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गुरुवार, 26 सितंबर 2013
कठोउपनिषद उपनिषद--प्रवचन-09
आत्म ज्ञान ही प्रत्यक्ष ज्ञान—नौवां प्रवचन
द्वितीय अध्याय—
प्रथम वल्ली :
परांचि खानि व्यतृणत् स्वभंभूस्तस्मात्परांपश्यति नान्तरात्मन्।
कस्विद्धीर: प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्।। 1।।
पराच: कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य याशम्।
अथ धीरा अमृतत्व विदित्वा ध्रुवमधुवेष्विह न प्रार्थयन्ते।। 2।।
येन स्वयं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शान्श्च मैथुनान्।
एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते।। एतद्वै तत्।।3।।
स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति।।4।।
य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात्।
ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते।। एतद्वै तत्।। 5।।
द्वितीय अध्याय—
प्रथम वल्ली :
परांचि खानि व्यतृणत् स्वभंभूस्तस्मात्परांपश्यति नान्तरात्मन्।
कस्विद्धीर: प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्।। 1।।
पराच: कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य याशम्।
अथ धीरा अमृतत्व विदित्वा ध्रुवमधुवेष्विह न प्रार्थयन्ते।। 2।।
येन स्वयं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शान्श्च मैथुनान्।
एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते।। एतद्वै तत्।।3।।
स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति।।4।।
य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात्।
ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते।। एतद्वै तत्।। 5।।
बुधवार, 25 सितंबर 2013
कठोउपनिषद--प्रवचन-08
धर्म का आधार—सूत्र : मौन—आठवां प्रवचन
एषु सर्वेषु भतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्धया सूक्ष्यया सूक्ष्मदर्शिभि:।। 12।।
यच्छेद्वामनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेचान आत्मनि।
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छान्त आत्मनि।। 13।।
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गें पथस्तत्कवयो वदन्ति।। 14।।
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्।
अनाद्यनन्तं महत: परं ध्रुव निचाटय तत्रत्युमुखात् प्रमुच्यते।।15।।
नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तं सनातनम्।
उक्ला श्रत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते।। 16।।
य इमं परमं गुह्य श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि।
प्रयत: श्राद्धकाले वा तदानज्याय कल्पते।
तदानज्याय कल्पते इति।। ।।
एषु सर्वेषु भतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्धया सूक्ष्यया सूक्ष्मदर्शिभि:।। 12।।
यच्छेद्वामनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेचान आत्मनि।
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छान्त आत्मनि।। 13।।
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गें पथस्तत्कवयो वदन्ति।। 14।।
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्।
अनाद्यनन्तं महत: परं ध्रुव निचाटय तत्रत्युमुखात् प्रमुच्यते।।15।।
नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तं सनातनम्।
उक्ला श्रत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते।। 16।।
य इमं परमं गुह्य श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि।
प्रयत: श्राद्धकाले वा तदानज्याय कल्पते।
तदानज्याय कल्पते इति।। ।।
कठोउपनिषद--प्रवचन-07
धर्म का आधार—सूत्र : विवेक—सांतवां प्रवचन
यस्तु विज्ञानवान् भविति युक्तेन मनसा सदा।
तस्येन्द्रियाणि वश्यनि सदश्वा इव सारथे:।।6।।
यस्त्वविज्ञानवान् भवत्यमनस्क: सदाशुचि:।
न स तत्यदमाप्नोति सन्सारं चाधिगच्छति।।7।।
वस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदा शुचि:।
स तु तत्यदमाप्तोति यस्माद् भयो न जायते।। 8।।
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान् नर:।
सोऽध्वनः पारमाप्योति तद्विष्णो: परमं पदम—।। 9।।
इन्द्रियेभ्य परा हर्था अथेंथ्यस्व परं मन:।
मनसस्त? परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान— पर:।। हे भे।।10।।
मंगलवार, 24 सितंबर 2013
कठोउपनिषद--प्रवचन-06
ज्ञान अनंत यात्रा है—छटवां प्रवचन
आसीनो दूर वजति शयानो याति सर्वतः।
कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति।।21।।
अशरीर शरीरेध्वनवस्थेष्यवस्थितम्।
महान विभुमात्मान मत्वा धीरो न शोचति।।22।।
नायामात्मा प्रवचनेन लथ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूंस्वाम्।।23।।
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः।
नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमामुयात्।।24।।
यस्य ब्रह्म च क्षत्र च उभे भवत ओदनः।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः।।25।।
आसीनो दूर वजति शयानो याति सर्वतः।
कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति।।21।।
अशरीर शरीरेध्वनवस्थेष्यवस्थितम्।
महान विभुमात्मान मत्वा धीरो न शोचति।।22।।
नायामात्मा प्रवचनेन लथ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूंस्वाम्।।23।।
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः।
नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमामुयात्।।24।।
यस्य ब्रह्म च क्षत्र च उभे भवत ओदनः।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः।।25।।
कठोउपनिषद--प्रवचन-05
अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्माक्तताकृतात्।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्यश्यसि तद्वद।। 14।।
सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद् वदन्ति।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्।। 15।।
एतद्धधेवाक्षरं ब्रह्म एतद्धधेवाक्षरं परम्।
एदद्धबेवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत्।। 16।।
एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते।। 17।।
न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्।
अजो नित्य: शाश्वतोध्यं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।। 18।।
सोमवार, 23 सितंबर 2013
कठोउपनिषद--प्रवचन-04
न साम्पराय: प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम्।
अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुन: पुनर्वशमापद्यते मे।। 6।।
श्रवणायपि बहुभियों न लभ्य: मृण्वन्तोsपि बहवो यं न विद्य:।
आश्चयों वक्ता कशलोडस्य लआऽऽस्वयों ज्ञाता कशलानशिष्ट:।। 7।।
न नरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिज्यमान:।
अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति अणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात्।। 8।।
नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ।
यां त्वमाप: सत्यमृतिर्बतासि त्वादृक् नो भूयान्नचिकेत: प्रष्टा।। 9।।
जानाम्यहं शेवधिरित्यनित्यं न ह्यधुवै: प्राप्यते हि घ्रुव तत्।
ततो मया नाचिकेतस्वितोऽग्निरनित्यैर्द्रव्यै: प्राप्तवानस्मि नित्यम्।।
10।।
कठोउपनिषद--प्रवचन-03
सन्यास वैराग्य
में हेतु रूपा
: मृत्यु—तीसरा
प्रवचन
द्वितीय
बल्ली :
अन्यत्छेूयोध्न्यदुतैव
प्रेयस्ते
उभे नानाथें
पुरुषं सिनीत:।
तयो: श्रेय
आददानस्य
साधु भवति
हीयतेsर्थाद्य उ
प्रेयो
वृणीते।। 1।।
श्रेयश्च
प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ
सम्परीत्य
विविनक्ति
धीर:।
श्रेयो हि
धीरोऽभि
प्रेयसो
वृणीते
प्रेयो मन्दो
योगक्षेमाद्
वृणीते।। 2।।
स त्वं
प्रियान्
प्रियरूपाक्य
कामानभिध्यायन्नचिकेतोइत्यस्राक्षी:।
नैतान् सृंकां
वित्तमयीमवाप्तो
यस्यां
मंजन्ति बहवो मनुष्य।:।।
3।।
दूरमेते
विपरीते
विषूची
अविद्या या च
विद्येति
ज्ञाता।
विद्याभीप्सिन
नचिकेतसं
मन्ये न त्वा
कामा बहवोऽलोलुपन्त।।4।।
अविद्यायामन्तरे
वर्तमाना:
स्वयं धीरा:
यण्डितम्मन्यमाना:।
दन्द्रम्यमाणा:
परियन्ति
मूढा
अन्धेनैव नीयमाना
यथान्धा:।। 5।।
कठोउपनिषद--प्रवचन-02
येयं
प्रेते
विचिकित्सा
मनुष्येपुस्तीत्येके
नायमस्तीति
चैके।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्लयाहं
वराणामेष वरस्तृतीय:।।20।।
देवैरत्रापि
विचिकित्सित
पुरा न हि सुविज्ञेयभणुरेष
धर्म:।
अन्यं वरं
नचिकेतो
वृणीध्व मा
मोपरोत्सीरति
मा सृजैनम्।।21।।
देवैरत्रापि
विचिकित्सितं
किल त्वं च
मृत्यो यन्न
सुविज्ञेयमात्थ।
वक्ता
चास्य
त्वादृगन्यो
न लभ्यो
नान्यो वरस्तुल्य
एतस्य
करश्चित्।।22।।
शतायुषः
पुत्रपौत्रान्
वृणीप्य बल—पद्य—हस्तिहिरण्यमश्वान्।
भूमेर्महदायतनं
वृणीध्व
स्वयं च जीव
शरदो यावदिच्छसि।।23।।
एतजुल्यं
यदि मन्यसे
वरं वृणीष्य
वित्त चिरजीविका
च।
महाभूमौ
नचिकेतस्लमेधि
कामाना त्वा
कामभाजं
करोमि।।24।।
रविवार, 22 सितंबर 2013
कठोउपनिषद--प्रवचन-01
प्रथम बल्ली
:
ओम उशन् ह वै
वाजश्रवस:
सर्ववेदसं
ददौ।
तस्य ह
नचिकेता नाम
पुत्र आस ।। 1।।
तह कुमार
सन्तं
दक्षिणासु नीयमानासु
श्रद्धाsऽविवेश
सोऽमन्यत।। 2।।
पीतोदका
जग्धतृणा
दुग्धदोहा
निरिन्द्रिया:।
अनन्दा नाम
ते
लोकास्तान् स
गच्छति ता
ददत्।। 3।।
स होवाच
पितरं तत
कस्मै मां
दास्यसीति।
द्वितीयं
तृतीय
तंहोवाच
मृत्यवे त्वा
ददामीति।। 4।।
बलामेमि
प्रथमो
बहूनामेमि
मध्यम:।
किंस्विद्यमस्य
कर्तव्य
यन्यमाद्य
करिष्यति।। 5।।
अनुपश्य
यथा पूर्वे
प्रतिपश्य
तथापरे।
सस्यमिव
मर्त्य:
पच्चते
सस्यमिवाजायते
पुन:।। 6।।
उपनिषद यात्रा -- कठोउपनिषाद
(उपनिषाद यात्रा)-ओशो
उपनिष्द
कठोपनिषद—
आज
हम एक ऐसी यात्रा पर चले है। जो पथ हजारों साल बाद भी उतना ही....साफ सुथरा और रमणीक
है। वैसे तो भारत के अध्यात्म जगत में न जाने कितने हीर-मोती-पन्ने...भरे पड़े
है। न जाने कितने चाँद सितारे जो संत बन कर चमक रहे है। जिनका प्रकाश सदियों से
मनुष्य को पथ दिखाता रहा है....ओर करोड़ो सालों तक दिखाता रहेगा।
लेकिन उन सब में उपनिषद अदुत्य है। बेजोड़ है....जिनका
कोई सानी नहीं है। आज से आप जगमगाते उन उपनिषदों को ओशो के वचनों से जीवित होता
हुआ पाओगे। जो सालों से उन पर पड़ धूल-धमास। हटा को उनका अर्थ हमारे सामने लाये है
मानों वो दोबारा जीवित हो गये है। आज कि यात्रा सुखद तो होगी ही इसके साथ हम आध्यात्मिक
के उन गहरे रहस्यों को भी बार-बार छूते चले जायेंगे।
संभोग से समाधि की और--ओशो (अठहरवां-प्रवचन)
न भोग, न दमन—वरण जागरण—अठहरवां प्रवचन
मेरे
प्रिय आत्मन,
तीन
सूत्रों पर
हमने बात की
है।
जीवन
क्रांति की
दिशा में पहला
सूत्र था- 'सिद्धांतों
से, शास्त्रों
से मुक्ति।'
जो
व्यक्ति किसी
भी तरह के
मानसिक
कारागृह में
बंद है, वह
जीवन ' की
सत्य की, खोज
नहीं कर सकता
है। और वे लोग,
जिनके
हाथों में
जंजीरें है
उतने बड़े
गुलाम नहीं हैं,
जितने वे
लोग, जिनकी
आस्था पर
विचारों की
जंजीरें हैं;
वादों, सिद्धांतों,
संप्रदायों
की जंजीरें
हैं। आदमी की
गुलामी मानसिक
है।
दूसरा
सूत्र था: ' भीड़
से मुक्ति। '
भीड़ की
आंखों में
अपने
प्रतिबिंब से बचिये, पब्लिक
ओपीनियन
से बचिये।
वह दूसरी
जंजीर है।
संभोग से समाधि की ओर--ओशो (सत्तहरवां-प्रवचन)
दमन से मुक्ति—सत्तरवां प्रवचन
मेरे
प्रिय आत्मन
'जीवन
क्रांति के
सूत्र' -इस
परिचर्चा के
तीसरे सूत्र
पर आज चर्चा
करनी है।
पहला
सूत्र था :
सिद्धांत शाख
और वाद से
मुक्ति।
दूसरा
सूत्र था भीड़
से,
समाज
से-दूसरों से
मुक्ति।
और आज
तीसरे सूत्र
पर चर्चा करनी
है। इस तीसरे
सूत्र को
समझने वो लिए
मन का एक
अद्भुत राज समझ
लेना आवश्यक
है। मन की वह
बड़ी अद्भुत
प्रक्रिया है, जो
साधारणत:
पहचान में
नहीं आती।
और वह
प्रक्रिया यह
है कि मन को
जिस ओर से
बचाने की
कोशिश की जाये, मन
उसी ओर जाना
शुरू हो जाता
है; जहां
से मन को
हटाया जाये, मन वहीं
पहुंच जाता है;
जिस तरफ से
पीठ की जाये, मन उसी ओर
उपस्थित हो
जाता है।
'निषेध'
मन के लिए
निमंत्रण है,
'विरोध' मन
के लिए बुलावा
है। और मनुष्य
जाति इस मन को बिना
समझे आज तक
जीने की कोशिश
करती रही है!
शनिवार, 21 सितंबर 2013
संभोग से समाधि की ओर--ओशो (सोलहवां प्रवचन)
भीड़ से, समाज से-दूसरों से मुक्ति—सोलहवां प्रवचन
मेरे प्रिय
आत्मन,
मनुष्य
का जीवन जैसा
हो सकता है, मनुष्य
जीवन में जो
पा सकता है।
मनुष्य जिसे
पाने के लिये
पैदा होता
है-वही उससे
छूट जाता है। वह
उसे नही मिल पाता
है कभी किसी एक
मनुष्य के जीवन
मे-किसी कृष्ण, किसी राम, किसी बुद्ध,
किसी गांधी के
जीवन में सौदर्य
के फूल खिलते
है। और सत्य
की सुगंध फैलती
है। लेकिन, शेष सारी मनुष्यता
ऐसे ही मुरझा जाती
है और नष्ट हो जाती
है।
कौन-सा
दुर्भाग्य है
मनुष्य के
ऊपर...कौन-सी
कठिनाई है?
करोड़ो बीजों
में से अगर एक बीज
में अंकुर आये
और शेष बीज, बीज ही रह कर सड़
जायें और समाप्त
हो जायें, तो
यह कोई सुखद स्थिति
नहीं हो सकती।
और अगर मनुष्य
जाति के पूरे इतिहास
को उठा कर देखें,
तो अंगुलियों
पर गिने जा सकें,
ऐसे थोडे-से
मनुष्य पैदा होते
है, जिनकी कथा
इतिहास में शेष
है। शेष सारी
मनुष्यता की
कोई कथा
इतिहास में
शेष नहीं है!
शेष सारे
मनुष्य बिना
किसी सत्य को जाने,
बिना किसी
सौदर्य को
जाने ही मर जाते
हैं! क्या ऐसे जीवन
को हम जीवन कहें?
संभोग से समाधि की ओर--ओशो (प्रन्द्रहवां प्रवचन)
सिद्धन, शास्त्र और वाद से मुक्ति—पन्द्रंहवां प्रवचन
मेरे
प्रिय आत्मन
अभी-अभी
सूरज निकला।
सूरज के दर्शन
कर रहा था।
देखा आकाश में
दो पक्षी उड़े
जा रहे हैं।
आकाश में न तो
कोई रास्ता है, न
कोई सीमा है, न कोई दीवाल
है, न उड़नेवाले
पक्षियों के
कोई चरण-चिन्ह
बनते हैं।
खुले आकाश में
जिनकी कोई
सीमाएं नहीं,
उन
पक्षियों को
उड़ता देखकर
मेरे मन में
एक सवाल उठा :
क्या आदमी की
आत्मा भी इतने
ही खुले आकाश
में उड़ने की
गण नहीं करती?
क्या आदमी
के प्राण भी
नहीं तड़पते
हैं सारी सीमाओं
के ऊपर उठ
जाने के
लिये-सारे
बंधन तोड़ देने
के लिये? सारी
दीवालों के
पार-वहां, जहां
कोई दीवाल
नहीं; वहां,
जहां कोई
फासले नहीं; वहां, जहां
कोई रास्ते
नहीं; वहां,
जहां कोई
चरण-चिन्ह
नहीं बनते-उस
खुले आकाश में
उठ जाने को
मनुष्य की
आत्मा की भी
क्या प्यास
नहीं है?
उस
खुले आकाश का
नाम है, परमात्मा।
लेकिन अभी तो
पैदा होते ही
बंधनों में
बंधने लगता है।
चाहे पैदा कोई
स्वतंत्र
होता हो, लेकिन
बहुत कम
सौभाग्यशाली
लोग हैं, जो
स्वतंत्र
जीते हैं; और
बहुत कम
सौभाग्यशाली
लोग हैं, जो
स्वतंत्र
होकर मर पाते
हैं। आदमी
पैदा तो
स्वतंत्र
होता है, और
फिर निरंतर
परतंत्र होता
चला जाता है।
किसी आदमी की
आत्मा
परतंत्र न ही
होना चाहती; फिर भी आदमी
परतंत्र होता
चला जाता है!
गुरुवार, 19 सितंबर 2013
संभोग से समाधि की ओर--ओशो ( चौदहवां-प्रवचन)
नारी एक और आयाम—प्रवचन चौदहवां
स्त्री
और पुरुष के
इतिहास में
भेद की, भिन्नता
की, लम्बी
कहानी जुड़ी
हुई है। बहुत
प्रकार के वर्ग
हमने निर्मित
किये हैं।
गरीब का, अमीर
का; धन के
आधार पर, पद
के आधार पर।
और सबसे आश्चर्य
की बात तो यह
है कि हमने स्त्री
पुरुष के बीच
भी वर्गोंका
निर्माण किया है!
शायद हमारे और
सारे वर्ग
जल्दी मिट
जायेंगे, स्त्री
पुरुष के बीच
खड़ी की गयी
दीवाल को
मिटाने में
बहुत समय लग
सकता है। बहुत
कारण हैं।
स्त्री
और पुरुष
भिन्न हैं, यह
तो निशित है, लेकिन असमान
नहीं।
भिन्नता
और असमानता दो
अलग बातें
हैं। भिन्न
होना एक बात
है। सच में एक
आदमी दूसरे
आदमी से भिन्न
है ही। कोई आदमी
समान नहीं
है।। कोई
पुरुष भी समान
नहीं है। स्त्री
और पुरुष भी
भिन्न हैं।
लेकिन
भिन्नता तो
वर्ग बनाना, ऊंचा—नीचा
बनाना, मनुष्य
का पुराना
षड्यंत्र और
शैतानी रही है।
संभोग से समाधि की ओर--ओशो (प्रवचन तैरहवां)
नारी और क्रांति—प्रवचन तैरहवां
मेरे
प्रिय आत्मन
व्यक्तियों
में ही, मनुष्य
में ही सी और
पुरुष नहीं
होते हैं—पशुओं
में भी
पक्षियों में
भी। लेकिन एक
और भी नयी बात
आपसे कहना
चाहता हू :
देशों में भी
सी और पुरुष
देश होते हैं।
भारत
एक सी देश है
और सी देश रहा
है। भारत की
पूरी मनःस्थ्ति
स्त्रैण है।
ठीक उसके उलटे
जर्मनी और
अमेरिका जैसे
देशों को
पुरुष देश कहा
जाता है। भारत
की पूरी आत्मा
नारी है।
इसलिए ही भारत
कभी?
आक्रामक
नहीं हो पाया।
पूरे इतिहास
में आक्रामक
नहीं हो पाया!
इसलिए भारत
में हिंसा का
कोई प्रभाव
पैदा नहीं हो
सका। भारत की
पूरे विचार की
कथा अहिंसा की
कथा है। भारत
के पूरे
इतिहास को
देखने से एक? आश्रर्यजनक
घटना मालूम
पड़ती है।
दुनिया का कोई
भी देश उस
अर्थों में स्त्रैण
नहीं है, जिस
अर्थों में
भारत। यही
भारत का
दुर्भाग्य भी
सिद्ध हुआ।
सारा जगत
पुरुषों का, सारा जगत
पुरुष—वृत्तियों
का, सारा आक्रामक,
सारा जगत
हिंसात्मक भारत
अकेला
आक्रामक नहीं,
हिंसात्मक
नहीं!
बुधवार, 18 सितंबर 2013
संभोग से समाधि की और--ओशो (बाहरवां प्रवचन)
युवा चित्त का जन्म—बाहरवां प्रवचन
मेरे
प्रिय आत्मन
सोरवान
विश्वविद्यालय
की दीवालों पर
जगह—जगह एक
नया ही वाक्य
लिखा हुआ
दिखायी पड़ता
है। जगह—जगह
दीवालों पर, द्वारों
पर लिखा है : ' 'प्रोफेसर्स,
यू आर ओल्ड'
' — अध्यापकगण,
आप बूढ़े हो
गये हैं!
सोरवान
विश्वविद्यालय
की दीवालों पर
जो लिखा है, वह
मनुष्य की
पूरी
संस्कृति, पूरी
सभ्यता की
दीवालों पर
लिखा जा सकता
है। सब कुछ
बूढ़ा हो गया
है, अध्यापक
ही नहीं।
मनुष्य का मन
भी बूढ़ा हो
गया है।
मैंने
सुना है कि
लाओत्से के
संबंध में एक
कहानी है कि
वह बूढ़ा ही
पैदा हुआ है।
यह कहानी कैसे
सच होगी? कहना
मुश्किल है।
सुना नहीं कि
कभी कोई आदमी
बूढ़ा ही पैदा
हुआ हो! शरीर
से तो कभी
नहीं सुना है
कि कोई आदमी
बूढ़ा पैदा हुआ
हो! लेकिन ऐसा
हो सकता है कि मन
से आदमी पैदा
होते ही बूढ़ा
हो जाये।
मंगलवार, 17 सितंबर 2013
संभोग से समाधि कि ओर--ओशो (ग्याहरवां प्रवचन)
युवक कौन—ग्याहरवां प्रवचन
युवकों
के लिए कुछ भी
बोलने के पहले
यह ठीक से समझ
लेना जरूरी है
कि युवक का
अर्थ क्या है?
युवक
का कोई भी
संबंध शरीर की
अवस्था से
नहीं है। उम्र
से युवा है।
उम्र का कोई
भी संबंध नहीं
है। बूढ़े भी
युवा हो सकते
हैं,
और युवा भी
बूढ़ा हो सकते
हैं। लेकिन
ऐसा कभी—कभी
ही होता है कि
बूढ़े युवा हो,
ऐसा अकसर
होता है कि
युवा बूढ़े
होते हैं। और
इस देश में तो
युवक पैदा
होते हैं यह
संदिग्ध बात
है।
युवा
होने का अर्थ
है—चित्त की
एक दशा, चित्त
की एक जीवंत
दशा,
लिविंग स्टेट
ऑफ माइंड। बूढ़े
होने का अर्थ
है—चित्त की
मरी हुई दशा।
संभोग से समाधि की और--ओशो (प्रवचन दसवां)
विद्रोह क्या है—प्रवचन दसवां
हिप्पी
वाद मैं कुछ
कहूं ऐसा
छात्रों ने
अनुरोध किया
है।
इस
संबंध में
पहली बात,
बर्नार्ड शॉ
ने एक किताब
लिखी है: मैक्सिम्प
फॉर ए रेव्होल्यूशनरी,
क्रांतिकारी
के लिए कुछ स्वर्ण-सूत्र।
और उसमें पहला
स्वर्ण बहुत
अद्भुत लिखा
है। और एक ढंग
से पहले स्वर्ण
सूत्र लिखा
है: ‘दि
फार्स्ट
गोल्डन रूल
इज़ दैट देयर
आर नौ गोल्डन
रूल्स’
पहला स्वर्ण
नियम यही है
कि कोई भी स्वर्ण-नियम
नहीं है।
हिप्पी
वाद के संबंध
में जो पहली
बात कहना
चाहूंगा, वह
यह कि हिप्पी
वाद कोई वाद
नहीं है,
समस्त वादों
का विरोध है।
पहली पहले इस ‘वाद’ को
ठीक से समझ
ले।
पाँच
हजार वर्षों
से मनुष्य को
जिस चीज ने
सर्वाधिक
पीड़ित किया
है वह है वाद—वह
चाहे इस्लाम
हो, चाहे
ईसाइयत हो,
चाहे हिन्दू
हो, चाहे
कम्यूनिज़म
हो,
सोशलिज्म हो, फासिस्ट, या
गांधी-इज्म
हो। वादों ने
मनुष्य को
बहुत ज्यादा
पीड़ित किया
है।
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