तू बांसुरी बने तो तुझे होंठों से लगा लूं।
तू फूल बने तो अपनी सांसो में समा लूं।
तू पीर बने तो तुझे मैं सीने से लगा लूं।
तू आस बने तो तुम्हें जीवन में बसा लूं।
तन भी फूल मन फूल, हर और फूल
समाया।
तेरी हंसी में प्रीतम हमने फूलो को हंसता पाया।
दूर डाल पर बैठ पपीहा, रहा पिहूं-पिहूं
पुकार,
तेरे रूप को देखा प्रियतम, बैठी
हूं दिल हार,
मधुर तुम्हारे बेना लागे, होते
दिल के पार।
तुमसे हुई जो आंखें चार, मैं तो
इत गई ये दिल हार।
लुटा मेरे दिल का करार, हो गई भव
सागर के पार।
ओ निर्दय जोगी तुम कब आओगे मेरे द्वार
झालर बन कर लटक है मेरे ह्रदय का प्यार
श्वास का हर छंद रटता, प्रीतम
तेरी पुकार।
(ओशो की मधुशाला)
मनसा-मोहनी दसघरा
.jpg)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें