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गुरुवार, 31 जनवरी 2013

पोनी—एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा-(अध्‍याय—23)

( मां से मिलन )
    शरीर की हष्‍टपुष्‍टता के कारण हमारा मन भी निडर और साहसी हो जाता है। मुझे अपनी ताकत और शरीर की चपलता पर बड़ा नाज हो गया था। या यूं कह सकते है। कि मुझे अपने जवानी पर बहुत घमंड हो गया था। मैं घर से निकल कर गलियों में साहस और बिना भय के निडर घूमता था। शरीर मेरा पतला और छरहरा जरूर था पर मेरी ताकत मेरी गर्दन के आस पास थी। जब मैं इन गांव के कुत्‍तों को देखता तो मुझे बड़ा अचरज होता था। ये वैसे तो देखने में बहुत हृष्टपुष्ट दिखाई देते है। परंतु इनकी गर्दन शरीर के बनस्‍पत एक दम से पतली होती है। इसी लिए जब भी मैं लड़ता तो न तो ये मुझे पकड़ ही पाते थे। आरे मेरी पकड़ के सामने उनकी बोलती बंद हो जाती थी। तब मैं यही सोचता था मेरी मां जंगली होने के कारण में इन सब से भिन्‍न हूं। क्योंकि हमें तो शिकार को पकड़ना उसे मारना होता था। तभी अपना पेट भर पाते थे। और ये मुस्टंडा कुछ भी नहीं करते....केवल लात, घुस्‍से और दुतकार के साथ भोजन पाते है। मेरी नस्‍ल कुत्‍तों से अधिक भेडीयों से अधिक मिलती थी। भारत में हिमालय की तराई या गुजरात की पट्टी पर पाये जाने वाले भेड़िया लगभग मेरे ही जैसे होते है। उनका कद काठी कोई खास बड़ी नहीं होती। और रंग आकार में भी वह मिट्टी से मिलते झूलते होते है। एक छदम रूप लिये ताकि प्रकृति में आसानी से धूल मिल सके।

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

ओशो: भगवान या आम आदमी ?

ए बी पी न्‍यूज का प्रश्न—
     18 जनवरी को सायं 9:30 अपने प्राइम स्‍लॉट पर प्रमुख न्‍यूज चैनल ए बी पी ने ओशो की पुण्‍य तिथि’—19 जनवरी—के अवसर पर एक विशेष कार्यक्रम प्रस्‍तुत किया। इससे पहले कि हम इस कार्यक्रम की विषय वस्‍तु पर बात करें, यह स्‍पष्‍ट हो जाना जरूरी है कि ओशो की कोई पूण्‍य तिथि नहीं है। ओशो के लिए सभी तिथियां पुण्‍य है क्‍योंकि उनकी देशना के अनुसार इस अस्‍तित्‍व में पुण्‍य के अतिरिक्‍त और कुछ है ही नहीं। जन्‍म-मरण की तिथियां ओशो पर लागू नहीं होती। अपना शरीर छोड़ने के चालीस दिन पूर्व ही लिखवा दिया था—ओशो: जिसका न कभी जन्‍म हुआ न मृत्‍यु,जो केवल इस पृथ्‍वी ग्रह की यात्रा पर आये।

सोमवार, 28 जनवरी 2013

पोनी एक कुत्‍ते कि आत्‍म कथा—(अध्याय—22)

( सन्‍यास एक कला है )

      शायद सितम्‍बर माह का ही होगा, बरसात खत्‍म हो गई थी। शरद ऋतु आने में अभी कुछ देरी थी। दिन भर धूप तेज रहती थी। परंतु सूर्य के अस्‍त होते ही एक मधुर सीतलता छा जाती थी। भारतीय  तिथि में इसे कार्तिक माह कहा जाता था। यह एक प्रकार का सुहाना बसंत ही है। जो गर्मी के बाद शरत ऋतु की और अग्रसर हो रहा होता था। इन्‍हीं दिनों हिंदुओं की राम लीला शुरू होती थी। और बच्‍चों के स्‍कूल की छुट्टी हो गई थी। इसी सब से यह तिथि मुझे आज भी याद है। क्‍योंकि पार्क में बहुत बड़ी सी स्‍टेज बना कर रात-रात भर राम लीला खेली जाती थी। जब में पार्क में सुबह जाता तो वहां पर हजारों लोगों के पद चाप की खुशबु महसूस होती थी। तभी मैं समझ जाता था, रात को यहां पर हजूम-हजूम लोग इक्कट्ठे हुए होंगे। परंतु मैं वहां रात को कभी नहीं जा सकता था। क्‍योंकि लोग नाहक कुत्‍तों को देख कर इतना डर जाते है या घिन्‍न करते है। जबकि हम तो प्रत्‍येक मनुष्‍य का सम्‍मान करते है।

रविवार, 27 जनवरी 2013

पोनी एक कुत्‍ते कि आत्‍म कथा—(अध्याय—21)

( मेरी शरारतें)
    जैसे-जैसे मैं बड़ा हो रहा था, मेरी शरारतें भी बढ़ती जा रही थी। हालांकि में उन पर काबू पाने की भरसक कोशिश कर रहा था। परंतु पशु स्‍वभाव से जो मुझे पीढ़ी दर पीढी मिला था वह मेरे बस के बहार हो जाता था। कितना ही कोशिश करू परंतु अंदर धक्‍के मारती उर्जा मुझे कुछ न कुछ गलती करने को मजबूर कर देती थी। शरीर का विकास भी इन घटनाओं की जड़ था। जैसे नये दांतों का उगना। अब वह दाँत किसी चीज को फाड़ना चाहते है। वही अभ्‍यास उनकी मजबूती की जड़ है। अब इस बात का पता नहीं चलता कि किसे काटे या किसे फाड़े। जब सब लोग ध्‍यान में चले जाते तब मुझे बहुत अकेला पन खलता था। और मुझे उस समय यह सधन महसूस होता था कि मैं कुत्‍ता हूं, मनुष्‍य नहीं। इसी सब की हीनता मुझे क्रोध करने को उकसाती थी। कि सब लोग अंदर चले गये और मुझे बहार छोड़ दिया। जब की मुझे अंदर जाना बहुत अच्‍छा लगता था। और मैं किसी को कुछ कहता भी नहीं था किसी एक कोने में आराम से बैठ कर आंखे बद कर लेता था। मेरे हिसाब से उनमें सबसे ज्‍यादा ध्‍यानी और शांत। कभी-कभी कुछ अंजान लोग भी आ जाते थे ध्‍यान करने के लिए। उस दिन तो मुझे और भी बुरा लगता था कि बाहर से अंजान लोग तो अंदर चले जाते है। और में यहां बाहर बैठा सूख रहा हूं। उस दिन मुझे कुछ ज्‍यादा ही जीद्द चढ़ गई। अंदर जैसे ही ध्‍यान का संगीत बजा मुझे अकेले पन ने घेर लिया। धीरे-धीरे श्‍याम हो रही थी। अभी सूर्य डूबा नहीं था।

गुरुवार, 24 जनवरी 2013

पोनी--एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा—(भाग—20)

( सन्यास के बाद फिर वही काम)

      अचानक घर की घंटी बजी, घंटी बजाने के ढंग से ही मैं समझ गया की पापा जी आ गये। मैं हड़बड़ी में बहुत तेजी से भोंकता हुआ आँगन की और दौड़ा। एक लम्‍बा खिचाव था, एक चुंबकीय विछोह....मैंने दरवाजे के नीचे से ही सूंघ लिया और लगा दरवाजे के पंजा मरने। की जल्‍दी से कोई आकर इन्‍हें खोले। मुझसे रहा नहीं जा रहा था। एक अजीब सी खुशी थी जो मुझमें समा नहीं पा रही थी। ये मनुष्‍य भी कितने सुस्‍त है। कोई काम चटकी से कर क्‍यों नहीं पाते। काम करने वाली अम्‍मा किसी तरह से घीसिड़ -पीसड़ करती हुई आई और उसने दरवाजा खोला1 सामने मम्‍मी-पाप खड़े थे। पापा जी वही महरून कुर्ता पायजामा पहने थे, पापा जी के हाथ में दो बैग थे। मम्‍मी जी के हाथ में एक छोटा बैग था। मम्‍मी जी पहले अंदर आई मैं खुशी के मारे लगभग रो रहा था। कुं...कुं....कुं करके चक्‍कर लगा रहा था।

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

तालाब--कहानी

ब्‍द को सुनने के लिए कान, पीड़ा को महसूस करने के लिए ह्रदय का स्पंदन, सौंदर्य को देखने के लिए आँखें चाहिए । प्रत्येक बुद्ध पुरुष बार-बार यही दोहराता है ’’ कान है तो सुन लो,  आँखें हैं तो देख लो ।जब मैं छोटा था तब यहीं सोचता था,  क्या ये सब बुद्ध पुरूष किन्‍हीं अंधे-बहरे लोगों के सामने खड़े हो कर बोल रहे थे।‘’ नहीं पर हमारे पास आंखें हो कर भी नहीं देख पाती कान हो कर भी हम बहरे है। हम इतने संवेदन-शुन्य हो गये है। हम विचारों की पर्त के नीचे इतना दब गये है, की हम एक जीवित लाश बन कर जी रहे है। हम पर किसी बात का किस भी विचार का कोई असर नहीं होता है। हमारा जीवन एक गहरी तंद्रा है। प्रकृति की इस लय से हम छिन्‍न भिन्‍न हो गये। प्रकृति की अपनी एक लय है,  एक समस्वरता है, उसमें पेड़, पौधे, जल, थल, चाँद, तारे, क्षितिज उसी लयबद्घता का एक अंग है,  फिर क्या मनुष्य ने प्रकृति  की उस लयवदिता से अपने को अलग-थलग कर लिया है। उसके जीने के अंदाज से तो यही लगता है। चारो ओर अराजकता हंसा तनाव, मानों वह जी नहीं रहा एक जीवन को ढो रहा है। उसका जीवन छिन्‍न-भिन्‍न हो गया है उसकी बहती जीवन सरिता में कही अवरोध पैदा हो गया है। आज उसकी जीवन नदिया रूखी-सुखी निरस और बेजान हो गई। उसमें कोई आनंद उत्‍सव कहीं भी दिखाई नहीं देता। आज वो उस सब  से टुट कर अलग थलग  हो गया है। प्रकृति से अपने को विच्छिन्न कर उसने आधुनिक उपकरणों को अपने जीवन में इस प्रकार रचा-बसा लिया है कि वो खुद हाड़ मास की एक मशीन बन कर रह गया है। वही शायद उसके भाव और संवेदनशीलता को निगल गया है। शायद समय ने इस प्रश्‍न को और अति प्रश्‍न बना दिया हैं।

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—112 (ओशो)

चौथी विधि:
     आधारहीन, शाश्‍वत, निश्‍चल आकाश में प्रविष्‍ट होओ।
     इस विधि में आकाश के, स्‍पेस के तीन गुण दिए गए है।
      1--आधारहीन: आकाश में कोई आधार नहीं हो सकता।
      2--शाश्‍वत: वह कभी समाप्‍त नहीं हो सकता।
      3--निश्‍चल: वह सदा ध्‍वनि-रहित व मौन रहता है।
      इस आकाश में प्रवेश करो। वह तुम्‍हारे भीतर ही है।
      लेकिन मन सदा आधार खोजता है। मेरे पास लोग आते है और मैं उनसे कहता हूं, आंखें बंद कर के मौन बैठो और कुछ भी मत करो। और वे कहते है, हमें कोई अवलंबन दो, सहारा दो। सहारे के लिए कोई मंत्र दो। क्‍योंकि हम खाली बैठ नहीं सकते है। खाली बैठना कठिन है। यदि मैं उन्‍हें कहता हूं कि मैं तुम्‍हें मंत्र दे दूं तो ठीक है। तब वह बहुत खुश होते है। वे उसे दोहराते रहते है। तब सरल है।

सोमवार, 21 जनवरी 2013

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—110 (ओशो)

  दूसरी विधि:
     हे गरिमामयी, लीला करो। यह ब्रह्मांड एक रिक्‍त खोल है जिसमें तुम्‍हारा मन अनंत रूप से कौतुक करता है।
     यह दूसरी विधि लीला के आयाम पर आधारित है। इसे समझे। यदि तुम निष्क्रिय हो तब तो ठीक है कि तुम गहन रिक्तता में, आंतरिक गहराइयों में उतर जाओ। लेकिन तुम सारा दिन रिक् नहीं हो सकते और सारा दिन क्रिया शून् नहीं हो सकते। तुम्हें कुछ तो करना ही पड़ेगा। सक्रिय होना एक मूल आवश्यकता है। अन्यथा तुम जीवित नहीं रह सकते। जीवन का अर्थ ही है सक्रियता। तो तुम कुछ घंटों के लिए तो निष्क्रिय हो सकते हो। लेकिन चौबीस घंटे में बाकी समय तुम्हें सक्रिय रहना पड़ेगा।

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—111 (ओशो)

   तीसरी विधि:
            हे प्रिये, ज्ञान और अज्ञान, अस्‍तित्‍व और अनस्‍तित्‍व पर ध्‍यान दो। फिर दोनों को छोड़ दो ताकि तुम हो सको।
            ज्ञान और अज्ञान, अस्‍तित्‍व और अनस्‍तित्‍व पर ध्‍यान दो।
      जीवन के विधायक पहलू पर ध्‍यान करो और ध्‍यान को नकारात्‍मक पहलू पर ले जाओ, फिर दोनों को छोड़ दो क्‍योंकि तुम दोनों ही नहीं हो।
      फिर दोनों को छोड़ सको ताकि तुम हो सको।
      इसे इस तरह देखो: जन्‍म पर ध्‍यान दो। एक बच्‍चा पैदा हुआ, तुम पैदा हुए। फिर तुम बढ़ते हो, जवान होते हो—इसे पूरे विकास पर ध्‍यान दो। फिर तुम बूढ़े होते हो। और मर जाते हो। बिलकुल आरंभ से, उस क्षण की कल्‍पना करो जब तुम्‍हारे पिता और माता ने तुम्‍हें धारण किया था। और मां के गर्भ में तुमने प्रवेश किया था। बिलकुल पहला कोष्ठ। वहां से अंत तक देखो, जहां तुम्‍हारा शरीर चिता पर जल रहा है। और तुम्‍हारे संबंधी तुम्‍हारे चारों और खड़े है। फिर दोनों को छोड़ दो, वह जो पैदा हुआ और वह जो मरा। वह जो पैदा हुआ और वह जो मरा। फिर दोनों को छोड़ दो और भीतर देखो। वहां तुम हो, जो न कभी पैदा हुआ और न कभी मरा।

बुधवार, 16 जनवरी 2013

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—109 (ओशो)

पहली विधि:
     अपने निष्‍क्रिय रूप को त्‍वचा की दीवारों का एक रिक्‍त कक्ष मानो—सर्वथा रिक्‍त।
     अपने निष्‍क्रिय रूप को त्‍वचा की दीवारों का एक रिक्‍त कक्ष मानो—लेकिन भीतर सब कुछ रिक्‍त हो। यह सुंदरतम विधियों में से एक है। किसी भी ध्‍यानपूर्ण मुद्रा में, अकेले, शांत होकर बैठ जाओ। तुम्‍हारी रीढ़ की हड्डी सीधी रहे और पूरा शरीर विश्रांत, जैसे कि सारा शरीर रीढ़ की हड्डी पर टंगा हो। फिर अपनी आंखें बंद कर लो। कुछ क्षण के लिए विश्रांत, से विश्रांत अनुभव करते चले जाओ। लयवद्ध होने के लिए कुछ क्षण ऐसा करो। और फिर अचानक अनुभव करो कि तुम्‍हारा शरीर त्‍वचा की दीवारें मात्र है और भीतर कुछ भी नहीं है। घर खाली है, भीतर कोई नहीं है। एक बार तुम विचारों को गुजरते हुए देखोंगे, विचारों के मेघों को विचरते पाओगे। लेकिन ऐसा मत सोचो कि वे तुम्‍हारे है। तुम हो ही नहीं। बस ऐसा सोचो कि वे रिक्‍त आकाश में घूम हुए आधारहीन मेध है,  वे तुम्‍हारे नहीं है। वे किसी के भी नहीं है। उनकी कोई जड़ नहीं है।

सोमवार, 14 जनवरी 2013

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—108 (ओशो)

तीसरी विधि:
     यह चेतना ही प्रत्‍येक की मार्ग दर्शक सत्ता है, यही हो रहो।
            पहली बात, मार्गदर्शक तुम्‍हारे भीतर है, पर तुम उसका उपयोग नहीं करते। और इतने समय से, इतने जन्‍मों से तुमने उसका उपयोग नहीं किया है। कि तुम्‍हें पता ही नहीं है कि तुम्‍हारे भीतर कोई विवेक भी है। मैं कास्‍तानेद की पुस्‍तक पढ़ रहा था। उसका गुरु डान जुआन उसे एक सुंदर सा प्रयोग करने के लिए देता है। यह प्राचीनतम प्रयोगों में से एक है।
      एक अंधेरी रात में, पहाड़ी रास्‍ते पर कास्‍तानेद का गुरु कहता है, तू भीतरी मार्गदर्शक पर भरोसा करके दौड़ना शुरू कर दे। यह खतरनाक था। यह खतरनाक था। पहाड़ी रास्‍ता था। अंजान था। वृक्षों झाड़ियों से भरा था। खाइयां भी थी। वह कहीं भी गिर सकता था। वहां तो दिन में भी संभल-संभलकर चलना पड़ता था। और यह तो अंधेरी रात थी। उसे कुछ सुझाई नहीं पड़ता था। और उसका गुरू बोला, चल मत दौड़।

शनिवार, 12 जनवरी 2013

नीम का दर्द—कहानी

    नीम के उस पेड़ को अपनी विशालता, भव्‍यता और सौंदर्य पर बहुत गर्व था। गर्व हो भी क्‍यों न प्रत्‍येक प्राणी उसके रंग रूप और आकार को देख कर कैसा गद-गद हो जाता था। पक्षी उस पर आकर बैठते और अठखेलिया करते। आपस में लड़ते झगड़ते कूद-फुदक कर कैसे मधुर गीतों की किलकारीयाँ गाते थे। मानों आपके कानों में कहीं दूर से घंटियों को मधुर नाद आ रहा है। कोई अपनी चोंच टहनियों पर रगड़-रगड़ कर उसे साफ़ कर रहा होता। कोई चोंच मार कर आपस में प्रेम प्रदर्शित कर रहा होता। आप बस यूं कह लीजिए की उस नीम के पेड़ के चारों और रौनक मेला लगा रहता था। उस सब को देख कर नीम भी मारे खुशी के पागल हुआ रहता था। उस नीम का तना हमारे आंगन में जरूर था पर उसकी शाखा-प्रशाखाओं दूर पड़ोसियों के छत और आंगन तक पसरी फैली हुई थी। वो इतना ऊँचा और विशाल था कि ये बटवारे की छोटी-छोटी चार दीवारी उसकी महानता के आगे बहुत ही नीची थी, इन दीवारों की उँचाई का कोई महत्‍व नहीं थी। या यूं कह लीजिए कि नीम कि उँचाई के आगे वह बोनी महसूस होती थी। जड़ें और तना भले ही हमारे आंगन में हो, परन्‍तु उसकी छत्र छाया का आशीर्वाद दुर दराज के घरों को भी उतना ही मिलता था।

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—107 (ओशो)

दूसरी विधि:
     यह चेतना ही प्रत्‍येक प्राणी के रूप में है। अन्‍य कुछ भी नहीं है।
     अतीत में वैज्ञानिक कहा करते थे कि केवल पदार्थ ही है और कुछ भी नहीं है। केवल पदार्थ के ही होने की धारणा पर बड़े-बड़े दर्शन के सिद्धांत पैदा हुए। लेकिन जिन लोगों की यह मान्‍यता थी कि केवल पदार्थ ही है वे भी सोचते थे कि चेतना जैसा भी कुछ है। तब वह क्‍या था? वे कहते थे कि चेतना पदार्थ का ही एक बाई-प्रोडेक्ट है, एक उप-उत्‍पाद है। वह परोक्ष रूप में, सूक्ष्‍म रूप में पदार्थ ही था।
      लेकिन इस आधी सदी ने एक महान चमत्‍कार होते देखा है। वैज्ञानिकों ने यह जानने का बहुत प्रयास किया कि पदार्थ क्‍या है। लेकिन जितना उन्‍होंने प्रयास किया उतना ही उन्‍हें लगा कि पदार्थ जैसा तो कुछ भी नहीं है। पदार्थ का विश्‍लेषण किया गया और पाया कि वहां कुछ नहीं है।

गुरुवार, 10 जनवरी 2013

बाँझ – कहानी

  र क्‍या था, एक भूतीय बंगला ही समझो। घर बनता है परिवार से, बच्‍चो की किलकारीयों से, इतनी बड़ी हवेली नुमा मकान के अंदर रहने को जिसमें मात्र एक पाणी हो, उसे घर कहना कुछ अनुचित सा लगता है। रहने के नाम पर इस समय उस मकान में एक बूढ़ी अम्‍मा ही थी। कितने चाव से उस हवेली को उसके ताऊ ने बनवाया था, उसकी ऊंची अटालिकाए , जाली दार महराबी । बरांडा जो मकान की शोभा के साथ बरसात को कमरों में झाँकने भी नहीं देता था। और उस बरांडे के मुहाने पर चारों और क़रीने से खड़े पाये प्रहरी जैसे दिखाई देते थे।  वे पाये उसकी रक्षा ही नहीं करते थे अपितु कैसे उसकी शोभा और मजबूती ही बढ़ते। बल्‍कि वे उसके चारों और प्रहरी से खड़े अति सुंदर लगते थे। किले नुमा उसकी शानदार नक्‍काशी,  शीशम और दार का बना लकड़ी का दरवाजा। जिसमे पीतल की कील, कुंडे, कड़े, और सांकल लगी थी। उस बड़े मुख्‍य गेट का तो बस क्या कहना वो तो उस हवेली के सर का ताज ही था। जब पचास साल पहले उसे खीमू खाती बना रहा था तो , कैसे आस पास के दस गांव के लोग देखने के लिए आए थे।

विज्ञान भैरव तंत्र विधि—106 (ओशो)

पहली विधि:
हर मनुष्‍य की चेतना को अपनी ही चेतना जानो। अंत: आत्‍मचिंता को त्‍यागकर प्रत्‍येक प्राणी हो जाओ।
     हर मनुष्‍य की चेतना को अपनी ही चेतना जानो।
      वास्‍तव में ऐसा ही है, पर ऐसा लगता नहीं। अपनी चेतना को तुम अपनी चेतना ही समझते हो। और दूसरों की चेतना को तुम कभी अनुभव नहीं करते। अधिक से अधिक तुम यही सोचते हो कि दूसरे भी चेतन है। ऐसा तुम इसीलिए सोचते हो क्‍योंकि जब तुम चेतन हो तो तुम्‍हारे ही जैसे दूसरे प्राणी भी चेतन होने चाहिए। यह एक तार्किक निष्कर्ष है; तुम्‍हें लगता नहीं कि वे चेतन है। यह ऐसे ही है जैसे जब तुम्‍हें सिर में दर्द होता है तो तुम्‍हें उसका पता चलता है, तुम्‍हें उसका अनुभव होता है। लेकिन यदि किसी दूसरे के सिर में दर्द है तो तुम केवल सोचते हो, दूसरे के सिर-दर्द को तुम अनुभव नहीं कर सकते। तुम केवल सोचते हो कि वह जो कह रहा है सच ही होना चाहिए। और उसे तुम्‍हारे सिर-दर्द जैसा ही कुछ हो रहा होगा। लेकिन तुम उसे अनुभव नहीं कर सकते।