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मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

अष्‍टावक्र: माहागीता--भाग-1 प्रवचन--10

हरि ओम तत्‍सत्—प्रवचन—दसवां

20 सितंबर, 1976
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क,
पूना।

पहला प्रश्न : आपने कल बताया कि तप्क्षण संबोधि, सडन एनलाइटेनमेंट किसी भी कार्य— कारण के नियम से बंधा हुआ नहीं है; लेकिन यदि अस्तित्व में कुछ भी अकस्मात, दुर्धटना की तरह नहीं घटता, तो संबोधि जैसी महानतम घटना कैसे इस तरह घट सकती है?

स्तित्व में कुछ भी अकारण नहीं घटता,
यह सच है, लेकिन अस्तित्व स्वयं अकारण है। परमात्मा स्वयं अकारण है, उसका कोई कारण नहीं है। संबोधि यानी परमात्मा। संबोधि यानी अस्तित्व। फिर और सब घटता है, परमात्मा घटता नहीं—है। ऐसा कोई क्षण न था, जब नहीं था; ऐसा कोई क्षण नहीं होगा, जब नहीं होगा। और सब घटता है—आदमी घटता है, वृक्ष घटते हैं, पशु—पक्षी घटते हैं; परमात्मा घटता नहीं—परमात्मा है। संबोधि घटती नहीं। संबोधि घटना नहीं है; अन्यथा अकारण घटती, तो दुर्घटना हो जाती। संबोधि घटती नहीं है, संबोधि तुम्हारा स्वभाव है; संबोधि तुम हो। इसलिए तत्क्षण घट सकती है, और अकारण घट सकती है।

सोमवार, 30 दिसंबर 2013

अष्‍टावक्र: माहागीता--भाग-1(ओशो) प्रवचन--9

मेरा मुझको नमस्‍कार—प्रवचन—नौवां

जनक उवाज।

प्रकाशो में निज रूपं नातिरिक्तोऽस्थ्यहं ततः।
यदा प्रकाशते विश्व तदाउउहंभास एव हि।।28।।
अहो विकल्पितं विश्वमज्ञानान्ययि भासते ।
रूप्‍यं शुक्तौ फणी रज्जौ वारि सर्यकरे यथा ।।29।।
मत्तो विनिर्गतं विश्वं मय्येव लयमेष्यति।
मृदि कुम्भो जले वीचि: कनके कटकं यथा।।30।।
अहो अहं नमो मझं विनाशो यस्य नास्ति में ।
ब्रह्मादिस्तम्बयर्यन्तं जगन्नाशेउपि तिष्ठत:।।31।।
अहो अहं नमो मह्यमेकोऽहं देहवानयि ।
क्वचिन्‍नगन्ता नागन्ता व्याप्त विश्वम्वास्थित:।।32।।
अहो अहं नमो मखं दक्षो नास्तीह मत्सम:।
असंस्थृश्य शरीरेण येन विश्व चिर धृतम्।।33।।
अहो अहं नमो मखं यस्य मे नास्ति किंचन।
अथवा यस्य में सर्वं यब्दाङमनसगोचरम्।।34।।


र्म अनुभूति है, विचार नहीं। विचार धर्म की छाया भी नहीं बन पाता। और जो विचार में ही उलझ जाते हैं, वे धर्म से सदा के लिए दूर रह जाते हैं। विचारक जितना धर्म से दूर होता है उतना कोई और नहीं!
जैसे प्रेम एक अनुभव है, ऐसे ही परमात्मा भी एक अनुभव है। और अनुभव करना हो, तो समग्रता से ही संभव है।

रविवार, 29 दिसंबर 2013

अष्‍टावक्र: माहागीता--भाग-1(ओशो) प्रवचन--8

नियंता नहीं—साक्षी बनो—प्रवचन—आठवां


18 सितंबर, 1976
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क,
पूना।

पहला प्रश्न :

मुझे लगता है कि मेरा शरीर एक पिंजड़े या बोतल जैसा है, जिसमें एक बड़ा शक्तिशाली सिंह कैद है, और वह जन्मों— जन्मों से सोया हुआ था, लेकिन आपके छेड़ने से वह जाग गया है। वह भूखा है और पिंजरे से मुक्त होने के लिए बड़ा बेचैन है। दिन में अनेक बार वह बौखला कर हुंकार मारता, गर्जन करता, और ऊपर की ओर उछलता है। उसकी हुंकार, गर्जन, और ऊपर की ओर उछलने के धक्के से मेरा रोआं—रोआं कैप जाता है, और माथे व सिर का ऊपरी हिस्सा ऊर्जा से फटने लगता है। इसके बाद मैं एक अजीब नशे व मस्ती में डूब जाता हूं। फिर वह सिंह जरा शांत होकर कसमसाता, चहलकदमी करता व गुर्राता रहता है। और फिर कीर्तन में या आपके स्मरण से वह मस्त हो कर नाचता भी है! अनुकंपा करके समझायें कि यह क्या हो रहा है?

पूछा है 'योग चिन्मय' ने। शुभ हो रहा है! जैसा होना चाहिए, वैसा हो रहा है। इससे भयभीत मत होना। इसे होने देना। इसके साथ सहयोग करना। एक अनूठी प्रक्रिया शुरू हुई है, जिसका अंतिम परिणाम मुक्ति है।

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

अष्‍टावक्र:माहागीता--भाग-1 (ओशो) प्रवचन--7

जागरण महामंत्र है—प्रवचन—सातवां

17 सितंबर, 1976
ओशो आश्रम
कोरेगांव पार्क, पूना।

जनक उवाच।

अहो निरंजन: शांतो बोधोउहं प्रकृते पर: ।
एतावंतमहं कालं मोहेनैव विडंबित: ।।21।।  
यथा प्रकाशाम्मेको देहमेनं तथा जगत् ।
अतो मम जगत्सर्वमथवा न ब किंचन ।।22।।
सशरीरमहो विश्वं परित्यज्य मयाउउधुना !
कुतश्चित् कौशलादेव परमात्मा विलोक्यते ।।23।।
यथा न तोयतो भिन्‍नस्तरंगा फेनबुखदा: ।
आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतम् ।।24।।
तंतुमात्रो भवेदेव पटो यद्वद्विचारत ।
आत्यतन्मात्रमेवेदं तद्वद्विश्वं विचारितम् ।।25।।
यथैवेमुरसे क्लृप्ता तेन व्याप्तेव शर्करा ।
तथा विश्वं मयि क्लृप्तं मया व्याप्तं निरतरम् ।।26।।
आत्माउउज्ञानाज्जगद्भाति आत्मज्ञानान्नभासते ।
रज्ज्वज्ञानादहिर्भाति तज्‍ज्ञनादभासते न हि ।।27।।

अंधेरे में जैसे अनायास किरण उतरे, या जैसे अंधे को अचानक आंखें मिल जाएं—ऐसा ही जनक को हुआ। जो नहीं देखा था कभी, वह दिखाई पड़ा। जो नहीं सुना था कभी, वह सुनाई पड़ा। हृदय एक नई तरंग, एक नई उमंग से भर गया। प्राणों ने एक नया दर्शन किया। निश्चित ही जनक सुपात्र थे!
वर्षा होती है, पहाड़ों पर होती है, पहाड़ खाली रह जाते हैं, क्योंकि पहले से ही भरे हैं। झीलों में होती है, खाली झीलें भर जाती हैं।

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

अष्‍टावक्र: माहागीता--भाग-1 प्रवचन--6

जागो और भोगो—प्रवचन—छटवां

16 सितंबर, 1976
कोरेगांव पार्क,
ओशो आश्रम पूना।


पहला प्रश्न :

वेदांत तथा अष्टावक्र—गीता जैसे ग्रंथों द्वारा स्वाध्याय करके यह जाना कि जो पाने योग्य है वह पाया हुआ ही है! उसके लिए प्रयास करना भटकन है। इस निष्ठा को गहन भी किया, तो भी आत्मज्ञान क्यों नहीं हुआ? कृपया मार्गदर्शन करें।

शास्त्र से जो समझ में आया वह तुम्हें समझ में आया र ऐसा नहीं है। शब्द से जो समझ में आया, वह तुम्हारी प्रतीति हो गई, ऐसा नहीं है। अष्टावक्र को सुनकर बहुतों को ऐसा लगेगा कि अरे, तो सब पाया ही हुआ है! लेकिन इससे मिल न जायेगा।
अष्टावक्र को सुनकर ही लगने से मिलने का क्या संबंध हो सकता है? यह प्रतीति तुम्हारी हो कि मिला ही हुआ है। यह अहसास तुम्हें हो, यह अनुभूति तुम्हारी हो; यह बौद्धिक निष्कर्ष न हो। बुद्धि तो बड़ी जल्दी राजी हो जाती है। इससे सरल बात और क्या होगी कि मिला ही हुआ है। चलो, झंझट मिटी! अब कुछ खोजने की जरूरत नहीं, ध्यान की जरूरत नहीं; पूजा—प्रार्थना की जरूरत नहीं—मिला ही हुआ है!

अष्‍टावक्र: माहागीता--भाग-1 प्रवचन--5

साधना नहीं—निष्‍ठा, श्रद्धा—प्रवचन—पांचवां

15 सितंबर, 1976
ओशो आश्रम पूना।

अष्टावक्र उवाच।

देहाभिमानपाशेन चिरं बद्धोsसि पत्रक ।
बोधोsहं ज्ञानखंगेन तन्निष्कृत्य सुखी भव ।।14।।
नि:संगो निष्‍क्रियोउसि त्वं स्वप्रकाशो निरंजन:?
अयमेव हि ले बंध: समाधिमनुतिष्ठसि ।।15।।
त्वया व्याप्तमिदं विश्व त्वयि प्रोतं यथार्थत: ।
शुद्धबुद्ध स्वरूपस्‍त्‍वं मागम: क्षुद्रचित्तताम् ।।16।।
निरपेक्षो निर्विकारो निर्भर: शीतलाशय:।
अगाध बुद्धिरक्षुब्‍धो भव चिन्यात्रवासन: ।।17।।
साकारमनृतं विद्धि निराकारं तु निश्चलम् ।
एतत्तत्वोपदेशेन न पुनर्भवसंभव ।।18।।
यथैवादर्शमध्‍यस्थे रूपेन्त: परितस्तम: ।
यथैवास्थिन् शरीरेsन्तः परित परमेश्वर: ।।19।।
एकं सर्वगतं व्योम बहिरंतर्यथा घटे ।
नित्यं निरंतरं ब्रह्म सर्व भूतगणे तथा ।।20।।

हला सूत्र
अष्टावक्र ने कहा, 'हे पुत्र! तू बहुत काल से देहाभिमान के पाश में बंधा हुआ है। उस पाश को मैं बोध हूं, इस ज्ञान की तलवार से काट कर तू सुखी हो!'
अष्टावक्र की दृष्टि में—और वही शुद्धतम दृष्टि है, आत्यंतिक दृष्टि है—बंधन केवल मान्यता का है। बंधन वास्तविक नहीं है।

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

अष्‍टावक्र:माहागीता--भाग-1(ओशो) प्रवचन-4

कर्म, विचार, भाव—और साक्षी—(प्रवचन—चौथा)


पहला प्रश्न :

ध्यान और साक्षित्व में क्या संबंध है? उनसे चित्तवृत्तियां और अहंकार किस प्रकार विसर्जित होता है? पूर्ण निरहंकार को उपलब्ध हुए बिना क्या समर्पण संभव है? गैरिक वस्त्र और माला, ध्यान और साक्षी—साधना में कहां तक सहयोगी है? और कृपया यह भी समझाएं कि साक्षित्व, जागरूकता और सम्यक स्मृति में क्या अंतर है? 

नुष्य के जीवन को हम चार हिस्सों में बांट सकते हैं। सबसे पहली परिधि तो कर्म की है। करने का जगत है सबसे बाहर। थोड़े भीतर चलें तो फिर विचार का जगत है। और थोड़े भीतर चलें तो फिर भाव का जगत है, भक्ति का, प्रेम का। और थोड़े भीतर चलें, केंद्र पर पहुंचें, तो साक्षी का।
साक्षी हमारा स्वभाव है, क्योंकि उसके पार जाने का कोई उपाय नहीं—कभी कोई नहीं गया, कभी कोई जा भी नहीं सकता। साक्षी का साक्षी होना असंभव है। साक्षी तो बस साक्षी है। उससे पीछे नहीं हटा जा सकता। वहां हमारी बुनियाद आ गयी। साक्षी की बुनियाद पर यह हमारा भवन है— भाव का, विचार का, कर्म का।
इसलिए तीन योग हैं. कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग। वे तीनों ही ध्यान की पद्धतियां हैं। उन तीनों से ही साक्षी पर पहुंचने की चेष्टा होती है। कर्मयोग का अर्थ है. कर्म + ध्यान। सीधे कर्म से साक्षी पर जाने की जो चेष्टा है, वही कर्मयोग है।

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

अष्‍टावक्र माहागीता--भाग-1 (ओशो) प्रवचन--3

जैसी मति, वैसी गति—(तीसरा—प्रवचन)

13 सितंबर, 1976
ओशो आश्रम, पूना।

अष्टावक्र उवाच।

एको द्रष्टाsसि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा।
अयमेव हि ते बंधो द्रष्टारं यश्यसीतरम्।।7।।
अहं कतेत्यहंमानमहाकृष्णहि दंशित।
नाहं कत्तेंति विश्वासामृत पीत्वा सुखी भव।। 8।।
एको विशुद्धबोधोउहमिति निश्चवह्रिना।
प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोक: सुखी भव।। 9।।
यत्र विश्वमिदं भाति कल्पित रज्जुसर्यवत्!
आनंदपरमानद स बोधक्ल सुखं चर।। 10।।
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्ययि।
किंवदतीह सत्येयं या मति: स गतिर्भवेत।। 11।।
आत्मा साक्षी विभु: पूर्ण एको मुक्तश्चिद क्रिय:।
असंगो निस्पृह: शांतो भ्रमात संसारवानिव!! 12।।
कूटस्थं बोधमद्वैतमात्मान परिभावय।
आभासोsहं भ्रमं मुक्त्‍वा भावं बाह्यमथांतरम्।।13।।

हला सूत्र:
अष्‍टावक्र ने कहा, तू सबका एक द्रष्टा है और सदा सचमुच मुक्त है। तेरा बंधन तो यही है कि तू अपने को छोड़ दूसरे को द्रष्टा देखता है।
यह सूत्र अत्यंत बहुमूल्य है। एक—एक शब्द इसका ठीक से समझें!
'तू सबका एक द्रष्टा है। एको द्रष्टाऽसि सर्वस्व! और सदा सचमुच मुक्त है।

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

अष्‍टावक्र: माहागीता--भाग-1 (ओशो) -प्रवचन--2

समाधि का सूत्र: विश्राम—दूसरा प्रवचन

12 सितंबर 1976,
ओशो  आश्रम, पूना।


पहला प्रश्न :

कल प्रवचन सुनते समय ऐसा लगा कि मैं इस पृथ्वी पर नहीं हूं, वरन मुक्त और असीम आकाश में एक ज्योति—कण हूं। प्रवचन के बाद भी हलकेपन का, खालीपन का अनुभव होता रहा; उसी आकाश में भ्रमण करते रहने का जी होता रहा। ज्ञान, कर्म, भक्ति मैं नहीं जानता; लेकिन अकेला होने पर इस स्थिति में डूबे रहने का जी होता है। लेकिन कभी—कभी यह भाव भी उठता है कि कहीं यह मेरा पागलपन तो नहीं है, कहीं यह मेरे अहंकार का ही दूसरा खेल तो नहीं है! कृपापूर्वक मेरा मार्ग—दर्शन करें!
स पृथ्वी पर हम हैं, पर इस पृथ्वी पर वस्तुत: हम न हो सकते हैं और न हम हैं। प्रतीत होता है, पृथ्वी पर हम अजनबी हैं। देह में घर किया है, लेकिन देह हमारा घर नहीं। जैसे कोई परदेस में बस जाये और भूल ही जाये स्वदेश को, फिर अचानक राह पर किसी दिन बाजार में कोई मिल जाये जो घर की याद दिला दे, जो अपनी भाषा में बोले—तो एक क्षण को परदेस मिट जायेगा, स्वदेश प्रगट हो जायेगा।

रविवार, 22 दिसंबर 2013

अष्‍टावक्र: माहागीता--भाग-1(ओशो) प्रवचन--1

अष्‍टावक्र : महागीता

ओशो

     

                        यूग बीते पर सत्‍य न बीता
                        सब हारा पर सत्‍य न हारा



सत्‍य का शुद्धतम वक्‍तव्‍य——पहला प्रवचन

11 सितंबर 1976
ओशो आश्रम, पूना।

जनक उवाच।

कथं ज्ञानमवाम्मोति कथं मुक्तिर्भविष्यति।
वैराग्य ब कथं प्राप्तमेतद ब्रूहि मम प्रभो।। १।।


अष्टावक्र उवाच।

मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान् विषवत्यज।
क्षमार्जवदयातोषसत्यं पीयूषवद् भज।। 2।।
न पृथ्वी न जलं नाग्निर्न वायुधौर्न वा भवान्।
एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्दि मुक्तये।।3।।
यदि देहं पृथस्कृत्य निति विश्राम्ब तिष्ठसि।
अधुनैव सखी शांत: बंधमक्तो भविष्यसि।।4।।
न त्वं विप्रादिको वर्णो नाश्रमी नाक्षगोचर:।
असंगोऽमि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव।।5।।
धर्माऽधमौं सुखं दुःख मानसानि न तो विभो।
न कर्ताऽसि न भोक्ताऽसि मुक्त एवासि सर्वदा।।6।।


क अनूठी यात्रा पर हम निकलते हैं। मनुष्य—जाति के पास बहुत शास्त्र हैं, पर अष्टावक्र—गीता जैसा शास्त्र नहीं। वेद फीके हैं। उपनिषद बहुत धीमी आवाज में बोलते हैं। गीता में भी ऐसा गौरव नहीं; जैसा अष्टावक्र की संहिता में है। कुछ बात ही अनूठी है!

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

हंसा तो मोती चूने--(संत लाल) ओशे--प्रवचन--10

अवल गरीबी अंग बसै—दसवां प्रवचन

 दसवा प्रवचन;
दिनाक 20 मई, 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना

सूत्र :

अवल गरीबी अंग बसै, सीतल सदा सुभाव।
पावस बुढ़ा परेम रा, जल सूं सींचो जाव।।

लागू है बोला गा।, घर घर माहीं दोखी।
गुंज कुण। सो किजिए, कुण है थासे सोखी।।

जोबन हा जब जतन हा, काया बड़ी बुढ़ाण।
सुकी लकड़ी न लुलै, किस बिध निकसे काण।।

लाय लगी घर आपणे, घट भीतर होली।
शील सपैद में न्हाइये, जहं हंसा टोली।।

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

जागरण मुक्‍ति है--प्रवचन--9


जागरण मुक्ति है—नौवां प्रवचन

नौवां प्रवचन;
दिनाक 19 मई 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार :

*युनिवर्सिटी की अनेक डिग्रिया प्राप्त करने, राजनीति में सक्रिय रहने, तथा अनेक गुरुओं के भटकाव मैं मैंने अपनी सारी जिंदगी बरबाद कर दी। आपने करुणावश मुझे उन्नीस सौ इकहत्तर में संन्यास दिया। अब सत्तर वर्ष की उस देखकर आंसू बहाता हूं। बराबर आता हूं और सोचता हूं कि इस बार भगवान से बहुत कुछ पूछूंगा। लेकिन आपके पास आते ही प्रश्न खो जाते हैं। बुढ़ापे के कारण अंग शिथिल होता जा रहा है। भगवान, मेरे अंतर को समझकर आप ही मार्गदर्शन करें। 

रविवार, 15 दिसंबर 2013

हंसा तो मोती चूने--(संत लाल) ओशो --प्रवचन--8

शून्य होना सूत्र है—आठवां प्रवचन

 आठवां प्रवचन;
दिनाक 18 मई, 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना

प्रश्‍न सार :

*भगवान! बिहारी की एक अन्योक्ति है फूल्यो अनफूल्यो रहयो गंवई गांव गुलाब क्या भारत में आपके साथ भी यही हो रहा है? दूर दिगंत तक तो आपकी सुवास फैल रही है और भारत अछूता रहा जा रहा है!

*भगवान! मैं मोक्ष नहीं चाहता हूं मैं चाहता हूं कि बार -बार जीवन मिले। आप क्या कहते       हैं?   

*भगवान! संन्यास लेने के बाद बहुत मिला-प्रेम, जीने का ढंग...। धन्यभागी हूं। परंतु कभी-       कभी काफी घृणा से भर जाता हूं आपके प्रति। इतना कि गोली मार दूं। यह क्या है प्रभु, कुछ   समझ नहीं आता?

*भगवान! सुलभ तेरी चाह है, पर तू कठिन।
पर कर न पाया चाह
का तेरी शमन। चाह में बीती उमर,
पर तुम न आये। मृत्यु जीवन में झलकने लग गई,
पर तुम न आये।

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

हंसा तो मोती चूने--(संत लाल) ओशो --प्रवचन--07

मेरे हांसे मैं हंसूं—सातवां प्रवचन


सातवां प्रवचन;
दिनाक 17 मई, 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना

सूत्र :


साइ बड़ो सिलावटो, जिण आ काया कोरी।
खूब रखाया कांगरा, नीकी नौ मोरी।।

'लालू' क्यूं सूत्यां सरै, बायर ऊबो काल।
जोखौ है इण जीवनै, जंववो घालै जाल।।

ऊपर तो बोली गई, आगे ओछी आव।
बेड़ी समदर बीज में, किण बिद लंगसी न्याव।।

'लालू' ओ जी आंधलो, आगैं, अलसीड़ा।
झरपट बावै सरपणी, पिंड भुगतै पीड़ा।।

निरगुण सेती निसतिया, सुरगुण सूं सीधा। 
कूड़ा कोरा रह गया, कोई बिरला बीधा।।

पिरथी भूली पीवकूं? पड़या समदरा खोज।
मेरे हांसे मैं हंसूं? दुनिया जाणै रोज।।

भली बुरी दोनूं तजो, माया जाणों खाक।
आदर जाकूं दीजसी, दल। खुलिया ताक।।

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

गीता दर्श्‍न--भाग--1 (ओशो)

गीता दर्शन भाग—1
        
   (भगवान कृष्‍ण के अमृत वचनों पर ओशो के अमर प्रवचन)

ओशो

शास्‍त्र की ऊंची ऊँचाई मनस है। शब्‍द की ऊंची से ऊंची संभावना मनस है। जहां तक मन है, वहां तक प्रकट हो सकता है। जहां मन नहीं है। वहां सब अप्रकट रह जाता है।
गीता ऐस मनोविज्ञान है जो मन के पार इशारा करता है। लेकिन है मनोविज्ञान ही। अध्‍यात्‍म—शास्‍त्र उसे मैं नहीं कहूंगा। और इसलिए नहीं कि कोई और अध्‍यात्‍म—शास्‍त्र है। कहीं कोई अध्‍यात्‍म का शास्‍त्र नहीं है। अध्‍यात्‍म की घोषणा ही यही है कि शास्‍त्र में संभव नहीं है। मेराहोना, शब्‍द में मैं नहीं समाऊंगा, कोई बुद्धि की सीमा—रेखा में नहीं मुझे बांधा जा सकता। जो सब सीमाओं का अतिक्रमण करा जाता है। और सब शब्‍दों को व्‍यर्थ कर जाता है—वैसी जो अनुभूति है, उसका नाम अध्‍यात्‍म है।