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सोमवार, 7 जनवरी 2013
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—104 (ओशो)
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—103 (ओशो)
रविवार, 6 जनवरी 2013
02--दसघरा गांव की दस कहानियां--(मनसा-मोहनी)
(दसघरा की दस कहानियां)
भोला ये केवल एक नाम ही नहीं था। ये उस चलते-फिरते हाड़मांस के शरीर मैं उस व्यक्ति के व्यक्तित्व उसकी कोमलता, गरिमा, उसका माधुर्य उसके पोर-पोर से टपकता हुआ पाओगे। आप उसके सान्निध्य में एक अलग ही सुवास को महसूस करोगे। भोला की मनुष्यता, मानसिकता, महिमा या गरिमा उसके दैनिक छोटे बड़े कार्यों में देखी जा सकती थी। उसकी विशालता को मैंने उसके अंतिम चरण में एक बूढ़े होते वृक्ष के रूप में जाना था। उसका क्षीण होता शरीर भी बढ़ते उस अपूर्व सौन्दर्य को कम नहीं कर पर रहा था। परन्तु उसकी सुकोमलता व पारदर्शी स्फटिक गहरी झील में प्रतिबिम्बित दिख रही थे। उसके चेहरा जरूर झुरियां से भर गया था। परंतु अब भी उसमें एक सुकोमल ताजगी, एक जीवंतता साफ दिखाई देती थी। मानो एक विशाल वृक्ष का खुरदरापन और उबड़-खाबड़, रूखा पन भी अपने में एक अद्भुत आकर्षकता लिए हुए हो। जिस तरह से एक वृक्ष का सौन्दर्य केवल उसकी कोमलता ही नहीं बखानती और न जानी जा सकती है। उसकी पूर्णता उसके पल्लव-पल्लव से टपक कर, झूमती लता या इठलाते हुये पत्ते उसके रूप और आकर्षण की कहानी कह रहे थे।
रंग का साँवला, साधारण फूली नाक, परंतु मुंह के हिसाब से कान अधिक बड़े और लंबे थे। उसकी बोलती काली गहरी आँख, सफ़ेद कंधे तक लहराते केश, जो माथे के काफ़ी ऊपर तक काफी कम हो गए थे। उन्हें देख कर ऐसा लगता किसी हिमाच्छादित पर्वत के सौन्दर्य को पूर्णता देने के लिए ही ऐसा हुआ है। कई बार ऐसा भ्रम होता पर्वत की सुंदरता उसकी विशाल ऊंची चोटियों के कारण थी, या उसपर बिखरी शवेत धवलता के कारण गर्वित हो रही थी। कभी आप उसे खेतों में हल चलाते हुए, मंद्र लय से आगे चलते बैल, पीछे चलती बगुलों की कतार, उस समय आपको ऐसा लगेगा जैसे बादलों को कोई धरा पर संग साथ लिए चल रहा हो। और कभी रोंझ की छाँव मैं होंठों पर लगी मुरली से छिटकती तानें सारे वातावरण को मदहोश कर देती थी।
शनिवार, 5 जनवरी 2013
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—102 (ओशो)
गुरुवार, 3 जनवरी 2013
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—101 (ओशो)
यह भी आंतरिक शक्ति पर, आंतरिक बल पर आधारित है। बड़ी बीज रूप विधि है। मानों कि तुम सर्वज्ञा हो, माना कि तुम सर्वशक्तिमान हो। मानो कि तुम सर्वव्यापी हो।सोमवार, 31 दिसंबर 2012
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—100 (ओशो)
यह बड़ी प्यारी
विधि है। तुम
इसे वैसे ही
शुरू कर सकते
हो जैसे तुम
हो; पहले कोई
शर्त पूरी
नहीं करनी है।
बहुत सरल विधि
है: तुम व्यक्तियों
से, वस्तुओं
से, घटनाओं से
घिरे हो—हर
क्षण तुम्हारे
चारों और कुछ
न कुछ है। वस्तुएं
है, घटनाएं है, व्यक्ति
है—लेकिन क्योंकि
तुम सचेत नही
हो, इसलिए तुम
भर नहीं हो।
सब कुछ मौजूद
है लेकिन तुम
गहरी नींद में
सोए हो। वस्तुएं
तुम्हारे
चारों तरफ
मौजूद है,
लोग तुम्हारे
चारों तरफ घूम
रहे है।
घटनाएं तुम्हारे
चारों तरफ घट
रही है। लेकिन
तुम वहां नहीं
हो। या, तुम सोए हुए
हो।रविवार, 30 दिसंबर 2012
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—99 (ओशो)
तंत्र और
योग दोनों
मानते है कि
संकीर्णता ही
समस्या है।
क्योंकि
तुमने स्वयं
को इतना
संकीर्ण कर
लिया है
इसीलिए तुम सदा
ही बंधन अनुभव
करते हो। बंधन
कही और से
नहीं आ रहा
है। बंधन तुम्हारे
संकीर्ण मन से
आ रहा है। और
वह संकीर्ण से
संकीर्णतर
होता चला जाता
है। और तुम
सीमित होते
चले जाते हो।गुरुवार, 27 दिसंबर 2012
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—98 (ओशो)
यह बड़ी सरल
विधि है।
परंतु चमत्कारिक
ढंग से कार्य
करती है। इसे
करके देखो। और
कोई भी कर
सकता है। इसमे
कोई खतरा नहीं
है। पहली बात
तो यह है कि
किसी भी
आरामदेह
मुद्रा में
बैठ जाओ, जो भी
मुद्रा तुम्हारे
लिए आसान हो।
किसी विशेष
मुद्रा या आसन
में बैठने की
कोशिश मत करो।
बुद्ध एक
विशेष मुद्रा
में बैठते है।
वह उनके लिए
आसान है। वह
तुम्हारे
लिए भी आसान
बन सकती है।
अगर कुछ समय
तुम उसका अभ्यास
करो, लेकिन
शुरू-शुरू में
यक तुम्हारे
लिए आसान न
होगी। पर इसका
अभ्यास करने
की कोई जरूरत
नहीं है। किसी
भी ऐसी मुद्रा
से शुरू करो
जो अभी तुम्हारे
लिए आसान हो।
मुद्रा के लिए
संघर्ष मत करो।
तुम आराम से
एक कुर्सी पर
बैठ सकते हो।
बस एक ही बात
का ध्यान
रखना है कि
तुम्हारा
शरीर एक
विश्रांत
अवस्था में
होना चाहिए।बुधवार, 26 दिसंबर 2012
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—97 (ओशो)
यह दूसरी
विधि पहली
विधि से ही
संबंधित है।
आकाश को अपना
ही आनंद-शरीर
समझो। एक
पहाड़ी पर
बैठकर, जब तुम्हारे
चारों और अनंत
आकाश हो, तुम इसे कर
सकते हो।
अनुभव करो कि
समस्त आकाश
तुम्हारे
आनंद-शरीर से
भर गया है।सोमवार, 24 दिसंबर 2012
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—96 (ओशो)
बुधवार, 19 दिसंबर 2012
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—95 (ओशो)
मंगलवार, 18 दिसंबर 2012
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—94 (ओशो)
बुधवार, 12 दिसंबर 2012
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—93 (ओशो)
अपने वर्तमान रूप का कोई भी अंग असीमित रूप से विस्तृत जानो।
सोमवार, 10 दिसंबर 2012
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—92 (ओशो)
तीन बातें। पहली,यदि
ज्ञान महत्वपूर्ण
है तो मस्तिष्क
केंद्र होगा।
यदि बच्चों
जैसी
निर्दोषिता
महत्वपूर्ण
है तो ह्रदय
केंद्र होगा।
बच्चा ह्रदय
में जीता है।
हम मस्तिष्क
में जीते है।
बच्चा अनुभव
करता है। हम
विचार करते
है। जब हम कहते
है कि हम
अनुभव कर रहे
है। तब भी हम
विचार करते
है। कि हम
अनुभव कर रहे
है। सोचना
हमारे लिए
महत्वपूर्ण
हो जाता है।
और अनुभव गौण
हो जाता है। विचार
विज्ञान का
ढंग है। और
अनुभव धर्म
का।गुरुवार, 6 दिसंबर 2012
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—91 (ओशो)
यह
दूसरी विधि
तभी प्रयोग की
जा सकती है,
जब तुमने पहली
विधि पूरी कर
ली है। यह
प्रयोग अलग से
भी किया जा
सकता है।
लेकिन तब यह
बहुत कठिन
होगा। इसलिए
पहली विधि
पूरी करके ही
इसे करना अच्छा
है। और तब यह
विधि बहुत सरल
भी हो जायेगी।मंगलवार, 4 दिसंबर 2012
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—90 (ओशो)
विधि में
प्रवेश के
पहले कुछ
भूमिका की
बातें समझ
लेनी है। पहली
बात कि आँख के
बाबत कुछ
समझना जरूरी
है। क्योंकि
पूरी विधि इस
पर निर्भर
करती है।गुरुवार, 29 नवंबर 2012
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—89 (ओशो)
मंगलवार, 27 नवंबर 2012
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—88 (ओशो)
जब भी तुम
कुछ जानते हो,
तुम उसे ज्ञान
के द्वारा,
जानने के
द्वारा जानते
हो। ज्ञान की
क्षमता के
द्वारा ही कोई
विषय तुम्हारे
मन में
पहुंचता है।
तुम एक फूल को
देखते हो;
तुम जानते हो
कि यह गुलाब
का फूल है।
गुलाब का फूल
बाहर है और
तुम भीतर हो।
तुमसे कोई चीज
गुलाब तक पहुँचती
है। तुमसे कोई
चीज फूल तक
आती है। तुम्हारे
भीतर से कोई
उर्जा गति
करती है।
गुलाब तक आती
है, उसका रूप
रंग और गंध
ग्रहण करती है
और लौट कर तुम्हें
खबर देती है
कि यह गुलाब
का फूल है। सब
ज्ञान, तुम जो भी
जानते हो,
जानने की
क्षमता के
द्वारा तुम पर
प्रकट होता
है। जानना
तुम्हारी
क्षमता है;
सारा ज्ञान
इसी क्षमता के
द्वारा
अर्जित किया
जाता है।सोमवार, 26 नवंबर 2012
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—87 (ओशो)
बुधवार, 21 नवंबर 2012
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—86 (ओशो)
मंगलवार, 13 नवंबर 2012
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—85 (ओशो)
अनासक्ति—संबंधी दूसरी विधि:
‘ना-कुछ का विचार करने से सीमित आत्मा असीम हो जाती है।’
मैं यहीं कह रहा था। अगर तुम्हारे अवधान का कोई विषय नहीं है, कोई लक्ष्य नहीं है, तो तुम कहीं नहीं हो, या तुम सब कहीं हो। और तब तुम स्वतंत्र हो तुम स्वतंत्रता ही हो गए हो।
यह दूसरा सूत्र कहता है: ‘ना कुछ का विचार करने से सीमित आत्मा असीम हो जाती है।’
अगर तुम सोच विचार नहीं कर रहे हो तो तुम असीम हो। विचार तुम्हें सीमा देता है। और सीमाएं अनेक तरह की है। तुम हिंदू हो, यह एक सीमा है। हिंदू होना किसी विचार से, किसी व्यवस्था से, किसी ढंग ढांचे से बंधा होना है। तुम ईसाई हो, यह भी एक सीमा है। धार्मिक आदमी कभी भी हिंदू या ईसाई नहीं हो सकता। और अगर कोई आदमी हिंदू या ईसाई है तो वह धार्मिक नहीं है। असंभव है। क्योंकि ये सब बिचार है। धार्मिक आदमी का अर्थ है कि वह विचार से नहीं बंधा है। वह किसी विचार से सीमित नहीं है। वह किसी व्यवस्था से, किसी ढंग-ढांचे से नहीं बंधा है। वह मन की सीमा में नहीं जीता है—वह असीम में जीता है।
मंगलवार, 6 नवंबर 2012
रविवार, 4 नवंबर 2012
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—84 (ओशो)
मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—83 (ओशो)
(कामना
के पहले और
जानने के पहले
मैं कैसे कह सकता
हूं कि मैं
हूं। विमर्श
करो। सौंदर्य
में विलीन हो
जाओ।)सोमवार, 29 अक्टूबर 2012
विज्ञान भैरव तंत्र विधि—82 (ओशो)
पहली बात
यह है कि
विचार नहीं
करना है, अनुभव करना
है। विचार
करना और अनुभव
करना दो भिन्न-भिन्न
आयाम है। और
हम बुद्धि से
इतनी ग्रस्त
हो गए है कि जब
हम यह भी कहते
है कि हम
अनुभव करते है
तो भी हम
अनुभव नही
करते,सोच-विचार
ही करते है।
तुम्हारा
भाव-पक्ष,
तुम्हारा
ह्रदय-पक्ष, बिलकुल बंद
हो गया है।
मुर्दा हो गया
है। जब तुम
कहते हो कि, ‘मैं
तुम्हें
प्रेम करता
हूं।’ तो
भी वह भाव
नहीं होता,
विचार ही होता
है।












