'मैं कौन हूं?'
से
संकलित
क्रांतिसूत्र
1966—67
मैं
अहिंसा पर
बहुत विचार
करता था। जो
कुछ उस संबंध
में सुनता था, उससे
तृप्ति नहीं
होती थी। वे
बातें बहुत
ऊपरी होती थीं।
बुद्धि तो
उनसे
प्रभावित
होती थी, पर
अन्त: अछूता
रह जाता था।
धीरे—धीरे
इसका कारण भी
दिखा। जिस
अहिंसा के
संबंध में
सुनता था, वह
नकारात्मक थी।
नकार बुद्धि
से ज्यादा
गहरे नहीं जा
सकता है। जीवन
को छूने के
लिए कुछ
विधायक चाहिए।
अहिंसा, हिंसा
का छोड़ना ही
हो, तो वह जीवनस्पर्शी
नहीं हो सकती
है। वह किसी
का छोड़ना नहीं,
किसी की
उपलब्धि होनी
चाहिए। वह
त्याग नहीं, प्राप्ति हो,
तभी सार्थक
है।



