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शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

सहज योग--(प्रवचन--12)

प्रेम: कितना मधुर, कितना मंदिर—(प्रवचन—बारहवां)

दिनांक 2 दिसंबर ,1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

1—मैंने मांगा कुछ, और मिला कुछ और। मांगी मन की मृत्यु--मिली मन की मगनता। मेरे मन में ज्ञानऱ्योग का महत्व ज्यादा है, परंतु अब प्रेम-भक्ति के भाव भी सघन हो रहे हैं। मन और शरीर जैसे रस के सरोवर में डूब गये हों! यह सब क्या है?

2—जहां सिद्ध सरहपा और तिलोपा के नाम सुदूर तिब्बत, चीन और जापान में उजागर नाम हैं, वहां अपने ही जन्म के देश में वे उजागर न हुए--इसका क्या कारण हो सकता है?

3—आप कहते हैं कि बुद्ध जहां रहते हैं उनके आस-पास के सूखे हुए वृक्ष भी हरे-भरे हो जाते हैं, मगर ये पूनावासी क्यों सूखते जा रहे हैं?

सहज योग--(प्रवचन--11)

खोलो गृह के द्वार—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)


दिनांक 1 दिसंबर ,1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

सारसूत्र :


वढ़ अणं लोअअ गोअर तत्त पंडित लोअ अगम्म।
जो गुरुपाअ पसण तंहि कि चित्त अगम्म।।1।।

सहजें चित्त विसोहहु चंग।
इह जम्महि सिद्धि मोक्ख भंग।।2।।

सचल णिचल जो सअलाचर।
सुण णिरंजण म करू विआर।।3।।

गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

सहज योग--(प्रवचन--10)

तरी खोल गाता चल माझी—(प्रवचन—दसवां)


दिनांक 30 नवंबर,1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

 1—आपने इस प्रवचनमाला को शीर्षक दिया है--सहजऱ्योग। क्या सहज और योग परस्पर-विरोधी नहीं लगते?

2—भक्त प्रभु-विरह  में कभी हंसता है कभी रोता है, यह विरोधाभास कैसा?

3—जाति-बिरादरी वालों ने मुझे छोड़ दिया है। यहां तक कि पंचायत बिठायी और चार व्यक्तियों ने मिलकर मुझे पीटा भी। संन्यास, बाल, दाढ़ी और गैरिक वस्त्र का त्याग करो--ऐसा कहकर मुझे पीटा गया--तथाकथित ब्राह्मणों और पंडितों द्वारा। ऐसा क्यों हुआ? अपने ही पराये क्यों हो गए?

सहज योग--(प्रवचन--09)

फागुन पाहुन बन आया घर—(प्रवचन—नौवां)


दिनांक 29 नवंबर,1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

1—तालमुद का वचन है: "जो तुझे आदिष्ट है उससे परे भी, उससे ऊपर भी तू पवित्र आचरण कर।' कृपा करके इस वचन का आशय हमें कहिए।

2—कोरा कागज था ये मन मेरा, लिख लिया नाम जिस पे तेरा! चैन गंवाया मैंने, निंदिया गंवाई; सारी-सारी रात जागूं, दूं मैं दुहाई!

3—बस एक ही प्रार्थना है कि आपके पास जो आग है, उसमें पूरी-पूरी जल जाऊं और खो जाऊं।

4—सिद्ध सरहपा ने महासुख की बात कही। यह महासुख क्या है?

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

सहज योग--(प्रवचन--08)

जीवन का शीर्षक: प्रेम—(प्रवचन—आठवां) 


दिनांक 28 नवंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :


1—आपका असहाय बालक रोता है।
आज अंतरीये करूं हूं आह्वान, नथी पूजा आयोजन
केवल आ मम तन-मन, तव दर्शन दान।

2—मनुष्य या तो काम-भोग की अति में चला जाता है या फिर
उसके विपरीत काम-दमन की कुंठा में। इस विषय में सहजऱ्योग की क्या दृष्टि है?

3—कौन आया मेरे मन के द्वारे, पायल की झनकार लिये!
आंख न जाने दिल पहचाने, मूरतिया कुछ ऐसी
याद करूं तो याद न आए, सूरतिया कुछ ऐसी
पागल मनवा सोच में डूबा, एक अनोखा प्यार लिए।

सहज योग--(प्रवचन--07)

जीवन के मूल प्रश्न—(प्रवचन—सातवां)


दिनांक 27 नवंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

1—परमात्मा कहां है, खोजें तो कहां खोजें?

2—विरह का, प्रभु-विरह का कष्ट नहीं सहा जाता है।

3—हम भारतीय क्यों दार्शनिक प्रश्न ही पूछते हैं, जबकि पश्चिमी संन्यासी अपने जीवन से संबंधित प्रश्न पूछते हैं?

4—श्री रामकृष्ण ने जीव के चार प्रकार कहे हैं--बद्ध, मुमुक्षु, मुक्त और नित्य। इसे समझाने की कृपा करें।

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

सहज योग--(प्रवचन--06)

सहजऱ्योग का आधार: साक्षी—(प्रवचन—छठवां)


दिनांक 26 नवंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

सारसूत्र :


आई ण अंत ण मज्झ णउ णउ भव णउ णि ब्वाण।
एहु सो परम महासुह णउ परणउ अप्पाण।।7।।

घोरान्धारें चंदमणि जिम उज्जोअ करेइ।
परम महासुह एक्कु खणे दुरि आसेस हरेइ।।8।।

जब्बे मण अत्थमण जाइ तणु तुट्टइ बंधण।
तब्बे समरस सहजे वज्जइ णउ सुछ ण बम्हण।।9।।

सहज योग--(प्रवचन--05)

जगत--एक रूपक—(प्रवचन—पांचवां)


दिनांक 25 नवंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार :

 1—परमात्मा की परिभाषा क्या है?

2—जीसस, सुकरात और मंसूर जैसे साक्षात प्रेमावतारों के शरीर को जिस घृणापूर्ण ढंग से सूली, जहर और कत्ल दी गयी--उससे क्या यह सिद्ध नहीं होता कि अस्तित्व बिलकुल तटस्थ है?

3—क्या जीवन सच ही बस एक नाटक है? बात जंचती भी है और जंचती भी नहीं। ऐसा क्यों?

4—प्रार्थना-शास्त्र का सार समझाइये।

रविवार, 24 अप्रैल 2016

सहज योग--(प्रवचन--04)

सहज-योग और क्षण-बोध—(प्रवचन—चौथा)


दिनांक 24 नवंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार :

 1—सिद्ध सरहपा का सहज-योग और झेन का क्षण-बोध क्या अन्य हैं या अनन्य? और क्या सहज-योग समर्पण का ही दूसरा नाम नहीं है?

2—उस दिन भारत के संदर्भ में आपने कहा कि इस देश की बुनियादी समस्या उसके अंधविश्वास हैं और यह कि यह देश समय से डेढ़ हज़ार वर्ष पीछे है। क्या बताने की कृपा करेंगे कि विश्वास और अंधविश्वास की परख क्या है? और क्या आज के विश्वास कल के अंधविश्वास नहीं हो जायेंगे? क्या यह भी बताने की अनुकंपा करेंगे कि कोई व्यक्ति या जनसमूह समसामयिक होने के लिए, आधुनिक रहने के लिए क्या करे?


3—आप क्यों इस मतांधों के देश में श्रम कर रहे हैं? परंपराग्रस्त और रूढ़िवादी लोग न आपको समझे हैं न समझेंगे। मैं स्वयं तो इस देश के अंधविश्वासों से इतना ऊब गया हूं कि सोचता हूं कि परदेस जा बसूं। आपका क्या आदेश है?

सहज योग--(प्रवचन--03)

देह गेह ईश्वर का—(प्रवचन—तीसरा)


दिनांक 23 नवंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार :

 1—अब इस देह में ज्यादा रहने का मन नहीं होता। इससे विदा लेने का मन है। लेकिन आपके लिए जी पीछे खींचता है। मैं बता नहीं सकती कुछ भी। मुझे कुछ भी लिखने को नहीं आता है। क्या कहूं?

2—आप राजनीति पर वक्तव्य देते हैं तो फिर आपको राजनीतिज्ञ क्यों न माना जाए?

3—सिद्ध सरहपा ने कहा कि जब तक स्वयं को न जान लो तब तक किसी को शिष्य न करना। इस पर कुछ और कहें।

4—आपने कहा है जीवन को लीला समझो। कैसे? और यदि जीवन माया-मात्र है तो इस जीवन की आवश्यकता क्या है?

5आप हज़ारों लोगों को संन्यास क्यों दे रहे हैं?

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

प्रेम योग–(दि बिलिव्ड-1)–(प्रवचन–04)

तुम्हारी आत्मा में गलता शून्‍य का संगीत—(प्रवचन—चौथा)

दिनांक 24 जून 1976;
श्री ओशो आश्रम पूना।
प्रश्‍नसार:
प्रथम प्रश्न :
प्यारे ओशो! अंतर्यात्रा प्रारंभ कैसे की जाए? सेक्स के अतिक्रमण करने का ठीक— ठीक क्या अर्थ है?
यात्रा का प्रारंभ तो पहले ही से हो चुका है, तुम्हें वह शुरू नहीं करना है। प्रत्येक व्यक्ति पहले से यात्रा में ही है। हमने अपने आपको यात्रा पथ के मध्य में ही पाया है। इसकी न तो कोई शुरुआत है और न कोई अंत। यह जीवन ही एक यात्रा है। जो पहली बात समझ लेने जैसी है वह यह है कि इसे प्रारंभ नहीं करना है, यह हमेशा से ही चली जा रही है। तुम यात्रा ही कर रहे हो। इसे केवल पहचानना है।

सहज योग--(प्रवचन--02)

ओंकार: मूल और गंतव्य—(प्रवचन—दूसरा)


दिनांक 22 नवंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार :

1—आपने कहा धर्म साधना है, क्रिया-कांड नहीं। लेकिन जिन्हें सरहपा क्रिया-कांड कहेंगे, उनमें से अनेक, जैसे भजन-कीर्तन, अपने आश्रम में और अन्यत्र भी साधना के अंग बने हैं। कृपापूर्वक समझाएं।

2—क्या उपासना का कोई भी मूल्य नहीं है? और यदि मूल्य है तो फिर विरोध क्यों?

3—सत्य ही कहता हूं, सत्य ही सुनता हूं। इस सत्यपन की आदत से सभी रिश्तेदार व मित्र साथ छोड़ गए हैं। सांसारिक होने के कारण अकेलापन बहुत परेशान करता है। काम ईमानदारी से करने और ईमानदारी से ही जीवन व्यतीत करने में शांति तो मिल रही है, लेकिन बच्चों के लिए ईमानदारी से पैसा कमाने में रात-दिन काम करता रहता हूं और साधना नहीं कर पाता। कृपया मार्ग दिखाएं।

4—ओंकार का आपने विरोध किया, इससे मन को ठेस पहुंची। कृपया समझावें कि ऋषि-मुनियों ने सदा ओंकार का समर्थन क्यों किया है?

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

सहज योग--(प्रवचन--01)

जागो, मन जागरण की बेला—(प्रवचन—पहला)


दिनांक 21 नवंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

सूत्र :
मन्तः मंते स्सन्ति ण होइ।
पड़िल भित्ति कि उट्ठिअ होइ।।1।।

तरुफल दरिसणे णउ अगघाइ।
वेज्ज देक्खि किं रोग पसाइ।।2।।

जाव ण अप्पा जाणिज्जइ ताव ण सिस्स करेइ।
अंधं अंध कढ़ाव तिम वेण वि कूव पड़ेइ।।3।।

सहज--योग--(सरहपा--तिलोपा) --ओशो

सहज योग—(सरहपा—तिलोपा)
ओशो

(सरहपा—तिलोमा वाणी पर आधारित ओशो के बीस अमृत प्रवचन: प्रथम दस प्रवचन सरहपा वाणी पर है, क्रमश: एक प्रवचन सूत्र पर और चार प्रवचन प्रश्‍नोतर; दूसरे दस प्रवचनतिलोपा वाणी पर, क्रमश: एक प्रवचन सूत्र पर और चार प्रवचन प्रश्‍नोत्‍तर। प्रवचन स्‍थल: श्री रजनीश आश्रम पूना। दिनांक 21 नवंबर से 10 दिसंबर 1978 तक।)

 हज योग कहता है: मनुष्‍य अभी जहां है वहींसे परमात्‍मा से जुड़ा है। जरा पहचानने की बात है; जरा गैल पकड़ लेने की बात है। रास्‍ता है; एक अदृष्‍य सेतु हमें जोड़े हुए है। हम सुख जो जानते है, तो फिर महासूख हमसे बहुत दूर नहीं है। विजातीय नहीं है। हम सुख जानते है। तो महासूख भी जान सकते है। हमने बूंद जानी है तो सागर को भी जान सकते है। क्‍योंकि सागर बूंदों का ही जोड़ है। ऐसे ही महासुख सुखों का ही जोड़ है। और क्‍या है? सुख होगी बूंद, महासूख होगा सागर।

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

प्रेम योग–(दि बिलिव्ड-1)–(प्रवचन–03)

लाखों मीलों का अंतराल—(प्रवचन—तीसरा)

दिनांक 23 जून 1976;
श्री ओशो आश्रम पूना।
बाउलगीत:
न कुछ भी हुआ है
और न कुछ भी होगा।
जो जहां है, वह वहां है।
मैं अपने स्वप्न में राजा बन गया
और मेरी प्रजा ने सम्पूर्ण पृथ्वी पर अधिकार जमा लिया।
मैं सिंहासन पर बैठकर शेर की तरह शासन करने लगा।
एक सुखी जीवन जीने लगा।
पूरा संसार मेरी आज्ञा का पालन करने लगा..।
पर जैसे ही मैंने अपने बिस्तरे पर करवट बदली
सब कुछ स्पष्ट हो गया
मैं शेर न होकर शेरका चाचा था
गांव का मूर्ख बैसाखनंदन, एक साधारण गदहा......।

रविवार, 17 अप्रैल 2016

प्रेम योग–(दि बिलिव्ड-1)–(प्रवचन–02)

चाँद की बांहों में—(प्रवचन—दूसरा)

दिनांक 22 जून 1976;
श्री ओशो आश्रम पूना।
प्रश्‍नसार:
प्रथम प्रश्न :
प्यारे ओशो? आपके निकट बने रहने की मेरी हमेशा तीव्र कामना रहती थी लेकिन अब आपको देखते हुए मैं क्यों आश्चर्य और भय से भर जाती हूं।
सा होना ही चाहिए। उस व्यक्ति को बरसते आशीर्वाद का अनुभव करना चाहिए क्योंकि आदरयुक्त भय ही केवल वह गुण है, जो मनुष्य को धार्मिक बना सकता है। केवल वही द्वार है। श्रद्धायुक्त भय, आश्चर्य के द्वारा ही तुम अपने चारों ओर दिव्यता का अनुभव करते हो। जिन आंखों में आदरयुक्त भय और आश्चर्य भरा हो वे परमात्मा को इंकार नहीं कर सकतीं, यह असम्भव है और वे लोग जो श्रद्धा, भय और आश्चर्य में डूबना भूल चुके हैं,

शनिवार, 16 अप्रैल 2016

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--20)

प्रभु की खोज को एक लपट बनाओ—(प्रवचन—बीसवां)

दिनांक 31 मई 1978;
श्री ओशो आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार:
1—सत्संग क्या है? सत्संग की महिमा क्या है?
2—बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफिल कभी ऐसी तो न थी
..............................................................
उनकी आँखों ने खुदा जाने क्या जादू किया
कि तबियत मेरी मायल कभी............
3—कब तक उलझना होगा मुझे इन कीचड़ों में? मुक्ति के द्वार तक ले जाने में मुझे आप सहाय नहीं करेंगे क्या?.........
4—संन्यासी जीवन के लक्षण क्या है? कृपया समझाएँ।
5प्रभु को पाना चाहता हूँ, लेकिन मार्ग में हजार बाधाएँ खडी है। एक पार करते ही दूसरी आ खड़ी होती है। मुझे आदेश दें!

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--19)

रज्‍जब आपा अरपिदे—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)

दिनांक 30 मई 1978;
श्री ओशो आश्रम पूना।
सारसूत्र:
नामरदां भगती नहीं, मरद गये करि त्याग।
रज्जब रिधि क्वाँरी रही, पुरुष—पाणि नहि लाग।।
छाजन भोजन दे भगवंत, अधिक न बाछैं साधू—संत।
रज्जब यह संतोषी चाल, माँगहि नाहिं मुलक औ माल।।
जबलगि तुझमें तू रहै, तबलगि वह रस नाहिं।
रज्जब आपा अरपिदे, तो आवै हरि माहिं।।
करणी कठिन रे बन्दगी, कहनी सब आसान।
जन रज्जब रहणी बिना, कहाँ मिलै रहिमान।।
हाथघडे कूँ पूजता, मोललिये का मान।
रज्जब अघडु अमोल की, खलक खबर नहिं जान।।

गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

संतो मगन भया मन मेरा--(प्रवचन--18)

मैं स्‍वागत हूं—(प्रवचन—अट्ठारहवां)

दिनांक 29 मई 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार:
1—भगवान के सायंकालीन दर्शन के समय धटी एक विशिष्ट घटना पर प्रश्न।
2—बार—बार ऐसा लगने लगा है कि कुछ भी तो नहीं पाना है, कहीं भी तो नहीं जाना है; जीवन है, जीना है। हे सद्गुरु, हे परमगुरु! यह मन का छलावा है या...?
3—तीसरी आजादी के संबंध में कुछ और कहे।
4—यदि दुख है और दुख रहेगा, क्योंकि संसार के होने में ही दुख निहित है, तो यह प्रार्थना—
सर्वे भवन्तु सुखिन
सर्वे सन्तु निरामय
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद् दुखभाग्य भवेत्
क्या मात्र शुभेच्छा है?
5—एक संन्‍यासिनी का आखिरी सवाल?
मैं स्वागत हूँ ?