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शनिवार, 17 मार्च 2012

कोई तो अमीरों का गुरु हो—( 10 ) ओशो

एक मात्र विकल्‍प: एक विश्‍व सरकार
 
(अमेरिका में तथा विश्व  भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्व  के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्ध  है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
(डेर श्पीगल, जर्मन पत्रिका के साथ)

प्रश्‍न—अमेरिकन समाज प्रजातांत्रिक नहीं है?

ओशो—नहीं, कोई भी समाज अभी तक सभ्‍य नहीं हुआ है।

मंगलवार, 13 मार्च 2012

कोई तो अमीरों का गुरु हो—( 9 ) ओशो

गरीबी : जिम्‍मेदार कौन
(अमेरिका में तथा विश्व  भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्व  के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्ध  है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
(डेर श्पीगल, जर्मन पत्रिका के साथ)
    
प्रश्‍न’—आप डच चित्रकार विन्‍सेंट वॉन गॉग के बहुत बड़े प्रशंसक है। जिसका एक ही कान था। आप कुछ इस तरह कहते है कि, ‘’उसने आत्‍महत्‍या कर ली क्‍योंकि जो कुछ वह चित्रित करना चाहता था, वह उसने चित्रित कर लिया था। तो पूरी दूनिया को यक आत्‍महत्‍या लगती है। परंतु मुझे नहीं। मुझे तो यह प्राकृतिक अंत लगता है। चित्र पूरा हुआ जीवन पूरा हुआ।

रविवार, 11 मार्च 2012

कोई तो अमीरों का गुरु हो--[8}—ओशो

मरने की स्‍वतंत्रता होनी चाहिए--
(अमेरिका में तथा विश्‍व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्‍व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्‍ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्‍ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
(डेर श्‍पीगल, जर्मन पत्रिका के साथ)
प्रश्‍न-–बस एक और प्रश्‍न उन लोगों के बारे में जो आपसे जुड़ रहे है। आपके साथ खड़े होने वालों के बारे में। मेरा ख्‍याल है कि सैद्धांतिक रूप से पश्‍चिम के हताश युवा आपके पास आ रहे है जो अधिक आज्ञाकारी है और जो बहुत से प्रश्‍न नहीं पूछते। क्‍योंकि भारतीय अधिक व्‍यावहारिक दिमाग के लोग नहीं है?

ओशो—क्‍या तुम सोचते हो कि तुम भारतीय हो?

शुक्रवार, 9 मार्च 2012

कोई तो अमीरों का गुरु हो——7 ओशो

देश और धर्म: झूठी लकीरें—ओशो
(अमेरिका में तथा विश्‍व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्‍व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्‍ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्‍ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
प्रश्‍न--युद्ध के अलावा, नैतिक व राजनैतिक दृष्‍टि से आप हिटलर के बारे में क्‍या सोचते है?
ओशो—नैतिक ढंग से वह महात्‍मा गांधी की तरह ही नैतिक था।

प्रश्‍न–महात्‍मा गांधी की तरह।
ओशो—हां, क्‍योंकि मैं दोनों को बहुत अनैतिक मानता हूं। सच तो यह है कि वह महात्‍मा गांधी से अधिक हिंदू था।

गुरुवार, 8 मार्च 2012

कोई तो अमीरों का गुरु हो——6 (ओशो)

अपनी खोज आप करो—ओशो
(अमेरिका में तथा विश्‍व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्‍व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्‍ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्‍ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
गुड मोर्निंग एक बी सी नेटवर्क के साथ—

प्रश्‍न—मुझे उस विषय में पूछना है जो अभी एक क्षण पहले आपने कहा। आपने कहा कि आप लोगों को नियंत्रित करना नहीं चाहते है। आपका कोई नियंत्रण नहीं है। लेकिन क्‍या आपके 350,000 अनुयायियों पर आपका बहुत ज्‍यादा प्रभाव नहीं है?

रविवार, 4 मार्च 2012

कोई तो अमीरों का भी गुरु हो? भाग--5 (—ओशो)

मेरा कोई जीवन-दर्शन नहीं है--ओशो

(अमेरिका में तथा विश्‍व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्‍व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्‍ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्‍ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)

दि लास्‍ट टेस्‍टामेंट
(गुड़ मोर्निंग अमेरिका, ए बी सी नेटवर्क के साथ)

प्रश्‍न—पहले तो आज रात हमारे साथ बात करने के लिए हम आपके आभारी है। कुछ वर्ष आपके मौन व्रत लिया हुआ था। हाल ही में आपने पुन: बोलने का निर्णय लिया है—अपने समर्थकों से, और आज हमसे आपने इस समय बोलने का निर्णय क्‍यों लिया?

शुक्रवार, 2 मार्च 2012

कोई तो अमीरों का भी गुरु हो? भाग--4 (—ओशो)

सारा विश्‍व एक पागलखाना बना हुआ है—ओशो

(अमेरिका में तथा विश्‍व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्‍व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्‍ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्‍ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
ये पत्रकार वार्ताएं जुलाई 1985 और जनवरी 1986 के बीच संपन्‍न हुई।
(इस अंक में प्रकाशित अंश ओशो के अमेरिका प्रवास से है)
प्रश्‍न—ओशो, अब मैं एक विषय की और मुड़ता हूं। पुन:, आपके और आपके संन्‍यासियों के बारे में कहा या लिखा गया है उसे मद्देनज़र रखते हुए यह कि लोगों में भय पैदा होता है जब वे आपके अंग रक्षकों को हथियारों से लैस देखते है। और ऐसी अफवाह है कि इस रैंच पर कहीं हथियारों का बड़ा भंडार है। क्‍या यह सही है? यदि यह सही है तो ये हथियार यहां क्‍यों रखे जाते है?

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

अमीरों का गुरु—भाग--3 (ओशो)

(अमेरिका में तथा विश्‍व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्‍व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्‍ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्‍ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
दि लास्‍ट टैस्‍टामैंट—ए बी सी नेटवर्क के साथ वार्तालाप—ओशो
प्रभु का राज्‍य पाने को कौन नहीं चाहेगा? जीसस ने कहा है, एक ऊँट तक सूई की आँख में से निकल जाये, लेकिन एक अमीर आदमी कभी स्‍वर्ग के द्वार में प्रवेश नहीं कर सकता। अब यह आदमी जिम्‍मेदार है सारी दूनिया में फैली हुई गरीबी के लिए। वह समृद्धि की भत्‍र्सना कर रहा है। वह उस सृजनात्‍मकता की निंदा कर रहा है। जिससे सारा विश्‍व समृद्ध किया जा सकता है।
      मैं सभी आयामों की समृद्धि के पक्ष में हूं, और मैं यह कभी नहीं कह सकता कि धन्‍य है गरीब। यही कार्ल मार्क्‍स ने कहा; ‘’धर्म लोगों की अफीम है। सुंदर शब्‍दों का प्रयोग करना आसान है, लेकिन यदि तुम उसमे छिपे हुए आशय को समझ सको तो ईसाई आज क्‍या कर रहे है, और पिछले हजार वर्षों में उन्‍होंने क्‍या किया?वे अनाथालय खोल लेंगे, वे संतति नियमन के विरोध में है। वे गर्भपात के विरोधी है।

सृजनात्‍मकता ही प्रेम है, धर्म है—कथा यात्रा (ओशो)

एक महान सम्राट अपने घोड़े पर बैठ कर हर दिन सुबह शहर में घूमता था। यह सुंदर अनुभव था कि कैसे शहर विकसित हो रहा है, कैसे उसकी राजधानी अधिक से अधिक सुंदर हो रही है।
      उसका सपना था कि उसे पृथ्‍वी की सबसे सुंदर जगह बनाया जाए। वह हमेशा अपने घोड़े को रोकता और एक बूढ़े व्‍यक्‍ति को देखता, वह एक सौ बीस साल का बूढ़ा रहा होगा जो बग़ीचे में काम करता रहता, बीज बोता, वृक्षों को पानी देता—ऐसे वृक्ष जिनको बड़ा होने में सैंकड़ो साल लगेंगे। ऐसे वृक्ष जो चार हजार साल जीते है।

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

कोई तो अमीरों का भी गुरु हो? भाग--2 (—ओशो)

(अमेरिका में तथा विश्‍व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्‍व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्‍ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्‍ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
ये पत्रकार वार्ताएं जुलाई 1985 और जनवरी 1986 के बीच संपन्‍न हुई।
(इस अंक में प्रकाशित अंश ओशो के अमेरिका प्रवास से है)

प्रश्‍न—आपके लोग लाल रंग की विविध छाया के वस्‍त्र क्‍यों पहनते है? वे अलग-अलग तरह के लाल रंग के कपड़े और माला क्‍यों पहनते है?

सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

कोई तो अमीरों का भी गुरु हो?—ओशो

(अमेरिका में तथा विश्‍व भ्रमण के दौरान ओशो ने जगह-जगह विश्‍व के पत्रकारों के साथ वार्तालाप किया। ये सभी वार्तालाप ‘’दि लास्‍ट टैस्टामैंट’’ शीर्षक से उपलब्‍ध है। इसके छह भाग है लेकि अभी केवल एक भाग ही प्रकाशित हुआ है।)
प्रश्न—ऐसी एक धारणा है कि आप और आपके धर्मावलंबी बहुत अमीर है। अगर यह सच है तो यह धन कहां से आता है?

उत्‍तर—जो लोग मेरे साथ है वे अमीर है। सच तो यह है कि केवल अमीर, शिक्षित, बुद्धिमान, सुसंस्‍कृत ही समझ सकते है जो मैं कह रहा हूं। भिखारी मेरे पास कभी नहीं आ सकता। निर्धन मेरे पास कभी नहीं आ सकते है। फासला बहुत बड़ा है, उनके और मेरे बीच में। वे मुझे सुन सकते है परंतु समझ नहीं  सकते। इसलिए यह स्‍वाभाविक है मैं अमीरों का गुरु हूं।

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

एरिस्‍टोटल्‍स थियोरी ऑफ पोएट्री एंड फाइन आर्ट—(055)

एरिस्‍टोटल्‍स थियोरी ऑफ पोएट्री एंड फाइन आर्ट—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

’कविता और कला के संबंध में एरिस्‍टोटल का सिद्धांत।‘’ यह शीर्षक ही विरोधाभासी मालूम होता है। कविता और कला दोनों ही सूक्ष्‍म तत्‍व है। वायवीय है, उनका सिद्धांत कैसे हो सकता है। और वह भी एरिस्‍टोटल जैसे तर्कशास्‍त्री द्वारा।
      काव्‍य का शास्‍त्र लिखने की परंपरा नई नहीं है। और न ही केवल पश्‍चिम की है। भारत में भी कश्मीरी पंडित मम्‍मट ने काव्‍य शास्‍त्र लिखा था। वह संस्‍कृत भाषा में है। और बड़ा रसपूर्ण है, क्‍योंकि संक्षिप्‍त सूत्रों में गूंथा हुआ है। उसका पहला ही सूत्र है: ‘’रसों आत्‍मा काव्यत्व‘’ रस काव्‍य की आत्‍मा। इसकी तुलना में एरिस्‍टोटल का पोएटिक्‍स गंभीर है, लेकिन उसकी बारीक बुद्धि ने काव्‍य और नाटक की गहराई में प्रवेश कर उनके एक-एक पहलुओं को उजागर कर दिया है। उसकी यह कलाकारी अपने आप में एक सुंदर रचना शिल्‍प है। इस संबंध में हमें कुछ बातें ख्‍याल में लेनी चाहिए।

      एक तो एरिस्‍टोटल का समय, दूसरे ग्रीक सभ्‍यता और मानसिकता। तीसरे खुद एरिस्‍टोटल का व्‍यक्‍तित्‍व। यक ग्रंथ आज से 2400 बी. सी. अर्थात क्राइस्‍ट पूर्व समय में लिख गया था। ग्रीक सभ्‍यता उस समय अपने शिखर पर थी। सॉक्रेटिस, प्लेटों, और उसके बाद एरिस्‍टोटल—यह शिष्‍य परंपरा थी। सॉक्रेटिस रहस्यदर्शी था, प्लेटों दार्शनिक था।

भारतीय संसद मंद बुद्धि है—ओशो

संसद की छवि गर्व करने लायक नहीं है:
--अटल बिहारी वाजपेयी
(प्रधानमंत्री ने का कि जनमानस में सदन की जो तस्‍वीर उभर रही है। वह ऐसी नहीं है जिस पर सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते गर्व किया जा सके। वाजपेयी ने लोकसभा के मानसून सत्र के समापन संबोधन में (2001) यह बात कहीं।
ओशो-
      ‘’और क्‍योंकि मैंने अपने एक वक्‍तव्‍य में यह कहा कि भारतीय संसद करीब-करीब मंदबुद्धि है तो मुझे एक नोटिस थमा दिया गया, ‘’ आपने देश की महानतम संस्‍था का अपमान किया है..........

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

एनेलेक्‍टस ऑफ कन्फ्यूशियस-(054)

एनेलेक्‍टस ऑफ कन्फ्यूशियस—ओशो की प्रिय पुस्तकें

कन्फूशियस चीन के प्राचीन और प्रसिद्ध दार्शनिकों में से एक है। जैसा कि सभी प्राचीन पौर्वात्‍य व्‍यक्‍तियों के साथ हुआ है, इतिहास में उसके जन्‍म और मृत्‍यु की कोई सुनिश्‍चत तारीख दर्ज नहीं है। जो भी उपलब्‍ध है वह केवल अनुमान है। कन्‍फ्यूशियस का जीवन काल ईसा पूर्व 551-479 बताया जाता है। कुछ इतिहासविद् उससे सहमत है, कुछ नहीं। जो भी हो, उसके जैसे व्‍यक्‍तियों के वचन महत्‍वपूर्ण होते है, उनका इतिहास या भूगोल नहीं। उसके जीवन के संबंध में जो भी आंशिक जानकारी इधर-उधर उपलब्‍ध है उसे जोड़कर जो चित्र बनता है वह यह कि कन्‍फ्यूशियस सामान्‍य परिवार में पैदा हुआ, वह विवाहित था। जीते जी उसकी ख्‍याति एक विद्वान और सर्वज्ञ ऋषि के रूप में फैल चुकी थी। और वह लगातार उसका खंडन करता था। वह इसका इन्‍कार करता था कि वह उसके पास कोई विशेष ज्ञान है। उसके मुताबिक उसके पास जो असाधारण बात थी वह थी सत्तत सीखने की प्‍यास। सुदूर अतीत में जो दिव्‍य शास्‍ता थे उनके आगे वह स्‍वयं को नाकुछ मानता था।

      उसका काम सिर्फ इतना था कि प्राचीनतों के ज्ञान को वह हस्‍तांतरित करे। पुरातन में उसका विश्‍वास और निर्भरता अटूट थी।

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

दि बुक ऑफ ली तज़ु—(053)

दि बुक ऑफ ली तज़ु—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

कन्‍फ्यूशियन दर्शन के बाद, ताओ वाद की बहुत बड़ी दार्शनिक परंपरा है। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में ताओ दर्शन प्रौढ़ हुआ। और तभी से ताओ ग्रंथों में किसी ली तज़ु नाम के रहस्‍यदर्शी का उल्‍लेख पाया जाता है। जी तज़ु जो हवाओं पर सवार होकर यात्रा करता था। उसकी ऐतिहासिकता भी संदिग्‍ध है। पता नहीं उसका समय क्‍या था। कुछ सुत्रों के अनुसार वह ईसा पूर्व 600 में हुआ, और कुछ कहते है 400 में पैदा हुआ। ली तज़ु एक व्‍यक्‍ति भी है, और दर्शन भी। कहते है ली तज़ु पु-तिएन शहर में रहता था। और चालीस साल तक किसी ने उसकी दखल नहीं ली। और राज्‍य के उच्‍च पदस्‍थ और राजसी परिवार के लोग उसे सामान्‍य आदमी समझते थे। चेंग में सूखा पडा और ली तज़ु ने वेइ जाने का फैसला लिया।

      उसके नाम से जो किताब प्रचलित है वह कहानियों, निबंधों और कहावतों का संकलन है। किताब के आठ परिच्‍छेद है। उनमें से ‘’याँग चु’’ शीर्षक से जो परिच्‍छेद है वह सुखवाद का समर्थन करता है। बाकी सात परिच्‍छेदों का संकलन ताओ तेह किंग और च्‍वांग तज़ु के बाद सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण किताब बन गई है। चीनी विद्वानों के मुताबिक यह किताब 300 ईसवी में संकलित की गई थी। यह ताओ वाद का दूसरा सृजनात्‍मक काल था।

रविवार, 19 फ़रवरी 2012

प्रेम को रिश्‍ता मत बनाओ—उर्मिला मातोंडकर

’प्रेम संबंध ऐसी फैटेंसी है जहां आप जिस तरह भी जीना चाहें जी तो सकते है मगर खुश होने के बावजूद आप अंतत: दुःखी ही होते है।‘’
प्रसिद्ध फिल्‍म अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर

ओशो
      ‘’तथाकथित संबंध बहुत सुंदर और सतरंगी सपनों के साथ शुरू होते है। परंतु शीध्र ही वे अत्‍यंत दुःख और गहरे विषाद के साथ समाप्‍त होते है। इसीलिए नये मनुष्‍य के बारे में मेरी जो दृष्‍टि है उसमे बह दूसरों से जुड़ेगा तो सही परंतु किसी प्रकार का रिश्‍ता नहीं बनायेगा—भविष्‍य के लिए किसी तरह

ओशो के प्रवचन पेंटिंग्‍स है—एम एफ हुसैन

हर कोई ओशो के प्रवचनों में से कुछ चून लेता है। मुझे उनमें एक पेंटिंग्‍स बनती नजर आती है। बिना किसी बुश और कैनवास के।
      कलाकार के लिए ओशो कहते है कि सारे तकनीक छोड़ दो और शुन्‍य चित दशा में कला का सृजन करो। इस बात से मैं सौ फीसदी सहमत हूं। इस स्‍थिति में ही कला में वह अनगढ़, शक्‍तिशाली तत्‍व आ सकेगा जो कि वास्‍तविक सृजन का स्‍त्रोत है।
      इस बात को मैंने तब महसूस किया जब ओशो के प्रवचनों को चित्रित करने के लिए में बंबई गया था। सूफियों पर उनके प्रवचन चल रहे थे। अब सूफियों की रूहानी मोहब्‍बत पर ओशो जैसा आदमी बोल रहा हो तो यह मौका तो मैं छोड़ने वाला नहीं था। म्यूज़िशियन के लाइव म्‍यूजिक को पेंटिंग्‍स में उतारने का मेरा सिलसिला शुरू हो चुका था।

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

मुल्‍ला नसरूद्दीन कौन था-(052)

मुल्‍ला नसरूद्दीन कौन था—(ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

कई देश मुल्‍ला नसरूद्दीन को पैदा करने का दावा करते है। टिर्की में तो उसकी कब्र तक बनी हुई है। और हर साल वहां नसरूद्दीन उत्‍सव मनाया जाता है। उस उत्‍सव में मुल्‍ला जैसी पोशाक पहनकर लोग उसके क़िस्सों को अभिनीत करते है। एस्‍किशहर उसका जन्‍म गांव बताया जाता है।
      ग्रीन लोग नसरूद्दीन के क़िस्सों को अपनी लोककथा का हिस्‍सा बनाते है। मध्‍ययुग में नसरूदीन के क़िस्सों का उपयोग तानाशाह अधिकारियों का मजाक उड़ाने के लिए किया जाता था। उसके बाद मुल्‍ला नसरूदीन सोवियत यूनियन का लोक नायक बना। एक फिल्‍म में उसे देश के दुष्‍ट पूंजीवादी शासकों के ऊपर बाजी मारते हुए दिखाया गया था।

      मुल्‍ला मध्‍यपूर्व और उसके आसपास बसने वाली मनुष्‍य जाति के सामूहिक अवचेतन का हिस्‍सा बन गया। कभी वह बहुत बुद्धू बनकर सामने आता है तो कभी बहुत बुद्धिमान। उसके पास कई रहस्‍यों के भंडार है। सूफी दरवेश उसका उपयोग मनुष्‍य के मन के अजीबो गरीब पहलुओं को उजागर करने के लिए किया करते थे।

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

ट्रैक्‍टेटस लॉजिको-(फिलोसफिकस)-051

ट्रैक्‍टेटस लॉजिको—फिलोसफिकस (ओशो की प्रिय पुस्‍तकें)

विटगेंस्‍टीन ऑस्‍टिया के वियना शहर में एक रईस खानदान में पैदा हुआ। उसके पिता उद्योगपति थे उनके पास धन का अंबार था। अंत: विटगेंस्‍टीन को उसके सात भाई-बहनों के साथ उच्‍च कोटि की शिक्षा मिली। उसकी मां और पिता दोनों ही संगीतज्ञ थे और अत्‍यंत सुसंस्‍कृत थे।
      इंजीनियरिंग तथा गणित को सीखने के लिए विटगेंस्‍टीन 1908 में इंग्‍लैड गया। वह बहुत ही मेधावी छात्र था और हर सिद्धांत का खुद प्रयोग करने में विश्‍वास रखता था। 1903 में बर्ट्रेंड रसेल की विख्‍यात किताब ‘’प्रिंसिपल ऑफ मैथेमेटिक्‍स’’ प्रकाशित हुई थी। तो विटगेंस्‍टीन सहज ही रसेल की और खिंचा चला आया। 1911 में वह केंब्रिज जाकर रहने लगा जो कि रसेल का ठिकाना था। विटगेंस्‍टीन रसेल का विद्यार्थी बन गया। सामान्‍यतया बर्ट्रेंड रसेल किसी विद्यार्थी से प्रभावित नहीं होता था—उसकी अपनी प्रतिभा इतनी बुलंद थी कि उसने सामने सभी बौने लगते थे।
लेकिन विटगेंस्‍टीन के संबंध में उसने लिखा है, ‘’विटगेंस्‍टीन को पढ़ाना मेरे जीवन के सर्वाधिक रोमांचकारी बौद्धिक अभियानों में एक रहा है। इसकी आग, कुशाग्र बुद्धि और बुद्धि की निर्मलता असाधारण थी। मैं जो कुछ सिखा सकता था वह उसके शीध्र ही आत्‍मसात कर लिया।‘’
      1912 तक रसेल को यह सुनिश्‍चित हो गया कि विटगेंस्‍टीन एक जीनियस है और उसकी प्रतिभा को गणित के दर्शन की दिशा में मोड़ना जरूरी है। विटगेंस्‍टीन गणित और तर्क के सवालों का अध्‍ययन करने में डूब गया लेकिन उसके लिए उसे केंब्रिज छोड़कर नार्वे जाकर एकांत में रहना पडा क्‍योंकि केंब्रिज के बुद्धिजीवी सिर्फ चर्चा करने में उत्‍सुक थे। उनकी बातचीत में कोई गहराई नहीं थी।

बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

चंदाभ की आभा—(कथा यात्रा-017)

चंदाभ की आभा-(एस धम्मो सनंतनो)
राजगृह में चंदाभ नाम का एक ब्राह्मण रहता था। किसी पूर्व जन्‍म में भगवान कश्‍यप बुद्ध के चैत्‍य में चंदन लगाया करता था।
      कुछ और बड़ा कृत्‍य नहीं था पीछे। लेकिन बड़े भाव से चंदन लगाया होगा कश्‍यप बुद्ध के चैत्‍य में, उनकी मूर्ति पर। असली सवाल भाव का है। बड़ी श्रद्धा से लगाया होगा। तब से ही उसमें एक तरह की आभा आ गयी थी। जहां श्रद्धा है, वहां आभा है। जहां श्रद्धा है, वहां जादू है।
उस पुण्‍य के कारण, वह जो कश्‍यप बुद्ध के मंदिर में चंदन लगाने का जो पुण्‍य था, वह जो आनंद से इसने चंदन लगाया था, वह जो आनंद से नाचा होगा। पूजा की होगी, प्रार्थना की होगी। वह इसके भीतर आभा बन गयी थी। ज्‍योतिर्मय हो कर इसके भीतर जग गयी थी।
      कुछ पाखंडी ब्राह्मण उसे साथ लेकर नगर-नगर घूमते थे। क्‍योंकि वह बड़ा चमत्‍कारी आदमी था। उसकी नाभि से रोशनी निकलती थी। वे कपड़ा उघाड़ कर लोगों को उसकी नाभि दिखाते थे। नाभि देखकर लोग हैरान हो जाते थे। और उन्‍होंने इसमें एक धंधा बना रखा था। वे कहते थे। जो इसके शरीर को स्‍पर्श करता है, वह चाहे जो पाता है। और जब तक लोग बहुत धन दान न करते वह उसका शरीर स्‍पर्श नहीं करने देते थे। ऐसे वह काफी लोगों को लूट रहे थे।