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रविवार, 9 जुलाई 2017

पोनी--एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा—(अध्‍याय—28)

मैंने भी प्रेम किया—
    अचानक एक दिन घर में गहमागहमी शुरू हो गई। मैं बहुत समझने की कोशिश कर रहा था परंतु मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। भैया-दीदी की स्‍कूल की छुटियां थी। दिसम्बर माह था। दिन की घूप बहुत अच्‍छी लगती थी। और रात को कड़ाके की ठंड शरीर की हड्डियों को भी सिहरा देती थी। और इन दिनों एक बात और थी मैं रोज ही पापा जी के साथ जंगल में सुबह -सुबह जाता था। पापा जी शहर कर के आते और में उस धूल भरे रस्‍ते पर बहुत ताकत के साथ दौड़ लगाता। मुझे अपने पूरे जोर से दौड़ने में बहुत मजा आता था। रात का अँधेरा होता था। आस पास कोई नहीं होता था। दूर रह-रह कर कभी-कभार गीदड़ों की हाऊ....हाऊ की पूकार सुनाई देती थी। आज कर जंगल में कुत्‍ते रहते थे उन में से दो कुतियाँ जो जंगल में रहती थी उन्‍होंने बहुत प्‍यारे-प्‍यारे बच्‍चे दे रखे थे। मैं और सब करता था परंतु बच्‍चे मुझे बहुत अच्‍छे लगते थे।
कुछ कुत्‍ते बच्‍चों से बहुत चिड़ते है और मैंने सूना था कुछ तो उनको जान से भी मार देते थे। परंतु मैं ऐसा नहीं करता था। मुझे बच्‍चे बहुत अच्‍छे लगते थे। और इसमें से एक जो काली सफेद कुतियाँ है उस के साथ तो मेरा मिलन भी हुआ था। उस दिन पापा जी मेरा कितना इंतजार करते रहे। पहले तो मैं गायब हो गया। और फिर हम चिपक गये। ये चिपकने वाला मामला पूरी पृथ्‍वी पर हमारा ही होता है। और किसी पशु में ऐसा नहीं होता। फिर चाहे भेड़िया हो या लोमड़ी...या शायद सियार भी। इस के बारे में अधिक नहीं जानता परंतु भेड़िया के बारे में मैं पक्‍का कह सकता हूं। हम जब नर-मादा चिपकते है। वहीं तो सहवास का आनंद है। उत्‍तेजना के बाद विराम का क्षण है। उत्पात के बाद जो शांति आती है वह केवल हम ही महसूस करते है।
      परंतु मनुष्‍य ने तो इसे गलत ही समझा है। क्‍योंकि गली मोहले में हम जहां मरजी चिपक कर खड़े हो जाते है। आती जाती बहुत बेटियाँ देख कर शरमा कर दोहरी हो जाती है। ये सब समाज की परंपरा के लिहाज से अच्‍छा नहीं है। परंतु न जाने प्रकृति ने क्‍या सोच कर बनाया। जगत हंसाई हमारे ही नाम क्‍यों कि। जंगल में तो ठीक था परंतु शहर में मनुष्‍य के बीच एक असभ्‍य सा लगता है। इस के बारे में अनेक-अनेक कथा सुनने में आती है। परंतु एक कथा मैंने सूनी है। एक बार एक कुत्‍ता जंगल में घूमता हुआ। एक ऋषि के आश्रम में आ गया। वहाँ पर एक ऋषि और उनकी पत्‍नी एकांत में एक निर्जन स्‍थान पर प्रेम क्रीड़ा कर रहे थे। न जाने उन के इस प्रेम आलाप को देख कर हमारा एक पूर्वज क्‍यों इतना मंत्र मुग्‍ध हो गया की अपलक उन्‍हें निहारने लगा। जब ऋषि का प्रेम क्रीड़ा खत्‍म हुई और उसने एक कुत्‍ते को अपनी और इस तरह से ताकते हुए देखा तो वह झेप गया। और उसे अपने अंदर एक निर्लजता का एहसास हुआ। कि मैं जो कर रहा था वह किसी प्राणी ने देख लिया। क्‍योंकि प्रेम प्रसंग में कुछ ऐसा किया जा जाता है कि उसके बाद आदमी को सोचने में लज्‍जा महसूस होती है। और ऋषि तो महान होता है। उसकी महानता पर इस तरह से किसी की नजर पड़े तो वह क्रोध में आ जाता है। और भारतीय ऋषि तो दुर्वासा का अवतार है। वह तो जरा सी बात पर आदमी को क्‍या किसी पहाड़ को पेड़ को श्राप दे सकता है। और सच में कहते है ऐसा ही हुआ। उस ऋषि ने क्रोध में आकर हमारी परी जाति को श्राप दे दिया। कि तुमने किसी की प्रेम क्रीड़ा को देखा है। तो आज के बाद जब भी तुम प्रेम क्रीड़ा करोगे तो तुम्‍हें सारा जगत देखेगा। देखेगा ही नहीं वह उसे दुतकार देगा। तुम्‍हें भगाया जायेगा। मारा जायेगा। परंतु ऋषि को ऐसा तो समझना चाहिए था कि हमारा पूर्वज हमारी जाती के पास भाषा नहीं है। फिर हम इस बात का विस्‍तार या विवेचन नहीं कर सकते। एक कुत्ते ने देखा वह शायद दूसरे से संवाद कर कह भी नहीं सकता। और हो सकता है उसे कुछ अचरज लगा हो कि ये दो मनुष्‍य किस मुद्रा में बैठे है या लेटे है। ये क्‍या कर रहे है। कहीं कोई कुछ गलत तो नहीं कर रहा । या मार तो नहीं रहा। अब भला लाखों साल पहले हम इतने बुद्धि मान थोड़े ही होंगे। आज कौन हमारी बुद्धि के चार चाँद लगे है।
      खेर उस ऋषि महाराज ने हमारी जाति को श्राप दे दिया। और हम आज भी उसे गली मोहलो में ढोये और घसीटते चले जा रहे है। कोई हम पर हंसता है कोई लात मारता है। कोई-काई नई नवेली घूँघट की ओट से हंस कर शरमाती जरूर है पर उसे कोई खास देखना नहीं कहां जा सकता। खेर ये हमारी जाती के सब अच्‍छी बात नहीं है।  मनुष्‍य ने जितनी भी बुराईयां हमारी जाती में ढूंढनी चाही ढूँढी परंतु हम भी एक ढीठ प्राणी ठहरे जरा भी टस से मस नहीं हुए। लात, दुतकार खाकर भी हमने उसके पैरो को ही सहलाया उन्‍हें चाटा उनके आव भगत में हम पूछ हिला-हिला कर स्‍वागत किये। ये ही मेरी वफादारी है जो कोई भी दुनियां का आदमी देख ले सकता है। और इसी सब के कारण आज हम पशुओं में श्रेष्‍ठ तरह से जी रहे है। कोई भी जाती हमसे महान नहीं है। कभी किसी जमाने में शायद कृष्‍ण भगवान के जमाने तक गाय मनुष्‍य की प्रिय पशु हुआ करती थी। क्‍योंकि वह बहुत उपयोगी थी। उसके बच्‍चे, उसका गोबर....सब काम का था। वैसे हम तीनों प्राणी जो पहले-पहले मनुष्‍य के संग आये उनमें से समय-समय पर अपनी पहचान बनाते रहे। कभी गाय का युग था। जब देश स्‍वर्ण युग था। आश्रम थे, चरागाह थी। और उसके बाद आया घोड़े का समय जब चारों और युद्ध ही युद्ध और मारा मारी होती थी। तब परिवहन का साधन भी घोड़ा ही हुआ करता था जो द्रुत गति से भाग सकता था। खेर अब कलयुग आ गया है। न दूध की जरूरत है, न परिवहन की जरूर है। उनके और विकल्‍प आ गये है। आज के संग साथ की जरूरत है। आज में मनुष्‍य के बहुत करीब आ गया हूं। आगे जाने अब किस का समय आये। संभावना तो और किसी की नहीं है।
       जब भी मैं पापा जी के साथ जंगल में जाता तो वह एकांत में जिन दो कुतियाओं ने बच्‍चे दे रखे थे उनमें से दो-दो बच्‍चे मेरे रंग रूप के थे। और पापा जी उन के खाने के लिए हमेशा कुछ ने कुछ ले ही जाते थे वह तो मोरों और पक्षियों के लिए दाना, जब छुट्टी का दिन होता तो सब बच्चे भी साथ होते। उस दिन बहुत मस्ती होती थी। गीदड़ों के लिए ब्रेड....किसी के रस्‍क, और किसी के बाजरा....आदी। उस चितकबरी कुतियाँ के साथ मुझे पापा जी ने चिपका हुआ देखा भी लिया था। पापा जी उस दिन कितनी ही देर तक मुझे आवाज दे-दे कर ढूंढते रहे। और मैं हूं कि उस कुतियाँ के पीछे लगा था। आखिर कार बाद में जब मिला तो पापा जी कितने परेशान चुके थे। पूरे जंगल के कितने ही चक्‍कर लगा चुके थे। इस तरह से वह मुझे जंगल में छोड़ कर घर जा भी नहीं सकते थे। और आखिर कर उन्‍होने मुझे एक पेड़ के नीचे छाव में उस कुतियाँ के साथ चिपका हुआ देख लिया। तब जाकर उन्‍हें चैन मिला। जैसे ही पापा जी ने मुझे देखा तो मुझे बहुत शरम आई और मैंने कोशिश की उस अलग होने की। कि किसी तरह से अलग हो जाऊं परंतु हो नहीं सका। पापा जी मुझे इस अवस्‍था में देख कर दूर एक पेड़ के नीचे बैठ गये। उन्‍हें शायद कम से कम यह तो तसल्ली हुई होगी की मैं यहां पर सकुशल हूं। और मुझे इस अवस्‍था में देख कर वह अति प्रश्न थे। कितनी ही देर वह मेरा वहां बैठ कर इंतजार करते है। मैं समझता था कि वह गुस्‍सा करेंगे। परंतु ऐसा नहीं हुआ। जब काफी देर बाद मे चिपक से छूटा तो पहले तो अपने अंग को चाटता रहा उस समय मेरे उस अंग में  काफी जलन हो रही था। वह निचोड़ कर एक दम से लाल हो गया था। थोड़ी सूजन भी आ गई थी। जब वहां चाटनें से कुछ राहत महसूस की तो मैं उसके बाद में पूंछ हिलाता हुआ। पापा जी के पास गया और उनके हाथ को चाटनें लगा। उनके हाथ में मेरी चेन और डंडा था। अब में समझने की कोशिश कर रहा था की कोन मेरे गले का हार बनेगा। परंतु पापा जी ने मरे शरीर को प्‍यार से सहलाया और मेरे कान के पास आकर कहने लगे की खुब जालिम, धोखा दिया और फिर चुप से कहां कि  ये सब  क्‍या हो रहा था..... उस समय शर्म के मारे मेरा चेहरा लाल हो गया। कि जेसे मेरे चौरी पकड़ी गई हो। और मैंने अपनी पूछ को खुब जोर से हिलाया और शर्म के मारे सर झुका लिया। परंतु पापा जी खुश थे। एक प्रकृति का मिलन देख कर। उनके मन में इस को लेकर कुछ भी विरोध नहीं था। उसके बाद पापा जी ने मेरे गले में पट्टा बाँध दिया। मेरा मन भी घर जाने को उतावला था। एक मन तो चाहता था कि यही रह जाऊं, उस के संग साथ कुछ और समय बिताने को कर रहा था। शायद यह प्रकृति का रासायन था जो मुझे सम्‍मोहित कर रहा था। परंतु मनुष्‍य के संग साथ और उसका प्रेम इस के सामने बड़ा हो गया और यह फिका पड़ गया। ये तो प्रकृति का एक खेल था। शायद मन कुछ विकसित हो गया था। प्रकृति के सम्मोहन को तोड़ रहा था। ऐसा केवल मनुष्‍य कर सकता है। और मैं शायद पापा जी के संग साथ रह कर ऐसा कर सका नहीं तो हम पशु कहां प्रकृति के पाश को तोड़ सकते है। इसी लिए तो हमारा नाम पशु है। फिर मेरे ख्‍याल में जो मनुष्‍य भी इस में प्रकृति के सम्मोहन में हमारी तरह ही बंधा हो तो उसे पशु ही कहना चाहिए। उस का शरीर चाहे मनुष्य का हो। खेर ये बात तो बहुत उँची है......ओर मैं ज्ञानी बनना नहीं चाहता परंतु में बस एक अनुभव आपको कह रहा हूं जो मुझे हुआ फिर आप चाहे मुझे अहंकारी ही क्‍यों न कहो। बस मैं जल्‍दी से जल्‍दी घर जाकर आराम से सो जाना चाहता था। मुझे न जाने क्‍यों नींद सी आ रही थी। दूसरी और शरीर तोर पर भी मुझे बहुत थकावट महसूस हो रही थी। किसी तरह से अपने शरीर को मैं खुद ही घिसटता हुआ घर पहुंचा। पेर और शरीर इतना भारी हो गया था की उसे उठाने को मन नहीं कर रहा था। किसी तरह से घर पर पहूंच ही गयाद्यजाकर पापा जी ने मम्‍मी के कान में कुछ कहां, मम्‍मी जी ने मुझे खाने के लिए पेडी गिरी दी और दूध भी दिया। मैं तिरछी नजरों से देख रहा था कि मम्‍मी जी के चेहरे पर शरारती हंसी थी। किसी तरह से पेडी गिरी और दूध मैं खत्‍म किया ओर उस के बाद मैं घोड़े बेच कर सो गया। कितनी ही देर सोता रहा मुझे पता नहीं चला।
      सपने में भी वही सब में देखता है। दौड़ता रहा। और न जाने क्‍या–क्‍या सब मैंने देखा। दूर कहीं पर अपना घर दिखाई दे रहा था। और में घर की और भाग रहा था और धीरे-धीरे घर बहुत दूर जा रहा है। और उसी सब के बीच में मुझे लगा मैं अपनी मां का दूध पी रहा हूं। कभी मुझे अपनी मां का चेहरा नजर आता और कभी उस चितकबरी कुतियाँ का.....मैं समझ नहीं पार रहा था ये क्‍या हो रहा था। परंतु इस सब के बीच भी मुझे कोई अचरज नहीं हो रहा था। शायद स्‍वप्‍न बहुत लम्‍बा चला जो पूरा याद नहीं रख सका। कहीं मुझे अपना परिवार नजर आता है। कहीं अपने बच्‍चे। और मैं उनके साथ खेल रहा हूं, वह मुझ पर चढ़ कर खेल रहे है। कोई मेरी पूंछ पकड़ रहे है। कोई मेरा कान पकड़ कर ही खेल रहा। और मुझे इस सब में बहुत आनंद आ रहा था। लग रहा था पूरा संसार झूम रहा है। अपने पन का ऐसा आनंद मैंने कभी जीवन में महसूस नहीं किया। हालाकि बाद मे सचमुच ही वे बच्‍चे मेरे साथ खेले। परंतु स्‍वप्‍न तो बहुत कुछ ऐसा दे जाता है जो हकीकत में संभवन हीं हो सकता।
      कुछ ही पशु पक्षियों में परिवार बना कर या झुंड बना कर रहने की प्रवृति होती है। उनमें हमारी जाती भी आगे है। हाथी, शेर, खरगोश...आदि परिवार की देख भाल दोनों ही करते है। परंतु अब यहां तो हमारी कोई जिम्‍मेदारी नही है। वह खुद बेचारी बच्‍चो  को पैदा करेगी। और फिर उनका भरन पोषण करेगी। अपना पेट और साथ में इतने बच्‍चों को....खेर पापा जी इतना जरूर करते थे की जब तब उन बच्‍चों की मम्‍मी को कितनी ही बाद दूध पिलाने के लिए आते थे। और उन सब के लिए एक रस्‍क का पैकिट लेकिर आते थे। मुझे ये देख कर अच्‍छा लगता परंतु मैं तो कुछ कर नहीं सकता था। परंतु मन में एक गुमान होता है कि मेरा मालिक जो कुछ कर रहा है वह मैं ही कर रहा हूं।  बच्‍चे मेरे पास आकर मेरे दूध पीने की कोशिश करते। और सच में उस समय मुझे अच्‍छा भी लगता और गुदगुदी भी होती । जंगल में पापा जी काफी पीछे छोड़ कर उन बच्‍चों के पास पहूंच जाता था। और मेरे आने की उपस्थिति को वह बहुत पहले जान जाते थे और मेरे साथ निकल कर रास्‍ते पर आ जाते थे। पापा जी समझ जाते थे कि मैं ही उन्‍हें बुला कर लाया हूं। तब वह रस नहीं खा सकते थे। केवल उनकी मम्‍मी ही खाती थी। उनके लिए तो बाद में जब वह दो महीने के हो गये थे। दूध आने लगा। लेकिन एक बात मैंने देखी उनकी मम्मी भी काफी प्रेम पूर्ण थी। जब दूध एक वर्तन में डला जाता। तो वह दूर खड़ी हो जाती। बच्‍चों को पीने देती थे। खूद नहीं पीती थी। खेर मेरा तो सवाल ही नहीं उठता। मेरे लिए तो घर पर इतना दूध होता था कि में तो उसे देखता भी नहीं था। खेर इन के लिए तो दूध एक इनायत है। और सच मैने देखा वो जो पापा जी ने उन बच्‍चों को 10-20 बार जाकर दूध पिलाया वह उनके जीवन के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। उनके शरीर हृष्ट-पुष्ट हो गये। और वह प्रकृति के कुरूर हाथों से बचने में सामर्थ्य हो गये। और देखा की वह चारों ही बच्‍चे जीवत बच गये। किसी तरह से वह आनंद उत्‍सव से जंगल में रहते थे। जब मैं जाता तो वह मेरे साथ भागते खेलते। और दूर तक मेरे ही साथ रहते। लेकिन उनकी मम्‍मी मेरे साथ नहीं आती थे। वह तो अपना पेड़ भरने के बाद दूर खड़ी रह जाती थी।
क्रमश: अगले अंक में.......
स्‍वामी आनंद प्रसाद