अध्याय -17
(समय की गति)
समय की गति मंथर जरूर थी, परंतु वह अपने में एकरसता कुछ मधुरता भी समाई साथ—साथ चल रही थी। दीपावली के गुजर जाने के बाद हवा में थोड़ी ठंडक बढ़ गई थी। दिन के समय तो तेज धूप जो शरीर को ताप दे रही थी। परंतु उस में लेटने से अभी भी बहुत अच्छा महसूस होने लगा था। जो तपीस के साथ—साथ एक अजीब तृप्ति का एहसास शरीर में भर रही थी। जो मेरे शरीर की थकावट के दर्द को भी कम कर रही थी। जैसे—जैसे धूप में ताप कम होता जा रहा था, वह कितनी सुहावनी लगने लग जाती है। पहले जिस धूप में थोड़ी देर भी नहीं लेट—बैठ पाता था, अब मैं उसमें घंटो लेटा रहता था। इसलिए हमारी जाति के प्रत्येक प्राणी को आप जून के महीने में भी धूप में लेटा हुआ देख सकते है। वैसे तो और बहुत प्राणी जो शीतल खून के होते है। जैसे मगरमच्छ या छिपकली उन्हें भी घंटा—आधा घंटा धूप में रहना ही होता है। पर हमारा शरीर तो वैसे ही प्रकृति ने बालों रूपी कंबल से ढका रखा था। भारतीय जाति के हमारे भाई बहन तो कम और छोटे बाल ही लिए होते है। परंतु यूरोप या पहाड़ों के उन कुत्तों को आप देखे जहां पर बहुत बर्फ पड़ती है। उनके बाल कितने बड़े और घने होते है। प्रकृति भी कितनी समझदार है, प्रत्येक प्राणी को उसकी जरूरत के हिसाब से उसे देती है।


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