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शनिवार, 17 मार्च 2012

कोई तो अमीरों का गुरु हो—( 10 ) ओशो

एक मात्र विकल्‍प: एक विश्‍व सरकार
 
(अमेरिका में तथा विश्व  भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्व  के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्ध  है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
(डेर श्पीगल, जर्मन पत्रिका के साथ)

प्रश्‍न—अमेरिकन समाज प्रजातांत्रिक नहीं है?

ओशो—नहीं, कोई भी समाज अभी तक सभ्‍य नहीं हुआ है।

मंगलवार, 13 मार्च 2012

कोई तो अमीरों का गुरु हो—( 9 ) ओशो

गरीबी : जिम्‍मेदार कौन
(अमेरिका में तथा विश्व  भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्व  के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्ध  है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
(डेर श्पीगल, जर्मन पत्रिका के साथ)
    
प्रश्‍न’—आप डच चित्रकार विन्‍सेंट वॉन गॉग के बहुत बड़े प्रशंसक है। जिसका एक ही कान था। आप कुछ इस तरह कहते है कि, ‘’उसने आत्‍महत्‍या कर ली क्‍योंकि जो कुछ वह चित्रित करना चाहता था, वह उसने चित्रित कर लिया था। तो पूरी दूनिया को यक आत्‍महत्‍या लगती है। परंतु मुझे नहीं। मुझे तो यह प्राकृतिक अंत लगता है। चित्र पूरा हुआ जीवन पूरा हुआ।

रविवार, 11 मार्च 2012

कोई तो अमीरों का गुरु हो--[8}—ओशो

मरने की स्‍वतंत्रता होनी चाहिए--
(अमेरिका में तथा विश्‍व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्‍व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्‍ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्‍ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
(डेर श्‍पीगल, जर्मन पत्रिका के साथ)
प्रश्‍न-–बस एक और प्रश्‍न उन लोगों के बारे में जो आपसे जुड़ रहे है। आपके साथ खड़े होने वालों के बारे में। मेरा ख्‍याल है कि सैद्धांतिक रूप से पश्‍चिम के हताश युवा आपके पास आ रहे है जो अधिक आज्ञाकारी है और जो बहुत से प्रश्‍न नहीं पूछते। क्‍योंकि भारतीय अधिक व्‍यावहारिक दिमाग के लोग नहीं है?

ओशो—क्‍या तुम सोचते हो कि तुम भारतीय हो?

शुक्रवार, 9 मार्च 2012

कोई तो अमीरों का गुरु हो——7 ओशो

देश और धर्म: झूठी लकीरें—ओशो
(अमेरिका में तथा विश्‍व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्‍व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्‍ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्‍ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
प्रश्‍न--युद्ध के अलावा, नैतिक व राजनैतिक दृष्‍टि से आप हिटलर के बारे में क्‍या सोचते है?
ओशो—नैतिक ढंग से वह महात्‍मा गांधी की तरह ही नैतिक था।

प्रश्‍न–महात्‍मा गांधी की तरह।
ओशो—हां, क्‍योंकि मैं दोनों को बहुत अनैतिक मानता हूं। सच तो यह है कि वह महात्‍मा गांधी से अधिक हिंदू था।

गुरुवार, 8 मार्च 2012

कोई तो अमीरों का गुरु हो——6 (ओशो)

अपनी खोज आप करो—ओशो
(अमेरिका में तथा विश्‍व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्‍व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्‍ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्‍ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
गुड मोर्निंग एक बी सी नेटवर्क के साथ—

प्रश्‍न—मुझे उस विषय में पूछना है जो अभी एक क्षण पहले आपने कहा। आपने कहा कि आप लोगों को नियंत्रित करना नहीं चाहते है। आपका कोई नियंत्रण नहीं है। लेकिन क्‍या आपके 350,000 अनुयायियों पर आपका बहुत ज्‍यादा प्रभाव नहीं है?

रविवार, 4 मार्च 2012

कोई तो अमीरों का भी गुरु हो? भाग--5 (—ओशो)

मेरा कोई जीवन-दर्शन नहीं है--ओशो

(अमेरिका में तथा विश्‍व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्‍व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्‍ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्‍ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)

दि लास्‍ट टेस्‍टामेंट
(गुड़ मोर्निंग अमेरिका, ए बी सी नेटवर्क के साथ)

प्रश्‍न—पहले तो आज रात हमारे साथ बात करने के लिए हम आपके आभारी है। कुछ वर्ष आपके मौन व्रत लिया हुआ था। हाल ही में आपने पुन: बोलने का निर्णय लिया है—अपने समर्थकों से, और आज हमसे आपने इस समय बोलने का निर्णय क्‍यों लिया?

शुक्रवार, 2 मार्च 2012

कोई तो अमीरों का भी गुरु हो? भाग--4 (—ओशो)

सारा विश्‍व एक पागलखाना बना हुआ है—ओशो

(अमेरिका में तथा विश्‍व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्‍व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्‍ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्‍ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
ये पत्रकार वार्ताएं जुलाई 1985 और जनवरी 1986 के बीच संपन्‍न हुई।
(इस अंक में प्रकाशित अंश ओशो के अमेरिका प्रवास से है)
प्रश्‍न—ओशो, अब मैं एक विषय की और मुड़ता हूं। पुन:, आपके और आपके संन्‍यासियों के बारे में कहा या लिखा गया है उसे मद्देनज़र रखते हुए यह कि लोगों में भय पैदा होता है जब वे आपके अंग रक्षकों को हथियारों से लैस देखते है। और ऐसी अफवाह है कि इस रैंच पर कहीं हथियारों का बड़ा भंडार है। क्‍या यह सही है? यदि यह सही है तो ये हथियार यहां क्‍यों रखे जाते है?

गुरुवार, 1 मार्च 2012

पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा—(अध्‍याय—14)

मेरा जंगल में खो जाना--

      धीरे-धीरे मेरा स्‍वास्‍थ ठीक हो रहा था। अब खाना भी हजम होने के साथ-साथ मुझे भूख भी लगने लगी। इसी लिए पापा जी मुझे रोज जंगल में घुमाने के लिए ले जाते थे। पर इतवार या किसी छुटटी के दिन के तो क्‍या कहने थे। जब पूरा परिवार जंगल में जाने की तैयारी करता तो मेरे सब्र का बाध टूट जाता। एक-एक पल मुझे युगों की तरह से लगता। पर मनुष्‍य को हमारी तरह से नहीं जीना उसे तो न जाने कितने काम होते है। ये सब में देखता पर क्‍या करू मुझे खुशी बरदाश्त होती ही नहीं थी। मेरे साथ बच्‍चे भी जूते कपड़े पहन कर तैयार हो जाते। पर ममि और मणि दीदी तो कछुवे की चाल से तैयार होती। मुझे लगता क्‍या जरूरत है इतना सब करने के लिए। कहीं खाना बनाया जाता। कहीं गंदे कपड़े साबुन एक बेग में भरे जाते। वरूण भैया अपना खेलने का सामन साथ ले कर चलते। कई बार तो पापा जी दूकान से भी आ जाते पर हमारी तैयारी पूरी नहीं होती। आखिर में रो-रो कर थक जाता। मेरे को दूध पीने के लिए कहा जाता पर मारे खुशी के दूध अंदर जाता ही नहीं था। लगता अभी पंख लग जाये और हम जंगल में पहुंच जाये।