दिनांक 25 सितम्बर सन् 1979;
ओशो आश्रम पूना
सारसूत्र :
संत
संत सब बड़े हैं, पलटू कोउ न छोट।
आतम
दरसी मिहीं है, और चाउर सब मोट।।
पलटू
ऐना संत है, सब देखैं तेहि माहिं।
टेढ़
सोझ मुंह आपना, ऐना टेढ़ा नाहिं।।
पलटू
यहि संसार में, कोऊ नाहीं हीत।
सोऊ
बैरी होत है, जाकौ दीजै प्रीत।।
जो
दिन गया सो जान दे, मूरख अबहूं चेत।
कहता
पलटूदास है, करिले हरि से हेत।।
पलटू
नरत्तन जातु है, सुंदर सुभग सरीर।
सेवा
कीजै साध की, भजि लीजै रघुवीर।।
पलटू
ऐसी प्रीति करूं, ज्यों मजीठ को रंग।
टूक-टूक
कपड़ा उड़ै, रंग न छोड़ै संग।।
आठ
पहर जो छकि रहै, मस्त अपाने हाल।
पलटू
उनसे सब डरैं, वो साहिब के लाल।।
पलटू
सीताराम से, हम तो किए हैं प्रीति।
देखि-देखि
सब जरत हैं, कौन जगत की रीति।।


