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रविवार, 22 जुलाई 2012

तंत्र सूत्र--विधि -49 (ओशो)

काम संबंधि दूसरा सूत्र--
‘’ऐसे काम-आलिंगन में जब तुम्‍हारी इंद्रियाँ पत्‍तों की भांति कांपने लगें उस कंपन में प्रवेश
करो।‘’
     जब प्रेमिका या प्रेमी के साथ ऐसे आलिंगन में, ऐसे प्रगाढ़ मिलन में तुम्‍हारी इंद्रियाँ पत्‍तों की तरह कांपने लगें, उस कंपन में प्रवेश कर जाओ।
      तुम भयभीत हो गए हो, संभोग में भी तुम अपने शरीर को अधिक हलचल नहीं करने देते हो। क्‍योंकि अगर शरीर को भरपूर गति करने दिया जाए तो पूरा शरीर इसमें संलग्‍न हो जाता है तुम उसे तभी नियंत्रण में रख सकते हो जब वह काम-केंद्र तक ही सीमित रहता है। तब उस पर मन नियंत्रण कर सकता है। लेकिन जब वह पूरे शरीर में फैल जाता है तब तुम उसे नियंत्रण में नहीं रख सकते हो। तुम कांपने लगोगे। चीखने चिल्‍लाने लगोगे। और जब शरीर मालिक हो जाता है तो फिर तुम्‍हारा नियंत्रण नहीं रहता।

शनिवार, 21 जुलाई 2012

तंत्र सूत्र--विधि -48 (ओशो)

काम संबंधि पहला सूत्र--


      ‘’काम-आलिंगन में आरंभ में उसकी आरंभिक अग्‍नि पर अवधान दो, और ऐसा करते हुए अंत में उसके अंगारे से बचो।‘’
      कई कारणों से काम कृत्‍य गहन परितृप्‍ति बन सकता है और वह तुम्‍हें तुम्‍हारी अखंडता पर, स्‍वभाविक और प्रामाणिक जीवन पर वापस पहुंचा सकता है। उन कारणों को समझना होगा।
      एक कारण यह है कि काम कृत्‍य समग्र कृत्‍य है। इसमें तुम अपने मन से बिलकुल अलग हो जाते हो। छूट जाते हो। यही कारण है कि कामवासना से इतना डर लगता है। तुम्‍हारा तादात्‍म्‍य मन के साथ है और काम अ-मन का कृत्‍य है। उस कृत्‍य में उतरते ही तुम बुद्धि-विहीन हो जाते हो। उसमे बुद्धि काम नहीं करती। उसमे तर्क की जगह नहीं है। कोई मानसिक प्रक्रिया नहीं है। और अगर मानसिक प्रक्रिया चलती है तो काम कृत्‍य सच्‍चा और प्रामाणिक नहीं हो सकता। तब आर्गाज्‍म संभव नहीं है। गहन परितृप्‍ति संभव नहीं है। तब काम-कृत्‍य उथला हो जाता है। मानसिक कृत्‍य हो जाता है। ऐसा ही हो गया है।

बुधवार, 18 जुलाई 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—47 (ओशो)

ध्‍वनि-संबंधी अंतिम विधि:
            ‘’अपने नाम की ध्‍वनि में प्रवेश करो, और उस ध्‍वनि के द्वारा सभी ध्‍वनियों में।‘’
     मंत्र की तरह नाम का उपयोग बहुत आसानी से किया जा सकता है। यह बहुत सहयोगी होगा, क्‍योंकि तुम्‍हारा नाम तुम्‍हारे अचेतन में बहुत गहरे उतर चुका है। दूसरी कोई भी चीज अचेतन की उस गहराई को नहीं छूती है। यहां हम इतने लोग बैठे है। यदि हम सभी सो जाएं और कोई बाहर से आकर राम को आवाज दे तो उस व्‍यक्‍ति के सिवाय जिसका नाम राम है, कोई भी उसे नहीं सुनेगा। राम उसे सुन लेगा। सिर्फ राम की नींद में उससे बाधा पहुँचेगी। दूसरे किसी को भी राम की आवाज सुनाई नहीं देगी।

रविवार, 15 जुलाई 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—46 (ओशो)

  ध्‍वनि-संबंधी दसवीं विधि:

‘’कानों को दबाकर और गुदा को सिकोड़कर बंद करो, और ध्‍वनि में प्रवेश करो।‘’
     हम अपने शरीर से भी परिचित नहीं है। हम नहीं जानते कि शरीर कैसे काम करता है और उकसा ताओ क्‍या है। ढंग क्‍या है। मार्ग क्‍या है। लेकिन अगर तुम निरीक्षण करो तो आसानी से उसे जान सकते हो।
      अगर तुम अपने कानों को बंद कर लो और गुदा को ऊपर की और सिकोड़ो तो तुम्‍हारे लिए सब कुछ ठहर जायेगा। ऐसा लगेगा कि सारा संसार रूक गया। ठहर गया है। गतिविधियां ही नहीं, तुम्‍हें लगेगा कि समय भी ठहर गया है। जब तुम गुदार को ऊपर खींचकर सिकोड़ लेते हो। क्‍या होता है ऐसा? अगर दोनों कान बंद कर लिए जाएं तो बंद कानों से तुम अपने भीतर एक ध्‍वनि सुनोंगे। लेकिन अगर गदा को ऊपर खींचकर नहीं सिकुड़ा जाए तो वह ध्‍वनि गुदा-मार्ग से बहार निकल जाती है। वह ध्‍वनि बहुत सूक्ष्म है। अगर गुदा को ऊपर खींचकर सिकोड़ लिया जाए और कानों को बंद किया जाए तो तुम्‍हारे भीतर एक ध्‍वनि का स्‍तंभ निर्मित होगा।

शनिवार, 14 जुलाई 2012

मिस्‍टर एकहार्ट-रहस्‍य सूत्र—(057)

मिस्‍टर एकहार्ट के रहस्‍य सूत्र—(ओशो की प्रिय पुस्तकें)

एक हार्ट बहुत करीब था। एक कदम और, और संसार का अंत आ जाता—उस पार का लोक खुल जात।
     एक हार्ट जर्मन का सबसे रहस्यपूर्ण और ग़लतफ़हमियों से घिरा रहस्‍यदर्शी है। एक सदी पहले तक जर्मन रोमांटिक आंदोलन के द्वारा मिस्‍टर एकहार्ट को, ‘’एक अर्ध रहस्‍यवादी चरित्र’’  समझा जाता था। न तो उसके जन्‍म की तारीख मालूम थी, न स्‍थान। जर्मनी में किसी कब्र पर उसका नाम दिवस खुदा नहीं था। कुछ छुटपुट तथ्‍यों की जानकारी थी—मसलन वह परेसा में पढ़ा, सन 1402 में डाक्‍टर ऑफ थियॉलॉजी की उपाधि प्राप्‍त की, जर्मनी के स्‍टैसवर्ग शहर में वह उपदेशक था। 1322 में कालोन के एक विद्यापीठ में उसे ससम्‍मान आमंत्रित किया गया। और पीठाधीश बनाया गया। तब तमक एकहार्ट अपने रहस्‍यवाद से ओतप्रोत प्रवचनों के लिए प्रसिद्ध हो चुका था। कालोन के आर्चबिशप को रहस्यवाद से चिढ़ थी। उसे उसमें बगावत की बू नजर आती थी। 1326 में उसने एकहार्ट पर मुकदमा दायर किया। उस पर इलजाम था, वह सामान्‍य जनों में खतरनाक सिद्धांत फैल रहा है।

ओशो) आपको गोली क्‍यों न मार दी जाए?

  ‘’28 अगस्‍त 1968 को जो क्रांति–स्‍वर उठाया था, उसका अलगा चरण प्रारंभ हुआ 28 सितंबर से। ऐतिहासिक गोवालिया टैंक मैदान में, जहां गांधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन की शुरू आत की थी। संयोगवश उसी वर्ष भारत छोड़ो आंदोलन की रजत जयंती के अवसर पर गोवालिया टैंक का नाम बदल कर अगस्‍त कांति मैदान कर दिया गया। उस समय कौन जानता था कि 1968 की अगस्‍त कांति पूरी मनुष्‍यता के इतिहास का ही नया खाका खींचने वाली है।‘’
      ढलते हुए मानसून का मौसम बंबई में बड़ा खूबसूरत होता है, इसलिए चार दिन को ये सभा खुले मैदान में रखने का तय हुआ था। लेकिन 28 सितंबर को सुबह से ही झड़ी लगी हुई थी। आशंका थी कि शायद काफी लोग जो आना चाहते थे वे न आ पाएँ। लेकिन शाम होते-होते बादल भी छंट गये और सभा शुरू होने से काफी पहले ही मैदान भी पूरा भर गया। इधर प्रेस भी अपने पूरे दल-बल समेत मौजूद था। अध्‍यात्‍म से जुड़े एक व्‍यक्‍ति द्वारा सेक्‍स पर चर्चा होगी। यह प्रेस के लिए एक अच्‍छी कहानी का मसाला था। लेकिन शायद इस सभा में उन्‍हें बहुत बार चौंकना था।

मंगलवार, 10 जुलाई 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—45 (ओशो)

ध्‍वनि-संबंधी नौवीं विधि:
            ‘’अ: से अंत होने वाले किसी शब्‍द का उच्‍चार चुपचाप करो। और तब हकार में अनायास सहजता को उपलब्‍ध होओ।‘’
      ‘’अ: से अंत होने वाले किसी शब्‍द का उच्‍चार चुपचाप करो।‘’
कोई भी शब्‍द जिसका अंत अ: से होता है, उसका उच्‍चार चुपचाप करो। शब्‍द के अंत में अ: के होने पर जोर है। क्‍यो? क्‍योंकि जि क्षण तुम अ: का उच्‍चार करते हो, तुम्‍हारी श्‍वास बाहर जाती है। तुमने ख्‍याल नहीं किया होगा। अब ख्‍याल करना कि जब भी तुम्‍हारी श्‍वास बाहर जाती है, तुम ज्‍यादा शांत होते हो। और जब भी श्‍वास भीतर जाती है, तुम ज्‍यादा तनावग्रस्‍त होते हो। कारण यह है कि बाहर जाने वाली श्‍वास मृत्‍यु है। और भीतर आने वाली श्‍वास जीवन है। तनाव जीवन का हिस्‍सा है। मृत्‍यु का नहीं। विश्राम मृत्‍यु का अंग है, मृत्‍यु का अर्थ है पूर्ण विश्राम। जीवन पूर्ण विश्राम नहीं बन सकता। वह असंभव है। जीवन का अर्थ है तनाव, प्रयत्‍न; सिर्फ मृत्‍यु विश्रामपूर्ण है।

रविवार, 8 जुलाई 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—44 (ओशो)

  ध्‍वनि-संबंधी आठवीं विधि:
            ‘’अ और म के बिना ओम ध्‍वनि पर मन को एकाग्र करो।‘’
      ओम ध्‍वनि पर एकाग्र करो; लेकिन इस ओम में म न रहें। तब सिर्फ उ बचता है। यह कठिन विधि है; लेकिन कुछ लोगों के लिए यह योग्‍य पड़ सकती है। खासकर जो लोग ध्‍वनि के साथ काम करते है। संगीतज्ञ, कवि, जिनके काम बहुत संवेदनशील है, उनके लिए यह विधि सहयोगी हो सकती है। लेकिन दूसरों के लिए जिनके कान संवेदनशील नहीं है, यह विधि कठिन पड़ेगी। क्‍योंकि यह बहुत सूक्ष्‍म है।

शनिवार, 7 जुलाई 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—43 (ओशो)

    ध्‍वनि-संबंधी सातवीं विधि:
            ‘’मुंह को थोड़ा-सा खुला रखते हुए मन को जीभ के बीच में स्‍थिर करो। अथवा जब श्‍वास चुपचाप भीतर आए, हकार ध्‍वनि को अनुभव करो।‘’
      मन को शरीर में कहीं भी स्‍थिर किया जा सकता है। सामान्‍यत: हमने उसे सिर में स्‍थिर कर रखा है; लेकिन उसे  कहीं भी स्‍थिर किया जा सकता है। और स्‍थिर करने के स्‍थान के बदलने से तुम्‍हारी गुणवता बदल जाती है। उदाहरण के लिए, पूर्व के कई देशों में, जापान, चीन, कोरिया आदि में परंपरा से सिखाया जाता है कि मन पेट में है। सि में नहीं है। और इस करण उन लोगों के मन के गुण बदल जाते है। जो सोचते है कि मन पेट में है। जो लोग सोचते है कि मन सिर में है। उनके ये गुण नहीं हो सकते।

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—42 (ओशो)

ध्‍वनि-संबंधी छठवीं विधि:
          ‘’किसी ध्‍वनि का उच्‍चार ऐसे करो कि वह सुनाई दे; फिर उस उच्‍चार को मंद से मंदतर किए जाओ—जैसे-जैसे भाव मौन लयबद्धता में लीन होता जाए।‘’
     कोई भी ध्‍वनि काम देगी; लेकिन अगर तुम्‍हारी कोई प्रिय ध्‍वनि हो तो वह बेहतर होगी। क्‍योंकि तुम्‍हारी प्रिय ध्‍वनि मात्र ध्‍वनि नहीं रहती; जब तुम उसका उच्‍चार करते हो तो उसके साथ एक अप्रकट भाव भी उठता है। और फिर धीरे-धीरे वह ध्‍वनि तो विलीन हो जाएगी और भाव भर रह जाएगा।
      ध्‍वनि को भाव की तरह से जाने वाले मार्ग की तरह उपयोग करना चाहिए। ध्‍वनि मन है और भाव ह्रदय है। मन को ह्रदय से मिलने के लिए मार्ग चाहिए। ह्रदय में सीधा प्रवेश कठिन है। हम ह्रदय को इतना भुला दिए है। हम ह्रदय के बिना इतने जन्‍मों से रहते आए है कि हमें पता ही नहीं रहा कि कहां से उसमे प्रवेश करें। द्वार बंद मालूम पड़ता है।

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—41 (ओशो)

  ध्‍वनि-संबंधी पाँचवीं विधि:
     ‘’तार वाले वाद्यों को सुनते हुए उनकी संयुक्‍त केंद्रित ध्‍वनि को सुनो; इस प्रकार सर्वव्‍यापकता को उपलब्‍ध होओ।
     वही चीज।
      ‘’तार वाले वाद्यों को सुनते हुए उनकी संयुक्‍त केंद्रीय ध्‍वनि को सुनो; इस प्रकार सर्वव्‍यापकता को उपलब्‍ध होओ।‘’
      तुम किसी वाद्य को सुन रहे हो—सितार या किसी अनय वाद्य को। उसमें कई स्‍वर है। सजग होकर उसके केंद्रीय स्‍वर को सुनो। उस स्‍वर को जो उसका केंद्र हो और उसके चारों और सभी स्‍वर घूमते हों; उसकी आंतरिक धारा को सुनो, जो अन्‍य सभी स्‍वरों को सम्‍हाले हुए हो। जैसे तुम्‍हारे समूचे शरीर को उसका मेरुदंड, उसकी रीढ़ सम्‍हाले हुए है। वैसे ही संगीत की भी रीढ़ होती है। संगीत को सुनते हुए सजग होकर उसमे प्रवेश करो और उसके मेरुदंड को खोजों—उस केंद्रीय स्‍वर को खोजों जो पूरे संगीत को सम्‍हाले हुए है। स्‍वर तो आते जाते रहते है। लेकिन केंद्रीय तत्‍व प्रवाहमान रहता है। उसके प्रति जागरूक होओ।

बुधवार, 4 जुलाई 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—40 (ओशो)

  ध्‍वनि-संबंधी चौथी विधि:
          ‘’किसी भी अक्षर के उच्‍चारण के आरंभ में और उसके क्रमिक परिष्‍कार में, निर्ध्‍वनि में जागों।‘’
     कभी-कभी गुरूओं ने इस विधि का खूब उपयोग किया है। और उनके अपने नए-नए ढंग है। उदाहरण के लिए, अगर तुम किसी झेन गुरु के झोंपड़े पर जाओ तो वह अचानक एक चीख मारेगा और उससे तुम चौंक उठोगे। लेकिन अगर तुम खोजोंगे तो तुम्‍हें पता चलेगा कि वह तुम्‍हें महज जगाने के लिए ऐसा कर रहा है। कोई भी आकस्मिक बात जगाती है। वह आकस्‍मिकता तुम्‍हारी नींद तोड़ देती है।

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—39 (ओशो)

       ध्‍वनि-संबंधी तीसरी विधि:
          ‘’ओम जैसी किसी ध्‍वनि का मंद-मंद उच्‍चरण करो। जैस-जैसे ध्‍वनि पूर्णध्‍वनि में प्रवेश करती है। वैसे-वैसे तुम भी।‘’
     ‘’ओम जैसी किसी ध्‍वनि का मंद-मंद उच्‍चारण करो।‘’
      उदाहरण के लिए ओम को लो। यह एक आधारभूत ध्‍वनि है। उ, इ और म, ये तीन ध्‍वनियां ओम में सम्‍मिलित है। ये तीनों बुनियादी ध्‍वनियां है। अन्‍य सभी ध्‍वनियां उनसे ही बनी है। उनसे ही नकली है, या उनकी ही यौगिक ध्‍वनियां है। ये तीनों बुनियादी है। जैसे भौतिकी के लिए इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन और प्रोटोन बुनियादी है। इस बात को गहराई से समझना होगा।
      गुरजिएफ ने तीन के नियम की बात की है। वह कहता है कि आत्‍यंतिक अर्थ में अस्‍तित्‍व एक है। आत्‍यंतिक अर्थ में परम अर्थ में एक ही नियम है। लेकिन यह परम है। और जो कुछ हम देखते है वह सापेक्ष है। वह परम नहीं है। वह परम तो सदा प्रच्‍छन्‍न है। छिपा है। हम उसे देख नहीं सकते। क्‍योंकि जैसे ही हमें कुछ दिखाई पड़ता है, वह तीन में विभाजित हो जाता है। वह तीन में, द्रष्‍टा, दृश्‍य और दर्शन में बंट जाता है।

सोमवार, 2 जुलाई 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—38 (ओशो)

ध्‍वनि-संबंधी दूसरी विधि:
          ध्‍वनि के केंद्र में स्‍नान करो, मानो किसी जलप्रपात की अखंड ध्‍वनि में स्‍नान कर रहे हो। या कानों में अंगुलि डालकर नांदों के नाद, अनाहत को सुनो।
     इस  विधि का प्रयोग कई ढंग से क्या जा सकता है। एक ढंग यह है कि कहीं भी बैठकर इसे शुरू कर दो। घ्वनियां तो सदा मौजूद है। चाहे बाजार हो या हिमालय की गुफा, घ्वनियां सब जगह है। चुप होकर बैठ जाओ।
      और ध्‍वनियों के साथ एक बड़ी विशेषता है, एक बड़ी खूबी है। जहां भी, जब भी कोई ध्‍वनि होगी, तुम उसके केंद्र होगे। सभी घ्वनियां तुम्‍हारे पास आती है, चाहे वे कहीं से आएं, किसी दिशा से आएं। आँख के साथ, देखने के साथ यह बात नहीं है। दृष्‍टि रेखाबद्ध है। मैं तुम्‍हें देखता हूं तो मुझसे तुम तक एक रेखा खिंच जाती है। लेकिन ध्‍वनि वर्तुलाकार है; वह रेखाबद्ध नहीं है। सभी घ्वनियां वर्तुल में आती है। और तुम उसके केंद्र हो। समूचे ब्रह्मांड का केंद्र। हरेक ध्‍वनि वर्तुल में तुम्‍हारी तरफ यात्रा कर रही है।

रविवार, 1 जुलाई 2012

क्यों सत्रह साल बाद दाढ़ी-बाल कटवायें?—(स्‍वामी आनंद प्रसाद)

1989 में ओशो से जुड़ने के बाद से ही मुझे लगने लगा कि दाढ़ी-बाल ध्‍यान में विशेष रूप से सहयोगी हो रहा है। जैसे-जैसे आप गहरे जा रहे है, ये आपको अति और अति शांत करती चले जाने में आपकी मदद और सहयोग कर रहे है। एक प्रकार से ध्‍यान के कच्‍चे पौधों के चारो और बागड़ का काम कर रहे थे दाढ़ी बाल। अगर ये इतना आनंद दायी न हो तो इसे रखाना एक तपस्‍या जैसा है। यह बहुत रखरखाव माँगती है। बहुत कठिन कार्य है दाढ़ी-बाल का रखना।    
      समय के साथ-साथ दाढ़ी बाल भी बढ़ते चले गये। जिस समय 1994 में मैंने सन्‍यास लिया उस समय मेरे दाढ़ी-बाल बहुत लंबे हो चुकी थी। नाचते हुए बालों के साथ झूमना, आपके नाच को की बदल देता है। एक बात और है, बाल अंदर से पोले होते है। और इसमे भरी उर्जा उसकी लंबाई के हिसाब से हमारे साथ काफ़ी दिनों तक रहती है।

शनिवार, 30 जून 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—37 (ओशो)

  ध्‍वनि-संबंधी पहली विधि:
     ‘’हे देवी, बोध के मधु-भरे दृष्‍टि पथ में संस्‍कृत वर्णमाला के अक्षरों की कल्‍पना करो—पहले अक्षरों की भांति, फिर सूक्ष्‍मतर ध्‍वनि की भांति, और फिर सूक्ष्‍मतर भाव की भांति। और तब, उन्‍हें छोड़कर मुक्‍त होओ।‘’
      शब्‍द ध्‍वनि है। विचार एक अनुक्रम में, तर्कयुक्‍त अनुक्रम में बंधे, एक खास ढांचे में बंधे शब्‍द है। ध्‍वनि मूलभूत है। ध्‍वनि से शब्‍द बनते है और शब्‍दों से विचार बनते है। और तब विचार से धर्म और दर्शनशास्‍त्र बनता है। सब कुछ बनता है। लेकिन गहराई में ध्‍वनि है।
      यह विधि विपरीत प्रक्रिया का उपयोग करती है।
      शिव कहते है: ‘’हे देवी, बोध के मधु-भरे दृष्टि पथ में संस्‍कृत वर्णमाला के अक्षरों की कल्‍पना करो—पहल अक्षरों की भांति, फिर सूक्ष्‍मतर ध्‍वनि की भांति, फिर सूक्ष्‍म तम भाव की भांति। और जब उन्‍हें छोड़कर मुक्‍त होओ।‘’

शुक्रवार, 29 जून 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—36 (ओशो)

देखने के संबंध में सातवीं ओशो
               ‘’किसी विषय को देखो, फिर धीरे-धीरे उससे अपनी दृष्‍टि हटा लो, और फिर धीरे-धीरे उससे अपने विचार हटा लो। तब।‘’
      ‘’किसी विषय को देखो..........।‘’
      किसी फूल को देखो। लेकिन याद रहे कि इस देखने का अर्थ क्‍या है। केवल देखो, विचार मत करो। मुझे यह बार-बार कहने की जरूरत नहीं है। तुम सदा स्‍मरण रखो कि देखने का देखना भर है; विचार मत करो। अगर तुम सोचते हो तो वह देखना नहीं है; तब तुमने सब कुछ दूषित कर दिया। यह शुद्ध देखना है महज देखना।
      ‘’किसी विषय को देखा.......।‘’
      किसी फूल को देखो। गुलाब को देखा।
      ‘’फिर धीरे-धीरे उससे अपनी दृष्‍टि हटा लो।‘’

गुरुवार, 28 जून 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—35 (ओशो)

देखने के संबंध में छट्टी ओशो
            ‘’किसी गहरे कुएं के किनारे खड़े होकर उसकी गहराइयों में निरंतर देखते रहो—जब तक विस्‍मय-विमुग्‍ध न हो जाओ।‘’    
       ये विधियां थोड़े से फर्क के साथ एक जैसी है।
       ‘’किसी गहरे कुएं के किनारे खड़े होकर उसकी गहराईयों में निरंतर देखते रहो—जब तक विस्‍मय-विमुग्‍ध न हो जाओ।‘’
       किसी गहरे कुएं में देखो; कुआं तुममें प्रतिबिंबित हो जाएगा। सोचना बिलकुल भूल जाओ; सोचना बिलकुल बंद कर दो; सिर्फ गहराई में देखते रहो। अब वे कहते है कि कुएं की भांति मन की भी गहराई है। अब पश्‍चिम में वे गहराई का मनोविज्ञान विकसित कर रहे है। वे कहते है कि मन कोई सतह पर ही नहीं है। वह उसका आरंभ भर है। उसकी गहराइयां है, अनेक गहराइयां है, छिपी गहराइयां है।

पागल और कुत्‍ता संबंध—एक विवेचन

पिछले दिनों हमारा पालतू कुत्ता जब 16 साल की आयु पा कर मरा। उसका तिल-तिल मोत के करीब जाते शरीर को मैने बहुत नजदीक से देखा, हिलती गर्दन, धुँधली हुई आंखे। रात को जब वह उठ कर सोच आदि के लिए अपने बिस्‍तरे से बहार आता। उन शरद रातों में भी वह बिस्‍तरे में शोच आदि नहीं करता था। और मनुष्‍य की मृत्‍यु....महीनों बिस्‍तर में गंद मचा-कर मरता है। और उस सुबह कितनी सहजता से उसका मरना। मरने से आधा घंटे पहले जब मैं उससे मिलने गया। तब न जाने उसने कोन सी भाषा में मुझ से कुछ कहना चाहा, न तो वो उसकी भाषा था। और न हमारी। ऊँ....ऊँ......ओ...ओ.....अई.....ई......करके करीब 15 मिनट तक मुझे कुछ कहता रहा। मैं उसके सर और गर्दन पर प्‍यास से हाथ फेरता रहा। उसने अपनी आंखें बंद कर ली। मुझे नहीं पता था कि वह अपनी आखरी विदाई मुझे ले रहा है। लेकिन इतना जरूरत जानता हूं उसकी मृत्‍यु में ऐ विभेद था। वह किसी कुत्‍ते की मोत नहीं मरा था। उसमें एक होश था, जागरण था, उसे समझ थी कि मुझ अपने रहने के स्‍थान को गंदा नहीं करना। उसका मन काम कर रहा था। और मुझे विश्‍वास ही नहीं यकीन है कि उसकी चेतना ने विकास किया है। और वह अपनी योनि से उच्‍च योनि में गति कर गया। और संभावना है, वह मनुष्‍य के संग साथ रहा है। उसमें मन का विकास हो गया था, वह चाह कर खाना खाता था, उसकी अपनी पंसद ना पसंद थी। वह रूठना मनना जानता था। वह प्‍यार और उसका इजहार कर सकता था।

बुधवार, 27 जून 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—34 (ओशो)

देखने के संबंध में पांचवी विधि:
     ‘’जब परम रहस्‍यमय उपदेश दिया जा रहा हो, उसे श्रवण करो। अविचल, अपलक आंखों से; अविलंब परम मुक्‍ति को उपलब्‍ध होओ।‘’
     ‘’जब परम रहस्‍यम उपदेश दिया जा रहा हो। उसे श्रवण करो।‘’
      यह एक गुह्म विधि है। इस गुह्म तंत्र में गुरु तुम्‍हें अपना उपदेश या मंत्र गुप्‍त ढंग से देता है। जब शिष्‍य तैयार होता है तब गुरु उसे उसकी निजता में वक परम रहस्‍य या मंत्र संप्रेषित करता है। वह उसके कान में चुपचाप कह दिया जाएगा। फुसफुसा दिया जाएगा। यह विधि उस फुसफुसाहट से संबंध रखती है।
      ‘’जब परम रहस्‍यमय उपदेश दिया जा रहा हो, उसे श्रवण करो।‘’

मंगलवार, 26 जून 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—33 (ओशो)

देखने के संबंध में चौथी विधि:
‘’बादलों के पार नीलाकाश को देखने से शांति को सौम्‍यता को उपलब्‍ध होओ।‘’    मैंने इतनी बातें इसलिए बताई कि ये विधियां बहुत सरल है। और उन्‍हें प्रयोग करके भी तुम्‍हें कुछ नहीं मिलेगा। और तब तुम कहोगे, ये किस ढंग की विधियां है। तुम कहोगे कि इन विधियों को तो हम अपने आप ही कर सकते है। केवल आकाश को, बादलों के पर नीलाकाश को देखते-देखते कोई शांत हो जाए, आप्‍तकाम हो जाए।
       बादलों के पार नीलाकाश को तुम देखते रह सकते हो, और कुछ भी घटित नहीं होगा। तब तुम कहोगे कि ये कैसी विधियां है। तुम कहोगे कि शिव के मन में जो भी आता है वे बोल देते है; उसमे कोई तर्क या बुद्धि नहीं है। यह कैसी विधि कि बादलों के पार नीलाकाश को देखते-देखते शांति को उपलब्‍ध हो जाओ।

सोमवार, 25 जून 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—32 (ओशो)

तंत्र-सूत्र—विधि—32 (ओशो)
देखने के संबंध में तीसरी विधि:
            ‘’किसी सुंदर व्‍यक्‍ति या सामान्‍य विषय को ऐसे देखो जैसे उसे पहली बार देख रहे हो।‘’
       पहले कुछ बुनियादी बातें समझ लो, तब इस विधि का प्रयोग कर सकते हो। हम सदा चीजों को पुरानी आंखों से देखते है। तुम अपने घर आते हो तो तुम उसे देखे बिना ही देखते हो। तुम उसे जानते हो, उसे देखने की जरूरत नहीं है। वर्षों से तुम इस घर में सतत आते रहे हो। तुम सीधे दरवाजे के पास आते हो, उसे खोलते हो और अंदर दाखिल हो जाते हो। उसे देखने की क्‍या जरूरत है?

रविवार, 24 जून 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—31 (ओशो)


देखने के संबंध में दूसरी विधि:
      ‘’किसी कटोरे को उसके पार्श्‍व-भाग या पदार्थ को देखे बिना देखो। थोड़े ही क्षणों में बोध का उपलब्‍ध हो जाओ।‘’
      किसी भी चीज को देखो। एक कटोरा या कोई भी चीज काम देगी। लेकिन देखने की गुणवत्‍ता भिन्‍न हो।
      ‘’किसी कटोरे को उसके पार्श्‍व-भाग या पदार्थ को देखे बिना देखो।‘’
      किसी विषय को पूरा का पूरा देखो, उसे टुकड़ो में मत बांटो। क्‍यो? इसलिए कि जब तुम किसी चीज को हिस्‍सों में बांटते हो तो आंखों को हिस्‍सों में देखने का मौका मिलता है। चीज को उसकी समग्रता में देखो। तुम यह कह सकते हो।

शुक्रवार, 22 जून 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—30 (ओशो)

देखने के संबंध में कुछ विधियां:
      
‘’आंखें बंद करके अपने अंतरस्‍थ अस्‍तित्‍व को विस्‍तार से देखो। इस प्रकार अपने सच्‍चे स्‍वभाव को देख लो।‘’
     ’आंखें बंद करके......।‘’
       अपनी आंखें बंद कर लो। लेकिन आंखे बंद करना ही काफी नहीं है। समग्र रूप से बंद करना है। उसका अर्थ है कि आँखो को बंद करते उनकी गति भी रोक दो।
अन्‍यथा आंखें बाहर की ही चीजें देखती रहेगी। बंद आंखें भी चीजों को चीजों के प्रतिबिंबों को देखती है। असली चीजें तो नहीं रहती। लेकिन उनके चित्र, विचार, संचित यादें तब भी सामने तैरती रहेंगी। ये चित्र ये यादें भी बाहर की है। इसलिए जब ते वे तैरती रहेगी तब तक आंखों को समग्ररूपेण बंद मत समझो। समग्र रूप से बंद होने का अर्थ है कि अब देखने को कुछ भी नहीं है।

गुरुवार, 21 जून 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—29 (ओशो)

अचानक रूकने की कुछ विधियां:     
पांचवी  विधि:
थोड़े से शब्‍दों की यह विधि एक अर्थ में बहुत सरल है और दूसरे अर्थ में अत्‍यंत कठिन। यह पांचवी विधि कहती है:
      ‘’भक्‍ति मुक्‍त करती है।‘’
            थोड़े से शब्‍द: भक्‍ति मुक्‍त करती है। सच में तो यह एक ही शब्‍द है। क्योंकि ‘’मुक्‍त करती है।‘’ भक्‍ति का परिणाम है। भक्‍ति का क्‍या मतलब है।
      विज्ञान भैरव तंत्र में दो कोटि की विधियां है। एक कोटि उनके लिए है जो मस्‍तिष्‍क प्रधान है। विज्ञानोन्‍मुख है। और दूसरी उनके लिए है जो ह्रदय प्रधान है। भावोन्‍मुख है, कवि है। और दो ही तरह के मन है—वैज्ञानिक मन और काव्यात्मक मन। और इनमें जमीन आसमान का अंतर है। वे एक दूसरे से की नहीं मिलते है। मिलन असंभव है। कभी-कभी वे समानांतर चलते है। लेकिन मिलते कही नहीं।

मंगलवार, 19 जून 2012

कोई नहीं मानता है गुरु की बात?

ओशो ने अपने धर्म को संप्रदाय की लकीर से बचाने की हर संभव कोशिश की। ताकि कोई लकीर का फकीर न बन सके। प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति अनूठा है। और उसे चलना भी अपने ही स्‍थान से है। फिर वह नकल क्‍या करे। केवल मार्ग को समझ, अपनी स्‍थिति को समझें और चल पड़े। ओशो पूरी उम्र हम लोगों को जगाते रहे और बताता रहे कि हम कहां पर खड़े और किसी और जाना। प्रत्‍येक प्रवचन यही कहता है। परन्‍तु मनुष्‍य चाल बाज है। उसका मन और भी चतुर चालाक हो गया। वह कहीं न कही उसमे से छेद निकाल ही लेता है। और तो और देखिये कितनी, बेबूझी पहली है। पूरी उम्र आडम्बर और गुरु डोम से बचाने और शास्‍त्र के पीछे नहीं भागने के लिए ओशो प्रयास करते रहे लेकिन कुछ उनके ही परिवार के लोग दुनियां को ब्रह्म ज्ञान दे रहे है। खुद ओशो भी जो नहीं जानते थे। ये वो भी लोगों को बता रहे है। कितनी बड़ी विडम्बना है।

रविवार, 17 जून 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—28 (ओशो)

अचानक रूकने की कुछ विधियां:     
चौथी विधि:
 ‘कल्‍पना करो कि तुम धीरे-धीरे शक्‍ति या ज्ञान से वंचित किए जा रहे हो। वंचित किए जाने के क्षण में अतिक्रमण करो।‘
      इस विधि का प्रयोग किसी यथार्थ स्‍थिति में भी किया जो सकता है। और तुम ऐसी स्‍थिति की कल्‍पना भी कर सकते हो। उदाहरण के लिए लेट जाओ, शिथिल हो जाओ। और भाव करो कि तुम्‍हारा शरीर मर रहा है। आंखें बंद कर लो और भाव करो कि मैं मर रहा हूं। जल्‍दी ही तुम महसूस करोगे कि मेरा शरीर भारी हो रहा है। भाव करो: ‘मैं मर रहा हूं, मैं मर रहा हूं, मैं मर रहा हूं।‘

शनिवार, 16 जून 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—27 (ओशो)

अचानक रूकने की कुछ विधियां:     
तीसरी विधि:
      ‘’पूरी तरह थकनें तक घूमते रहो, और तब जमीन पर गिरकर, इस गिरने में पूर्ण होओ।‘
      वही है, विधि वही है।
      पूरी तरह थकनें तक घूमते रहो।
      बस वर्तुल में घूमों। कुदो, नाचो, दौड़ों, जब तक थ न जाओ घूमते रहा। यह घूमना तब तक जारी रहे जब तक ऐसा न लगे कि और एक कदम उठना असंभव है। लेकिन यह ख्‍याल रखो कि मन कह सकता है कि अब पूरी तरह थक गए। मन की बिलकुल मत सुनो। चलते चलो, दौड़ते रहो। नाचते रहो, कूदते रहो।

शुक्रवार, 15 जून 2012

तंत्र-सूत्र—विधि—26 (ओशो)

 अचानक रूकने की कुछ विधियां:     
दूसरी विधि:
      ‘’जब कोई कामना उठे, उसे पर विमर्श करो। फिर, अचानक, उसे छोड़ दो।‘’
      यह पहली विधि का ही दूसरा आयाम है।
      ‘’जब कोई कामना उठे, उस पर विमर्श करो। अचानक, उसे छोड़ दो।‘’
      तुम्‍हें कोई इच्‍छा होती है—चाहे वह कामवासना हो, चाहे प्रेम की इच्‍छा हो, चाहे भोजन की इच्‍छा हो। तुम्‍हें इच्‍छा होती है तो उस पर विमर्श करो। जब यह सूत्र कहता है कि विमर्श करो तो उसका मतलब होता है कि उसके पक्ष या विपक्ष में विचार मत करो। बल्‍कि देखो कि वह इच्‍छा क्‍या है।

गुरुवार, 14 जून 2012

तंत्र-सूत्र— विधि—25 (ओशो)

अचानक रूकने की कुछ विधियां:
पहली विधि:
      ‘’जैसे ही कुछ करने की वृति हो , रूक जाओ।‘’
            ये सारी विधियां मध्‍य में रूकने से संबंधित है। जार्ज गुरजिएफ ने पश्‍चिम में इन विधियों को प्रचलित किया था, लेकिन उसे विज्ञान भैरव तंत्र का पता नहीं था। उसने ये विधियां तिब्‍बत में बौद्ध लामाओं  से सीखी थी। पश्‍चिम में उसने इन विधियों पर काम किया और अनेक साधक इन विधियों के द्वारा केंद्र को उपलब्‍ध हो गए। वह उन्‍हें स्‍टाप एक्सरसाइज‍, रूक जाने का प्रयोग कहता था। लेकिन इन प्रयोगों का स्‍त्रोत विज्ञान भैरव तंत्र है।

मंगलवार, 12 जून 2012

तंत्र-सूत्र—विधि-24 (ओशो)

केंद्रित होने की बारहवीं विधि:
      ‘’जब किसी व्‍यक्‍ति के पक्ष या विपक्ष में कोई भाव उठे तो उसे उस व्‍यक्‍ति पर मत आरोपित करे।‘’
      अगर हमें किसी के विरूद्ध घृणा अनुभव हो या किसी के लिए प्रेम अनुभव हो तो हम क्‍या करते है? हम उस घृणा या प्रेम को उस व्‍यक्‍ति पर आरोपित कर देते है। अगर तुम मेरे प्रति घृणा अनुभव करते हो तो उस घृणा के ही कारण तुम अपने को बिलकुल भूल जाते हो। और मैं तुम्‍हारा एक मात्र लक्ष्‍य या विषय बन जाता हूं। वैसे ही जब तुम मुझे प्रेम करते हो तो भी तुम अपने को बिलकुल ही भूल जाते हो। और मुझे अपना एक मात्र विषय बना लेते हो। तुम अपनी घृणा को प्रेम को या जो भी भाव हो, उसे मुझे पर प्रक्षेपित कर देते हो। उस दशा में तुम आंतरिक केंद्र को भूल जाते हो। और दूसरे को अपना केंद्र बना लेते हो।

तंत्र-सूत्र—विधि-23 (ओशो)

केंद्रित होने की ग्‍यारहवीं विधि:
      ‘’अपने सामने किसी विषय को अनुभव करो। इस एक को छोड़कर अन्‍य सभी विषयों की अनुपस्‍थिति को अनुभव करो। फिर विषय-भाव और अनुपस्‍थिति भाव को भी छोड़कर आत्‍मोपलब्‍ध होओ।‘’
      ‘’अपने सामने किसी विषय को अनुभव करो।‘’
            कोई भी विषय, उदाहरण के लिए एक गुलाब का फूल है—कोई भी चीज चलेगी।
      ‘’अपने सामने किसी विषय को अनुभव करो....’’
      देखने से काम नहीं चलेगा, अनुभव करना है। तुम गुलाब के फूल को देखते हो, लेकिन उससे तुम्‍हारा ह्रदय आंदोलित नहीं होता है। तब तुम गुलाब को अनुभव नहीं करते हो। अन्‍यथा तुम रोते और चीखते, अन्‍यथा तुम हंसते और नाचते। तुम गुलाब को महसूस नहीं कर रहे हो, तुम सिर्फ गुलाब को देख रहे हो।

सोमवार, 11 जून 2012

तंत्र-सूत्र—विधि-22 (ओशो)

केंद्रित होने की दसवीं विधि:
      ‘’अपने अवधान को ऐसी जगह रखो, जहां अतीत की किसी घटना को देख रहे हो और अपने शरीर को भी। रूप के वर्तमान लक्षण खो जायेगे, और तुम रूपांतरित हो जाओगे।‘’
      तुम अपने अतीत को याद कर रहे हो। चाहे वह कोई भी घटना हो; तुम्‍हारा बचपन, तुम्‍हारा प्रेम, पिता या माता की मृत्‍यु, कुछ भी हो सकता है। उसे देखो। लेकिन उससे एकात्‍म मत होओ। उसे ऐसे देखो जैसे वह किसी और जीवन में घटा है। उसे ऐसे देखो जैसे वह घटना पर्दे पर फिर घट रही हो, फिल्‍माई जा रही हो, और तुम उसे देख रहे हो—उससे अलग, तटस्‍थ साक्षी की तरह।
      उस फिल्‍म में, कथा में तुम्‍हारा बीता हुआ रूप फिर उभर जाएगा। यदि तुम अपनी कोई प्रेम-कथा स्‍मरण कर रहे हो, अपने प्रेम की पहली घटना, तो तुम अपनी प्रेमिका के साथ स्‍मृति के पर्दे पर प्रकट होओगे और तुम्‍हारा अतीत का रूप प्रेमिका के साथ उभर आएगा। अन्‍यथा तुम उसे याद न कर सकोगे।

शनिवार, 9 जून 2012

तंत्र-सूत्र—विधि-21( ओशो)

केंद्रित होने की नौवीं विधि:
      ‘’अपने अमृत भरे शरीर के किसी अंग को सुई से भेदो, और भद्रता के साथ उस भेदन में प्रवेश करो, और आंतरिक शुद्धि को उपलब्‍ध होओ।‘’
      यह सूत्र कहता है: ‘’अपने अमृत भरे शरीर के किसी अंग को सुई से भेदों.....।‘’
      तुम्‍हारा शरीर मात्र शरीर नहीं है, वह तुमसे भरा है, और यह तुम अमृत हो। अपने शरीर को भेदों, उसमें छेद करो। जब तुम अपने शरीर को छेदते, सिर्फ शरीर छिदता है। लेकिन तुम्‍हें लगता है कि तुम ही छिद गए। इसी से तुम्‍हें पीड़ा अनुभव होती है। और अगर तुम्‍हें यह बोध हो कि सिर्फ शरीर छिदा है, मैं नहीं छिदा हूं, तो पीड़ा के स्‍थान पर आनंद अनुभव करोगे।

तंत्र-सूत्र—विधि-20 (ओशो)

केंद्रित होने की आठवीं  विधि:
      ‘’किसी चलते वाहन में लयवद्ध झुलने के द्वारा, अनुभव को प्राप्‍त हो। या किसी अचल वाहन में अपने को मंद से मंदतर होते अदृश्‍य वर्तृलों में झुलने देने से भी।‘’
      दूसरे ढंग से यह वही है। ‘’किसी चलते वाहन में..........।‘’
      तुम रेलगाड़ी या बैलगाड़ी से यात्रा कर रहे हो। जब यह विधि विकसित हुई थी तब बैलगाड़ी ही थी। तो तुम एक हिंदुस्तानी सड़क पर—आज भी सडकें वैसी ही है—बैलगाड़ी में यात्रा कर रहे हो। लेकिन चलते हुए अगर तुम्‍हारा सारा शरीर हिल रहा है तो बात व्‍यर्थ हो गई।

गुरुवार, 7 जून 2012

तंत्र-सूत्र—विधि-19 ( ओशो)

केंद्रित होने की सातवीं विधि:
      ‘’पाँवों या हाथों को सहारा दिए बिना सिर्फ नितंबों पर बैठो। अचानक केंद्रित हो जाओगे।‘’

चीन में ताओ वादियों ने सदियों से इस विधि को प्रयोग किया है। यह एक अद्भुत विधि है और बहुत सरल भी।
      इसे प्रयोग करो: ‘’पाँवों या हाथों को सहारा दिए बिना सिर्फ नितंबों पर बैठो। अचानक केंद्रित हो जाओगे।‘’