अध्याय 2 :
सूत्र 2
इस
प्रकार
अस्तित्व और
अनस्तित्व
मिल कर एक-दूसरे
के
भाव
को जन्म देते
हैं; असरल और सरल
एक-दूसरे के
भाव
की
सृष्टि करते
हैं; विस्तार
और संक्षेप
एक-दूसरे की
आकृति
का
निर्माण करते
हैं; उच्चता
और नीचता का
भाव एक-दूसरे
के
विरोध पर
अवलंबित हैं; संगीत
के स्वर और
ध्वनियां
परस्पर
संबद्ध होकर
ही समस्वर
बनती हैं, और
पूर्वगमन
एवं
अनुगमन
से ही क्रम के
भाव की
उत्पत्ति
होती है।
जो
विरोधी है, जो
विपरीत है, वही संगी भी
है, वही
साथी भी। जो
शत्रु है, जो
दुश्मन है, वही मित्र
भी है, वही
सगा भी।
लाओत्से
विरोधी को
विरोधी नहीं
देखता, दूर
को दूर नहीं
मानता, विपरीत
को विपरीत
नहीं।
लाओत्से का
कहना है, सब
दूरियां
निकटता से ही
तौली जाती
हैं। और सब निकटताएं
दूरियों
का ही छोटा
रूप हैं।
शुभ्र रेखा
खींचनी हो, तो अंधेरी, काली पृष्ठभूमि
की जरूरत पड़ती
है।











