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शनिवार, 6 मई 2017

लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-03

लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
तीसरा प्रवचन-मैं सदैव परम, प्रत्यक्ष और लब्ध हूं
दिनांक 23 नवम्बर, 1980,श्री ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न:
भगवान, पैंगल उपनिषद के अनुसार चार महावाक्य हैं।
पहला: तत्वमसि, वह तू है; दूसरा: त्वं तदसि, तू वह है; तीसरा: त्वं ब्रह्मास्मि, तू ब्रह्म है; और चौथा: अहं ब्रह्मास्मि, मैं ब्रह्म हूं।
भगवान, इन महावाक्यों के अर्थ और अर्थभेद बताने की अनुकंपा करें।

चिदानंद, उपनिषद सदगुरु और शिष्य के बीच शून्य में हुआ संवाद है। आंखों-आंखों में बात हो गई है। हृदय ने हृदय पर गीत गाया है। न तो गुरु ने कुछ कहा है और न शिष्य ने कुछ सुना है, फिर भी गुरु ने सब कह दिया और शिष्य ने सब सुन लिया है।
गुरु के साथ तीन प्रकार के संबंध हो सकते हैं। विद्यार्थी का; तब गुरु केवल शिक्षक होता है। वहां वाणी आवश्यक है। संवाद जरूरी है। क्योंकि बात बुद्धि से बुद्धि तक होगी। वह सबसे ऊपरी नाता है। विद्यार्थी जिज्ञासु है, मुमुक्षु नहीं। जानना चाहता है, होना नहीं। होने के लिए तो न होने की तैयारी चाहिए। जानने में कुछ कीमत चुकानी नहीं पड़ती। जानकारी इकट्ठी करके और भी अहंकार को रस आता है। जैसे-जैसे जानकारी बढ़ती है वैसे-वैसे अहंकार और परिपुष्ट होता है।

लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-02

लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
दूसरा प्रवचन-(कच्ची कंध उते काना ऐ)
दिनांक 22 नवम्बर, 1980,श्री ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न:
भगवान, पंजाबी भाषा में एक टप्पा है, जिसमें एक प्रेमी अपनी प्रेयसी से कहता है--
कच्ची कंध उते काना ऐ
मिलणा तां रब नूं है
तेरा पिआर बहाना है।
अर्थात कच्ची दीवार पर कौवा बैठा है। और मिलना तो परमात्मा से है, तेरा प्यार बहाना है।
भगवान, क्या लौकिक प्रेम अलौकिक प्रेम का साधन है? कृपया समझाएं।

विनोद भारती, टप्पा तो यह प्यारा है:
"कच्ची कंध उते काना ऐ--कच्ची दीवार पर कौवा बैठा है।'
अधिकतर लोगों की जिंदगी बस ऐसी--दीवार कच्ची और कच्ची दीवार पर कौवा बैठा है। जिंदगी भी कच्ची और काली भी। हंस भी नहीं, कौवा बैठा है। और दीवार भी रेत की है। अभी है, अभी नहीं हो जाएगी। कब गिर जाएगी, पता नहीं। किस क्षण समाप्त हो जाएगी, कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकता। और इस कच्ची दीवार पर बैठा भी कौन है? कुछ मूल्यवान नहीं। सब दो कौड़ी का है।
"कच्ची कंध उते काना ऐ।'

लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-01

लगन महुरत झूठ सब-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
पहला प्रवचन-(यह क्षण है द्वार प्रभु का)
दिनांक 21 नवम्बर, 1980,श्री ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न:
भगवान, आज प्रारंभ होने वाली प्रवचनमाला के लिए आपने नाम चुना है: लगन महूरत झूठ सब।
निवेदन है कि संत पलटू के इस वचन पर प्रकाश डालें।

आनंद दिव्या, पलटू का पूरा वचन ऐसा है--
पलटू सुभ दिन सुभ घड़ी, याद पड़ै जब नाम।
लगन महूरत झूठ सब, और बिगाड़ैं काम।।
धर्म तो परवानों की दुनिया है! दीवानों की, मस्तों की। वहां कहां लगन-महूरत! धर्म तो शुरू वहां होता है जहां समय समाप्त हो जाता है। वहां कहां लगन-महूरत!
लगन-महूरत की चिंता तो उन्हें होती है जो अतीत में जीते हैं और भविष्य में जिनकी वासना अटकी होती है। जीते हैं उसमें जो है नहीं और आशा करते हैं उसकी जो अभी हुआ नहीं--और शायद कभी होगा भी नहीं।

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-10

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

बुद्धत्व और पांडित्य-(प्रवचन-दसवां)
दसवां प्रवचन; दिनांक २० सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
किसी को चैन से देखा न दुनिया में कभी मैंने।
इसी हसरत में कर दी खतम सारी जिंदगी मैंने।।
कहते हैं लोग मौत से भी बदतर हैं इंतिजार।
बस राह देखते ही गुजारी जिंदगी मैंने।।
उठाए क्यों लिए जाते हो मुझको बागे-दुनिया से।
नहीं देखी है दिल भर के बहारे जिंदगी मैंने।।
लोग घबरा कर यूं ही कह देते हैं कि मर जाएं।
मर के भी लेकिन सुकूं पाते नहीं देखा मैंने।।
जब ये आसी उठाएंगे फिरदौस में जाम।
मय बदल जाएगी पानी में सुना है मैंने।।
आग दोजख की भी अर्क ए शर्म से बुझ जाएगी।
परेशां आदमी को देख ये न सोचा मैंने।।
सब तरफ कब्रें तमन्नाओं की बनी हैं यहां।
एक बस्ती को भी बसते नहीं देखा मैंने।।
इस जहां में तू कैसे बेपिए मदहोश रहता है?
ऐ साकी! आज तक देखा न तुझसा आदमी मैंने।।
बता तू कौन है इंसान या कोई फरिश्ता है?
या देखा है खुदा को ख्वाब में बना आदमी मैंने।।

अमृत प्रिया!

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-09

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

आचरण नहीं--बोध से क्रांति-(प्रवचन-नौवां)
नौवां प्रवचन; दिनांक १९ सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
जमाना हो गया घायल
तेरी सीधी निगाहों से
खुदा ना खासता तिरछी
नजर होती तो क्या होता?

मुहम्मद हुसैन!
सीधी नजर काफी हो, तो तिरछी नजर की जरूरत क्या! और सीधे-सीधे जो काम हो जाए, वह तिरछे होने से नहीं होता। तिरछा होना तो मन की आदत है; सीधा होना हृदय का स्वभाव।
मैं जो कह रहा हूं, वह दो और दो चार जैसा सीधा-साफ है। जिसकी समझ में न आए, उसकी समझ तिरछी होगी, उसके भीतर विकृतियों का जाल होगा। अगर तुम्हारे पास भी सीधा-सादा हृदय हो, तो मेरी बात का तीर ठीक निशाने पर पहुंच ही जाएगा, पहुंच ही जाना चाहिए। प्रेम से सुनोगे तो सुनते-सुनते ही क्रांति घट जाएगी।

शुक्रवार, 5 मई 2017

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-08

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

इक साधे सब सधै-(प्रवचन-आठवां)
आठवां प्रवचन; दिनांक १८ सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान, योगवासिष्ठ में यह श्लोक है:
न यथा यतने नित्यं यदभावयति यन्मयः।
यादृगिच्छेच्च भवितुं तादृग्भवति नान्यथा।।
मनुष्य नित्य जैसा यत्न करता है, तन्मय हो कर जैसी भावना करता है, और जैसा होना चाहता है, वैसा ही हो जाता है; अन्यथा नहीं।
भगवान, क्या ऐसा ही है?

सहजानंद!
ऐसा जरा भी नहीं है। यह सूत्र आत्मसम्मोहन का सूत्र है--आत्मजागरण का नहीं। कुछ होना नहीं है। जो तुम हो उसे आविष्कृत करना है। कोहिनूर को कोहिनूर नहीं होना है, सिर्फ उघड़ना है। कोहिनूर तो है। जौहरी की सारी चेष्टा कोहिनूर को निखारने की है--बनाने की नहीं। कोहिनूर पर परतें जम गई होंगी--मिट्टी की उन्हें धोना है। कोहिनूर को चमक देनी है, पहलू देने हैं।

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-07

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

दुख से जागो-(प्रवचन-सातवां)
सातवां प्रवचन; दिनांक १७ सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान, श्रीमदभागवत में यह श्लोक है:
यश्च मूढ़तमो लोके यश्च बुद्धे: परं गतः।
तावुभौ सुखमेघेते क्लिश्यत्यंतरितो जनः।।
संसार में जो अत्यंत मूढ़ है और जो परमज्ञानी है, वे दोनों सुख में रहते हैं। परंतु जो दोनों की बीच की स्थिति में है, वह क्लेश को प्राप्त होता है।
क्या ऐसा ही है भगवान?

आनंद मैत्रेय!
निश्चय ही ऐसा ही है। मूढ़ का अर्थ है--सोया हुआ, जिसे होश नहीं। जी रहा है, लेकिन पता नहीं क्यों! चलता भी है, उठता भी है, बैठता भी है--यंत्रवत! जिंदगी कैसे गुजर जाती है, जन्म कब मौत में बदल जाता है, दिन कब रात में ढल जाता है--कुछ पता ही नहीं चलता। जो इतना बेहोश है, उसे दुख का बोध नहीं हो सकता। बेहोशी में दुख का बोध कहां! झेलता है दुख, पर बोध नहीं है, इसलिए मानता है कि सुखी हूं।

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-06

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-ओशो
गुरु कुम्हार, शिष्य कुंभ है-(प्रवचन-छट्ठवां)

छठवां प्रवचन; दिनांक १६ सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान, मैं ध्यान क्यों करूं?
दिवाकर भारती!

जीवन में कुछ चीजें हैं, जो साधन नहीं--साध्य हैं। और बहुत चीजें हैं, जो साधन हैं--साध्य नहीं। पूछा जा सकता है कि मैं धन क्यों अर्जित करूं। नहीं पूछा जा सकता कि मैं ध्यान क्यों करूं। क्योंकि धन साधन है--क्यों का उत्तर हो सकता है।
धन की कोई उपयोगिता है; ध्यान की कोई उपयोगिता नहीं है। ध्यान अपने आप में साध्य है--जैसे प्रेम। कोई पूछे कि मैं प्रेम क्यों करूं! क्या उत्तर होगा? प्रेम! क्यों का प्रश्न ही नहीं; हेतु की बात ही नहीं; अंतरभाव है। जैसे फूल में सुगंध है; क्यों की कोई बात नहीं। ऐसे हृदय का फूल खिलता है, तो प्रेम की सुगंध उठती है।
नहीं पूछा जा सकता कि जीवन क्यों...

गुरुवार, 4 मई 2017

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-05

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

जागो-डूबो-(प्रवचन-पांचवां)
पांचवां प्रवचन; दिनांक १५ सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान, अहमक अहमदाबाद मिल गया। वही मारवाड़ी चंदूलाल का पिता और ढब्बूजी का चाचा! लेकिन है बहुरूपी। देखती हूं--अदृश्य हो जाता है। अचानक दूसरे रूप में प्रकट होता है। इसकी लीला विचित्र है। जन्मों-जन्मों से स्वामी बन कर बैठा है। अब तो मैं थकी। बूढ़ा, कुरूप, गंदा--पीछा नहीं छोड़ता। आपके सामने होते हुए भी आपसे मिलने नहीं देता। आपके प्रेम-सागर में डूबने नहीं देता। जीवन सौंदर्य की उड़ान नहीं लेने देता। इसी के कारण मैं विरह अग्नि में जली जा रही हूं। मैं असहाय, असमर्थ हूं।
भगवान! मेरे भगवान!
मेहर करो मेहरबान
जुगत करो जोगेश्वर
चरण पड़ी दासी तोरी
भाव-भक्ति दो अविनाशी
ताकि मैं--
आपके स्तुति गान जन्मों-जन्मों तक
गाती रहूं, गाती रहूं, गाती रहूं!

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-04

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

संन्यास, सत्य और पाखंड-(प्रवचन-चौथा)
चौथा प्रवचन; दिनांक १४ सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान, जीवन की शुरुआत से सभी को यही शिक्षा मिलती रहती है कि सच बोलो। अच्छे काम करो। हिंसा न करो। पाप न करो। लेकिन हम संन्यासी तो इसी रास्ते पर जाने की कोशिश करते हैं, फिर हमारा विरोध क्यों? इस विरोधाभास को समझाने की कृपा करें।

रजनीकांत!
मनुष्यजाति आज तक विरोधाभास में ही जी रही है। इस विरोधाभास को ठीक से समझो, तो मुक्त भी हो सकते हो।
विरोधाभास यह है कि जो तुम से कहते हैं--सत्य बोलो, वे भी सत्य नहीं बोल रहे हैं। उनका जीवन कुछ और कहता है। उनकी वाणी कुछ और कहती है। उनके व्यक्तित्व में पाखंड है। और बच्चों की नजरें बड़ी साफ होती हैं। बच्चों के पास दृष्टि बड़ी निखरी होती है। होगी ही? ताजी होती है। बच्चे शीघ्र ही देख लेते हैं कि कहना कुछ--करना कुछ!

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-03

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

आचार्यो मृत्युः-(प्रवचन-तीसरा)
दिनांक १३ सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान, संत सफियान, अब्दुल वहीद आमरी और हसन बसरी राबिया को मिलने गए। उन्होंने कहा, आप साहिबे-इल्म हैं। कृपा कर हमें कोई सीख दें। राबिया ने सफियान को एक मोमबत्ती, अब्दुल वहीद आमरी को एक सुई और हसन को अपने सिर का एक बाल दिया और वे बोलीं, लो, समझो!
भगवान, इस पर सूफी लोग अपना मंतव्य प्रकट करते हैं। प्रभु जी! आप इस पर कुछ कहें कि राबिया ने वे चीजें देकर उन तीनों को क्या सीख दी?

दिनेश भारती!
राबिया बहुत इने-गिने रहस्यवादियों में एक है; गौरीशंकर के शिखर की भांति। बुद्ध, महावीर, कृष्ण, क्राइस्ट और लाओत्सू, जरथुस्त्र--उस कोटि में थोड़ी-सी ही स्त्रियों को रखा जा सकता है। राबिया उनमें अग्रगण्य है।

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-02

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-ओशो
संस्कृति का आधार: ध्यान-(प्रवचन-दूसरा)

दूसरा प्रवचन; दिनांक १२ सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न : भगवान, भारतीय संस्कृति संसद अपने पच्चीस वर्ष पूरे कर रही है, उसके उपलक्ष्य में डाक्टर प्रभाकर माचवे ने आपको चिंतक, विचारक और मनीषी का संबोधन देते हुए भारतीय संस्कृति ग्रंथ के लिए आपके विचार आमंत्रित किए हैं, जिसे वे ग्रंथ के प्रारंभ में प्रकाशित करके धन्यता अनुभव करेंगे।
भगवान, निवेदन है कि कुछ कहें!

चैतन्य कीर्ति!
मैं न तो चिंतक हूं, न विचारक, न मनीषी। चिंतन को हम बहुत मूल्य देते हैं; विचारक को हम बड़ा सौभाग्य समझते हैं; मनीषा तो हमारी दृष्टि में जीवन का चरम शिखर है। लेकिन सत्य कुछ और है। न तो बुद्ध विचारक हैं--न महावीर, न कबीर। जिसने भी जाना है, वह विचारक नहीं है। जो नहीं जानता, वह विचारता है। विचार अज्ञान है। अंधा सोचता है: प्रकाश कैसा है, क्या है! आंख वाला जानता है--सोचता नहीं। इसलिए कैसा चिंतन? कैसा विचार?

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-01

ज्यूं था त्यूं ठहराया-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

स्वभाव में थिरता-(प्रवचन-पहला)
पहला प्रवचन; दिनांक ११ सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान, आज प्रारंभ होने वाली प्रवचनमाला को जो शीर्षक मिला है, वह बहुत अनूठा और बेबूझ है--ज्यूं था त्यूं ठहराया! भगवान, हमें इस सूत्र का अर्थ समझाने की अनुकंपा करें।

आनंद मैत्रेय!
यह सूत्र निश्चय ही अनूठा है और बेबूझ है। इस सूत्र में धर्म का सारा सार आ गया है--सारे शास्त्रों का निचोड़। इस सूत्र के बाहर कुछ बचता नहीं। इस सूत्र को समझा, तो सब समझा। इस सूत्र को जीया, तो सब जीया।
सूत्र का अर्थ होता है: जिसे पकड़ कर हम परमात्मा तक पहुंच जाएं। ऐसा ही यह सूत्र है। सूत्र के अर्थ में ही सूत्र है। सेतु बन सकता है--परमात्मा से जोड़ने वाला। यूं तो पतला है बहुत, धागे की तरह, लेकिन प्रेम का धागा कितना ही पतला हो, पर्याप्त है।

बुधवार, 3 मई 2017

ज्यूं मछली बिन नीर-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-10

ज्यूं मछली बिन नीर-(प्रश्नोत्तर)-ओशो
ध्यान विधि है मूर्च्छा को तोड़ने की-(प्रवचन-दसवां)

दसवां प्रवचन; दिनांक ३० सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
क्या आप इस सूत्र पर कुछ कहना पसंद करेंगे?--
नास्ति कामसमो व्याधि नास्ति मोह समो रिपु:।
नास्ति क्रोध समो वहिनास्ति ज्ञानात् परं सुखम्।।
काम के समान कोई व्याधि नहीं है, मोह के समान कोई शत्रु नहीं है, क्रोध के तुल्य कोई अग्नि नहीं है और ज्ञान के उत्कृष्ट कोई सुख नहीं है।
चैतन्य कीर्ति

यह उन थोड़े से सूत्रों में से एक है जिनकी सदा ही गलत व्याख्या होती रही है। अमृत भी जहर हो जाता है गलत हाथों में। सही हाथों में जहर भी औषधि हो जाता है। सवाल गलत और सही का कम, सवाल उन हाथों का होता है जिनमें सूत्र पड़ जाते हैं। सही हाथों में तलवार जीवन का रक्षण है और गलत हाथों में निश्चित ही हिंसा बनेगी।

ज्यूं मछली बिन नीर-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-09

ज्यूं मछली बिन नीर-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

संन्यास: ध्यान की कसम-(प्रवचन-नौवां)
नौवां प्रवचन; दिनांक २९ सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
पहला प्रश्न: भगवान,
मैं वर्षों से संन्यास लेने के लिए सोच-विचार कर रहा हूं, लेकिन कोई न कोई बाधा आ जाती है और मैं रुक जाता हूं। क्या करूं क्या न करूं, आप ही कहें। और यह भी बताएं कि परमात्मा क्या है, कौन है?
रामाकृष्ण चतुर्वेदी,

सोच-विचार से संन्यास का कोई संबंध नहीं। सोच-विचार की संन्यास में कोई गति भी नहीं। सोच-विचार सेतु नहीं है, बाधा है। जितना सोचोगे उतना उलझोगे। सोच-विचार से मार्ग नहीं मिलता। मिल भी रहा हो तो छिटक जाता है।
नदी के तट पर बैठ कर कितना ही सोचो कि नदी की गहराई क्या है, कैसे जानोगे? डुबकी मारनी होगी। और डुबकी मारने के लिए सोच-विचार सहयोगी नहीं है, साहस चाहिए। सोच-विचार जगत के लिए ठीक, बाहर के लिए ठीक, भीतर के लिए अवरोध है। भीतर तो निर्विचार से गति होती है। और संन्यास भीतर की यात्रा है, अंतर्यात्रा है।

ज्यूं मछली बिन नीर-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-08

प्रतिरोध न करें-(प्रवचन-आठवां)
आठवां प्रवचन; दिनांक २७ सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना


पहला प्रश्न: भगवान,
अनुकंपा करें और गहराई से समझाएं: "प्रतिरोध न करें।'
मैं एक व्यापारी हूं और विश्व का समाजसेवी सदस्य हूं। अगर आप मुझे कोई युक्ति दें तो मैं बहुत अनुगृहीत होऊंगा।
मैंने आपकी "बुक ऑफ दि सीक्रेट्स' के पांचवे भाग को एक शब्द पढ़ा है: स्वीकार-भाव।
वह दूर नहीं है। वह तो हमारे प्राणों से भी निकट है। वह तो हमारे चैतन्य का केंद्र है। आंसुओं की धुंध में लेकिन न पहचाने गये! पर आंखें हमारी बहुत तरह की धुंधों से घिरी हैं। आंसुओं की धुंध तो है ही, क्योंकि जीवन हमारा विषाद है। और जीवन विषाद ही होगा। उसे जाने बिना कैसा आनंद? उसे पहचाने बिना कैसा प्रकाश? उसके अभाव में अंधकार है।

अंधकार अभाव का ही नाम है। अंधकार की कोई सत्ता नहीं है, कोई अस्तित्व नहीं है। रोशनी का न होना। बस दीये की गैर-मौजूदगी। दीया जला और अंधकार गया। गया कहना भी ठीक नहीं, भाषा की भूल है; क्योंकि था ही नहीं, जाएगा कहां? मिटा कहना भी ठीक नहीं; था ही नहीं तो मिटेगा कैसे? अंधकार केवल अनुपस्थिति थी। प्रकाश उपस्थित हो गया, इसलिए अब अंधकार दिखाई नहीं पड़ता। प्रकाश अनुपस्थित हो जाए, फिर अंधकार दिखाई पड़ने लगेगा।

ज्यूं मछली बिन नीर-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-07

ज्यूं मछली बिन नीर-(प्रश्नोत्तर)-ओशो
श्रद्धा और सत्य का मिथुन-(प्रवचन-सातवां)

सातवां प्रवचन; दिनांक २७ सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान
ऐतरेय ब्राह्मण में यह सूत्र आता है:
श्रद्धया पत्नी सत्यं यजमानः। श्रद्धा सत्यं तदित्युत्तमं मिथुनम।
श्रद्धा सत्येन मिथुने न स्वर्गाल्लोकान जयतीति।
अर्थात (जीवन-यज्ञ में) श्रद्धा पत्नी है और सत्य यजमान। श्रद्धा और सत्य की उत्तम जोड़ी है। श्रद्धा और सत्य  की जोड़ी से मनुष्य दिव्य लोकों को प्राप्त करता है।
भगवान, इस सूत्र का आशय समझाने की अनुकंपा करें।
आनंद मैत्रेय,

यह सूत्र अत्यंत अर्थगर्भित है। संदेह से सत्य नहीं पाया जा सकता। संदेह से सत्य अकस्मात  मिल भी जाए, तो भी तुम चूक जाओगे। संदेह की दृष्टि सत्य को भीतर प्रविष्ट ही न होने देगी। सत्य द्वार भी खटखटाएगा तो भी तुम द्वार न खोलोगे संदेह कहेगाः "होगा हवा का झोंका।' संदेह, परमात्मा भी सामने खड़ा हो, तो उस पर भी प्रश्नचिन्ह लगा देगा।

ज्यूं मछली बिन नीर-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-06



जीवन जीने का नाम है-(प्रवचन-छट्ठवां)
छठवां प्रवचन; दिनांक २६ सितंबर, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
ऋतस्य यथा प्रेत।
अर्थात प्र्राकृत नियमों के अनुसार जीओ।
यह सूत्र ऋग्वेद का है।
भगवान, हमें इसका अभिप्रेत समझाने की कृपा करें।
आनंद मैत्रेय

यह सूत्र अपूर्व है। इस सूत्र में धर्म का सारा सार-निचोड़ है। जैसे हजारों गुलाब के फूलों का कोई इत्र निचोड़े, ऐसा हजारों प्रबुद्ध पुरुषों की सारी अनुभूति इस एक सूत्र में समायी हुई है। इस सूत्र को समझा तो सब समझा। कुछ समझने को फिर शेष नहीं रह जाता।
लेकिन इस सूत्र का इतना ही अर्थ नहीं है कि प्राकृत नियमों के अनुसार जीओ। सच तो यह है कि "ऋत' शब्द के लिए हिंदी में अनुवादित करने का कोई उपाय नहीं है। इसलिए समझने की कोशिश करो। प्राकृत शब्द से भूल हो सकती है। निश्चित ही वह एक आयाम है ऋतु का। लेकिन बस एक आयाम। ऋतु बहु आयामी है। जिसको लाओत्सु ने "ताओ' कहा है। उसको ही ऋग्वेद ने ऋतु कहा  है। जिसको बुद्ध  ने "एस धम्मो सनंतनो' कहा है, "धम्म' कहा है, वही ऋत का अर्थ है।

मंगलवार, 2 मई 2017

ज्यूं मछली बिन नीर-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-05


सत्य की कसौटी -(प्रवचन-पांचवां)
दिनांक 25 सितंबर, 1980; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
मनुस्मृति का यह बहुत लोकप्रिय श्लोक है:
सत्यं ब्रूयात्प्रिंयं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम।
प्रियं च नानृतं बू्रयादेष धर्म: सनातनः।।
अर्थात मनुष्य सत्य बोले, प्रिय बोले, अप्रिय सत्य को न बोले, और असत्य प्रिय को भी न बोले। यह सनातन धर्म है।
भगवान, इस पर कुछ कहने की कृपा करें।
शरणानंद,
मनुस्मृति इतने असत्यों से भरी है कि मनु हिम्मत भी कर सके हैं इस सूत्र को कहने की, यह भी आश्चर्य की बात है। मनुस्मृति से ज्यादा पाखंडी कोई शास्त्र नहीं है। भारत की दुर्दशा में मनुस्मृति का जितना हाथ है, किसी और का नहीं। मनुस्मृति ने ही भारत को वर्ण दिए हैं। शूद्रों का यह जो महापाप भारत में घटित हुआ है, जैसा पृथ्वी में कहीं घटित नहीं हुआ, उसके लिए कोई जिम्मेवार है तो मनु जिम्मेवार हैं। यह मनुस्मृति की शिक्षा का ही परिणाम है, क्योंकि मनुस्मृति है हिंदु धर्म का विधान। वह हिंदु धर्म की आधारशिला है।

ज्यूं मछली बिन नीर-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-04


ध्यान पर ही ध्यान दो-(प्रवचन-चौथा)
दिनांक 24 सितंबर, 1980; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न:भगवान,
यह एक प्रचलित श्लोक है:
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकार: पुण्याय पापाय परपीड़न।।
अठारह पुराणों में व्यास के दो वचन ही मुख्य हैं--परोपकार से पुण्य होता है और परपीड़न से पाप।
भगवान, इस पर कुछ कहने की कृपा करें।
शरणानंद,

यह सूत्र निश्चित ही बहुत विचारणीय है, क्योंकि इस देश का सारा आधार इसी सूत्र पर निर्भर है। यह बुनियाद है तथाकथित धार्मिक व्यक्तित्व पैदा होता है, वह पाखंड का ही होता है। यह सूत्र ऐसा है कि तत्क्षण इसमें भ्रांति दिखाई पड़नी असंभव है। सोचोगे तो भी नहीं समझ पाओगे कि इसमें कुछ भूल हो सकती है। बात इतनी साफ मालूम पड़ती है--दो और दो जैसे चार होते हैं ऐसी। कौन इसका विरोध करेगा?--"परोपकार से पुण्य होता है और परपीड़न से पाप।'

ज्यूं मछली बिन नीर-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-03

अंतर्यात्रा पर निकलो-(प्रवचन-तीसरा)
दिनांक 23 सितंबर, 1980; श्री रजनीश आश्रम, पूना


पहला प्रश्न: भगवान,
अथर्ववेद में एक ऋचा है--
पृष्ठात्पृथिव्या अहमन्तरिक्षमारुहम्
अन्तरिक्षाद्दि विमारूहम्, दिवोनाकस्य
पृष्ठात्ऽ सर्‌वज्योतिरगामहम्।
अर्थात हम पार्थिव लोक से उठ कर अंतरिक्ष लोक में आरोहण करें, अंतरिक्ष लोक से ज्योतिष्मान् देवलोक के शिखर पर पहुंचें, और ज्योतिर्मय देवलोक से अनंत प्रकाशमान ज्योतिपुंज में विलीन हो जाएं।
 भगवान कृपया बताएं कि ये लोक क्या हैं और कहां हैं?
चैतन्य कीर्ति,
लोक शब्द से भ्रांति हो सकती है--हुई है। सदियों तक शब्दों की भ्रांतियों के दुष्परिणाम होते हैं। लोक शब्द से ऐसा लगता है कि कहीं बाहर, कहीं दूर--यात्रा करनी है किसी गन्तव्य की ओर। लोक से भौगोलिक बोध होता है, जबकि ऋषि का मन्तव्य बिलकुल भिन्न है। यह तुम्हारे भीतर की बात है--तुम्हारे अंतरलोक की।

ज्यूं मछली बिन नीर-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-02

जगत सत्य बह्म सत्य -(दूसरा-प्रवचन)


दिनांक 22 सितंबर, 1980; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
आदिगुरु शंकराचार्य के "जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्य' सूत्र का खंडन करते हुए आपने कहा कि जगत भी सत्य है और ब्रह्म भी सत्य है। लेकिन सत्य की परिभाषा है--वह, जो कि नश्वर नहीं है। इसलिये जगत जो कि नश्वर है, सत्य कैसे होगा? मिथ्या ही होगा। ब्रह्म अनश्वर है, इसलिए सत्य है।
आपसे अनुरोध है कि सत्य की परिभाषा करते हुए इस पहलू पर प्रकाश डालें।
पंडित ब्रह्मप्रकाश,
बड़े भाग्य कि आप भी इस मयकदे में पधारे! ऐसे तो मयकदे में आना अच्छी बात नहीं है और आ ही गये हैं तो बिना पीए जाना अच्छी बात नहीं है। जाम हाजिर है। जी भर कर पी कर लौटें।
पूछते हैं आप कि सत्य की क्या परिभाषा है? सत्य की कोई परिभाषा नहीं है,न हो सकती है। परिभाषित होते ही सत्य असत्य हो जाता है। सत्य तो अनिर्वचनीय है। कैसे उसकी परिभाषा होगी? कैसे उसकी व्याख्या होगी? सत्य तो शब्दों में आता नहीं, छूट-छूट जाता है। सत्य तो शब्दातीत है, मनातीत है। सत्य अनुभव है--और ऐसा अनुभव, जो कि मन के अतिक्रमण पर ही उपलब्ध होता है--निर्विचार में, शून्य में, समाधि में।

ज्यूं मछली बिन नीर-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-01

ज्यूं मछली बिन नीर-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

अपने-अपने काराग्रह-(पहला प्रवचन)
दिनांक २१ सितंबर, १९०; श्री रजनीश आश्रम, पूना
पहला प्रश्न: भगवान,
संत रज्जब ने क्या हम सोए हुए लोगों को देख कर ही कहा है: ज्यूं मछली बिन नीर। समझाने की अनुकंपा करें।
नरेंद्र बोधिसत्व,

और किसको देख कर कहेंगे? सोए लोगों की जमात ही है। तरहत्तरह की नींदें हैं। अलग-अलग ढंग हैं सोए होने के। कोई पद की शराब पी कर सोया है। लेकिन सारी मनुष्यता सोयी हुईं है। जिन्हें तुम धार्मिक  कहते हो वे भी धार्मिक नहीं है, क्योंकि बिना जागे कोई धार्मिक नहीं हो सकता है। हिंदू हैं, मुसलमान हैं, ईसाई हैं, जैन हैं--लेकिन धार्मिक मनुष्य का कोई पता नहीं चलता। धार्मिक मनुष्य हो तो हिंदू नहीं हो सकता है। ये सब सोए होने के ढंग हैं। कोई मस्जिद में सोया हुआ है, कोई मंदिर में सोया है। मैं एक बड़े प्यारे आदमी को जानता था। सरल थे, अदभुत रूप से सरल थे! और आग्नेय भी थे, अग्नि की तरह दग्ध कर दें। नाम था उनका--महात्मा भगवानदीन। वे जब भी बोलते थे तो बीच-बीच में रुक जाते। कहते, "बायां हाथ ऊपर करो। अब दायां हाथ ऊपर करो। अब दोनों हाथ ऊपर करो।' फिर कहते, "दोनों हाथ नीचे कर लो।'