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शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--19


सच खंडि वसै निरंकारु—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)

पउड़ी: 37

करम खंड की वाणी जोरु। तिथै होरु न कोई होरु।।
तिथै जोध महाबल सूर। तिन महि राम रहिआ भरपूर।।
तिथै सीतो सीता महिमा माहि। ताके रूप न कथने जाहि।।
न ओहि मरहि न ठागे जाहि। जिनकै राम बसै मन माहि।।
तिथै भगत वसहि के लोअ। करहि अनंदु सचा मनि सोइ।।
सच खंडि वसै निरंकारु। करि करि वेखै नदरि निहाल।।
तिथै खंड मंडल बरमंड। जे को कथै त अंत न अंत।।
तिथै लोअ लोअ आकार। जिव जिव हुकमु तिवै तिव कार।।
वेखै विगसे करि वीचारु। 'नानक' कथना करड़ा सारु।।


नुष्य असहाय है। लेकिन तभी तक, जब तक परमात्मा से दूर है। मनुष्य दुर्बल है, दरिद्र है, दीन है, लेकिन तभी तक, जब तक परमात्मा से दूर है। उससे हमारी दूरी ही हमारी दरिद्रता है। और जितने हम उससे दूर होते जाते हैं, उतना ही जीवन अर्थहीन होता जाता है।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--18


नानक अंतु न अंतु—(प्रवचन—अट्ठाहरवां) 

पउड़ी: 35
धरम खंड का एहो धरमु।
गिआन खंड का आखहु करमु।।
केते पवन पाणि वैसंतर केते कान महेस।
केते बरमे घाड़ति घड़िअहि रूप रंग के वेस।।
केतीआ करम भूमी मेर केते केते धू उपदेस।
केते इंद चंद सूर केते केते मंडल देस।।
केते सिध बुध नाथ केते केते देवी वेस।
केते देव दानव मुनि केते केते रतन समुंद।।
केतीआ खाणी केतीआ वाणी केते पात नरिंद।
केतीआ सुरती सेवक केते 'नानक' अंतु न अंतु।।


पउड़ी: 36

गिआन खंड महि गिआनु परचंड।
तिथै नाद विनोद कोउ अनंदु।।
सरम खंड की वाणी रूपु।
तिथै घाड़ति घड़ीऐ बहुतु अनूपु।।
ताकीआ गला कथीआ ना जाहि।
जे को कहै पिछै पछुताइ।।
तिथै घड़ीऐ सुरति मति मनि बुधि।
तिथै घड़ीऐ सुरा सिधी की सुधि।।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--17


करमी करमी होइ वीचारु—(प्रवचन—सतरहवां)

पउड़ी: 34

राती रुति थिति वार। पवन पानी अगनी पाताल।।
तिसु विचि धरती थापि रखी धरमसाल।
तिसु विचि जीअ जुगुति के रंग। तिनके नाम अनेक अनंत।।
करमी करमी होइ वीचारु। साचा आप साचा दरबारु।।
तिथै सोहनि पंच परवाणु। नदरी करमी पवै नीसाणु।।
कच पकाई ओथै पाइ। 'नानक' गाइआ जापै जाइ।।


नानक के सूत्र के पहले कुछ बातें समझ लेनी जरूरी हैं।
पहली बात, कि जीवन को जो लक्ष्य मान लेता है, वह भटक जाता है। जीवन केवल एक अवसर है, लक्ष्य नहीं। मार्ग है, गंतव्य नहीं। उससे कहीं पहुंचना है। जीवित होने से ही मत समझ लेना कि पहुंच गए। जीवन कोई सिद्धि नहीं है, केवल एक प्रक्रिया है। उससे ठीक से गुजरे, तो पहुंच जाओगे। ठीक से न गुजरे, तो भटक जाओगे।

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--79)

नि:स्‍वभाव योगी अनिर्वचनीय है(प्रवचनचौथा)

दिनांक 29 जनवरी, 1977;
श्री ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।

अष्‍टावक्र उवाच।

निरोधादीनि कर्माणि जहांति जडधीर्यदि।
मनोरथान् प्रलापांश्न कर्पुमाम्मोत्यतत्सणात्।। 251।।
मंद: श्रुत्वापि तद्वस्तु न जहांति विमूढताम्।
निर्विकल्पो बहिर्यत्नादन्तर्विषयलालस।। 252।।
ज्ञानादगलितकर्मा यो लोकद्वष्टआपि कर्मकृत्।
नामोत्यवसरं कर्तुं वक्तुमेव न किंचन।। 253।।
क्य तम: क्य प्रकाशो वा हान क्य न न किचन।
निर्विकारस्थ धीरस्थ निरातंकस्थ सर्वदा।। 254।।
क्य धैर्य क्य विवेकित्व क्य निरातंकतायि वा।
अनिर्वाव्यस्वभावस्थ निःस्वभावस्थ योगिनः।। 255।।
न स्वगों नैव नरको जीवन्युक्तिर्न चैव हि!
बहुनात्र किमुक्तेन योगद्वष्टधा न किंचन।। 256।।
नैव प्रार्थयते लाभ नालाभेनानशोचति!
धीरस्थ शीतलं चित्तममृतेनैव पूरितम्।। 257।।

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--77)

बुद्धिपर्यन्‍त संसार है(प्रवचनदूसरा)

दिनांक 27 जनवरी, 1977;
श्री ओशो आश्रम, पूना।

अष्‍टावक्र उवाच।

भ्रमभूतमिदं सर्वं किचिन्नास्तीति निश्चयी।
अलक्यस्फुरण: शुद्ध: स्वभावेनैव शाम्यति।। 246।।
शद्धस्फुरणरूपस्थ दृश्यभावमयश्यत:।
क्य विधि: क्य च वैराग्‍यं क्य त्याग: क्य शमद्रेयि वा।। 247।।
स्फरतोऽनन्तरूपेण प्रकृतिं च न पश्यत:।
क्य बंध: क्य च वा मोक्ष: क्य हर्ष: क्य विषादिता।। 248।।
बद्धिपर्यन्तसंसारे मायामात्र विवर्तने।
निर्ममो निरहंकारो निष्काम: शोभते बुध:।। 249।।
अक्षयं गतसंतायमात्मान पश्यतो मुनेः।
क्य विद्या च क्य वा विश्वं क्य देहोउहं ममेति वा।।250।।

अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--78)

अक्षर से अक्षर की यात्रा(प्रवचनतीसरा)

दिनांक 28 जनवरी, 1977;
ओशो  आश्रम पूना।

पहला प्रश्न :

आपने एक कथा कही है, 'स्वर्ग के रेस्टारेंट में एक बार जब लाओत्से, कस्फशियस और बद्ध आये तो कालसंदरी स्वर्णपात्र में लबालब जीवनरस भरकर लाई, पर बुद्ध ने जीवन दुख है कहकर जीवनरस से मुंह मोड़ लिया। कन्‍फ्यूशियस ने कहा कि जीवनरस ले ही आई हो तो लाओ, जरा चख लूं। और लाओत्से ने कहा कि जीवनरस को चखना क्या, पूरा पात्र ही ले आ, सभी पी लूं।अब इस रेस्टारेंट में अष्टावक्र भी आ गये है। वे कालसुंदरी से जीवनरस स्वीकार करेंगे या नहीं? कृपा करके कहिये।

ष्टावक्र की न पूछो!
जीवनरस तो स्वीकार करेंगे ही, उसे तो पी ही लेंगे कालसुंदरी को भी पी जायेंगे।
अष्टावक्र का स्वीकार बेशर्त और पूरा है। यहां जो भी है, एक ही है। इसलिए द्वंद्व का, निषेध का उपाय नहीं है। विष भी अमृत है।

बुधवार, 5 नवंबर 2014

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--16


नानक उतमु नीचुकोइ—(प्रवचन—सोलहवां)

पउड़ी: 32

इकदू जीभौ लख होहि लख होवहि लख बीस।
लखु लखु गेड़ा अखिअहि एक नामु जगदीस।।
एतु राहि पति पवड़ीआ चड़ीए होइ इकीस।
सुणि गला आकास की कीटा आई रीस।।
'नानक' नदरी पाईए कूड़ी कूड़ै ठीस।।

पउड़ी: 33

आखणि जोरु चुपै नह जोरू। जोरु न मंगणि देणि न जोरू।।
जोरु न जीवणि मरणि नह जोरू। जोरु न राजि मालि मनि सोरू।।
जोरु न सुरति गिआनु वीचारि। जोरु न जुगती छुटै संसारू।।
जिसु हथि जोरू करि वेखै सोइ। 'नानक' उतमु नीचुकोइ।।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--15


जुग जुग एको वेसु—(प्रवचन—पंद्रहवां)

पउड़ी: 30

एका माई जुगति विआई तिनि चेले परवाणु।
इकु संसारी इकु भंडारी इकु लाए दीवाणु।।
जिव तिसु भावै तिवै चलावै जिव होवै फुरमाणु।
ओहु वेखै ओना नदरि न आवै बहुता एहु विडाणु।।
आदेसु तिसै आदेसु।।
आदि अनीलु अनादि अनाहतु जुग जुग एको वेसु।।

पउड़ी: 31

आसणु लोइ लोइ भंडार। जो किछु पाइआ सु एका वार।।
करि करि वेखै सिरजनहार। नानक सचे की साची कार।।
आदेसु तिसै आदेसु।।
आदि अनील अनादि अनाहतु जुग जुग एको वेसु।।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--14


आदेसु तिसै आदेसु—(प्रवचन—चौदहवां)

पउड़ी: 28

मुंदा संतोखु सरमु पतु झोली धिआन की करहि बिभूती।
किंथा कालु कुआरी काइआ जुगति डंडा परतीति।।
आई पंथी सगल जमाती मनि जीतै जगु जीत।।
आदेसु तिसै आदेसु।।
आदि अनीलु अनादि अनाहति। जुगु जुगु एको वेसु।।


पउड़ी: 29

भुगति गिआनु दइआ भंडारणि घटि घटि बाजहि नाद।
आपि नाथु नाथी सभ जा की रिधि सिधि अवरा साद।।
संजोगु विजोगु दुइ कार चलावहि लेखे आवहि भाग।।
आदेसु तिसै आदेसु।।
आदि अनीलु अनादि अनाहति। जुगु जुगु एको वेसु।।

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--35


सदगुरु शास्त्रों का पुनर्जन्म है—पंद्रहवां प्रवचन



पंद्रहवां प्रवचन
25 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

सूत्र :


तल्छक्तिर्माया उड्सामान्यात्।। 86 ।।
व्यापकत्वाद्वयाप्यानाम्।। 87 ।।
न प्राणिबुद्धिभ्योऽसम्भवात्।। 88 ।।
निर्मायोच्चावच श्रुतीश्च निर्मिमीते पितृवत्।। 89 ।।
मिश्रोपदेशान्नेति चेन्‍न स्वल्पत्वात्।। 90 ।।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--34

जग़ारण है द्वार स्वर्ग काचौदहवां प्रवचन

 चौदहवां प्रवचन
24 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 प्रश्‍न सार :


1--क्या धरती पर स्वर्ग उतारा जा सकता है? क्या इस बार हम कुछ नये की आशा संजो सकते हैं?

2--कान्हा! क्या होली नहीं खेलोगे?


3--कुंड़लिनी या सक्रिय ध्यान में ऊर्जा जाग्रत होने पर उसे नाचकर क्यों खत्म कर दिया जाता है?

4--क्या राजनीति अध्यात्म के विपरीत है?

5--एक ध्यान— अनुभव पर प्रकाश डालने हेतु भगवान से निवेदन। आपसे और आश्रम से मेरे    दूर रखे जाने में राज क्या है?


6--आपको सुन—सुनकर भक्ति का रोग लग गया है। अब धैर्य नहीं रखा जाता है। आकांक्षा  होती   है सब अभी हो जाए।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--33

क्रांति और उत्कांति—तेरहवां प्रवचन

 तेरहवां प्रवचन
23 मार्च 1978,
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

सूत्र :

उत्कांतिस्मृतिवाक्यशेषाच्च।। 81।।
महापातकिनां त्वातौं।। 82।।
सैकान्तभावो गीतार्थप्रत्यभिज्ञानात्।। 83।।
परां कृत्वैव सर्वेषा तथाह्याह।। 84।।
भजनीयेनाद्वितीयमिदं कृष्णस्य तक्लरूपत्वात्।। 85।।

जुस्तजू—ए—राह बाकी है न मंजिल की तलाश
मुझको खुद है अब मेरे खोए हुए दिल की तलाश
रोक ऐं हमदम! न मेरी अश्क—अफशानी को तू
महफिले—हस्ती को है इक शाम—ए—महफिल की तलाश
अब नजर आए जहा अपने सिवा कोई न हो
दिल को राहे—शौक में है ऐसी मंजिल की तलाश

सोमवार, 3 नवंबर 2014

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--13


सोई सोई सदा सचु साहिबु—(प्रवचन—तेरहवां)

पउड़ी: 27

सो दरु केहा सो घरु केहा जितु बहि सरब समाले।
बाजे नाद अनेक असंखा केते वावणहारे।।
केते राग परी सिउ कहीअनि केते गावणहारे।
गावहि तुहनो पउणु पाणी वैसंतरु गावे राजा धरम दुआरे।।
गावहि चितगुपतु लिखि जाणहि लिखि लिखि धरमु वीचारे।
गावहि ईसरु बरमा देवी सोहनि सदा सवारे।।
गावहि इंद इंदासणि बैठे देवतिया दरि नाले।
गावहि सिध समाधी अंदरि गावनि साध विचारे।।
गावनि जती सती संतोखी गावहि वीर करारे।
गावनि पंडित पड़नि रखीसर जुगु जुगु वेदा नाले।।
गावनि मोहणीआ मनु मोहनि सुरगा मछ पइआले।
गावनि रतनि उपाए तेरे अठसठि तीरथ नाले।।
गावहि जोध महाबल सूरा गावहि खाणी चारे।
गावहि खंड मंडल वरमंडा करि करि रखे धारे।।
सेई तुधनो गावनि जो तुधु भावनि रते तेरे भगत रसाले।
होरि केते गावनि से मैं चिति न आवनि नानकु किया विचारे।।
सोई सोई सदा सचु साहिबु साचा साची नाई।
है भी होसी जाई न जासी रचना जिनि रचाई।।
रंगी रंगी भाती करि करि जिनसी माइआ जिनि उपाई।
करि करि वेखै कीता आपणा जिव तिस दी बडिआई।।
जो तिसु भावै सोई करसी हुकमु न करणा जाई।
सो पातिसाहु साहा पातिसाहिबु नानक रहणु रजाई।।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--12


आखि आखि रहे लिवलाइ—(प्रवचन—बारहवां)

पउड़ी: 26


अमुल गुण अमुल वापारअमुल वापारीए अमुल भंडार।।
अमुल आवहि अमुल लै जाहिअमुल भाव अमुला समाहि।।
अमुलु धरमु अमुलु दीवाणुअमुलु तुलु अमुलु परवाणु।।
अमुलु बखसीस अमुलु नीसाणुअमुलु करमु अमुलु फरमाणु।।
अमुलो अमुलु आखियाजाइआखि आखि रहे लिवलाइ।।
आखहि वेद पाठ पुराण। आखहि पड़े करहि वखियाण।।
आखहि बरमे आखहि इंदआखहि गोपी तै गोविंद।।
आखहि ईसर आखहि सिधआखहि केते कीते बुध।।
आखहि दानव आखहि देव। आखहि सुरि नर मुनि जन सेव।।
केते आखहि आखणि पाहिकेते कहि कहि उठि उठि जाहि।।
एते कीते होरि करेहि। ता आखिसकहि केई केइ।।
जेवडु भावै तेवड होइ। 'नानक' जाणै साचा सोइ।।
जे को आखै बोल बिगाडु। ता लिखीए सिरि गावारा गावारु।।

महावीर वाणी-(प्रवचन-27)

मनुष्‍यत्‍व : बढ़ते हुए होश की धारा(प्रवचनसत्‍ताइसवां)

दिनांक 12 सितम्‍बर,1972,
द्वितीय पर्युषण व्‍याख्‍यानमाला,
पाटकर हाल, बम्‍बई।

चतुरंगीय—सूत्र :

      चत्तारि परमंगाणि, टुल्लहाणीह जंतुणो।
माणुसत्तं सुई सद्धा, संजमम्मि य वीरियं।।
कम्माणं तु पहाणए, आणुपुव्‍वी क्याई उ।
जीवा सोहिमणुप्पत्ता, आययन्ति्र मणुस्सयं।।
माणुसत्तम्मि आयाओं, जो धम्मं सोच्च सद्हे।
तवस्सी वीरियं लडूं, संबुडे निद्धृणे स्व।।

 संसार में जीवों को इन चार श्रेष्ठ अंगों का प्राप्त होना बड़ा दुर्लभ है—मनुष्यत्व, धर्म—श्रवण, श्रद्धा और संयम के लिए पुरुषार्थ।