अध्याय
38 : खंड 2
अधःपतन
इसलिए:
जब
ताओ का लोप
होता है,
तब
मनुष्यता का
सिद्धांत
जन्म लेता है;
और
जब मनुष्यता
का लोप होता
है,
तब
न्याय का
सिद्धांत
जन्म लेता है।
और
जब न्याय का
भी लोप होता
है,
तब
कर्मकांड का
सिद्धांत
पैदा होता है।
अब
यह कर्मकांड
हृदय की
निष्ठा
और
ईमानदारी का
विरल हो जाना
है।
और
वही अराजकता
की शुरुआत भी
है।
पैगंबर
ताओ के पूरे
खिले फूल हैं।
और
उनसे ही
मूर्खता की
शुरुआत भी
होती है।
इसलिए
आर्य पुरुष
सघनता (नींव)
में बसते हैं;
विरलता
(अंत) में वे
नहीं बसते।
वे
फल में बसते
हैं; फूल की
खिलावट
(अभिव्यक्ति)
में वे नहीं
बसते।
इसलिए
वे एक को
इनकार और
दूसरे
को स्वीकार
करते हैं।






