Friday, December 11, 2009

स्वतर्णिम बचपन—( 31 )

                     मस्‍तो बाबा से मिलन
      पागल बाबा अपने अंतिम दिनों में हमेशा कुछ चिंतित रहते थे। मैं यह देख सकता था, हालांकि उन्‍होंने कुछ कहा नहीं था, न ही किसी और ने इसका उल्‍लेख किया था। शायद किसी और को इसका अहसास भी नहीं था कि वे चिंतित थे। अपनी बीमारी, बुढ़ापा या आसन्‍न मृत्‍यु के बारे में तो निशचित ही उन्‍हें कोई फ़िकर नहीं थी। उनके लिए इनका कोई महत्‍व नहीं था।
      एक रात मैं जब उनके साथ अकेला था, मैंने उनसे पूछा, सच तो यह है कि मुझे आधी रात को उन्‍हें नींद से जगाना पड़ा, क्‍योंकि ऐसा कोई क्षण खोजना जब उनके पास कोई न हो बहुत ही कठिन था। उन्‍होंने मुझसे कहा, क्‍या बात है, अवश्‍य ही कोई बहुत महत्‍वपूर्ण बात होगी अन्‍यथा तुम मुझे न जगाते। मैंने कहा: हां, प्रश्‍न तो यही है, मैं देख रहा हूं कि थोड़ी चिंता की छाया ने आप को घेर लिया है। पहले तो यह कभी नहीं होती थी। आपका आभा मंडल सदा सुर्य के प्रकाश की तरह स्‍वच्‍छ और तेज रहा है। लेकिन अब मुझे थोड़ी सी छाया दिखाई देती है। यह मृत्यु तो नहीं हो सकती।    
      उन्‍होंने हंस कर कहा: हां, छाया तो है, और वह मृत्‍यु नहीं है। यह भी सच है। मुझे चिंता यह है कि मैं एक ऐसे आदमी की प्रतीक्षा कर रहा हूं जिसको मैं तुम्‍हारा उत्तरदायित्व सौंप सकूं। मैं चिंतित हूं क्‍योंकि वह अभी तक यहां पहुंचा नहीं है। और अगर मैं मर गया तो तुम्‍हारे लिए उसको खोजना असंभव होगा।
      मैंने कहा: अगर सचमुच मुझे किसी कह आवश्यकता है तो मैं उसे खोज लुंगा। लेकिन मुझे किसी कह आवश्यकता नहीं है। मरने से पहले आप पूर्णत: निशचित हो जाइए। मैं आपकी चिंता का कारण नहीं बनना चाहता। आपकी मृत्‍यु भी उतनी ही वैभवशाली, प्रफुल्‍लित, उतनी ही सुंदर होनी चाहिए जितना सुंदर आपका जीवन रहा है।
      उन्‍होंने कहा: यह संभव नहीं है.......लेकिन मुझे मालूम है कि वह आदमी जरूर आएगा। मैं अकारण ही चिंता कर रहा हूं। वह अपने वायदे का पक्‍का है, उसने वादा किया है, वह यहां पर मेरे मरने से पहले अवश्‍य पहुंच जाएगा।
      मैंने उनसे पूछा: उनको कैसे मालुम है कि आप कब मरने बाले है।   
      उन्‍होंने हंस कर कहा: इसीलिए तो मैं तुम्‍हारा उससे परिचय करना चाहता हूं। तुम बहुत छोटे हो और मैं चाहता हूं कि कोई मुझ जैसा व्‍यक्‍ति तुम्‍हारे निकट रहे। उन्‍होंने कहा: सच तो यह है कि यह एक पुरानी परंपरा है कि अगर कोई बच्‍चा कभी जाग्रत होने वाला है तो उसे उसके बचपन में ही कम से कम तीन जाग्रत लोगों द्वारा पहचान लिया जाना चाहिए।
      मैंने कहा: बाबा, यह सब बकवास है। मुझे जाग्रत होने से कोई नहीं रोक सकता है। उन्‍होंने कहा: मुझे मालूम है। लेकिन मैं पुराने ढंग का रूढ़िवादी आदमी हूं। इसलिए कृपा करके खासकर मेरी मृत्‍यु के समय परंपरा और रूढ़ि के विरोध में कुछ न कहो।
      मैंने कहा: अच्‍छा आपके कारण मैं चुप रहूंगा। मैं कुछ नहीं कहूंगा। क्‍योंकि मैं जो कुछ भी कहूंगा वह किसी न किसी तरह परंपरा और रुढि के विरूद्ध होगा।
      उन्‍होंने कहा: मैं यह तो नहीं कह रहा कि तुम्‍हें चुप रहना चाहिए, लेकिन मुझे समझने की कोशिश करो। मैं बढ़ा आदमी हूं। तुम्हारे सिवाय मैं इस दुनिया में किसी और की परवाह नहीं कहता। मुझे नहीं मालूम कि क्‍येां और कैसे तुम मेरे इतने नजदीक आ गए। मैं चाहता हूं कि कोई मेरी जगह ले ताकि बाद में तुम्‍हें मेरी याद न आए। तुम मुझे मिस न करो।
      मैने कहा: बाबा, कोई भी व्‍यक्‍ति आपकी जगह नहीं ले सकता। लेकिन मैं वादा करता हूं कि मैं पूरी कोशिश करूंगा कि मैं  आपको मिस न करू।     
      लेकिन यह आदमी दूसरे दिन सुबह पहुंच गया।
      मुझे पहचानने वाले पहले जाग्रत व्‍यक्‍ति थे, मग्‍गा बाबा, दूसरे थे, पागल बाबा, और तीसरे तो और भी अजीब थे। मेरी कल्‍पना के भी बाहर, पागल बाबा भी इतने पागल न थे। उनका नाम था मस्‍त बाबा।
      बाबा एक आदरसूचक शब्‍द है, जिसका अर्थ है: दादा। लेकिन किसी भी जाने-माने समाधिस्‍थ व्‍यक्‍ति को लोग बाबा कहते थे। क्‍येांकि असल में वहीं समाज में सबसे बड़ा, सबसे बुजुर्ग आदमी होता है। ऐसा न भी हो, भले ही वह नवयुवक हो, लेकिन उसे बाबा ही कहा जाता है।
      मस्‍त बाबा का तो कहना ही क्‍या, कमाल के आदमी थे, कमाल के। जैसा आदमी मुझे पसंद है ठीक वैसे ही थे। उनको तो मानों मेरे लिए ही बनाया गया था। पागल बाबा के परिचय कराने से पहले ही हम मित्र बन गए।
      मैं घर के बाहर खड़ा था। मुझे नहीं मालूम की मैं वहां क्‍यों खड़ा था। कम से कम इस समय तो मुझे याद नहीं आ रहा, क्‍योंकि बहुत पुरानी बात है। शायद मैं भी इंतजार ही कर रहा था। क्योंकि पागल बाबा ने कहा था कि वह आदमी अवश्‍य अपनी वादा पूरा करेगा। वह आएगा। और मैं हर बच्चे की तरह बहुत उत्‍सुक था। मैं बच्‍चा ही था और अन्‍य अनेक बातों के बावजूद भी मैं बच्‍चा ही रहा हूं। शायद मैं इंतजार कर रहा था या कुछ और करने के बहाने उस आदमी की रहा देख रहा था। और मैने देखा कि वे  आ रहे थे। मैंने तो सोचा भी न था कि वे इस प्रकार आएंगे। वे दौड़ते हुए आ रहे थे। वे बहुत बुजुर्ग न थे। पैंतीस वर्ष से अधिक उम्र के नहीं थे। वे युवावस्‍था की पराकाष्‍ठा पर थे। वे ऊंचे,अति दुबले थे और उनके लंबे सुंदर बाल और सुंदर दाढ़ी भी थी।
      मैंने उनसे पूछा: क्‍या आप मस्‍त बाबा है।
      चौंक कर उन्‍होंने पूछा: तुम्‍हें मेरा नाम कैसे मालूम हुआ।
      मैंने कहा: इसमें कोई रहस्‍य की बात नहीं है। पागल बाबा आपका इंतजार कर रहे है। उन्‍होंने आपके नाम का जिक्र किया है। आप सच में ऐसे व्‍यक्‍ति है जिसके साथ रहना तो मैं स्‍वयं पसंद करता। आप उतने ही पागल है जितने युवावस्‍था में पागल बाबा रहे होगें। शायद युवा पागल बाबा आपके रूप में वापस आ गए है।
      उन्‍होंने कहा: तुम तो मुझसे भी अधिक पागल मालूम होते हो। यह तो बताओ कि पागल बाबा कहां है।
      मैंने उनको रास्‍ता दिखाया और उनके पीछे-पीछे प्रवेश किया। उनहोंने पागल बाबा के चरण स्‍पर्श किए। उन्‍होंने कहा: मस्‍तो, यह मेरा अंतिम दिन है—वे उन्‍हें इसी नाम से पुकारते थे—मैं तुम्‍हारा इंतजार कर रहा था और थोड़ा चिंतित हो रहा था।
      मस्‍तो ने कहा: क्‍यों, मृत्‍यु का तो आपको कोई डर नहीं है।
      बाबा ने उत्‍तर दिया: निश्चित ही मृत्‍यु का मेरे लिए कोई अर्थ नहीं है। लेकिन अपने पीछे देखो। यह लड़का मेरे लिए सब कुछ है। शायद यह वह सब कुछ कर सकेगा जो मैं करना चाहता था। और कर न सका। तुम इसके पैर छुओ। मैं इंतजार कर रहा था ताकि मैं तुम्‍हारा इससे परिचय करा सकूं।
      मस्‍त बाबा ने मेरी आंखों में झाँका....पागल बाबा ने न जाने कितने लोगों को मुझसे परिचित करवाया और मेरे पैर छूने को कहा था। उन सब में से केवल यही एक सच्‍चे आदमी थे। यह एक तरह की छाप  बन गई थी, सब लोगों को मालूम था कि अगर पागल बाबा को मिलने जाओ तो उस लड़के के पैर छूने पड़ते हैं जो कि सब तरह से एक आफत है। और तुम्‍हें उसके पैरों को छूना ही पड़ता है। क्‍या बेतुकी बात है, पर पागल बाबा तो पागल है। यह आदमी मस्‍तो तो अलग ही ढंग का था। अपनी आंखों में आंसू लिए,हाथ जोड़ कर उन्‍होंने कहा: इस क्षण से आगे अब तुम मेरे पागल बाबा होंगे। वे अपना शरीर छोड़ रहे है, लेकिन अब वे तुम्‍हारे रूप मैं जीवित रहेंगे। न जाने कितना समय बीत गया,क्‍योंकि वे मेरे पैरो को छोड़ ही नहीं रहे थे। वे रो रहे थे। उनके सुंदर बाल जमीन पर फैले हुए थे। मैंने कई बार उनसे कहा: मस्‍त बाबा, अब बस करो। उन्‍होंने कहा: जब तक मुझे मस्‍तो नहीं कहो गे, मैं तुम्‍हारे पैर नहीं छोड़ुगा।
      अब मस्‍तो ऐसा शब्‍द है जो किसी बुजुर्ग द्वारा किसी बच्चे के लिए उपयोग किया जाता है। मैं उनको मस्‍तो कैसे कहता। लेकिन मेरे लिए कोई दूसरा चारा ही नहीं था। मुझे कहना ही पडा। पागल बाबा ने भी कहा, अब देर मत करो। उसे मस्‍तो कहो ताकि मैं निश्‍चिंत होकर मर सकूं। स्‍वभाव: ऐसी परिस्थिति में मुझे उन्‍हें मस्‍तो कहना ही पडा। जैसे ही मैंने यह नाम लिया, मस्‍तो ने कहा, तीन बार ऐसा कहो।
      पूर्व में यह भी एक परंपरा है कि जब तक एक बात को तीन बार न कहा जाए तब तक उसका कोई खास महत्‍व नहीं होता। तो तीन बार मैंने कहा: मस्‍तो, मस्‍तो, मस्‍तो। अब मेहरबानी करके मेरे पैर छोड़ दो। और मैं हंसा, पागल बाबा हंसे और मस्‍तो हंसे....ओर हम तीनों की इस हंसी ने हमें अटूट बंधन में बाँध दिया।
      उसी दिन पागल बाबा की मृत्‍यु हो गई। लेकिन मस्‍तो नहीं रुके। यद्यपि मैंने उनसे कहा था कि मृत्‍यु अति निकट है।
      उन्‍होंने कहा: मेरे लिए अब तुम्‍हीं हो। जब भी मुझे आवश्‍यकता होगी मैं तुम्‍हारे पास आ जाऊँगा। ये तो मरने ही वाले है। सच तो यह है कि इन्‍हें तीन दिन पहले ही मर जाना चाहिए था। सिर्फ तुम्‍हारे कारण उनके प्राण अटके हुए थे, क्‍योंकि वे मुझे तुमसे परिचित करा सकें और यह सिर्फ तुम्‍हारे लिए ही नहीं वरन मेरे लिए भी जरूरी था।      
      पागल बाबा के मरने से पहले मैने उनसे पूछा: मस्‍त बाबा के यहां आ जाने के बाद आप इतने खुश क्‍यों है।
      उनहोंने कहा: सिर्फ अपने रूढ़ीवादी मन के कारण। क्षमा करना।
      वे इतने अच्‍छे वृद्ध आदमी थे, नब्‍बे साल की उम्र में वक एक छोटे से लड़के से इतने प्‍यार से क्षमा मांग रहे थे।
      मैंने कहा: मैं यह नहीं पूछ रहा कि आपने उनका इंतजार क्‍यों किया। यह प्रश्‍न उनके या आपके बारे में नहीं है। वे तो इतने प्‍यारे आदमी हैं, इतने सुंदर है। इंतजार करने योग्‍य है। मैं तो यह पूछ रहा हूं कि आप इतने चिंतित क्‍यों हो गए थे।
      उन्‍होंने कहा: मैं फिर तुमसे कहता हूं कि इस समय तुम तर्क मत करो। तुम्‍हें मालूम है कि मैं तर्क का विरोध नहीं करता। तुम जिस तरह से तर्क करते हो वह मुझे बहुत पसंद है—विशेषत: जिस प्रकार तुम अपने तर्क को अजीब मोड़ दे देते हो। लेकिन यह समय नहीं है, अब इसके लिए समय नहीं है। मैं तो उधार के समय पर जीवित हूं। मैं तुम्‍हें केवल इतना ही बता सकता हूं कि मैं उसके आने से खुश हूं ओर मुझे इसकी भी खुशी है कि तुम दोनों मित्र बन गए और एक दूसरे के प्रति प्रेमपूर्ण हो गए—यही मैं चाहता था। शायद एक दिन तुम इस पुरानी परंपरा की सचाई को समझ सकोगे।      
      इस परंपरागत विचार के अनुसार जब तक भावी बुद्ध का उसके बचपन में तीन समाधिस्‍थ व्‍यक्‍ति पहचान न लें तब तक उसका बुद्ध बनना असंभव सा है। पागल बाबा तुम सही थे। अब मुझे मालूम हो गया है कि यह केवल रूढ़िगत विचार नहीं है। किसी के बुद्धत्‍व को पहचाने से उसको बड़ी सहायता मिलती है। विशेषत: पागल बाबा या मस्‍तो जैसे आदमी जब तुम्‍हें पहचान लें और तुम्‍हारे पैर छुएँ।
      मैं उनको मस्‍तो ही कहता रहा, क्‍योंकि पागल बाबा ने कहा था कि उसको फिर कभी मस्‍त बाबा न कहना। वह बुरा मान जाएगा। मैं उसको मस्‍तो कहता था और अब से तुम्हें भी उसे यही कहना होगा।
      अब दृश्‍य भी देखने जैसा होता था। जिस आदमी का आदर सैकड़ों लोग करते थे उसको एक बच्‍चा मस्‍तो कह कर पुकारता था। और सिर्फ यही नहीं, मैं जो भी कहता वे तत्‍क्षण वही करते। उदाहरण के लिए, एक बार वे भाषण दे रहे थे। मैंने उठ कर कहा, मस्‍तो, तुरंत बंद करो। वे एक वाक्‍य के बीच में थे, उन्‍होंने उसे पूरा भी नहीं किया और बीच में बोलना बंद कर दिया। लोगो ने उन से आग्रह किया कि वे अपनी बात को पूरा करें, लेकिन उन्‍होंने कोई उत्‍तर नहीं दिया। उन्होंने मेरी और इशारा किया। मुझे माइक्रोफोन पर जाकर लोगों से कहना पडा कि अब वे अपने घर जाएं, क्‍योंकि भाषण समाप्‍त हो गया है। और मस्‍तो मेरे कब्‍जे में है।      
      वे खूब हंसे और मेरे पैर छुए। और उनका मेरे पैरों को छूना...हजारों लोगों ने मेरे पैर छुए होंगे, लेकिन उनका अपना ही अनोखा तरीका था। वे तो मेरे पैरो कोक इस प्रकार छूते थे मानो साक्षात परमात्‍मा उनके सामने खड़ा हो। उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगती और उनके लंबे बाल.....उनको दुबारा बैठाने में मुझे उनकी मदद करनी पड़ती ।
      मैं उनसे कहता, मस्‍तो,…. अब बहुत हो चुका बस करों। लेकिन वहां सुनता कौन, वे या तो रोते, गाते या किसी मंत्र का जाप करते। मुझे तब तक इंतजार करन पड़ता जब तक वे अपना इस प्रकार का कार्यक्रम समाप्‍त न कर देते। कभी- कभी तो मुझे आधे घंटे तक बैठना पड़ता केवल यह कहने के लिए कि अब बस करो। लेकिन यह भी तो तभी कह सकता था। जब उनके भावों की अभिव्‍यक्‍ति समाप्‍त हो जाती। अखीर मैं भी तो शिष्‍टाचार जानता हूं। जब हवे अपने हाथों से मेरे पैरों को पकड़े रहते तो मैं उस समय सीधे यह तो नहीं कह सकता था, बस, अब मेरे पैर छोड़ दो। सच तो यह है कि मैं कभी नहीं चाहता था कि वे उन्‍हें छोड़े, लेकिन मुझे और भी कई काम करने होते थे। और उन्‍हें भी। यह व्‍यावहारिक दुनिया है। यद्यपि मैं हमेशा बहुत अव्यवहारिक हूं। पर जहां तक लोगों का सवाल है, मैं अव्यावहारिक नहीं हूं। मैं हमेशा बहुत ही व्‍यावहारिक हूं, जब बीच में बोलने का मुझे मोका मिल जाता तो मैं कहता, मस्‍तो, बस करो, काफी हो गया। रो-रो कर अपनी आंखों को लाल कर रहे हो। और अपने बालों को तो देखो, मिटटी से लथपथ हो रहे है। मुझे उनको धोना पड़ेगा।
      तूम लोग जानते हो कि भारत की धूल ओमनीप्रजेंट है, हर जगह मौजूद रहती है—खास कर गांव में। सब कुछ धूल से सना हुआ होता है। लोगों के चेहरे भी मटमैले हो जाते है। वे भी क्‍या कर सकते है। कितनी बार को धोएं। अब एक राज कि बात बताऊ—किसी से कहना मत—यहां भी, एयरनकंडीशंड़ कमरे में रहते हुए जहां कोई धूल नहीं होती, मैं जब भी बाथरूम में जाता हूं तो पुरानी आदत के अनुसार अपना मुहँ धो लेता हूं। यहां तो मुहँ धोने कि जरूरत नहीं है। लेकिन एक दिन में कई बार अपना मुहँ धो लेता हूं। बस एक पुरानी भारतीय आदत है। भारत में तो इतनी धूल होती है। कि मैं बार-बार बाथरूम में मुंह धोने जाता था। मेरी मां मुझसे कहती, ऐसा लगता है कि हमें तुम्‍हारे कमरे में ही बाथरूम बना देना चाहिए। ताकि तुम्‍हें बार-बार पूरे घर में से गुजर कर नजाना पड़े। तुम करते क्‍या हो, उनसे कहता: यहां इतनी धूल है। मैं सिर्फ अपना मुँह धोता हूं।
      मैंने मस्‍तो से कहा: मुझे तुम्‍हारे बाल धोने पड़ेंगे। और मैं उनके बाल धोया करता था। उनके बाल बहुत सुंदर थे और मुझे सुंदरता से प्रेम है। जिस मस्‍तो के आने के बारे में पागल बाबा इतने चिंतित थे। वे तीसरे जाग्रत पुरूष थे। बाबा चाहते थे कि तीन जाग्रत व्‍यक्‍ति एक छोटे से असंबुद्ध बच्‍चे के पैर छुएँ। और वे इसमें सफल हुए।

      पागलों का अपना ही ढंग होता है। उन्‍होंने इसका इंतजाम अच्‍छी तरह से कर लिया। उन्‍होंने संबुद्ध जनों को राज़ी कर लिया एक ऐसे लड़के के पैर छूने के लिए जो संबुद्ध नहीं था।
      मैंने उनसे पूछा: क्‍या आप नहीं सोचते कि यह कुछ हिंसात्‍मक है।
      उन्‍होंने कहा: बिलकुल नहीं। वर्तमान को भविष्‍य के प्रति अर्पित होना चाहिए। और अगर एक संबुद्ध व्‍यक्‍ति भविष्‍य में न देख सके तो वह संबुद्ध नहीं है। यह किसी पागल आदमी के दिमाग का विचार नहीं है। उन्होंने कहा, यह एक अत्‍यंत आदरणीय और प्राचीन मान्‍यता है।
      बुद्ध ने जब जन्‍म लिया और जब वे केवल चौबीस घंटे के थे तो एक संबुद्ध व्‍यक्‍ति उनके पास पहुंचा और उसने रोते हुए उस बच्‍चे के पैर छुए। गौतम बुद्ध के पिता को यह देख कर बहुत आश्‍चर्य हुआ, उनको अपने आंखों पर विश्‍वास नही हो रहा था। क्‍योंकि यह व्‍यक्‍ति बहुत प्रसिद्ध था। और बुद्ध के पिता भी उसके पास जाते थे। वे सोच रहे थे कि क्‍या इस आदमी का दिमाग खराब हो गया है। जो यह चौबीस घंटे पहले पैदा हुए बच्‍चे के पैर छू रहा है। बुद्ध के पिता ने उनसे पूछा, क्‍या मैं आपसे पूछ सकता हूं कि आप इस छोटे से शिशु के पैर क्‍यों छू रहे है।
      उस संबुद्ध व्‍यक्‍ति ने कहा: मैं इसके पैर छू रहा है, क्‍योंकि में इसकी भावी संभावना को देख सकता हूं। अभी तो यह कली है, लेकिन जल्‍दी ही यह पूर्ण विकसित कमल बन जाएगा।
      और बुद्ध के पिता—शुद्घोधन उनका नाम था—ने उनसे पूछा, तो आप रो क्‍यों रहें हे। अगर यह कमल खिलने बाला है। तो आपको तो इसके लिए खुश होना चाहिए।
      उस वृद्ध व्‍यक्‍ति ने कहा: मैं इसलिए रो रहा हूं, क्‍योंकि जब यह कमल बनेगा, तब में नहीं रहूंगा।
      हां, किसी खास क्षणों में बुद्ध पुरूष भी रो पड़ते है। विशेषत: उन क्षणों में जब वे किसी बच्‍चे कि बुद्ध बनने की संभावना के साथ यह भी देख लेता है कि जब यह अद्भुत घटना-घटेगी तो उस समय तक उनकी मृत्‍यु हो चुकी होगी। यह निश्‍चित ही कठिन है। यह तो अंधकारपूर्ण रात्रि के उस प्रहर जैसा है जब पक्षियों का गान सुनाई देने लगा है, सूर्योदय होने वाला है, क्षितिज पर थोड़ा सा उजाला भी दिखाई दे रहा है.....लेकिन एक और सुबह को देखने से पहले ही तुम्‍हें मर जाना है।
      निशचित ही बुद्ध के पैरों को पकड़ कर रोने वाला वृद्ध व्‍यक्‍ति ठीक ही था। मैं यह अपने अनुभव से जानता हूं। आज तक मैं जितने लोगों से मिला हूं उसमें से सबसे अधिक महत्‍वपूर्ण ये तीन है। और मैं नहीं सोचता कि मैं इन तीन से अधिक महत्‍वपूर्ण व्‍यक्‍ति से कभी मिलूंगा।
      अपनी समाधि के बाद मैं अन्‍य संबुद्ध लोगों से भी मिला हूं, लेकिन वह दूसरी कहानी है। मैं अपने उन शिष्‍यों से भी मिला हूं। जिनकेा संबोधी प्राप्‍त हो चुकी है। लेकिन वह भी दूसरी कहानी है। विचित्र सौभाग्‍य की बात तो यह है कि मैं उस समय पहचाना गया जब मैं बच्‍चा ही था और सब लोग मेरे विरूद्ध थे। मेरे परिवार सदा मेरे विरूद्ध था। हां, इसमें मैं अपने माता पिता आरे भाईयों को सम्‍मिलित नहीं करता। लेकिन मेरा परिवार बहुत बड़ा था और वे सब मेरा विरोध करते थे। मैं उनकी बात समझ सकता हूं। एक प्रकार से वे सही थे, क्‍योंकि वे समझते थे कि मैं पागलों जैसा व्‍यवहार करता हूं और इसकी चिंता थी।
      उस छोटे से शहर का हर आदमी मेरे पिताजी से मेरी शिकायत करता था। मुझे यह तो मानना पड़ेगा कि उनमें असीम धैर्य था। उनको चौबीस घंटे मेरे बारे में शिकायतें सुननी पड़ती। हर दिन-रात, कभी-कभी तो आधी रात को भी कोई न कोर्इ आकर उनसे कहता कि मैंने क्‍या गलत काम किया है। और मैं सदा वहीं काम करता जो मुझे नहीं करना चाहिए था। कभी-कभी तो मुझे भी अपने आप पर ताज्‍जुब होता कि कैसे मैं वहीं करता हूं जो मुझे नहीं करना चाहिए। क्‍योंकि गलती से भी कभी मुझसे कुछ ठीक तो होता ही नहीं था।
      मैंने एक बार पागल बाबा से पूछा: शायद आप मुझे यह बता सकें। अगर मैं पचास प्रतिशत ठीक काम करूं और पचास प्रतिशत गलत काम करूं तो यह बात समझ सकता हूं, लेकिन मैं तो शत प्रतिशत गलत काम करता हूं। मुझे नहीं मालूम कि मैं यह कैसे करता हूं। क्‍या आप मुझे यह समझा सकते है।
      पागल बाबा हंसे और उन्होंने कहा: तुम बहुत अच्‍छी तरह से इसकी व्‍यवस्‍था करते हो। काम करने का यही तरीका है। दूसरे क्‍या कहते है, तुम इसकी परवाह मत करो। तुम तो अपने ढंग से चलते रहो। सब शिकायतों को सुनो और अगर तुम्‍हें सज़ा मिले, तो उसे भी खुशी-खुशी स्‍वीकार कर लो, उसका भी मजा है।
      और मैं सचमुच सज़ा को भी मजे सह भोग लेता था। जब मेरे पिताजी ने देखा कि मैं सज़ा का भी पूरी तरह से मजा ले लेता हूं तो उन्‍होंने मुझे सज़ा देनी बंद कर दी। उदाहरण के लिए, उन्‍होंने एक बार मुझसे कहा ,इस इमारत के सात चक्कर लगाओ। तेजी से दौड़ों और वापस आओ। तो मैंने उनसे पूछा: क्‍या मैं सत्‍तर चक्‍कर लगा सकता हूं। सुबह का समय इतना सुहावना है। मैंने उनके चेहरे की और देखा। वे सोच रहे थे कि वे मुझे सज़ा दे रहें है। और मैंने सचमुच सत्‍तर चक्‍कर लगाए। धीरे-धीरे उनकी समझ में आ गया कि मुझे सजा देना कठिन है। क्‍योंकि मैं उसका मजा लेता। पिताजी को मेरे कारण अनावश्‍यक बहुत परेशानी हुई। इसलिए मुझे उनसे बहुत सहानुभूति थी।  
      मुझे लंबे बाल रखने का बहुत शौक था और सिर्फ यही नहीं मैं पंजाबी ड्रेस पहनता था। ये कपड़े उस इलाके में नहीं पहने जाते थे। हमारे गांव में कुछ गायक आए थे। उन्‍होंने यह पंजाबी ड्रेस पहना हुआ था। यह ड्रेस मुझे बहुत पसंद आई। मेरा तो खयाल यह है कि भारत में सबसे सुंदर पोशाक यही है। मुझे सलवार-कुर्ता पहने हुए और  लंबे बालों के साथ देख कर लोग समझते कि मैं लड़की हूं।
      और मैं दिन भर पिताजी की दुकान में से घर के भीतर आता-जाता रहता। लोग पिताजी से पूछते, यह लड़की किसकी हे। इसने कैसे कपड़े पहने हुए है। यह सुन कर मेरे पिताजी को बहुत बुरा लगता। मुझे तो इसमें कोई बुराई दिखाई नहीं देती कि कोई आपके लड़के को लड़की समझ बैठे। लेकिन इस पुरूष प्रधान समाज में मेरे पिताजी का मुझसे नाराज होना स्‍वाभाविक था। उन्‍होने झल्‍ला कर मुझसे कहा: सुनो,यह कलवार-कुर्ता पहनना बंद करो। ये औरतों जैसे कपड़े है। और अपने इन बालों को भी काट दो, नहीं तो मैं खूद ही इन्‍हें काट दूँगा।
      मैंने उनसे कहा: आप मेरे बाल काट कर पछताओगे।
      उन्‍होंने कहा: क्‍या मतलब है तुम्‍हारा।
      मैंने कहा: मैंने कह दिया है। अब आप खुद सोच लो और पता लगा लो कि मेरा क्‍या मतलब है। आप पछताओगे।
      वे बहुत नाराज हो गए। केवल इस बार ही मैंने उन्‍हें इतने गुस्‍से में देखा था। उनकी कपड़ों की दुकान थी और कपड़ा काटने के लिए वहां पर कैंची तो रहती ही थी। वे दुकान से कैंची ले आए और मेरे बालों को काट दिया और कहा: अब नाई के पास जाकर इनको ठीक करवा लो—नहीं तो कार्टून जैसे दिखाई दोगे।
      मैंने कहा: मैं तो जाऊँगा, लेकिन आप पछताओगे।
      उन्‍होंने कहा: अब इसका क्‍या मतलब है।
      मैंने कहा: मैं क्‍यों समझाऊ्ं ।यह आपका ही किया हुआ है। आप सोचो, किसी काक कुछ समझाने की मेरी कोई जिम्‍मेदारी नहीं है। आपने मेरे बाल काटे है और आप ही पछताएंगे।     
      मैं उस नाई के पास गया जो अफीमची था। मैंने उसको चुना, क्‍योंकि वही एक ऐसा नाई था जो मेरा कहना मानता। दूसरा कोई इसके लिए तैयार न होता। असल में बात यह है कि भारत में बच्‍चे का सिर तब मुड़वाते है जब उसका बाप मर जाता है। मैं इस अफीमची के पास गया, उससे मेरा बहुत प्रेम था। उसका नाम नत्थू था। मैंने उससे कहा: नत्‍थू क्‍या तुम मेरे बाल घोंट दोगे। मेरा सिर सफाचट कर दोगे।
       उसने कहा: हां, हां, हां, --तीन बार।
      मैंने कहा: वाह, एक बात को तीन बार कहने का ढंग तो बुद्ध का है। अच्‍छा अब घोट दो। और उसने मेरे सारे बाल काट दिए, सिर घोट दिया।
      जब मैं घर आया तो मुझे देख कर पिताजी को विश्‍वास नहीं हुआ। मैं बौद्ध भिक्षु जैसा दिखाई दे रहा था। बौद्ध भिक्षु और हिन्दू संन्‍यासी में यही भेद है। कि हिंदू संन्‍यासी अपने सारे बाल मुंडवा देता है। लेकिन जहां सहस्‍त्रार है, जहां सातवां चक्र है। वहां वह थोड़े से बाल रख छोड़ता है। ताकि कड़ी धूप से वह सुरक्षित रहे। लेकिन बौद्ध भिक्षु अधिक हिम्‍मत वाला है। वह सारे बाल काट देता है। अपने सिर को पूरी तरह से मुंडवा देता है।
      मेरे पिताजी ने कहा: यह तुमने क्‍या किया, क्‍या तुम्‍हें मालूम है कि इसका मतलब क्‍या है। अब मेरे लिए पहले से भी ज्‍यादा मुसीबत खड़ी हो जाएगी। सब लोग पुछोगे कि क्‍या इस बच्‍चे का पिता मर गया है जो इसको अपना सर मुँड़वाना पड़ा।
      मैंने कहा: अब यह आप जानो। मैंने तो कहा था आप पछताएंगे।
      और उन्‍हे कई महीने तक पछताना पडा। क्‍योंकि मैंने अपने सिर के बालों को उगने ही नहीं दिया। और लोग उनसे पूछते रहे कि क्‍या बात हे। क्‍या करण है।
      नत्‍थू हमेशा वहां होता था और वह बहुत प्‍यारा आदमी था। जब भी मैं जाऊँ और उसकी कुर्सी खाली होती मैं उस पर जाकर बैठ जाता और कहता,नत्‍थू, फिर से काट दो। तो जो थोड़े-बहुत बाल उगे होते उनको वह काट देता। उसने मुझसे कहा: मुझे सिर घोटने में बड़ा मजा आता है। ये बेवकूफ लोग मुझसे आकर कहते है। हमारे बाल ऐसे काटो, वैसे काटो, इस स्‍टाइल में या उस स्‍टाइल में सब बकवास करते है। सबसे अच्‍छा स्‍टाइल तो यही है। न मुझे कोई चिंता करनी पड़ती है, न तुम्‍हें। बस सिर सफाचट हो जाता है....संतों जैसा।
      मैंने कहा: हां, तुमने बिलकुल ठीक कहा—बिलकुल साधु-सन्‍यासी जैसा। पर क्‍या तुम्हें मालूम है कि अगर मेरे पिता को मालुम हो गया तुम मेरा सर मूँड़न कर रहे हो तो तुम मुसीबत में पड़ोगे।      
      उसने कहा: तुम चिंता मत करो। सब जानते हे कि मैं अफीमची हूं, मैं कुछ भी कर सकता हूं। गनीमत है कि मैंने तुम्‍हारा सिर नहीं काट दिया। और हंस पडा।
      मैने कहा: ये अच्‍छी बात है, अगली बार जब अगर मैं अपनी सिर कटवाना चाहूंगा तो मैं तुम्हारे पास आऊँगा। मुझे तुम पर पूरा भरोसा है।
      उसने कहा: हां, मेरे बेटे, हों मेरे बेटे, हां मेरे बेटे।
      शायद अफीम के कारण वह हर बात को ती बार कहता था। शायद तभी वह अपनी उस बात को सुन सकता था जो वह कह रहा था।
      लेकिन मेरे पिताजी ने सबक सीख लिया। उन्‍होंने मुझसे कहा: मैं बहुत पछता चुका हूं। अब दुबारा मैं ऐसा कभी नहीं करुंगा। और उन्‍होंने कभी नहीं किया। उन्‍होंने अपना वादा पूरा किया। यही एक ऐसा मौका था जब उन्‍होंने पहली और अखीरी बार मुझे सज़ा दी थी। मुझे भी इस पर विश्‍वास नहीं होता था, क्योंकि मैं बहुत ज्‍यादती करता था। बहुत शैतानी करता था। लेकिन वे बहुत धैर्यपूर्वक सब शिकायतों को सुनते और मुझे कभी कुछ नहीं कहते। सच तो यह है के वे सदा मुझे बचाने की पूरी कोशिश करते।
      एक बार मैंने उनसे पूछा मुझे सज़ा न देने का वायदा किया है, लेकिन मुझे बचाने को तो वादा नहीं किया। मुझे बचाने की तो कोई जरूरत नहीं है।
      उन्होंने कहा: तुम इतने शैतान हो कि अगर मैं तुम्हें न बचाऊ तो मुझे नहीं लगता कि तुम बच पाओगें। कोई भी, कहीं भी तुम्‍हें मार डालेगा। मुझे तुम्‍हारी रक्षा करनी ही पड़ेगी। उपर से बाबा भी हमेशा मुझसे कहते है कि हमें इस बच्‍चे की सुरक्षा का सदा ध्‍यान रखना चाहिए। मैं उनसे प्रेम करता हूं, उनका आदर करता हूं। अगर उन्‍होंने तुम्‍हारी सुरक्षा करने के बारे में  कहा है तो वे ठीक ही कहते होगें।  पागल बाबा गलत नहीं हो सकते। सारा गांव गलत हो सकता है, मैं गलत हो सकता हूं। लेकिन वे गलत नहीं हो सकते।
      और मुझे मालूम है कि पागल बाबा सबको,मेरे अध्‍यापकों और मेरे रिश्‍तेदारों को बार-बार कहते थे। कि इस बच्‍चे का ध्‍यान रखो, इसे सुरक्षित रखो। यहां तक कि मेरी मां को भी मुझे सुरक्षित रखने को कहा जाता था। मुझे अच्छी तरह से याद है कि इसके बारे में उन्‍होंने केवल मेरी नानी से कुछ नहीं कहा। यह इतना साफ था कि अपवाद था कि मुझे उनसे पूछना पडा कि आप कभी मेरी नानी से मुझे सुरक्षित रखने के बारे में क्‍यों कुछ नहीं कहते।
      उन्‍होंने कहा: इसकी कोई जरूरत नहीं है। तुम्‍हारी रक्षा के लिए तो वह अपनी जान पर भी खेल जाएगी। वह तो मुझसे भी लड़ पड़ेगी। मेरा उस पर पूरा विश्‍वास है। तुम्‍हारे परिवार में केवल वही एक है जिससे मुझे तुम्‍हारी सुरक्षा के बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है।
      उनकी अंतर्दृष्‍टि पारदर्शी था, हां। कुछ ऐसी आंखें भी होती है जो मनुष्‍य द्वारा निर्मित उस धुंध के पार भी देख सकती है जिसमें वह अपने आपको छिपा लेता हे।


--ओशो

     

Wednesday, December 9, 2009

स्वुर्णिम बचपन—(सत्र—30)

विजय भैया....मेरे लक्ष्‍मण थे
      मैं पागल बाबा और उन तीन बांसुरी वादकों के बारे में बता रहा था। जिनसे उन्‍होंने मुझे परिचित करवाया था। अभी भी वह याद बड़ी सुंदर और ताजा है। कि वे किस प्रकार से इन लोगों से मेरा परिचय कराते थे—विशेषत: उनसे जो बहुत सम्‍मानित थे, जिनको बहुत आदर दिया जाता था। सबसे पहले वे उनसे कहते, इस लड़के के पैर छुओ।
      मुझे याद है कैसे विभिन्‍न प्रकार से लोग प्रतिक्रिया करते थे। और बाद में हम दोनों कैसे हंसते थे। पन्‍ना लाल घोष को मुझसे परिचित करवाया गया था। कलकत्ता में, उनके अपने घर में। पागल बाबा उनके मेहमान थे और मैं पागल बाबा का मेहमान था। पन्‍ना लाल घोष बहुत प्रसिद्ध थे। और जब बाबा ने उनसे कहा कि पहले इस लड़के के पैर छुओ, उसके बाद ही मैं तुम्‍हें अपने पैर छूने दूँगा। तो वे एक क्षण के लिए तो झझके, फिर उन्‍होंने मेरे पैरों को छुआ तो जरूर लेकिन उसमें छूने का कोई भाव न था। पैरों को छूकर भी नहीं छुआ।
      ऐसा प्राय: होता है कि बहुत सी चीजों को हम छूते हुए भी नहीं छूते। लोग जब हाथ भी मिलाते है तो बिलकुल  भाव विहीन ढंग से—न उसमें को ई प्रेम होता है, न कोई खुशी, न किसी प्रकार की कोई ग्रहण शीलता। किस लिए ऐसे हाथ मिलाते है। यह व्‍यर्थ की कसरत है। और बेचारे हाथों का क्‍या कसूर है। यूं ही क्‍यों उन्‍हें हिलाते रहते हो।
      मैंने बाबा से कहा: इन्‍होंने पैर छुए नहीं।
      बाबा ने कहा: मुझे मालूम है। पन्‍ना लाल, फिर से छुओ।
      उनके अपने ही घर में इतने लोगों के सामने इस सुप्रसिद्ध आदमी के साथ यह कुछ ज्‍यादती थी। उस समय वहां था और अन्‍य उस शहर के गणमान्‍य लोग उपस्‍थित थे। फिर से पैर छुओ। लेकिन इस से सिद्ध होती है उस व्‍यक्‍ति की विशेषता। उन्‍होंने दुबारा मेरे पैर छुए। इस बार तो उनका स्‍पर्श पहले से भी अधिक निर्जीव थे।
                मैं हंस पडा। बाबा ने जोर से ठहाका लगाया। मैंने कहा: इनको प्रशिक्षण की जरूरत है।
      बाबा ने कहा: यह सच है, इनका प्रशिक्षण प्राप्‍त करने के लिए उनको कई बार जन्‍म लेना पड़ेगा। इस जीवन में तो ये चूक गए। मैं इन्‍हें अंतिम अवसर दे रहा था, लेकिन ये उससे भी चूक गए।
      और तुमको यह जान कर आश्‍चर्य होगा कि सिर्फ सात दिन के बाद पन्‍ना लाल इस संसार में नहीं रहे। शायद बाबा ने ठीक ही कहा था कि पन्‍ना लाल को अंतिम अवसर दिया गया था लेकिन वे चूक गए। इतनी याद रखना कि वे बुरे आदमी नहीं थे। नोट कर लो कि मैं यह नहीं कहता कि वे अच्‍छे आदमी थे। मैं तो केवल यह कह रहा हूं कि वे बुरे आदमी नहीं थे। वे सिर्फ साधारण व्‍यक्‍ति थे। अच्‍छा या बुरा होने के लिए थोड़ा से असाधारण होना पड़ता है।
      उन्‍होंने अपनी समस्‍त प्रतिभाअपनी योग्‍यता और आत्‍मा को अपनी बांसुरी में ही उंडेल दिया था। और वे स्‍वयं मरुभूमि जैसे हो गए थे। उनकी बांसुरी तो सुंदर थी। लेकिन एक व्‍यक्‍ति की तरह उनको न जानना ही अच्छा था। अब जब मैं उनकी बांसुरी को रेकार्ड पर सुनता हूं तो मैं कहता हूं, पन्‍ना लाल घोष, तुम बीच में मत आओ, मुझे बांसुरी को रेकार्ड पर सुनने दो।
      लेकिन बाबा उन्‍हें मुझसे परिचित करवाना चाहते थे। मुझे उनसे नहीं। यह मेरे लिए नहीं था क्‍योंकि मेरा तो कोई नाम नहीं था। मैंने कुछ भी नहीं किया था—ठीक या गलत। और कभी कुछ करने बाला भी नहीं था।
      अभी मैं वही बात कह सकता हूं कि मैंने ठीक या गलत कुछ नहीं किया है। मैं तो न करने वाला हूं। और सदा ऐसा ही रहा हूं, कुछ न करने वाला लेकिन पन्‍ना लाल घोष महान संगीतज्ञ थे। इतने लोगों के सामने उनको पैर छूने के लिए कहना बहुत ही निरादर वाली बात थी। उनके लिए यह एक अच्‍छी कसरत थी। लेकिन दो बार ऐसा करना तो कुछ ज्‍यादा ही था। लेकिन वे सच्‍चे बंगाली बाबू थे।
      बंगाली बाबू शब्‍द का आविष्‍कार अंग्रेजों ने किया था। क्‍योंकि भारत में उनकी प्रथम राजधानी कलकत्‍ता थी, दिल्‍ली नहीं, और इसलिए बंगाली उनके पहले नौकर थे। सब बंगाली मछली खाते है। इसलिए उनसे मछली की बू आती है। चेतना इस बात को समझ सकती है, क्‍योंकि वह मछुआरे की बेटी है। सौभाग्‍य से वह ठीक-ठाक समझ सकती है। उसमें सूँघने की शक्‍ति भी है। जब मुझे कोई ऐसी महक महसूस होती है जिसको कोई दूसरा सूंघ नहीं सकता तब मैं चेतना की नाम पर भरोसा करता हूं। मैं फिर उससे पूछता हूं, और वह ठीक-ठाक सूंघ लेती है।
      सब बंगाली मछली खाने बाले हैं। इसलिए उनसे मछली की बू आती है। हर बंगाली मकान के साथ एक तालाब होता है। यह बंगाल की विशेषता है। भारत में और कहीं भी ऐसा नहीं होता। बंगाल बहुत सुंदर प्रदेश है। अपनी क्षमता के अनुसार हर मकान का एक छोटा या बड़ा तालाब होता है। जिसमें मछलियाँ पाली जाती है।
      तुम्‍हें यह जान कर हैरानी होगी कि अंग्रेजी शब्‍द बैंगलो असल में बंगाली मकान का नाम है। बँगला कहते थे, हर बंगाली अर्थात बंगाली मकान का अपना तालाब होता है। जिसमें वे अपने भोजन को पैदा करने का इंतजाम करते है। चारों और मछली की बदबू फैली रहती है। मेरे जैसे आदमी के लिए किसी बंगाली से बात करना बहुत मुशिकल है। जब मैं बंगाल जाता था तब भी इस बदबू के कारण मैं किसी बंगाली के कभी बात नहीं करता था—वहां पर रहने वाले अन्‍य प्रदेश के लोगों से बात करता था।
      जब पन्ना लाल घोष से मिला तो उसके ठीक सात दिन बाद वे मर गए। बाबा ने उनसे कहा था, यह तुम्‍हारा अंतिम अवसर है। मैं नहीं समझता कि वे इस बात को समझे। वे थोड़ा बुद्धू से दिखाई दे रहे थे। मैं कहूं या न कहूं,वे बुद्धू दिखाई देते थे। लेकिन जहां तक उनके बांसुरी वादन का प्रश्‍न है, उसमें वे बेजोड़ थे, उसमें उनकी बराबरी कोई नहीं कर सकता था। इसीलिए शायद अन्‍य बातें में वे बुद्धू हो गए थे। इस बांसुरी ने उनकी सारी प्रतिभा को सोख लिया था। बड़ा खतरनाक वाद्य-यंत्र है यह। लेकिन उन्‍होंने मेरे पैरों को छुआ तो न छूने के भाव से ही सही। इसी लिए बाबा ने उनसे कहा: फिर से छुओ और सचमुच छुओ।
      पन्‍ना लाल घोष ने कहा: मैंने तो दो बार पैर छुए है। इब सचमुच कैसे छुए जाते है। इस पर मालूम है बाबा ने क्‍या कहा। पन्‍ना लाल को दिखाने के लिए कि कैसे पैर छुए जाते है। उन्होंने आंखों में आंसू भर कर मेरे पैर छुए—और बाबा उस समय नब्‍बे बरस के थे।
      बाबा कभी भी मुझे दूसरे लोगों के साथ नहीं बैठने देते थे। मुझे उनके बाव-तकिए पर थोड़ा ऊपर और पीछे बैठना होता था। भारत में यह एक विशेष प्रकार का गोल तकिया—या तो अमीर लोग इस्‍तेमाल करते थे, या विशेष सम्‍मानित लोग। बाबा अपने साथ बहुत कम चीजें रखते थे। लेकिन वे इस तकिये को सदा अपने साथ रखते थे। उन्‍होंने मुझे बताया था, मुझे इसकी जरूरत नहीं है। लेकिन किसी दूसरे के तकिये पर सोना बहुत गंदा लगता है। मेरे पास कुछ और नहीं है, लेकिन कम से कम मेरा अपना तकिया तो मेरे पास होना चाहिए। इसलिए जहां भी जाता हूं, इसे अपने साथ ले जाता हूं।
      तुम्‍हे पता है, जब मैं सफर करता था.....चेतना इसे समझ सकेगी—क्‍योंकि एक तकिया मेरे लिए काफी नहीं है। में तीन तकिया इस्‍तेमाल करता हू। दो को तो मैं अपने दोनों और रखता हूं और एक मेरे सिर के नीचे रहता है। इसका मतलब है कि इन तकियों के लिए मैं एक बड़ा सूटकेस रखता था। और एक दूसरे बड़े सूटकेस में मैं अपने कंबल रखता था। क्‍योंकि मैं किसी दूसरे के कंबल इस्‍तेमाल नहीं कर सकता, उनमें से मुझे बू आती है। और मैं तो बच्‍चे की तरह सोता हूं। तुम्‍हें मुझे सोते देख कर हंसी आएगी। में तो सर से पैर तक कंबल को ओड़ कर उसमें गायब हो जाता हूं। और अगर कंबल में से बदबू आए तो मैं श्‍वास नहीं ले सकता। और मैं अपना सिर बाहर भी रख सकता, क्‍योंकि तब मेरी नींद गड़बड़ा जाती है।
      जब तक मैं अपने शरीर को पूरी तरह से ढंक न लू तब तक मैं अच्‍छी तरह से सो नहीं सकता। अगर कोई बदबू आ रही हो तब तो सोना संभव ही नहीं है। इसलिए मुझे अपना कंबल सदा अपने साथ रखना पड़ता था। और एक सूटकेस मैं मेरे कपड़े रखे जाते थे। इसलिए पच्‍चीस वर्ष तक निरंतर मुझे सफर करते समय तीन सूटकेस अपने साथ रखने पड़ते थे।
      बाबा  मुझसे अधिक भाग्‍यशाली थे। वे अपने तकिये को अपनी बांह के नीचे रख कर ले जाते थे। यह उनकी एक मात्र संपदा थी। उनहोंने मुझ बताया कि यह गंव-तकिया तो मैं खास तौर पर तुम्‍हारे लिए ले जाता हूं। क्‍योंकि जब तुम मेरे साथ आते हो तो मैं तुम्‍हें कहां बिठाउुंगा। मैं दूसरों से अधिक ऊंचे मंच पर बैठता हूं। लेकिन तुम्‍हें तो मुझसे भी ऊंचे बैठना चाहिए।
      मैने कहा: पागल बाबा आप पागल है।
      उन्‍होने कहा: यह बात तो तुम भी जानते हो और दूसरे लोग भी जानते है कि मैं पागल हूं। लेकिन बार-बार इसका जिक्र करने की जरूरत है। बस, यह मेरा निर्णय है कि तुम्‍हें मुझसे ऊंचे आसन पर बैठना है।
      वह गंव-तकिया मेरे लिए रखा गया था। न चाहते हुए भी मुझे उस पर बैठना ही पड़ता। इसके कारण मुझे कभी-कभी गुस्‍सा भी आता, संकोच भी होता और शर्म भी आती, क्‍योंकि उस पर बैठना बड़ा अजीब लगता। लेकिन बाबा न मानते। मेरे गुस्‍से का उन पर कोई असर न होता। मेरे सिर को थपथपाते हुए कहते, अच्‍छा बेटा, अब तो थोड़ा मुस्‍कुरा दो। उस तकिए पर मैंने तुम्‍हें बिठाया सिर्फ इसलिए तुम नाराज हो गए, मत होओ।
      इस आदमी, पन्‍ना लाल घोष को न मैं पसंद करता था, और ना पसंद करता था। इनके प्रति मेरा कोई भाव नहीं था। उनमें कोई नमक नहीं था। वे बिलकुल स्‍वाद-रहित थे। लेकिन उनकी बांसुरी......उन्‍होंने भारत की बांस की बांसुरी को सारे संसार में प्रसिद्ध कर दिया और इसको संगीत का एक महत्‍वपूर्ण वाद्य-यंत्र बना दिया। उनके कारण ही जापान की अधिक सुंदर बांसुरी अब फीकी पड़ गई है। अरबी बांसुरी को तो को पूछता ही नहीं। लेकिन भारतीय बांसुरी को तो सदा इस बंगाली बाबू का आभार मानना पड़ेगा।
      तुम्‍हें आश्‍चर्य होगा कि भारत में ये बाबू शब्‍द बड़े आदर सूचक बन गया है। जब किसी के प्रति आदर दिखाना होता उसे बाबू कहा जाता है। लेकिन न इसका सही अर्थ होता है—वह जो बदबू दे रहा है। जब अंग्रेज भारत आए तो उन्‍होंने बंगालियों के लिए बाबू शब्‍द का प्रयोग किया। धीरे-धीरे यह शब्‍द सारे भारत में प्रचलित हो गया। सबसे पहले बंगालियों के लिए बाबू शब्‍द बाबू जो मूलत: आदर सूचक नहीं था। अत्‍यंत सम्‍माननीय बन गया। शब्‍दों का भाग्‍य भी बड़ा अजीब होता है। अब कोई नहीं सोचता कि यह गंदा शबद है। अब यह सब लोग समझने लगे कि यह सुंदर शब्‍द है।
      पन्‍ना लाल तो सचमुच बाबू थे अर्थात जिससे मछली की बू आती थी। इसलिए मुझे अपनी नाक पकड़नी पड़ती थी।
      उन्‍होंने बाबा से पूछा: बाबा, आपका यह लड़का, जिसके पैर मुझे बार-बार छूने पड़त है, अपनी श्‍वास क्‍यों रोके हुए है।
      बाबा ने कहा: यह एक यौगिक क्रिया कर रहा है। इसका तुम्‍हारी मछली की बू से कोई लेना-देना नहीं है।ये पागल बाबा बड़े प्‍यारे व्‍यक्‍ति थे।
      दूसरा संगीतज्ञ, जिसका मैं नाम भी नहीं लेना चाहता था। लेकिन एक बार ले चूका हूं। और इस अध्‍याय को समाप्‍त करने के लिए एक बार फिर उसका उल्‍लेख करना पड़ेगा—सचदेवा था। उसका बांसुरी वादन पन्‍ना लाल घोष के बांसुरी वादन से बिलकुल भिन्‍न है, हालांकि दोनों एक ही तरह की बांसुरी का उपयोग करते है। तुम दोनों को एक ही बांसुरी दे सकते हो, लेकिन तुम्‍हें आश्‍चर्य होगा की उनका संगीत कितना अलग-अलग होता है। अपने आप में बांसुरी तो गौण है, बांसुरी वादन महत्‍वपूर्ण है। बांसुरी में से जो स्‍वर निकलते है उनसे उसके संगीत की विशेषता प्रकट होती है।
      सचदेवा के हाथ में तो जादू था। पन्‍ना लाल घोष के बजाने की तकनीक उत्‍तम थी, उसमें संगीत की कला और जादू, दोनों का मिश्रण पाया जाता था। उसका संगीत श्रोताओं को दूसरे ही लोक में पहुंचा देता था। लेकिन मुझे यह आदमी तो कभी अच्‍छा नहीं लगा। पन्‍ना लाल तो मुझे न पसंद थे, न नापंसद थे। इस आदमी से तो मुझे घृणा थी। उससे मुझे इतनी नफरत थी कि शिष्‍टाचार वश भी हम दोनो एक-दूसरे के निकट नहीं आ सकते थे। परिचय की ओपचारिकता को भी नहीं निभा सकते थे। और बाबा को यह मालूम था। सचदेवा को भी मालूम था और फिर भी उसको मेरे पैर छूने पड़ते थे।
      मैने बाबा को कहा: मैं अपने पैर दुबारा उन्हें नहीं छूने दूँगा। पहली बार तो मुझे मालूम नहीं था कि उनकी तरंगें न सिर्फ खराब है, अब तो मुझे मालूम हो गया।
      और उनकी तरंगें न सिर्फ खराब थी बल्‍कि उबकाई लाने वाली थी। और उनका चेहरा भी ऐसा ही थी। अगला व्‍यक्‍ति बीमार महसूस करने लगे। मैं उनके बारे में बात नहीं करना चाहता था। क्‍योंकि मैं उनको याद नहीं करना चाहता था। क्‍यों? क्‍योंकि तुम्‍हें उनके बारे में बताने के लिए मुझे इस सबको फिर से झेलना पड़ेगा। लेकिन मैंने तय किया है कि मैं अपना सारा भार पूरी तरह उतार दूँगा। तो जो होना हो सो हो। सच में वह पास पोर्ट फोटो से भी अधिक बदसूरत थे।   
      मेरा ख्‍याल था की पासपोर्ट फोटो सबसे अधिक कुरूप चीज है, कोई उससे अधिक बदसूरत नहीं हो  सकता। लेकिन सचदेवा उससे भी कहीं अधिक बदसूरत थे। और उनका नाम कितना सुंदर है—सचदेवा, वाह, सच का देवता। लेकिन कितने बदसूरत थे वे। है भगवान, है जीसस।
      लेकिन जब वह अपनी बांस की बांसुरी को बजाने लगते तो उनकी सारी कुरूपता गायब हो जाती और वे सुनने बाले को किसी दूसरे ही लोक में ले जाते। उनका संगीत अंतर को भेदने वाला है और वह तलवार की धार की तरह तीखा ओर प्रखर है। वह इतनी कुशलता से श्रोताओं  के ह्रदय को भेद कर उनके अंदर पहुंच जाता कि किसी को यह मालूम ही न होता कि सर्जरी हो चुकी है।
      लेकिन यह आदमी बदसूरत था। मैं शारीरिक कुरूपता को कोई महत्‍व नहीं देता। अब उसके शरीर की बनावट या उसके रंग-रूप से मुझे क्‍या लेना-देना। लेकिन मन से भी वह बदसूरत थे। पहली बार जब उन्‍होंने बड़े संकोच से मेरे पैर छुए तो ऐसा लगा जैसे मेरे पैरा से पर कोई रेंगने बाला जंतु रेंग रहा हो, कोई सांप रेंग रहा हो और मैं कूद कर सांप को मार भी नहीं सकता था—वह सांप नहीं,आदमी था।
      मैंने बाबा की और देख कर कहा: अब इस सांप का मैं क्या करूं।
      बाबा ने कहा: मुझे मालूम था कि तुम इसे पहचान लोगे। थोड़ा धीरज रखे। पहले उसकी बांसुरी सुनो, फिर हम उसके सांप होने पर सोचेंगे। मुझे यही डर था कि तुम्‍हें इसका पता चल जाएगा। मुझे मालूम था कि वह तुम्‍हें धोखा नहीं दे सकता। लेकिन हम लोग बाद में इसकी बात करेंगे। पहले उसकी बांसुरी सुन लो।
      तो मैंने बांसुरी को सुना ।और वह सच जादूगर था—दूसरे के भीतर की गहराई में प्रवेश कर जाता था। ऐसा लगता था जैसे दूर किसी पहाड़ी पर कोयल बोल रही हो। इस कहावत को केवल भारतीय संदर्भ में ही समझा जा सकता है। भारत मैं कुक्कू से वह नहीं समझा जाता जो पश्‍चिम में समझा जाता है। पश्‍चिम में तो कुक्कू होने का मतलब है पागल होना। लेकिन पूर्व में अच्‍छे गायकों और कवियों को कुक्कू, कोयल की उपाधि दी जाती है। सचदेवा को बांसुरी के जगत की कोयल कहा जाता था। उनकी बांसुरी इतनी मधुर होती थी की कोयल को भी उससे ईर्ष्‍या हो सकती थी। मेरे कहने का अभी प्राय यह है कि उनका संगीत बहुत अच्‍छा था। केवल संगीत।
      पन्‍ना लाल बड़े सपाट ढंग से बढते है। वे बड़े विश्‍वास से अपना हर कदम आगे बढ़ाते है। इस विश्‍वास का कारण है उनकी मेहनत, उनका अभ्‍यास। तुम कहीं कोई दोष नहीं खोज सकते। सचदेवा के बांसुरी वादन में भी कोई त्रुटि नहीं थी, कोई दोष नहीं था। लेकिन वे सपाट जमीन पर नहीं चलते थे। वे पहाड़ों के पक्षी है। ऐसा पक्षी जो अभी जंगली है। और अपनी मौज में ऊपर-नीचे इधर-उधर उड़ता रहता है। अभी पालतू नहीं बना, लेकिन बहुत कुशल है। पन्‍ना लाल घोष काफी दूर लगते है, कुछ दिमागी वादक एक तकनीशियन लगते है। लेकिन सचदेवा सच्‍चे कलाकार हैं, बड़े प्रतिभाशाली है। कुछ जया करने वाले बहुत थोड़े लोग होते है और वे उनमें से एक है। खासकर बांसुरी के छोटे से क्षेत्र में उन्‍होंने इतनी मौलिक और नई धुनें तैयार की हैं कि आने वाली कई पीढ़ियाँ उनका रेकार्ड नहीं तोड़ सकती। कोई उनको हरा नहीं सकेगा।
      तुम यह भी देख सकते हो जब कि मैंने इस आदमी को कभी पसंद नहीं किया फिर भी मैं उनके बांसुरी वादन के प्रति न्‍याय कर रहा हूं, उसकी उचित सराहना ही कर रहा हूं। और वैसे भी आदमी का उसकी बांसुरी से क्‍या लेना-देना है। न वे मुझे पसंद करते थे, न में उनको पसंद करता था। मुझे वे इतने बुरे लगते थे कि जब वे अगली बार बाबा से मिलने आए और बाबा ने उन्‍हें मेरे पैर छूने के लिए कहा तो मैं पद्मासन लगा कर बैठ गया और अपने पैरों को अपने कुरते से ढाँक लिया। बाबा ने कहा: यह पद्मासन का अभ्‍यास तुमने कहां किया, आज तो तुम बहुत बड़े योगी जैसा व्‍यवहार कर हो। तुमने योग कब सीखा।
      मैंने कहा: इन साँपों और रेंगते हुए जीव-जंतुओं के कारण मुझे योग सीखना पडा। उदाहरण के लिए यह आदमी, मुझे इनकी बांसुरी बहुत अच्‍छी लगती है, लेकिन उनकी बांसुरी उनके आंतरिक स्‍वभाव से बिलकुल भिन्‍न है, दोनों में कोई साम्‍य नहीं है। मैं नहीं चाहता वे मुझे छुएँ। और मुझे मालूम था कि आप उनसे वही कहेंगे जो आपने अभी कहा। आप मुझे उनके पैर छूने को कहें, वह कहीं ज्‍यादा आसान होगा।
      अब मैं तुम्‍हें कुछ समझाता हूं, जिसके बिना अभी मैंने जो कहा है वह तुम्‍हें समझ न आ पाएगा। जब तुम किसी के पैरों को छूते हो तो तुम अपनी ऊर्जा को उसके चरणों में उँड़ेलते हो। तुम अपने आपको उसके प्रति अर्पित करते हो। जब तक तुम पूरी तरह से योग्‍य न होओ तब तक तुम्‍हें ऐसा करने से रोकना ही बेहतर होगा। मैं तो बिना किसी मुश्‍किल के उनके पैरों को छू सकता था। मेरे भीतर जो कुछ भी था उसे उनके पैरों में डाल सकता था। तुम फूल को पत्‍थर पर फेंक सकते हो, लेकिन पत्‍थर को फूल पर नहीं फेंकना चाहिए।   
      बाबा ने कहा: मैं समझता हूं, लेकिन उसको भी तो बदलना पड़ेगा।
      इसके बाद उन्‍होंने उनसे मेरे पैर छूने के लिए दुबारा नहीं कहा। इसके बाद कुछ बार फिर हम दोनों मिले तो न सचदेवा ने मेरी और देखा,न मैंने उनकी और देखा। मुझे बाबा का डर था  और सचदेवा को मेरा डर था। जब भी वे आते तो मैं बाबा को कुहनी मार कर याद दिलाता कि वे सचदेवा को मेरे पैर छूने के लिए न कहें। बाबा कहते, हां मुझे मालूम है। मैंने कहा: मुझे मालूम है कहने से काम नहीं चलेगा। जब तक वे यहां से चले न जाएंगे मैं आपको याद दिलाता रहूँगा। या तो वे अपनी बांसुरी बजाए या उन्‍हें चले जाने को कहिए। क्योंकि वे सिर्फ बुरी तरह से पैर छूते है ऐसा ही नहीं, उनका चेहरा और उनकी उपस्‍थिति, कुछ-कुछ आध्‍यात्‍मिक कैंसर जैसे है। तो यह समझोता हो गया कि अगर सचदेवा बाबा से बात करना चाहें तो मुझे किसी काम के बहाने वहां से भेज दिया जाए और इस प्रकार मैं मुक्‍त हो जाता और वहां से टल जाता। या  उनसे बांसुरी बजाने को कहा जाता। तब तो वे तारों को धरती पर उतार देते। तब तो वे पत्‍थरों को भी पिघला देते। वे तो जादूगर थे। लेकिन केवल बांसुरी बजाते समय मुझे उनकी बांसुरी बहुत अच्‍छी लगती है, लेकिन वे स्‍वयं नहीं।
      तीसरे व्‍यक्‍ति, हरि प्रसाद तो दोनों है। जितना उनका संगीत सुंदर है उतना ही उनका अंतर भी सुंदर है। उनका स्‍वभाव बहुत अच्‍छा है। वे पन्‍ना लाल घोष जितने प्रसिद्ध नहीं है। और शायद कभी होंगे भी नहीं, क्‍योंकि उन्‍हें इसकी परवाह नहीं है। न वे राजनेताओं के पीछे भगते है, न वे किसी के आदेश से बजाते है। उनकी बांसुरी का तो स्‍वाद ही कुछ और है। उनकी बांसुरी की विशेषता है—संतुलन, पूर्ण संतुलन, जेसे कि तेज बहते हुए पानी में चल रहे हो। यह उदाहरण मैं लाओत्से से दे रहा हूं। जब तुम बहुत तेज प्रवाह वाली जंगली नदी के साथ ही बह जाओगे। लाओत्से यह भी कहता है कि तुम्‍हें तेजी से जल्‍दी-जल्‍दी चलना होगा। क्‍योंकि नदी का पानी ठंडा है—बर्फ जैसा ठंडा। तेज और संतुलित—यही विशेषता है हरि प्रसाद चौरासिया कि बांसुरी की। उनकी शुरूआत वे अचानक ही कर दे तक है और अंत भी अचानक ही कर देते है। किसी को यह आशा ही नहीं कि वे इस प्रकार अचानक शुरू कर देंगे।
      पन्‍ना लाल घोष तो भूमिका बांधने में आधा घंटा लगा देते है। भारत में शास्‍त्रीय संगीत का यही तरीका है। तबला बजाने वाला अपने तबले को ठोंकता-पीटता है। वह अपनी छोटी से हथौड़ी से तबले पर इधर-उधर चोट करके उसकी आवाज को ठीक करता है। सितार बजाने वाला सितार के तारों को बार-बार खींच कर या ढीला करके देखता है कि सब तार स्‍वर बद्ध हो गए या नहीं। आधे घंटे तक बस यही चलता रहता है, वाद्य यंत्रों को तैयार किया जाता है। भारतीय बहुत धीरज वाले लोग है। इसे तैयारी कहा जाता है। लेकिन लोगों के आने से पहले इसकेा क्‍यों नहीं कर लिया जाता। या पर्दे के पीछे क्‍यों नहीं कहते। जैसा नाटक में करते है। बड़ी अजीब बात है कि भारतीय संगीतज्ञ अपनी तथा अपने यंत्रों की तैयारी श्रोताओं के सामने ही करते है। इसका कोई खास कारण तो होगा। मेरा ख्‍याल है कि पूर्व में शास्‍त्रीय संगीत इतना गहरा है कि अगर तुम आधे घंटे के लिए भी धीरज नहीं रख सकते तो तुम वहां उपस्‍थित रहने के योग्‍य ही नहीं हो।
      मुझे एक बहुत प्रसिद्ध कहानी याद आ गई है। गुरजिएफ अपने शिष्‍यों को बड़े अजीब समय पर बुलाता था। उसकी मीटिंग मेरा मीटिंग कि तरह निश्‍चित समय पर नहीं होती थी। यहां तो तुम लोगों को मेरे आने से पहले एकत्रित होना पड़ता है। अगर मैं पाँच मिनट देर से आऊं तो याद रखना, इसमें मेरा दोष नहीं है। मेरी कार के ड्राइवर मुझे जानबूझ कर थोड़ी देर से लाते थे। ताकि देर से आने वाले लोग भी बैठ जाएं। क्‍योंकि एक बार जब मैं पहुंच जाता हूं तो मुझे लोगों का इधर-उधर होना, भीतर आना जाना पसंद नहीं है। उस समय सब कुछ ठहर जाना चाहिए। जब चारों और सब शांत हो जाता है जब मैं अपनी काम आरंभ कर सकता हूं या जो कुछ भी मुझे बोलना होता है। जो मैं कहने जा रहा हूं वह जरा सी भी गड़बड़ से बदल जाता है। मैं कुछ न कुछ तो कहूंगा ही लेकिन यह वही नहीं होगा और शायद मैं उस बात को दुबारा कभी न कहुं।
      मेरा ढंग तो तुम्‍हें मालुम ही है, लेकिन गुरजिएफ का तरीका इससे बिलकुल उल्‍टा था। वह अपने शिष्‍यों को टेलीफोन से सूचित करता कि मीटिंग तीस मील की दूरी पर रखी गई है और वे लोग वहां पर समय पर पहुंच जाएं। अब बिना किसी पूर्व‍ सूचना के, बिना किसी तैयारी के तीस मील दूर समय पर पहुंचने के लिए गाड़ी की जरूरत तो होती ही है। अपने दूसरे सब कामों को छोड़-छाड़ कर भागे-भागे जब वे मीटिंग के स्‍थान पर पहुंचते तो देखते कि वहां पर नोटिस लगा हुआ है आज की मीटिंग रद्द कर दी  गई है।
      दूसरे दिन शिष्‍यों के टेलीफोन फिर से बजने लगते—मीटिंग की सूचना देने के लिए। पहले दिन अगर दो सो लोगों को बुलाया गया था तो उनमें से केवल सौ आते। दूसरे दिन तो केवल पचास ही आते और उनको भी दरवाजे पर यही नोटिस लिख हुआ मिलता कि मीटिंग रद्द कर दी गर्इ है। वहां पर इसके लिए खेद प्रकट करने के लिए भी कोई न होता। ऐसा कुछ दिन तक चलता रहता और चह चौथे या सातवें दिन आता। वह से मेरा मतलब गुरजिएफ से है। तब होता यह कि आरंभ में जो दो सौ लोग थे उनमें से अब केवल चार ही बचते। उनकी और देख कर वह कहता, जब मैं वह कह सकता हूं जो मैं कहना चाहता था और जिन लोगों को मैं यहां पर नहीं चाहता था वे अपने आप ही नहीं आए। केवल वही लोग बच गए हैं जो मेरी बात को सुनने के योग्‍य थे।
      गुरजिएफ का ढंग अलग ही था। वह भी एक तरीका है, एक उपाय है। लेकिन तरीके तो बहुत से हे। मुझे तो ऐसा कोई भी तरीका पसंद है जो कारगर हो, जिससे लोगों को लाभ हो, जिसको परिणाम अच्‍छा हो। मुझे गौतम बुद्ध की इस परिभाषा से विश्‍वास है कि सत्‍य वह है जो कारगर हो। अब यह बडी अजीब परिभाषा है। क्‍योंकि कभी-कभी झूठ काम कर सकता है। और मुझे मालुम है कि कई बार सच बिलकुल काम नहीं करता और झूठ काम कर देता है। लेकिन मैं बुद्ध से सहमत हूं। अगर बात काम करती है। सही परिणाम लाती है तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आरंभ में वह सच थी या झूठ। अंतिम परिणाम ही महत्‍वपूर्ण होता है। भले ही मैं गुरजिएफ के तरीके का उपयोग करूं,क्‍योंकि मैं दूसरों के तरीकों को नहीं अपनाता, हालाकि लोग समझते है कि मैं ऐसा करता हूं। मैं केवल इसका दिखाव करता हूं। मैं तो जो कारगर है उसी को उपयोग करता हूं। किसका है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सत्‍य तो नमेरा है, न तुम्‍हारा है।
      ये जो तीसरे व्‍यक्‍ति है, ये मुझे बहुत प्रिय है। जिस क्षण से हमने एक दूसरे को देखा हमने एक दूसरे को पहचान लिया। उन तीन बांसुरी वाद को में से एक ऐसे थे जिन्‍होंने बाबा के कहने से पहले ही मेरे पैर छू लिए। जब यह हुआ तब बाबा ने कहा: यह तो बड़ी अजीब बात है। हरि प्रसाद, तुमने एक बच्‍चे के पैर कैसे छू लिए। हरि प्रसाद ने कहा: क्‍या कोई ऐसा कानून है जो इसकी मनाही करता है। बच्‍चे के पैर छूना कोई अपराध है। मुझे यह बहुत अच्‍छा लगा, बहुत प्यार  लगा, इसलिए मैंने इसके पैर छुए।
      बाबा तो बहुत खुश हो गए। ऐसे लोगों से वे बहुत खुश होते थे। अगर पन्‍ना लाल घोष भेड़ जैसे थे, तो हरि प्रसाद तो शेर है। वे बहुत ही अनोखे सुंदर और प्‍यारे व्‍यक्‍ति है। तीसरे व्‍यक्‍ति, मेरा मतलब है सचदेवा, उनका तो  मैं नाम भी नहीं लेना चाहता। लेकिन मेरा कोई नुकसान नहीं किया, लेकिन उनके नाम से ही मेरे सामने उनका कुरूप चेहरा आ जाता है। और तुम्‍हें मालूम है कि मैं सौंदर्य का कितना आदर करता हूं। मैं सब कुछ क्षमा कर सकता हूं लेकिन कुरूपता को नहीं। और वह कुरूपता शरीर की नहीं आत्‍मा की भी हो तब तो उसे सहन नहीं किया जो सकता। वे भीतर और बाहर , दोनों और से कुरूप थे। कुरूपता की कोई सीमा नहीं थी।
                जहां तक इन बांसुरी वादकों का सवाल है उनमें हरि प्रसाद ही मेरी पंसद है। उनकी बांसुरी में उन दोनों की विशेषता तो पाई जाती है। लेकिन व न पन्‍ना लाल घोष की भांति बहुत जोरदार और आडंबर पर्ण है और न इतनी प्रखर और तेज कि वह तुम्‍हें भेद कर काट कर पीडा पहुँचाए। वे तो हवा के समान कोमल है, गर्मी की रात में ठंडी हवा के झोंके के समान है। वे तो चाँद के समान है, प्रकाश तो है पर गरम नहीं, ठंडा है। तूम उसके ठंडे पन को महसूस कर सकते हो।    
      हरि प्रसाद को आज का महानतम बांसुरी वादक माना जाना चाहिए। लेकिन वे बहुत प्रसिद्ध नहीं है। हो भी नहीं सकेत, क्‍योंकि वे बहुत विनम्र है। प्रसिद्ध होने के लिए बहुत आक्रामक होना पड़ता है। वे न संघर्ष कर सकते है, न लड़ाई। अपने नाम के लिए वे किसी प्रकार का कोई संघर्ष नहीं कर सकते। लेकिन हरि प्रसाद को पहचानने वाले पागल बाबा जैसे लोग थे। पागल बाबा ने कुछेक दूसरे लोगों को भी पहचाना था। उनकी बात मैं बाद में  करूंगा। क्‍योंकि वे भी मेरे जीवन में उनके माध्‍यम से ही आए।
      बड़ी अजीब बात है कि हरि प्रसाद को बिलकुल नहीं जानता था। और जब पागल बाबा ने उनका मुझसे परिचय कराया तो उनकी मुझमें दिलचस्‍पी इतनी बढ़ गई कि हवे पागल बाबा के पास इसलिए आते कि वे मुझसे मिल सकें। एक बार पागल बाबा ने मजाक में उनसे कह ही दिया कि अब तुम मुझसे मिलने नहीं आते—यह तुम भी जानते हो और मैं भी जानता हूं और जिसके लिए तुम आते हो वह भी जानता है।
      मैं हंस पडा: हरि प्रसाद ने हंस कर कहा: बाबा, आप बिलकुल ठीक कहते है।
      मैंने कहा: मुझे तो मालूम था बाबा देर अबेर, कभी न कभी यक बात जरूर कहेंगे। और यही उस व्‍यक्‍ति का सौंदर्य था। वे अनेक लोगों को मेरे पास लाए, लेकिन मुझे धन्‍यवाद देने से भी रोक दिया। उनहोंने मुझसे केवल यहीं कहा: मैंने तो सिर्फ अपना कर्तव्‍य निभाया है। मुझ पर तुम केवल एक ही कृपा करना कि जब मैं मरू तो तुम मेरी चिता को आग लगाना।
      मैंने उनको ऐसी मनोदशा में कभी नहीं देखा था। तब मैं जान गया कि उनका अंतिम समय जल्‍दी ही आने वाला है। इसके बारे में बात करके वह अपना समय नष्‍ट नहीं करना चाहते थे।
      मैंने कहा: अच्‍छा, इसके बारे में कोई बहस नहीं की जाएगी। मैं आपकी चिता को आग दूँगा—इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे पिता आपति करते है। या अपका परिवार आपति करता है। मैं आपके परिवार को नहीं जानता।     
      संयोगवश पागल बाबा की मृत्‍यु मेरे ही गांव में हुई। लेकिन शायद उन्होंने स्‍वंय ऐसी व्‍यवस्‍था की। मेरा खयाल है कि उन्‍होंने स्‍वयं अपनी इच्‍छानुसार ऐसा किया। जब मैं उनकी चिता को आग देने लगा तो मेरे पिता ने कहा: तुम क्‍या कर रहे हो, यह काम तो सबसे बड़ा बेटा ही करता है। मैंने कहा: दद्दा, मुझे करने दीजिए। मैंने उनसे वादा किया था। ओर जहां तक आपका सवाल है तो मैं यह नहीं कर सकूंगा। मेरे छोटा भाई करेगा। असल में वही आपका सबसे बड़ा बेटा है। मैं नहीं, मैं तो परिवार के लिए किसी कामा का नहीं हूं। और न ही कभी होऊंगा। मैं तो सदा परिवार के लिए एक उपद्रव ही सिद्ध होऊंगा। मेरे बाद जो मुझसे छोटा भाई है वह आपकी चिता को आग लगाएगा और वही परिवार की देखभाल करेगा।
      मैं अपने भाई विजय का बहुत आभारी हूं। मेरे कारण ही वह विश्‍वविद्यालय में न पढ़ सका। क्‍योंकि मैं तो कुछ कमा नहीं रहा था और किसी न किसी को तो परिवार का उत्‍तर दायित्‍व लेना ही पड़ता,उसकी देख भाल करनी ही पड़ती। मेरे दूसरे भाई विश्‍वविद्यालय में पढ़ने के लिए गए। उनका खर्च भी देना पड़ता था। इसलिए विजय घर पर ही रहा। उसने सचमुच बहुत त्‍याग किया। विजय जैसा प्‍यारा भाई बड़े भाग्‍य से मिलता है। उसने बहुत त्‍याग किया। मैं शादी करने के लिए राज़ी नहीं था। इसके लिए परिवार के लोग मुझ पर दबाव डाल रहे थे।
      विजय ने मुझसे कहा: भैया, अगर सब लोग आपको शादी के लिए बहुत परेशान कर रहे है तो मैं शादी करने के लिए तैयार हूं, सिर्फ आपकेा मुझसे एक वायदा करना होगा। मेरे लिए लड़की आपको पंसद करनी होगी। यह विवाह परिवार के लोगों की पसंद और उनकी इच्छा अनुसार ही किया जा रहा था। भारत में विवाहा प्राय: परिवार द्वारा ही निश्‍चित किया जाता है।
      मैंने कहा: हां, यह तो मैं कर सकता हूं। लेकिन उसका त्‍याग मेरे ह्रदय को छू गया। और इससे मुझे बहुत लाभ हुआ। एक बार उसकी शादी हो गई तो मुझे पूरी तरह भुला दिया गया क्‍योंकि मेरे दूसरे भाई-बहिन भी थे। एक बाद शादी हो गई तो उसके बाद मेरे दूसरे भाई बहनेां की शादी का क्रम शुरू हो गया। मैं कोई कारोबार करने को तैयार नहीं था।
      विजय ने कहा: इसकी भी आप चिंता मत करो। मैं किसी प्रकार का कोई भी काम करने को तैयार हूं। और छोटी सी उम्र से ही उसने परिवार का सारा बोझ उठा लिया आरे काम धंधे में व्‍यस्‍त हो गया। इन सब बातों के लिए मैं उसका बहुत आभारी हूं और उसके प्रति मेरी बहुत सहानुभूति है।
      मैने अपने पिता से कहा: पागल बाबा ने मुझसे कहा था और मैने उनसे वादा किया था, इसलिए मैं उनकी चिता को आग दूँगा। जहां तक आपकी मृत्‍यु का प्रश्‍न है, चिंता मत करें, मेरा छोटों भाई वहां होगा। मैं भी वहां उपस्‍थित रहूंगा, लेकिन आपके पुत्र की हैसियत से नहीं।
      मुझे नहीं मालुम कि ऐसा मैंने क्‍यों कहा, और उन्‍होंने क्‍या सोचा होगा। लेकिन बाद में यह सच हुआ। जब उनकी मृत्यु हुई तो मैं वहां उपस्‍थित था। मैंने उन्‍हें अपने पास रहने के लिए बुला लिया था ताकि मुझे उस शहर न जाना पड़े जहां वे रहते थे। अपनी नानी की मृत्‍यु के बाद मैं वहां दुबारा नहीं जाना चाहता था। वह दूसरा वादा था। मुझे अनेक वायदे पूरे करने है। लेकिन अभी तक उनमें से अधिकांश सफलता पूर्वक मैं पूरे कर चूका हूं। अब तो थोडे से ही वायदे पूरे करने को रह गए है।
      मैंने अपने पिताजी से कहा था और मैं उनकी मृत्‍यु के समय वहां उपस्‍थित था। लेकिन मैं उनकी चिता को आग नहीं लगा सका। और निश्‍चित ही उस समय मैं उनके पुत्र की तरह उपस्‍थित नहीं था। जब उनकी मृत्‍यु हुई तब वे मेरे शिष्‍य थे। वे मेरे संन्‍यासी थे और मैं उनका गुरु था।

 --ओशो   





Friday, December 4, 2009

स्‍वर्णिम बचपन—( सत्र- 29 )

    पागल बाब और रहस्‍य

      सारी रात हवा पेड़ों में से सरसराती हुई बहती रही। यह आवाज इतनी अच्‍छी लगी कि मैंने पन्‍ना लाल घोष के संगीत को सुना। उन बांसुरी वादकों में से जिनको पागल बाबा ने मुझसे परिचित करवाया था। अभी-अभी मैं उनके संगीत को सुन रहा था। उनका बांसुरी बजाने का ढंग अपना ही है। उनकी प्रस्‍तावना बहुत लंबी होती है। गुड़िया ने जब मुझे बुलाया तो अभी भूमिका ही चल रही था—मेरा मतलब है कि तब तक उन्‍होने अपनी बांसुरी को बजाना आरंभ नहीं किया था। सितार और तबला उनकी बांसुरी के बजने की पृष्‍ठभूमि तैयार कर रहे थे। पिछली रात शायद दो साल के बाद मैंने उनके संगीत को दुबारा सुनी।
      पागल बाबा की बात परोक्ष‍ रूप मैं ही करनी पड़ती है। उनकी यही विशेषता थी। वे सदा अदृश्‍य से ही बने रहते थे। उन्‍होंने मेरा परिचय अनेक संगीतज्ञों से कराया। और मैं सदा उन से पूछता था कि वे ऐसा क्‍यों करते है। वे कहते थे: ‘’ एक दिन तुम संगीतज्ञ बनोगें।‘’
      मैने कहा: ‘’ पागल बाबा, कभी-कभी ऐसा लगता है कि लोग ठीक कहते है कि आप पागल हो। मैं संगीतज्ञ नहीं बनने बाला हूं। उन्‍होंने हंस कर कहा: ‘’ मुझे मालूम है। फिर भी मैं यह कहता हूं कि तुम संगीतज्ञ बनोगें।‘’
      अब उनकी इस बात से क्‍या समझा जाए, मैं संगीतज्ञ तो नहीं बना। लेकिन फिर भी एक अर्थ में उनकी बात ठीक थी। मैंने संगीत के किसी यंत्र को तो नहीं बजाया,लेकिन मैंने हजारों लोगो की ह्रदय तंत्री को बजाया है। बिना किसी साज के, बिना किसी तकनीक के मैने जो संगीत बजाया है, वह साज के संगीत से कहीं अधिक गहरा और मर्मस्पर्शी है।
      मुझे वे तीनों बांसुरी वादक अच्‍छे लगते थे, कम से कम उनका संगीत अच्‍छा लगता  था। लेकिन उन में से कुछ एक ही मुझे पसंद करते थे। हरि प्रसाद मुझसे बहुत प्रेम करते थे । उनको कभी यह खयाल नहीं आया कि मैं बच्‍चा हूं, और वे मुझसे बड़े है, और संसार के सुविख्‍यात संगीतज्ञ है। वे मुझसे प्रेम ही  नहीं वरन मेरा आदर करते थे एक बार मेंने उनसे पूछा कि हरी बाबा, आप मेरा आदर क्‍यों करते हो। उन्‍होंने उत्‍तर दिया: ‘’ अगर बाबा तुम्‍हारा आदर करते है तो आदर करते है तो मैं क्‍यों न करूं। मेरा पागल बाबा पर पुरा विश्‍वास है। और अगर वे तुम्‍हारे पैर छूते है, और तुम छोटे से बच्‍चे हो, तो इसका मतलब है कि उनके जो मालुम है उसको समझने में या जानने में अभी मैं असमर्थ हूं। पर वह गौण है, मेरे लिए इतना ही काफी है कि वे जानते है। वे भक्‍त थे।    
      पिछली रात जिस संगीतज्ञ को मैंने सुना ओर यहां आने से पहले दुबारा जिसे सुनने की कोशिश कर रहा था, वे है पन्‍ना लाल घोष। वे मुझे न पंसद करते थे,न नापंसद करते थे। वे बहुत ही सपाट आदमी थे—दूर तक फैले हुए सपाट मैदान की तरह जिसमें न कोई पहाड़ी थी। न कोई घाटी थी। उनकी पसंद और नापसंद में कोई गहराई नहीं थी। लेकिन उनका बांसुरी बजाने का जो अपना ढंग था। वह अनोखा था उनके जैसी बांसुरी न पहले किसी ने बजाईं न बाद में कोई बजाएगा। अपनी बांसुरी पर तो वे शेर की तरह गरजते थे।
      एक बार मैंने उनसे पूछा: ‘’ अपने जीवन में तो आप ठीक बंगाली बाबू हो—भेड़ जैसे। वे बंगाल के थे और भारत में कायर आदमी को बंगाली कहा जाता है। क्‍योंकि बंगाली आक्रमक नहीं होता।) आप सच्‍चे बंगाली बाबू हो। लेकिन जब आप बांसुरी बजाते हो तो आपको क्‍या हो जाता है। आप तो शेर बन जाते हो।‘’
      उन्‍होंने कहा: ‘’ कुछ तो अवश्‍य होता है। मैं वही नहीं रहता अन्‍यथा मैं वही बंगाली बाबू रहूँ ठीक वही दब्बू और डरपोक, लेकिन कुछ होता है, मुझ पर सवार हो जाता है। ठीक यही शब्‍द उन्‍होंने उपयोग किए थे। मैं आवेशित हो जाता हूं, मैं नहीं जानता कि मुझे पर क्‍या छा जाता है। शायद तुम जानते होगें। नहीं तो पागल बाबा मन में तुम्‍हारे लिए इतना आदर क्‍यो  होता। मैंने उनको कभी किसी के पैर छूते नहीं देखा, लेकिन वे तुम्‍हारे पैर छूते है। बड़े-बड़े संगीतज्ञ उनके  पास आते है उनके आशीर्वाद को प्राप्‍त करने के लिए और उनके पैर छूने के लिए।
      पागल बाबा ने मुझे केवल बांसुरी वादकों से ही नहीं और भी अनेक लोगों से परिचित करवाया था। शायद मेरी कहनी के किसी दौर में उनका भी जिक्र आएगा। लेकिन पन्‍ना लाल घोष ने जो कहा वह बहुत महत्‍वपूर्ण है।
      उन्‍होंने कहा: ‘’ मैं आवेष्टित हो जाता हूं, एक बार मैं बजाना शुरू करता हूं तो मैं पन्‍ना लाल घोष नहीं होता। कुछ और ही हो जाता हूं,  मैं उनके शब्‍दों को शब्‍दों को उद्धृत कर रहा हूं। उसके बाद उनहोंने कहा, इसीलिए असली धुन को बजाने से पहले मुझे बहुत देर तक स्‍वरों की लंबी भूमिका तैयार करनी पड़ती है। बांसुरी वादक इतनी लंबी भूमिका प्रस्‍तुत नहीं करते। इसीलिए लोग मेरी आलोचना करते है।
      वे बांसुरी के क्षेत्र के बर्नार्ड शॉ थे। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ की पुस्‍तक अगर नब्बे पृष्ठों की होती है तो उसकी भूमिका तीन सौ पृष्ठों की होती है। पन्‍ना लाल घोष ने कहा, लोग तो समझ नहीं सकते। लेकिन में तुम्‍हें बताता हूं कि मुझे तब तक इंतजार करना पड़ता है जब तक मैं आवेष्टित न हो जाऊँ। लंबी भूमिका का यही कारण है। जब तक यह आंतरिक स्‍वयं नवन जाए, मैं बजाने में लीन नहीं हो सकता।
      ये शब्‍द है प्रमाणिक कलाकार के। केवल प्रामाणिक कलाकार ही ऐसा कह सकता है। पत्रकार के ढंग का कलाकार संगीत के बारे में लिखते है, लेकिन स्‍वयं उनको इसका कोई अनुभव नहीं होता। वे कविता के बारे में लिखते है, जब कि स्‍वयं उन्‍होंने कभी एक कविता नहीं लिखी। वे राजनीति के बारे में लिखते है, जब कि राजनीति के संघर्ष का उन्‍हें कोई अनुभव नहीं होता। आफिस में बैठ कर ये पत्रकार हर विषय के बारे में लिख देते है। एक ही व्‍यक्‍ति एक सप्‍ताह संगीत के बारे में लिखता है। दूसरे सप्‍ताह काव्‍य के बारे में  और तीसरे सप्‍ताह राजनीति की चर्चा करता है1 लेकिन  इन सब विषयों पर वह एक ही नाम से नहीं वरन विभिन्‍न नामों से लिखता है।
      एक बार मुझे भी आवश्‍यकतावश पत्रकार बनना पड़ा था। अन्‍यथा मुझे यह कष्‍ट सहन न करना पड़ता। मेरे पास पैसे नहीं थे और मेरे पिता मुझे विज्ञान पढ़ने के लिए भेजना चाहते थे। मुझे विज्ञान में कोई दिलचस्‍पी नहीं थी। न अब है न तब थी। और वे इतने गरीब थे कि मुझे लगा कि वे बहुत बड़ा जोखिम उठा रहे है। मेरे परिवार में किसी ने भी उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त नहीं कि थी। मेरे पिता ने मेरे एक चाचा को विश्वविद्यालय में पढ़ने भेजा था, लेकिन वहां का खर्च वहन न कर सकने के कारण उनको वापस बुलाना पडा था।
      अब मेरे पिताजी मुझे विश्‍वविद्यालय भेजने को तैयार थे। इसके लिए उन्‍हें बहुत बड़ा त्‍याग करना पड़ता। वे इसे व्‍यावसायिक ढंग से  करना चाहते थे। वे सोच रहे कि अगर वक मेरी शिक्षा पर पैसा लगाएंगे तो आगे चल कर इससे अधिक उनको वापस मिल जाएगा। मैंने उनसे कहां: यह मेरी शिक्षा का प्रश्‍न है या आप की पूंजी का निवेश का। आप मुझे इंजीनियर या डाक्‍टर बनाना चाहते है ताकि मैं अधिक कमा सकूं। लेकिन मैं तो कभी कुछ नहीं कमाना चाहता,सदा अधिक से अधिक सीखते रहना चाहता हूं। और फिर मैंने उनसे कहा: मैं तो होबो(आवारा घुमक्कड़)बना रहूँगा। उन्‍होंने कहा: क्‍या होबो, मैंने कहा: अच्‍छे शब्दों में एक संन्‍यासी। वे तो स्‍तब्‍ध रह गए। उन्‍होंने कहा: अगर तुम्‍हें संन्‍यासी ही बनना है तो विश्‍वविद्यालय में पढ़ने की क्‍या जरूरत है।
      मैंने कहा: मुझे इन प्रोफेसरों से धृणा हैं, लेकिन उनकी निंदा करने के लिए, उनकी आलोचना करने के लिए यह जरूर है कि पहले उनके पेशे से अच्‍छी तरह से परिचित हो जाऊँ।   
      उन्‍होंने कहा: यह तो और अजीब बात है कि तुम विश्‍वविद्यालय इसलिए जाना चाहते हो ताकि बाद में उनकी निंदा कर सको। मैं पैसा उधार लेकर या अपने मकान को गिरवी रख कर, अपने व्‍यापार को जोखिम में डाल कर तुम्‍हें विश्‍वविद्यालय भेजूं ताकि तुम इन्‍हीं प्रोफेसरों की बुराई कर सको। यह काम तुम विश्‍वविद्यालय में जाए बिना क्‍यों नहीं कर सकते हो।
      मैंने पिताजी के लिए एक छोटा सा पत्र लिख कर घर छोड़ दिया। मैंने लिखा कि मैं आपकी भावनाओं को समझ सकता हूं और मैं आपकी आर्थिक स्‍थिति को भी जानता हूं। न आप मुझे समझ सकते है और न मैं आप को समझ सकता हूं। हम दोनों अलग-अलग दुनिया के है। कम से कम अभी हम दानों के बीच कोई पुल नहीं है। इसकी कोई जरूरत भी नहीं है। आपने मेरे लिए जो कुछ भी करना चाहा उसके लिए धन्‍यवाद,लेकिन वह एक पूंजी निवेश था और आपने व्‍यापार में मैं आपका भागीदार नहीं बनना चाहता। आपसे बिना मिले मैं जा रहा हूं और अब शायद मैं आपसे तभी मिलुंगा जब मैं आर्थिक रूप से स्‍वतंत्र होकर अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊँगा।
      इसलिए मुझे पत्रकार का काम करना पडा। यह सबसे खराब काम है, लेकिन उस समय और कोई काम उपलब्ध नहीं था। तो मजबूरी में मुझे यही काम करना पडा। भारत में पत्रकारिता तीसरे दर्जे का निम्‍नतम काम है। तीसरे दर्जे का ही नहीं, संसार का सबसे खराब काम है। मैंने इसे किया तो सही लेकिन बहुत अच्‍छी तरह से न कर सका। मैं कुछ भी अच्‍छी तरह से नहीं कर सकता। अच्‍छी तरह से करना तो दूर रहा। मैं तो कुछ भी नहीं कर सकता। यह में अपने प्रति शिकायत नहीं कर रहा, केवल स्‍वीकार कर रहा हूं।
      और वह नौकरी तो जल्‍दी ही समाप्‍त हो गई। क्‍योंकि जब मालिक, प्रधान संपादक आया, तो मैं मेज पर पैर रख कर सो रहा था—ठीक जैसे अभी मैं हूं। उसने मुझे देखा और मुझे झकझोरा। मैंने अपनी आंखें खोली, उसको देखा और कहा, यह कैसी अशिष्‍टता है। मैं गहरी नींद सो रहा था और सुंदर सपना देख रहा था। आपने उसे भंग कर दिया। उस सपने को दुबारा देखने के लिए मैं अमूल्‍य निधि दे सकता हूं। मैं पैसे देने को तैयार हूं, अब बताइए कि उस सपने के आगे कैसे बढ़ाऊ।
      उसने कहा: मुझे तुम्‍हारे सपने से कोई सरोकार नहीं है। भाड़ में जाए तुम्‍हारा सपना। लेकिन यह समय मेरा है और इसके लिए तुम्‍हें पैसे दिए जाते है। इसलिए तुम्‍हें नींद से उठाने का मेरा अधिकार है।
      मैंने कहा: अच्‍छा, तो फिर यहां से चले जाने का अधिकार मेरा है। इतना कह कर मैं बाहर चला गया। उसने गलत बात नहीं कही थी, लेकिन मैं गलत जगह पहुंच गया था। वह स्‍थान मेरे लिए नहीं था। मैं पत्रकारों के साथ तीन वर्ष तक रहा। वह नरक था। पत्रकार बहुत ही घटिया लोग होते है।
      हां, तो मैं कह रहा था, मैं तुम लोगों को चेक कर रहा हूं।
      आप बता रहे थे कि आपके पिता आपकी आर्थिक सहायता नहीं कर सकते थे इसलिए आपको पत्रकारिता का काम करना पडा।
                उसके पहले?
      जब तुम सचमुच में प्रामाणिक कलाकार होते हो तो तुम आविष्‍ट हो जाते हो।
      ठीक।  
      पत्रकारिता के ढंग का नहीं।
      ठीक-ठीक और सही नोट लिखना चालू रखो। तुम अच्‍छे लेखक बन गए हो।    
      मेरे पिता को बहुत आश्‍चर्य होता थ जब भी पागल बाबा आकर मेरे पैर छूत थे। वे पागल बाबा के पैर छूते थे। बड़ा मजेदार दृश्‍य होता था। और चक्र को पूरा करने के लिए मैं अपने पिताजी के पैर छूता था। पागल बाबा इतने जोर से हंसने लगते थ कि सब लोग चुप हो जाते थे, मानेा कुछ विशेष घट रहा हो। और मेरे पिता को संकोच होता।
      पागल बाबा बार-बार मुझे यह समझाने की कोशिश करते कि संगीतज्ञ बनना मेरा भविष्‍य है। मैं कहता, नहीं। और जब मैं नहीं कहता हूं तो सच्‍चे अर्थों में नहीं होता है।
      बचपन में मेरा नहीं बहुत स्‍पष्‍ट रहा है। हां, तो मैं कभी-कभी कहता हूं। यह हांशब्‍द इतना अमूल्य, इतना पवित्र है कि इसका प्रयोग केवल दिव्‍य की उपस्‍थिति में ही होना चाहिए चाहे वह प्रेम हो या सौंदर्य.....इस समय तो गुलमोहर के पेड़ पर खिले हुए असंख्‍य घने फूल—जैसे कि समूचे वृक्ष से आग की लपटें निकल रही हों। जब कोई चीज तुम्‍हें पावनता की याद दिलाए तब हां शब्‍द का प्रयोग करना चाहिए—तब वह प्रार्थना से भरा हुआ होता है। नहीं का अर्थ होता है कि मैं अपने आप को प्रस्‍तावित गतिविधि से अलग कर लेता हूं। मैं तो सदा से नहीं कहने वाला रहा हूं। मुझसे हां कहलाना बहुत मुशिकल था।
      पागल बाबा संबुद्ध माने जाते थे। मुझे उन दिनों में भी वे अनोखे दिखाई देते थे। मुझे समाधि के बारे में कुछ मालूम नहीं था। उस समय मेरी वही स्‍थिति थी जो आज है—नितांत अज्ञानी, लेकिन उनकी उपस्‍थिति तेजस्‍वी थी। हजारों लोगों में वे आसानी से पहचाने जा सकते थे।
      वे पहले आदमी थे जो मुझे कुंभ के मेले में ले गए। प्रयाग में कुंभ का मेला हर बारह वर्ष में लगता है। सारी दुनिया में शायद ही किसी और जगह पर इतनी बड़ी संख्‍या में लोग जमा होते होंगे। प्रत्‍येक हिंदू कुंभ के मेले को देखने का सपना देखता है। हिंदू सोचता है कि कुंभ के मेले में सम्‍मिलित हुए बिना जीवन सार्थक नहीं होता। इस मेले में कम से कम एक करोड़ लोग तो होते ही है और अधिकतम संख्या ती करोड़ की होती है।
      मुसलमान भी इसी प्रकार सोचते है कि अगर मक्‍का जाकर हज नहीं की और हाजी ने बने तो सारा जीवन व्‍यर्थ हो गया। हज का अर्थ है:  मक्‍का की यात्री—जहां पर मोहम्‍मद रहे और जहां उनकी मृत्‍यु हुई। सारी दुनिया के मुसलमानों का एकमात्र सपना यहीं है कि कम से कम एक बार मक्‍का ही यात्रा करनी चाहिए। हिंदू प्रयाग जाना चाहते है। ये स्‍थान उनके इजराइल है। ऊपरी सतह पर तो सब धर्म अलग-अलग दिखाई देते है, लेकिन जरा कुरेदने पर सबके भीतर वही कचरा भरा हुआ है। हिंदू, मुसलमान, यहूदी, ईसाई से कोई फर्क नहीं पड़ता।
      कुंभ मेले की विशेषता अलग ही है। तीन करोड़ लोगों का एक स्‍थान पर एकत्रित होना ही अपने आप में एक दुर्लभ अनुभव है। सारे हिंदू साधु-संन्‍यासी वहां आते है। और उनकी संख्‍या कम नहीं होती—पाँच लाख होती है। और रंग-विरंग लोग होते है। तुम कल्‍पना भी नहीं कर सकत कि कैसे-कैसे संप्रदाय होते है, तुम भरोसा नहीं कर सकते कि ऐसे लोग भी होते है। और ये सब विचित्र लोग वहां पर एकत्रित होते है। 
      पागल बाबा मुझे जीवन में पहली बार कुंभ के मेले में ले गए। इसके बाद भी एक बार मैं गया था। लेकिन पागल बाबा के साथ जाने का अनुभव बहुत ही ज्ञान वर्धर्क था। क्‍योंकि वे मुझे सभी महान और तथाकथित महान संतों के पास ले गए और उनके सामने ही, हजारों की भीड़ में वे मुझसे पूछते, क्‍या ये आदमी सच्‍चा संत है। मैं कह देता, नहीं’, लेकिन पागल बाबा भी मेरी ही तरह जिद्दी थे। उन्‍होंने उम्‍मीद नहीं छोड़ी, वे मुझे हर संभव संत के पास ले गए जब तक कि एक आदमी के लिए मैंने हीं नहीं कहा। पागल बाबा ने हंस कर कहा: मुझे मालूम था कि तू सच्‍चे आदमी को पहचाने लेगा, तुमने इसको पहचान लिया। यह समाधिस्‍थ और संबुद्ध व्‍यक्ति है, लेकिन इसको कोई नहीं जानता। यह आदमी एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठा हुआ था। और उसके पास कोई अनुयायी नहीं था। तीन करोड़ लोगों की भीड़ में शायद वह बिलकुल अकेला था। बाबा ने पहले मेरे पैरों को छुआ और फिर उसके पैरों को छुआ। उस आदमी ने कहा: इस बच्‍चे को तुमने कहां से खोज लिया, मैं तो सोच भी नहीं सकता था कि एक बच्‍चा मुझे पहचान लेगा। मैंने तो अपने आप को बहुत अच्‍छी तरह से छिपा रखा है। तुम्‍हारा मुझे पहचानना तो ठीक है, लेकिन यह कैसे पहचान सका।
      बाबा ने कहा: यही तो पहेली है। इसीलिए तो मैं इसके पैर छूता हूं। अब तुम इसके पैर छुओ।
      अब निन्यानवे साल के इस वयोवृद्ध आदमी की आज्ञा को कौन टाल सकता था । वे इतने तेजस्‍वी और रोबीला थे। उस आदमी ने तुरंत मेरे पैरों को छुआ।
      पागल बाबा इसी प्रकार मुझे सब प्रकार के लोगों से परिचित कराते थे। इस दौर में तो मैं अधिकतर संगीतज्ञों की ही चर्चा कर रहा हूं, क्‍योंकि संगीत से उनको विशेष प्रेम था। वे मुझे भी संगीतज्ञ बनाना चाहते थे। लेकिन मैं उनकी इस इच्‍छा को पूरी नहीं कर सका, क्‍योंकि मेरे लिए संगीत केवल एक प्रकार का मनोरंजन है। मैंने उनसे यही कहा था: पागल बाबा संगीत काफी निम्‍न कोटि का ध्यान है, मुझे इसमें कोई दिलचस्‍पी नहीं है।
      उन्‍होंने कहा: हां, मुझे मालूम है। मैं तुमसे सुनना चाहता था। लेकिन ऊंचे उठने के लिए संगीत एक अच्‍छी सीढ़ी है। उसे पकड़े नहीं रहना चाहिए या उसी पर अटके नहीं रहना चाहिए। सीढी का काम है किसी दूसरी जगह पहुंचना।
      इसी लिए मैंने अपनी समस्‍त ध्‍यान-विधियों में संगीत का उपयोग एक सीढी की तरह किया है—उस असली संगीत, नाद हीन संगीत के लिए। नानक कहते है, एक ओंकार सत्नाम। अर्थात  परमात्मा या सत्‍य का एक ही नाम है और वह है की नाद हीन नाद, स्‍वरहीन स्‍वर। शायद ध्‍यान का जन्‍म संगीत से हुआ हो या संगीत ध्‍यान की मां है। लेकिन अपने आप में संगीत ध्‍यान नहीं है। यह सिर्फ एक इशारा हो सकता है। केवल एक संकेत हो सकता है......
     

      चिरंतन तालाब
      मेढक उसमें छलांग लगाता है,
      स्‍वरहीन स्‍वर.......
     
      इसका अनुवाद कई तरह से किया गया है। एक तो यह है स्‍वरहीन स्‍वर प्‍लाप इससे भी अच्‍छा है लेकिन हिंदी का शब्‍द और भी अच्‍छा और अर्थपूर्ण है। जब मेढक तालाब में कूदता है तो उसकी आवाज होती है—तुम उसे प्‍लाप कह सकते हो, लेकिन हिंदी का शब्‍द इसकी आवाज को ठीक उसी तरह से प्रकट करता है, वह शब्‍द है: छपाक। अब तुम मेढक बन कर तालाब में कूदो, तो तुम्‍हें मालूम हो जाएगा कि छपाक क्‍या है।
      अंग्रेजी में लिखना मुशिकल होगा। अच्‍छा होगा, मैं तुम लोगों को बता दूँगा, नहीं तो तुम कुछ गलत लिख दोगे। छपाक को अंग्रेजी में इन अक्षरों में लिखना पड़ेगा: सी एँच एँच ए पी ए के। अंग्रेजी में के लिए कोई अक्षर नहीं है। इस लिए हमें इस प्रकार लिखना पड़ेगा।
      अंग्रेजी में केवल छब्बीस अक्षर है। तुम्‍हें जान कर आश्‍चर्य होगा कि हिंदी या संस्‍कृत की वर्णमाला की संख्‍या इससे दुगुनी है—बावन अक्षर है। बहुत बार अनुवाद करना या रोमन लिपि में लिखना भी मुश्‍किल हो जाता हे। अंग्रेजी में ध्‍वनि ही नहीं है। और बिना छ के न मेढक होगा, ना छपाक होगा, और ऐसी हजारों चीजों से चूक जाओगे।
      एक ओंकार सत्नाम, सत्‍य का वास्‍तविक नाम तो नाद हीन नाद है। इसको संस्‍कृत में लिखने के लिए हमने जो अक्षर विहीन प्रतीक बनाया वह केवल ध्‍वनि है। नाद है, यह संस्‍कृत वर्णमाला का हिस्‍सा नहीं है। ओम सिर्फ एक ध्‍वनि है, नाद है। और बहुत महत्‍वपूर्ण नाद है। यह बनता है। अ उ और म से। और ये संगीत के तीन बुनियादी स्‍वर है। सारा संगीत इन तीन स्‍वरों पर निर्भर करता है। अगर ये तीनों एक हो जाते है तो मौन होता है। मौन। अगर ये तीनों भिन्‍न हो जाते है तो ध्वनि होती है। अगर सब स्‍वर सम हो तो मौन।
      तुमने हर हिंदू मंदिर में घंटे को  देखा होगा। लेकिन तुमने कोई कलात्‍मक घंटा नहीं देखा होगा। इसके लिए तो तुम्‍हें किसी अजायबघर के तिब्‍बती विभाग को देखना चाहिए। तिब्‍बती घंटी बहुत सुंदर होती हे। यह अजीब घंटी अनेक धातुओं के मेल से बनाई जाती है। इसका आकार एक प्‍याले जैसा होता है जिसके साथ लकड़ी का हैंडल बना हुआ होता है। उस हैंडल को अपने हाथ में ले कर प्‍याले के भीतर गोल-गोल घुमाया जाता है। ऐसा एक निश्‍चित संख्‍या में किया जाता है। जैसे सत्रह बार—और फिर घंटी के भीतर लगे निशान पर चोट की जाती है। यही आरंभ है ओ यही अंत है। वहीं से फिर तुम गोल-गोल घुमाना शुरू करते हो और अंत में एक चोट करते हो। और बड़ी विचित्र बात तो यह है कि वह घंटी पूरे तिब्‍बती मंत्र को दोहराती है। पहली  बार सुनने पर तो यह विश्‍वास ही नहीं होता कि घंटी तिब्‍बती मंत्र को दोहराती है। लेकिन इसी उदेश्‍य के लिए इस घंटी को बनाया गया है।
      एक तिब्‍बती लामा ने मुझे इस प्रकार की घंटी दिखाई थी। घंटी द्वारा पूरे मंत्र को दोहराए जाते सुन कर बड़ा ही सुखद विस्‍मय हुआ। तुम मंत्र को जानते हो। मैंने तुम्‍हें बताया है। मंत्र कोई विशेष नहीं है, उसका कोई अर्थ नहीं है। लेकिन वह संगीत पूर्ण है, बहुत ही संगीत पूर्ण है। इसी लिए इसका सृजन कर सकती है। अगर यह अर्थपूर्ण होता तो घंटी इसे दोहरा नहीं सकती थी। आखिर घंटी इसे दोहरा नहीं सकती थी। आखिर घंटी तो केवल घंटी है।
      मणि पद्य हूम—घंटी इसे इतने स्‍पष्‍ट स्‍वर में दोहराती है कि सुनने बाले को संदेह हो जाता है कि होती घोस्‍ट कहीं छुपा हुआ है। लेकिन वहां पर कुछ नहीं है। न कोई होली घोस्‍ट है, न कुछ और केवल एक लकड़ी की डंडी से उसको गोल-गोल घुमाना पड़ता है और एक खास जगह पर उसे मारना पड़ता है। तब वह घंटी उस मंत्र को अनुगुंजित करती है।
      भारत, तिब्‍बत, चीन या बर्मा के मंदिरों में लगा हुआ घंटा बहुत अर्थ पूर्ण है। यह आपको याद दिलाता है कि जैसे घंटे पर चोट करने से यह आवाज करता है और फिर धीरे-धीरे वह आवाज कम होती चली जाती है। फिर समाप्‍त हो जाती हे। तब नाद हीन नाद प्रवेश करता है। ठीक ऐसे ही तुम भी मौन हो सकते हो। जो जोग केवल आवाज सुनते है वे घंटे को नहीं सुन पाते। तुम्‍हें दूसरे भाग को भी सुनना चाहिए। जब आवाज कम होने लगती है, खो रही होती है। तब स्‍वरहीन स्‍वर प्रकट होने लगता है। जब ध्‍वनि पूरी तरह से खो जाती है तब नाद हीन नाद होता है, मौन छा जाता है। और वह ध्‍यान है।                                    
      मैं संगीतज्ञ नहीं बनने बाला था। पागल बाबा को भी मालूम था, लेकिन वे स्‍वयं संगीत के प्रेमी थे, और वे चाहते थे कि मैं श्रेष्‍ठ संगीतज्ञों से परिचित हो जाऊँ, शायद मैं कभी उस और आकर्षित हो जाऊँ। उन्‍होंने मुझे अनेक संगीतज्ञों से मिलाया—उन सबके नाम भी याद रखने मुश्‍किल थे। लेकिन कुछ नाम बहुत प्रसिद्ध हैं, सारी दुनिया में विख्‍यात है। उदाहरण के लिए ये तीन।
      पन्‍ना लाल घोष को उत्‍कृष्‍ट बांसुरी वादक माना गया है। और यह गलत नहीं हे। लेकिन मुझे वे पसंद नहीं थे। वे शेर की भांति गरजते हैं, लेकिन आदमी चूहे जैसे है। और यही मुझे पसंद नहीं है। एक चूहा शेर की तरह ग़रजे, यह पाखंड है। फिर भी वे अच्छी तरह से निभा लेते थे। यह कठिन काम है, लेकिन वे करीब-करीब ठीक से कर लेते है। मैं कहता हूं, करीब-करीब, क्‍योंकि वे मेरी आंखों को धोखा नहीं दे सकते/। मैंने उससे कहा भी और उन्‍होंने कहा: मैं जानता हूं। वे मेरी पसंद नहीं थे।
      दूसरे व्‍यक्‍ति दक्षिण के है। आरंभ से ही मुझे वे अच्‍छे नहीं लगे। हां,उनकी बांसुरी मुझे बहुत प्रिय है—और किसी में शायद इतनी गहराई नहीं है जितनी उनमें है। लेकिन हम दोनों एक दूसरे को सहन नहीं कर सकते थे। न ही मुझे वे पसंद आए न ही उनका नाम। वे मेरी पसंद नहीं है। यह आदमी—मैं उनका नाम बता चुका हूं। उसे फिर नहीं दोहराऊंगा। लेकिन इसमें कोर्इ संदेह नहीं कि सदियों से उनके जैसी बांसुरी सुनी नहीं गई। फिर भी एक बार काफी है। न ही मुझे वे पसंद आए नहीं उनका नाम। वे मेरी पसंद नहीं है, क्‍योंकि वह आदमी मुझे अच्‍छा नहीं लगता था। अगर मैं व्‍यक्‍ति को पसंद न करूं तो उनकी बांसुरी भले ही कितनी मधुर बजती हो, मैं उन्हें इसमें प्रथम नहीं मान सकता।
      मेरी पसंद हरि प्रसाद। वे बहुत ही विनम्र हैं। न वे चूहे जैसे है, न वे शेर जैसे है। वे ठीक बीच में है। इसे कहा जाता है, मज्झम। पन्‍ना लाल घोष और इस दक्षिणी बांसुरी बादक में, जिसका मैं दुबारा नाम नहीं लुंगा, जो संतुलन, खो गया था वह उन्‍होंने संतुलन पैदा कर दिया है। हरि प्रसाद एक संतुलन आए है, बहुत अच्‍छा संतुलन, रस्‍सी पर चलने बाले जैसा संतुलन।
       पागल बाबा का नाम मुझे बार बार लेना पड़ेगा, क्‍योंकि उनहोंने अनेक लोगों से मुझे परिचित कराया था। जब उनकी चर्चा करता हूं तो यह स्‍वाभाविक है कि उनके साथ पागल बाबा का भी उल्‍लेख हो। उनके द्वारा एक पूरी दुनिया खुल गई । मेरे लिए तो वे किसी विश्‍वविद्यालय से भी अधिक मूल्य वान थे। क्‍योंकि उन्‍होंने हर संभव क्षेत्र के श्रेष्ठतम से मुझे परिचित करवाया।
      वे आंधी की तरह मेरे गांव आते थे और मुझे पकड लेते थे। मेरे माता-पिता उनको न नहीं कहा सकते थे, यहां तक कि मेरी नानी भी उनको मना नहीं कर सकती थी। जैसे ही मैं पागल बाबा का नाम लेता, वैसे ही वे हां कह देते। क्‍योंकि उनको मालूम था कि अगर वे मुझे इनकार करेंगे तो पागल बाबा घर में आकर बहुत गड़बड़ कर देंगे—वे चीजें तोड़ सकते थे या लोगों की मार-पिटाई कर सकते थे। और वे इतने आदरणीय थे कि कोई उन्‍हें तोड़-फोड़ करने से रोकता नहीं था। इसलिए सब जानते थे कि समझदारी इसी में है कि हाँ कहा दिया जाए। अगर पागल बाबा तुम्‍हें अपने साथ ले जाना चाहते है तो तुम जा सकते हो। और वह कहते कि हमें मालूम है कि पागल बाबा के साथ ले जाना चाहते है तो तुम जा सकते हो।
      गांव में मेरे दूसरे रिश्‍तेदार मेरे पिता से कहते थे, अपने बेटे को इस पागल आदमी के साथ भेज कर आप ठीक नहीं कर रहे।
      मेरे पिता कहते, आपको इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं है। मेरा बैटा तो ऐसा है कि मुझे उसकी नहीं बल्‍कि उस पागल आदमी की ज्‍यादा चिंता होने लगती है।
      पागल बाबा के साथ मैंने अनेक स्‍थानों की यात्रा कि । वे मुझे बड़े-बड़े कलाकारों और संगीतज्ञों से पास ही नहीं ले गए वरन कई प्रसिद्ध स्‍थानों पर भी ले गए। उनके साथ ही मैंने सबसे पहले ताज महल और अजंता-एलोरा की गुफाएं देखी। उनके साथ ही मैंने पहली बार हिमालय देखा। मैं उनका बहुत अधिक आभारी हूं। और मैंने कभी उनके प्रति धन्‍यवाद तक प्रकट नहीं किया। मैं कर भी नहीं सकता था। क्‍योंकि वे मेरे पैर छूते थे। धन्‍यवाद के लिए अगर मैं उनसे कभी कुछ कहता तो वे तुरंत अपने होठों पर हाथ रख कर कहते, चुप रहो। कभी धन्‍यवाद मत कहना। तुम मेरे प्रति आभारी नहीं हो। मैं तुम्हारे प्रति कृतज्ञ हूं।
      एक रात जब हम अकेले थे तो मैंने उनसे पूछा: आप मेरे क्‍यों आभारी हो। मैंने तो आपके लिए कुछ नहीं किया। और आपने मेरे लिए बहुत कुछ किया है। फिर भी आप मुझे आपको धन्‍यवाद नहीं करने देते।
      उन्‍होंने कहा: एक दिन तुम समझ जाओगे। पर अभी तुम सो जाओ। और फिर कभी इसका जिक्र मत करना। कभी नहीं, कभी नहीं। जब समय आएगा तो तुम्‍हें मालूम हो जाएगा।
      जब तक मालूम हुआ तब तक बहुत देर हो चुकी थी- तब तक वे इस दुनिया से जा चुके थे। मुझे मालूम तो हुआ लेकिन बहुत देर में। अगर उनके जीवन काल में उनको यह पता लग जाता की मैं इसका करण जान गया हूं तो उनको बहुत कठिनाई होती। क्‍योंकि पिछले किसी जन्‍म में उन्‍होंने मुझे विष दिया था। जब कि मैं बच गया था। वे अपनी सामर्थ्‍य अनुसार मेरे साथ जो भी अच्‍छा कर सकते थे कर रहे थे और अब वे क्षतिपूर्ति करने की कोशिश कर रहे थे। वे उसको साफ करने कह कोशिश कर रहे थे। वे मेरे साथ आवश्‍यकता से अधिक अच्‍छा व्‍यवहार करते थे। लेकिन अब मैं जान गया हूं कि क्‍यों,क्‍योंकि वे संतुलन लाने की कोशिश कर रहे थे।
      पूरब में इसको कर्म कहते है, कर्म का सिद्धांत कहते है। तुम जो भी करते हो, याद रखना, तुम्‍हारे कृत्‍य से चीजों में जो असंतुलन हो गया है उसको फिर से तुम्‍हें संतुलित करना होगा। अब मैं जान गया हूं कि वह एक बच्‍चे के साथ इतना अच्‍छा व्‍यवहार क्‍यों कर रहे थे। वे दुबारा संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे थे। और इसमें वे सफल हो गए। एक बसरा तुम्‍हारे सब कृत्‍य बिलकुल संतुलित हो जाएं तो तुम विलीन हो सकते हो। तभी तुम उस चक्र को रोक सकते हो। सच तो यह है कि चक्र अपने आप ही रूक जाता है, तुम्‍हे उसको रोकना भी नहीं पड़ता।

--ओशो






Wednesday, December 2, 2009

स्वर्णिम बचपन—(28)


पन्‍न लाल घोष और सचदेवा
      अभी-अभी मैं फिर सुन रहा था—हरी प्रसाद चौरासिया को नहीं, बल्‍कि एक दूसरे बांसुरी वादक को। भारत मैं बांसुरी के दो आयाम है: एक दक्षिणी और दूसरा उत्‍तरी। हरी प्रसाद चौरासिया उत्‍तरी बांसुरी वादक है। मैं ठीक इसके उलटे, आयाम, दक्षिणी को सुन रहा था। इस आदमी से भी मेरा परिचय पागल बाबा ने ही करवाया था। मेरा परिचय देते हुए उन्‍होंने उस संगीतज्ञ से कहा: शायद यह तुम्‍हारी समझ में नहीं आएगा कि मैं इस लड़के से तुम्‍हारा परिचय क्‍यों करा रहा हूँ। अभी तो तुम्‍हारी समझ में नहीं आएगा, लेकिन शायद एक दिन प्रभु-इच्‍छा से तुम समझ जाओगे।
      यह आदमी भी वैसी ही बांसुरी बजाता है, लेकिन बिलकुल दूसरे ढंग से। दक्षिण की बांसुरी बहुत ही तीखी और भीतर चुभनें वाली होती है। वह सुनने वाले के अंतर को झकझोर देती है। उत्‍तर भारतीय बांसुरी बहुत ही मधुर होती है, लेकिन थोड़ी सपाट होती है—उत्‍तर भारत की तरह सपाट।
      उस आदमी ने मुझे हैरानी से देखा। एक क्षण के लिए कुछ सोचा, फिर उसने कहा: ‘’ बाबा, अगर आप मुझे इससे परिचित करा रहे है तो अवश्‍य कोई कारण होगा, जिसे अभी में अपनी असमर्थता के कारण नहीं समझ रहा हूं। लेकिन मेरे प्रति आप जो असीम प्रेम दिखा रहे है उसे लिए मैं आपका आभारी हूं। यह आपकी कृपा है कि आप मुझे वर्तमान से ही नहीं वरन भविष्‍य से भी परिचित करा रहे है।   
      मैंने उन्‍हें केवल कुछ बार ही सुना है, क्‍योंकि हमारा कभी भी सीधा संबंध नहीं हुआ। मैं उन्‍हें पागल बाबा के माध्‍यम से ही जानता था। वे बांसुरी वादक उनसे आते थे। अगर संयोगवश मैं भी वहीं पर होता तो वह मुझे हेलो कह देते। बाबा हमेशा हंसते और कहते, ‘’ इस लड़के को हेलो कहने से काम नहीं चलेगा। मूर्ख, उसके पैर छुओ।‘’ उन्‍होंने बड़े संकोच से झिझकते हुए मेरे पैर छुए। मैं उनकी झिझक को देख सका। इसीलिए मैं उनका नाम नहीं बता रहा। वे अभी भी जीवित है और शायद उनको बुरा लगे, क्‍योंकि उन्‍होंने प्रेम वश मेरे पैरो को नहीं छुआ था। पर क्‍योंकि पागल बाबा ने आदेश दिया था। इसलिए उनको मेरे पैर छूने पड़े। मैं हंस पडा और मैंने कहा: ‘’ बाबा,क्‍या मैं इसे मार सकता हूं?                                               उन्‍होंने कहा: ‘’ हां, जरूर।‘’ और तुम भरोसा कर सकते हो कि वह मेरे पैर छू रहा था तो मैंने उसके मुंह पर एक थप्‍पड़ मारा।
      इससे देव गीत ने जो पत्र मुझे लिखा है उसकी याद आ गई। मुझे मालूम था कि वह रोएगा। मुझे मालूम था। उसके पत्र लिखने से पहले ही मुझे कैसे मालुम हो गया? अगर वह मुझे नहीं भी लिखता तो भी मुझे पता था। मैं अपने लोगों को जानता हूं, मुझसे जो प्रेम करते है उनको तो मैं अच्‍छी तरह से जानता हूं—चाहे वे कुछ बोले या न बोले। और उसके शबद मेरे ह्रदय को  छू गए। उसने कहा: ‘’ आप चाहे जितना मुझे मारे, मेरी पिटाई  करें—इससे मुझे कोई पीड़ा नहीं होगी। पीड़ा तो तब होती है जब मैं नहीं हंसता तब भी आप कहते है कि देव गीत, मुझे धोखा देने की कोशिश मत करो, यह सुन कर मुझे बहुत दुःख होता है। यह ऊपरी तौर से अन्‍याय है ओर इसी से मुझे पीड़ा होती है।‘’ उसने लिखा था: ‘’ ऊपरी तौर से अन्‍याय। गुड़िया, मैं सोचता हूं यही शब्‍द है—ऊपरी तौर से अन्‍याय। क्‍या मैं ठीक कह रहा हूं गुड़िया ?
      ‘’हां, ओशो।‘’
      ठीक है, क्‍योंकि गुड़िया को ही वह पत्र मुझे पढ़ कर सुनाना पडा। मैंने तो बरसों से कुछ नहीं पढ़ा, क्‍योंकि ड़ाक्टरों ने कहा था कि अगर मैं पढ़ना चाहूंगा तो मुझे चश्‍मा लगाना पड़ेगा। और मुझे चश्मे से नफरत है। मैं तो कल्‍पना भी नहीं कर सकता कि मुझे चश्‍मा लगा हुआ है। इससे तो अच्‍छा है कि में अपनी आंखों को बंद रखूं। मैं अपने और चारों और के वातावरण के बीच में कोई बाधा नहीं खड़ी करना चाहता। चाहें वह पारदर्शी कांच ही क्‍यों न हो। इसलिए दूसरे को मुझे पढ़ कर सुनाना पड़ता है।
      ये शब्‍द उपरी तौर से अन्‍याय उसके ह्रदय को प्रतिबिंबित करते है। उसे मालूम है कि बाहर से ऐसा ही दिखाई देता है। सचमुच यह अन्‍याय ही मालूम होता है। कि जब वह हंसता नहीं होता तब भी मैं कहता हूं कि देव गीत, हंसों मत। स्‍वभावत: इन शब्‍दों को सुन कर वह स्‍तंभित हो जाता है। और बेचारा देव गीत तो उस समय चुपचाप नोट लिख रहा होता है।
      फिर मुझे पागल बाबा की याद आई, क्‍योंकि आज सुबह ही मैं उनकी बात कर रहा था और मैं उसे जारी रखूंगा। वे ऊपरी तौर से लोगों से अनर्गल वाक्‍य बोलते थे। और इतना ही नहीं, कभी-कभी तो उनको मार भी देते थे। मेरी तरह नहीं—वे सचमुच मारते थे। मैं सचमुच नहीं मारता। ऐसा नहीं की मैं मारना नहीं चाहता। पर इसलिए कि मैं बहुत आलसी हूं। एक-दो बार मैंने कोशिश की, लेकिन तब मेरा हाथ दुखाने लगा। इससे उस आदमी को कोई नसीहत हुई या नहीं, यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन मेरे हाथ ने कहा, कृपा करके दुबारा ऐसा मत करना।‘’
      लेकिन पागल बाबा तो आकारण ही मार बैठते थे। कोई उनके पास चुपचाप बैठा होता और वे उसको एक थप्‍पड़ मार देते। उस आदमी ने न कुछ किया था और न ही कुछ कहा था, फिर भी......     
      कभी-कभी लोग आपत्‍ति करते कि यह अन्‍याय है और पागल बाबा से कहते, बाबा, आपने उसको क्‍यो मारा? वे हंस कर कहते, ‘’ तुम्‍हें मालूम है कि मैं पागल हूं।‘’ बस यहीं उनके लिए पर्याप्‍त स्‍पष्‍टीकरण था। अब मैं इस प्रकार के स्‍पष्‍टीकरण नहीं दे सकता। मैं तो इतनी पागल हूं कि बड़े-बड़े बुद्धिमान भी नहीं समझ पाते कि यह कैसा पागलपन है। पागल बाबा तो सीधे-सादे पागल थे। मैं बहुआयामी पागल हुं।
      इसलिए कभी तुम लोगों को ऐसा लगे कि ऊपरी तौर से अन्‍याय हो रहा है तो ऊपरी तौर से शब्‍द को याद रखना। मैं अन्‍याय नहीं कर सकता। खासकर जो लोग मुझसे प्रेम करते है। उनके प्रति मैं अन्‍याय कैसे कर सकता हूं। प्रेम अन्‍यायपूर्ण कैसे हो सकता है। लेकिन बहार से कई बार ऐसा दिखाई देगा। अब मेरे जैसे लोगों का क्‍या ठिकाना कि कब क्या कर बैठे? हो सकता है कि मैं पिटाई तो आशु कि कर रहा हूं  और असल में लक्ष्‍य मेरा देवराज हो। यह बहुत ही जटिल मामला है। इसे कंप्‍यूटराराइज्‍ड नहीं किया जा सकता है। यह इतनी जटिल है कि कोई भी कंप्‍यूटर इसका मास्‍टर नहीं बन सकता। कंप्‍यूटर कुछ भी बन सकता है—इंजीनियर, डाक्‍टर या दाँत का डाक्‍टर—सब संभव है। और मनुष्‍य से अधिक कुशल हो सकता है। लेकिन दो बातें है जो कंप्‍यूटर नहीं कर सकता। एक तो वह जीवित नहीं हो सकता है। वह मशीन की आवाज में गुनगुना सकता है। लेकिन वह जीवित नहीं हो सकता। वह जीवन के बारे में कुछ नहीं जान सकता। दुसरी बात पहली का ही परिणाम है। वह गुरु नहीं बन सकता।
      जीवन को जानने का अर्थ है गुरु बनना। सिर्फ जीवित होना एक बात है। जीवित तो सब लोग हैं। लेकिन अपनी और मुडना,अपने होने की और मुड़ना, देखने वाले को देखना, जानने बाले को जानना—यही मेरा तात्‍पर्य है। अपनी और मुडना या लौटने का मेरा अभिप्राय यहीं है तब कोई मास्‍टर बनता है। अब कंप्‍यूटर तो अपनी ओर  मुड़ नहीं सकता। यह संभव नहीं है।
      देव गीत, तुम्‍हारा पत्र बहुत सुंदर था—और तुम रोंए। मुझे इस बात की खुशी है। जो कुछ भी प्रामाणिक होता है वह मार्ग  पर सहायक होता है। और आंसुओं से अधिक प्रामाणिक तो और कुछ भी नहीं हो सकता है। हां, पेशेवर रोने वाले भी होते है। लेकिन वे कई प्रकार कि चालाकी करते है।
      भारत में जब कोई मरता है तो यह होता है। कोई बूढा व्‍यक्‍ति, जिसकी किसी को जरूरत नहीं थी, और सच में जिसके मर जाने से सब खुश होते है। लेकिन कोई अपनी खुशी दिखा नहीं सकता—तब वे पेशेवर रोने वालों को बुलाते है। खासकर बंबई, कलकत्‍ता, मद्रास और नई दिल्‍ली जैसे बड़े शहरों में। उनकी अपनी संस्‍था भी होती है। तुम उनको फोन करके बता सकते हो कि कितने रोने बाले चाहिए और वे सब आ जाते है। ओ वे खूब रोते हैं। किसी भी असली रोने बाले को वे हरा सकते है। और वे बहुत कुशल होते है और उनको सारी चालाकी मालूम होती है। वे कुछ खास दवाई का उपयोग करते है, उसे अपनी आँख क नीचे लगाते है और उससे आंखों से पानी बहना शुरू हो जाता है। और यह बड़ी अजीब बात है जब आंसू बहने लगते है तो आदमी उदास हो जाता है।
      मनेाविज्ञान में बहुत दिनों से एक बहस चल रहीं है। जिसका अभी तक कोई निर्णय नहीं हुआ। विवादास्‍पद विषय यह है कि पहले क्‍या होता है। डर के कारण आदमी दौड़ने लगता है या दौड़ने के कारण डरने लगता है। इस दोनों स्‍थितियों को प्रतिपादित करने वाले लोग है। एक पक्ष के लोग कहते है कि डर के कारण दौड़ना पड़ता है और दूसरा पक्ष कहता है कि दौड़ने से डर पैदा होता है। बात तो एक ही है। दोनों बातें एक साथ होती है।
      जब तुम उदास होते हो तो आंसू आ जाते है। अगर किसी कारण आंसू आ जाएं—चाहे वे कृत्रिम आंसू ही क्‍यों न हों—तब भी अपनी स्‍वाभाविक प्रवृति के कारण तुम उदास हो जाते हो। मैंने इन पेशेवर रोने वालों का ह्रदय-विदारक रोना देखा है। और तब यह नहीं कहा जा सकता कि वे दूसरों को धोखा दे रहे है। हां, वे अपने आप को अवश्‍य धोखा देते है।
      प्रेम के आंसुओं का अनुभव सबसे अधिक मूल्‍यवान है। तुम रोंए....मैं खुश हूं....क्‍योंकि तुम नाराज भी हो सकते थे, लेकिन तुम नाराज नहीं हुए। तुम गुस्‍सा हो सकते थे, चिड़चिड़ा सकते थे। लेकिन तुमने यह नहीं किया, तुम रोंए, और ऐसा ही होना चाहिए था।
      लेकिन याद रखना कि मैं बार-बार यहीं करूंगा, क्‍योंकि मुझे अपना काम करना है। डेंटिस्‍ट होने के कारण तुम्‍हें मालूम है की कितनी पीड़ा होती है। लेकिन फिर भी तुम्‍हें अपना काम तो करना ही पड़ता है। तुम पीड़ा पहुंचाना चाहते इसलिए अनास्तेसिया जैसा दवाओं से तुम पूरे शरीर को या शरीर के किसी अंग को बेहोश कर देते हो, जड़ बना देते हो।
      लेकिन मेरे पास तो ऐसा कुछ नहीं है। मुझे तो अपने सारे आपरेशन बिना अनास्तेसिया के ही करने पड़ते है। बिना बेहोश किए अगर किसी आदमी के पेट या दिमाग को खोल दिया जाए तो क्‍या होगा। उसे इतनी अधिक पीड़ा होगी कि या तो उसके कारण को खोल दिया वह पागल हो जाएगा या अपनी खोपड़ी को वहीं पर छोड़ कर वह टेबल से कूद कर अपने घर भाग जाएगा। यह भी हो सकता है कि वह डाक्‍टर को ही मार डाले। लेकिन मेरा काम ऐसा ही है। इस काम को किसी दूसरे ढंग से किए जाने की संभावना ही नहीं है।
      ऊपर से तो यह सदा ‘’अन्‍यायपूर्ण’’ ही दिखाई देगा। मुझे यह जान कर संतोष हुआ कि यद्यपि इससे तुम्‍हें पीड़ा होती है, दुःख होता है। तथापि तुम मेरे प्रेम को समझ सकते हो। तुम भूल न जाओ इसलिए मैं बार-बार कहूंगा कि मैं ऐसा कहता ही रहूंगा।
      तुम बहुत डर गए होगें, क्‍योंकि तुमने ‘’ पुनश्‍च‘’  लिखा है और फिर ‘’ पुनश्‍च पुनश्‍च’’ लिखा है जिससे तुम कहते हो कि, ‘’ मैंने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं आपके इतना निकट आऊँगा, अथवा यह काम मुझे दिया जाएगा। मुझे नोटस लेना बहुत अच्‍छा लगता है। फिर पुनश्‍च पुनश्‍च: ‘’ कृपया, इस काम को कभी मत रोकिए गा।‘’
      उसे डर लगा होगा कि मैं उसे इस काम से रोक दूँगा य सोच कर कि इससे उसे पीड़ा पहुँचती है। आशु को भी पीड़ा होती हैं। लेकिन उसने अभी पत्र नहीं लिखा है। लेकिन मैं भविष्‍यवाणी करता हूं कि एक दिन वह लिखेगी—चाहे की ही लिख दे। मैं तो दांए-बाएं मारता ही रहता हूं। क्‍योंकि तुम दोनों मेरे दोनों ओर रहते हो। इसलिए यह स्‍वभाविक है  कि तुम दोनों को सबसे अधिक मान मिलती है। मेरा तो सदा यही ढंग रहा है। जो लोग मेरे निकटतम होते है उनको सबसे अधिक पिटा जाता है। लेकिन इससे उनका विकास होता है। जैसे-जैसे उन्‍होंने हर आघात को आत्‍म सात किया वैसे-वैसे वे अधिक सघन और अखंड होते गए। यह तो वे भाग जाते या वे विकसित होते। करो या मरो। अगर तुम करो—सघनता और अखंडता से मेरा यही अर्थ है—तभी जीवित हो सकते हो। नहीं तो आदमी पशु की तरह मरता है आदमी हर क्षण मर रहा है।
      यह पत्र कई अर्थों में बहुत सुंदर था। गुड़िया,बाद में इस पत्र को उसे वापस दे देना, ताकि वह उसके  नोट का फुट नोट बन सके या जो अनेक परिशिष्‍ट लिखें जाएँगे यह उनका ही भाग बन जाएगा।
      फिर पागल बाबा.... इसी को तो मैं कहता हूं  चक्‍करों में घूमना। उन्‍होंने मुझे केवल इन बांसुरी वादकों से ही नहीं वरन अन्‍य संगीतज्ञों से भी परिचित किया। वे तो संगीतज्ञों के भी संगीतज्ञ थे। साधारण लोगों को तो यह मालूम नहीं था, लेकिन महान संगीतज्ञ यह जानते थे कि वह किसी चीज से भी संगीत पैदा कर सकते थे। मैंने देखाथा एक कंकड़ से अपने कमंडल को बजा कर वे अत्‍यंत मधुर स्‍वर उत्पन्न कर लेते थे। हिंदू संन्‍यासी भोजन और पानी को भी सितार की तरह बजाते थे। बाजार में बच्‍चों के लिए बिकने वाली बांसुरी—जो एक रूपये में एक दर्जन मिल जाती थी—उनके हाथ में आकर ऐसी उत्‍कृष्‍ट स्‍वर लहरी का सृजन करती थी कि संगीतज्ञ भी आश्‍चर्य से भर जाते थे। और सोचते कि क्‍या ये संभव है, आरंभ में मैं जिस दक्षिण के बांसुरी वादक का उल्लेख किया था उसका नाम तुम्‍हें बताना चाहता हूं। ताकि मैं ठीक वैसा ही हो जाऊँ जैसा मैं आया था। मैं अपने हाथ कुछ भी लेकर नहीं आया था—एक स्‍मृति भी नहीं1 मेरे इस संसमरणों का मुख्‍य उदेश्‍य यही है कि में वैसा ही कोरा हो जाऊँ जैसा आया था। उस बांसुरी बादक का नाम था, सचदेवा। दक्षिण भारत में उसका नाम बहुत प्रसिद्ध था। पागल बाबा ने मुझे जहां ती बांसुरी वादकों से परिचित किया था। एक थे हरि प्रसाद चौरासिया। जो उत्‍तर भारत के थे। जहां अलग तरह  का संगीत होता है। दूसरे बंगाल के पन्‍ना लाल घोष। वे अलग तरह की बांसुरी बजाते है। उनकी बांसुरी बड़े जोर से बजती है और बड़ी ओजस्वीनी है। उसमे ओज गुण की प्रधानता है। और सचदेवा की बांसुरी ठीक इसके विपरीत थी—मधुर, स्‍त्रैण, गुण प्रधान, प्राय: मौन। उनके नाम का उल्लेख करने के बाद अब मैं हलका महसूस कर रहा हूं। अब उन पर निर्भर है कि वह इसे कैसे ग्रहण करते है।
      अपने पत्र में देव गीत कहता है: ओशो, मुझे आप पर भरोसा है।
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