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मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

माटी कहे कुम्‍हार सूं-(ध्‍यान-साधना)-प्रवचन-12



बारहवां प्रवचन

माटी कहै कुम्हार सूं
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी घटना से मैं आज की चर्चा शुरू करना चाहूंगा। एक काल्पनिक घटना ही मालूम होती है, एक सपने जैसी झूठी, एक किसी कवि ने सपना देखा हो ऐसा ही।
लेकिन जिंदगी भी बहुत सपना है और जिंदगी भी बहुत कल्पना है और जिंदगी भी बहुत झूठ है।
एक बहुत बड़ा मूर्तिकार था। उसकी मूर्तियों की इतनी प्रशंसा थी सारी पृथ्वी पर कि लोग कहते थे कि वह जिस व्यक्ति की मूर्ति बनाता है, अगर उस व्यक्ति को मूर्ति के पास ही श्वास बंद करके खड़ा कर दिया जाए, तो पहचानना मुश्किल है कि कौन मूल है कौन मूर्ति है, कौन असली है कौन नकल है।

माटी कहे कुम्‍हार सूं-(ध्‍यान-साधना)-प्रवचन--11



ग्यारहवां प्रवचन

माटी कहै कुम्हार सूं
मेरे प्रिय आत्मन्!
बीती चर्चाओं के संबंध में बहुत से प्रश्न हैं।

एक मित्र रोज ही पूछ रहे हैं कि व्यवहार के संबंध में कुछ बोलिए। शायद उन्हें प्रतीत होता होगा कि जो मैं बोल रहा हूं वह व्यवहार के संबंध में नहीं है। व्यवहार से लोग न मालूम किस बात को सोचते और समझते हैं। शायद वे सोचते हैं: किस भांति के कपड़े पहने जाएं, किस भांति का खाना खाया जाए, कब सोया जाए, कब उठा जाए, सच बोला जाए या झूठ बोला जाए, ईमानदारी की जाए या बेईमानी की जाए। आचरण की और सारी बातों को वे व्यवहार समझते होंगे। इसलिए मैं रोज बोल रहा हूं लेकिन उनका प्रश्न रोज लौट आता है। वे द्वार पर ही मुझे मिल जाते हैं कि वह व्यवहार के संबंध में आपने अब तक कुछ भी नहीं कहा। तो आज पहले उनके संबंध में ही बात कर लेनी उचित होगी।

माटी कहे कुम्‍हारा सूं-(ध्‍यान-साधन)-प्रवचन-10



दसवां प्रवचन

माटी कहै कुम्हार सूं
प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी कहानी से मैं अपने आज की बात शुरू करना चाहूंगा।
एक नया मंदिर निर्मित हो रहा था, सैकड़ों मजदूर उसे बनाने में लगे थे। नये पत्थर तोड़े जा रहे थे, नई मूर्तियां बनाई जा रही थीं। एक कवि भी भूला-भटका हुआ उस मंदिर के पास से गुजर गया। उसने एक पत्थर तोड़ते मजदूर से पूछा कि मेरे मित्र, क्या कर रहे हो? उस मजदूर ने क्रोध से भरी हुई आंखें ऊपर उठाई, तो उसकी आंखों में जैसे आग जलती हो और उतने ही क्रोध से उसने कहा, क्या तुम अंधे हो? तुम्हें दिखाई नहीं पड़ता कि मैं क्या कर रहा हूं? मैं पत्थर तोड़ रहा हूं। और वापस उसने पत्थर तोड़ना शुरू कर दिया। वह जैसे पत्थर न तोड़ता हो पूरे जीवन से बदला ले रहा हो, वह जैसे पत्थर न तोड़ता हो किसी प्रतिशोध में हो।

माटी कहे कुम्‍हार सूं-(ध्‍यान-साधना)-प्रवचन-09



नौवां प्रवचन

माटी कहै कुम्हार सूं
बीते दो दिनों की चर्चाओं के संबंध में मित्रों ने बहुत से प्रश्न पूछे हैं। उनमें से कुछ पर अभी विचार हो सकेगा।
किसी ने पूछा है: कल मैंने कहा कि आश्चर्य, विस्मय और रहस्य की भावना जितनी तीव्र और गहरी होगी मनुष्य के जीवन में ईश्वर का संपर्क उतना ही ज्यादा हो सकता है। उन्होंने पूछा है, विस्मय का यह भाव कैसे गहरा हो? कैसे तीव्र हो? आश्चर्य की यह दृष्टि कैसे मिले? हम कैसे जीवन को रहस्य की भांति देख सकें?

दोत्तीन बातें इस संबंध में समझ लेनी उपयोगी होंगी।
पहली बात, जीवन तो रहस्य है। यह मत पूछिए कि हम जीवन के रहस्य को कैसे देख सकें? यह पूछिए कि हमने जीवन के रहस्य को कैसे देखना बंद कर दिया है।

माटी कहे कुम्‍हार सूं-(ध्‍यान-साधन)-प्रवचन-08



आठवां प्रवचन

माटी कहै कुम्हार सूं
मेरे प्रिय आत्मन्!
मनुष्य-जाति के, मनुष्य-चेतना के भंडार से कौन सा रत्न खो गया है, अगर मैं यह अपने से पूछता हूं तो मुझे ऐसा नहीं मालूम होता कि नीति खो गई हो, धर्म खो गया हो, दर्शन या फिलासफी खो गई हो। न तो मनुष्य के जीवन से नीति खो गई है, आचरण खो गया है, न धर्म खो गया है, न दर्शन खो गया है। क्योंकि आज से हजारों वर्ष पहले मनुष्य के चित्त की जैसी अनैतिक दशा थी, ठीक वैसी ही दशा आज भी है। लोग सोचते हैं कि शायद पहले के लोग बहुत नैतिक और बहुत आचारवान थे, तो एकदम सौ प्रतिशत गलत सोचते होंगे। अगर बुद्ध और महावीर के समय के लोग नीतिवान और आचारवान रहे हों, तो बुद्ध और महावीर की शिक्षाओं की कोई भी जरूरत नहीं हो सकती थी।

माटी कहे कुम्‍हार सूं-(ध्‍यान-साधना)-प्रवचन-07



सातवां प्रवचन

माटी कहै कुम्हार सूं
मेरे प्रिय आत्मन्!
कल संध्या, सत्य की खोज में साधक के मन की पात्रता कैसी चाहिए, उस संबंध में थोड़ी सी बातें मैंने कही हैं। उन बातों पर कुछ प्रश्न पूछे गए हैं, उनकी हम चर्चा करेंगे।
एक मित्र ने पूछा है कि अतीत को छोड़ देने पर, परंपरा को छोड़ देने के लिए, मेरा इतना आग्रह क्यों है?

एक आदमी हाथ में कंकड़-पत्थर लिए हुए चल रहा हो, उसके हाथ कंकड़-पत्थरों से भरे हों और हमें पता हो कि उसी रास्ते पर तो हीरे-जवाहरात भी मिल सकते हैं और उस आदमी से हम कहें कि तुम अपने हाथ खाली कर लो, कंकड़-पत्थर छोड़ दो।

माटी कहे कुम्‍हार सूं-(ध्‍यान-साधना)-प्रवचन--06



छठवां प्रवचन

माटी कहै कुम्हार सूं
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक सुबह, अभी सूरज निकला ही था; एक बड़ी राजधानी में उस देश के सम्राट का, नगर के बाहर से आगमन हो रहा था। वह अपने घोड़े पर सवार था। रास्ते में उसने देखा--एक गरीब बूढ़ा मजदूर पत्थर की एक बड़ी चट्टान अपने कंधे पर उठाए हुए जा रहा है। सुबह की ठंडी हवाओं में भी उसके माथे से पसीने की बूंदें टपक रही हैं। वह इतना बूढ़ा और कमजोर है कि उसके हाथ कंप रहे हैं, उसके पैर कंप रहे हैं। पत्थर बहुत वजनी है। उस सम्राट ने चिल्ला कर कहा, मजदूर, पत्थर को नीचे गिरा दो! वह पत्थर नीचे गिरा दिया गया।

माटी कहे कुम्‍हार सूं-(ध्‍यान-साधना)-प्रवचन-05



पांचवां प्रवचन
माटी कहै कुम्हार सूं
जीवन क्या है?
मेरे प्रिय आत्मन्!
जीसस से कोई पूछ रहा था कि आपका जन्म कब हुआ? तो जीसस ने जो उत्तर दिया वह बहुत हैरानी का है। यहूदियों का एक बहुत पुराना पैगंबर हुआ है इब्राहिम, जीसस से कोई दो हजार साल पहले। इब्राहिम यहूदियों के इतिहास में पुराने से पुराना नाम है। जीसस ने कहा कि इब्राहिम था, उसके भी पहले मैं था। विश्वास नहीं हुआ होगा सुनने वाले को। क्योंकि विश्वास हमें केवल उसी बात का होता है, जिसका हमें अनुभव हो। बात पहेली ही मालूम पड़ी होगी, क्योंकि इब्राहिम के पहले जीसस के होने की कोई संभावना नहीं मालूम होती। शरीर तो हो ही नहीं सकता, लेकिन जीसस जैसा आदमी व्यर्थ ही झूठ बोले यह भी संभव नहीं है।

माटा कहे कुम्‍हार सूं-(ध्‍यान-साधना)-प्रवचन--04



चौथा प्रवचन

माटी कहै कुम्हार सूं

मेरे प्रिय आत्मन्!
बीती चर्चाओं में जो बहुत सी बातें मैंने आपसे कहीं, उनके संबंध में अनेक प्रश्न आए हैं। कुछ थोड़े से प्रश्नों पर आज की अंतिम रात हम और बात कर सकेंगे।

एक प्रश्न जो बहुत से मित्रों ने पूछा है, बहुत-बहुत रूपों में पूछा है, उसे मैं सबसे पहले ले लूं: उन्होंने पूछा है कि मैं शब्दों, सिद्धांतों और शास्त्रों के विरोध में मालूम पड़ता हूं। क्या परमात्मा की खोज में सिद्धांत और शास्त्र सहयोगी नहीं हैं? क्या वे हमारे और प्रभु के बीच में बाधा बनते हैं?

प्रभु और मनुष्य के बीच में ही नहीं, जीवन के सभी अनुभवों के बीच में शास्त्र और शब्द बाधा बनते हैं। जीवन के किसी भी अनुभव के बीच में, जो हमने सीख रखा है, वह बाधा बनता है। एक फूल के पास आप खड़े हैं। उस फूल के संबंध में आप जो भी जानते हैं--वह किस जाति का फूल है,

माटी कहे कुंम्‍हार सूं-(ध्‍यान-साधन)-प्रवचन--03




तीसरा--प्रवचन
माटी कहै कुम्हार सूं

जिज्ञासा और खोज
बहुत से प्रश्न मेरे सामने आए हैं। सबसे पहले, सुबह मैंने कहा, जो हम नहीं जानते हैं, भलीभांति जानना चाहिए कि हम नहीं जानते हैं। इस संबंध में पूछा है कि हम अपने बच्चों को न बताएं कि ईश्वर है? क्या धर्म के संबंध में उन्हें कुछ भी न कहें? आत्मा के लिए कोई उन्हें विश्वास न दें? ऐसे कुछ प्रश्न पूछे हैं।

जिसे हम नहीं जानते हैं, उसे हम देना भी चाहेंगे, तो क्या दे सकेंगे? और जो हमें ही ज्ञात नहीं है, क्या उस बात की शिक्षा, हमारे संबंध में बच्चे के मन में आदर पैदा करेगी? क्या यह असत्य की शुरुआत न होगी? और क्या असत्य पर भी ईश्वर का ज्ञान कभी खड़ा हो सकता है?

माटी कहे कुम्‍हार सूं-(ध्‍यान-साधना)-प्रवचन--02




 दूसरा--प्रवचन
माटी कहै कुम्हार सूं
(अहंकार है दूरी)
मेरे प्रिय आत्मन्!
कल रात्रि, प्रभु उपलब्धि सरल है, इस संबंध में थोड़ी सी बातें मैंने आपसे कहीं। मनुष्य को परमात्मा से रोक लेने वाली धारणाओं में पहली धारणा यही रही है कि परमात्मा को पाना कठिन है, बहुत कठिन है। मनुष्य के चित्त पर यह दीवाल की भांति खड़ी हो गई--यह धारणा। इस धारणा ने ही जीवन की सरिता को प्रभु के सागर की ओर बहने से रोक लिया। लेकिन यह अकेली ही धारणा नहीं। इस भांति की दीवाल बन जाने में और धारणाएं भी हैं। आज दूसरी धारणा पर आपसे मैं बात करूंगा।

माटी कहै कुम्हार सूं-(ध्‍यान-साधना)-प्रवचन--01



माटी कहै कुम्हार सूं-(ओशो) 
(ध्‍यान-साधना) 
प्रवचन—पहला  

परमात्मा सरल है
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक आश्चर्यजनक दुर्भाग्य मनुष्य-जाति के ऊपर रोज-रोज अपनी काली छाया बढ़ाता गया है। अब तो शायद हमें उस दुर्भाग्य का कोई पता भी नहीं चलता है। जैसे कोई जन्म से ही बीमार पैदा हो तो उसे स्वास्थ्य का कभी कोई पता नहीं चलता। जैसे कोई जन्म से ही अंधा पैदा हो, तो जगत में कहीं प्रकाश भी है, इसका उसे कोई पता नहीं चलता। ऐसे ही हम एक अदभुत अनुभव से जन्म के साथ ही जैसे वंचित हो गए हैं। धीरे-धीरे मनुष्य-जाति को यह खयाल भी भूलता गया है कि वैसा कोई अनुभव है भी। उस अनुभव को इंगित करने वाले सब शब्द झूठे और थोथे मालूम पड़ने लगे हैं।

अमृत की दशा-(ध्‍यान-साधन)- प्रवचन--08



अमृत की दशा-ओशो
प्रवचन—08


वह वस्तुतः जिसे हम जीवन जानते हैं, वह जीवन नहीं है। जिसे हम जीवन मान कर जी लेते हैं और मर भी जाते हैं, वह जीवन नहीं है। बहुत कम सौभाग्यशाली लोग हैं जो जीवन को अनुभव कर पाते हैं। जो जीवन को अनुभव कर लेते हैं, उनकी कोई मृत्यु नहीं है। और जब तक मृत्यु है, मृत्यु का भय है, और जब तक प्रतीत होता है कि मैं समाप्त हो जाऊंगा, मिट जाऊंगा, तब तक जानना कि अभी जीवन का कोई संधान, जीवन का कोई संपर्क, जीवन का कोई अनुभव नहीं उपलब्ध हुआ है।
एक छोटी सी कहानी से आज की चर्चा को मैं प्रारंभ करना चाहूंगा। बहुत बार उस कहानी को देश के कोने-कोने में अनेक-अनेक लोगों से कहा है। फिर भी मेरा मन नहीं भरता और मुझे लगता है उसमें कुछ बात है जो सभी को खयाल में आ जानी चाहिए।

अमृत की दशा-(ध्‍यान-साधन)-प्रवचन--07



अमृत  की  दशा-ओशो

प्रवचन—सातवां

कुछ प्रश्न हैं।

सबसे पहले, पूछा है कि धर्मशास्त्र इत्यादि पाखंड हैं, तो वेद-उपनिषद में जो बातें हैं, वे सत्य माननी चाहिए या नहीं?

शास्त्रों में जो है, उसे ही आप कभी नहीं पढ़ते हैं। शास्त्र में जो है, उसे नहीं; आप जो पढ़ सकते हैं, उसे ही पढ़ते हैं।
इसे थोड़ा समझ लेना जरूरी होगा।
यदि आप गीता को पढ़ते हैं, या उपनिषद को पढ़ते हैं, या बाइबिल को, या किसी और शास्त्र को, तो क्या आप सोचते हैं, जितने लोग पढ़ते हैं वे सब एक ही बात समझते हैं? निश्चित ही जितने लोग पढ़ते हैं, उतनी ही बातें समझते हैं। शास्त्र से जो आप समझते हैं, वह शास्त्र से नहीं, आपकी ही समझ से आता है। स्वाभाविक है। जितनी मेरी समझ है, जो मेरे संस्कार हैं, जो मेरी शिक्षा है, उसके माध्यम से ही मैं समझ सकूंगा।

अमृत की दशा-(ध्‍यान-साधना)-प्रवचन--06




 प्रवचन--छटवां 


कोई मानसिक दासता और गुलामी न हो; कोई बंधे हुए रास्ते, बंधे हुए विचार और चित्त के ऊपर किसी भांति के चौखटे और जकड़न न हों, यह पहली शर्त मैंने कही, सत्य को जिसे खोजना हो उसके लिए। निश्चित ही जो स्वतंत्र नहीं है, वह सत्य को नहीं पा सकेगा। और परतंत्रता हमारी बहुत गहरी है। मैं उस परतंत्रता की बातें नहीं कर रहा हूं, जो राजनैतिक होती है, सामाजिक होती है, या आर्थिक होती है। मैं उस परतंत्रता की बात कर रहा हूं, जो मानसिक होती है। और जो मानसिक रूप से परतंत्र है, वह और चाहे कुछ भी उपलब्ध कर ले, जीवन में आनंद को और कृतार्थता को, आलोक को अनुभव नहीं कर सकेगा। यह मैंने कल कहा।
चित्त की स्वतंत्रता पहली भूमिका है। आज सुबह दूसरी भूमिका पर आपसे कुछ विचार करूं। दूसरी भूमिका है--चित्त की सरलता।
पहली भूमिका है: चित्त की स्वतंत्रता।
दूसरी भूमिका है: चित्त की सरलता।

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

अमृत की दशा-(ध्‍यान-साधन)-प्रवचन--05-ओशो

 प्रवचन--पांचवां 

मैं विचार में हूं--किस संबंध में आपसे बातें करूं। और बातें इतनी ज्यादा हैं और दुनिया इतनी बातों से भरी है कि संकोच होना बहुत स्वाभाविक है। बहुत विचार हैं, बहुत उपदेश हैं, सत्य के संबंध में बहुत से सिद्धांत हैं। यह डर लगता है कि कहीं मेरी बातें भी उस बोझ को और न बढ़ा दें, जो कि मनुष्य के ऊपर वैसे ही काफी है। बहुत संकोच अनुभव होता है। कुछ भी कहते समय डर लगता है कि कहीं वह बात आपके मन में बैठ न जाए। बहुत डर लगता है कि कहीं मेरी बात को आप पकड़ न लें। बहुत डर लगता है कि कहीं वह बात आपको प्रिय न लगने लगे; कहीं वह आपके मन में स्थान न बना ले।
चूंकि मनुष्य विचारों और सिद्धांतों के कारण ही पीड़ित और परेशान है। उपदेशों के कारण ही मनुष्य के जीवन में सत्य का आगमन नहीं हो पाता है। दूसरों के द्वारा कही गई और दी गई बातें ही उस सत्य के बीच में बाधा बन जाती हैं जो हमारे पास है और निरंतर है।

अमृत की दशा-(ध्‍यान-सााधन)-प्रवचन--04-(ओशो)


 प्रवचन--चौथा 
मेरे प्रिय आत्मन्!
मैं अत्यंत आनंदित हूं कि जीवन के संबंध में और उसके परिवर्तन के लिए थोड़ी सी बातें आपसे कह सकूंगा। इसके पहले कि मैं कुछ बातें आपको कहूं, एक छोटी सी कहानी से चर्चा को प्रारंभ करूंगा।
एक बहुत अंधेरी रात में एक अंधा आदमी अपने एक मित्र के घर मिलने गया था। जब वह वापस लौटने लगा, तो रास्ता अंधेरा था और अकेला था। उसके मित्र ने कहा कि मैं एक लालटेन हाथ में दिए देता हूं ताकि रास्ते पर साथ दे।
वह अंधा आदमी बोला, मेरे लिए लालटेन का क्या उपयोग होगा? मेरे लिए तो हाथ में लालटेन हो तो और न हो तो, दोनों हालतों में रास्ता अंधेरा है।

अमृत की दशा-(ध्‍यान-साधन)-प्रवचन--03--(ओशो)

 प्रवचन-तीसरा  
 मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी कहानी से आज की चर्चा प्रारंभ करूंगा।
ऐसी ही एक सुबह की बात है। एक छोटे से झोपड़े में एक फकीर स्त्री का आवास था। सुबह जब सूरज निकलता था और रात समाप्त हो रही थी, तो वह फकीर स्त्री अपने उस झोपड़े के भीतर थी। एक यात्री उस दिन उसके घर मेहमान था। वह भी एक साधु, एक फकीर था। वह झोपड़े के बाहर आया और उसने देखा कि बहुत ही सुंदर प्रभात का जन्म हो रहा है। उसने देखा कि बहुत ही सुंदर प्रभात का जन्म हो रहा है और बहुत ही प्रकाशवान सूर्य उठ रहा है। इतनी सुंदर सुबह थी और पक्षियों का इतना मीठा संगीत था, इतनी शांत और शीतल हवाएं थीं कि उसने भीतर आवाज दी उस फकीर स्त्री को। उस स्त्री का नाम राबिया था। उस साधु ने चिल्ला कर कहा, राबिया, भीतर क्या कर रही हो, बाहर आओ! परमात्मा ने एक बहुत सुंदर सुबह को जन्म दिया है!

अमृत की दशा-(ध्‍यान-साधन)-प्रवचन--02-ओशो

प्रवचन-दूसरा 


 मेरे प्रिय आत्मन्!
आज की संध्या आपके बीच उपस्थित होकर मैं बहुत आनंदित हूं। एक छोटी सी कहानी से आज की चर्चा को मैं प्रारंभ करूंगा।
बहुत वर्ष हुए, एक साधु मरणशय्या पर था। उसकी मृत्यु निकट थी और उसको प्रेम करने वाले लोग उसके पास इकट्ठे हो गए थे। उस साधु की उम्र सौ वर्ष थी और पिछले पचास वर्षों से सैकड़ों लोगों ने उससे प्रार्थना की थी कि उसे जो अनुभव हुए हों, उन्हें वह एक शास्त्र में, एक किताब में लिख दे। हजारों लोगों ने उससे यह निवेदन किया था कि वह अपने आध्यात्मिक अनुभवों को, परमात्मा के संबंध में, सत्य के संबंध में उसे जो प्रतीतियां हुई हों, उन्हें एक ग्रंथ में लिख दे। लेकिन वह हमेशा इनकार करता रहा था। और आज सुबह उसने यह घोषणा की थी कि मैंने वह किताब लिख दी है जिसकी मुझसे हमेशा मांग की गई थी। और आज मैं अपने प्रधान शिष्य को उस किताब को भेंट कर दूंगा।

अमृत की दशा-(ध्‍यान-साधना)-वचन--01-(ओशो)

अमृत की दशा-(ओशो)
(ध्‍यान-साधना)  

प्रवचन-01

एक साधु के आश्रम में एक युवक बहुत समय से रहता था। फिर ऐसा संयोग आया कि युवक को आश्रम से विदा होना पड़ा। रात्रि का समय है, बाहर घना अंधेरा है। युवक ने कहा, रोशनी की कुछ व्यवस्था करने की कृपा करें।
उस साधु ने एक दीया जलाया, उस युवक के हाथ में दीया दिया, उसे सीढ़ियां उतारने के लिए खुद उसके साथ हो लिया। और जब वह सीढ़ियां पार कर चुका और आश्रम का द्वार भी पार कर चुका, तो उस साधु ने कहा कि अब मैं अलग हो जाऊं, क्योंकि इस जीवन के रास्ते पर बहुत दूर तक कोई किसी का साथ नहीं दे सकता है।