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सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

राम दूवारे जो मरे--(प्रवचन--01)


गुरु मारैं प्रेम का बान—(प्रवचन—पहला)

दिनांक
11 नवम्‍बर1979;
श्री रजनीश आश्रम पूना।

सूत्र:

अब तेरी शरण आयो राम।।
जबै सुनिया साध के मुख, पतितपावन नाम।।
यही जान पुकार कीन्ही, अति सतायो काम।।
विषय सेती भयो आजिज, कह मलूक गुलाम।। 
सांचा तू गोपाल, सांच तेरा नाम है।
जहंवां सुमिरन होय, धन्य सो ठाम है।।

रविवार, 28 फ़रवरी 2016

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--65)

अध्‍याय—(पैष्‍ठवां)

 स टैक्सी वाली घटना के बाद, मेरी एक मित्र जो रोज शाम प्रवचन के लिए आती है, वह और मैं यह निश्चय करती हैं कि रात को या तो वह मेरे घर रुक जाया करेगी या मैं उसके घर रुक जाया करूंगी। सुबह हम अपने—अपने घर जा सकती हैं। वह मेरे घर आना पसंद करती है, उसके लिए मैंने अपने कमरे में अलग से एक बिस्तर लगा दिया है। हमारी यह योजना बिलकुल ठीक चल रही है।

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--64)

अध्‍याय—(चौष्‍ठवां)

शो ने हर शाम 8 बजे से अपने बुडलैंड्स अपार्टमेंट में प्रवचन करना शुरू कर दिया है। कई बार प्रवचन दो—दो घंटे तक चलता है। मुझे वहां से अपने घर पहुंचने में एक घंटे से भी ज्यादा समय लगता है। रात काफी देर हो जाती है। इस समय मुश्किल से ही कोई महिला लोकल ट्रेन में सफर करती है। पुरुष मुझे अजीब नजरों से देखते हैं और कभी—कभी अश्लील फब्‍तियां भी कसते हैं। लेकिन किसी भी कीमत पर, मैं उनके प्रवचन से चूकना नहीं चाहती।

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--63)

अध्‍याय—(तरेष्‍ठवां)


 शाम हो चुकी है, और बंबई की सड्कों पर वाहनों की सबसे ज्यादा भीड़ का समय है। मैं क्रॉस मैदान पहुंचने के लिए एक टैक्सी का इंतजार कर रही हूं, जहां 6—30 बजे ओशो भगवद्गीता पर प्रवचन देने वाले हैं। मैं पंद्रह मिनट इंतजार करने के बाद बड़ी अधीर सी हो रही हूं। मेरे आगे से कितनी ही टैक्सियां गुजर रही हैं, लेकिन सभी भरी हुई हैं। मैं हैरान होती हूं कि ये इतने सारे लोग आखिर जा कहां रहे हैं, और मुझे कोई क्यों नहीं बिठा लेता।

भावना के भोज पत्र-(पत्र पाथय--8)

पत्र पाथय08

 निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

प्रिय मां,
पद—स्पर्श, कल रात्रि 10 बजे यहां पहुंच गया। आने को आग या पर सच में तो अपने वहीं छोड़ आया हूं! कल रात्रि जब सोया आपकी सुवास साथ थी—जागा जब तो आपके हाथों की राह देखता रहा.......और जानती हैं.......जब आपने उठाया तभी उठा हूं!

भावना के भोज पत्र-(पत्र पाथय--7)

पथ पाथय07

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

 प्रिय मां,
पद—स्पर्श! भाव—भीना पत्र मिला। हृदय की बात हृदय तक पहुंच गई। हृदय तक केवल वही बात पहुंचती भी है जो कि हृदय की गहराई से आती है। मेरे स्नेह में जो गीत लिखा है वह बहुत प्रिय लगा—'अपने होठों की पूरी मिठास आपने उसमें डाल दी है!

भावना के भोज पत्र-(पत्र पाथय--6)

पत्र पाथय06  

 निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

 प्रिय मां
पद—स्पर्श! आपका पत्र मिला। स्नेह में भीगकर शब्द कैसे जीबित हो जाते हैं—यह आपके प्रेम से भरे हृदय से निकले शब्दों को देखकर अनुभव होता है। शब्द अपने में तो मृत है; प्रीति उनमें प्राण डाल देती है। इस तरह प्रीति—सिक्त होकर वे अभिमंत्रित हो जाते हैं। काव्य का जन्म ऐसी ही अनुभुति से होता है। मेरे लिए आशीर्वाद—रूप कुछ गीत—पंक्तियां आपने लिखीं हैं। इन पंक्तियों ने मुझे छू लिया है। पढ़ा। समाधिस्थ हो गया।..... देर तक सब कुछ मिटा रहा. ........

भावना के भोज पत्र-(पत्र पाथय--5)

पत्र पाथय05

संत तारण तरण जयंती समारोह समिति
                        (सर्व—धर्म—सम्‍मेलन)
                                                जबलपूर
                                          दिनांक 10 अक्‍टूबर 1960
प्रिय मां,
पद—स्पर्श! आपका प्रीति—पत्र! एक—एक शब्द छूता है और आप बहुत निकट अनुभव होती हैं। प्रेम जीवन की सर्वोत्कृष्ट अनुभूति है। उसमें होकर ही हम प्रभु में और सत्य में हो पाते हैं। प्रेम द्वार है। ईसा ने तो कहा है, 'प्रेम ही प्रभु है।इस प्रेम को विस्तृत करते जाना है—एक से अनेक तक, अत से अनंत तक, अणु से ब्रह्मांड तक। इस रहस्यमय जगत् का एक—एक कण प्रीति—योग्य है।

भावना के भोज पत्र-(पत्र पाथय--4)

पत्र पाथय04  

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय
प्रिय मां
पद—स्पर्श। आपका आशीष—पत्र। बहुत खुशी हुई।
मेरा चित्र मांगा है। चांदा जब आऊं तब उसे लेने की व्यवस्था कर लें। वैसे वह चित्र तो आपके हृदय में है। कागज पर तो मृत—चित्र ही होते हैं हृदय में जीवित.....छवि बन जाती है। उससे बोला जा सकता है—उसे छुआ जा सकता है—उससे प्रत्युत्तर पाये जा सकते हैं। आंखें बद करें और देखें। क्या मैं भीतर नहीं हूं?

राम दूवारे जो मरे--(बाबा मलूक दास)


राम दुवारे जो मरे
(मलूक वाणी)
लूकदास न तो कवि है,दाशीनिक है, न धर्मशास्‍त्री है—दीवाने है, परवाने है। और परमात्‍मा को उन्‍होंने ऐसे जाना है, जैसे परवाना शमा को जानता है। वह पहचान बड़ी और है। दूर—दूर से नहीं, परिचय मात्र नहीं है वह पहचान है। अपने को गंवा कर, अपने को मिटाकर होती है।
राम दूवारे जो मरे।
राम के द्वार पर मर कर राम को पहचाना है।

शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

भावना के भोज पत्र--(पत्र पाथय-3)

पत्र पाथय03

 निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय
           
प्रिय मां,
पद—स्पर्श! आपका आशीष—पत्र मिला। जो आनंद हुआ—कैसे कहूं? आनंद—अनुभूति शब्दों में नहीं बंधती है। शब्द हैं बहुत असमर्थ, अपाहिज और अपंग—जीवन उनमें नहीं समाता है। जो भी जीवित है वह उनमें प्रगट नहीं हो पाता है। मन पर ही उनकी सत्ता और जड़—पार्थिव के लिए ही अभिव्यक्ति की उनकी क्षमता है।

भावना के भोज पत्र--(पत्र पाथय-2)

पत्र पाथय—02  

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

 प्रिय मां,
पद—स्पर्श। आपकी स्नेह—पाती मिली। आप मुझे निकट देखना चाहती हैं—मेरा भी मन आने को और आपके स्नेह को पाने के लिए लालायित है। मेरा बड़ा होना आपकी प्रेम—अभिव्यक्ति में बाधा नहीं बनेगा—मां के सामने भी क्या कोई बड़ा हो पाता है?

भावना के भोज पत्र--(पत्र पाथय--1)

पत्र पाथय—01

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

 प्रिय मां,
पद स्पर्श आपका आशीष पत्र मिला। मैं कितना आनंदित हूं कैसे कहूं? मां जैसी अमूल्य वस्तु निर्मूल्‍य मिल जावे और वह भी मुझ जैसे अपात्र को तो इसे प्रभु की अनुकंपा के अतिरिक्त और क्या कहूं? उस अचिन्त्य और अज्ञेय के स्नेह प्रसाद की अनुभूति जैसे—जैसे मुझ पर प्रगट होती जा रही है, वैसे—वैसे मेरा जीवन, आनंद, शांति और कृतज्ञता के अमृत बोध से भरता जाता है। आपको पाने में भी उसका करुणामय हाथ ही पीछे है। यह मैं स्पष्ट देख पा रहा हूं।

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

भावना के भोज पत्र--(09)

इस तरह भगवान तो पिछले कई जन्मों से संन्यासी के रूप में ही अवतारित होते रहे हैं। मा के पास वात्सल्य के ऐश्वर्य भरा बजरा रहा था परन्तु वहां भी वे तो अतिथि ही थे।’’पूर्व जन्म से आपका आशय, किस पूर्व जन्म से है? ''मैंने उन्हें अधिक कुरेदना चाहा।’’
‘‘उन्होंने 700 वर्ष पहले का संदर्भ दिया है किसी प्रवचन में।’’
‘‘मैं कहता आखन देखी’‘ प्रश्नोत्तर माला में इस और इशारा किया है भगवान ने।’’
''न।‘’  
‘‘मा बेटे के रूप में कहां थे, और कब थे ये तो मुझे नहीं मालूम। परन्तु किसी न किसी जन्म में थे जरूर ये दावे से मैं कह सकती हूं। ऐसे ही दुनियां के बहुत से साधु—संन्यासी और प्रेमी (तुम्हारे जैसे) वे कभी न कभी मेरे पिछले जन्मों में कहीं न कहीं निश्चय ही सम्पर्क में आए थे।

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--62)

अध्‍याय—(बाष्‍ठवां)

शो बंबई के पाटकर हॉल में महावीर पर प्रवचन दे रहे हैं। जैनों के अट्ठारह दिन के पर्यूषण चल रहे हैं।
आज, ओशो की मां व चाची जो गाडरवारा से आई हैं, प्रवचन से पहले संन्यास लेंगी। ऑडिटोरियम खचाखच भरा हुआ है। आज ओशो दो मिनट पहले ही आ गए हैं और सबको नमस्कार करने के बाद आंखें बंद करके पद्मासन में बैठ गए हैं। अचानक दो प्रौढ़ महिलाएं भगवा साड़ियां पहने ऑडिटोरियम से निकल कर पोडियम तक पहुंचती हैं और ओशो के सामने झुक जाती हैं।

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--61)

अध्‍याय—(इक्‍षठवां)

 शो ने खुले मैदानों में सार्वजनिक प्रवचन करने बंद कर हैं। हर शाम वे बुडलैंड्स अपार्टमेंट के लिविंगरूम में मित्रों के समूह से बोलते हैं। सुबह के प्रवचन सभागारों में आयोजित किए जाते हैं। अब हम करीब पचास संन्यासी हैं, जिन्हें पोडियम पर उनके पीछे बैठने दिया जाता है। प्रवचन के बाद कीर्तन होता है। हम सब पोडियम पर ही नाचते गाते हैं. और ओशो संगीत की पुन के साथ—साथ ताली बजाते हैं। स्टेज पर ऊर्जा का एक नृत्य घटित हो जाता है।

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--60)

अध्‍याय—(षाठवां)

 शो बुडलैंड्स बिल्डिंग के अपने नए अपार्टमेंट में आ चुके हैं। मैं लगभग रोज ही उनसे मिलती हूं और तरह—तरह की घटनाओं के बारे में उन्हें बताती हूं। वे सबका मजा लेते हुए हंसते हैं और मुझसे कुछ भी गंभीरता से न लेने को कहते हैं।
मैं उन्हें बताती हूं कि जब मैं बस स्टॉप पर खड़ी होती हूं तो कैसे बसों में से कालेज के लड़के चुंबन के इशारे करते हैं। मुझे बड़ा अजीब लगता है जब लाइन में खड़े लोग मेरी ओर ऐसे देखने लगते हैं जैसे मैं कोई पागल हूं।

सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--59)

अध्‍याय—(उन्‍नष्‍ठवां)

मैं बंबई भगवा कपड़ों और माला में लौटने से डर रही हूं। मैं बॉम्बे ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करती हूं जो पूरी बंबई में बसें चलाने वाली एक बड़ी ऑर्गेनाइजेशन है। कोलाबा स्थित मुरव्य ऑफिस में मेरे साथ हजारों लोग काम करते हैं। मैं जब भी छुट्टी पर जाती हूं कभी समय से नहीं लौटती।

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--58)

अध्‍याय—(अट्ठावनवां)

 ये भगवा कपड़े दो दिन पहनने के बाद मैं उन्हें धो देती हूं और सुबह के प्रवचन में अपने साधारण कपड़ों में ही जाती हूं। जब वे मेरी ओर देखते हैं तो मुझे लगता है कि मेरे दूसरे कपड़े पहनने से वे खुश नहीं हैं। उनकी नजरों में एक सवाल है, तेरे भगवा कपड़ों को क्या हुआ?'

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--57)

अध्‍याय—(सत्‍तावनवां)  

मैं कमरे से बाहर निकलती हूं तो देखती हूं चैतन्य भारती अपना कैमरा लिए खड़े हैं। मैं उनसे पूछती हूं कि क्या वे प्रवचन के बाद ओशो के साथ मेरी तस्वीर खींच सकते हैं, उन्होंने सहमति भर दी। मैं उन्हें कहती हूं कि प्रवचन के बाद मैं ओशो के पास जाऊंगी, जहां वह तैयार रहें। मैं पोडियम के पास ही जाकर जमीन पर अपनी आंखें बन्द कर बैठ जाती हूं।

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--56)

अध्‍याय(छप्‍पनवां)

 नाली का व्यान शिविर शुरू हो गया है। आज मैं ओशो से अपने साधारण कपड़ों में मिलने जाती हूं। वे मुझसे पूछते हैं, तेरे भगवा कपड़े कहां हैं? वे क्यों नहीं पहने?' मैं कहती हूं उन्हें मैं कल पहनूंगी।
अगली सुबह भगवा पहनकर मैं अपनी लुंगी और कुर्त्ता प्रवचन से पहले, बंबई की अपनी एक मित्र वीणा के साथ, ओशो से मिलने आती हूं।

भावना के भोज पत्र--(08)

मां आनंद मयी से एक भेट वर्ता–………..

मां के आनंद में सहभागी होते हुए मैंने प्रसंग आगे बढ़ाया— ‘‘ये तीन दिसम्बर की बात )थी क्यों मा? ''
‘‘हां' ये तीन दिसम्बर 1960 की बात थी।’’‘ 'ये तीन का आंकड़ा बड़ा फंस रहा है। मां! वर्धा को बजाजवाड़ी में तीसरी सीढ़ी चढ़ते ही उन्हें सामने देखना, फिर तीसरे कमरे मैं उनका चिंतन की लीन अवस्था में मिलना, 3 दिसम्बर को चांदा आना और फिर तीन दिन रहना।’’ इस बात पर फिर से हम दोनों के उन्‍मुक्त हास्य से वह 'सारंग' रंगीन हो गया रह।’’

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--55)

अध्‍याय—(पच्‍चपनवां)

 ल्दी ही मनाली में ध्यान शिविर होने वाला है। आज सुबह वे मुझसे पूछते हैं कि क्या मुझे लक्ष्मी के भगवा कपड़े अच्छे लगते हैं।मैं कहती हूं हां ओशो, ये कपड़े उस पर अच्छे लगते हैं।वे कहते हैं, 'ध्‍यान शिविर में यह अच्छा लगेगा कि सबने एक ही रंग के कपड़े पहने हुए हों। तू लक्ष्मी के जैसी एक ड्रेस सिलवा ले।वे करुणा को भी यही संदेश देते हैं। हम दोनों ही इसके लिए तैयार हो जाती हैं।

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--54)

अध्‍याय—(चौवनवां)

 नारगोल के ध्यान शिविर के बाद लक्ष्मी ने भगवा लुंगी और कुर्त्ता पहनना शुरू कर दिया है। ओशो ने उसे अपनी सेक्रेटरी की तरह नियुक्त किया है और वह सीसीआई. चेंबर्स पर सुबह ७ बजे पहुंच जाती है। किसी को भी ओशो से मिलना हो तो उसे लक्ष्मी से अपाइंटमेंट लेनी पड़ती है। यह मेरी कल्पना से परे है। मेरा मन इस नई व्यवस्था को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--53)

अध्‍याय—(तरेपन्नवां)

 शो ने यूनिवर्सिटी के पद से त्यागपत्र दे दिया है और वे जबलपुर से बंबई आ गए हैं। वे सीसी. आई. चेंबर्स के एक तीन बैडरूम वाले अपार्टमेंट में अतिथि की तरह ठहरे हुए हैं, जो कि एक मित्र ने उन्हीं के लिए किराए पर लिया है।
एक बैडरूम में हम, आठ—दस मित्र, रोज सुबह सात से आठ बजे तक सक्रिय ध्यान करते हैं। मैं बंबई के एक दूर—दराज इलाके में रहती हूं और वहा से पहुंचने में मुझे लगभग एक घंटा लगता है। एक मित्र ध्यान का संचालन करते हैं और हम बाकी के लोग उसमें हिस्सा लेते हैं।

भावना के भोज पत्र--(07)

मां आनंद मयी से एक भेट वर्ता–............. 

मां अक्‍सर भगवान को कविता या गीत के रूप में ही पत्र लिखती रहती थी। भगवान शब्‍दों की गहराई में डूबे हुए अर्थों को ग्रहण कर अपने भक्त को अपने पूर्ण प्रेम से अवगत कराने मैं कभी नहीं कृपणता का बोध करने देते थे।

जबलपुर (म प्र.)

प्रिय मां,
पद स्‍पर्श आपका पत्र मिला। रनेह में भीगकर शब्द कैसे जीवित हो जाते हैं। यह आपके प्रेम से भरे ह्रदय से निकले शब्‍दों को देखकर अनुभव होता है। शब्द अपने में तो मृत है, प्रीति उनमें प्राण डाल देती है। इस तरह प्रीतिसक्ति होकर वे अभमिंत्रित हो जाते है। काव्‍य का जन्‍म ऐसी ही अनुभूति से होता है। मेरे लिए आशीर्वाद रख कुछ गीत पंक्तियां आपने लिखी है। इन पंक्‍तियों में मुझे छू लिया है। पढ़ा समाधिस्थ हो गया। .......देर तक सब कुछ मिटा रहा.....मैं भी नहीं था। .......पर न होना हीं जीवन को उपलब्‍ध करना है। होना दुःख है। होना सीम। समग्र धर्म....समग्र कला....समग्र दर्शन, इस शून्यता को पान के लिए ही है। शून्यता शून्य नहीं हे। वहीं पूर्ण हे। न कुछ, सब कुछ है।
रजनीश के प्रणाम

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

दस हजार बुद्धो की एक सौ गथाएं--(अध्‍याय--52)

अध्‍याय—(बावनवां)

ज पहलगाम में हमारा आखिरी दिन है। ओशो के साथ, कभी तो ऐसा लगता है कि समय पूरी तरह रुक गया है और कभी ऐसा लगता है कि बहुत तेज भाग रहा है। मैं पैकिंग करने में व्यस्त हूं कि मुझे दरवाजे पर खड़े मुस्लिम चौकीदार की आवाज सुनाई पड़ती है। मैं उसे हमारा सामान कार में चढ़वाने के लिए एक घंटे बाद आने को कहती हूं। मैं उसे उसकी सेवाओं के एवज में बीस रुपये देती हूं, जो वह धन्यवादपूर्वक लेकर चला जाता है।

दस हजार बुद्धो की एक सौ गथाएं--(अध्‍याय--51)

अध्‍याय—(इक्‍यवनवां)

हर्षि महेश योगी भी अपने कुछ पश्चिमी शिष्यों के साथ पहलगाम आए हुए हैं, उन्होंने ओशो से मिलने की इच्छा व्यक्त की है। जिस बंगले में महेश योगी अपने शिष्यों के साथ ठहरे हुए हैं, उसके बाहर खुले लॉन में दोपहर को एक मीटिंग आयोजित की गई है।
मैं अपना कैसेट रिकार्डर लेकर बाकी दो मित्रों के साथ उसी कार में बैठ जाती हूं जिससे ओशो जा रहे हैं। दस मिनट के बाद कार एक बंगले के पास रुकती है।

भावना के भोज पत्र--(अध्‍याय--06)

 मां आनंदमयी से एक भेंट वार्ता:

मां ने भगवान से प्रथम मिलन की भूमिका बना पुन: कहना प्रारंभ किया— ‘‘उन दिनों विवेकानंद का बड़ा जोर था। अभी तक उनका कोई साहित्य मैंने नहीं पढ़ा था और फिर सबसे पहले उनका 'राजयोग' पढ़ा। पतंजलि—योग दर्शन की बड़ी सुंदर व्याख्या की है उसमें।’’
‘‘यात्रा से चांदा लौटकर आईं तो वरोरा मेरे ननिहाल से एक तपश्चर्या के उत्सव में सम्मिलित होने का निमंत्रण मिल पाया। मैं उत्सव में सम्मिलित होने के लिए पैसेंजर गाड़ी से अकेली ही रवाना हुई। चांद! के पास ही थोड़ी दूर पर एक माजरी नामक छोटा सा जक्शन स्टेशन है।

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--50)

अध्‍याय—(पचासवां)

र रोज ओशो और क्रांति के लिए टिफिन में सुबह और शाम का भोजन भेजा जाता है। जब वे अपना भोजन कर चुकते हैं तो मैं पाती हूं कि टिफिन में इतना भोजन छूट गया है जो मेरे और शीलू के लिए पर्याप्त है। हम दोनों बचे हुए भोजन को खूब आनन्द लेकर खाते हैं साथ ही रसोईघर तक भोजन के लिए जाने की तबालत से बचने पर बहुत प्रसन्न होते हैं।

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--49)

अध्‍याय—(उन्‍नचासवां)

दोपहर को भोजन के बाद ओशो. अपने कमरे में आराम कर रहे हैं और मैं बरामदे में बैठी दे रही हूं। तीन मुस्लिम बुजुर्ग आते हैं और कहते हैं, हमें पीर बाबा से मिलना है।मैं उन्हें बताती हूं वह अभी आराम कर रहे हैं, आप वापस 3 बजे आ सकते हैं।
वे लोग ओशो के बारे में जानने के उत्सुक हैं। बातचीत की शुरुआत करने के लिए उनमें से एक बुजुर्ग पूछता है कि क्या मैं ओशो की बेटी हूं।

दस हजार बुद्धों के लिए एक सौ गाथाएं—(अध्‍याय--48)

अध्‍याय—(अड़तालीसवां)

मिट्टी के तेल से जलने वाले इस स्टोव को जलाना वाकई मुश्किल काम है। यह बड़ी तकलीफ दे रहा है। इसके निप्पल को मुझे बार—बार एक पिन से साफ करना पड़ता है, और फिर कुछ देर पंप करते रहने के बाद यह भभककर जल उठता है।
पहले मैं चाय तैयार करती हूं और फिर टोस्ट बनाने के लिए ढ़क्‍कन को सीधा ही स्टोव पर रख देती हूं। ओशो रसोई के एक कोने में रखी छोटी सी मेज पर रखा—नाश्ता कर रहे हैं। मैं मिट्टी के तेल की गंध को बाहर करने के लिए रसोई का दरवाजा खुला रखती हूं।