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शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

शराब और कामवासना—

तो हम तो आपने को एक मादक बिन्‍दु बनाना चाहते है। जिसमें चारों तरफ, जिसके व्‍यक्‍तित्‍व में शराब हो और खींच ले। और महावीर कहते है कि जो दूसरे को खींचने जायेगा, वह पहले ही दूसरों से खिंच चुका है। जो दूसरों के आकर्षण पर जीयेगा वह दूसरों से आकर्षित है। और जो अपने भीतर मादकता भरेगा, बेहोशी भरेगा, लोग उसकी तरफ खीचेंगें जरूर,लेकिन वह अपने को खो रहा है और डूबा रहा है। और एक दिन रिक्‍त हो जायेगा, आरे जीवन के अवसर से चूक जायेगा।

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

मुल्‍ला नसरूद्दीन और लाटरी—

मैने सुना है कि मुल्‍ला नसरूदीन एक गांव की सबसे गरीब गली में दर्जी का काम करता था। इतना कमा पता था कि मुश्‍किल से कि रोटी-रोजी का काम चल जाये, बच्‍चे पल जाये। मगर एक व्‍यसन था उसे कि हर रविवार को एक रूपया जरूर सात दिन में बचा लेता था लाटरी का टिकट खरीदने के लिए। ऐसा बाहर साल तक करता रहा, न कभी लाटरी मिली, न उसने सोचा कि मिलेगी। बस यह एक आदत हो गई थी कि हर रविवार को जाकर लाटरी की एक टिकट खरीद लेने की। लेकिन एक रात आठ नौ बजे जब वह अपने काम में व्‍यस्‍त था, काट रहा था कपड़े कि दरवाजे पर ऐ कार आकर रुकी। उस गली में तो कार कभी आती नहीं थी; बड़ी गाड़ी थी। कोई उतरा....दो बड़े सम्‍मानित व्‍यक्‍तियों ने दरवाजे पर दस्‍तक दी। नसरूदीन ने दरवाजा खोला; उन्‍होंने पीठ ठोंकी नसरूदीन की और कहा कि ‘’तुम सौभाग्‍यशाली हो, लाटरी मिल गई, दस लाख रूपये की।‘’

पांचवी--पद्म लेश्‍या

 
पद्म..महावीर कहते है, दूसरी धर्म लेश्‍या है पीत। इस लाली के बाद जब जल जायेगा अहंकार.....स्‍वभावत: अग्नि की तभी तक जरूरत है जब तक अहंकार जल न जाये। जैसे ही अहंकार जल जायेगा, तो लाली पीत होने लगेगी। जैसे, सुबह का सूरज जैसे-जैसे ऊपर उठने लगता है। वैसा लाल नहीं रह जायेगा,पीला हो जाये। स्‍वर्ण का पीत रंग प्रगट होने लगेगा। जब स्पर्धा छूट जाती है, संघर्ष छूट जाता है, दूसरों से तुलना छूट जाती है और व्‍यक्‍ति अपने साथ राज़ी हो जाता है—अपने में ही जाने लगता है—जैसे संसार हो या न हो कोई फर्क नहीं पड़ता—यह ध्‍यान की अवस्‍था है।

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

चौथी लेश्‍या—तेज(लाल) लेश्‍या–

 
यह जो लाल लेश्‍या है, इसके संबंध में कुछ बातें समझ लेनी चाहिए। क्‍योंकि धर्म की यात्रा पर यह पहला रंग हुआ। आकाशी, अधर्म की यात्रा पर संन्‍यासी रंग था। लाल, धर्म की यात्रा पर पहला रंग हुआ। इसलिए हिन्‍दुओं ने लाल को, गैरिक को संन्‍यासी का रंग चुना; क्‍योंकि धर्म के पथ पर यह पहला रंग है। हिंदुओं ने साधु के लिए गैरिक रंग चुना है, क्‍योंकि उसके शरीर की पूरी आभा लाल से भर जाए। उसका आभा मंडल लाल होगा। उसके वस्‍त्र भी उसमे ताल मेल बन जाएं, एक हो जायें। तो शरीर और उसकी आत्‍मा में उसके वस्‍त्रों और आभा में किसी तरह का विरोध न रहे; एक तारतम्‍य,एक संगीत पैदा हो जाये।

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

तीसरी लेश्‍या—कापोत लेश्‍या


तीसरी लेश्‍या को महावीर ने ‘’कापोत’’ कहा है—कबूतर के कंठ के रंग की। नीला रंग और भी फीका हो गया। आकाशी रंग हो गया। ऐसा व्‍यक्‍ति खुद को थोड़ी हानि भी पहुंच जाए, तो भी दूसरे को हानि नहीं पहुँचाता। खुद को थोड़ा नुकसान भी होता हो तो सह लेगा। लेकिन इस कारण दूसरे को नुकसान नहीं पहुँचाएगा। ऐसा व्‍यक्‍ति प्रार्थी होने लगेगा। उसके जीवन में दूसरे की चिंतना और दूसरे का ध्‍यान आना शुरू हो जायेगा।

दूसरी लेश्‍या--नील लेश्‍या--

 
नील लेश्‍या दूसरी लेश्‍या है। जो व्‍यक्‍ति अपने को भी हानि पहुँचाकर दूसरे को हानि पहुंचने में रस लेता है। वह कृष्‍ण लेश्‍या में डूबा है। जो व्‍यक्‍ति अपने को हानि न पहुँचाए, खुद को हानि पहुंचाने लगे तो रूक जाये। लेकिन दूसरे को हानि पहुंचाने की चेष्‍टा करे, वैसा व्‍यक्‍ति नील लेश्‍या में है।

रविवार, 26 दिसंबर 2010

नारी-माहवारी—विद्युत झंझावात

अभी स्‍त्रियों के संबंध में एक खोज पूरी हुई है। उस खोज ने स्‍त्रियों के मन के संबंध में बड़ी गहरी बातें साफ कर दी है। जो अब तक साफ नहीं थी। लेकिन खोज विद्युत की है। मनोवैज्ञानिक जिसे साफ नहीं कर पाता था।
      हजारों साल से स्‍त्री एक रहस्‍य रही है। वह किस तरह का व्‍यवहार करेगी किस क्षण में, अनिश्चित है। स्‍त्री अनप्रिडिक्‍टेबल है, उसकी कोई भविष्‍यवाणी नहीं हो सकती। ज्योतिषी उससे बुरी तरह हार चुके है।

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

छ: लेश्‍याएं—ओर मनुष्‍य के चित के प्रकार(भाग-1)


कृष्‍ण, नील, कापोत—ये तीन अधर्म लेश्‍याएं है। इन तीनों से युक्‍त जीव दुर्गति में उत्‍पन्‍न होता है।
तेज पद्म और शुक्‍ल—ये तीन धर्म लेश्‍याएं है। इन तीनों से युक्‍त जीव सदगति में उत्‍पन्‍न होता है।

कृष्‍ण लेश्‍या
      तो पहले समझें कि लेश्‍या क्‍या है? ऐसा समझें कि सागर शांत है। कोई लहर नहीं है, फिर हवा का एक झोंका आजा है, लहरें उठनी शुरू हो जाती है, तरंगें उठती है। सागर डांवांडोल
हो जाता है, छाती अस्‍त वस्‍त हो जाती है। सब अराजक हो जाता है। उन लहरों का नाम लेश्‍या है। तो लेश्‍या का अर्थ हुआ चित की वृतियां।

बुद्धि का स्‍वभाव नकरात्मक—

वस्‍तुत: बुद्धि का स्‍वभाव नकार है। इसे समझ लें,ठीक से। बुद्धि का स्‍वभाव निगेटिव है, नकारात्‍मक हे। जब बुद्धि कहती है नहीं—तभी होती है। ओर जब आप कहते है हां, तब बुद्धि विसर्जित हो जाती है, ह्रदय होता है। जब भी आपके भीतर से ‘’हां’’ होती है, यस होता है, तब ह्रदय होता है। और जब नहीं होती है, ‘’नो’’ तब बुद्धि होती है। इसलिए जो व्‍यक्‍ति जीवन को पूरी तरह ‘’हां’’ कह सकता है, वह आस्‍तिक है; और जो व्‍यक्‍ति ‘’नहीं’’ पर जोर दिये चला जाता है, वह नास्‍तिक है।

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

जीसस का जन्‍म और तीन भारतीय मनीषी--

जीसस के जन्‍म पर पूरब के तीन व्‍यक्‍ति जीसस की खोज में निकले। जीसस का जन्‍म हुआ बेथलहम की एक घुड़साल में, जहां जानवर बांधे जाते है। उस पशुशाला में गरीब बढ़ई के घर। और पूरव के तीन मनीषी यात्रा पर निकले कि कहीं कोई शुभ्र लेश्‍या का व्‍यक्‍ति जन्‍म लेने वाला है। और वो तीनों एक तारे का पीछा करते बेथलहम पहुंच गए।  इन तीन की वजह से हेरोत को पता चला,

मानव और मृत्‍यु–

 
मृत्‍यु मनुष्‍य के जीवन में इतनी बड़ी घटना है कि बाकी जीवन में जो भी घटता है वो उसके सामन तुच्‍छ हो जाता है, बोना हो जाता है। फिर भी क्‍यों मनुष्‍य मृत्‍यु की इस घटना को जान नहीं पाता,समझ नहीं पाता, उसमें खड़ा हो नहीं पाता। क्‍या कारण है मनुष्‍य पूरे जीवन में सब प्रकार की तैयारी करता है पर उस महत्‍वपूर्ण घटना से साक्षात्‍कार नहीं कर पाता उसे ग्रहण नहीं कर पाता उससे आँख चुराता है। अभी कुछ दिनों पहले किरलियान फोटोग्राफी ने मनुष्‍य के सामने कुछ वैज्ञानिक तथ्‍य उजागर किये है।

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

भगवान महावीर और गौतम—(कथा यात्रा)


गौतम उस समय का बड़ा पंडित था। हजारों उसके शिष्‍य थे, जब वह महावीर को मिला, उसके पहले उसका बड़ा नाम था, वह ब्राह्मण घर में जन्‍मा था। महावीर से विवाद करने ही आया था। गौतम, महावीर से विवाद करना ठीक उल्‍टा होगा ये उसे ज्ञात नहीं था। वह थोथे ज्ञान से भरा था। तर्क बुद्धि थी। तक्र बुद्धि आदमी को अहंकारी बना देती है। महावीर को पराजित करने के लिए आया था। हरा दिये होंगे पंडित पुरोहित। जो जानकारी रखते होंगे। उसने सोचा महावीर भी जानकरी से भरा है।

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

दूध और कामवासना—

 
दूध असल में अत्‍यधिक कामोत्तेजक आहार है और मनुष्‍य को छोड़कर पृथ्‍वी पर कोई पशु इतना कामवासना से भरा हुआ नहीं है। और उसका एक कारण दूध है। क्‍योंकि कोई पशु बचपन के कुछ समय के बाद दूध नहीं पीता, सिर्फ आदमी को छोड़ कर। पशु को जरूरत भी नहीं है। शरीर का काम पूरा हो जाता है। सभी पशु दूध पीते है अपनी मां का, लेकिन दूसरों की माताओं का दूध सिर्फ आदमी पीता है और वह भी आदमी की माताओं का नहीं जानवरों की माताओं का भी पीता है।

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

निजिन्‍सकी का असाधारण नृत्‍य—

 
अभी एक बहुत अद्भुत नृत्‍यकार हुआ पश्‍चिम में—निजिन्सकी। उसका नृत्‍य असाधारण था, शायद पृथ्‍वी पर वैसा नृत्‍यकार इसके पहले नहीं था। असाधारण यह थी वह अपने नाच में जमीन से 10-12 फीट हवा में ऊपर उठ जाता था। जितना की साधारणतया उठना नामुमकिन है। और इससे भी ज्‍यादा आश्‍चर्य जनक यह था कि वह ऊपर से जमीन की तरफ आता था तो इतने स्‍लोली, इतने धीमें आता था कि जो बहुत हैरानी की बात है।

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

अंधी लड़की बिना हाथ से छू कर पढ़ना—

  पिछले दस वर्ष पहले1961 में रूस में एक अंधी लड़की ने हाथ से पढ़ना शुरू कर दिया। हैरानी की बात थी। बहुत परीक्षण किए गए। पाँच वर्ष तक निरंतर वैज्ञानिक परीक्षण किए गए। और फिर रूस की जो सबसे बड़ी वैज्ञानिक संस्‍था है, एकेडमी, उसने घोषणा की; पाँच वर्ष के निरंतर अध्ययन के बाद कि लड़की ठीक कहती है। और हैरानी की बात है कि हाथ आँख से भी ज्‍यादा ग्रहण शील होकर अध्ययन कर रहे है। अगर लिखे हुए कागज पर—ब्रेल में नहीं, अंधों की भाषा में नहीं आपकी भाषा में लिखे हुए कागज पर—वह हाथ फेरती है तो पढ़ लेती है। आपके लिए हुए कागज पर कपड़ा ढाँक दिया गया है और उस कपड़े पर हाथ रखती है, तो पढ़ लेती है। तो यह तो आँख भी नहीं कर पाती है। यह तो जो वैज्ञानिक प्रयोग कर रहे है। वे भी नहीं पढ़ पाते है सामने, कि नीचे क्‍या लिखा है।

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

अहंकार—

अहंकार आत्‍मबोध का आभाव है। आत्म स्मरण का आभाव है। अहंकार अपने को न जानने का दूसरा नाम है। इसलिए अहंकार से मत लड़ों। अहंकार और अंधकार पर्यायवाची है। हां, अपनी ज्‍योति को जला लो। ध्‍यान का दीया बन जाओ। भीतर एक जागरण को उठा लो। भीतर सोए-सोए न रहो। भीतर होश को उठा लो। और जैसे ही होश आया, चकित होओगे, हंसोगे—अपने पर हंसोगे। हैरान होओगे। एक क्षण को तो भरोसा भी न आएगा कि जैसे ही भीतर होश आया वैसे ही अहंकार नहीं पाया जाता है। न तो मिटाया,न मिटा,पाया ही नहीं जाता है।

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

मैंने स्‍वयं को भगवान घोषित क्‍या किया?

मुझे रोज पत्र आते है। मेरे खिलाफ रोज अखबारों में लेख निकलते हैं—सारी दुनियां के कोने-कोने में। उन सारे विरोधों में जो सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण विरोध है, वे विचारणीय है। एक विरोध यह है कि मैंने स्‍वयं को भगवान घोषित क्‍यों किया? की मैं स्‍वयं घोषित भगवान हूं, यह भारी विरोध है।

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

स्‍वामी रामकृष्‍ण परमहंस और मां शारद


      राम कृष्‍ण अपनी पत्‍नी को मां बोलते थे। और यूं नहीं कि बाद में कहने लगे थे। रामकृष्‍ण जब चौदह साल के थे, तब उनको पहली समाधि हुई। आ रहे थे अपने खेत से वापस। झाल के पास से गांव में से गुजरते थे। सुंदर गांव की झील, सांझ का समय, सूरज का डूबना, बस डूबा-डूबा। सूरज की डूबती हुई किरणों ने, आकाश में फैली छोटी-छोटी बदलियों पर बड़े रंग फैला रखे है। वर्षा के दिन करीब आ रहे है। काली बदलियां भी छा गई है। घनघोर, जल्‍दी रामकृष्‍ण लोट रहे है। तभी बगुलों की एक पंक्‍ति झील से उड़ी और काली बदलियों को पार करती हुई निकल गई। काली बदलियों से सफेद बगुलों की पंक्‍ति का निकल जाना, जैसे बिजली कौंध गई। यह सौंदर्य का ऐसा क्षण था कि रामकृष्‍ण वहीं गर पड़े। घर उन्‍हें लोग बेहोशी में लाए। लोग समझे बेहोशी है, वह थी मस्‍ती। बामुशिकल से वे होश में लाए जा सके।

रविवार, 12 दिसंबर 2010

स्‍वर्ग का अख़बार और पत्रकार—

    
पत्रकार की तो और भी अड़चन है। पत्रकार तो जीता है गलत पर ही। पत्रकार का सत्‍य से कोई लेना-देना नहीं है। पत्रकार तो जीता असत्‍य पर है, क्‍योंकि असत्‍य लोगों को रुचिकर है। अख़बार में लोग सत्‍य को खोजने नहीं जाते। अफवाहें खोजते है। तुम्‍हें शायद पता हो या न हो कि स्‍वर्ग कोई अख़बार नहीं निकलता। कोई ऐसी घटना ही नहीं घटती स्‍वर्ग में जो अख़बार में छापी जा सकें। नरक में बहुत अख़बार निकलते है। क्‍योंकि नरक में तो घटनाएं घटती ही रहती है।

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

मोरारजी देसाई और नर्क—


मोरारजी देसाई जब इस प्‍यारी दुनियां से चल बसे, तब उन्‍होंने सोचा की हो-न-हो मुझे तो जरूर ही स्‍वर्ग में जगह मिलेगी। पर ये स्‍वर्ग दिल्‍ली तो नहीं था। न ही वहां दिल्‍ली की कोई साठ गांठ ही चल सकती थी। पहुंच गये नर्क में। शैतान ने कहा कि आप ऐसे भले आदमी है, खादी पहनते है। और एक कुर्ता भी मोरारजी देसाई दो दिन पहनते है। इसलिए जब वह बैठते है, कुर्सी पर तो पहले कुरते को दोनों तरफ से उठा लेते है। क्‍या बचत कर रहे है, अरे गरीब देश है, बचत तो करनी ही पड़ेगी। इस तरह एक दफा और लोहा करने की बचत हो जाती है। पहले  दोनों पुछल्ला ऊपर उठा कर बैठ गए, ताकि सलवटें न पड़े। सिद्ध पुरूष है, चर्खा हमेशा बगल में दबाए रखते है। चलाएँ या न चलाए। शैतान ने कहा कि और आप काम ऊंचे करते रहे, गजब के काम करते रहे, तो आपको हम एक अवसर देते है कि नरक में तीन खंड है, आप चुन ले। आम तौर से हम चुनने नहीं देते, हम भेजते है। आपको हम सुविधा देते है कि आप चुनाव कर लें।

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

नागार्जुन और चोर—

 
नागार्जुन से एक चोर ने कहा था कि तुम ही एक आदमी हो जो शायद मुझे बचा सको। यूं तो मैं बहुत महात्‍माओं के पास गया, लेकिन मैं जाहिर चोर हूं, मैं बड़ा प्रसिद्ध चारे हूं, और मेरी प्रसिद्धि यह है कि मैं आज तक पकड़ा नहीं गया हूं, मेरी प्रसिद्धि इतनी हो गई है कि जिनके घर चोरी भी नहीं कि वह भी लोगों से कहते है कि उसने हमारे घर चोरी की। क्‍योंकि मैं उसी के घर चोरी करता हूं जो सच में ही धनवान है। हर किसी अरे–गैरे –नत्थू खैरे के घर चोरी नहीं करता। सम्राटों पर ही मेरी नजर होती है। और कोर्इ मुझे पकड़ नहीं पाया है। लेकिन तुमसे मैं पूछता हूं। और महात्‍माओं से पूछता हूं तो वे कहते है: पहले चोरी छोड़ो।

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

नेता जी और सर्कस—


एक राजनेता चुनाव में हार गये। राजनेता थे, और कुछ जानते भी नहीं थे। ने पढ़े-लिखे थे, एक दम से अंगूठा छाप थे। राजनेता होने के लिए अंगूठा छाप होना एक योग्‍यता है। सब तरह से अयोग्‍य होना योग्‍यता है। चुनाव क्‍या हार गए। बड़ी मुश्‍किल में पड़ गये। कोई नौकरी तो मिल नहीं सकती थी, कहीं चपरासी की भी नौकरी नहीं मिली। नेताजी परेशान बाकें हाल, बिना काम के घर में कौन घुसने दे। सब अमचे चमचे भी साथ छोड़ गये।

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

वृक्षों भी संवेगों और भावनाएँ महसूस करना—


वृक्षों के संवेगों पर, भावनाओं पर। वह बड़ा हैरान करने वालो प्रयोग हुआ। पहले किसी नह सोचा भी नहीं था कि वृक्षों में संवेग हो सकते है। महावीर के बाद जगदीश चंद्र बसु तक बात ही भूल गई थी। फिर जगदीश चंद्र बसु ने थोड़ा बात उठाई कि वृक्षों में जीवन है। लेकिन बसु भी धीरे-धीरे विस्‍मृत हो गए। विज्ञान से यह बात ही खो गई। इसकी चर्चा ही बंद हो गई।

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

सम्‍मोहन क्‍या होता है?

सम्‍मोहन क्‍या होता है, क्‍या तुमने कभी किसी सम्मोहन विद को ध्‍यान से देखा है, क्‍या करता है वह? पहले तो वह कहता है ‘’रिलैक्‍स’’ शिथिल हो जाओ। और वह दोहराता है इसे, वह कहता जाता है, रिलैक्‍स, रिलैक्‍स—शिथिल हो जाओ, शिथिल हो जाओ।

शनिवार, 4 दिसंबर 2010

सम्‍मोहन—


आदमी जीता है एक गहरे सम्‍मोहन में। मैं सम्‍मोहन पर काम करता हूं, क्‍योंकि सम्‍मोहन को समझना ही एक मात्र तरीका है व्‍यक्‍ति को सम्‍मोहन के बाहर लाने का। सारी जागरूकता एक तरह की सम्मोहन नाशक है, इसीलिए सम्‍मोहन की प्रक्रिया को बहुत-बहुत साफ ढंग से समझ लेना है; केवल तभी तुम उसके बहार आ सकते हो। रो को समझ लेना है, उसका निदान कर लेना है; केवल तभी उसका इलाज किया जा सकता है। सम्‍मोहन आदमी को रोग है। और सम्‍मोहन विहीनता होगी एक मार्ग।

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

जर्मन राजकुमार विमल कीर्ति का बुद्धत्‍व---


अभी कुछ दिन पहले मेरा जर्मन संन्‍यासी,विमल कीर्ति, संसार से विदा हुआ। उसने अपनी आखिरी कविता जो मेरे लिए लिखी, उसमें कुछ प्‍यारे वचन लिखे थे। विमल कीर्ति यूं तो राज परिवार से था। करीब-करीब यूरोप के सारे राज परिवारों से उसके संबंध थे। उसकी मां है ग्रीस की महारानी की बेटी। उसकी दादी है ग्रीस की महारानी। उसकी मौसी है स्‍पेन की महारानी। उसकी मां के भाई है फिलिप, एलिज़ाबेथ के पति इंग्‍लैंड के। एलिज़ाबेथ, इंग्‍लैंड की महारानी उसकी मामी। प्रिंस वेल्‍स उसके ममेरे भाई।

गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

विश्राम व शांति के सूत्र—

इधर मनुष्‍य के जीवन में निरंतर पीड़ा, दुःख और अशांति बढ़ती गई है। बढ़ती जा रही है। जीवन के रस का अनुभव, आनंद का अनुभव विलीन होता जा रहा है। जैसे एक भारी बोझ पत्‍थर की तरह हमारे मन और ह्रदय पर है, हम जीवन भर उसमें दबे-दबे जीते है। उसी बोझ के नीचे समाप्‍त हो जाते है। लेकिन किस लिए यह जीवन था। किसी लिए हम थे। कौन सा प्रयोजन था? इस सब को कोई अनुभव नहीं हो पाता है। यह कौन सा बोझा है जो हमारे चित पर बैठ कर हमारे जीवन का रस सोख लेता है। कौन साभार है, जो हमारे प्राणों पर पाषाण बन कर बोझिल हो जाता है?
      यह भार क्‍या है। यह वेट क्‍या है, जो आपकी जान लिए लेता है। मेरी जान लिए लेता है। सारी दुनियां की जान लिए लेता है। यह कौन सा पाषाण-भार है, जो आपके कंघे पर है? कौन सी चीज है जो दबाए देती है। ऊपर नहीं उठने देता। आकांक्षाओं तो आकाश छूना चाहती है। लेकिन प्राण तो पृथ्वी से बंधे है। क्‍या है, कौन सी बात है? कौन रोक रहा है? कौन अटका रहा है? किसने यह सुझाव दिया है कि इस पत्‍थर को अपने सिर पर ले लेना? किसने समझाया? शायद हमारे अहंकार ने हमको भी फुसलाया है। शायद हमारी अस्‍मिता ने ईगो ने, हमको भी कहा है कि भर सिर ले लो। क्‍योंकि इस जगत में जिसके सिर पर जितना भार है, वह उतना बड़ा है। बड़े होने की दौड़ है, इसलिए भार को सहना पड़ता है।
     
लेकिन सारी दुनिया,सारे मनुष्‍य का मन कुछ ऐसी गलत धारणा में परिपक्‍व होता है, निर्मित होता है कि जिन पत्‍थरों को हम अपने ऊपर अपने हाथों से ही रखते है। कौन सी चीजें है, कौन सा केंद्र है जिस पर भर को रखने वाले हाथ मेरे ही है। कौन सी चीजें है, कौन सा केंद्र है जिस पर भार इकट्ठा होता है। कौन से तत्‍व है जिनसे पत्‍थर की तरह भार संग्रहीत होता है। उनकी ही मैं आपसे चर्चा करना चाहता हूं।

विजय आनंद(मशहूर ऐक्टर डायरेक्टर) का संन्‍यास त्‍याग—

 
अभी कुछ दिन पहले मेरे एक पुराने संन्‍यासी—भूतपूर्व संन्‍यासी—विजय आनंद, कृष्‍ण प्रेम को मिल गये महाबालेश्वर में। कृष्‍ण प्रेम से बोले कि मैंने भगवान को पूर्ण समर्पण कर दिया था। पाँच साल तक संपूर्ण समर्पण रखा। लेकिन जब मुझे बुद्धत्‍व उपलब्‍ध नहीं हुआ तो मैंने फिर संन्‍यास का त्‍याग कर दिया।

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

धर्मों की चट्टानें—

जिसे लोग धर्म समझते है,  वह धर्म नहीं है। ईसाइयत, इसलाम और हिंदू धर्म, ये धर्म नहीं है। लोग जिन्‍हें धर्म कहते है, वे मृत चट्टानें हे। मैं तुम्‍हें धर्म नहीं धार्मिकता सिखाता हूं—एक बहती हुई सरिता, पग-पग पर मोड़ लेती है, निरंतर अपना मार्ग बदलती है। लेकिन अंतत: सागर तक पहुंच जाती है।

संत असिता और भगवान बुद्ध का जन्‍म–


आज से पच्‍चीस सौ साल पहले, जब भगवान बुद्ध का जन्‍म हुआ,  घर में उत्‍सव मनाया जा रहा था। सम्राट के घर बेटा पैदा हुआ था, पूरी राजधानी को सजाया गया था। रात भर लोगों दीए जलाएं, नाचे। उत्‍सव मनाया। बूढ़े सम्राट के घर बेटा पैदा हुआ था। बड़े दिन की अभिलाषा पूरी हुई। पूरा राज्‍य खुशीया मना रहा था, उनके राज्‍य का वारीश आया है। मालिक बूढ़ा होता जाता था और नये मालिक की कोई खबर नहीं। इस लिए भगवान बुद्ध को नाम दिया सिद्धार्थ। सिद्धार्थ का अर्थ होता है। अभिलाषा का पुरा हो जाना।