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रविवार, 16 सितंबर 2012

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—71 (ओशो)

या बीच के रिक्‍त स्‍थानों में यह बिजली कौंधने जैसा है—ऐसा भाव करो।
     थोड़े से फर्क के साथ यह विधि भी पहली विधि जैसी ही है।
     या बीच के रिक्‍त स्‍थानों में यह बिजली कौंधने जैसा है—ऐसा भाव करो।
     एक केंद्र से दूसरे केंद्र तक ताकी हुई प्रकाश-किरणों में बिजली के कौंधने का अनुभव करो—प्रकाश की छलांग का भाव करो। कुछ लोगों के लिए यह दूसरी विधि ज्‍यादा अनुकूल होगी, और कुछ लोगों के लिए पहली विधि ज्‍यादा अनुकूल होगी। यही कारण है कि इतना सा संशोधन किया गया है।

शनिवार, 15 सितंबर 2012

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—70 (ओशो)

    ‘अपनी प्राण शक्‍ति को मेरुदंड के ऊपर उठती, एक केंद्र की और गति करती हुई प्रकाश किरण समझो, और इस भांति तुममें जीवंतता का उदय होता है।
       योग के अनेक साधन अनेक उपाय इस विधि पर आधारित है। पहले समझो कि यह क्‍या है, और फिर इसके प्रयोग को लेंगे।
      मेरुदंड, रीढ़ तुम्‍हारे शरीर और मस्‍तिष्‍क दोनों का आधार है। तुम्‍हारा मस्‍तिष्‍क,  तुम्‍हारा सिर तुम्‍हारे मेरुदंड का ही अंतिम छोर है। मेरुदंड पूरे शरीर की आधारशिला है। और अगर मेरुदंड युवा है तो तुम युवा हो। और अगर मेरुदंड बूढा है तो तुम बढ़े हो। अगर तुम अपने मेरुदंड को युवा रख सको तो बूढा होना कठिन है। सब कुछ इस मेरूदंड पर निर्भर है। अगर तुम्‍हारा मेरूदंड जीवंत है तो तुम्‍हारे मन मस्‍तिष्‍क में मेधा होगी। चमक होगी। और  अगर तुम्‍हारा मेरूदंड जड़ और मृत है तो तुम्‍हारा मन भी बहुत जड़ होगा। समस्‍त योग अनेक ढंग से तुम्‍हारे मेरूदंड को जीवंत, युवा,ताजा और प्रकाशपूर्ण की चेष्‍टा करता है।

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—69 (ओशो)

   ‘यथार्थत: बंधन और मोक्ष सापेक्ष है; ये केवल विश्‍व से भयभीत लोगों के लिए है। यह विश्‍व मन का प्रतिबिंब है। जैसे तुम पानी में एक सूर्य के अनेक सूर्य देखते हो, वैसे ही बंधन और मोक्ष को देखो।
     यह बहुत गहरी विधि है; यह गहरी से गहरी विधियों में से एक है। और विरले लोगों ने ही  इसका प्रयोग किया है। झेन इसी विधि पर आधारित है। यह विधि बहुत कठिन बात कह रही है—समझने में कठिन, अनुभव करने में कठिन नहीं है। परंतु पहले समझना जरूरी है।

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—68 (ओशो)

जैसे मुर्गी अपने बच्‍चों का पालन-पोषण करती है, वैसे ही यथार्थ में विशेष ज्ञान और विशेष कृत्‍य का पालन-पोषण करो।
     इस विधि में मूलभूत बात है: यथार्थ में। तुम भी बहुत चीजों का पालन पोषण करते हो; लेकिन सपने में, सत्‍य में नहीं। तुम भी बहुत कुछ करते हो; लेकिन सपने में सत्‍य में नहीं। सपनों को पोषण देना छोड़ दो। सपनों को बढ़ने में सहयोग मत दो। सपनों को अपनी ऊर्जा मत दो। सभी सपनों से अपने को पृथक कर लो।

बुधवार, 12 सितंबर 2012

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—67 (ओशो)

यह जगत परिवर्तन का है, परिवर्तन ही परिवर्तन का। परिवर्तन के द्वारा परिवर्तन को विसर्जित करो।
            पहली बात तो यह समझने की है कि तुम जो भी जानते हो वह परिवर्तन है, तुम्‍हारे अतिरिक्‍त जानने वाले के अतिरिक्‍त सब कुछ परिवर्तन है। क्‍या तुमने कोई ऐसी चीज देखी है। जो परिवर्तन न हो। जो परिवर्तन के अधीन न हो। यह सारा संसार परिवर्तन की घटना है।
      हिमालय भी बदल रहा है। हिमालय का अध्यन करने वाले वैज्ञानिक कहते है कि हिमालय बढ़ रहा है। बड़ा हो रहा है। हिमालय संसार का सबसे कम उम्र का पर्वत है।

सोमवार, 3 सितंबर 2012

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—66 (ओशो)

   मित्र और अजनबी के प्रति, मान और अपमान में, असमता और समभाव रखो।
      असमता के बीच समभाव रखो। यह आधार है। तुम्‍हारे भीतर क्‍या घटित हो रहा है। दो चीजें घटित हो रही है। तुम्‍हारे भीतर कोई चीज निरंतर वैसी ही रहती है; वह कभी नहीं बदलती। शायद तुमने इसका निरीक्षण न किया हो। शायद तुमने अभी इसका साक्षात्‍कार न किया हो। लेकिन अगर निरीक्षण करोगे तो जानोंगे कि तुम्‍हारे भीतर कुछ है जो निरंतर वही का वही रहता है। उसी के कारण तुम्‍हारा एक व्‍यक्‍तित्‍व होता है। उसी के कारण तुम अपने को केंद्रित अनुभव करते हो; अन्‍यथा तुम एक अराजकता हो जाओगे।