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गुरुवार, 31 मार्च 2016

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--10)


ठहर जाना पा लेना है—(प्रवचन—दसवां)
दिनांक 21 मई 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्न सार:
1—आपके हिंदी प्रवचनों में भी सत्तर—अस्सी प्रतिशत वे पाश्चात्य संन्यासी होते हैं जिन्हें हिंदी—भाषा बिल्कुल नहीं आती। आप फिर भी उसी तत्परता, सहजता और गहनता से बोलते हैं मानो पूरी मंडली भाषा समझ रही हो। क्या आपको इस बात से कोई अड़चन नहीं आती?
2— इस सदी का मनुष्य अधार्मिक क्यों हो गया है?
3—बहुत दिनों से बड़ी बेचैन और गुमसुम हो रही हूँ। पहले की तरह खुलकर हँस भी नहीं सकती हूँ। दो दिन के दर्शन से अपूर्व आनंदित हुई। लेकिन चार रात से सो नहीं पाती और ऐसी हालत बहुत दिनों से है।
तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा. ....
4—परमात्मा से वियोग क्यों?

आनंद योग—(द बिलिव्‍ड)–(प्रवचन–3)

अपनी आंखें बंद करो और उसे पकडने का प्रयास करो—(प्रवचन—तीसरा)

दिनांक 12 जूलाई 1976;
श्री ओशो आश्रम पूना।

बाउल गाते हैं—
वासना की सरिता में
कभी डुबकी लगाना ही मत
अन्यथा तुम किनारे तक पहुंचोगे ही नहीं,
यह उग्र तूफानों से भरी हुई वह नदी है—
जिसके किनारे हैं ही नहीं।
क्या तुम उस मानुष को
अपने ही अंदर देखना चाहते हो?
यदि हां, तो अपने ही घर के अंदर जाओ
जो अत्यंत सुंदर और रूपमान है।
उस तक जाने के सभी मार्ग

बुधवार, 30 मार्च 2016

आनंद योग—(द बिलिव्‍ड)–(प्रवचन–2)

जब संदेह न होकर विश्‍वास होता है—(प्रवचन—दूसरा)

दिनांक 11 जूलाई 1976;
श्री ओशो आश्रम पूना।
प्रश्‍नसार:
      1—विश्‍वास करने के निर्णय से विश्‍वास उत्‍पन्‍न क्‍यों नहीं होता?
      2—बाउल, एक तांत्रिक, एक भक्‍त और एक सूफी के मध्‍य.....क्‍या अंतर?
      3—अनुभव और अनुभतियों का अनुसरण करो?
      4—सहष्‍णुता में, स्‍थगित करने में और मात्र मूढ़ता के मध्‍य क्‍या अंतर है?
      5—आपका व्‍यवहार विवेक के प्रति कैसा है?

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--09)


राम रेगीले के रंग राती—(प्रवचन—नौवां)
दिनांक 20 मई 1979;
श्री रजनीश आश्रम पूना
सूत्र:

गुरु गरवा दादू मिल्या, दीरघ दिल दरिया।
तत छन परसन होत हीं भजन भाव भरिया।। 
श्रवण कथा साँची सुणी, संगति सतगुरु की।
दूजा दिल आवै नहिं, जब धारी धुर की।।
भरमजाल भव काटिया, संका सब तोड़ी।
साँचा सगा जे राम का, ल्यौ तासूँ जोड़ी।।
भौजल माहीं काढ़िकै, जिन जीव जिलाया।

सोमवार, 28 मार्च 2016

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--08)


अहेतुक प्रेम भक्‍ति है—(प्रवचन—08)
दिनांक 19 मई 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार:
1—आपसे आंख मिली तबसे अविरत गुंजन हो गयी थी। कल संध्या आपके चरणों में गिरते ही धुन विदा हो गयी, शब्द निःशब्द हो गए। यह कैसी पुकार!
2—यहाँ आने का कोई कारण नजर नहीं आता, मगर न जाने आपकी कशिश मुझे यहाँ क्यों खींच लाती है। किसी को उत्तर देने में असमर्थ मगर अब जिंदगी में जीने का मजा आने लगा है। क्यों? साथ ही मैं बिल्कुल पत्थर हो गयी हूँ। रोना तो जैसे सूख ही गया है।
3—मनुष्य क्यों व्यर्थ की बातों में उलझा रहता है?

रविवार, 27 मार्च 2016

आनंद योग—(द बिलिव्‍ड)--(प्रवचन--1)

जड़े और फूल एक ही है—(प्रवचन—पहला)

दिनांक 10 जूलाई 1976;
श्री ओशो आश्रम पूना।
सूत्र—
बाउल गाते हैं
उत्सव आनंद में डूबे साहसी दीवानों का
रस और माधुर्य जब एक स्वर्णपात्र में इकट्ठा हो जाता है
तभी उसका मूल्य समझ में आता है कि
वह श्रेष्ठतम है। पूजा प्रार्थना फलप्रद होकर तभी
विकसित करती है
जब तुम्हारा पात्र तैयार और शुद्ध हो। वही प्रेमी सत्य को
उपलब्ध होता है
जो समग्रता से प्रेम करता है।
इसे बार—बार प्रयास कर असफल होने वाला व्यक्ति ही

आनंद योग—(द बिलिव्‍ड)

आनंद योग—(द बिलिव्‍ड)
(अंग्रेजी पुस्‍तक ‘’The Beloved Vol-2’’ बाउल संतो के क्रांति गीत का हिंदी अनुवाद स्‍वामी ज्ञान भेद द्वारा)
रमात्‍मा तुम्‍हारे चारों और है,
और तुम हमेशा उससे चूक रहे हो,
परमात्‍मा के पास केवल एक ही काल है—
और वह है वर्तमान उसके लिए
भूतकाल और भविष्‍यकाल
का अस्‍तित्‍व ही नहीं है।
मनुष्‍य, वर्तमान न रहकर,
भूत या भविष्‍य में रहता है,
परमात्‍मा भूत और भविष्‍य
में न रहकर वर्तमान में रहता है,
इसलिए दोनों का मिलन कैसे हो?

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--07)


मन रे, करू संतोष सनेही—(प्रवचन—सातवां)
दिनांक 18 मई 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
सारसूत्र:
मन रे, करु संतोष सनेही।   
तृस्ना तपति मिटै जुग—जुग की, दुख पावै नहिं देही।।
मिल्या सुत्याग माहिंजे सिरज्या, गह्या अधिक नहिं आवै
तामें फेर सार कछू नाहीं राम रच्या सोइ पावै।।
बाछै सरग सरग नहिं पहुँचै, और पताल न जाई।
ऐसे जानि मनोरथ मेटहु, समझि सुखी रहु भाई।।
रे मन, मानि सीख सतगुरु की, हिरदै धरि विस्वासा
जन रज्जब यूँ जानि भजन करु, गोबिंद है घर वासा।।

शनिवार, 26 मार्च 2016

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--37)

अध्याय—सैंतीस


 मुर्शिद लोगों को आग और खून की बाढ़ से सावधान करते हैं
बचने का मार्ग बताते हैं, और अपनी नौका को जल में उतारते हैं

मीरदाद : क्या चाहते हो तुम मीरदाद से? वेदी को सजाने के लिये सोने का रत्न —जटित दीपक? परन्तु मीरदाद न सुनार है, न जौहरी, आलोक—स्तम्भ और आश्रय वह भले ही हो।
या तुम तावीज चाहते हो बुरी नजर से बचने के लिये?  
हां, तावीज मीरदाद के पास बहुत हैं, परन्तु किसी और ही प्रकार के।

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--36)

अध्याय—छत्तीस

नौका — दिवस तथा उसके धार्मिक अनुष्ठान
जीवित दीपक के बारे में बेसार के सुलतान का सन्देश

नरौंदा : जब मुर्शिद बेसार से लौटे तब से शमदाम उदास और अलग —अलग सा रहता था। किन्तु जब नौका —दिवस निकट आ गया तो वह उल्लास तथा उत्साह से भर गया और सभी जटिल तैयारियों का, छोटी से छोटी बातों तक का. नियन्त्रण उसने स्वयं सँभाल लिया।
अगर —बेल के दिवस की तरह नौका —दिवस को भी एक दिन से बढ़ा कर उल्लास —भरे आमोद—प्रमोद का पूरा सप्ताह बना लिया गया था जिसमें सब प्रकार की वस्तुओं तथा सामान का तेजी के साथ व्यापार होता था।

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--35)

अध्याय—पैंतीस

परमात्मा की राह पर प्रकाश — कण

मीरदाद : इस रात के सन्नाटे में मीरदाद परमात्मा की ओर जाने वाली तुम्हारी राह पर कुछ प्रकाश —कण बिखेरना चाहता है।
विवाद से बचो। सत्य स्वयं प्रमाणित है; उसे किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं। जिसे तर्क और प्रमाण के सहारे की आवश्यकता होती है, उसे देर—सवेर तर्क और प्रमाण के द्वारा ही गिरा दिया जाता है।

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--34)

अध्याय—चौंतीस


 माँ— अण्डाणु

मीरदाद : मीरदाद चाहता है कि इस रात के सन्नाटे में तुम एकाग्र —चित्त होकर माँ—अण्डाणु के विषय में विचार करो।
स्थान और जो कुछ उसके अन्दर है एक अण्डाणु है जिसका खोल समय है। यही माँ —अण्डाणु है।
जैसे धरती को वायु लपेटे हुए है, वैसे ही इस अण्डाणु को लपेटे हुए है विकसित परमात्मा. विराट परमात्मा — जीवन जो कि अमूर्त, अनन्त और अकथ है।

शुक्रवार, 25 मार्च 2016

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--33)

अध्याय—तैंतीस

रात्रि — अनुपम गायिका

नरौंदा : पर्वतीय नीड़ के लिये, जिसे बर्फीली हवाओं और बर्फ के भारी अम्बारों ने पूरे शीतकाल में हमारी पहुँच से परे रखा था, हम सब इस प्रकार तरस रहे थे जिस प्रकार कोई निर्वासित व्यक्ति अपने घर के लिये तरसता है।
हमें नीड़ में ले जाने के लिये मुर्शिद ने बसन्त की एक ऐसी रात चुनी जिसके नेत्र कोमल और उज्ज्वल थे, जिसकी साँस उष्ण और सुगन्धित थी, जिसका हृदय सजीव और सजग था।

गुरुवार, 24 मार्च 2016

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--32)

अध्याय—बत्तीस

पाप और आवरण
मीरदाद : पाप के विषय में तुम्हें बता दिया गया है, और यह तुम जान जाओगे कि मनुष्य पापी कैसे बना।
तुम्हारा कहना है, और वह सारहीन भी नहीं है, कि परमात्मा का प्रतिबिम्ब और प्रतिरूप मनुष्य यदि पापी है, तो स्पष्ट है कि पाप का स्रोत स्वय परमात्मा ही है। इस तर्क में भोले —भाले लोगों के लिये एक जाल है, और तुम्हें, मेरे साथियो, मैं जाल में फँसने नहीं दूँगा। इसलिये मैं इस जाल को तुम्हारे रास्ते से हटा दूँगा. ताकि तुम इसे अन्य मनुष्यों के रास्ते से हटा सकी।

किताबे--ए--मीरदाद--(अध्‍याय--31)

अध्याय—इकत्तीस

निज घर के लिये महाबिरह

मीरदाद : धुन्ध के समान है निज घर के लिये महाविरह। जिस प्रकार समुद्र और धरती से उठी धुन्ध समुद्र तथा धरती पर ऐसे छा जाती है कि उन्हें कोई देख नहीं सकता, इसी प्रकार हृदय से उठा महाविरह हृदय पर ऐसे छा जाता है कि उसमें और कोई भावना प्रवेश नहीं कर सकती।
और जैसे धुन्ध स्पष्ट दिखाई देने वाले यथार्थ को आँखों से ओझल करके स्वयं एकमात्र यथार्थ बन जाती है. वैसे ही यह विरह मन की अन्य भावनाओं को दबा कर स्वय प्रमुख भावना बन जाता है।

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--06)


प्रेम परमात्‍मा है—(प्रवचन—छठवां)
दिनांक 17 मई 1979;
श्री रजनीश आश्रम पूना।
प्रश्‍न सार:
1—आपसे कोई प्रश्न पूछती हूँ तो मुझे लगता है—मेरी गर्दन आपकी तलवार के नीचे आ गयी ऐसा क्यों?
2—आप ऑंख खोलने के लिए कहते हैं, मगर ऑंख खोलने में इतना भय क्यों लगता है?
3—मनुष्य जीवन सहज की ओर मुड़ेगा या नहीं? हमारा कर्तव्य क्या है?
4—कआदमी से प्रेम करता हूँ। लेकिन परमात्मा से किसी लगाव का मुझे पता नहीं। क्या मैं पाप के रास्ते पर हूँ?

मंगलवार, 22 मार्च 2016

भावना के भोज पत्र--(पत्र--पाथय--50)

पत्रपाथय50

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

प्रिय मां,
कल रात्रि कोई महायात्रा पर निकल गया है। उसके द्वार पर आज रुदिन है।
सुबह—सुबह घूमकर लौटा हूं। देखता हूं कि सड़क के किनारे कुछ लोग जमा है। एक भिखारी शरीर से मुक्त हो गया है।
एक बचपन की स्मृति मन पर दुहर जाती है। पहली बार मरघट जाना हुआ था। चिता जल गई थी और लोग छोटे—छोटे झुंड बनाकर बातें कर रहे थे। गांव के एक कवि ने कहा था:, ‘‘मैं मृत्यु से नहीं डरता हूं। मृत्यु तो मित्र है।’’

भावना के भोज पत्र--(पत्र--पाथय--49)

पत्रपाथय49

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

मां,
नयी सुबह। नया सूरज। नई धूप। सोकर उठा हूं। सब नया—नया है। जगत् में कुछ भी पुराना नहीं है।
कई सौ वर्ष पहले यूनान में किसी ने कहा था, ‘‘एक ही नदी में दो बार उतरना असंभव है।’’
सब नया है पर मनुष्य पुराना पड़ जाता है। मनुष्य नये में जीता ही नहीं इसलिए पुराना पड़ जाता है। मनुष्य जीता है स्मृति में, अतीत में, मृत में। यह जीना ही है, जीवन नहीं है। पर अर्ध—मृत्यु है।
कल एक जगह यही कहा हूं। मनुष्य अपने में मृत है। जीवन योग से मिलता है। योग चिर—नवीन में जगा देता है। योग चिर—वर्तमान में जगा देता है।
मानव—चित्त स्मृति के भार से मुक्त हो तो ‘‘जो है’‘ वह प्रगट हो जाता है। स्मृति भूल का संकलन है। इससे जीवन को नहीं पाया जा सकता है। वह ज्ञान में भटकता है। उससे जो अज्ञान है, उसके द्वार नहीं खुलते हें।
ज्ञान को जाने दो ताकि अज्ञान प्रगट हो सके। मूल को जाने दो ताकि जीवित प्रगट हो सके—योग का सार—सूत्र यही है।

 28 मार्च 1963
रजनीश के प्रणाम

भावना के भोज पत्र--(पत्र--पाथय--48)

पत्रपाथय48

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय
25 मार्च 1962

प्रिय मां,
दोपहर तप गई है। पलाश वृक्षों पर फूल अंगारों की तरह चमक रहे हैं।
एक सुनसान रास्ते से गुजरता हूं। बांसों के घने झुरमुट हैं और उनकी छाया भली लगती है।
कोई अपरिचित चिड़िया गीत गाती है। उसके निमंत्रण को मान वहीं रुक जाता हूं। एक व्यक्ति साथ हैं। पूछ रहे हैं, ‘‘क्रोध को कैसे जीते, काम को कैसे जीते?'' यह बात तो अब रोज—रोज पूछी जाती है। इसके पूछने में ही भूल है। यही उनसे कहता हूं। समस्या जीतने की है ही नहीं। समस्या मात्र जानने की है। हम न क्रोध को जानते हैं और न काम को जानते हैं।

भावना के भोज पत्र--(पत्र--पाथय--47)

पत्र—पाथय—47  

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

प्रिय मां,
सांझ से ही आधी पानी है। हवाओं ने थपेड़ों से बड़े—बड़े वृक्षों को हिला डाला है। बिजली बद हो गई और नगर में अंधेरा है।
घर में एक दीपक जलाया गया है।
उसकी लौ ऊपर की और उठ रही है दीया भूमि का भाग है पर लौ न मालूम किसे पाने निरंतर ऊपर की और भागती रहती है।
लौ की भांति मनुष्य की चेतना है।

भावना के भोज पत्र--(पत्र--पाथय--46)

पत्र—पाथय—46

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय
प्रिय मां,
एक कागज की नाव पानी में डूब गई है।
कल कुछ रेत के घरोंदे बच्चों ने बनाए थे वे भी मिट गये हैं।
रोज नावें डूबती हैं और रोज घरोंदे टूट जाते हैं।
एक महिला आईं थीं। सपने उनके पूरे नहीं हुए हैं। जीवन से मन उनका उचाट है। आत्म हत्या के विचार ने उन्हें पकड़ लिया है। आंखें गड्डों में चली गई हैं और सब व्यर्थ मालूम होता है।
मैंने कहा, ‘‘सपने किसके पूरे होते हैं। सब सपने अंतत: दुःख ही देते हैं; कारण, कागज की नावें कहीं भी तो कितनी दूर बह सकती हैं? इसमें भूल सपनों की नहीं है।