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गुरुवार, 25 सितंबर 2014

ताओ उपनिषाद (भाग-2) प्रचवन--24




शरीर व आत्मा की एकता, ताओ की प्राण-साधना व अविकारी स्थिति—(प्रवचन—चौबीसवां)

अध्याय 10 : सूत्र 1

अद्वय की स्वीकृति

यदि बौद्धिक और एंद्रिक आत्माओं को एक
ही आलिंगन में आबद्ध रखा जाए,
तो उन्हें पृथक होने से बचाया जा सकता है।
जब कोई अपनी प्राणवायु को अपनी ही एकाग्रता
द्वारा नमनीयता की चरम सीमा तक पहुंचा दे,
तो वह व्यक्ति शिशुवत कोमल हो जाता है।
जब वह कल्पना के अतिशय रहस्यमय दृश्यों
को झाड़-पोंछ कर साफ कर लेता है, तो वह निर्विकार हो जाता है।

द्वैत की हम बात सुनते हैं: एक ही है सत्य। लेकिन फिर भी, अद्वैत की भी जो बात करते हैं, वे भी शरीर और आत्मा को दो हिस्सों में बांट कर चलते हैं। जो अद्वैत का विचार रखते हैं, वे भी अपने शरीर और अपनी आत्मा के बीच पृथकता मानते हैं। और जब शरीर और आत्मा में भेद होगा, तो जगत और परमात्मा में भेद अनिवार्य हो जाता है। भेद की जरा सी स्वीकृति द्वैत को निर्मित कर देती है।

ताओ उपनिषाद (भाग--2) प्रवचन--23




 ताओ उपनिषद—(भाग-2)
ओशो

(ओशो द्वारा लाओत्‍से के ताओ तेह किंग पर दिए गए 127 प्रवचनों में से 21 (तेईस से तैंतालीस) अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन।)


लाओत्‍से ने जो भी कहा है, वह पच्‍चीस सौ साल पुराना जरूर है, लेकिन एक अर्थों में इतना ही नया है। जैसे सुबह की ओस की बूंद नई होती है। नया इसलिए है कि उस पर अब तक प्रयोग नहीं हुआ। नया इसलिए है कि मनुष्‍य की आत्‍मा उस रास्‍ते पर एक कदम भी अभी नहीं चली। रास्‍ता बिलकुल अछूता और कुवांरा है।
पुराना इसलिए है कि पच्‍चीस सौ साल पहले लाओत्‍से ने उसके संबंध में खबर दी। लेकिन नया इसलिए है कि उस खबर को अब तक सुना नहीं गया है। और आज उस खबर को सुनने की सर्वाधिक जरूरत आ गई है। जितनी कि कभी नहीं थी।

ओशो



सफलता के खतरे, अहंकार की पीड़ा और स्वर्ग का द्वार—(प्रवचन—तेईसवां)

अध्याय 9 : सूत्र 1 व 2

आशातीत सफलता के खतरे

1.  किसी भरे हुए पात्र को ढोने की कोशिश करने की
अपेक्षा उसे अधजल छोड़ना ही श्रेयस्कर है।
यदि आप तलवार की धार को बार-बार महसूस करते रहें,
तो दीर्घ अवधि तक उसकी तीक्ष्णता नहीं टिक सकती।

2. सोने और हीरे से जब भवन भर जाता है,
तब मालिक उसकी रक्षा नहीं कर सकता है।
जब समृद्धि और सम्मान से घमंड उत्पन्न होता है,
तब वह स्वयं के लिए अमंगल का कारण बन जाता है।
कार्य की सफल निष्पत्ति के अनंतर जब कर्ता का यश
फैलने लगे, तब उसका अपने को ओझल बना लेना ही स्वर्ग का मार्ग है।

गीता दर्शन (भाग--4) प्रवचन--90


मृत्यु-क्षण में हार्दिक प्रभु-स्मरण—(प्रवचन—दूसरा)

अध्याय—8

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर।। 4।।
अन्तकालेमामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्
यः प्रयातिमद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः।। 5।।
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।। 6।।

उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पदार्थ अधिभूत हैं और हिरण्यमय पुरुष अधिदैव हैं और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन, इस शरीर में मैं ही अधियज्ञ हूं।
और जो पुरुष अंतकाल में मेरे को ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।

गीता दर्शन (भाग--4) प्रवचन--89



गीता दर्शन (भाग—4)
ओशो

(ओशो द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता के अध्‍याय आठ अक्षर—ब्रह्म—योग एंव अध्‍याय नौ राजविद्याराजगुह्म—योग  पर दिए गए चौबीस अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन।)

कृष्‍ण ने यह गीता कही—इसलिए नहीं कि कह कर सत्‍य को कहा जा सकता है। कृष्‍ण से बेहतर यह कौन जानेगा कि सत्‍य को कहा नहीं जा सकता है। फिर भी कहा; करूणा से कहा।
सभी बुद्धपुरूषों ने इसलिए नहींबोला है कि बोल कर तुम्‍हें समझाया जा सकता है। बल्‍कि इसलिए बोला है कि बोलकर ही तुम्‍हें प्रतिबिंब दिखाया जा सकता है।
प्रतिबिंब ही सही—चाँद की थोड़ी खबर तो ले आयेगा। शायद प्रति बिंब से प्रेम पेदा हो जाए। और तुम असली की तलाश करनेलगो, असलीकी खोज करने लगो, असली की पूछताछ शुरू कर दो।
ओशो


स्वभाव अध्यात्म है—(प्रवचन—पहला)


अध्याय—8

श्रीमद्भगवद्गीता (अथ अष्टमोऽध्यायः)

अर्जुन उवाच

किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते।। 1।।
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः।। 2।।

श्रीभगवानुवाच

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः।। 3।।

गीता दर्शन (भाग--3) प्रवचन--31


धर्म का सार: शरणागति—(प्रवचन—इकतीसवां) 

अध्याय –7

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परंतप।। 27।।
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः।। 28।।

हे भरतवंशी अर्जुन, संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न हुए सुख-दुख आदि द्वंद्व रूप मोह से संपूर्ण प्राणी अति अज्ञानता को प्राप्त हो रहे हैं। परंतु निष्काम भाव से श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करने वाले जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो हे गया है, वे रागद्वेषादि द्वंद्व रूप मोह से मुक्त हुए और दृढ़ निश्चय वाले पुरुष मेरे को सब प्रकार से भजते हैं।

गीता दर्शन (भाग--3) प्रवचन--30


कामना और प्राथना—( प्रवचन—तीसवां)

अध्याय—7

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि।। 23।।

परंतु उन अल्पबुद्धि वालों का वह फल नाशवान है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मेरे को ही प्राप्त होते हैं।

कामनाओं से प्रेरित होकर की गई प्रार्थनाएं जरूर ही फल लाती हैं। लेकिन वे फल क्षणिक ही होने वाले हैं; वे फल थोड़ी देर ही टिकने वाले हैं। कोई भी सुख सदा नहीं टिक सकता, न ही कोई दुख सदा टिकता है। सुख और दुख लहर की तरह आते हैं और चले जाते हैं।
देवताओं की पूजा से जो मिल सकता है, वह क्षणिक सुख का आभास ही हो सकता है। वासनाओं के मार्ग से कुछ और ज्यादा पाने का उपाय ही नहीं है।

ताओ उपनिषाद (भाग--1) प्रवचन--22


लाओत्से सर्वाधिक सार्थक--वर्तमान विश्व-स्थिति में—(प्रवचन—बाईसवां)

प्रश्न-सार

लाओत्से पर बोलने के पीछे प्रेरणा क्या है?

लाओत्से ऊर्ध्वगमन के विपरीत निम्नगमन की बात क्यों करते हैं?

अहंकार भी यदि प्राकृतिक है तो उसे हटाएं क्यों?

कोई स्त्री अब तक धर्म-प्रणेता क्यों नहीं हुई?

यदि ज्ञानी स्त्रैण-चित्त हैं तो मोहम्मद और कृष्ण युद्ध में क्यों गए?

क्या साधारण आदमी भी निरहंकार को प्राप्त हो सकता है?

ताओ उपनिषाद (भाग--1) प्रवचन--21


जल का स्वभाव ताओ के निकट है—(प्रवचन—इक्‍कीसवां)


अध्याय 8 : सूत्र 1, 2 व 3

जल

1. सर्वोत्कृष्टता जल के सदृश होती है।
जल की महानता पर-हितैषणा में निहित होती है,
और उस विनम्रता में होती है,
जिसके कारण वह अनायास ही ऐसे
निम्नतम स्थान ग्रहण करती है,
जिनकी हम निंदा करते हैं।
इसीलिए तो जल का स्वभाव ताओ के निकट है।

2. आवास की श्रेष्ठता स्थान की उपयुक्तता में होती है,
मन की श्रेष्ठता उसकी अतल निस्तब्धता में,
संसर्ग की श्रेष्ठता पुण्यात्माओं के साथ रहने में,
शासन की श्रेष्ठता अमन-चैन की स्थापना में,
कार्य-पद्धति की श्रेष्ठता कर्म की कुशलता में,
और किसी आंदोलन के सूत्रपात की श्रेष्ठता उसकी सामयिकता में है।

3. और जब तक कोई श्रेष्ठ व्यक्ति अपनी निम्न
स्थिति के संबंध में कोई वितंडा खड़ा नहीं करता,
तब तक वह समादृत होता है।

ताओ उपनिषाद (भाग--1) प्रवचन--20


धन्य हैं वे जो अंतिम होने को राजी हैं—(प्रवचन—बीसवां)


अध्याय 7 : सूत्र 12

सर्व-मंगल हेतु जीना

1. स्वर्ग और पृथ्वी दोनों ही नित्य हैं।
इनकी नित्यता का कारण है
कि ये स्वार्थ-सिद्धि के निमित्त नहीं जीते;
इसलिए इनका सातत्य संभव होता है।

2. इसलिए तत्वविद (संत) अपने व्यक्तित्व
को पीछे रखते हैं;
फिर भी वे सबसे आगे पाए जाते हैं।
वे निज की सत्ता की उपेक्षा करते हैं,
फिर भी उनकी सत्ता सुरक्षित रहती है।
चूंकि उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं होता,
इसलिए उनके लक्ष्यों की पूर्ति होती है।

जीवन दो प्रकार का हो सकता है। एक, इस भांति जीना, जैसे मैं ही सारे जगत का केंद्र हूं। इस भांति, जैसे सारा जगत मेरे निमित्त ही बनाया गया है। इस भांति कि जैसे मैं परमात्मा हूं और सारा जगत मेरा सेवक है। एक जीने का ढंग यह है। एक जीने का ढंग इससे बिलकुल विपरीत है। ऐसे जीना, जैसे मैं कभी भी जगत का केंद्र नहीं हूं, जगत की परिधि हूं। ऐसे जीना, जैसे जगत परमात्मा है और मैं केवल उसका एक सेवक हूं।

तंत्र--सूत्र (भाग--1) प्रवचन--10

केंद्रित, संतुलित और आप्‍तकाम होओ(प्रवचनदसवां)

      प्रश्‍नसार:

1—क्‍या आत्‍मोपलब्‍धि बुनियादी आवश्‍यकता है?

2—मनन, एकाग्रता और ध्‍यान पर प्रकाश डालें।

3—नाभि—केंद्रके विकास के लिए जो प्रशिक्षण है
   वह ह्रदय और मस्‍तिक के केंद्रों के प्रशिक्षण
   से भिन्‍न कैसे है?

4—क्‍या सभी बुद्धपुरूष नाभि—केंद्रित है?


कई प्रश्न हैं। पहला प्रश्न :

क्या आत्मोपलब्‍धि सेल्फ—एक्‍जुअलाइजेशन मनुष्य की बुनियादी आवश्यकता है?

 हले यह समझने की कोशिश करो कि सेल्क—एरूअलाइजेशन. का, आत्मोपलब्धि का अर्थ क्या है। ए .एच मैसलो ने इस शब्द सेल्फ—एरूअलाइजेशन का प्रयोग किया है। मनुष्य एक संभावना की तरह पैदा होता है। वह सच में वास्तविक नहीं है, मात्र संभावना है। मनुष्य एक संभावना की भांति जन्म लेता है, वास्तविकता की भांति नहीं। वह कुछ हो सकता है; वह अपनी संभावना को वास्तविकता बना सकता है। और ऐसा नहीं भी हो सकता है। अवसर का उपयोग किया जा सकता है, नहीं भी किया जा सकता है।

बुधवार, 24 सितंबर 2014

ताओ उपनिषाद (भाग--1) प्रवचन--19


स्त्रैण-चित्त के अन्य आयाम: श्रद्धा, स्वीकार और समर्पण—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)

प्रश्न-सार

अस्तित्व के स्त्रैण रहस्य पर कुछ और विस्तार से प्रकाश डालने की कृपा करें।

प्रश्न: भगवान श्री, कल आपने अस्तित्व के स्त्रैण रहस्य पर चर्चा की है। इस विषय में कुछ और विस्तार से प्रकाश डालने की कृपा करें।

स्तित्व के सभी आयाम स्त्रैण और पुरुष में बांटे जा सकते हैं।
स्त्री और पुरुष का विभाजन केवल यौन-विभाजन, सेक्स डिवीजन नहीं है। लाओत्से के हिसाब से स्त्री और पुरुष का विभाजन जीवन की डाइलेक्टिक्स है, जीवन का जो द्वंद्वात्मक विकास है, जो डाइलेक्टिकल एवोल्यूशन है, उसका अनिवार्य हिस्सा है।

ताओ उपनिषाद (भाग--1) प्रवचन--18


घाटी-सदृश, स्त्रैण व रहस्यमयी परम सत्ता—(प्रवचन—अठाहरवां)

अध्याय 6 : सूत्र 12

घाटी की आत्मा

1. घाटी की आत्मा कभी नहीं मरती, नित्य है।
इसे हम स्त्रैण रहस्य, ऐसा नाम देते हैं।
इस स्त्रैण रहस्यमयी का द्वार
स्वर्ग और पृथ्वी का मूल स्रोत है।
2. यह सर्वथा अविच्छिन्न है;
इसकी शक्ति अखंड है;
इसका उपयोग करो,
और इसकी सेवा सहज उपलब्ध होती है।

जिसका जन्म है, उसकी मृत्यु भी होगी। जो प्रारंभ होगा, वह अंत भी होगा। वही केवल मृत्यु के पार हो सकता है, जिसका जन्म न हो। और वही केवल अनंत हो सकता है, जो अनादि हो।
प्रकाश जन्मता है, मिट जाता है। अंधकार सदा है। शायद इस भांति कभी न सोचा हो। सूर्य निकलता है, सांझ ढल जाता है। दीया जलता है, बाती चुक जाती है, बुझ जाती है। जब दीया नहीं जला था, तब भी अंधकार था। जब दीया जला, अंधकार हमें दिखाई नहीं पड़ा।

गीता दर्शन (भाग--3) प्रवचन--29


श्रद्धा का सेतु—(प्रवचन—उन्‍नतीवां)

अध्याय—7

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्।। 21।।
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते
लभतेततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्।। 22।।

जो-जो सकामी भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की मैं उस ही देवता के प्रति श्रद्धा को स्थिर करता हूं। तथा वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त हुआ उस देवता के पूजन की चेष्टा करता है और उस देवता से मेरे द्वारा ही विधान किए हुए उन इच्छित भोगों को निःसंदेह प्राप्त होता है।

प्रभु की खोज में किस नाम से यात्रा पर निकला कोई, यह महत्वपूर्ण नहीं है; और किस मंदिर से प्रवेश किया उसने, यह भी महत्वपूर्ण नहीं है। किस शास्त्र को माना, यह भी महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण सिर्फ इतना है कि उसका भाव श्रद्धा का था।

गीता दर्शन (भाग--3) प्रवचन--28


मुखौटों से मुक्ति—(प्रवचन—अट्ठाईवां)

अध्याय—7


उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्
आस्थितःहि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्।। 18।।
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।। 19।।

यद्यपि ये सब ही उदार हैं अर्थात श्रद्धासहित मेरे भजन के लिए समय लगाने वाले होने से उत्तम हैं, परंतु ज्ञानी तो साक्षात मेरा स्वरूप ही है, ऐसा मेरा मत है, क्योंकि वह स्थिर बुद्धि ज्ञानी भक्त अति उत्तम गति-स्वरूप मेरे में ही अच्छी प्रकार स्थित है। और जो बहुत जन्मों के अंत के जन्म में तत्वज्ञान को प्राप्त हुआ ज्ञानी, सब कुछ वासुदेव ही है, इस प्रकार मेरे को भजता है, वह महात्मा अति दुर्लभ है।

प्रभु को जो जानता है, वह उस जानने में ही उसके साथ एक हो जाता है। सब दूरी अज्ञान की दूरी है। सब फासले अज्ञान के फासले हैं। परमात्मा को दूर से जानने का कोई भी उपाय नहीं है, परमात्मा होकर ही जाना जा सकता है।

तंत्र--सूत्र (भाग--1) प्रवचन--9


केंद्रीभूत होने की कुछ विधियांप्रवचननौवां

सूत्र:

13—या कल्‍पना करो कि मोर की पूंछ के पंचरंगें वर्तुल
निस्‍सीम अंतरिक्ष में तुम्‍हारी पाँच इंद्रियां है।
अब उनके सौंदर्य को भीतर ही धुलने दो।
उसी प्रकार शून्‍य में या दीवार पर किसी बिंदु के साथ
कल्‍पना करो, जब तक कि वह बिंदु विलीन न हो जाए।

14—अपने पूरे अवधान को अपने मेरूदंड के मध्‍य में
कमल तुतु सी कोमल स्‍नायू में स्‍थित करो।
और उसमें रूपांतरित हो जाओ।

नुष्‍य अपने केंद्र के साथ जन्म लेता है, लेकिन उसे उसकी जानकारी जरा भी नहीं रहती। मनुष्य अपने केंद्र को जाने बिना रह सकता है, लेकिन केंद्र के बिना वह हो नहीं सकता। और यह केंद्र मनुष्य और अस्तित्व के बीच की कड़ी है। यह मूल है, आधार है।

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

अष्‍टावक्र: महागीता (भाग--5) प्रवचन--7

दृश्य से द्रष्टा में छलांग—(प्रवचन—सातवां)

दिनांक 17 जनवरी, 1977;
श्री ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क, पूना।

सूत्र:

क्यात्मनो दर्शन तस्य यदृष्टमवलंबते।
धीरास्तं तं न पश्यति पश्यंत्यात्मानमव्ययम्।।216।।
क्य निरोधो विमूढ़स्य यो निर्बंध करोति वै।
स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदाऽसावकृत्रिम:।।217।।
भावस्य भावक: कश्चिन्न किचिद्भावकोऽपर:।
उभयाभावक: कश्चिदेवमेव निराकुल:।।218।।
शुद्धमद्वयमात्मान भावयति कुबुद्धय:।
न तु जानन्ति समोहाद्यावज्जीवमनिर्वृता।।219।।
मुमुक्षोर्बुद्धिरालबमतरेण न विद्यते।
निरालंबैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा।।22०।।

क्यात्मनोदर्शनतस्ययद्दृष्टमवलबते।
धीरास्ततनपश्यंतिपश्यंत्यात्मानमव्ययम्।।

'सको आत्मा का दर्शन कहा है, जो दृश्य का अवलंबन करता है? धीर पुरुष दृश्य को नहीं देखते हैं और अविनाशी आत्मा को देखते है।'

इस एक सूत्र में पूरब के समस्त दर्शन का सार है। दर्शन शब्द का भी यही अर्थ है। यह सूत्र दर्शन की व्याख्या है।