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गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

स्‍वर्णीम बचपन - (सत्र-- 40)

मैं कल्‍कि अवतार नहीं हूं
     
      मैं खड़ा हूं—अजीब बात है, इस समय तो मैं आराम कर रहा हूं—मेरा मतलब है अपनी स्मृति में मैं मस्‍तो कि साथ खड़ा हूं। निश्‍चित ही तो ऐसा कोई और नहीं है जिसके साथ मैं खड़ा हो सकता हूं। मस्‍तो के बाद दूसरे किसी का संग-साथ तो बिलकुल अर्थहीन है।
      मस्‍तो तो पूर्णतया समृद्ध थे—भीतर से भी और बाहर से भी। उनके रोम-रोम से उनकी आंतरिक समृद्धि झलकती थी। अपने विविध संबंधों का उन्‍होंने जो विशाल जाल बुन रखा था उसका हर तंतु मूल्‍य वान था और इसके बारे मैं उन्‍होंने मुझे धीरे-धीरे अवगत किया। अपने जाने-पहचाने सब लोगो से तो उन्‍होंने मुझे परिचित नहीं कराया—ऐसा करना संभव नहीं था। मुझे जल्‍दी थी वह करने की जिसे में कहता हूं, न करना। वे मेरे प्रति अपनी जिम्‍मेवारी को पूरा करने की जल्‍दी मैं थे। चाहते हुए भी वह मेरे लिए अपने सब संबंधों का लाभ उपलब्‍ध न करा सके। इसके दूसरे कारण भी थे।
      वे परंपरागत संन्‍यासी थे। कम से कम ऊपरी तल पर, परंतु उनको मैं भीतर से जानता था। वे परंपरागत नहीं थे। पर ऐसा होने का ढोंग करना पड़ता था, क्‍योंकि लोगों की भीड़ ही उनसे चाहती थी। आज मैं समझ सकता हूं कि उनको पीड़ा झेलनी पड़ी होगी। मुझे वैसी पीडा कभी नहीं हुई क्‍योंकि मैंने हर प्रकार के ढोंग से इंकार कर दिया।   
      तुम्‍हें विश्‍वास नहीं होगा कि हजारों लोग मुझे यह उपेक्षा कर रहे थे कि मैं उनकी कल्पनाओं को साकार कर दूँ अर्थात मेरा आचरण उनकी कल्‍पनाओं के अनुसार हो मुझे उनसे कोई मतलब न था।
      मेरे लाखों अनुयायियों में से हिंदू लोग—मैं उस समय की बात कर रहा हूं जब मैंने अपना काम अभी शुरू नहीं किया था। लोग मुझे कल्‍कि मान रहे थे। कल्‍कि हिंदुओं का अंतिम अवतार है।
      इसके बारे में मुझे तुम लोगों को कुछ बातें समझनी पड़ेगी। भारत में प्राचीन हिंदू परमात्‍मा के केवल दस अवतार मानते थे। वह स्‍वभाविक है क्‍योंकि उस समय लोग अंगुलियों पर ही गिनती किया करते थे। और दस की संख्‍या अंतिम थी। एक से दस ही गिना जाता था। इसलिए हिंदुओं का यह विश्‍वास था कि अस्‍तित्‍व के हरेक चक्र में दस अवतार होते है। अवतार शब्‍द का अर्थ है: दिव्‍य का अवतरण। दस इसलिए क्‍योंकि दस के बाद एक चक्र समाप्‍त हो जाता है। इसके तुरंत बाद ही दूसरा आरंभ हो जाता है। फिर पहला अवतार आता है। और इस प्रकार यह कहानी दस तक चलती रहती है।
      अगर तुमने भारतीय गरीब किसानों को गिनती करते हुए देखा हो तो तुम मेरी बात को समझ जाओगे। वे अपनी अंगुलियों पर दस तक गणना करते है—इसके बाद फिर वे एक दो से शुरू करते है। आदिवासियों में दस का अंक अंतिम है। अजीब बात है, जहां तक भाषाओं का ख्याल है अभी भी वैसा ही है। दस के बाद कुछ नहीं। ग्‍यारह का अंक तो केवल पुनरूक्‍ति है। एक के पीछे एक रख दिया गया है। उनका विवाहा कर दिया गया है और उन्‍हें मुसीबत में डाल दिया। दस तक के अंक मौलिक क्‍यों है। क्‍योंकि सब जगह आदमी ने अपनी अंगुलियों पर ही गिनती की है।
      इससे पहले कि यह चर्चा मैं चालू रखूं—थोड़ा सा मोड़ तुम्‍हें बताना चाहता हूं कि एक दो तीन..........दस अंकों के लिए तुम्‍हारे अंग्रेजी के बाद जो शब्‍द है उस सबको संस्‍कृत से उधार लिया गया है। गणित तो संस्‍कृत का ऋणी है। क्‍योंकि इन अंको के बिना न तो अल्बर्ट आइंस्टीनी होता। न एटम बम होता, न ब्रट्रेंड़रसल और न  हाइट हैड का प्रिसिपिआ        मैथेमेटिका होता। ये अंक बुनियादी ईंटे हैं। और ये हिमालय की घाटी में रखी गई थी। शायद उनहोंने असीम सौंदर्य को देख कर उसको मापना चाहा था। या कोई दूसरा कारण रहा होगा। परंतु एक बात तो निश्‍चित है कि संस्‍कृत का षष्‍ठ अंग्रेजी में सिक्थ बन जाता है। संस्‍कृत का अष्‍ट एट बन जाता है। और इसी प्रकार दूसरे अंकों का रूप भी थोड़ा बदल जाता है।
      मैं क्‍या कहा रहा था?
                आप कहते थे कि हिंदू समझ रहे थे कि आप परमात्‍मा के अंतिम अवतार कल्‍कि है।
      हां, तुम अच्‍छी तरह से सुन रहे हो।
      कल्‍कि हिंदुओं का दसवां और अंतिम अवतार है। उसके बाद दुनियां समाप्‍त हो जाती है। और फिर से आरंभ होती है। ठीक उसी तरह जिस तरह तुम ताश का घर गिरा देते हो। और फिर उसे बनाते हो। हां, बनाने से पहले ताश के पत्‍तों को थोड़ा सा मिलाते हो, ऊपर-नीचे करते हो। इससे तुम्‍हारी उत्‍साह बढ़ जाता है। पत्‍तों को तो कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन इससे तुम्‍हारा उत्साह बढ़ जाता है।
      बस इसी प्रकार परमात्‍मा भी ऊपर-नीचे करता है। कि शायद इस बार मैं अधिक अच्‍छा कर सकूंगा। किंतु वह जो करता है—हर बार रिचर्ड निकसन, एडोल्‍फ हिटलर, मोरार जी देसाई.....बाहा निकल आते है...मेरा मतलब यह है कि परमात्‍मा हर बार असफल हो जाता है।
      हां, कभी-कभी वह असफल नहीं भी होता। किंतु इसका श्रेय तो मनुष्‍य को मिलना चाहिए क्‍योंकि वह ऐसी दुनिया में सफल होता है जहां पर सब कुछ असफल है। इसका श्रेय परमात्‍मा को नहीं दिया जा सकता। वह दुनिया परमात्‍मा की बदनामी का अच्‍छा प्रमाण है।
      ऋग्‍वेद के समय से भी पहले, कोई दस हजार वर्ष पहले से हिंदू दस के अंक को अंतिम अंक मानते आ रहे है। परंतु जैन, जो हिंदुओं से कही अधिक प्राचीन, तार्किक और गणितज्ञ है। दस की संख्या की पावनता में विश्‍वास नहीं करते। उनकी अपनी अलग मान्यता है। निश्‍चित ही उन्‍होंने भी किसी स्‍त्रोत से गणना निर्धारित की होगी। अगर अपनी अंगुलियों से गणना निर्धारित नहीं कि तो किसी और तरीके से निर्धारित की होगी। कोई और स्‍त्रोत रहा होगा।
      जैनों ने जो किया, उसकी स्‍पष्‍ट चर्चा कभी नहीं की गई। और मैं किसी शास्‍त्र से इसकी पुष्‍टि नहीं कर  सकता क्‍योंकि शायद मैं ही इसके बारे में पहली बार बोल रहा हूं। अगर किसी ने इसकी चर्चा मुझसे पहले की है तो मुझे मालूम नहीं है। इसीलिए मैं कहा रहा हुं कि शायद। परंतु जानने योग्‍य सभी शास्‍त्रों को में जानता हूं। दूसरों कि और मैंने ध्‍यान नहीं दिया। पर फिर भी हो सकता है कि भीड़ में मैंने किसी ऐसे की उपेक्षा कर दी हो जिसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए थी। इसीलिए शायद शब्द का प्रयोग करना पडा । अन्यथा मैं निशचित रूप से जानता हूं कि इससे पहले किसी दूसरे ने ऐसा नहीं कहा परंतु अब इसे कहा देना चाहिए।
      जैन चौबीस गुरूओं को मानते हे। वे उन्हें तीर्थंकर कहते है। तीर्थ कर शब्‍द बहुत ही सुंदर है। इसका अर्थ है: दूसरे किनारे पर जाने के लिए जो तुम्‍हारी नाव के लिए घाट बनाता है। तीर्थ का यही अर्थ है। तीर्थकर का अर्थ है: जो ऐसा घाट बनाता है जहां से अनेक-अनेक लोग दूसरे किनारे पर जा सकते है। परंतु वे चौबीस को मानते है। उनकी सृष्‍टि का भी एक चाक है किंतु वह बड़ा है। हिंदुओं का दस का चक्र है। जैनों का चौबीस का बड़ा चक्र है उनका क्षेत्र बड़ा है।      
      हिंदू भी अनजाने ही इस चौबीस की संख्‍या से प्रभावित हो गए। क्‍योंकि जैन उनसे कहते थे कि तुम्‍हारे पास ता केवल दस है—हमारे पास चौबीस है। ये बच्‍चों जैसी बातें है। बच्‍चे एक-दूसरे से पूछते है कि तुम्‍हारे पापा कितने बड़े है। क्‍या वे केवल पाँच फीट ऊंचे है। मेरे पापा तो छह फीट ऊंचे है। मेरे पापा कैसे बड़ा तो कोई हो ही नहीं सकता। और यह परमात्‍मा भी कुछ और नहीं बस पापा ही होता है। परमात्मा हीं। अब्‍बा, वास्‍तव में प्रेम ओर आदर का शब्‍द है। पिता शब्‍द से प्रेम की यह ध्‍वनि नहीं निकलती। जैसे ही तुम और आदर का शब्‍द है। पिता शब्‍द से प्रेम की वह ध्‍वनि नहीं निकलती। जैसी ही तुम पिता या फादर कहते हो कुछ गंभीर रहो जाता है। अपने पादरियों को फादर कहते है। उनके लिए डैडी पापा शब्‍द उपयुक्‍त नहीं है। और बच्‍चे अब्‍बा शब्‍द पर हंसेगे—कोई उनको गंभीरता से नहीं लेता।
      हिंदू भारत के बाहर से आए। ये इस देश के मूल निवासी नहीं है। ये विदेशी है—बिना पासपोर्ट के । शताब्‍दियों तक ये मध्‍य एशिया से आते रहे है। यहीं से यूरोप की अन्य जातियां भी आई है—फ्रांसीसी,अंग्रेज,जर्मन, रूसी, स्‍केंडीनेवीयन, हिरीथूएनियन आदि-आदि।
      सभी यन्‍स मंगोलिया से आए है। आज तो मंगोलिया रेगिस्‍तान जैसा बन गया है। मंगोलिया के बारे में कोई सोचता भी नहीं है कि यह एक देश है। इसका कुछ भाग तो चीन का है और इसका अधिकांश भाग रूस में चला गया है। निरंतर इसी बात पर झगड़ा होता रहता है। कि इसकी सीमा-रेखा कहां खींची जाए। क्‍योंकि मंगोलिया तो सिर्फ रेगिस्‍तान है।
      परंतु ये सब लोग—विशेषत: आर्य मंगोलिया से ही आए। ये भारत चले आए, क्‍योंकि एकाएक मंगोलिया रेगिस्‍तान बनने लगा और उनकी जनसंख्‍या भारतीय ढंग से बढ़ने लगी थी। इसीलिए उन्‍हें सभी दिशाओं में जाना पडा। अच्‍छा ही हुआ इसी प्रकार इन विभिन्न देशों का निर्माण हुआ।   
      आर्यों के भारत में आने से पहले ही ये देश अति सभ्य और सुसंस्‍कृत था। यह यूरोप जैसा नहीं था। जब आर्य जर्मनी ओर इंग्लैड पहुंचे तो उनको किसी से भी लड़ाई नहीं करनी पड़ी। उन्‍हें वहां पर बहुत सुंदर जमीन मिल गई जहां पर किसी का उन्‍हें डर नहीं था। परंतु भारत में ऐसा नहीं था। आर्यों के प्रवेश के पहले भारत में जो लोग रहते थे वे बहुत ही सुसभ्‍य  रहे होंगे। मेरा मतलब है कि वे केवल शहरों में ही नहीं रहते थे।
      उस समय के दो शहर खुदाई में निकाले गए है—मोहलजोदरो और हड़प्‍पा। अब ये पाकिस्‍तान में है। किंतु पहले भारत में ही थे। इन शहरों में आश्‍चर्यजनक चीजें है। इन शहरों की गलियाँ बहुत चौड़ी होती थी। साठ फीट चौडी। इमारतें तीन मंजिल की होती थी। बेडरूम के साथ-साथ बाथरूम भी होते थे।    
      आज भी भारत में लाखों लोग यह नहीं जानते कि बेडरूम के साथ बाथरूम भी हो सकता है। अगर उन्‍हें यह बात बताई जाए तो वे इस पर विश्‍वास ही नहीं करते और वे हंसने लगते है। वे समझते है कि तुम पागलों जैसी बात कर रहे हो—बेडरूम के साथ बाथरूम कैसे हो सकता है।
      स्केंडीनेवीयन का जो नवीनतम मकान का नक्‍श बनाने वाला है वह तुम्‍हें भी पागल ही मालूम होगा। क्‍योंकि उसके बाथरूम के भीतर ही बेडरूम है। सारा दृष्‍टिकोण ही बदल गया। बुनियादी रूप से तो यह बाथरूम ही है और उसके एक कोने में बेडरूम बना हुआ है। अलग भी नहीं है। बाथरूम अधिक महत्वपूर्ण है। उसके भीतर एक छोटा सा स्‍विमिंग पुल भी बना हुआ है। और जरूरत की सब चीजें वहां पर मौजूद है, उसमें एक चारपाई भी बनी हुई है। बाथरूम बेडरूम से जुड़ा हुआ नहीं है बेड ही बाथरूम में है।
      भविष्‍य में शायद ऐसा ही होगा। परंतु अगर भारत के लोगों को यह बात बताई जाए...। सारे गांव में अकेला मैं ही था—मेरे नाना के गांव में जहां पर मैं बहुत दिन तक रहा—जिसने अपने बेडरूम के साथ ही बाथरूम बनाया हुआ था। लोग इसका मजाक उड़ाते थे। कि क्‍या सचमुच तुम्‍हारे बेडरूम के साथ बाथरूम बना हुआ है। और वे इस बात को बहुत धीरे से फुसफुसा कर कहते थे।
      मैं उनसे कहता: इसमें छिपाने की क्या बात है, हां—है तो क्‍या?
      उन्‍होंने कहा: हमें विश्‍वास नहीं होता। क्‍योंकि यहां पर तो हमने ऐसा कभी नहीं सुना कि बेडरूम के साथ लगा हुआ बाथरूम भी होता है। जरूर यह तुम्‍हारी नानी का विचार रहा होगा। वे बहुत खतरनाक है। वे यहां की नहीं है। कहीं दूर से आई है। हमने उनके जन्‍मस्‍थान की जो कहानियाँ सुनी है उन्‍हें हम अपने बच्‍चों को भी नहीं सुना सकते । और तुम्‍हें भी नहीं बताएँगे।
      मैंने उनसे कहा: आप लोग इसकी चिंता मत करो, आप मुझे बता सकते है क्‍योंकि मेरी नानी स्वयं इन के बारे में मुझे बताती है।
      वे कहते, देखो, हमने तो पहले ही कहा था कि वे खजुराहो से आई हुई विचित्र औरत है। वहां पर सही लोग पैदा ही नहीं होते है।
      शायद मुझमें नानी का जो खून है उसके कारण ही लोग जिसे गलत मानते है उसे मैं ठीक मानता हूं।
      इस दुनियां में जब कि हिंदू अपने धर्म को सबसे प्राचीन मानते है, लेकिन ऐसा नहीं है। जैन सबसे प्राचीन है। पर वे अल्‍पसंख्‍यक है और बहुत कायर है। परंतु इन्‍होंने चौबीस की संख्‍या के बारे में सोचा। चौबीस क्‍यों? मैंने इसके बारे में सोचा है मेंने इसके बारे में मस्‍तो से अपनी मां से और अपनी तथाकथित सास से चर्चा की थी।

      इस तथाकथित अपनी सास के बारे में बादमें बात करूंगा। मेरे सामने तो उसको मेरी सास कोई भी नहीं कहता था। क्‍योंकि दोनों ही खतरनाक थे। मेरी नानके बाद मेरे परिचितों में से वह सबसे अधिक साहसी स्‍त्री थी। उसको मैं प्रथम स्‍थान तो नहीं दे सकता मजाक ही मजाक में उसे मेरी सास कहा जाता था। वह मेरी मां जैसी थी। मैंने उसकी बेटी से शादी नहीं की थी परंतु उसकी बेटी का मुझसे प्रेम था। उसके बारे में मैं किसी और चक्र में बात करूंगा क्‍योंकि वह तो वास्‍तव में दुस्चक्र है। और उसको मैं अभी आरंभ नहीं करना चाहता।
                समय क्‍या हुआ है?
                साढ़े दस बजे हैं,ओशो।
      वाह,सिर्फ मेरे लिए दस मिनट ओर, बहुत ही सुंदर है।
(और उन दस मिनट में सब मौन हो ध्‍यान में बैठे रहते है और ओशो, हंसते है धीमे-धीमे आरे वो हंसते हुए चले जाते है)

-- ओशो                बचपन में बनाया एक दुर्लभ चित्र

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन—( सत्र- 39 )

      पंडित जवाहरलाल नेहरू से भेट

      देव गीत, मुझे लगता है तुम किसी बात से परेशान हो रहे हो। ।तुम्‍हें परेशान नहीं होना चाहिए, ठीक है?
      ठीक है।
      ....नहीं तो नोट कौन लिखेगी, अब लिखने वाले को तो कम से कम लिखने वाला ही चाहिए।
      अच्‍छा। ये आंसू तुम्‍हारे लिए है, इसीलिए तो ये दाईं और है। आशु चुक गई। वह बाईं और एक छोटा सा आंसू उसके लिए भी आ रहा है। मैं बहुत कठोर नहीं हो सकता। दुर्भाग्‍यवश मेरी केवल दो ही आंखें है। और देवराज भी यहीं है। उसके लिए तो मैं प्रतीक्षा करता रहा हूं। और व्‍यर्थ में नहीं। वह मेरा तरीका नहीं है। जब में प्रतीक्षा करता हूं। तो वैसा होना ही चाहिए। अगर वैसा नहीं होता तो इसका मतलब है कि मैं सचमुच प्रतीक्षा नहीं कर रहा था। अब फिर कहानी को शुरू किया जाए।
      मैं इंदिरा गांधी के पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू के दो कारणों से नहीं मिलना चाहता था। मैंने इसके बारे में मस्‍तो से कहा भी किंतु वे नहीं माने। वह मेरे लिए बिलकुल ठीक आदमी थे। पागल बाबा ने गलत आदमी के लिए सही आदमी को चुना था। मैं तो किसी की भी नजर में कभी भी ठीक नहीं रहा। किंतु मस्‍तो था। मेरे सिवाय आरे कोई नहीं जानता था कह वह बच्‍चें की तरह हंसता था। परंतु वह हमारी निजी बात थी—और भी कई निजी बातें थीं,अब इनकी चर्चा करके मैं इनको सार्वजनिक बना रहा हूं।
      कई दिनों तक हम यह बहस करते रहे कि मुझे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री से मिलने जाना चाहिए कि नहीं। मैं सदा की तरह इसके लिए राज़ी नहीं हो रहा था। जैसे ही तुम मुझसे कहीं जाने के लिए पुछोगे—यहां तक कि भगवान के घर जाने के लिए भी—वैसे ही मैं कहूंगा कि हम सोचेंगे या हम उसको चाए पर बुला सकते है।
हम बहस करते गए और करते ही गए, लेकिन वे सिर्फ मेरे तर्कों को ही नहीं समझ
रहे थे, बल्‍कि तर्क करने वाले को भी समझ रहे थे और उसके लिए वे ज्यादा चिंतित थे।
      उन्‍होंने कहा: तुम जो चाहे कहो, लेकिन, जब वे अपने तर्क से मुझे पराजित न कर सकते तो अंत में वे सदा अपना यह अचूक तीर चलाते, पागल बाबा ने मुझसे ऐसा करने को कहा था, अब तुम जानो कि क्‍या करना है।
      मैंने कहा: अगर तुम कहते हो कि पागल बाबा ने तुमसे यह कहा था, तो फिर ठीक है, वैसा ही होने दो। अगर वे जीवित होते तो मैं उन्‍हें इतनी आसानी से न छोड़ देता। किंतु अब तो वे है ही नहीं और मृत आदमी से—विशेषत: अपने प्रिय व्‍यक्‍ति से तर्क नहीं किया जा सकता।     
वे हंस पड़ते और कहते: अब तुम्‍हारे तर्कों को क्‍या हुआ?
मैंने कहा: अब तुम चुप रहो। तर्क में जीतने के लिए तुम मृत पागल बाबा को बीच
 में खड़ा कर देते हो। तुम तर्क में नहीं जीत सके....मैंने अपनी हार मान ली, अब तुम्‍हें जो करना है करो। पिछले तीन दिन से तुम जिसके बारे में तर्क कर रहे हो वहीं करो।
      किंतु वे तर्क बहुत ही सुंदर थे, बहुत ही सूक्ष्‍म और दूर तक पहुंचने वाले थे। किंतु आज उस पर चर्चा करने की कोई आवश्‍यकता नहीं है। शायद फिर किसी दूसरे चक्‍कर में...
      मस्‍तो इस बात का आग्रह कर रहे थे कि मुझे प्रधानमंत्री से मिलना चाहिए। क्‍योंकि कोई नहीं जानता, शायद किसी दिन मुझे उसकी सहायता की जरूरत पड़ जाए।
      मैंने मस्‍तो से कहा: तुम इन शब्‍दों के साथ यह भी जोड़ दो कि शायद कभी प्रधानमंत्री को मेरी सहायता की जरूरत हो सकती है। ठीक है। मैं जाने को तैयार हूं। अगर बाबा ने तुमसे ऐसा कहा है तो बेचारे बाबा को निराश नहीं करना चाहता । परंतु मस्‍तो क्‍या तुममें इतनी हिम्‍मत है कि मैंने जो कहा है उसको तुम अपने शब्‍दों के साथ जोड़ दो।
      थोड़ा झिझकते हुए वे तक कर खड़े हो गए और उन्‍होंने कहा: हां, एक दिन शायद नही, निश्चित ही उनको या उस कुर्सी पर बैठने वाले किसी भी व्‍यक्‍ति को तुम्‍हारी सहायता की आवश्‍यकता होगी। अब तो तुम मेरे साथ चलो।
      उस समय मैं केवल बीस बरस का था। मैंने मस्‍तो से पूछा: क्‍या तुमने जवाहरलाल को मेरी उम्र के बारे में बताया है। वे बुजुर्ग है और दुनिया के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक देश के प्रधानमंत्री है। और उनके मन में हजारों बातें चल रही होगी क्‍या उनके पास मेरे जैसे लड़के के लिए समय होगा। ऐसा लड़का जो रुढिवादी नहीं है—मेरा मतलब जो कनवैंट से नहीं है।
      मेरा तो ढंग ही निराला था। पहले तो मैं खड़ाऊँ पहनता था, जो बहुत आवाज करता थी और एक उपद्रव थीं। वे यह घोषणा कर देती थी के मैं आ रहा हूं। नजदीक आ रहा हूं। जितना नजदीक होता उतनी वे ज्‍यादा आवाज करती।
      मेरे हेड मास्‍टर कहते: तुम्‍हें जो करना है करो, जाकर फिर सेब को खा लो। वे ईसाई थे। इसलिए उन्‍होंने ऐसा कहा। या अगर तुम सांप को खाना चाहते हो तो उसे भी खा लो। परंतु भगवान के लिए इन खड़ाऊँ को इस्‍तेमाल मत करो।
      मैंने उनसे कहा: आप पहले मुझे अपने नियमों की किताब दिखाइए जिसे आप हर बार मुझे दिखाते है जब भी मैं कुछ गलत करता हूं। क्‍या उसमें खड़ाऊँ के बारे में कुछ लिखा है?
      उन्‍होंने कहा: है भगवान, अब ये कौन सोच सकता था कि कोई छात्र खड़ाऊँ पहन कह आएगा। इसके बारे में तो मेरी पुस्‍तक में कुछ नहीं लिखा है।
      मैंने कहा: तब तो आपको शिक्षा मंत्रालय से पूछताछ करनी पड़ेगी। परन्‍तु जब तक वे यह नियम नहीं बना देते कि स्‍कूल में खड़ाऊँ नहीं पहनी जा सकती तब तक मैं इसको इस्‍तेमाल करता ही रहूंगा। मैं नियमों के अनुसार ही चलता हूं। अगर इस खड़ाऊँ मे विरूद्ध कोई नियम बनाया गया तो दुनिया इस बात पर हंसेगे।
      हेड मास्टर ने कहा: हां, मुझे मालूम है कि तुम सदा कानून का पालन करते हो। कम से कम इस मामले में तो अवश्‍य करते हो। गनीमत है कि तुमने यह आग्रह नहीं किया कि मैं भी खड़ाऊँ पहन लू।
      मैने कहा: मैं तो प्रजातांत्रिक व्‍यक्‍ति हूं। किसी से कोई जबरदस्‍ती नहीं करना चाहता। आप अगर नग्न भी आ जाएं तो मैं यह नहीं पूछूंगी कि आपकी पेंट कहा है?
      उन्‍होंने कहा: क्‍या?
      मैंने कहा: मैं तो उसी तरह बोल रहा था। जैसे आप क्‍लास में बोलते है कि अगर ऐसा हो तो....मैं यह नहीं कह रहा की सचमुच आप नग्‍न आ जाए। ऐसा करने का आप में सहसा नहीं है। ,(खड़खड़ की आवाज फिर होने लगती है)इसके बारे में केवल आशीष ही कुछ कर सकता है!
      मैं क्‍या कहा रहा था?
      आप हेड मास्टर से कह रहे थे कि उसमें इतना सहसा नहीं है कि वह बिना पेंट पहने ही आ जाएं।
      हां, मैंने उनसे कहा: यह तो मैं केवल कल्‍पना करने की बात कर रहा हूं। आप जिस प्रकार क्‍लास में कहते है—मान लो कि, तब हम यह नहीं पूछते कि वास्‍तव में ऐसा है या नहीं। इसीलिए मुझसे भी मत पूछिए। मान लीजिए कि आप बिना पेंट के आ जाएं...अब मैं कुछ और जोड़ देता हूं—बिना कमीज के या बिना जांघिक के.....
      हेड मास्टर ने कहा: तुम यहां से बाहर चले जाओ।
      मैंने कहा: मैं तब तक नहीं जाऊँगा जि तक आप ये न कहा दें कि मैं खड़ाऊँ इस्‍तेमाल कर सकता हूं। मैं अहिंसक आदमी हूं इसलिए मैं चमड़े का इस्‍तेमाल नहीं कर सकता। लकडी बिलकुल प्राकृतिक है। या तो मैं आपकी तरह चमड़े का इस्‍तेमाल करूं। हालांकि आप अपने आप को ब्राह्मण कहते है। आप चमड़े के इन जूतों के साथ अपने आपको ब्राह्मण कैसे कह सकते है। या मैं खड़ाऊँ पहंनू।
      उन्‍होंने कहा: तुम्हे जो करना हो करो, जितने जल्‍दी हो सके, जितने दूर जा सको चले जाओ। क्‍योंकि मैं शायद ऐसा कुछ कर बैठूं जिसके लिए मुझे अपनी सारी उम्र पछताना पड़े।
      मैंने कहा: क्‍या आप सोचते है कि आप मुझे जान से मार सकते है, सिर्फ मेरी खड़ाऊँ के कारण।
      उन्‍होंने कहा: और अधिक प्रश्न मत पूछो। मुझे परेशान मत करो। परंतु मैं तुम्‍हें बताना चाहता हूं कि जब मैं खड़ाऊँ की आवाज को सुनता हूं—और स्‍कूल के फर्श पत्‍थर से ही बने हुए थे—मुझे इनकी आवाज कहीं से भी सुनाई देती है। यह असंभव है कि इनकी आवाज न सुनाई दे। पता नहीं क्‍यों पर हर वक्‍त तो तुम चलते रहते हो। ओर उस आवाज से में बौखला जाता हूं।
      मैंने कहा: वह आपकी समस्‍या है। मैं तो खड़ाऊँ ही पहनूंगा।
      और जब तक मैंने युनिवर्सिटी को नहीं छोड़ा तब तक खड़ाऊँ पहनता ही रहा। हाई स्‍कूल से लेकर युनिवर्सिटी तक मैंने खड़ाऊँ ही पहने। कोई भी मेरे बारे में तुम्‍हें बता सकता था। क्‍योंकि सिर्फ मैं ही खड़ाऊँ पहनता था। इसलिए सब लोग कहते थे कि तुम उसकी आवाज मीलों दूर से सुन सकते हो।
      मुझे ये खड़ाऊ बहुत अच्‍छी लगती थी। जहां तक मेरा सवाल था, मुझे वे बहुत पसंद थीं क्‍योंकि उन्‍हें पहल कर मैं रात को और सुबह के समय मीलों घूमता था। सैर करता था। तुम लोगों को तो खड़ाऊँ का कोई अनुभव नहीं है। ऐसा लगता है जैसे कोई अपने पीछे चल रहा हो। जब के अपने को पता होता है कि अपनी ही खड़ाऊँ की आवाज है ।फिर भी बीच-बीच में संदेह होने लगता है कि पीछे मूड कर एक बार देख ही लिया जाए कि कौन  मेरा पीछा कर रहा है। मुझे वर्षो लग गए अपने आप को समझाने में कि मुझे ऐसी मूर्खतापूर्ण चीजें नहीं करनी चाहिए। और इससे भी अधिक समय लग गया यह समझाने में कि ऐसी बेवकूफी की चीजें करने के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए।
      मैंने मस्‍तो से कहा: दूसरे लोग जिन कामों के लिए आसानी से तैयार हो जाते है उन कामों के लिए भी मैं जल्‍दी से राज़ी नहीं होता। हां कहना मुझमें बहुत देर के बाद आया। मैं तब तक नहीं-नहीं कहता गया जब तक यह नहीं अपने आप हां में परिवर्तित नहीं हो गई। किंतु मैं इसकी प्रतीक्षा नहीं कर रहा था।
      अब यह तो विषयांतर हो गया। सच तो यह है कि इस वार्ता माला में विषयांतर होता ही रहेगा। किंतु मैं बार-बार उसी बिंदु पर वापस आने की कोशिश करता रहूंगा जहां से हम दूसरे विषय पर चले गए थे।
      अंत में मैं राज़ी हो गया। मस्तो और मैं प्रधानमंत्री के घर गए। मुझे मालूम नहीं था कि कितने लोग मस्‍तो का आदर करते है। क्‍योंकि दुनिया के बारे में तो मैं कुछ ज्‍यादा जानता ही नहीं था। मैंने रास्‍ते में उनसे पूछा कि क्‍या तुमने उनके साथ समय तय कर लिया है?
      वह हंसे और उन्‍होंने कुछ नहीं कहा। मैंने मन ही मन सोचा, अगर इन्‍हें चिंता नहीं है तो मैं क्‍यों चिंतित हो रहा हूं। ये मेरी परेशानी नहीं है।, मैं तो सिर्फ इनके साथ जा रहा हूं। जैसे ही हम फाटक के भीतर घूसे मैं यह समझ गया कि मस्‍तो को यहां आने के लिए किसी से कुछ भी पूछने की जरूरत नहीं है। वहां पर जो सिपाही खड़ा था उसने मस्‍तो के पैरों को छूकर कहा: बाबा आप तो कई महीनों से नहीं आए। हम तो आपके दर्शन को  तरस गए। कभी-कभी प्रधानमंत्री को भी आपका आशीर्वाद चाहिए होता है।     
      मस्‍तो हंसे किंतु उन्‍होंने कुछ नहीं कहा। जैसे ही हमने प्रवेश किया सैक्रेटरी ने उनके पैर छुए और उनसे कहा: अगर आप टेलीफोन कर देते तो हम प्रधानमंत्री की कार भेज देते। और ये लड़का कोन है?
      मस्‍तो ने कहा: मैं इस लड़के को सिर्फ जवाहरलाल से मिलाने को लाया हूं। और किसी से नहीं। और याद रखना कि उसके बारे में किसी भी तरह से कुछ नहीं कहना। उन्‍होंने तो पूरी सावधानी से काम किया किंतु फिर भी मेरे सिद्धांत ने भी अपना काम कर ही दिया।
      मैंने तुम्‍हे बताया है कि जैसे ही हम एक मित्र बनाते है वैसे ही एक दुश्‍मन भी बन जाता है। अगर तुम्‍हे दुश्‍मन नहीं चाहिए तो मित्र मत बनाओ। बौद्ध और ईसाई साधुओं का यही ढंग है। वे सब संबंधों को, मित्रता और सबको भूल जाते है ताकि कोई दुश्‍मन न बने। परंतु जीवन का एक मात्र उद्देश्‍य यही तो नहीं है कि कोई दुश्‍मन न बने।
      तुम्हें हैरानी होगी जैसे कि मुझे हुई थी....उस दिन नहीं बहुत वर्षो के बाद..उस दिन तो मेरे लिए यह संभव नहीं था कि मैं उस आदमी को पहचान सकूं जो सैक्रेटरी के आफिस में बैठा हुआ भेंट करने के नियुक्‍त समय का इंतजार कर रहा था। उस समय मैंने उस के बारे में कुछ नहीं सुना था किंतु वह बहुत घमंडी दिखाई दे रहा था । मैंने सोचा कि वह कोई बहुत शक्ति शाली आदमी होगा।
      मैने मस्‍तो से पूछा: ये आदमी कौन है?
      मस्‍तो ने कहा: हां, मेरा मतलब है कि काई खास महत्‍व के नहीं है। बस यूं ही.....हां, वह कैबिनेट मिनिस्‍टर है....जरा देखो, वह कितने गुस्‍से में है, क्‍योंकि इस समय उन्‍हें प्रधानमंत्री के साथ होना चाहिए था। उनको यह समय दिया गया था।
      परंतु मस्‍तो को सब लोग जानते थे और प्रधानमंत्री ने उनको पहले बुला लिया और मोरार जी देसाई को इंतजार करने को कहा। जवाहरलाल ने अनजाने में ही उनका अपमान कर दिया। परंतु मोरार जी देसाई तो शायद आज भी नहीं भूल सके। वह उस नवयुवक को शायद भूल हों किंतु उन्‍हें मस्‍तो तो याद होगा ही। क्‍योंकि हर प्रकार से मस्‍तो बहुत प्रभावशाली व्‍यक्‍तित्‍व वाले थे।
      हम लोग भीतर गए और वहीं पाँच मिनट नहीं पूरा एक घंटा और तीस मिनट ठहरे और मोरार जी देसाई को इंतजार करना पडा। उनके लिए यह सहन करना मुश्‍किल हो गया। वह उसका समय था और एक संन्‍यासी एक नवयुवक के साथ उनके पहले ही घुस गया... और फिर उनको नब्‍बे मिनट तक इंतजार करना पड़ा।
      और जीवन में पहली बार मैं हैरान रह गया। क्‍योंकि मैं तो यहां पर एक राजनीतिज्ञ से मिलने गया था। और जिसे मैं मिला वह राजनीतिज्ञ नहीं वरन कवि था। जवाहर लाल राजनीतिज्ञ नहीं थे। अफसोस है कि वह अपने सपनों को साकार नहीं कर सके। किंतु चाहे कोई खेद प्रकट करे, चाहे कोई वाह-वाह कहे, कवि सदा असफल ही रहता है यहां तक कि अपनी कविता में भी वह असफल होता है। असफल होना ही उसकी नियति है। क्‍योंकि वह तारों को पाने की इच्‍छा करता है। वह क्षुद्र चीजों से संतुष्‍ट नहीं हो सकता। वह समूचे आकाश को अपने हाथों में लेना चाहता है।
      मैं तो आश्‍चर्यचकित रह गया। जवाहरलाल के ध्‍यान में भी यह बात आई और उन्‍होंने कहा: क्या हुआ? ऐसा लगता है जैसे इस लड़के को शाक लगा हो।
      मेरी और बिना देखे ही मस्‍तो ने कहा: मैं इस लड़के को जानता हूं। इसलिए इसे मैं आपके पास लाया हूं। अगर मेरी सामर्थ्‍य में होता तो मैं आपको इसके पास ले जाता।
      यह सुन कर जवाहरलाल के बड़ा अचरज हुआ। परंतु वे बहुत ही सुसंस्‍कृत व्‍यक्‍ति थे। मस्‍तो के शब्‍दों के अर्थ को समझने के लिए उन्‍होंने फिर मेरी और देखा। एक क्षण के लिए हमने एक दूसरे की आंखों में देखा। आँख से आँख मिली और हम दोनों हंस पड़े। और उनकी हंसी किसी बूढे आदमी की हंसी नहीं थी। वह एक बच्‍चे की हंसी थी वे अत्यंत सुदंर थे। और मैं जो कह रहा हूं वही इसका तात्‍पर्य है। मैंने हजारों सुंदर लोगो को देखा है किंतु बिना किसी झिझक के मैं यह कह सकता हूं कि वह उनमें से सबसे अधिक सुंदर थे। केवल शरीर ही सुंदर नहीं था उनका...।
      अजीब बात है की हम कविता की बात कर रहे थे और मोरार जी देसाई बाहर बैठे इंतजार कर रहे थे। हम लोग ध्यान की बात कर रहे थे। और मोरार जी मन ही मन गुस्‍से में जल रहे होगें। उसी दिन से हम दोनों की शत्रुता निश्‍चित हो गई, उस पर मुहर लग गई। मेरी और से नहीं। मरा अपना तो उससे कोई विरोध नहीं है। उन्‍होंने जिन बातों का विरोध किया है वे मूर्खतापूर्ण है—उनका क्‍या विरोध करना। उन पर तो बस हंसा जा सकता है। यही मैंने किया है उनके नाम और उनकी यूरीन थेरेपी के साथ। अब उनका अपने ही पेशाब को पीना अमरीका में वे अपनी इस यूरीन थेरेपी का प्रचार कर रहे थे। कोई उनसे यह नहीं पूछता है कि अपना पेशाब पी रहे हो या किसी दूसरे का। क्‍योंकि जब कोई आदमी पेशाब पीने लगे तो इसका मतलब है कि वह अपने होश हवास में नहीं है। इसलिए अब वह कुछ भी पी सकता है—दूसरे का पेशाब तो क्‍या? और वे वहां पर पेशाब पीने का उपदेश दे रहे थे।
      उस दिन से वे मेरे शत्रुबन गए, मुझे इसके बारे में उस समय मालूम नहीं थी। इसका कारण यहीं था। उन्‍हें डेढ घंटे तक इंतजार करना पडा। वे जरूर मेरे बारे में सैक्रेटरी से जान गए होंगे। उन्‍होंने सैक्रेटरी से पूछा होगा कि यह लड़का कौन है और उसे प्रधानमंत्री से क्‍यों परिचित करवाया जा रहा है। इसका उद्देश्‍य क्‍या है? और मस्‍तो बाबा उसमें इतनी दिलचस्‍पी क्‍यों ले रहे है।
      अब अगर कहीं पर डेढ़ घंटे बैठना पड़ें तो थोड़ी-थोड़ी बातचीत तो करनी ही पड़ती है। मैं उस स्‍थिति को समझ सकता हूं। किंतु उनके लिए यह सहन करना बहुत मुश्‍किल हो गया। किंतु इससे भी बढ़ कर—उनको बरदाश्‍त के बाहर तब हो गया जब जवाहर लाल इस बीस वर्ष के लड़के को विदा करने के लिए स्‍वयं पोर्च में आएं।
      उस समय मोरार जी देसाई ने देखा कि प्रधानमंत्री मस्‍त बाबा से नहीं वरन खड़ाऊँ पहने हुए एक अजीब लड़के से बात कर रहे थे। उस सुंदर संगमरमर के बरामदे पर चलते हुए बहुत आवाज कर रहा था। उस समय मेरे बाल लंबे-लंबे थे और मैंने एक अजीब सा चोगा पहन रखा था, जिसको मैंने अपने हाथों से सिया था। क्‍योंकि अब जो मेरे संन्‍यासी मेरे लिए कपड़े बनाते है उस समय वे वहां नहीं थे। कोई भी वहां नहीं था।
      मैंने बहुत ही सीधा-साधा रोब बनाया था। उसमें बाँहों को बाहर निकालने के लिए दो सुराख थे और अगर बाँहों को भीतर रखना हो तो इन्‍हीं सुराखों में उन्‍हें भीतर कर लिया जात। इसे मैंने स्‍वयं बनाया था। इसके बनाने में कोई कारीगरी की जरूरत नहीं थी। बस कपड़े के एक टुकडे को दोनों ओर से सीकर गले के लिए एक छोटा सा सुराख बना देना था।
      मस्‍तो को ये चोगा बहुत पसंद आया। उसने किसी दूसरे से अपने लिए भी ऐसा ही बनवाया।
      मैंने कहा: तुम्‍हें इसके लिए मुझसे कहना चाहिए था।
      उन्‍होंने कहा: नहीं, यह ज्‍यादती हो जाती। अगर तुम उसे बनाते तो मैं उसे पहन ही नहीं सकता था। मैं उसे संजो कर अपने पास सुरक्षित रखता।
      हम उस बंगले से बाहर आ गए जो बाद में त्रिमूर्ति  के नाम से प्रसिद्ध हुआ। जवाहरलाल की स्‍मृति में उसे अजायब घर बना दिया गया है।
      जवाहरलाल सचमुच महान थे। वे एक लड़के को बाहर तक छोड़ने आए। जिसकी कोई जरूरत न थी और फिर इसके कार में बैठ जाने पर उन्‍होंने स्‍वयं कार का दरवाजा बंद किया और जब तक कार रवाना नहीं हो गई तब तक वहीं खड़े रहे। और बेचारे मोरार जी देसाई यक सब देख रहे थे। वे तो कार्टून है लेकिन यह कार्टून मेरा दुश्‍मन बन गया सदा के लिए। उन्‍होंने मुझे नुकसान पहुंचाने की भरपूर कोशिश की किंतु इसमें सफल नहीं हो सके।
      समय क्‍या हुआ है?
      आठ बज कर इक्‍कीस मिनट, ओशो।
      अच्‍छा मेरे लिए दस मिनट। फिर मुझे काम पर जाना है। इसके बाद मेरा आफिस शुरू होता है।


ओशो
         



मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

सुनहरी यादें--(खंड़-2)

ओशो का जीवन में प्रवेश

      कुछ बातें जीवन में ऐसी होती है, न तो उनके आने की आहट हमें सुनाई देती है और न ही उनके पदचाप ही हमारे ह्रदय में कही छपते है। वे अदृष्‍य मूक हमारे जीवन में प्रवेश कर जाना चाहती है। लेकिन ये कुदरत की प्रबोधन के आगमन अनुभूति इतना पारदर्शी अस्‍पर्शित होती है, कि वो अनछुआ क्वारी की क्वारी ही रह जाती है।। वो इतना शूक्ष्माति-शूक्ष्‍म होता है कि चाहे तो उसके आर-पार आसानी से आया जाया जा सकता है। मेरे जीवन में ओशो का प्रवेश भी कुछ ऐसे ही हुआ। हुआ भी नहीं का जा सकता क्‍योंकि जब उन्‍होंने आकर दस्‍तक दी तो मैं द्वार बंद कर करवट बदल कर सो गया।
      बात सन् 1985 की है उन दिनों ओशो अमरीका से भारत आये थे। मेरा व्‍यवसाय उस समय बहुत अच्‍छा चल रहा था। घर में वो सब कुछ था जो होना चाहिए। घर में ख़ुशियों के साथ-साथ जरूरत की हर चीज थी। मेरी लड़की अन्‍नू( मां बोद्धीउनमनी) उस समय पाँच वर्ष की थी। उसे एक टीचर पढ़ाने आया करता था। वो ओशो को पढ़ता था। एक दिन न जाने उस के मन में क्‍या आई वो जो ओशो पुस्‍तक हाथ में लिए हुए था। उसने मुझसे आग्रह किया की में एक बार इसे पढ़ कर देखूं। पुस्तकें पढ़ने का बालपन से ही शोक था खास कर हिन्‍दी साहित्य, मैं जब सातवीं कक्षा में था जब ही मैंने पूरा प्रेम चन्‍द साहित्‍य पढ़ लिया था। स्कूल की किताबों में कम मन लगता था, शरत चन्‍द, रविन्‍द्र नाथ, वंकिम दा, विमल मित्र, और नरेश मेहता, ही मेरे विस्‍तर में साथ सोते थे पुस्‍तकों के रूप में।
      सो वो मास्‍टर मुझे किताब देन के लिए ज़िद्द करता रहा, वो गिड़गिड़ाता रहा, बिना किसी स्वार्थ के। मानों कोई अदृष्‍य शक्‍ति उस पर आविष्‍ट हो गई है। और जीवन भी कितना रहस्‍य भरा है बाद मैं करीब पाँच या छं साल बाद वो मेरे पास ध्‍यान करने आया और सन्‍यास भी लिया। लेकिन प्रकृति ने उसको माध्‍यम बनाया मुझे जगाने का। जरूर उससे मुझसे कहीं जायद समर्पण करने की क्षमता होगी। उसका ह्रदय मुझसे कहीं तरल होगा। मैं एक बंजर भूमि बन खड़ा रहा। अब कितनी ही बरसात आ जाए उसमें उगने बाला कुछ भी नहीं था। इसमें और किसी का क्‍या दोष। हमारा मन बड़ा जटिल है, बहुत आयाम है इसके। ये इतना गहरा है आप इसके और छोर को पा नहीं सकते। शायद करोड़ो समुन्दर से भी अथाह गहरा। मैंने उससे साफ मना कर दिया पुस्तक लेने से। बड़ी अजीब बात है जब इससे पहले मैने ‘’ओशो’’ को पढ़ा ही नहीं जाना ही नहीं फिर ये कैसा आग्रह है पहले से। इस मन को कैसे पता चल गया की वो एक दार्शनिक है, तर कनिष्ट है, सम्मोहन विद है, और न जाने क्‍या-क्‍या निष्ठ। ये बड़ा अजीब रहस्य है...उस मास्‍टर को किताब हाथ में लिए गिड़गिड़ाते में आज भी अपनी आंखों के सामने खड़ा हुआ देख सकता हूं। उसकी आँखो झर-झर आंसू बह रहे थे। परंतु मैं पत्‍थर ह्रदय कैसे बन गया, मेरी समझ में नहीं आया। मैं टस से मस नहीं हुआ। या ये भी इस मन की ही कोई चालबाजी थी। बो तो मैं आज सालों पीछे जाकर देख पा सका हुं। मेरा अपना अनुभव तो यह कहता है कि जिस कार्य के लिए हमारा मन बिना किसी कारण के रोकना चाहे, उसे एक बार गहरे जाकर देख लेना चाहिए। ये शायद उस मन के मोत की ही कोई घंटी हो जो वो तो सुन सकता है और आपको उस ध्‍वनि से अनभिज्ञ कर देता है। एक कहानी एक बार एक गुरु ने अपने शिष्‍य के हाथ किसी घर्म गुरु के पास अपनी कोई पुस्‍तक भेजी। गुरु ने वो पुस्‍तक हाथ में लेते ही तुरंत बाहर फेंक दी। पास बैठी उसकी पत्‍नी ने कहा ये कैसी अभद्रता कम से कम उनका सम्‍मान रखने के लिए इसे ले कर रख लेते। शिष्‍य न जब जा कर सारी बात गुरु को बताई तो गुरु ने कहा वो धर्म गुरु जरूर मुझसे प्रभावित होगा और उसकी पत्‍नी कभी नहीं हो सकती। शिष्‍य को बात विरोधाभास लगी लेकिन मन का विरोध ही उस आकर्षण का कारण है। वो तर्क की आड़ में अपना बचाव करता रहा यहीं मेरे साथ भी हुआ। काश में एक बार रूक सकता या किसी के आग्रह को आस्‍तित्‍व की पुकार समझ लेता तो मैं आपने गुरु के चरणों में उनके जीते जी चला जाता अफसोस ऐसा नहोना था.....लेकिन ये मेरा अहंकार ही था जो मेरे आड़े आ  रहा था। जब कि आज देखता हूं तो क्या था ऐसा जिस पर में अंहकार कर रहा था। सागर के किनारे पड़ें धूल कणों जो खुद लहरों के कारण पल में इधर पल में अधर फेंका जा रहे हो। जैसा ही तो था।
      समय गुजरता गया, बड़ी अजीब बात है गुजरते हम समय में है समय तो देख रहा है वो तो शाश्वत का हिस्‍सा है वो कैसे गुजर सकता है। लोग कहते है समय काट रहे है समय न हो कोई कपड़े का टुकडा हो जो कट रह हो। हम खुद काट रहे होते अपने जीवन को, ताश के पत्‍ते खेल कर या कुछ भी ऐसा....प्रकीर्ति  ने अपना खेल दिखाया। मेरा एक-एक कदम दलदल में फँसता चला गया। एक कुचक्र ने मुझे घेर लिया, धीरे-धीरे में एक ऊँचाई से गिरते पत्‍थर जैसी मेरी हालत हो गई,जिसे अब घाटी में ही पहुंच कर ही चैन मिलेगा...शायद वहीं उसे होना चाहिए। मैं व्‍यवसाय के नुकसान के साथ-साथ कर्ज में भी फँसता चला गया। इसे पुरी तरह से अपने पार्टनर को भी दोषी नहीं मान सकता। कुछ तो था जो समझ से बहार था। कहीं दूर कुछ घट रहा था अदृष्‍य सा जो छाया बन कर जीवन पर छा रहा था। जिसे दूर नक्षत्रों की गणना करने वाले ज्येातिषी भी नहीं समझ पा रहे थ। क्‍यों मेरे पार्टनर ज्‍योतिष में बहुत विश्वास करता था। मूंगा, राहु का गोमेद, हीरा न जाने क्‍या नहीं किया पर कोई काम नहीं आया।
      आखिर समय ऐसा आ गया की बच्‍चों की फीस तक में नहीं दे सका, और बच्‍चें घर पर ही बैठ गये। हमारे सारे सपने मृगमरीचिका ही बने रह गये। शेख चिल्‍ली के सपने। हाथ इतना तंग हो गया कि मां कि दवाई के लिए पैसे नहीं। वो तो भला हो हमारे भाई साहब का जिन्‍होंने मां को बेसा हास्‍पिटल में भर्ती करा दिया। एक सवा महीने मां हास्पिटल में रही। उसके फेफड़े खराब हो गये थे। लेकिन ये कुदरत का अजीब रहस्‍य है। जब ड़ाक्टरों ने कह दिया कि अब ये ठीक है, आप इन्‍हें घर ले जा सकते है। वो छुटटी मिलने के एक दिन पहले हमारे साथ बहार तक घूमने आई और वही  पर में उसके लिए खाना ले आया हिमांशु जो दो  साल का था उस के हाथ से रोटी के टुकडे लेकर खेल-खेल कर खाता रहा। जब हम दूसरे दिन गये तो वो इस दुनियां में नहीं रही। हम आखरी समय उसके साथ नहीं थे। अचानक रात को खासी उठी और उनका दम निकल गया। ड़ाक्टरों ने कहा उसे काफी तकलीफ थी। जो उसके चेहरे से दिखाई नहीं देती थी।    
      आपको यह जान कर अचरज होगा की जब मुझे मां की मृत्‍यु की खबर मिली तो मेरी जेब में दो रूपये थे। कफ़न के भी पैसे नहीं थे। मुझे लगा मेरे नीचे है वो एक सुलगता लावा है। जिसमें मैं झुलसा जा रहा हूं। मगर मेरी इच्‍छा पूर्ण जलने की थी। वो उसे पुरी नहीं कर पा रहा है। आंखे केवल सूनी थी उनमें रोने के लिए आंसू भी नहीं थे। दूर रेगिस्‍तान में भटकते मुसाफिर की तरह, एक जलती प्‍यास....जिसका कोई अंत नहीं वो केवल एक गर्म उसास सी है जो प्‍यास को और अधिक कर रही थी। ़
      मैं अपने पार्टनर के पास गया। जिसने मुझे पड़ोस से मांग कर 1500/- दिये। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्‍या हो रहा है। कोई बात मुझ से छुपी नहीं थी। मेरे खुद के 15लाख रूपये के अलावा उसके भी पैसे जैसे मिटटी हो गये। उसके घर की हालात तो हमारे से भी बदतर थे। क्‍योंकि उसके बच्‍चे बडी कक्षा में पढ रहे थे। वो खंडे़लवाल थे। जब उनके बड़े लड़के की शादी हुई तब मैं आखरी बार उन से मिला था। उस समय तक मुझे ओशो मिल गए थे। वो शायद1993 की बात थी। उसकी शादी में जब मैं नाचा तो सब लोग मेरा नाच देखते ही रह गय। क्‍योंकि ओशो के प्रत्‍येक महत्‍व पूर्ण ध्‍यान के बाद नृत्‍य एक उत्‍सव का पड़ाव आता ही है फिर मेरा नाचना वो भी कुछ होश को लिए हुए ओर अंदर एक आनंद का सागर हिलोरे मार ही रहा था। अंकल आप का नाच सब से अलग था। में केवल हंस दिया ओर क्‍या बता सकता था। क्‍या उसे समझाया जा सकता है। नहीं शब्‍द उससे अछूते रह जाते है।
      जब तक ध्‍यान का रस मेरे सूखे जीवन को पल्‍लवित करने लगा था। जलती धरा पर अषाढ़ के मेघों ने चार बुंदे बरसा दी थी। जिससे उठी वो उमस में भी एक मदहोशी थी, जीवन जो रस हीन हो गया था उस में फिर स्पंदन महसूस होने लगा था। एक ऐसी उच्‍छवास जो सीने में भर कर नव जीवन दायिनी का काम कर रही थी। उसी दिन मैं उनसे कहा लाला जी (मैं अपने पार्टनर को इसी नाम से पुकारता था) अगर आप के पास पैसा आ जाए तो मुझे दे देना। वरना आप भगवान के घर भी मेरे कर्ज से आप मुक्‍त हो। और उनको तो यकीन ही नहीं आ रहा था कि मैं क्‍या कह रहा हूं। उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और अपने माथे से लगा लिया। हालाकि लाला जी मेरे से उम्र में तीस साल बड़े थे। जब भी हम कही जाते तो मुझे सब मजाक में उनका हनुमान कहते थे। कि आज आपका हनुमान नहीं आया। आज आपके हनुमान को राम मिल गया। अब भरत या सुग्रीव कि उसे इतनी जरूरत नहीं रही। और मैने उन्‍हें दिल से माफ कर दिया। माफ करने जैसा उन्‍होंने किया भी क्‍या था। वो मेरा हाथ पकड कर रोने लगे। क्‍योंकि वो घंटो शिव कि उपासना करते थे। कि तुझे जरूर कुछ मिल गया है। शायद में लकीर का फकीर उसी लकीर पर चलता रहूँ। आज मुझे तुझ से ईर्षा हो रही है। तुमने कुछ पा लिया है जो अद्भुत है, और वो रो पड़े। आज पता नहीं इस दुनियां में है या नहीं में उस दिन के बाद उनके पास नहीं गया। क्‍योंकि मुझे देख कर उन्‍हें छोटा पन लगे। मेरे पैसे कि याद आए, ये मैं नहीं चाहता था।
      शायद कोई बड़ी घटनाएं इन छोटी घटनाओं के पीछे खड़ी हुई हमारा इंतजार कर रही होती है। लेकिन हम आंखों के पास या अति दूर कि चीजों को नहीं देख सकते। यही तो आस्तित्व का गहनत्‍म रहस्‍य है जिसे वो अपने ह्रदय में छूपाए रहता है। जब वो हमारे ऊपर कण-कण बरसना चाहता है। हम सुविधाओं का छात तान लेते है। और आपने के बहुत बुद्धिमान समझ कर इतराते फिरते है।     
      कुल मिला कर मैंने तो यह मान लिया कि जीवन में  जो घटता है उसे प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लो। शुभ या अशुभ वो हमारी समझ के बहार है। उस आस्‍तित्‍व पर छोड़ दो वो जो कर रहा है। वो हमसे अधिक हमारी फिक्र करता है। एक छोटे बच्‍चे की तरह क्‍या माता पिता अपने बच्चे का गलत कर सकते है। नहीं तो वो क्‍या इस छोटे से रिश्ते से भी गया बीता रिश्ता है। उस कुदरत ने हमे बनाया है। वो हमारा अच्‍छा बुरा पहचानती हे, जानती है ,लेकिन उसने हमें स्वतंत्रता दे रखी है। यही उसकी महानता है यही उसका गौरव है। इस लिए वो महान है। फिर उस अंधकार के सीने में क्‍या छीपा है, ये तो समय ही बताता उस समय दिखाई नहीं देता। लेकिन वे मार्ग मधुर है, अति पावन है, अति आलोकिक है, नीरवता, निस्तब्धता भरी सीतलता है। कुल मिल कर चलकर देखने जैसा है.......

उस अंधकार के बाद मैने क्षितिज पर चमकता सूर्य देखा।
     भूल गया मैं काली रात को, जो दुर खड़ी मुस्‍कुरा रही थी।
कौन करता स्‍वागत उस सुबह का,
     कैसे फैलता जीवन में फिर अनवरता विस्‍तार,
कैसे गाते पक्षी मधुर गीत,
     झरने कलरव गान पर न इठलाते।
कैसे अठखेलिया करती ये लताएं,
     कैसे  फुल  फिर मुस्कराते पाते।
कैसे चटकती ये कलियों,
     फिर मूक रह जाता क्‍या कोयल का गान?
नहीं भँवरा करता गुंजन,
     शायद सुर न छूते निशब्‍द का स्पंदन।
     आया एक मधुमास,
     ले आया उच्‍छवास।
     फैला गया जीवन में हास,
     वो रास, जो करता आनंद का परिहास।

--मनसा आनंद मानस



      

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

स्‍वर्णिम बचपन—( सत्र- 38 )


मोज़ेज और जीसस—पहलगाम (कश्‍मीर)में मरे

    ओ. के.। मैं तुम्‍हें एक सीधा-सादा सरल सा सत्‍य बताना चाहता था। शायद सरल होने के कारण ही वह भुला दिया गया है। और कोई भी धर्म उसका अभ्‍यास नहीं कर सकता। क्‍योंकि जैसे ही तुम किसी धर्म के अंग बन जाते हो वैसे ही तुम न तो सरल रहते हो और न ही धार्मिक। मैं तुम्‍हें एक सीधी सह बात बताना चाहता था। जो कि मैंने बड़े मुश्‍किल ढंग से सीखी है। शायद तुम्‍हें तो यह बहुत सस्‍ते में मिल रही है। साधी और सरल सदा सस्‍ता ही माना जाता है। यह सस्‍ता बिलकुल नहीं है। यह बड़ा कीमती है। क्‍योंकि इस सरल से सत्‍य के मूल्‍य को चुकाने के लिए अपने सारे जीवन को दांव पर लगाना पड़ता है। और वह है समर्पण, श्रद्धा।   
      ट्रस्‍ट, श्रद्धा को तुम लोग गलत समझते हो। कितनी बार मैं तुम्‍हें बता चुका हूं? शायद लाखों बार बताया है। परंतु क्‍या तुमने एक बार भी ध्‍यान से सुना है। अभी उस रात मेरी सैक्रेटरी रो रही थी और मैंने उससे पूछा कि वह क्‍यों रो रही है?
      उसने कहा: मेरे रोने का कारण कह है कि आप मुझ पर बहुत श्रद्धा करते है। और मैं इस योग्‍य नहीं हूं। मैं इसे सहन नहीं कर सकती।
      मैंने कहा: ये तुम पर श्रद्धा करता हूं। अब तुम रोना चाहती है तो रो सकती हो। अगर तुम हंसना चाहती हो तो हंस सकती हो।
      अब, यह तो उसके लिए बहुत मुशिकल है। वह मुझे समझती है। उसके आंसू मेरे विरोध में नहीं वह रहे, वे मेरे लिए बह रह थे। मैंने उससे कहा: तुम क्‍या कर सकती हो। ज्‍यादा से ज्‍यादा तुम मुझसे यह घर छोड़ कर जाने के लिए कह सकते हो। इस घर में से जो भी मेरे साथ आना चाहेगा वह आएगा, नहीं तो मैं अकेला ही चला जाऊँगा। मैं अकला ही आया हूं ओर अकेला ही जाऊँगा। उस वास्‍तविक यात्रा पा तो मेरे साथ कोई नहीं चल सकता हां, इस बीच समय बिताने के लिए तुम सब तरह से खेल-खेल सकते हो।     
      मैंने उससे कहा: तुम सोच रही हो कि अब तुम मुझे धोखा दे सकती हो। ठीक है, इससे अच्‍छा मौका तुम्‍हें नहीं मिलेगा।
      वह फिर रोने लगी और पैरों में गिरने लगी और उसने कहा: नही, नहीं। मैं आपकी धोखा देना नहीं चाहती। इसीलिए तो मैं रो रही थी। आपको धोखा नहीं देना चाहती।
      मैंने कहा: तो फिर यह विचार कैसे आया, तुम ऐसा नहीं करना चाहती, मैं भी नहीं चाहता कि तुम करो, तो फिर हम समय क्यों बरबाद कर रहे है। अगर तुम मुझे धोखा देना चाहती हो। तो मैं इसके लिए राज़ी हूं। रोना तो मुझे चाहिए क्‍योंकि आरंभ से ही मैं एक समस्‍या ही बना रहा हूं। अभी भी मैं एक समस्‍या हूं—अपने लिए नहीं—मैं तो हूं ही नहीं। इसलिए यह प्रश्‍न ही नहीं उठता। परंतु दूसरों के लिए जो ‘’हैं’’ और जो बहुत ही ज्‍यादा, हैं.. जितना अधिक उनमें मैं हूं का भाव है, उतना ही अधिक उनका जीवन समस्‍यापूर्ण उसकी कोई समस्‍या नहीं है। और अगर वह तुम पर भरोसा करता है तो तुम्‍हारी देखभाल करने के लिए अस्‍तित्‍व पर्याप्‍त है।
      परंतु अस्‍तित्‍व में किसी की कोई दिलचस्‍पी नहीं है—सब बातों में दिलचस्‍पी है सिवाय अस्‍तित्‍व के।
      इससे मस्‍तो फिर वापस आ जाते है। मस्‍तो है ही ऐसे व्‍यक्‍ति जो कहीं भी टपक पड़ते है—बुलाए, बिन बुलाए, आमंत्रित, बिन आमंत्रित। और वह इतने प्रिय थे कि आमंत्रित हों या न हों, सब लोग उनका स्‍वागत करने के लिए तैयार रहते थे। मस्‍तो बार-बार बीच में आते है। वह पुरानी आदत है। इसका कोई इलाज नहीं है।
      अब बेचारा देव गीत नोट ही लिखता रहता है, और यह काम वह बहुत अच्‍छी तरह से करता है। कभी-कभी उसे चेक करने के लिए बीच में ही मैं पूछ बैठता हूं के मैं क्‍या कह रहा था। और हव मुझे बिलकुल ठीक बता देता है। कि मैं क्‍या कह था। वह अपना काम करता है। मेरे प्रति उसकेा इतना अधिक प्रेम है कि वह अनायास ही ठंडी श्‍वास लेता है। उच्‍छवास लेता है। यह सोच कर कि कुछ अविश्‍वसनीय घट गया है और उसे अभी भी उस पर विश्‍वास नहीं होता। और मेरी मुश्किल यह है कि मैं समझता हूं कि वह चुपके-चुपके हंस रहा है वह हंस नहीं रहा, उसकी उत्‍तेजक श्‍वास से मुझे यह भ्रम हो जाता है कि वह हंस रहा है।
      इसके बारे में उसने मुझे लिखा भी है। किंतु जब भी वह उच्‍छवास लेता है तो तत्‍काल मुझे उसकी दबी हुई हंसी का खयाल आ जाता है। कि वह फिर हंस रहा है। मेरी भी यह पुरानी आदत तब से है जब मैं प्रोफेसर था। अब तुम्‍हें तो मालूम ही है की प्रोफेसर तो आखिर प्रोफेसर ही होता है। और वह अपनी क्‍लास मैं ही-ही करके हंसने की इजाजत नहीं दे सकता। अब मुझे इस पर कोई आपत्‍ति नहीं है। मुझे अच्‍छा लगता है।
      मेरी क्‍लास में लड़कियों की संख्‍या लड़कों से अधिक थी। इसलिए खूब हंसी सुनाई देती थी। और तुम मुझे जानते हो मुझे हंसी मजाक अच्‍छा लगता है। चुटकुले भी सुनाता था। परंतु मेरे सामने अकारण कोई हंसे तो वह मुसीबत में पड़ जाएगा। हां अगर चुटकुले के बाद कोई हंसे तो उस पर मुझे कोई आपति नहीं है। परंतु अगर कोई बिना किसी विशेष कारण से हंसे तो मैं उसको रंगे हाथों पकड़ लेता। मेरे चुटकुले के कारण वे नहीं हंस रहे थे—लड़के आरे लड़कियों के एक साथ होने के कारण हंस रहे थे। आदम और ईव की वही पुरानी कहानी। तब परमात्‍मा ने कहा था: इस ईदन के बग़ीचे से बाहर निकल जाओ। दोनों निकल जाओ। हां, ऐसा ही कहा था परमात्‍मा ने।
      वह पुराने ढंग का अध्‍यापक रहा होगा और यह सांप भी कोई पुराना, ऐसा पुराना नौकर रहा होगा जिसने बहुत से अदम और बहुत सी ईव का काम किया होगा—उनकी चिटठीयों को एक दूसरे के पास पहुंचाने में सहायता की होगी। दूसरी प्रकार के काम भी किए होगें किंतु उनका उल्‍लेख नकरना ही अच्‍छा है। हां, यह पर कोई भद्र महिलाएं उपस्थित नहीं है। किंतु अगर कोई भद्र पुरूष भद्र न होने का दिखावा कर रहा हो अगर कोई भ्रद महिला भ्रद न होने का दिखावा कर रही हो तो उन्‍हें अनावश्‍यक कष्‍ट होगा। मैं किसी को कोई कष्‍ट नहीं देना चाहता।
      मुझे अपना प्रथम भाषण याद है....देखा, कैसे चीजें हो रही है इस शृंखला में। वह भाषण मैंने एक हाईस्‍कूल मैं दिया था। जिले के सभी हाई स्‍कूलों ने अपने-अपने वक्‍ताओं को वहां भेजा था। मुझे भी अपने स्‍कूल का प्रतिनिधित्‍व करने के लिए चुन लिया गया था। इसलिए नहीं कि मैं सबसे अच्‍छा वक्‍ता था, मैं ऐसा नहीं कह सकता,बल्‍कि इसलिए कि मैं ही सबसे उपद्रवी था। अगर मुझे न चुना जाता तो मैं मुसीबत खड़ी कर देता, इतना पक्‍का था। तो उन्‍होंने मुझे चुना। किंतु उन्‍हें यह नहीं मालूम था कि मैं जहां कहीं भी जाऊँ मुसीबत अपने आप खड़ी हो जाती है।
      मैंने अपना भाषण बिना किसी संबोधन के आरंभ कर दिया। किसी प्रकार की कोई औपचारिकता नहीं निभाई। मैंने न कहा सभापति महोदय, न कहा सज्‍जनों ओर देवियों...हुआ यह कि जब मैंने सभापति को ऊपर से नीचे तक देखा तो मैंने अपने आपसे कहा कि यह तो सभापति जैसा दिखाई नहीं देता। फिर वहां उपस्थित लोगों की और देखा तो मैंने सोचा कि यहां पर तो न कोई सज्‍जन दिखाई देता है, न कोई देवी। इसलिए दुर्भाव से मुझे अपना भाषण बिना किसी संबोधन के ही आरंभ करना होगा। मैं सिर्फ कह सकता हूं कि जो कोई भी उपस्‍थित है, या जिससे भी इसका कोई ताल्‍लुक है।
      बाद में मेरे प्रिंसिपल ने मुझे बुलाया, क्‍योंकि इसके बाद भी मैंने प्रथम पुरस्‍कार प्राप्‍त किया।
      मेरे प्रिसिंपल ने मुझे बुला कर कह कि ‘‘ तुम्‍हें क्‍या हुआ था? तुमने ऐसा अजीब व्‍यवहार क्‍यों किया। हमने तुम्‍हारे लिए जो भाषण तैयार किया था, उसमें से तुम एक शब्‍द भी नहीं बोले और तुमने सभापति को भी संबोधित नहीं किया। न सज्‍जनों और देवियों को।
      मैंने कहा: मैंने चारों और देखा, तो मुझे कोई भी सज्‍जन दिखाई नहीं दिया। मैं उन सब लोगों को अच्‍छी तरह से जानता हूं, और उनमें से कोई भी सज्‍जन नहीं है। और जहां तक देवियों का सवाल है, वे तो और भी गई बीती थी। क्‍योंकि वे इन्‍हीं पुरूषों की पत्नियाँ थी। और सभापति। वह तो ऐसा लगता है जैसे कि परमात्‍मा द्वारा इस शहर में सिर्फ कभी सभाओं के सभापतित्‍व के लिए भेजा गया है। मैं तो उससे थक गया हूं। मैं उसे आदरणीय सभापति नहीं बुला सकता। क्‍योंकि मैं तो उसे थप्‍पड़ मारना चाहूंगा।
      उस दिन जब सभापति ने मुझे पुरस्‍कार देने के लिए बुलाया तो मैंने कहा: याद रखिए आपको नीचे आना पड़ेगा आरे मुझसे हाथ मिलाना पड़ेगा।
      उसने कहा: क्‍या, तुमसे हाथ मिलाऊं, मैं तो कभी तुम्‍हारी और देखूँगा भी नहीं। तुमने मेरा अपमान किया है।
      मैंने कहा: मैं तुम्‍हें दिखाअुगा।
      उस दिन से वह सभापति मेरा दुश्‍मन बन गया। मैं दुश्‍मन बनाने की कला को बहुत अच्‍छी तरह जानता हूं। वह उस शहर का जाना-माना राजनीतिज्ञ था और उसका नाम था श्रीनाथ भट्ट। वह गांधी वादी राजनैतिक दल का प्रभावशाली नेता था। उस समय भारत ब्रिटिश राज्‍य में था। जहां तक स्‍वतंत्रता का सवाल है, भारत अभी भी स्‍वतंत्र नहीं है। ब्रिटिश राज्‍य से वह भले ही स्‍वतंत्र हो गया हो परंतु अंग्रेजों ने जो नौकर शाही बनाई थी वह उससे स्‍वतंत्र नहीं हुआ।
      मैं सदा श्रद्धा की बात करता रहा हूं किंतु मैं इसको अच्‍छी तरह से समझा नहीं सका। शायद इसमें मेरा कोई दोष नहीं है। श्रद्धा की बात नहीं की जा सकती, उसकी और केवल इशारा किया जा सकता है। जब कि मैं इसके बारे में कुछ निशचित कहने कि कठिन कोशिश करता रहा हूं। फिर भी मैं इसमे सफल नहीं हो सका। या तो यह तुम्हारे अनुभव हो जाए—तब इसको जानने की जरूरत ही नहीं रहती या जब यह तुम्‍हारा अनुभव ही नहीं बनता तब तुम्‍हें श्रद्धा के संबंध में सब जानकारी प्राप्‍त हो तो भी वास्‍तव में तुम उसके बारे में कुछ भी नहीं जानते।
      मैं दुबारा तुम्‍हें बताने कि कोशिश कर रहा था—अपने को एक और मौका दे रहा था। शायद और सब प्रयासों के बारे में बात करना लगता है। उन प्रयासों के बारे में भी जो असफल हुए हैं। परंतु यह सोच कर गर्व होता है कि ये प्रयास ठीक दिशा में किए गए थे। प्रश्‍न तो दिशा का ही है। हां श्रद्धा तो बहुत कुछ है, किंतु सबसे पहले अपनी और एक प्रश्‍न दिशा में परिवर्तन।
      हम जन्‍मते ही बाहर की और देखते है। अपने भीतर देखना शरीर –रचना का काम नहीं है। शरीर बाहर के सब काम अच्‍छी तरह से करता है। कही जाना हो तो वह तुम्‍हें ले जाता है। परंतु जैसे ही तुम पूछते हो कि मैं कौन हूं। तो उसकी समझ में नहीं आता कि वह क्‍या करे। और वह गड़बड़ा जाता है। क्‍योंकि वह प्रश्‍न इस तथाकथित  संसार से संबंधित नहीं है।
      इस संसार में दस आयाम  या दस दशाएं है। आयाम तो बड़ा शब्‍द है ओर दिशा के लिए इसका प्रयोग नहीं होना चाहिए। ये दस दशाएं है। दो-एक ऊपर, एक नीचे, और चारो को हम जानते हैं। पूर्व, पश्‍चिम उतर, दक्षिण की तरह और चार कोने है। शेष चार कोने है। जब तुम पूर्व पश्‍चिम की और एंव अत्‍तर-दक्षिण की और रेखा खींचो तो उत्‍तर और पूर्व में पूर्व और दक्षिण में कोने होते है। इस तरह चार कोने होते है।
      मुझे आयाम शब्‍द को प्रयोग नहीं करना चाहिए था। वह बिलकुल ही अलग है, वह देव गीत की छींक के समान बिलकुल भिन्‍न है। वह उसे दबाने की कोशिश करता है और ऐसा करना असंभव है। मैं उसे सलाह दूँगा कि वह छींक को आने दे, वह  आ ही जाती है तो क्‍यों मुश्‍किल में पड़ना। दुबारा जब छींक दस्तक दे तो दरवाजा खोल कर उसका स्‍वागत करते हुए कहिए: मैडम भीतर आ जाओ। शायद छींक बिलकुल न आए। छींक अजीब चीज है। छींक लाने के लिए कोशिश करो तो योग की सब प्रक्रियाएं करनी पड़ेगी। और फिर भी शायद इसमें सफलता न मिले। किंतु जब इसे रोकने की कोशिश की जाती है तो यह जरूर आती है। तुम्‍हें तो मालूम है कि यह स्‍त्री है, और जब स्‍त्री तुम पर अधिकार करने की कोशिश करे तो उससे बचने के लिए उसे छींक कर बाहर कर देना चाहिए—रोकना ठीक नहीं है।  
      दिशा और आयाम उतने ही भिन्‍न है जितना उसकी छींक को मेरा यह समझना कि यह हंसी है। वह अपनी छींक को रोकने की कोशिश कर रहा था ओर मैं उसके बारे में बोलना शुरू कर रहा था। जिसके बारे में बोला नहीं जा सकता। और उसी समय उसने छीं दिया। इसी को तो कर्ला गुस्‍ताव जुंग सिन्क्रॉनिसिटी कहता है। यह बहुत अच्‍छा उदाहरण नहीं है। किंतु छोटा सा उदाहरण है।
      यह अजीब बात है, खास कर भारत में, जब भी ऐसी बातों की चर्चा की जाती है...ओर मैं नहीं सोचता कि और कहीं लोगों ने हजारों वर्षो से ऐसी बात की हो—गू    रू से मिलने के समय छींकना मना है। क्‍या? मेरी समझ में नहीं आता कि छींक को कैसे मना किया जा सकता है। छींक तो तुम्‍हारे सिपाहियों से या तुम्‍हारी बंदूकों से नहीं डरती। तुम उसे मना कैसे कर सकते हो। हां अगर नाक की प्‍लास्‍टिक सर्जरी की जाए तो शायद यह संभव है। पर वह ठीक नहीं होगा, क्‍योंकि छींक तो केवल यह सूचना देती है कि नाक के भीतर कुछ गलत घुस गया है। उसे कभी नहीं रोकना चाहिए।
      इसीलिए मैं तुमसे कहता हूं,देव गीत, तुम मेरे शिष्‍य हो और मेरे शिष्‍यों को सब तरह से भिन्‍न होना चाहिए—छींक के मामले में भी। वे तो उस समय भी छींक सकते है जब गुरु श्रद्धा के बारे में बात कर रहा हो। इसमें तो कोई नुकसान नहीं है। किंतु कभी-कभी जब तुम उसे दबाने की या रोकने की कोशिश करते हो  तो उसका प्रभाव तुम्‍हारी श्‍वास पर पड़ता है। तुम्‍हारे भीतर की सब चींजे उससे प्रभावित हो जाती है। और तब मुझे यह गलतफहमी हो जाती है कि तुम हंस रहे हो। तुम्‍हें तो यह सोच कर खुश होना चाहिए कि मेरा गुरु अगर कभी-कभार मुझे गलत भी समझता है तो वह सही समझता है कि मैं हंस रहा हूं।
      ये वही लोग होंगे जिन्‍होंने उस आदमी को मार डाला था और अभी भी वे उसके ताबुत पर कीलें ठोके जा रहे है। की वह बहार न निकल आए। ये वहीं लोग है जो अभी भी उसे सूली पर लटका रहे है। और वह तो दो हजार साल पहले मर चुका है। अब उसे सूली पर चढ़ाने की कोई जरूरत नहीं है। परंतु वह अपनी सम्रझदारी से सूली पर मरने से बच गया। ठीक समय पर वहां से भाग गया था। आम जनता के लिए तो उसने सूली पर चढने का नाटक किया और जब लोग घर चले गए तो वह भी घर चला गया। मेरा यह अर्थ नहीं है कि वह परमात्‍मा के पास चला गया, ऐसा मत समझना। वह सचमुच आने घर चला गया।   
      अभी भी ईसाइयों को जो गुफा दिखाई जाती है। के जिसमें जीसस के शरीर को रखा गया था—वह सब बकवास है। कुछ घंटों के लिए उनके शरीर को वहां रखा गया था। शायद रात भर भी रखा गया हो किंतु उस समय वे जीवित थे। यह बात बाइबिल द्वारा ही सिद्ध होती है। बाईबिल में कहा गया है कि जब उन्‍होंने समझा कि जीसस मर गए तो एक सिपाही ने उनके शरीर में भाला भोंक दिया ओर खून निकल आया। परंतु मरे हुए आदमी के शरीर से खून नहीं निकलता। जैसे ही आदमी मरता है वैसे ही उसका खून विघटित होना शुरू हो जाता है। अगर बाईबिल में यह कहा गया होता कि पानी निकलता तो मुझे यह विश्‍वास होता कि वे सच कह रहे है। परंतु यह लिखना भी बहुत मूखतापूर्ण लगता कि पानी बाहर निकला। सच तो यह है कि जीसस यरूशलम में कभी मरे ही नहीं। वे तो पहल गाम में मरे थे।
      पहल गाम शब्‍द का वही अर्थ है जो मेरे गांव के नाम का अर्थ है। पहलगाम इस संसार में बहुत ही सुंदर स्‍थान है। जीसस यहीं पर मर के और उस समय उनकी उम्र एक सौ बाहर वर्ष की थी। किंतु वे अपने ही लोगों से इतने परेशान हो गए थे कि उन्‍होंने स्‍वयं ही यक अफवाह फैला दी कि वे सूली पर मर गए है।
      सूली उनको अवश्‍य लगी थी। किंतु तुम्‍हें यह समझ लेना चाहिए कि सूली देने का जो यहूदी तरीका था वह अमरीका जैसा नहीं था कि कुर्सी पर बिठा कर बस बटन दबाया और आदमी मर गया। इतना भी समय नहीं मिलता कि कोई यह कहे कि है भगवान, इन लोगों को क्षमा करना जो बटन दबा रहे है। इन्‍हें नहीं मालूम  कि वह क्‍या कर रहे है। वे जानते है कि वे क्‍या कर हैं । वे बटन दबा रहे है। और तुम्‍हें नहीं मालूम कि वह क्‍या कर रहे है।
      अगर जीसस को वैज्ञानिक ढंग से सूली दी जाती तो उनको कोई समय नहीं मिलता। यहूदियों का ढंग बहुत बर्बर और असभ्‍य था। कभी-कभी तो मरने मैं चौबीस घंटे से भी अधिक समय लगता था। कभी-कभी तो यहूदियों की सूली पर चढ़ाएं जाने के बाद लोग तीन-तीन दिन जीवित रहते थे। क्‍योंकि वे सिर्फ आदमी के हाथों और पैरों में कीले ठोंक देते थे। खून में जमने कि क्षमता होती है वह थोड़ी देर बहने के बाद जमने लगता है। आदमी को ताक बहुत पीडा होती है। वह परमात्‍मा से प्रार्थना करता है कि जल्‍दी से जल्‍दी समाप्‍त करो। जीसस का भी शायद यही मतलब था जब वे कह रह थे कि वे नहीं जानते कि वे क्‍या कर रहे है। आपने मुझे क्‍यो त्‍याग दिया है। पीड़ा बहुत अधिक हुई होगी। क्‍योंकि अंत में उन्‍होंने कहा था कि तेरी मर्जी पूरी हो।
      मैं नहीं सोचता कि वे सूली पर मरे। नहीं, मुझे तो यह भी नहीं कहना चाहिए कि ‘’मैं नहीं सोचता’’…. मैं जानता हूं कि वे सूली पर नहीं मरे। उन्‍होंने कहा था: तेरी मर्जी पूरी हो। यह उनकी स्‍वतंत्रता थी। अब वे जो चाहे कह सकते थे। सच तो यह है कि रोम के गर्वनर पांटियस को उनसे प्रेम हो गया था। किसे न होता, जो भी ठीक से देख सकता था उसके लिए यह स्‍वभाविक ही था।
      परंतु जीसस के अपने लोग तो पैसे गिनने में व्‍यस्‍त थे। उनके पास इतना समय ही कहां था कि से जीसस की आँखो में झांक कर देख सके? जीसस के पास पैसा भी नहीं था। पांटियस पायलट ने तो एक बार यह भी सोचा कि वह उनको छोड़ दे क्योंकि उन्हें मुक्‍त करने का अधिकार उसे था। किंतु वह उन लोगों की भीड़ से डर गया। और वह इस प्रकार की किसी मुसीबत में पड़ना नहीं चाहता था। उसे मालूम था कि जीसस यहूदी है और ये लोग भी यहूदी है। इसीलिए इन्‍हें आपस में निपटने दो—इन्‍हें स्‍वयं ही फैसला करने दो। पायलट न यह भी  सोचा लिया कि अगर इन्‍होंने जीसस के पक्ष में निर्णय नहीं लिया तो फिर मुझे कोई दूसरा रास्‍ता खोजना पड़ेगा।      
      और उसने रास्‍ता खोज लिया। राजनीतिज्ञ सादा कोई न कोई रास्‍ता खोज ही लेते है। वे घुमा-फिरा कर काम करते है। वे सीधे नहीं जाते। अगर उन्‍हें के पास जाना हो तो वे पहले ख के पास जाते है। राजनीति में काम ऐसे ही होता है। और यह बड़ा कारगर तरीका होता है। किंतु जब कोई व्‍यक्‍ति राजनीतिज्ञ नहीं होता तो यह तरीका कारगर नहीं होता। पांटियस पायलट ने अपने को किसी मुसीबत में डाले बिना जीसस के मामले को बहुत अच्‍छी तरह से सुलझा दिया।
      शुक्रवार दोपहर को जीसस को सूली लगी थी। इसीलिए उस दिन को गुड फ्रायड कहते है। अजीब दुनिया है। इतने अच्‍छे आदमी को सूली लगी और तुम उस दिन को अच्‍छा शुक्रवार कहते है, किंतु इसका कारण था, क्योंकि यहूदी....मेरा ख्‍याल है कि देव गीत, तुम फिर मेरी सहायता कर सकते हो। अपनी छींक से नहीं क्‍या शनिवार उनका धार्मिक दिन है?
      हां ओशो।
      अच्‍छा...क्‍योंकि शनिवार को कुछ भी किया जाता। शनिवार यहूदियों के लिए अच्‍छा दिन है। सब काम बंद कर दिए जाते है। इसीलिए शुक्रवार का दिन चुना गया था। और वह भी दोपहर बाद का जब सूर्य अस्त होने वाला था, सूर्य अस्‍त होने के बाद शरीर नीचे उतार लिया गया। क्‍योंकि अगर शनिवार को भी वह लटकता रहे, तो वह भी एक प्रकार का काम हो जाएगा।  और शनिवार को यहूदियों की छुटटी  होती है। राजनीति में ऐसे ही काम होता है, धर्म में नहीं। रात को जीसस के एक अमीर अनुयायी ने जीसस के शरीर को उस गुफा से बाहर निकाल लिया। इसके बाद रविवार का तो सब लोगों को छुटटी होती है। सोमवार तक तो जीसस बहुत ही दुर चले गए थे।      
      इजराइल बहुत ही छोटा सा देश है। पैदल चल कर भी चौबीस घंटों में उसे पार किया जा सकता है। जीसस भाग गए और इसके लिए हिमालय से अच्‍छा और कौन सा स्‍थान हो सकता है। पहल गाम एक छोटा सा गांव है, जहां पर कुछ एक झोपड़ियों है। इसके सौंदर्य के कारण जीसस ने इसको चुना होगा। जीसस ने जिस स्‍थान को चुना वह मुझे भी बहुत प्रिय है।
      मैंने बीस साल तर निरंतर कश्‍मीर में रहने की कोशिश की। परंतु कश्‍मीर का कानून बड़ा अजीब है। केवल कश्‍मीरी लोग ही वहां रह सकते है। दूसरे भारतीय भी नहीं। यह तो अजीब बात है। किंतु मुझे मालूम है कि नब्‍बे प्रतिशत कश्‍मीरी मुसलमान है और उनको यह डर है कि अगर भारतीयों को वहां बसने की अनुमति मिल जाएगी तो हिंदुओं की संख्‍या अधिक हो जाएगी। क्‍योंकि वह भारत का ही हिस्‍सा है। अब तो यह खेल वोटों का है—हिंदुओं को वहां नहीं बसने दिया जाएगा।
      मैं हिंदू नहीं हूं किंतु सरकारी नौकर मंदबुद्धि वाले होते है। इनको तो मानसिक अस्पतालों में रखना चाहिए। वे मुझे वहां रहने की अनुमति ही नहीं देते है। मैं कश्‍मीर के मुख्‍यमंत्री से भी मिला था जो पहले कश्‍मीर का प्रधानमंत्री माना जाता था। उसे प्रधानमंत्री से मुख्‍यमंत्री पद पर लाने के लिए संघर्ष करना पडा था। अब एक देश में दो प्रधानमंत्री कैसे हो सकते है। किंतु यह व्‍यक्‍ति शेख अब्‍दुल्‍ला इस बात को मानने के लिए राज़ी ही नहीं था। उसको कई वर्ष तक कैद में रखना पडा तब कश्‍मीर के सारे संविधान को बदल दिया गया। किंतु यह अजीब खँड़ वैसे का वैसा ही बना रहा, इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। शायद कमेटी के सब सदस्‍य मुसलमान थे और वे नहीं चाहते थे कि कोई कश्‍मीर मे प्रवेश कर सके। मैंने बहुत कोशिश कि किंतु सफल न हो सका। इन राजनीतिज्ञों की मोटी खोपड़ी में कुछ भी नहीं घुस सकता।
      मैंने शेख से कहा: तुम पागल हो क्‍या, मैं हिंदू नहीं हूं। तुम्‍हे मुझसे डरने की कोई जरूरत नहीं है। और मेरे लोग तो सारी दुनिया से आ रहे है। वे तुम्‍हारी राजनीति पर कोई प्रभाव नहीं डालेंगे।
      उसने कहा: फिर भी हमें सावधान तो रहना ही चाहिए।
      मैंने कहा: अच्‍छा,तुम सावधान बने रहो ओर इस प्रकार तुम मुझे और मेरे लोगो को खो बैठोगे।
      कश्‍मीर को कितना लाभ होता। परंतु ये राजनीतिज्ञ जन्‍म से ही बहरे होते है। उसने सुन कर भी नहीं सुना।
      मैंने उससे कहा: आपको पता है कि मैं तो आपकेा बहुत वर्षो से जानता हूं। और मुझे कश्‍मीर से बहुत प्रेम है।
      उसने कहा: मैं आपको जानता हूं। इसीलिए तो मुझे आपसे डर है। आप राजनीतिज्ञ नहीं है। आप बिलकुल दूसरे ही वर्ग के हो, ऐसे लोगों पर हम विश्वास नहीं करते। उसने अविश्‍वास शब्‍द का प्रयोग किया और मैं तुमसे विश्‍वास की बार कर रहा हूं।
      इस समय मैं मस्‍तो को नहीं भूल सकता। बहुत समय पहले उसने ही मुझे अब्‍दुल्‍ला से परिचय करवाया था। बाद में जब मैं कश्मीर में प्रवेश करना चाहता था, विशेषत: पहल गाम में तो मैंने शेख को इस परिचय की याद दिलाई।
      शेख ने कहा: हां, मुझे याद है कि यह आदमी भी खतरनाक था, और आप तो उससे भी अधिक खतरनाक हो। चुंकी आपका परिचय मस्‍तो बाबा ने दिया था इसीलिए आपको कश्‍मीर का स्‍थायी निवासी नहीं बनने दूँगा।
      मस्‍तो ने मेरा परिचय बहुत से लोगों से कराया था। उन्‍होंने सोचा था कि शायद मुझे उनकी जरूरत पड़ जाए। और निश्चित ही मुझे उनकी जरूरत थी। अपने लिए नहीं अपने काम के लिए। परंतु कुछ एक को छोड़ कर अधिकांश लोग तो कायर निकले। उन सबने यही कहा। हमें मालूम है कि आप समाधिस्‍थ हो, जाग्रत हो।
      मैने कहा: बस वहीं रूक जाओ। तुम लो्ंगो के मुहँ से ये शब्‍द निकलते ही पवित्रता खो देते है। या तो तुम लोग मेरी बात मान लो या सीधे इनकार कर दो। दूसरी किसी प्रकार की बकवास न करो।
      वे सब नम्र होते थे। उनको मस्तो; याद थे, और कुछ को तो पागल बाबा भी याद थे। किंतु वे मेरे लिए कुछ भी नहीं करना चाहते थे। मैं ज्‍यादातर लोगों की बात कर रहा हूं। मस्‍तो ने जिन सैकड़ों लोगो से मुझ परिचय कराया। उनमें से केवल एक प्रतिशत ने मेरी सहायता की। बेचारे मस्‍तो वे चाहते थे कि मुझे कभी कोई कठिनाई नही और उनके परिचित मेरी हर आवश्‍यकता को पूरा करते रहें।
      मैंने उनसे कहा: मस्‍तो तुम मेरे लिए सब प्रकार की कोशिश कर रहे हो। किंतु तुम जब इन मूर्खों से मेरा परिचय कराते हो तो में शिष्टाचार वश चुप रहता हूं। अगर तुम वहां पर न होते तो मैं मुसीबत खड़ी कर देता। उदाहरण के लिए वह आदमी तो मुझे कभी न भूल पाता। तुम्‍हारे कारण ही मुझे अपने आप को नियंत्रण में रखना पड़ता है। जब कि मैं नियंत्रण में विश्‍वास नहीं करता परंतु तुम्‍हारे लिए मुझे यह भी करना पड़ता है।
      मस्‍तो ने हंस कर कहा: मुझे मालूम है। किसी बड़े नामी आदमी से तुम्‍हारा परिचय कराते समय जब मैं तुम्‍हारी और देखता हूं तो मैं हंसता हूं अंदर ही अंदर और सोचता हूं कि उस मूरख को मारने की अपनी इच्‍छा को तुम कितनी मुशिकल से रोके हुए हो।
      शेख अब्‍दुल्‍ला के साथ भी मुझे यही कोशिश करनी पड़ी। उसने मुझे कहा: अगर मस्त बाबा ने आपका परिचय न दिया होता तो मैं आपको कश्‍मीर में रहने की इजाजत अवश्य दे देता।
      मैने शेख से पूछा: ऐसा क्‍यों?.....आप तो उनके बड़े प्रशंसक दिखते थे।
      उसने कहा: हम किसी के प्रशंसक  नहीं होते। हम तो अपने ही प्रशंसक है। किंतु मुझे मस्त बाबा का प्रशंसक बनना पडा, क्‍योंकि कश्‍मीर में उनके बहुत से अमीर लोग अनुयायी थे। मैं उनका स्‍वागत करने के लिए और उन्‍हें विदा देने के लिए हवाई अड्डे पर जाता था। अपने सब काम छोड़ कर उनके पीछे भागता था। किंतु वह आदमी खतरनाक था। क्‍योंकि उनहोंने आपका परिचय मुझसे कराया था इसलिए आप कश्‍मीर में नहीं रहा सकते, जब तक कि मैं शासन कर रहा हूं। एक पर्यटक की तरह आप आ जा सकते हो।
      अच्छा ही हुआ कह जीसस ने शोख अब्दुल्ला से पहले ही कश्‍मीर में प्रवेश कर लिया,उन्‍होंने अच्‍छा ही किया की दो हजार साल पहले जन्‍म ले लिया,वे शेख‍ अब्दुल्ला से डर गये होगें। जीसस की कब्र अभी भी वहां है। इजराइल से जो लोग उनके साथ आए थे। उनके वंशज  अभी भी उसकी देखभाल करते है। यह तो तुम समझ सकते हो कि मेरे जैसे लोग अकेले नहीं जा सकते। कुछ लोग जीसस के साथ वहां भी चले गए होंगे। यद्यपि वे इजराइल से बहुत दूर चले गए, फिर भी कुछ लोग उनके साथ चले गए होगें।
     
      मस्‍तो ने ही मेरा परिचय इंदिरा से भी कराया था। इंदिरा के पिता पंडित जवाहर लाल नेहरू।  
      मस्‍तो भारत के तत्‍कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के मित्र थे। वे बहुत ही सुंदर और अनोखे व्‍यक्‍ति थे। राजनीति के क्षेत्र में रह कर शायद ही कोई इतना सुंदर रह सकता है। जब गूंगा बहरी और अंधी विश्‍वविख्‍यात महिला, हेलर केलर नेहरू से मिली तो उसने उनके चेहरे का स्‍पर्श करके अपनी संकेत-भाषा द्वारा कहा कि इस व्‍यक्‍ति के चेहरे को छूकर मुझे ऐसा लग रहा है।  जैसे कि मैं किसी संगमरमर की मूर्ति को छू रही हूं।
      बहुत से लोगों न जवाहरलाल नेहरू के बारे में बहुत कुछ लिखा है परंतु बिना आंख, कान और जबान की इस महिला ने बडी सरलता से बहुत ही महत्‍व पूर्ण बात कह दी।
      जब मस्‍तो ने मेरा उनसे परिचय कराया तो मेरा भी यही खयाल था। उस समय मैं केवल बीस वर्ष का था और एक वर्ष के बाद ही मस्‍तो मुझे छोड़ कर जाने वाले थे। इसलिए वे चाहते थे कि मरा अधिक से अधिक लोगों से परिचय करा दें। वे मुझे प्रधान मंत्रि के घर ले गए। जवाहर लाल नेहरू के साथ मेरी यह भेंट बहुत ही सुंदर रही। मुझे ऐसी आशा नहीं थी क्‍योंकि राजनीतिज्ञों से मिल कर मैं सदा निराश हुआ था। में तो कभी सोच भी नहीं सकता था कि प्रधानमंत्री और राजनीतिज्ञ ने हो। किंतु वे नहीं थे।
      हम लोग जब नेहरू से विदा ले रहे थे और वह  हमें छोड़ने के लिए गलियारे में आ रहे थे उसी समय संयोग से इंदिरा गांधी भी वहां पर आ गई। उस समय वे किसी पद पर नहीं थीं—कम आयु की युवती थीं। उनके पिता ने ही उनका मुझसे परिचय कराया था। मस्‍तो भी वहीं थे किंतु मुझे यह नहीं मालूम कि इंदिरा मस्‍तो को जानती थी या नहीं। मेरी जवाहरलाल नेहरू से यह भेट इतनी महत्वपूर्ण सिद्ध हुई कि इसके कारण उनके परिवार के प्रति मेरा दृष्‍टिकोण ही बदल गया।    
      नेहरू ने मेरे साथ स्‍वतंत्रता और सत्‍य के बारे में चर्चा की। मुझे विश्‍वास ही नहीं हो रहा था। मैंने उनसे कहा: क्‍या आपको मालूम है कि मैं केवल बीस वर्ष का हूं।
      उन्‍होने कहा: उम्र की चिंता न करो आयु से कुछ नहीं होता। क्‍योंकि मेरा अनुभव तो ये है कि बड़ी उम्र में भी गधा-गधा ही रहता है। वह घोड़ा नहीं बन सकता। खच्‍चर भी नहीं बनता तो फिर घोड़ा कैसे बन सकता है। इसलिए अपनी उम्र की चिंता मत करो। बात जारी रखते हुए उन्‍होने कहा। हम दोनो की आयु के अंतर को भूल जाओ और जो चर्चा चल रही है उसे आगे बढ़ने दो बिना किसी उम्र जाति, धर्म या पद की बाधा को बीच में लाए। और फिर उन्होनें मस्‍तो से कहा बाबा, क्‍या आप कृपया दरवाजा बंद कर देंगे ताकि कोई अंदर न आ सके । मैं नहीं चाहता के मेरा प्राइवेट सैक्रेटरी भी भीतर आ सके।  
      बस फिर हमने अनेक महत्‍वपूर्ण विषयों पर बात की और मुझे यह देख कर बड़ा आश्‍चर्य हुआ कि वे मेरी बात को इतने ध्‍यान से सुन रहे थे। जैसे तुम सुनते हो। और उनका चेहरा इतना सुंदर था जो कि सिर्फ कश्‍मीरियों का ही हो सकता है। भारतीय कुछ काले होते है। और जैसे-जैसे दक्षिण की और जाएं वैसे-वैसे लोगों का रंग काला होता जाता है। और अंत में उस बिंदु पर भी पहुच जाते है जहां पर पहली बार यह समझ‍ में आता है कि वास्‍तव में काला क्‍या होता है।
      परंतु कश्‍मीरी सचमुच सुंदर होते है। जवाहर लाल नेहरू निश्‍चित ही सुंदर थे। इसके दो कारण थे। मेरा अपना यह खयाल है कि गोरा आदमी—केवल गोरा आदमी कुछ खोखला सा दिखाई देता है। क्‍योंकि सफेदी में कोई गहराई नहीं होती। इसीलिए तो कैलिफ़ोर्निया कि सब लड़कियां धूप मैं बैठ कर अपने को सांवला कर रही है। उन्‍हें मालूम है कि जब धूप से चमड़ी तांबे के रंग की हो जाती है तो उसमें ऐसी गहराई आ जाती है  जो गोरी चमड़ी में नहीं होती। किंतु काली चमड़ी तो कुछ अधिक ही जल जाती है। उसे गहराई नहीं कहा जा सकता, वह तो मृत्‍यु है परंतु कश्मीरियों का रंग एकदम बीच का है। वे बहुत सुंदर है। गोरे होते हुए भी जन्‍म से ही कुछ-कुछ तांबे के रंग के है। ये यहूदी है।
      मैंने जीसस की कब्र को कश्‍मीर में देखा है। उनकी तथाकथित सूली के बाद वे यहीं पर भाग आए थे। मैं इसे तथा कथित ही कहता हुं क्‍योंकि इसका सारा इंतजाम बड़ी कुशलता से किया गया था। इसका सारा श्रेय तो मिलता है पांटियस पायलट को जब जीसस को गुफा  में से निकल जाने दिया गया तो प्रश्‍न यह खड़ा हो गया कि वे कहां जाए? इजराइल से बहार कश्‍मीर ही एक ऐसा स्‍थान था जहां पर वे शांति से रह सकते थे। क्‍योंकि वह एक छोटा इज्राईल था। यहां पर केवल जीसस ही,मोजेज भी दफ़नाए गए थे।,
      इससे तुम और भी चौंक जाओगे। मैने उनकी कब्र को भी देखा है। दूसरे यहूदी मोज़ेज से यह बार-बार पूछ रहे थे  कि हमारा खोया हुआ कबीला कहांहै।
      रेगिस्‍तान में चालीस साल तक निरंतर समय एक जाति खो गई थी। यहां पर मोज़ेज गलती कर गए। अगर वे दाएं न जाकर बाएं चले जाते तो यहूदी बग तक तेल के राजा बन गए होते। किंतु यहूदी तो यहूदी ही होते है। इनके बारे में कुछ नहीं कहां जा सकता। कि वह कब क्‍या कर बैठेंगे। मोज़ेज को ईजिप्‍त से इजराइायल तक की यात्रा करने में चालीस साल लगे।
      मैं न तो यहूदी हूं, न ईसाई। और इससे मेरा कोई सरोकार नहीं है। किन्‍तु केवल उत्सुकतावश मेरे मन में यह प्रश्न उठता है। उन्‍होंने इजराइल को ही क्‍यों चुना? मोज़ेज ने इजराइल की खोज क्‍यों कि। वे एक सुंदर स्‍थान की खोज कर रहे होंगे—खोजते-खोजते बूढ़े हो गए....चालीस साल रेगिस्‍तान में कठिन यात्रा करने के बाद...मैं तो ऐसा नहीं कर सकता था। चालीस साल, मैं तो चालीस घंटे भी नहीं कर सकता था। मैं नहीं कर सकता.....मैं तो हाराकिरी कर लेता। हाराकिरी तो तुम जानते हो। साधारण भाषा में इसका अर्थ है आत्‍महत्‍या, और हाराकिरी आत्‍महत्‍या नहीं है।  
      चालीस साल यात्रा करने के बाद मोजेज इजराइल पहुंचे और वह उस धूल भरे और बदसूरत स्‍थान येरूशलम में आए। और इस सबके बाद—यहूदी आखिर यहूदी ही होते है—उन्‍होंने अपने खोए हुए कबीले को खोजने के लिए फिर यात्रा करने की जिद की। मेरा अनुमान है कि इन लोगों से छुटकारा पाने के लिए वे चले गए। किंतु वह खोजते कहां, सबसे नजदीक और सुंदर स्‍थान हिमालय ही था। ओर वह उसी घाटी में पहुंच गए।
      वह बहुत अच्‍छा हुआ कि जीसस और मोजेज दोनों भारत में मरे। भारत न तो ईसाई है और नहीं यहूदी। परंतु जो आदमी, या जो परिवार इन क़ब्रों की देखभाल करते है वह यहूदी है। दोनों कब्रें भी यहूदी ढंग से बनी है। हिंदू कब्र नहीं बनाते। मुसलमान बनाते है किन्‍तु दूसरे ढंग कि। मुसलमान की कब्र की सिर मक्‍का की और होता है। केवल वे दोनों कब्रे ही कश्‍मीर में ऐसी है जो मुसलमान नियमों के अनुसार नहीं बनाई गई।
      किंतु ये नाम भी तुम्‍हारी आशा के अनुसार नहीं है। अरबी में मोज़ेज को मुसा कहते है। उनकी कब्र पर भी मूसा लिखा है। अरबी में जीसस को अरेमेक की तरह येशु कहा जाता है। जो कि हिब्रू भाषा के जोशुआ का परिवर्तित रूप है। और यह उसी प्रकार लिखा जाता है। तुम यह गलत समझ सकते हो कि येशु जीसस है या मूसा मोजेज। मूल शब्‍दों को अंग्रेजी में गलत उच्‍चरण के कारण ही मोजेज और जीसस बन गए।  
      जोशुआ धीरे-धीरे येशु ही बन जाएगा। जोशुआ कुछ भारी भरकम है। येशु ठीक है। भारत में हम जीसस को यीशु कहते है। हमने इस नाम को और अधिक सुंदर बना दिया है। जीसस ठीक है, पर तुम्‍हें मालूम है कि इसके साथ क्‍या किया है। जब कभी कोई कोसना चाहता है तो वह कहता है। जीसस, इस ध्वनि में जरूर कुछ है। अब अगर किसी को जोशुआ कह कर कोसना हो तो मुश्‍किल हो जाएगा। यह शब्‍द ही तुम्‍हें ऐसा करने से रोक देगा। यह शब्‍द इतना स्‍त्रैण, इतना सुंदर इतना गोल है कि तुम इससे किसी को चोट ही नहीं पहुंचा सकते।
      समय क्‍या हुआ है?
      ग्‍यारह बज कर बीस मिनट,ओशो।
      अच्‍छा अब इसे समाप्‍त करो।


-ओशो