कुल पेज दृश्य

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

ताओ उपनिषाद-प्रवचन--006


विपरीत स्वरों का संगीत—प्रवचन—छठवां


अध्याय 2 : सूत्र 2

इस प्रकार अस्तित्व और अनस्तित्व मिल कर एक-दूसरे के
भाव को जन्म देते हैं; असरल और सरल एक-दूसरे के भाव
की सृष्टि करते हैं; विस्तार और संक्षेप एक-दूसरे की आकृति
का निर्माण करते हैं; उच्चता और नीचता का भाव एक-दूसरे
के विरोध पर अवलंबित हैं; संगीत के स्वर और ध्वनियां
परस्पर संबद्ध होकर ही समस्वर बनती हैं, और पूर्वगमन एवं
अनुगमन से ही क्रम के भाव की उत्पत्ति होती है।

जो विरोधी है, जो विपरीत है, वही संगी भी है, वही साथी भी। जो शत्रु है, जो दुश्मन है, वही मित्र भी है, वही सगा भी।
लाओत्से विरोधी को विरोधी नहीं देखता, दूर को दूर नहीं मानता, विपरीत को विपरीत नहीं। लाओत्से का कहना है, सब दूरियां निकटता से ही तौली जाती हैं। और सब निकटताएं दूरियों का ही छोटा रूप हैं। शुभ्र रेखा खींचनी हो, तो अंधेरी, काली पृष्ठभूमि की जरूरत पड़ती है।

तंत्र--सूत्र (भाग-1) प्रवचन--05

अवधान, शिव—नेत्र और आत्‍मोपलब्‍धि–प्रवचन—पांचवां

सूत्र:

5—    भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर कर विचार
को मन के सामने करो। फिर सहस्‍त्रार तक रूप
को श्‍वास—तत्‍व से, प्राण से भरने दो।
वहां वह प्रकाश की तरह बरसेगा।
     
6—    सांसारिक कामों में लगे हुए,
अवधान को दो श्‍वासों के बची टिकाओ।
इस अभ्‍यास से थोड़े ही दिनों में नया जन्‍म होगा।
     
      7—    ललाट के मध्‍य में सूक्ष्‍म श्‍वास, प्राण को टिकाओ।/
जब वह सोन के क्षण में ह्रदय तक पहुंचेगा तब
स्‍वप्‍न और स्‍वयं मृत्‍यु पर अधिकार हो जाएगा।
     
8—    आत्‍यंतिक भक्‍तिपूर्वक श्‍वास के दो संधि—स्‍थलों
पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो।

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--62)

घन बरसे—(प्रवचन—दूसरा)

दिनांक 12 जनवरी, 1977;
श्री ओशो आश्रम, कोरगांवपार्क, पूना।

प्रश्‍नसार:


 पहला प्रश्न :

आप कहते हैं कि समझ पैदा हो जाए तो कुछ भी करने की जरूरत नहीं है। आप जिस समझ की तरफ इशारा करते हैं, क्या वह बुद्धि की समझ से भिन्न है? असली समझ पर कुछ प्रकाश डालने की अनुकंपा करें।

 बुद्धि की समझ तो समझ ही नहीं। बुद्धि की समझ तो समझ का धोखा है। बुद्धि की समझ तो
तरकीब है अपने को नासमझ रखने की। बुद्धि का अर्थ होता है. जो तुम जानते हो उस सबका संग्रह। जाने हुए के माध्यम से अगर सुना तो तुम सुनोगे ही नहीं। जाने हुए के माध्यम से सुना तो तुम ऐसे ही सूरज की तरफ देखे रहे हो, जैसे कोई आंख बंद करके देखे।

सोमवार, 15 सितंबर 2014

तंत्र--सूत्र (भाग--1) प्रवचन--04

मन के धोखों से सावधान—(प्रवचन—चौथा)

     प्रश्‍नसार:

1—ऐसी आसान विधियों से क्‍या ज्ञान—उपलब्‍धि संभव है?

2—काम करते हुए क्‍या श्‍वास—बोध का प्रयोग किया जा सकता है?


प्रश्न :

यह कैसे संभव है कि कोई व्यक्ति बस श्वास— क्रिया के एक विशेष बिंदु पर होश साधर ज्ञान को उयलब्ध जाए? श्वास—प्रश्वास के ऐसे छोटे क्षणिक अंतराल के प्रति सजग होकर अचेतन से मुक्त होना कैसे संभव है?

 यह प्रश्न अर्थपूर्ण है, और यह प्रश्न अनेक के मन में उठा होगा। कई चीजें यहां समझने की हैं। समझा जाता है कि अध्यात्म एक कठिन उपलब्धि है। यह दोनों में कुछ नहीं है, न यह कठिन है और न उपलब्धि ही। तुम जो भी हो तुम आध्यात्मिक ही हो। तुम्हारे अस्तित्व में कुछ जोड़ा जाने को नहीं है; न उससे कुछ हटाया जाने को है।

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--61)

अष्‍टावक्र महागीता—(भाग—5)
ओशो
अष्‍टावक्र के सूत्र ऐसे नहीं है कि पूरा शास्‍त्र समझें तो काम के होंगे। एक सूत्र भी पकड़ लिया तो पर्याप्‍त है। अष्‍टावक्र की सारी चेष्‍टा है: रोशनी। आँख खोलकर देख लो। थोड़े शांत बैठकर देख लो। थोड़े निश्‍चल मन होकर देख लो। कहीं कुछ बंधन नहीं है। वासना नहीं है।.....

 'जीवन तो जैसा है वैसा ही रहेगा। वैसा ही रहना चाहिए। हां, इतना फर्क पड़ेगा... और वही वस्तुत: आमूल क्रांति है। आमूल का मतलब होता है : 'मूल से'।... आमूल क्रांति का अर्थ होता है : जो अब तक सोये—सोये करते थे, अब जाग कर करते हैं। जागने के कारण जो गिर जाएगा, गिर जाएगा; जो बचेगा, बचेगा—लेकिन न अपनी तरफ से कुछ बदलना है, न कुछ गिराना, न कुछ लाना। साक्षी है मूल।

महावीर वाणी-(प्रवचन-05)

अहिंसा : जीवेषणा की मृत्यु—(प्रवचन—पांचवां)

दिनांक 22 अगस्त,1971;
प्रथम पर्युषण व्याख्यानमाला ,
पाटकर हाल, बम्बई

धम्म-सूत्र : १ (अहिंसा)


धम्मो मंगलमुक्किट्ठं,
अहिंसा संजमो तवो।
देवा वि तं नमंसन्ति,
जस्स धम्मे सया मणो ।।

धर्म सर्वश्रेष्ठ मंगल है। (कौन-सा धर्म?) अहिंसा, संयम और तपरूप धर्म। जिस मनुष्य का मन उक्त धर्म में सदा संलग्न रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।


धर्म मंगल है। कौन-सा धर्म? अहिंसा, संयम और तप। अहिंसा धर्म की आत्मा है। कल अहिंसा पर थोड़ी बातें मैंने आपसे कहीं, थोड़े और आयामों से अहिंसा को समझ लेना जरूरी है।
हिंसा पैदा ही क्यों होती है? हिंसा जन्म के साथ ही क्यों जुड़ी है? हिंसा जीवन की पर्त-पर्त पर क्यों फैली है? जिसे हम जीवन कहते हैं, वह हिंसा का ही तो विस्तार है।ऐसा क्यों है?

ताओ उपनिषाद-प्रवचन--005


सापेक्ष विरोधों से मुक्त--सुंदर और शुभ—प्रवचन—पांचवां

अध्याय 2 : सूत्र 1

सापेक्ष विरोधों की उत्पत्ति

जब पृथ्वी के प्राणी सुंदर के सौंदर्य से परिचित होते हैं,
तभी से कुरूप की पहचान शुरू होती है।
और जब वे शुभ से परिचित होते हैं,
तभी उन्हें इस बात का बोध होता है कि अशुभ क्या है।


सौंदर्य से परिचित होते ही, सौंदर्य की प्रतीति होते ही, इस बात की खबर मिलती है कि कुरूप का परिचय हो गया। शुभ का बोध अशुभ के बोध के बिना असंभव है।
लाओत्से ने अपने प्रथम सूत्रों में जो बात कही है, उसे एक नए आयाम से पुनः दोहराया है। लाओत्से यह कह रहा है, जो व्यक्ति सुंदर को अनुभव करता है, वह बिना कुरूप का अनुभव किए सुंदर को अनुभव न कर सकेगा। जिस व्यक्ति के मन में सौंदर्य की प्रतीति होती है,

महावीर वाणी-(प्रवचन-04)

धर्म : स्‍वभाव में होना—(प्रवचन—चौथा)

दिनांक 21 अगस्‍त; 1971
प्रथम पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला, पाटकर हाल बम्‍बई।


धम्म-सूत्र

धम्मो मंगलमुक्किट्ठं,
            अहिंसा संजमो तवो।
देवा वि तं नमंसन्ति,
जस्स धम्मे सया मणो ।।


धर्म सर्वश्रेष्ठ मंगल है। (कौन-सा धर्म?) अहिंसा, संयम और तपरूप धर्म। जिस मनुष्य का मन उक्त धर्म में सदा संलग्न रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।


धर्म सर्वश्रेष्ठ मंगल है -- तो अमंगल क्या है, दुख क्या है, मनुष्य की पीड़ा और संताप क्या है? उसे न समझें तो "धर्म मंगल है, शुभ है, आनंद है'-- इसे भी समझना आसान न होगा। महावीर कहते हैं-- धर्म सर्वश्रेष्ठ मंगल है। जीवन में जो भी आनंद की संभावना है, वह धर्म के द्वार से ही प्रवेश करती है। जीवन में जो भी स्वतंत्रता उपलब्ध होती है वह धर्म के आकाश में ही उपलब्ध होती है।

ताओ उपनिषाद-प्रवचन--004

अज्ञान और ज्ञान के पार--वह रहस्य भरा ताओ—चौथा प्रवचन

अध्याय 1 : सूत्र 4

इन दोनों पक्षों में यह एक ही है; किंतु ज्यों-ज्यों इसकी प्रगति होती है, लोग इसे भिन्न-भिन्न नामों से संबोधित करते हैं। इन नामों के समूह को ही हम रहस्य कहते हैं। जहां रहस्य की सघनता सर्वोपरि हो, वहीं उस सूक्ष्म और चमत्कारी का प्रवेश-द्वार है।

दो के भीतर एक का ही निवास है। जहां-जहां दो दिखाई पड़ता है बुद्धि को, वहां-वहां अस्तित्व तो एक ही है। ऐसा कहें, बुद्धि का देखने का ढंग चीजों को दो में तोड़ लेने का है। जैसे ही बुद्धि किसी चीज को देखने जाती है, वैसे ही दो में तोड़े बिना नहीं रह सकती।

रविवार, 14 सितंबर 2014

महावीर वाणी-(प्रवचन-03)

शराणगति: धर्म का मूल आधार—(प्रवचन—तीसरा)

दिनांक 20 अगस्‍त, 1971;
प्रथम पर्युषण व्‍याख्‍यानमाल, बम्‍बई।

शरणागति—स्प

अरिहते सरण पवज्जामि।
सिद्धे सरण पवज्जामि।
सादू सरण पवज्जामि।
केवलिपन्नत्त धम्म सरण पवज्जामि।

 अरिहंत की शरण स्वीकार करता हूं। सिद्धों की शरण स्वीकार करता हूं। साधुओं की शरण स्वीकार करता हूं। केवली प्ररूपित अर्थात आत्मज्ञ—कथित धर्म की शरण स्वीकार करता हूं।

तंत्र--सूत्र (भाग--1) प्रवचन--03

श्‍वास: शरीर और आत्‍मा के बीच सेतु—(प्रवचन—तीसरा)


सूत्र:

शिव कहते है:

1—हे देवी, यह अनुभव दो श्‍वासों के बीच घटित हो
सकता है। श्‍वास के भीतर आने के पश्‍चात और बहार
लौटन के ठीक पूर्व—श्रेयस है, कल्‍याण है।

2—जब श्‍वास नींचे से ऊपर की और मुड़ती है, और फिर
जब श्‍वास ऊपर से नीचे की और मुड़ती है, इन दो मोड़ों के
द्वारा उपलब्‍ध हो।

3—या जब कभी  अंत:श्‍वास और बहिर्श्‍वास एक—दूसरे
में विलीन होती है। उस क्षण ऊर्जारहित, ऊर्जापूरित
केंद्र को स्‍पर्श करो।

ताओ उपनिषाद-प्रवचन--003


ताओ की निष्काम गहराइयों में—प्रवचन—तीसरा

अध्याय 1 : सूत्र 3

इसलिए यदि जीवन के रहस्य की अतुल गहराइयों
को मापना हो तो निष्काम जीवन
ही उपयोगी है। कामयुक्त मन को
इसकी बाह्य परिधि ही दिखती है।

जिस पथ पर विचरण किया जा सके, वह पथ नहीं; जिस सत्य की निर्वचना हो सके, वह सत्य नहीं।
अनाम है अस्तित्व का जन्मदाता और नाम है वस्तुओं की जननी।
ऐसे दो सूत्रों के बाद लाओत्से का तीसरा सूत्र है: देयरफोर, इसलिए। तो सबसे पहले तो इस इसलिए को समझ लेना जरूरी है, फिर हम सूत्र को समझ पाएंगे। आश्चर्यजनक लगता है एकदम से, क्योंकि पहली दो बातों से तीसरे सूत्र का ऐसा कोई संबंध नहीं है, जिसे देयरफोर से जोड़ा जा सके।
सत्य नहीं कहा जा सकता। ऐसा मार्ग नहीं, जिस पर चला जा सके।

शनिवार, 13 सितंबर 2014

तंत्र--सूत्र (भाग--1) प्रवचन--02

योग और तंत्र; समर्पण और विधि—प्रवचन—दूसरा

प्रश्‍न सार:

1—योग और तंत्र में क्‍या फर्क है?

2—समर्पण की विधि क्‍या है?

3—कैसे कोई विधि रास आती है?

कई प्रश्न हैं।

पहला प्रश्न:

परंपरागत योग और तंत्र में भेद क्या है? क्या वे एक ही चीज हैं?

 तंत्र और योग बुनियादी रूप से भिन्न हैं। यद्यपि दोनों एक ही लक्ष्य पर ले जाते हैं, तो भी उनके रास्ते भिन्न हैं; भिन्न ही नहीं विपरीत हैं।
इसे ठीक से समझ लेना है। योग की प्रक्रिया भी उपायमूलक है। योग भी विधि ही है। योग कोई मीमांसा नहीं है। तंत्र की तरह ही योग भी क्रिया, उपाय, विधि. पर निर्भर है। तंत्र की तरह ही योग में भी कुछ करने से, क्रिया से होना या अस्तित्व उपलब्ध होता है। लेकिन दोनों के ढंग, दोनों की प्रक्रियाएं भिन्न—भिन्न हैं।

तंत्र--सूत्र (भाग--1)--प्रवचन--01

तंत्र—सूत्र (भाग—01)
ओशो

तंत्र विज्ञान है, और वह परमाणु—विज्ञान से भी ज्‍यादा गहन विज्ञान है। परमाणु विज्ञान पदार्थ से संबंधित है; तंत्र तुमसे संबंधित है। और तुम सदा ही किसी भी परमाणु—ऊर्जा से अधिक खतरनाक हो। तंत्र तुमसे, जीवित कोशिका से, स्‍वयं जीवन चेतना से संबंधित है। यही वजह है कि काम या सेक्‍स में तंत्र की इतनी गहरी रूचि है। जो व्‍यक्‍ति जीवन और चेतना में रूचि रखता है। वह अपने काम में दिलचस्‍पी लेगा।
क्‍योंकि काम जीवन का स्‍त्रोत है, प्रेम का स्‍त्रोत है। चेतना का स्‍त्रोत है। चेतना के जगत में जो भी घट रहा है। उसका आधार काम है। और अगर कोई साधक काम में उत्‍सुक नहीं है। वह दार्शनिक हो सकता है वह साधक नहीं है। और दर्शनशास्‍त्र कामोबेश कचरा है। जो व्‍यर्थ की चीजों के संबंध में ऊहापोह करता है।
तंत्र की उत्‍सुकता दर्शन में नहीं है। उसकी उत्‍सुकता वास्‍तविक और अस्‍तित्‍वगत जीवन में है। तंत्र कभी नहीं पूछता है कि क्‍या ईश्‍वर है, क्‍या मोक्ष है। क्‍या स्‍वर्ग—नरक है। तंत्र जीवन के संबंध में बुनियादी प्रश्‍न पूछता है। यही कारण है कि काम या सेक्‍स और प्रेम में उसकी इतनी रूचि है। काम और प्रेम बुनियादी है।

ओशो

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

ताओ उपनिषाद-प्रवचन--002


रहस्यमय परम स्रोत—ताओ—प्रवचन—दूसरा


अध्याय 1 : सूत्र 2

वह अनाम ही पृथ्वी और स्वर्ग का जनक है।
वह नामधारी ही सभी पदार्थों की जननी है।

अस्तित्व है अनाम।
नाम देते ही वस्तु का जन्म होता है।
जब तक नाम नहीं दिया, तब तक प्रत्येक वस्तु असीम अस्तित्व का अंग होती है। जैसे ही नाम दिया, टूट जाती है, अलग और पृथक हो जाती है। नाम पृथकता की सीमा-रेखा है। नाम का अर्थ है पृथक करना। जब तक नाम नहीं दिया, तब तक सब एक है। जैसे ही नाम दिया, चीजें टूट जाती हैं और अलग हो जाती हैं।
लाओत्से कहता है, वह अनाम स्वर्ग और नर्क का जन्मदाता है, मूल स्रोत है। और यह नाम, या नामी समस्त वस्तुओं की जननी है।

ताओ उपनिषाद--प्रवचन--001

ताओ उपनिषाद—(भाग—1)

ओशो

ओशो द्वारा लाओत्‍से के ‘ताओ तेह किंग’ पर दिए गए 127 प्रवचनों में से पहले 22 अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन)

लोओत्‍से की किताब जमीन पर बचने वाली उन थोड़ी सी किताबों में से एक है, जो पूरी तरह शुद्ध है। इसमें कुछ जोड़ा नहीं जा सकता। न जोड़ने का कारण यह है कि जो लाओत्‍से कहता है, लाओत्‍से की हैसियत का व्‍यक्‍ति ही उसमें कुछ जोड़ सकता है। किसी को कुछ जोड़ना हो तो लाओत्‍से होना पड़े। और लाओत्‍से होकर जोड़ने में फिर कोई हर्ज नहीं है।
जिन्‍होंने जाना है—शब्‍दों से नहीं,शास्त्रों से नहीं,वरन जीवन से ही, जीकर—लाओत्‍से उन थोडे से लोगों में से एक है। और जिन्‍होंने केवल जाना ही नहीं है। वरन जानने की भी अथक चेष्‍टा की है—लाओत्‍से उन और भी बहुत थोड़े से लोगों में से एक है।

ओशो

महावीर वाणी-(प्रवचन-02)

मंगल व लोकात्‍तम की भावना—(प्रवचन—दूसरा)

दिनांक 19 अगस्‍त, 1971;
प्रथम पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
पाटकर हाल, बम्‍बई। 

मंगल—भाव—न्त

अरिहता मंगल।
सिद्धा मंगल।
साहू मंगल।
केवलिपन्नत्तो धम्मो मंगल।।
अरिहता लोगुत्तमा।
सिद्धा लोद्यमा।
साहू लोद्यमा।
केवलिपन्नत्तो धम्मो लोद्यमो।।

 अरिहंत मंगल हैं। सिद्ध मंगल हैं। साधु मंगल हैं। केवलीप्ररूपित अर्थात आत्मज्ञकथित धर्म मंगल है। अरिहंत लोकोत्तम हैं। सिद्ध लोकोत्तम हैं। साधु लोकोत्तम हैं। केवलीप्ररूपित अर्थात आत्मशकथित धर्म लोकोत्तम है।

महावीर वाणी--प्रवचन--01


महावीर—वाणी (भाग—1)
ओशो

प्रथम एवं द्वितीय पर्युषण व्‍याख्‍यामाला के अंतर्गत दिनांक 18 अगस्‍त से 4 सितम्‍बर 1971 एवं 4 सितम्‍बर से 12 सितम्बर 1972 तक भगवान श्री द्वारा दिए गए 27 प्रवचनों का संकलन।

जैसे पर्वतों में हिमालय है या शिखरों में गौरीशंकर, वैसे ही व्‍यक्‍तियों में महावीर है। बड़ी है चढ़ाई। जमीन पर खड़े होकर भी गौरीशंकर के हिमाच्‍छादित शिखर को देखा जा सकता है। लेकिन जिन्‍हें चढ़ाई करनी हो और शिखर पर पहुंच कर ही शिखर को देखना हो, उन्‍हें बड़ी तैयारी की जरूरत है। दूर से भी देख सकते है महावीर को, लेकिन दूर से जो परिचय होता है वह वास्‍तिक परिचय नहीं है। महावीर में तो छलांग लगाकर ही वास्‍तविक परिचय पाया जा सकता है।
आदमी जो आज जानता है वह पहली बार जान रहा है, ऐसी भूल में पड़ने का अब कोई कारण नहीं है। आदमी बहुत बार जान लेता है और भूल जाता है। बहुत बार शिखर छू लिए गये है। और खो गये है। सभ्‍यताएं उठती है और विलीन हो जाती है।
महावीर एक बहुत बड़ी संस्‍कृति के अंतिम व्‍यक्‍ति है, जिस संस्‍कृति का विस्‍तार कम से कम दस लाख वर्ष है। महवीर जैन विचार और परंपरा और अंतिम तीर्थंकर है—चौबीसवें। शिखरकी, लहर की आखिरी ऊँचाई और महावीर के बाद वह लहर और वह सभ्‍यता और वह संस्‍कृति सब बिखर गयी। आज उन सूत्रों को समझना इसलिए कठिन है, क्‍योंकि वह पूरा का पूरा मिल्‍यू, वह वातावरण जिसमें वे सूत्र सार्थकथे आज कहीं भी नहीं है।

ओशो