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रविवार, 31 मई 2015

मैं मृत्‍यु सिखाता हूं--(प्रवचन--14)

धर्म की महायात्रा में स्वयं को दांव पर लगाने का साहस—(प्रवचन—चौहदवां)


 (प्रतीक्षा बना देती है दर्पण चेतना को। और जिस दिन हम दर्पण बन जाते हैं उसी दिन सब मिल जाता है। क्योंकि सब तो सदा ही था सिर्फ हम नहीं थे। दर्पण होकर हम हो जाते है।)


भगवान श्री जाति— स्मरण अर्थात पिछले जन्मों की स्मृतियों में प्रवेश की विधि पर आपने द्वारका शिविर में चर्चा की है। आपने कहा है कि चित्त को भविष्य की दिशा से पूर्णत: तोड़ कर ध्यान की शक्ति को अतीत की ओर फोकस करके बहाना चाहिए। प्रक्रिया का क्रम आपने बताया पहले पांच वर्ष की उम्र की स्मृति में लौटना फिर तीन वर्ष की फिर जन्म की स्मृति में फिर गर्भाधान की स्मृति में फिर पिछले जन्मों की स्मृति में प्रवेश होता है। आपने आगे कहा है कि मैं जाति— स्मरण के प्रयोग के पूरे सूत्र नहीं कह रहा हूं। पूरे सूत्र क्या हैं? क्या आगे के सूत्र का कुछ स्पष्टीकरण करने की कृपा कीजिएगा?

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--10)

आंतरिक रूपांतरण के तथ्य—(प्रवचन—दसवां)

चौथी प्रश्नोत्तर चर्चा


 प्रश्न : ओशो कल की चर्चा में आपने कहा कि शक्ति का कुंड प्रत्येक व्यक्ति का अलग— अलग नहीं है लेकिन कुंडलिनी जागरण में तो साधक के शरीर में स्थित कुंड से ही शक्ति ऊपर उठती है। तो क्या कुंड अलग— अलग हैं या कुंड एक ही है इस इस स्थिति को कृपया समझाएं।

 सा है, जैसे एक कुएं से तुम पानी भरो। तो तुम्हारे घर का कुआं अलग है, मेरे घर का कुआं अलग है, लेकिन फिर भी कुएं के भीतर के जो झरने हैं वे सब एक ही सागर से जुड़े हैं। तो अगर तुम अपने कुएं के ही झरने की धारा को पकड़कर खोदते ही चले जाओ, तो उस मार्ग में मेरे घर का कुआं भी पड़ेगा, औरों के घर के कुएं भी पड़ेंगे, और एक दिन तुम वहां पहुंच जाओगे जहां कुआं नहीं, सागर ही होगा। जहां से शुरू होती है यात्रा वहां तो व्यक्ति है, और जहां समाप्त होती है यात्रा वहां व्यक्ति बिलकुल नहीं है, वहां समष्टि है; इंडिविजुअल से शुरू होती है और एकोल्युट पर खतम होती है।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--195

पूरब और पश्‍चिम का अभिनव संतुलन—(प्रवचन—आठवां)

अध्‍याय—17
सूत्र:

श्रद्धया परया तप्तं तयस्तन्त्रिविधं नरै ।
अफलाकंक्षिभिर्युक्तै: सात्त्विकं पश्चिक्षते।। 17।।
सत्कारमानपूजार्थ तपो दम्भेन चैव यत्।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमब्रुवम्।। 18।।
मूढग्राहेणात्मनार्थं यत्पीडया क्रियते तय: ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदहतम्।। 19।।

है अर्जुन, कल को न चाहने वाले निष्कामी योगी परूषों द्वारा परम आ से किए हुए उस पूर्वोक्‍त तीन प्रकार के तय को तो सात्‍विक कहते हैं।
और जो तय सत्कार, मान और पूजा के लिए अथवा केवल पाखंड से ही किया जाता है वह अनिशचय और क्षणिक कल वाला तय का राजस कहा गया है।
और जो तय मूढतापूर्वक हठ से मन, वाणी और शरीर की बढ़ी के सहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है वह तय तामस कहा गया है।

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--194

शरीर, वाणी और मन के तप—(प्रवचन—सातवां)

अध्‍याय—7
सूत्र:--

देवद्धिजगुरूप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्‍यते।। 14।।
अनुद्वेगकरं वाक्‍यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्‍यमनं चैव वाङ्मय तय उच्यते।। 15।।
मन:प्रमाद सौम्यत्‍वं मौनमात्मीवनिग्रह:।
भावसंशुद्धिरित्‍येतत्तपो मानसमुच्‍यते।। 16।।

तथा हे अर्जुन, देवता, द्विज अर्थात ब्रह्मण, गुरू और ज्ञानीजनों का पूजन एवं पवित्रता, सरलता, ब्राह्मचर्य और अहिंसा, यह शरीर संबंधी तय कहा जाता है।
तथा जो उद्वेग को न करने वाला प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है और जो स्वाध्याय का अभ्यास है, वह नि:संदेह वाणी संबंधी तय कहा जाता है।
तथा मन की प्रसन्नता, शांत भाव, मौन, मन का निष्ठ और भाव की पवित्रता, ऐसे यह मन संबंधीं तय कहा जाता है।

शनिवार, 30 मई 2015

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--9)

श्वास की कीमिया—(प्रवचन—नौवां)

तीसरी प्रश्नोत्तर चर्चा

प्रश्न :  ओशो रूस के बहुत बड़े अध्यात्मविद् और मिस्टिक जॉर्ज गुरजिएफ ने अपनी आध्यात्मिक खोज— यात्रा के संस्मरण 'मीटिंग्स विद दि रिमार्केबल मेन' नामक पुस्तक में लिखे हैं। एक दरवेश फकीर से उनकी काफी चर्चा भोजन को चबाने के संबंध में तथा योग के प्राणायाम व आसनों के संबंध में हुई जिससे वे बड़े प्रभावित भी हुए। दरवेश ने उन्हें कहा कि भोजन को कम चबाना चाहिए कभी— कभी थी सहित भी निगल जाना चाहिए; इससे पेट शक्तिशाली होता है। इसके साथ ही दरवेश ने उन्हें किसी भी प्रकार के श्वास के अभ्यास को न करने का सुझाव दिया। दरवेश का कहना था कि प्राकृतिक श्वास—प्रणाली में कुछ भी परिवर्तन करने से सारा व्यक्तित्व अस्तव्यस्त हो जाता है और उसके घातक परिणाम होते हैं इस संबंध में आपका क्या मत है?

 समें पहली बात तो यह है कि यह तो ठीक है कि अगर भोजन चबाया न जाए, तो पेट शक्तिशाली हो जाएगा। और जो काम मुंह से कर रहे हैं वह काम भी पेट करने लगेगा। लेकिन इसके परिणाम बहुत घातक होंगे।

गुरुवार, 28 मई 2015

मैं मृत्‍यु सिखाता हूं--(प्रवचन--13)

सूक्ष्‍म शरीर, ध्यान—साधना एवं तंत्र—साधना के कुछ गुप्‍त आयाम—(प्रवचन—तैरहवां)


(दो शरीर के मिलने से तो सिर्फ हम एक शरीर को जन्मने की सुविधा देते हैं। लेकिन जब दो आत्माएं भी मिलती है, तब हम एक विराट आत्‍मा को उतरने की सुविधा देते है।)

भगवान श्री आपने एक प्रवचन में कहा है कि समाधि के प्रयोग में अगर तेजस शरीर अर्थात सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर के बाहर चला गया तो पुरुष के तेजस शरीर को बिना स्त्री की सहायता के वापस नहीं लौटाया जा सकता या स्त्री के तेजस शरीर को बिना पुरुष की सहायता के वापस नहीं लौटाया जा सकता। क्योंकि दोनों के स्पर्श से एक विद्युत— वृत्त पूरा होता है और बाहर गई चेतना तीव्रता से भीतर लौट आती है आपने अपना एक अनुभव भी कहा है कि वृक्ष पर बैठकर ध्यान करते थे और स्थूल शरीर नीचे गिर गया और सूक्ष्म शरीर ऊपर से देखता रहा। फिर एक स्त्री का छूना और सूक्ष्म शरीर का स्थूल शरीर में वापस लौट जाना। तो प्रश्न है कि पुरुष को स्त्री की और स्त्री को पुरुष की आवश्यकता इस प्रयोग में क्यों है? कब तक है? क्या दूसरे के बिना लौटना संभव नहीं है? क्या कठिनाई है?

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--8)

यात्रा: दृश्य से अदृश्य की और—(प्रवचन—आठवां)


दूसरी प्रश्नोत्तर चर्चा:

 प्रश्न : ओशो आपने नारगोल शिविर में कहा है कि कुंडलिनी साधना शरीर की तैयारी है। कृपया इसका अर्थ स्पष्ट समझाएं।

 हली बात तो यह शरीर और आत्मा बहुत गहरे में दो नहीं हैं; उनका भेद भी बहुत ऊपर है। और जिस दिन दिखाई पड़ता है पूरा सत्य, उस दिन ऐसा दिखाई नहीं पड़ता कि शरीर और आत्मा अलग—अलग हैं, उस दिन ऐसा ही दिखाई पड़ता है कि शरीर आत्मा का वह हिस्सा है जो इंद्रियों की पकड़ में आ जाता है और आत्मा शरीर का वह हिस्सा है जो इंद्रियों की पकड़ के बाहर रह जाता है।

 शरीर और आत्मा—एक ही सत्य के दो छोर:

बुधवार, 27 मई 2015

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--193

तीन प्रकार के यज्ञ—(प्रवचन—छठवां)

अध्‍याय—17
सूत्र—

            अफलाकांक्षिभिर्यज्ञो विभिदृष्टो य हज्यते।
यष्टध्यमेवेति मन: समाधाय अ सात्‍विक।। 11।।
अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।
इज्‍यते भरतश्रेष्ठं तं यज्ञं विद्धि राजसम् ।। 12।।
विधिहीनमसृष्‍टान्‍नं मंत्रहीनमदक्षईणम् ।
श्रद्धाविरहितं यज्ञ तामसं परिचक्षते ।। 13।।

और हे अर्जुन, जो यज्ञ शास्त्र— विधि से नियत किया हुआ है तथा करना ही कर्तव्य है, ऐसे मन को समाधान करके फल को न चाहने वाले पुरूषों द्वारा किया जाता है, यह यज्ञ तो सात्‍विक है।
और हे अर्जुन, जो यज्ञ केवल दंभाचरण के ही लिए अथवा फल को भी उद्देश्य रखकर किया जाता है, उस यज्ञ को तू राजस जान।
तथा शास्त्र— विधि से हीन और अन्न— दान से रहित एवं बिना मंत्रों के बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किए हुए यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं।

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--7)

 कुंडलिनी जागरण व शक्तिपात—(प्रवचन—सातवां)

पहली प्रश्नोत्तर चर्चा:

 ताओ—मूल स्वभाव:

प्रश्न:

ओशो ताओ को आज तक सही तौर से समझाया नहीं गया है। या तो विनोबा भावे ने ट्राई किया या फारेनर्स ने ट्राई किया या हमारे एक बहुत बड़े विद्वान मनोहरलाल जी ने ट्राई किया लेकिन ताओ को या तो वे समझा नहीं पाए या मैं नहीं समझ पाया। क्योंकि यह एक बहुत बड़ा गंभीर विषय है।

 ताओ का पहले तो अर्थ समझ लेना चाहिए। ताओ का मूल रूप से यही अर्थ होता है, जो धर्म का होता है। धर्म का मतलब है स्वभाव।  जैसे आग जलाती है, यह उसका धर्म हुआ। हवा दिखाई नहीं पड़ती है, अदृश्य है, यह उसका स्वभाव है, यह उसका धर्म है। मनुष्य को छोड्कर सारा जगत धर्म के भीतर है। अपने स्वभाव के बाहर नहीं जाता। मनुष्य को छोड्कर जगत में, सभी कुछ स्वभाव के भीतर गति करता है। स्वभाव के बाहर कुछ भी गति नहीं करता। अगर हम मनुष्य को हटा दें तो स्वभाव ही शेष रह जाता है। पानी बरसेगा, धूप पड़ेगी, पानी भाप बनेगा, बादल बनेंगे, ठंडक होगी, गिरेंगे। आग जलाती रहेगी, हवाएं उड़ती रहेंगी, बीज टूटेंगे, वृक्ष बनेंगे। पक्षी अंडे देते रहेंगे। सब स्वभाव से होता रहेगा। स्वभाव में कहीं कोई विपरीतता पैदा न होगी।

सोमवार, 25 मई 2015

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--192

 भोजन की कीमिया—(प्रवचन—पांचवां)

अध्‍याय—17
सूत्र:--

आयु:सत्त्वब्रलारौग्यसुख्तीतिविवर्थना:।
रस्‍या: स्निग्‍धा: स्थिरा हद्या आहारा: सात्‍विकप्रिया:।। 8।। कट्वब्ललवणात्युष्यातीक्श्रणीरूक्षधिदाहिन:।
आहारा राजसस्येष्टा दु:खशस्कोमयप्रदा:।। 9।।
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
उच्‍छिष्‍टमपि चामेध्यं भोजन तामसप्रियम्।। 10।।

आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढाने वाले एवं रसयुक्‍त, चिकने स्थिर रहने वाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय, ऐसे आहार सात्‍विक पुरूष को प्रिय होते हैं। और कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त और अति गरम तथा तीक्ष्‍ण, रूखे और दाहकारक एवं दुख, चिंता और रोगों को उत्पन्‍न करने वाले आहार राजस पुरूष को प्रिय होते हैं।
और जो भोजन अधपका, रसरहित और दुर्गंधयुक्त एवं बासा और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र है, वह भोजन तामस पुरूष को प्रिय होता है।

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--6)

गहरे पानी पैठ—(प्रवचन—छठवां)

(समापन प्रवचन)

 मेरे प्रिय आत्मन्!

तीन दिनों में बहुत से प्रश्न इकट्ठे हो गए हैं और इसलिए आज बहुत संक्षिप्त में जितने ज्यादा प्रश्नों पर बात हो सके, मैं करना चाहूंगा।

 कितनी प्यास?

एक मित्र ने पूछा है कि ओशो विवेकानंद ने रामकृष्ण से पूछा कि क्या आपने ईश्वर देखा है? तो रामकृष्ण ने कहा लूं जैसा मैं तुम्हें देख रहा हूं ऐसा ही मैने परमात्मा को भी देखा है। तो वे मित्र पूछते हैं कि जैसा विवेकानंद ने रामकृष्ण से पूछा क्या हम भी वैसा आपसे पूछ सकते हैं?

 हली तो बात यह, विवेकानंद ने रामकृष्ण से पूछते समय यह नहीं पूछा कि हम आपसे पूछ सकते हैं या नहीं पूछ सकते हैं। विवेकानंद ने पूछ ही लिया। और आप पूछ नहीं रहे हैं, पूछ सकते हैं या नहीं पूछ सकते हैं, यह पूछ रहे हैं। विवेकानंद चाहिए वैसा प्रश्न पूछनेवाला। और वैसा उत्तर रामकृष्ण किसी दूसरे को न देते। यह ध्यान रहे, रामकृष्ण ने जो उत्तर दिया है वह विवेकानंद को दिया है, वह किसी दूसरे को न दिया जाता।

रविवार, 24 मई 2015

मैं मृत्‍यु सिखाता हूं--(प्रवचन--12)

नाटकीय जीवन के प्रति साक्षी चेतना का जागरण—(प्रवचन—बाहरवां)


 (रुक जाएं और एक क्षण को किसी भी क्षण को, जागने का क्षण बना लें और क्या हो रहा है। आप साक्षी रह जाए सिर्फ।)

 भगवान श्री मृत्यु में भी जागे रहने के लिए या ध्यान में सचेतन मृत्यु की घटना को सफलतापूर्वक आयोजित करने के लिए शरीर— प्रणाली श्वास— प्रणाली श्वास की स्थिति प्राणों की स्थिति ब्रह्मचर्य मनशक्ति आदि के संबंध में क्या— क्या तैयारियां साधक की होनी चाहिए इस पर सविस्तार प्रकाश डालने की कृपा करें।

 मृत्यु में जागे हुए रहने के लिए सबसे पहली तैयारी दुख में जागे रहने की करनी पडती है। साधारणत: जो दुख में ही मूर्च्छित हो जाता है, उसकी मृत्यु में जागे रहने की संभावना नहीं है। और दुख में मूर्च्‍छित होने का क्या अर्थ है, यह समझ लेना जरूरी है। तो दुख में जागे रहने का अर्थ भी समझ में आ जाएगा।
जब भी हम दुख में होते हैं तो मूर्च्छित होने का अर्थ होता है, दुख के साथ आइडेंटिफिकेशन, दुख के साथ तादात्म्य। जब आपका सिर दुखता है, तो ऐसा नहीं लगता है कि सिर कहीं दुख रहा है और आप जान रहे हैं। ऐसा लगता है कि मैं ही दुख रहा हूं।

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--5)

कुंडलिनी, शक्तिपात व प्रभु प्रसाद—(प्रवचन—पांचवां)

अंतिम ध्यान प्रयोग

 मेरे प्रिय आत्मन्!

हुत आशा और संकल्प से भर कर आज का प्रयोग करें। जानें कि होगा ही। जैसे सूर्य निकला है, ऐसे ही भीतर भी प्रकाश फैलेगा। जैसे सुबह फूल खिले हैं, ऐसे ही आनंद के फूल भीतर भी खिलेंगे। पूरी आशा से जो चलता है वह पहुंच जाता है, और जो पूरी प्यास से पुकारता है उसे मिल जाता है।
जो मित्र खड़े हो सकते हों, वे खड़े होकर ही प्रयोग को करेंगे। जो मित्र खड़े हैं, उनके आसपास जो लोग बैठे हैं, वे थोड़ा हट जाएंगे.. .कोई गिरे तो किसी के ऊपर न गिर जाए। खड़े होने पर बहुत जोर से क्रिया होगी—शरीर पूरा नाचने लगेगा आनंदमग्न होकर। इसलिए पास कोई बैठा हो, वह हट जाए। जो मित्र खड़े हैं, उनके आसपास थोड़ी जगह छोड़ दें—शीघ्रता से। और पूरा साहस करना है, जरा भी अपने भीतर कोई कमी नहीं छोड देनी है।

शनिवार, 23 मई 2015

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--191

संदेह और श्रद्धा—(प्रवचन—चौथा)

अध्‍याय—17
सूत्र—

            आहारस्थ्यपि सर्वस्य प्रिविधो भवति प्रिय:।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदीममं श्रृणु।। 7।।

और है अर्जुन, जैसे श्रृद्धा तीन प्रकार की होती है, वैसे ही भोजन भी सबको अपनी—अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है। और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी सात्विक, राजसिक और तामसिक, ऐसे तीन— तीन प्रकार के होते हैं। उनके इस न्यारे— न्यारे भेद को तू मेरे से मन।

 पहले कुछ प्रश्न।

पहला प्रश्न :

आप कहते हैं कि पदार्थ की खोज में जो स्थान संदेह का है, धर्म की खोज में वही स्थान श्रद्धा का है। और पदार्थ की खोज में मैंने इतनी लंबी यात्रा की है कि संदेह मेरा दूसरा स्वभाव बन गया है; वह मेरी चमड़ी में ही नहीं, मांस—मज्जा में समाया है। इस हालत में अपने मूल स्वभाव यानी श्रद्धा को उपलब्ध होने के लिए मैं क्या करूं?

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--190

सुख नहीं, शांति खोजो—(प्रवचन—तीसरा)

अध्‍याय—17
सूत्र: 190

अशास्‍त्रविहितं धीरं तप्यन्ते ये तपो जना:।
दम्भाहंकारसंयुक्‍ता: कामरागबलान्त्तिता:।। 5।।
कर्शयन्त: शरीरस्थं भूतग्राममचेतस:।
मां चैवान्त:शरीरस्थं तान्‍विद्धय्यासुरीनश्चयान्।। 6।।

और है अर्जुन, जो मनुष्य शास्त्र— विधि से रहित केवल मनोकल्‍पित घोर तप को तपते हैं तथा दंभ और अहंकार से युक्‍त एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्‍त हैं तथा जो शरीररूप से स्थित भूत— समुदाय को और अंत:करण में स्थित मुझे अंतर्यामी को भी कृश: करने वाले है, उन अज्ञानियों को तू आसुरी स्वभाव वाला जान।

 पहले कुछ प्रश्न।

पहला प्रश्न : भक्त के सामने साक्षात भगवान हैं, फिर भी विरह कम क्यों नहीं हो रहा है?

 जैसे—जैसे भगवान की प्रतीति होती है, विरह बढ़ता है। जैसे—जैसे निकट आते हैं, वैसे—वैसे दूरी खलती है। जितने पास आते हैं, उतनी ही पीड़ा होती है। क्योंकि पास आने पर ही पहली दफा पता चलता है कि अब तक सारा जीवन व्यर्थ ही गंवाया। और पास आने पर ही पता चलता है कि इतनी थोड़ी—सी दूरी भी अब बहुत दूरी है।

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--4)

ध्‍यान पंथ ऐसो कठिन—(प्रवचन—चौथा)



 प्रभु—कृपा और साधक का प्रयास
मेरे प्रिय आत्मन्!

 एक मित्र ने पूछा है कि ओशो क्या ध्यान प्रभु की कृपा से उपलब्ध होता है?

 स बात को थोड़ा समझना उपयोगी है। इस बात से बहुत भूल भी हुई है। न मालूम कितने लोग यह सोचकर बैठ गए हैं कि प्रभु की कृपा से उपलब्ध होगा तो हमें कुछ भी नहीं करना है। यदि प्रभु—कृपा का ऐसा अर्थ लेते हैं कि आपको कुछ भी नहीं करना है, तो आप बड़ी भ्रांति में हैं। दूसरी और भी इसमें भांति है कि प्रभु की कृपा सबके ऊपर समान नहीं है।
लेकिन प्रभु—कृपा किसी पर कम और ज्यादा नहीं हो सकती। प्रभु के चहेते, चूज़न कोई भी नहीं हैं। और अगर प्रभु के भी चहेते हों तो फिर इस जगत में न्याय का कोई उपाय न रह जाएगा।
प्रभु की कृपा का तो यह अर्थ हुआ कि किसी पर कृपा करता है और किसी पर अकृपा भी रखता है। ऐसा अर्थ लिया हो तो वैसा अर्थ गलत है। लेकिन किसी और अर्थ में सही है। प्रभु की कृपा से उपलब्ध होता है, यह उनका कथन नहीं है जिन्हें अभी नहीं मिला, यह उनका कथन है

गुरुवार, 21 मई 2015

मैं मृत्‍यु सिखाता हूं--(प्रवचन--11)

संकल्यवान—हो जाता है आत्‍मवान—(प्रवचन—ग्‍याहरवां)


 (वापस लौटना सदा आसान मालूम पड़ता है। क्यों? क्योंकि जहां हम लौट रहे हैं वह परिचित भूमि है। आगे बढ़ना हमेशा खतरनाक मालूम पड़ता है क्योंकि जहां हम जा रहे हैं वहां का हमें कोई भी पता नहीं है।)

भगवान श्री,

द्वारका शिविर में आपने कहा है कि सब साधनाएं झूठी हैं क्योंकि परमात्मा से हम कभी बिछुड़े ही नहीं हैं तो क्या झूठी है? शरीर और मन का विकास झूठा है? संस्कारों की निर्झर? झूठी है? स्थूल से सूक्ष्म की ओर की साधना हठी है? प्रथम शरीर से सातवें शरीर की यात्रा का आयोजन झूठा है? क्या कुंडलिनी साधना की लंबी प्रक्रिया हठ है? इन बातों को समझाने की कृपा करें।

 हली बात तो यह कि जिसे मैं असत्य कहता हूं, झूठ कहता हूं? उसका मतलब यह नहीं होता है कि वह नहीं है। असत्य भी होता तो है ही। अगर न हो तो असत्य भी नहीं हो सकता। झूठ का भी अपना अस्तित्व है, स्वप्न का भी अपना अस्तित्व है। जब हम कहते हैं, स्वप्न झूठ है, तो उसका यह मतलब नहीं होता है कि स्वप्न का अस्तित्व नहीं है। उसका केवल इतना ही मतलब होता है कि स्वप्न का अस्तित्व मानसिक है, वास्तविक नहीं है। मन की तरंग है, तथ्य नहीं है। जब हम कहते हैं, जगत माया है, तो उसका मतलब यह नहीं होता है कि जगत नहीं है। क्योंकि अगर नहीं है, तो किससे कह रहे हैं? कौन कह रहा है?

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--3)

ध्यान है महामृत्यु—(प्रवचन—तीसरा)

(कुंडलिनी—योग साधना शिविर)
नारगोल

 महामृत्यु : द्वार अमृत का:

प्रश्‍न:

एक मित्र पूछ रहे हैं कि ओशो कुंडलिनी जागरण में खतरा है तो कौन सा खतरा है? और यदि खतरा है तो फिर उसे जाग्रत ही क्यों किया जाए?

 तरा तो बहुत है। असल में, जिसे हमने जीवन समझ रखा है, उस पूरे जीवन को ही खोने का खतरा है। जैसे हम हैं, वैसे ही हम कुंडलिनी जाग्रत होने पर न रह जाएंगे; सब कुछ बदलेगा—सब कुछ—हमारे संबंध, हमारी वृत्तियां, हमारा संसार; हमने कल तक जो जाना था वह सब बदलेगा। उस सबके बदलने का ही खतरा है।
लेकिन अगर कोयले को हीरा बनना हो, तो कोयले को कोयला होना तो मिटना ही पड़ता है। खतरा बहुत है। कोयले के लिए खतरा है। अगर हीरा बनेगा तो कोयला मिटेगा तो ही हीरा बनेगा। शायद यह आपको खयाल में न हो कि हीरे और कोयले में जातिगत कोई फर्क नहीं है; कोयला और हीरा एक ही तत्व हैं।

बुधवार, 20 मई 2015

गीता दर्शन--(भाग--8) प्रवचन--189

भक्‍ति और भगवान—(प्रवचन—दूसरा)

अध्‍याय—17
सूत्र—

सत्‍वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो वो यव्छुद्ध: स एव सः।। 3।।
यजन्ते सात्‍विका देवान्यक्षरक्षांति राजसाः।
प्रेतान्धूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जना: ।। 4।।

है भारत सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अंतःकरण के अनुरूप होती है तथा यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरूष जैसी श्रद्धा वाला है, वह स्वयं भी वही है।
उनमें सात्‍विक पुरूष तो देवों को पूजते हैं और राजस परुष यक्ष और राक्षसों को पूजते हैं तथा अन्य जो तामस मनुष्य है, वे ने और भूतगणों को पूजते हैं।

 पहले कुछ प्रश्न।

पहला प्रश्न : भक्त जब भगवान को मिलता है, तब उसे पुलक और आनंद का अनुभव होता है। क्या भगवान को भी उस क्षण वैसी ही पुलक और आनंद का अनुभव होता है?

मंगलवार, 19 मई 2015

मैं मृत्‍यु सिखाता हूं--(प्रवचन--10)

अंधकार से आलोक और मूर्च्छा से परम जागरण की और—(प्रवचन—दसवां)


( यान मूल तत्व जिसकी तरलता जिसकी सघनता विरलता जिसका ठोसपन तय करता है कि आपको जाग्रत कहें या आपको सोया हुआ कहें। जागरण और मूर्च्छा के बीच जो तत्व यात्रा करता है, वह ध्‍यान है।)


भगवान श्री सजग मृत्यु में प्रवेश की प्रक्रिया पर चर्चा करने के पहले मैं पूछना चाहूंगा कि और जागृति में क्या भेद है? बेहोशी चेतना की किस स्थिति को कहते हैं? अर्थात होश और बेहोशी में जीवात्मा की चेतना की कौन— सी स्थिति होती है?

 मूर्च्छा और जागृति, इन दोनों को समझने के लिए पहली बात तो यह समझ लेनी जरूरी है कि ये दोनों विपरीत अवस्थाएं नहीं हैं। साधारणत: दोनों विपरीत अवस्थाएं समझी जाती हैं। असल में जीवन को हम द्वैत में तोड़कर ही देखते हैं। अंधकार और प्रकाश को बांट लेते हैं और सोचते हैं, अंधकार और प्रकाश दो चीजें हैं। जैसे ही हमने यह समझा कि अंधकार और प्रकाश दो चीजें हैं, बुनियादी भूल हो गई। अब इस बुनियादी मूल के बाद जो भी चिंतन खड़ा होगा, वह भ्रांत होगा, वह ठीक कभी भी नहीं हो सकेगा। अंधकार और प्रकाश एक ही चीज की तारतम्यताएं हैं। अंधकार और प्रकाश एक ही चीज के रूप हैं, अंधकार और प्रकाश एक ही चीज की सीढ़ियां हैं।

जिन खोजा तिन पाइयां--(प्रवचन--2)

बुंद समानी समुंद में—(प्रवचन—दूसरा)

(कुंडलिनी—योग साधना शिविर)
नारगोल

मेरे प्रिय आत्मन्!

र्जा का विस्तार है जगत और ऊर्जा का सघन हो जाना ही जीवन है। जो हमें पदार्थ की भांति दिखाई पड़ता है, जो पत्थर की भांति भी दिखाई पड़ता है, वह भी ऊर्जा, शक्ति है। जो हमें जीवन की भांति दिखाई पड़ता है, जो विचार की भांति अनुभव होता है, जो चेतना की भांति प्रतीत होता है, वह भी उसी ऊर्जा, उसी शक्ति का रूपांतरण है। सारा जगत—चाहे सागर की लहरें, और चाहे सरू के वृक्ष, और चाहे रेत के कण, और चाहे आकाश के तारे, और चाहे हमारे भीतर जो है वह, वह सब एक ही शक्ति का अनंत—अनंत रूपों में प्रगटन है।

 ऊर्जामय विराट जीवन:

हम कहां शुरू होते हैं और कहां समाप्त होते हैं, कहना मुश्किल है।
हमारा शरीर भी कहां समाप्त होता है, यह भी कहना मुश्किल है। जिस शरीर को हम अपनी सीमा मान लेते हैं, वह भी हमारे शरीर की सीमा नहीं है।