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रविवार, 22 मार्च 2015

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--21)

अहिंसा क्या है?—(प्रवचनइक्किसवां)

'मैं कौन हूं?'
से संकलित क्रांतिसूत्र 1966—67

 मैं अहिंसा पर बहुत विचार करता था। जो कुछ उस संबंध में सुनता था, उससे तृप्ति नहीं होती थी। वे बातें बहुत ऊपरी होती थीं। बुद्धि तो उनसे प्रभावित होती थी, पर अन्त: अछूता रह जाता था। धीरे—धीरे इसका कारण भी दिखा। जिस अहिंसा के संबंध में सुनता था, वह नकारात्मक थी। नकार बुद्धि से ज्यादा गहरे नहीं जा सकता है। जीवन को छूने के लिए कुछ विधायक चाहिए। अहिंसा, हिंसा का छोड़ना ही हो, तो वह जीवनस्पर्शी नहीं हो सकती है। वह किसी का छोड़ना नहीं, किसी की उपलब्धि होनी चाहिए। वह त्याग नहीं, प्राप्ति हो, तभी सार्थक है।

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--20)

जीवन की अदृश्य जड़ें(प्रवचन—बीसवां)

'मैं कौन हूं?'
से संकलित क्रांतिसूत्र 1966—67

 किस संबंध में आपसे बातें करूं—जीवन के संबंध में? शायद यही उचित होगा, क्योंकि जीवित होते हुए भी जीवन से हमारा संबंध नहीं है। यह तथ्य कितना विरोधाभासी है? क्या जीवित होते हुए भी यह हो सकता है कि जीवन से हमारा संबंध न हो? यह हो सकता है! न केवल हो ही सकता है, बल्कि ऐसा ही है। जीवित होते हुए भी, जीवन भूला हुआ है। शायद हम जीने में इतने व्यस्त हैं कि जीवन का विस्मरण ही हो गया है।

वृक्षों को देखता हूं तो विचार आता है कि क्या उन्हें अपनी जड़ों का पता होगा? पर वृक्ष तो वृक्ष हैं, मनुष्य को ही अपनी जड़ों का पता नहीं। जड़ों का ही पता न हो तो जीवन से संबंध कैसे होगा? जीवन तो जड़ों में है—अदृश्य जड़ों में। दृश्य के प्राण अदृश्य में होते हैं। जो दिखाई पड़ता है उसका जीवन स्त्रोत उन मे होता है जो दिखाई नही पड़ता है। दृश्य को अदृश्य धारण किए हुए है। जब तक यह अनुभव न हो तब तक जीवित होते हुए भी जीवन से संबंध नहीं होता है।

महावीर मेरी दृष्‍टी में--(प्रवचन--22)

जागा सो महावीर: सोया सो अमहावीर—(प्रवचन—बाईसवां)

प्रश्न:
अगर मन ही जागरण है, तो इसकी मूर्च्छा का क्या कारण है? यह मूर्च्छा कहां से पैदा हुई?
हावीर से किसी ने पूछा, साधु कौन है?
स्वभावतः अपेक्षा रही होगी कि महावीर साधु की परिभाषा करेंगे। लेकिन महावीर ने जो किया, वह परिभाषा नहीं थी, इशारा था।
उन्होंने कहा, साधु वह है, जो जाग्रत है; और असाधु वह है, जो मूर्च्छित है।
सुत्ता, सो अमुनि: वह जो सोता है, वह असाधु है।
असुत्ता, मुनि: जो नहीं सोता है, जागा हुआ है, वह साधु है।
यह सवाल पूछने जैसा है कि अगर जागृति, चेतना हमारा स्वभाव है, स्वरूप है, तो फिर यह मूर्च्छा कहां से आ गई है?

महावीर मेरी दृष्‍टी में--(प्रवचन--21)

अनेकांत: महावीर का दर्शन-आकाश—(प्रवचन—इक्‍कीसवां)

प्रश्न:
आपने पिछले दिनों भगवान महावीर के संबंध में एकांत वाली बात कही थी। वह क्या रियलाइजेशन जो भगवान महावीर का था--वह भी एकांत ही था? क्या वह संपूर्ण नहीं था? यह मेरा प्रश्न है।

इस संबंध में दो बातें समझनी चाहिए, दो शब्द समझने चाहिए। एक शब्द है दृष्टि और दूसरा शब्द है दर्शन।
दृष्टि होगी एकांगी, सदा ही एकांत होगी, अधूरी होगी, खंड होगी। दृष्टि का मतलब है, एक जगह मैं खड़ा हूं, वहां से जैसा दिखाई पड़ता है। जो दिखाई पड़ता है, वह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। और जिस जगह मैं खड़ा हूं, वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है--कहां से मैं देख रहा हूं! जहां से खड़े होकर मैं देख रहा हूं, वैसा मुझे दिखाई पड़ेगा, वह दृष्टि होगी।

शनिवार, 21 मार्च 2015

गीता दर्शन--(भाग--6) प्रवचन--159

पुरूष में थिरता के चार मार्ग—(प्रवचन—नौवां)

अध्‍याय—13
सूत्र—

ध्यानेनात्‍मनि पश्‍यान्ति केचिदात्‍मानमात्‍मना।
अन्ये सांख्‍येन योगेन कर्मयोगेन चापरे।। 24।।
अन्ये त्वेवमजानन्‍त: श्रुत्‍वान्‍येभ्‍य उपासते।
तउपि चातितरन्‍त्येव मृत्‍यु श्रुतिपरायणा:।। 25।।
यावत्‍संजायते किंचित्‍सत्‍वं स्‍थावरजड्गमम्।
क्षेत्रक्षत्रज्ञसंयोत्‍तद्विद्धि भरतर्षभ।। 26।।

और है अर्जुन उस परम पुरुष को कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्‍म बुद्धि से ध्यान के द्वारा हदय में देखते हैं तथा अन्य कितने ही ज्ञान— योग के द्वारा देखते हैं तथा अन्य कितने ही निष्काम कर्म— योग के द्वारा देखते हैं।
परंतु इनसे दूसरे अर्थात जो मंद बुद्धि वाले पुरूष है, वे स्वयं इस प्रकार न जानते न दूसरों से अर्थात तत्‍व के जानने वाले पुरूषों से सुनकर ही उपासना करते हैं और वे सुनने के यरायण हुए पुरुष भी मृत्‍युरूय संसार— सागर को निस्संदेह तर जाते हैं।
हे अर्जुन यावन्‍मात्र जो कुछ भी स्थावर— जंगम वस्तु उत्पन्‍न होती है, उस संपूर्ण को तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्‍न हुई जान

गीता दर्शन--(भाग--6) प्रवचन--158

गीता में समस्‍त मार्ग है—(प्रवचन—आठवां)

      अध्‍याय—13
सूत्र—

            पुरूष प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजानुाणान्।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्यसु।। 21।।
उपदृष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता म्हेश्वर:।
परमात्‍मेति चाप्‍युक्‍तो देहेउस्‍मिन्‍पुरूष: यर:।। 22।।
य एवं वेत्ति पुरूष प्रकृति च गुणै सह।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते।। 23।।

परंतु प्रकृति में स्थित हुआ ही पुरूष प्रकृति मे उत्पन्न हुए त्रिगुणत्मक सब पदाथों की भोगता है। और इन गुणों का संग ही ड़सके अच्छी— बुरी योनियों में जन्म लेने में कारण है। वास्तव में तो यह पुरूष इस देह में स्थित हुआ भी पर ही है,
केवल साक्षी होने से उपदृष्टा और यथार्थ सम्मति देने वाला होने मे अनुमंता एवं सबको धारण करने वाला होने से भर्ता? जीवरूय से भोक्‍ता तथा बह्मादिकों का भी स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्‍चिदानंदघन होने से परमत्मा, ऐसा कहा गया है।
इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित कृति को जो मनुष्य तत्व से जानता है, वह सब प्रकार से बर्तता हुआ भी फिर नही जन्‍मता है अर्थात पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होता है।

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--19)

समाधि योग(प्रवचनउन्‍नीसवां)

'मैं कौन हूं?'
से संकलित क्रांतिसूत्र 1966—67

 त्य की खोज की दो दिशाएं हैं—एक विचार की, एक दर्शन की। विचार—मार्ग चक्रीय है। उसमें गति तो बहुत होती है, पर गन्तव्य कभी भी नहीं आता। वह दिशा भ्रामक और मिथ्या है। जो उसमें पड़ते हैं, वे मतों में ही उलझकर रह जाते है। मत और सत्य भिन्न बातें है। मत बौद्धिक धारणा है, जबकि सत्य समग्र प्राणों की अनुभूति में बदल जाते हैं। तार्किक हवाओं के रुख पर उनकी स्थिति निर्भर करती है, उनमें कोई थिरता नहीं होती। सत्य परिवर्तित नहीं होता है। उसकी उपलब्धि शाश्वत और सनातन में प्रतिष्ठा देती है।

विचार का मार्ग उधार है। दूसरों के विचारों को ही उसमें निज की सम्पत्ति मानकर चलना होता है। उनके ही ऊहापोह और नये—नये संयोगों को मिलाकर मौलिकता की आत्मवंचना पैदा की जाती है, जबकि विचार कभी भी मौलिक नहीं हो सकते हैं। दर्शन ही मौलिक होता है, क्योंकि उसका जन्म स्वयं की अन्तर्दृष्टि से होता है।

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--18)

जीवन—संपदा का अधिकार—(प्रवचन—अठरहवां)

'मैं कौन हूं?'
से संकलित क्रांतिसूत्र 1966—67

 मैं क्या देखता हूं? देखता हूं कि मनुष्य सोया हुआ है। आप सोए हुए हैं। प्रत्येक मनुष्य सोया हुआ है। रात्रि ही नहीं, दिवस भी निद्रा में ही बीत रहे हैं। निद्रा तो निद्रा ही है, किन्तु यह तथाकथित जागरण भी निद्रा ही है। आंखों के खुल जाने मात्र से नींद नहीं टूटती। उसके लिए तो अंतस का खुलना आवश्यक है। वास्तविक जागरण का द्वार अंतस है। जिसका अंतस सोया हो, वह जाग कर भी जागा हुआ नहीं होता, और जिसका अंतस जागता है वह सोकर भी सोता नहीं है।

जीवन जागरण में है। निद्रा तो मृत्यु का ही रूप है। जागृति का दीया ही हृदय को आलोक से भरता है। निद्रा तो अंधकार है और अंधकार में होना, दुख में, पीडा में, संताप में होना है। स्वयं से पूछें कि आप कहां है? क्या है? यदि संताप में हैं, भय में हैं, दुख और पीड़ा में है तो जानें कि अंधकार में है, जानें कि निद्रा में हैं। इसके पूर्व कि कोई जागने की दिशा में चले, यह जानना आवश्यक है कि वह निद्रा में है। जो यह नहीं जानता, वह जाग भी नहीं सकता है। क्या कारागृह से मुक्त होने की आकांक्षा के जन्म के लिए स्वयं के कारागृह में होने का बोध जरूरी नहीं है?

महावीर मेरी दृष्‍टी में--(प्रवचन--20)

महावीर: परम-स्वातंत्र्य की उदघोषणा—(प्रवचन—बीसवां)

प्रश्न:
कस्तूर भाई ने पूछा है कि महावीर प्राकृत भाषा में क्यों बोले, संस्कृत में क्यों नहीं?
ह प्रश्न सच में गहरा है। संस्कृत कभी भी लोक-भाषा नहीं थी, सदा से पंडित की भाषा है, दार्शनिक की, विचारक की। प्राकृत लोक-भाषा थी--साधारणजन की, अशिक्षित की, अपढ़ की, ग्रामीण की। शब्द भी बड़े अदभुत हैं।
प्राकृत का मतलब है: नेचुरल, स्वाभाविक।
संस्कृत का मतलब है: रिफाइंड, परिष्कृत।
प्राकृत से ही जो परिष्कृत रूप हुए थे, वे संस्कृत बने। प्राकृत मौलिक, मूल भाषा है। संस्कृत उसका परिष्कार है।

महावीर मेरी दृष्‍टी में--(प्रवचन--19)

महावीर: सत्य अनेकांत—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)

 प्रश्न:

भगवान महावीर ने इंद्र को स्पष्ट कहा कि मुझे स्वयं कर्मों से युद्ध करना है, तो भी वह एक देवता को देख-रेख के लिए नियुक्त कर गया! इस घटना में क्या कोई औचित्य है?

समें दो बातें समझने योग्य हैं।
एक तो कर्मों से युद्ध, अज्ञान से युद्ध स्वयं ही करना है। महावीर इस बात की जरा भी तैयारी में नहीं थे कि कोई भी उनके संघर्ष में सहयोगी बने। सहयोगी को बिलकुल ही स्वीकार न करना, बड़े मूल्य की बात है। चाहे स्वयं देवता ही सहयोग के लिए क्यों न कहें, महावीर सहयोग के लिए राजी नहीं हैं। क्योंकि महावीर की दृष्टि यह है कि इस खोज में कोई संगी-साथी नहीं हो सकता है। और इस खोज में जो संगी-साथी के लिए रुकेगा, ठहरेगा; वह खोज से ही वंचित रह जाएगा। यह नितांत अकेले की खोज है।

गुरुवार, 19 मार्च 2015

गीता दर्शन--(भाग--6) प्रवचन--157

पुरूष—प्रकृति—लीला—(प्रवचन—सातवां)

अध्‍याय—13
सूत्र—

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्‍तं समासत:।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्यावायोपयद्यते।। 18।।
प्रकृतिं पुरूषं चैव विद्यनादी उभावपि।
क्किारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्।। 19।।
कार्यकरणकर्तृन्वे हेतु: प्रकृतिरुच्यते।
पुरुष: सुखदुखानां भोक्‍तृत्‍वे हैतुरूच्‍यते।। 20।।

हे अर्जुन, इस प्रकार क्षेत्र तथा ज्ञान अर्थात ज्ञान का साधन और जानने योग्य परमात्मा का स्वरूप संक्षेप से कहा गया, इसको तत्व से जानकर मेरा भक्त मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।
और हे अर्जुन, कृति अर्थात त्रिगुणमयी मेरी माया और पुरुष अर्थात क्षेत्रज्ञ, इन दोनों को ही तू अनादि जान और रागद्वेषदि विकारों को तथा त्रिगुणास्थ्य संपूर्ण यदार्थो को भी प्रकृति से ही उत्पन्न हुए जान।
क्योंकि कार्य और करण के उत्पन्न करने में प्रकृति हेतु कही जाती है और पुरुष सुख— दुखों के भोक्तापन में अर्थात भोगने में हेतु कहा जाता है।

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--17)

शिक्षा का लक्ष्‍य—(प्रवचन—सतरहवां)

 'मैं कौन हूं?'
से संकलित क्रांतिसूत्र

मैं आपकी आंखों में देखता हूं और उनमें घिरे विषाद और निराशा को देखकर मेरा हृदय रोने लगता है। मनुष्य ने स्वयं अपने साथ यह क्या कर लिया है? वह क्या होने की क्षमता लेकर पैदा होता है और क्या होकर समाप्त हो जाता है! जिसकी अन्तरात्मा दिव्यता की ऊंचाइयां छूती, उसे पशुता की घाटियों में भटकते देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी फूलों के पौधे में फूल न लगकर पत्थर लग गए हों और जैसे किसी दीये से प्रकाश की जगह अंधकार निकलता हो।

ऐसा ही हुआ है मनुष्य के साथ। इसके कारण ही हम उस सात्विक प्रफुल्लता का अनुभव नहीं करते हैं जो हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है, और हमारे प्राण तमस के भार से भारी हो गए हैं।
मनुष्य का विषाद, वह जो हो सकता है, उस विकास के अभाव का परिणाम है।

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--16)

जीये और जानें—(प्रवचन—सोलहवां)

'मैं कौन हूं?'
से संकलित क्रांतिसूत्र 1966—67

 मैं मनुष्य को जड़ता में डूबा हुआ देखता हूं। उसका जीवन बिलकुल यांत्रिक बन गया है। गुरजिएफ ने ठीक ही उसके लिए मानव यंत्र का प्रयोग किया है। हम जो भी कर रहे हैं, वह कर नहीं रहे हैं, हमसे हो रहा है। हमारे कर्म सचेतन और सजग नहीं हैं। वे कर्म न होकर केवल प्रतिक्रियाएं हैं।
मनुष्य से प्रेम होता है, क्रोध होता है, वासनाएं प्रवाहित होती हैं। पर ये सब उसके कर्म नहीं हैं, अचेतन और यांत्रिक प्रवाह हैं। वह इन्हें करता नहीं है, ये उससे होते हैं। वह इनका कर्ता नहीं है, वरन उसके द्वारा किया जाना है।

महावीर मेरी दृष्‍टी में--(प्रवचन--18)

वासना-चक्र के बाहर महावीर-छलांग—(प्रवचन—अट्ठारहवां)

प्रश्न:
महावीर के पूर्व-जन्म की स्थिति मोक्ष की स्थिति थी और आपका कहना है कि मोक्ष से लौटना नहीं होता, तो फिर उनका लौटना कृपया स्पष्ट करें।
हायान में एक बहुत मीठी कथा का उल्लेख है। बुद्ध का निर्वाण हुआ, वे मोक्ष के द्वार पर पहुंच गए, द्वारपाल ने द्वार खोल दिया, बुद्ध को कहा: स्वागत है, आप भीतर आएं। लेकिन बुद्ध पीठ करके उस द्वार की तरफ खड़े हो गए और उन्होंने द्वारपाल से कहा, जब तक पृथ्वी पर एक व्यक्ति भी अमुक्त है, तब तक मैं भीतर कैसे आ जाऊं? अशोभन है यह, उचित नहीं मालूम पड़ता। मेरे योग्य नहीं। लोग क्या कहेंगे कि अभी पृथ्वी पर बहुत लोग बंधे थे, बद्ध थे, दुखी थे और बुद्ध आनंद में प्रवेश कर गए! तो मैं रुकूंगा। मैं इस द्वार से अंतिम ही प्रवेश कर सकता हूं।
ऐसी कहानी महायान बौद्धों में है। कहानी ही है, लेकिन अर्थ रखती है। अर्थ यह रखती है कि एक व्यक्ति मुक्त भी हो सकता है; लेकिन मुक्त हो जाना ही मोक्ष में प्रवेश नहीं है। यह बात समझ लेनी चाहिए।

महावीर मेरी दृष्‍टी में--(प्रवचन--17)

महावीर के मौलिक योगदान—(प्रवचन—सत्रहवां) 


प्रश्न:

महावीर के सामने लाखों विरोधी थे, क्या उनके विरोध की चिंता महावीर को नहीं थी? अहिंसक व्यक्ति के भी विरोधी पैदा होना अहिंसा के विषय में संदेह पैदा करता है।

सी धारणा रही है कि जो अहिंसक है, पूर्ण अहिंसक है, उसका कोई विरोधी पैदा नहीं होना चाहिए। क्योंकि जिसके मन में कोई द्वेष, कोई विरोध, कोई घृणा, कोई हिंसा नहीं है उसके प्रति किसी की घृणा, हिंसा, और द्वेष क्यों पैदा हो?
ऊपर से देखे जाने पर यह बात बहुत सीधी और साफ मालूम पड़ती है। लेकिन जीवन ज्यादा जटिल है और जितने सरल सिद्धांत होते हैं, जीवन उतना सरल नहीं है। सच तो यह है कि पूर्ण अहिंसक व्यक्ति के जितने विरोधी पैदा होने की संभावना है, उतने हिंसक के विरोधी पैदा होने की भी संभावना नहीं है। उसके कारण हैं।

बुधवार, 18 मार्च 2015

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--15)

विचार के जन्म के लिए : विचारों से मुक्ति—(प्रवचन—पंद्रहवां)

'मैं कौन हूं?'
से संकलित क्रांतिसूत्र 196667

विचार—शक्ति के संबंध में आप जानना चाहते हैं? निश्‍चय ही विचार से बड़ी और कोई शक्ति नहीं। विचार व्यक्तित्व का प्राण है। उसके केंद्र मर ही जीवन का प्रवाह घूमता है। मनुष्य में वही सब प्रकट होता है, जिसके बीज वह विचार की भूमि में बोता है। विचार की सचेतना ही मनुष्य को अन्य पशुओं से पृथक भी करती है। लेकिन यह स्मरण रहे कि विचारों से घिरे होने और विचार की शक्ति में बड़ा भेद है— भेद ही नहीं, विरोध भी है।

विचारों से जो जितना घिरा होता है, वह विचार करने से उतना ही असमर्थ और अशक्त हो जाता है। विचारों की भीड़ चित्त को अन्ततः विक्षिप्त करती है। विक्षिप्तता विचारों की अराजक भीड़ ही तो है! शायद इसीलिए जगत में जितने विचार बढ़ते जाते हैं, उतनी ही विक्षिप्तता भी अपनी जड़ें जमाती जाती है। विचारों का आच्छादन विचार—शक्ति को ढांक लेता है और निष्‍प्राण कर देता है।

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--14)

मनुष्य का विज्ञान—(प्रवचन—चौदहवां)

'मैं कौन हूं?'
से संकलित क्रांतिसूत्र 1966 — 67

मैं सुनता हूं कि मनुष्य का मार्ग खो गया है। यह सत्य है। मनुष्य का मार्ग उसी दिन खो गया, जिस दिन उसने स्वयं को खोजने से भी ज्यादा मूल्यवान किन्हीं और खोजों को मान लिया।
मनुष्य के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और सार्थक वस्तु मनुष्य के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं। उसकी पहली खोज वह स्वयं ही हो सकता है। खुद को जाने बिना उसका सारा जानना अन्तत: घातक ही होगा।
अज्ञान के हाथों में कोई भी ज्ञान सृजनात्मक नहीं हो सकता, और ज्ञान के हाथों में अज्ञान भी सृजनात्मक हो जाता है।

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--13)

विज्ञान की अग्‍नि में धर्म और विश्वास—(प्रवचन—तेहरवां)

'मैं कौन हूं?'
से संकलित क्रांतिसूत्र 1966 — 67

 मैं स्मरण करता हूं मनुष्य के इतिहास की सबसे पहली घटना को। कहा जाता है कि जब आदम और ईव स्वर्ग के राज्य से बाहर निकाले गए तो आदम ने द्वार से निकलते हुए जो सबसे पहले शब्द ईव से कहे थे, वे थे— 'हम एक बहुत बड़ी क्रांति से गुजर रहे हैं।पता नहीं पहले आदमी ने कभी यह कहा था या नहीं, लेकिन न भी कहा हो तो भी उसके मन में तो ये भाव रहे ही होंगे। एक बिलकुल ही अज्ञात जगत में वह प्रवेश कर रहा था। जो परिचित था वह छूट रहा था, और जो बिलकुल ही परिचित नहीं था, उस अनजाने और अजनबी जगत में उसे जाना पड रहा था। अशांत सागर में नौका खोलते समय ऐसा लगना स्वाभाविक ही है।
ये भाव प्रत्येक युग में आदमी को अनुभव होते रहे हैं, क्योंकि जीवन का विकास तो निरंतर अज्ञात से अज्ञात में ही है।

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--12)

धर्म क्‍या है?—(प्रवचन—बारहवां)

'मैं कौन हूं'
से संकलित क्रांति?सूत्र 1966—67

मैं धर्म पर क्या कहूं? जो कहा जा सकता है, वह धर्म नहीं होगा। जो विचार के परे है, वह वाणी के अंतर्गत नहीं हो सकता है। शास्त्रों में जो हैं, वह धर्म नहीं है। शब्द ही वहां हैं। शब्द सत्य की ओर जाने के भले ही संकेत हों, पर वे सत्य नहीं है। शब्दों से संप्रदाय बनते हैं, और धर्म दूर ही रह जाता है। इन शब्दों ने ही मनुष्य को तोड़ दिया है। मनुष्यों के बीच पत्थरों की नहीं, शब्दों की ही दीवारें हैं।
मनुष्य और मनुष्य के बीच शब्द की दीवारें हैं। मनुष्य और सत्य के बीच भी शब्द की ही दीवार है। असल में जो सत्य से दूर किए हुए है, वही उसे सबसे दूर किए हुए है।

मंगलवार, 17 मार्च 2015

मैं कहता आंखन देखी--(प्रवचन--11)

मैं कौन हूं?—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

मैं कौन हूं?
से संकलित क्रांति—सूत्र
1966—67
 एक रात्रि की बात है। पूर्णिमा थी, मैं नदी तट पर था, अकेला आकाश को देखता था। दूर—दूर तक सन्नाटा था। फिर किसी के पैरो की आहट पीछे सुनाई पड़ी। लौटकर देखा, एक युवा साधु खडे थे। उनसे बैठने को कहा। बैठे, तो देखा कि वे रो रहे है। आंखों से झर—झर आंसू गिर रहे है। उन्हें मैंने निकट ले लिया। थोडी देर तक उनके कन्धे पर हाथ रखे मैं मौन बैठा रहा। न कुछ कहने को था, न कहने की स्थिति ही थी, किन्तु प्रेम से भरे मौन ने उन्हें आश्वस्त किया। ऐसे कितना समय बीता कुछ याद नहीं। फिर अन्तत: उन्होंने कहा, 'मैं ईश्वर के दर्शन करना चाहता हूं। कहिए क्या ईश्वर है या कि मैं मृगतृष्णा में पड़ा हूं।
मैं क्या कहता? उन्हें और निकट ले लिया। प्रेम के अतिरिक्त तो किसी और परमात्मा को मैं जानता नहीं हूं। प्रेम को न खोजकर जो परमात्मा को खोजता है, वह भूल में ही पड़ जाता है।