झुक
आई बदरिया
सावन की, सावन की
मनभावन की।
सावन
में उमग्यो
मेरा मनवा, भनक सुनी
हरि आवन की।
उमड़—घुमड़
चहुं दिस से
आए, दामण दमक
झर लावन की।
नन्हीं—नन्हीं
बुंदिया मेहा
बरसे, सीतल
पवन सुहावन
की।
मीरा
के प्रभु
गिरधर नागर, आनंद मंगल
गावन की।
राणाजी, मैं सांवरे
रंग राची।
सज
सिंगार पद
बांध घुंघरू, लोकलाज तजि
नाची।
गई
कुमति लहि
साधु संगति, भक्ति रूप
भई सांची।
गाय—गाय
हरि के गुण
निसदिन, काल—ब्याल
ते बांची।
उन
बिन सब जग
खारो लागत, और बात सब
कांची।
मीरा
के प्रभु
गिरधर नागर, भक्ति रसीली
जांची।



