कुल पेज दृश्य

शनिवार, 31 जनवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--77

परमात्‍मा की भेंट ही अंतिम भेंट(प्रवचनसतहरवां)

योग—सूत्र:

सत्‍वपुरूषयोरत्‍यन्‍तासंकीर्णयों: प्रत्‍यायविशेषो भोग:
परार्थत्‍वात् स्वार्थसंयमात्पुरुषज्ञानम्।। 36।।
पुरुष, सद चेतना और सत्व, सदबुद्धि के बीच अंतर कर पाने की अयोग्यता के परिणामस्वरूप अनुभव के भोग का उदभव होता है. यद्यपि ये तत्व नितांत भिन्न हैं। स्वार्थ पर संयम संपन्‍न करने से अन्‍य ज्ञान से भिन्न पुरूष ज्ञान उपलब्‍ध होता है।

            तत: प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्‍वादवार्ता जायन्‍ते।। 37।।
इसके पश्‍चात अंतर्बोधयुक्‍त श्रवण, स्‍पर्श, दृष्‍टि, आस्‍वाद और आध्राण की उपलब्‍धि चली आती है।

            ते समाधावुपसर्गाव्‍युत्‍थाने सिद्धय:।। 38।।
ये वे शक्‍तियां है जो मन के बाहर होने से प्राप्‍त होती है, लेकिन ये समाधि के मार्ग पर बाधाएं है।

शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--76

धन्‍यवाद की कोई आवश्‍यकता नहीं(प्रवचनसौहलवां)

प्रश्‍न—सार:

1. क्या आप भी कभी किसी दुविधा में पड़े हैं?

      2. बुद्धि, अंतर्बोध और प्रतिभा के प्रासंगिक महत्व को समझाएं।

      3. इस शइक्त को,क्ष्मैं'j'. समझाएं—'योगियों और सार्धुंक्ती बुरी संगत में।'

      4 अहंकार सभी परिस्‍थितियों में पोषित होता मालूम पड़ता है। तो ऐसे में क्या करें?

5. हम अपने मन को कैसे गिरा सकते है, जबकि आप प्रवचनों में दिलचस्‍प बातें सुनाकर मन में खलबली मचाते रहते हैं!

      6 मेरे प्‍यारे—प्‍यारे भगवान, जब मैं बुद्धत्‍व का अनुभव करूं;
क: क्‍या मैं आपसे कहूं?
ख: क्‍या आप मुझसे कहेंगे?
ग: क्‍या यह प्रश्‍न मेरा अहंकार पूछ रहा है?

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--136

चरणस्‍पर्श का विज्ञान(प्रवचननौवां)

अध्‍याय—11
सूत्र—

      सखेति मत्वा प्रसभं क्ट्रूम्क्तंक हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्‍प्रणयेन वापि।। 41।।
यच्चावहासार्थमसरूतोउसि विहारशय्यासनभोजनेषु।
एकोउथवाध्यम्हत तत्समक्षं तकामये त्वामहमप्रमेयम्।। 42।
पितासि लोकस्य चराचरस्थ त्वमस्य यूज्यश्च गुरुर्गरीयान्।
न त्वत्समोउस्लथ्यधिक: कुतोउन्यो लोकत्रयेउध्यप्रतिमप्रभाव।। 43।।
तस्माह्मणम्य प्रणिधाय काय प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्।
पितेव युत्रस्य सखेव सखु: प्रिय: प्रियायार्हसि देव सोहुम।। 44।।

हे परमेश्वर सखा ऐसे मानकर आपके इस प्रभाव को न जानते हुए मेरे द्वारा प्रेम से अथवा प्रमाद से भी हे कृष्ण हे यादव हे सखे इस प्रकार जो कुछ हठपूर्वक कहा गया है; और हे अच्‍युतू जो आप हंसी के लिए विहार शय्या आसन और भोजनादिको में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किए गए हैं, वे सब अपराध अप्रमेयस्वरूय अर्थात अचिंत्य प्रभाव वाले आपसे मैं क्षमा कराता हूं।

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--75

अंतर—ब्रह्मांड के साक्षी हो जाओ—(प्रवचन—पंद्रहवां)

योग—सूत्र:

मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम।। 33।।
सिर के शीर्ष भाग के नीचे की ज्योति पर संयम केंद्रित करने से समस्‍त सिद्धों के अस्तित्व से जुड्ने की क्षमता मिल जाती है।

            प्रातिभाद्वा सर्वम्।। 34।।
प्रतिभा के द्वारा समस्‍त वस्‍तुओं का बोध मिल जाता है।

            ह्रदये चित्‍तसंवित्।। 35।।
ह्रदय पर संयम संपन्‍न करने से मन की प्रकृति, उसके स्‍वभाव के प्रति जागरूकता आ बनती है।

बुधवार, 28 जनवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--74

अहंकार अटकाने को खूँटा नहीं—(प्रवचन—चौदहवां)

प्रश्‍न–सार:

1—क्या संबुद्ध होना और साथ ही संबोधि के प्रति चैतन्‍य होना संभव है? क्या संबुद्ध का विचार स्वय में अहंकार उत्पन्न नहीं कर देता है?

2—मैं अक्‍सर दो मन में रहता हूं—सूर्य और चंद्र मन में। कृपया कुछ कहें।

3—आप कहते है कि बुद्ध पुरूष कभी स्‍वप्‍न नहीं देखते। फिर च्वांगत्‍सु ने कैसे स्‍वप्‍न देखा कि वह तितली है?

4—स्व—निर्भर होने के लिए पतंजलि की विधि या आपकी विधि क्या है?
अध्‍यात्‍मिक व्‍यक्‍ति ठीक—ठीक वर्तमान के क्षणों में कैसे जी सकता है?
रोज के व्‍यावहारिक जीवन में क्षण—क्षण, वर्तमान में जीने की आदत कैसे बनायी जाए?

 5—क्‍या राम संबोधि को उपलब्‍ध हो गया है?

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--135

बेशर्त स्‍वीकार(प्रवचनआठवां)

अध्‍याय—11
सूत्र—

 सजय उवाच:

एतच्‍छुत्वा वचनं केशवस्थ कृताज्जलिर्वेयमान किरीटी।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीत प्रणम्य।। 35।।

अर्जुन उवाच:

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्यहृष्यगुरज्यते च।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघा।। 36।।
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोउध्यादिकर्त्रे।
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्यरं यत्।। 37।।
त्वमादिदेव: पुरूष पुराणस्‍त्‍वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तामि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप।। 38।।
वायुर्यमोउग्निर्वरुण: शशाड्क: प्रजापतिस्व प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेस्‍तु सहस्रकृत्व: गुनश्च भूयोउपि नमो नमस्ते।। 39।।
नम: पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोउख ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्वं सर्वं समाम्नोषि ततोउमि सर्व:।। 40।।

इसके उपरांत संजय बोला कि हे राजन— केशव भगवान के इस वचन को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़े हुए, कांपता हुआ नमस्कार करके फिर भी भयभीत हुआ प्रणाम करके भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गदगद वाणी से बोला— हे अंतर्यामिन् यह योग्य ही है कि जो आपके नाम और प्रभाव के कीर्तन से जगत अति हर्षित होता है और अनुराग को भी प्राप्त होता है तथा भयभीत हुए राक्षस लोग दिशाओं में भागते हैं और सब सिद्धगणों के समुदाय नमस्कार करते हैं।

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--73

अंतरब्रह्मांड के साक्षीहो जाओ(प्रवचनतेरहवां)

योग—सूत्र:

चंद्रे ताराव्‍यूहज्ञानम् ।। 28।।
चंद्र पर संयम संपन्न करने से तारों—नक्षत्रों की समेग्र व्‍यवस्‍था का ज्ञान प्राप्त होता है।

धुवे तद्गतिज्ञानम्।। 29।।
ध्रुव—नक्षत्र पर संयम संपन्न करने से तारों—नक्षत्रों की गतिमयता का ज्ञान प्राप्त होता है।

नाभिचक्रै कायव्‍यूहज्ञानम् ।। 30।।
नाभि चक्र पर संयम संपन्‍न करने से शरीर की संपूर्ण संरचना का ज्ञान प्राप्त होता है।

      कण्‍ठकूपे क्षुत्‍पिपासानिवृति: ।। 31।।
कंठ पर संयम संपन्‍न करने से क्षुधानु पिपासा की अवभूतियां क्षीण हो जाती है।

      कूर्मनाडयां स्‍थैर्यम्।। 32।।
कूर्म—नाड़ी नामक नाड़ी पर संयम संपन्‍न करने से, योगी पूर्ण रूप से थिर हो जाता है।

सोमवार, 26 जनवरी 2015

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--134

साधना के चार चरण—(प्रवचन—सांतवां)
अध्‍याय—11
सूत्र—(134)

श्रीभगवागुवाच:

कालोउस्थि लोकक्षयकृत्यवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्त:।
ऋतेउयि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येउवस्थिता प्राचनीकेषु ।। 32।।
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुड्क्ष्‍व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहता: पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।। 33।।
द्रोणं च भीष्म च जयद्रथ च कर्ण तथान्यानयि योधवीरान्।
मया हतांस्त्‍वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्।। 34।।

इस प्रकार अर्जुन के क्रने पर श्रीकृष्ण भगवान बोले हे अर्जुन मैं लोकों का नाश करने वाला बडा हुआ महाकाल हूं। इस समय हन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूं। इसलिए जो प्रतियक्षियों की सेना में स्थित हुए योद्धा लोग हैं वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात तेरे युद्ध न करने मे भी सबका नाश हो जाएगा।

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--72

मैं एक पूर्ण झूठ हूं(प्रवचनबारहवां)


प्रश्‍न—सार:



1—आपके शिष्य अचानक संबोधि को उपलब्ध होंगे, या चरण दर चरण विकास के द्वारा संबुद्ध होंगे?



 2—क्या अज्ञान के कारण किए कर्मों के लिए भी व्यक्ति उत्‍तरदायी होता है?



3—रामकृष्ण ने भोजन का उपयोग शरीर में रहने के लिए खूंटी की भांति किया। आप शरीर में बने रहने के लिए किस खूंटी का उपयोग करते हैं?



4—आपने कहा कि काम—वृत्‍ति पर एकाग्रता ले आने से व्‍यक्‍ति संबुद्ध हो सकता है। लेकिन क्‍या काम—वृति पर एकाग्रता ले आने से व्‍यक्‍ति का अहंकार नहीं बढ़ता?



5—कृपा करके संयम और संबोधि के भेद को हमें समझाएं।



6—एक शराबी की दूसरे से गुफ्तगू: आपकी शराब सबसे मधुर और मीठी है।



7—क्‍या कभी आप झूठ बोलते है?

रविवार, 25 जनवरी 2015

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--133

पूरब और पश्‍चिम: नियति और पुरूषार्थ(प्रवचनछठवां)


अध्‍याय—11

सूत्र—(133)



यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।

तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवायि वक्ताणि समृद्धवेगाः।। 29।।

लेलिह्यमे ग्रसमान: समन्ताल्लोकान्समग्रान्त्रदनैर्ज्वलदभि:।

तेजोभिरायर्य जगत्ममग्रं भासस्तवोग्रा: प्रतयन्ति विष्णो।। 3०।।

आख्याहि मे को भवागुग्ररूपो नमोउख ते देववर प्रसीद।

विज्ञखमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्।। 3।।



अथवा जैसे पतंग मोह के वश होकर नष्ट होने के लिए प्रज्वलित अग्नि में अति वेग से युक्त हुए प्रवेश करते हैं वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाश के लिए आपके मुखों में अति वेग से युक्त हुए प्रवेश करते हैं।

और आप उन संपूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा ग्रसन करते हुए सब ओर से चाट रहे हैं। हे विष्णो आपका उग्र प्रकाश संपूर्ण जगत को तेज के द्वारा परिपूर्ण करके तपायमान करता है।

हे भगवन— कृपा करके मेरे प्रति कहिए कि आप उग्र रूप वाले कौन हैं! हे देवों में श्रेष्ठ आपको नमस्कार होवे। आय प्रसन्‍न होड़ए। आदिस्वरूप आपको मैं तत्व से जानना चाहता हूं क्योंकि आपकी प्रवृत्ति को मैं नहीं जानता

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--71

मृत्‍यु और कर्म का रहस्‍य(प्रवचनग्‍यारहवां)

योग—सूत्र:

सोपक्रमं निरूपक्रमं च कर्म तत्‍संयमादपरान्‍तज्ञानमरिष्‍टेभयो वा।। 23।।
सक्रिय व निष्किय या लक्षणात्मक व विलक्षणात्‍मक—इन दो प्रकार के कर्मों पर संयम पा लेने के बाद मृत्यु की ठीक—ठीक घड़ी की भविष्‍य सूचना पायी जा सकती है।

 मैत्र्यादिषु बलानि।। 24।।
मैत्री पर संयम संपन्‍न करने से या किसी अन्य सहज गुण पर संयम करने से उस गुणवत्‍ता विशेष में बड़ी सक्षमता आ मिलती है।

बलेषु हस्‍तिबलादीनि।। 25।।
हाथी के बल पर संयम निष्‍पादित करने से हाथी की सी शक्‍ति प्राप्‍त होती है।

प्रवृत्‍यालोकन्‍यासात्‍सूक्ष्‍मव्‍यवहितविप्रकृष्‍टज्ञानम्।। 26।।
पराभौतिक मनीषा के प्रकाश को प्रवर्तित करने से सूक्ष्‍म का बोध होता है। प्रच्‍छन्न का अोर दूरस्‍थ तत्‍वों का ज्ञान प्राप्‍त होता है।

भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात्।। 27।।
सूर्य पर संयम संपन्‍न करने से संपूर्ण सौर—ज्ञान की उपलब्‍धि होती है।

शनिवार, 24 जनवरी 2015

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--132

अचुनाव अतिक्रमण है(प्रवचनपांचवां)

अध्‍याय—11
सूत्र:

      रूपंमहत्ते कवक्तनेत्रं महाबाहो बहुबाक्रयादम्।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं हूड़वा लोका: प्रव्यथितास्तथाहम्।। 23।।
नभ:स्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्।
दृष्ट्रवा हि त्वां प्रव्यखितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो।। 24।।
दंष्ट्राकरालानि व ते मुखानि दृष्ट्रवैव कालानलसब्रिभानि।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास।। 25।।
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्थ युत्रा: सर्वे सहैवावनियालसंघै:।
भीष्मो द्रोण: सूतमुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरयि योधमुख्यै।। 26।।
वक्वाणि ते स्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेपु संदृश्यन्ते चूर्णितेरुत्तमाङ्गै।। 27।।
यथा नदीनां बहवोउखुवेगा समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति।
तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्ताण्यभिविज्वलन्ति।। 28।।

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--70

खतरे में जीओ(प्रवचनदसवां)

प्रश्‍न—सार:  

1—मेरी अधिक बैचेनी अपने महा— अहंकार को लेकर है,
जो इस झूठे अहंकार पर इतने वर्षों तक निगाह रखता रहा है।

      2—भगवान, मैं चाहता हूं कि आप एक—एक ही बार में सदा—सदा के लिए मिटा दें।

      3—जब मैं निर्णय लेने का प्रयत्‍न करता हूं तो चिंतित हो जाता हूं,
कि मैं कहीं गलत चुनाव न कर लूं। यह कैसा पागलपन है?
     
      4—ध्‍यान के दौरान मैं आपकी शून्‍यता को पुकारता हूं।
क्‍या इस विधि के द्वारा मैं आपके समग्र अस्‍तित्‍व को
आत्‍म सात कर सकता हूं?

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

गीता दर्शन--(भाग--5) प्रवचन--131

परमात्‍मा का भयावह रूप(प्रवचनचौथा)

अध्‍याय—11
सूत्र: (131)

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम।
त्वमध्यय: शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्ल पुरुषो मतो मे।।। 18।।
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्तं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।। 19।।
द्यावायृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्त स्वयैकेन दिशश्च सर्वा:।
दृष्ट्वाइभुतं रूयमुग्रं तवेदं लोकत्रय प्रव्यथितं महात्मन्।। 20।।
अमी हि त्वां सुरसंधा विशन्ति केचिद्रभीता प्राज्जत्नयो ग्दाणन्ति।
स्वस्तीत्युक्ता महर्षिसिद्धसंधा: स्तुवन्ति ना खतिभि पुष्कलाभि।। 21।।
रुद्रादित्या वसवो ये व साध्या विश्वेउश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे।। 22।।

इसलिए हे भगवन— आय ही जानने योग्य परम अक्षर हैं अर्थात परब्रह्म परमात्मा हैं और आय ही हल जगत के परम आश्रय हैं तथा आय ही अनादि धर्म के रक्षक हैं और आय ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं, ऐसा मेरा मत है।
हे परमेश्वर मैं आपको आदि अंत और मध्य से रहित तथा अनंत सामर्थ्य से युक्त और अनंत हाथों वाला तथा चंद्र— सूर्य रूप नेत्रों वाला और प्रज्वलित अग्निरूप मुख वाला तथा अपने तेज से हम जगत को तपायमान करता हुआ देखता हूं।

पतंजलि: योगसूत्र--(भाग--4) प्रवचन--69

अनूठा अस्‍तित्‍व में(प्रवचननौंवा)

योग—सूत्र :

प्रत्ययस्य परिचित्‍तज्ञानम्।। 19।।
जो प्रतिछवि दूसरों के मन को घेरे रहती है, उसे संयम द्वारा जाना जा सकता है।

            न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात्।। 20।।
लेकिन संयम द्वारा आया बोध उन मानसिक तथ्यों का ज्ञान नहीं करवा सकता जो कि दूसरे के मन की छवि—प्रतिछवि को आधार देते है, क्‍योंकि वह बात संयम की विषय—वस्‍तु नहीं होती है।

            कायरूपसंयमत्‍तद्ग्राह्मशक्‍तिस्‍तम्‍भे चक्षु: प्रकाशसंप्रयोगेउन्‍तर्धानम्।। 21।।
ग्राह्म—शक्‍ति को हटा देने के लिए, शरीर के स्‍वरूप पर संयम संपन्‍न करने से द्रष्‍टा की आँख और शरीर से उठती प्रकाश—किरणों के बीच संबंध टूट जाता है, और तब शरीर अदृश्‍य हो जाता है।

            एतन शब्‍दद्यन्‍तर्धानमुक्‍तम्।। 22।।
यही नियम शब्‍द के तिरोहित हो जाने की बात को भी स्‍पष्‍ट कर देता है।