दिनांक
28 मई, 1976; श्री
रजनीश आश्रम
पूना।
सारसूत्र:
जे
तुम राम
बुलायल्यौ, तो
रज्जब मिलसी
आय।
जथा
पवन परसगि ते
गुडी गगन कूँ
जाय।।
भला
बुरा जैसा
किया, तैसा
निपज्या जीव।
यह
तुम्हरा
तुमकूँ
मिल्या, तुम
क्यूँ मिते न
पीव।।
जैसे
छाया कूप की, बाहरि
निकसै नाहिं।
जन
रज्जब यूँ
राखिये, मन
मनसा हरि माहि।।
साध, सबूरी
स्वान की, लीजै
करि सुविवेक।
वै
घर बैठचा एक
कै,
तू घर घर
फिरहि अनेक।।
साबुन
सुमिरण जल
सतसंग। सकल
सुकृत करि
निर्मल अंग।।
रज्जब
रज उतरै इहि
रूप। आतम अंबर
होइ अनूप।।


