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गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

दीपक बारा नाम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-08

दर्शन तो एक आत्मिक संस्पर्श है—(प्रवचन—आठवां)

दिनांक 8 अक्तूबर 1980;
श्री ओशो आश्रम, पूना

पहला प्रश्न:

भगवान, छांदोग्य उपनिषद में एक सूत्र इस प्रकार है:
न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुखतां
सर्व ह पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति।
सर्वश इति।
अर्थात ज्ञानी न मृत्यु को देखता है, न रोग को और न दुख को; वह सबको आत्मरूप देखता है। और सब कुछ प्राप्त कर लेता है।
भगवान, आप तो गवाह हैं, क्या सच ही बुद्धपुरुष को मृत्यु, रोग और दुख में भी आत्मरूप ही दिखाई पड़ता है?
इस सूत्र पर हमें दिशाबोध देने की कृपा करें।

हजानंद, संबोधि का अर्थ है: अहंकार का मिट जाना। मैं-भाव की समाप्ति अस्मिता का अंत। और जहां मैं नहीं है, वहां सवाल नहीं उठता मृत्यु का। मैं की ही मृत्यु होती है। अहंकार ही मरता है। क्योंकि अहंकार ऐसे हैं जैसे ताशों से बनाया घर।

दीपक बारा नाम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-07

धर्म है मुक्ति का आरोहण—(प्रवचन—सातवां)
दिनांक 7 अक्तूबर 1980;
श्री ओशो आश्रम, पूना
पहला प्रश्न:

भगवान, यह सूत्र छान्दोग्य उपनिषद में उपलब्ध है:
"जो विशाल है, वही अमृत है। जो लधु है वह मर्त्य है। जो विशाल है, वही सुखरूप है। अल्प में सुख नहीं रहता। निस्संदेह विशाल ही सुख है। इसलिए विशाल का ही विशेष रूप से जानने की इच्छा करनी चाहिए।
मूलपाठ इस प्रकार है:
यो वै भूमा तदमृतम। अथ यदल्पं तन्मर्त्यम।
यो वै भूमा तत्सुख। नाल्पे सुख-मस्ति।
भूमैव सुख। भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्यः।।
भगवान, इस सूत्र को हमारे लिए सुस्पष्ट बनाने की कृपा करें।

दीपक बारा नाम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-06

गुहग्रंथिभ्यो विमुक्तोमृतो भवति—(प्रवचन—छठवां)

दिनांक 6 अक्तूबर 1980;
श्री ओशो आश्रम, पूना
 पहला प्रश्न:

भगवान मुंडकोपनिषद का यह सूत्र कुछ अजीब लगता है। यह कहता है: जो उस परम ब्रह्म को जानता है, वह ब्रह्म ही हो जाता है। उसके कुल में ब्रह्म को न जानने वाला पैदा नहीं होता। वह शोक से तर जाता है, पाप से तर जाता है, और हृदय की ग्रंथियों से मुक्त होकर अमृत बन जाता है।
श्लोक इस प्रकार है:
स यो ह वै तत परमं ब्रह्म वेद, ब्रह्मैस भवति।
नास्याब्रह्मवित कुले भवति।
तरति शोकं, तरति पाप्मानम
गुहाग्रंथिभ्यो विमुक्तोमृतो भवति।।
भगवान, हमें इस सूत्र का गूढ़ार्थ समझाने की अनुकंपा करें।

हजानंद! यह सूत्र अजीब लग सकता है, अजीब है नहीं। लग सकता है इसलिए कि इसमें कुछ अस्तित्व के संबंध में बुनियादी बातें कही गयी हैं, जो सामान्य तर्क के अतीत हैं।

बुधवार, 26 अप्रैल 2017

दीपक बारा नाम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-05

अल्लाह बेनियाज़ है—(प्रवचन—पांचवां)

दिनांक 5 अक्तूबर 1980;
श्री रजनीश आश्रम, पूना


पहला प्रश्न—

भगवान, कुरान की जो प्रार्थना है उसके तीन हिस्से हैं: पनाह, अलफातिहा और सूरत-इ-इखलास (मैत्री)। सूरत-इ-इखलास इस प्रकार है:
बिस्मिल्लाहिर् रहमानिर् रहीम।
कुल हुवल्लाहु अहद। अल्लाहुस्समद।
लम् यलिद, वलम् यूलद;
व लम् यकुल्लहू कुफवन् अहद्।।
अर्थ ऐसा है:
पहले ही पहल नाम लेता हूं अल्लाह का, जो निहायत रहमवाला मेहरबान है।
(ऐ पैगंबर, लोग तुम्हें खुदा का बेटा कहते हैं और तुमसे हाल खुदा का पूछते हैं, तो तुम उनसे)
कहो कि वह अल्लाह एक है, और अल्लाह बेनियाज़ है (उसे किसी की भी गरज नहीं), न उसका कोई बेटा है और न वह किसी से पैदा हुआ है। और न कोई उसकी बराबरी का है।
भगवान, इसे हमारे लिए बोधगम्य बनाने की अनुकंपा करें।

नंद मैत्रेय! कुरान अत्यंत सीधे-सादे हृदय का वक्तव्य है। उपनिषद, धम्मपद, गीता, ताओत्तेह-किंग, इन सब में एक परिष्कार है। क्योंकि बुद्ध परम सुशिक्षित, सुसंस्कृत राजघर से आए थे। मोहम्मद बेपढ़े-लिखे थे।

दीपक बारा नाम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-04

संन्यास बोध की एक अवस्था है—(प्रवचन—चौथा)
 
दिनांक 4 अक्तूबर 1980;
श्री ओशो आश्रम, पूना


पहला प्रश्न:

भगवान, यह श्लोक भी मुंडकोपनिषद में है:
वेदांत विज्ञान सुनिश्चितार्था:
संन्यास योगाद यतय: शुद्ध-सत्वा:।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले
परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे।।
अर्थात वेदांत और विज्ञान (प्रकृति का ज्ञान) के द्वार जिन्होंने अच्छी तरह अर्थ का निश्चय कर लिया है और साथ ही संन्यास और योग के द्वारा जो शुद्ध स्वत्व वाले हो गये हैं, वे प्रयत्नवान ब्रह्मपरायण लोग मरने पर ब्रह्मलोक में पहुंच कर मुक्त हो जाते हैं।
भगवान, हमें इस सूत्र को समझाने की अनुकंपा करें।

हजानंद! यह सूत्र तो मूल्यवान है, लेकिन इसकी जो व्याख्याएं की गयी हैं अब तक, बड़ी मूल्यहीन हैं। तुमने भी हिंदी में इसका जो अर्थ किया है, वह उन्हीं व्याख्याओं पर आधारित है जो गलत हैं। और गलत व्याख्या बहुत दिनों तक चलती रहे तो ठीक मालूम होने लगती है। पुनरुक्ति का एक सम्मोहन है, जादू है।

दीपक बारा नाम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-03

स्वयं का सत्य ही मुक्त करता है—(प्रवचन—तीसरा)


दिनांक 3 अक्तूबर 1980;
श्री ओशो आश्रम, पूना

पहला प्रश्न:

भगवान, शह श्लोक मुंडकोपनिषद का है:
सत्यं एक जयते नानृतम
सत्येन पन्था विततो देवयानः।
येनाक्रमन्ति ऋषियो ह्याप्तकामा
यत्र तत्र सत्सस्य परम निधानम।।
अर्थात सत्य की जय होती है, असत्य की नहीं। जिस मार्ग से आप्तकम ऋषिगण जाते हैं और जहां उस सत्य का परम निधान है, ऐसा देवों का वह मार्ग हमारे लिए सत्य के द्वारा ही खुलता है।
भगवान, क्या सत्य साध्य और साधन दोनों है? हमें दिशा बोध देने की अनुकंपा करें!

हजानंद! धर्म के सूत्रों के संबंध में एक प्राथमिक बात सदा स्मरण रखना: वे अंतर्यात्रा के सूत्र हैं, बहिर्यात्रा के नहीं। यह भूल जाए तो फिर सूत्रों की व्याख्या गलत हो जाती है।

दीपक बारा नाम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-02

यह मयकदा है—(प्रवचन—दूसरा)

दिनांक 2 अक्तूबर 1980;
श्री ओशो आश्रम पूना

पहला प्रश्न:

भगवान, मुंडकोपनिषद में यह श्लोक आता है:
नायं आत्मा प्रवचने लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यं एवैष वृणुतं तेन लभ्यस
तस्यैष आत्मा विवृणुते स्वाम।।
अर्थात यह आत्मा वेदों के अध्ययन से नहीं मिलता, न मेधा की बारीकी या बहुत शास्त्र सुनने से मिलता है। यह आत्मा जिस व्यक्ति का वरण करता है उसीको इसकी प्राप्ति होती--आत्मा उसीको अपना स्वरूप दिखाता है।
भगवान, उपनिषद के इस सूत्र को हमारे लिए बोधगम्य बनाने की अनुकंपा करें।

हजानंद! यह सूत्र उन थोड़े-से सूत्रों में से एक है, जिनमें अमृत भरा है। जितना पीओ, उतना थोड़ा।
नायं आत्मा प्रवचनेन लभ्यो

दीपक बारा नाम का-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-01

महल भया उजियार—(प्रवचन—पहला) 


1 अक्तूबर 1980;
श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न:

भगवान, "दीपक बारा नाम का', संत पलटू के इस सूत्र से आज एक नयी प्रवचन माला शुरू हो रही है। कृपया समझाएं कि यह नाम का दीपक क्या है और संत पलटू किस नाम का जिक्र कर रहे हैं?

चैतन्य कीर्ति!
पूरा सूत्र इस प्रकार है--
पलटू अंधियारी मिटी, बाती दीन्हीं बार।
दीपक बारा नाम का, महल भया उजियार।।
मनुष्य जन्मता तो है, लेकिन जन्म के साथ जीवन नहीं मिलता। और जो जन्म को ही जीवन समझ लेते हैं, वे जीवन से चूक जाते हैं। जन्म केवल अवसर है जीवन को पाने का। बीज है, फूल नहीं। संभावना है, सत्य नहीं। एक अवसर है, चाहो तो जीवन मिल सकता है; न चाहो, तो खो जाएगा। प्रतिपल खोता ही है। जन्म एक पहलू, मृत्यु दूसरा पहलू। जीवन इन दोनों के पार है। जिसने जीवन को जाना, उसने यह भी जाना कि न तो कोई जन्म है और न कोई मृत्यु है।

दीपक बारा नाम का-(प्रश्नोत्तर)-ओशो

दीपक बार नाम का
ओशो
लटू अंधियारी मिटी, बाती दीन्हीं बार।
दीपक बारा नाम का, महल भया उजियार।।
मनुष्य जन्मता तो है, लेकिन जन्म के साथ जीवन नहीं मिलता। और जो जन्म को ही जीवन समझ लेते हैं, वे जीवन से चूक जाते हैं। जन्म केवल अवसर है जीवन को पाने का। बीज है, फूल नहीं। संभावना है, सत्य नहीं। एक अवसर है, चाहो तो जीवन मिल सकता है; न चाहो, तो खो जाएगा। प्रतिपल खोता ही है। जन्म एक पहलू, मृत्यु दूसरा पहलू। जीवन इन दोनों के पार है। जिसने जीवन को जाना, उसने यह भी जाना कि न तो कोई जन्म है और न कोई मृत्यु है।

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

चेत सके तो चेत-(विविध)-प्रवचन-06

प्रवचन-छट्ठवां-(अश्लीलता: नैतिकता का फल)
दिनांक 13 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबार, गुजरात।


प्रश्न यह है कि चित्रों में, पोस्टर्स वगैरह में अश्लील चीजें पेश की जाती हैं। तो लोग अश्लील हैं, यानी पोस्टर्स से, इनसे नहीं बदले हैं, मगर वे खुद अश्लील हैं ही। इसलिए वे जो चित्र वगैरह में ले आते हैं। तो मेरा सवाल यह है कि यह जो कार्य-कारण संबंध है वह एकमार्गी नहीं है, द्विमार्गी है। हो सकता है कि लोग थोड़े अश्लील हों, अश्लील चीजें पसंद करते हों। मगर ये चित्र, ये पोस्टर्स, ये फिल्म वगैरह उस अश्लीलता को और ज्यादा बढ़ाएं, कुछ ऐसा पेश करते हैं। तो इसलिए सिर्फ लोगों की अश्लीलता यही कारण है, मगर दूसरी तरफ से वह कार्य-कारण संबंध जो है, द्विमार्गी चलता है। इसलिए अगर कोई कहे कि फिल्म और पोस्टर बढ़ा रहे होंगे या अश्लीलता कम की जानी चाहिए...
वे मित्र पूछ रहे हैं कि ऐसा मैंने कहा कि लोग अश्लील हैं, उनके मन की मांग अश्लीलता की है, इसीलिए अश्लील चित्र, फिल्में, गीत उन्हें पसंद पड़ते हैं। मित्र पूछ रहे हैं कि यह संबंध दोहरा हो सकता है। यह हो सकता है कि अश्लील चित्रों, फिल्मों और गीतों को सुन कर उनमें अश्लीलता भी पैदा होती हो।

चेत सके तो चेत-(विविध)-प्रवचन-05

प्रवचन-पांचवा-(खोलो नये ऊर्जा द्वार)
दिनांक 11 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबार, गुजरात।


कोई भी काम टेंशन पैदा कर रहा है, कोई भी काम ऊब पैदा कर रहा है। काम सवाल ही नहीं है। हम कैसे काम को लेते हैं--यह सवाल है। हमारा एटिटयूड क्या है। काम तो सब बोरिंग हैं। रोज रिपिटीटिव हैं। वही तुम्हें फिर करना पड़ेगा--चाहे दफ्तर जाओ, चाहे पढ़ाने जाओ, चाहे फैक्ट्री में जाओ, चाहे मजदूरी करो। रोज वही काम करना पड़ेगा। और एक बंधे हुए घेरे में रोज घूमना पड़ेगा। वह उबाने वाला हो ही जाएगा। पुनरुक्ति ऊबाती है, रिपीटीशन बोर्डम है। इसलिए यह तो सवाल ही नहीं है।
और रोज काम बदलोगे तो जिंदगी मुश्किल में पड़ जाएगी। और रोज-रोज काम बदला, तो बदलना भी रिपिटीटिव हो जाएगा, वह भी उबाने लगेगा। जो भी चीज दोहरने लगेगी, वह उबाने वाली हो जाएगी।

चेत सके तो चेत-(विविध)-प्रवचन-04

प्रवचन-चौथा-(धर्म और चिंतन)
दिनांक 10 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबार, गुजरात।

बुद्ध ने अपने पिछले जन्म की एक कहानी कही है। पिछले जन्म की कहानी है। तब वे बुद्धपुरुष नहीं थे। और उस जन्म में, जो उस जमाने में एक बुद्धपुरुष थे, वे उनके दर्शन करने गए थे। तो जब उन्होंने उन बुद्धपुरुष के पैर छुए, पैर छूकर वे उठ ही पाए थे कि वे बुद्धपुरुष भी झुके और इनके पैर छू लिए! ये बहुत हैरान हो गए। इन्होंने कहा कि मैं आपके पैर छुऊं, नमस्कार करूं, यह तो ठीक है। आप मेरे पैर छुएं और नमस्कार करें, यह तो मेरी समझ के बाहर हो गया! तो उस बुद्धपुरुष ने कहा कि यह तुम्हारी समझ के बाहर है। क्योंकि मुझमें जो वास्तविक हो गया है, वह तुममें संभावना है। और आज नहीं कल तुममें भी वास्तविक हो जाएगा। वास्तविक हो जाएगा तुममें भी; जो आज बीज है वह कल वृक्ष हो जाएगा। मैं उस संभावना को नमस्कार करता हूं। और इसलिए कर रहा हूं ताकि तुम्हें याद दिला सकूं कि तुममें भी वह संभावना है।

चेत सके तो चेत-(विविध)-प्रवचन-03

प्रवचन-तीसरा-(धर्म की क्रांति)
दिनांक 09 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबार, गुजरात।


पिछले साल साईंबाबा आए थे और हमारे राज्यपाल जी, मुख्यमंत्री जी, वे भी वहां गए थे। और सुना है कि प्रधानमंत्री की पत्नी को एक ताबीज भी दिया था। मैं आपसे यह जानना चाहता हूं कि आध्यात्मिकता और चमत्कारों के बीच कोई नाता है?

आध्यात्मिकता और चमत्कार के बीच एक नाता है, वह नाता विरोध का है। आध्यात्मिक व्यक्ति चमत्कार के लिए राजी नहीं होगा, यह नाता है। और जो व्यक्ति चमत्कार के लिए राजी होता हो, उसे मदारी कहना चाहिए, आध्यात्मिक नहीं।
लेकिन मदारीपन से बहुत लोग प्रभावित होते हैं। अध्यात्म से प्रभावित होना भी बहुत मुश्किल है। मदारीपन बहुत तेजी से प्रभावित करता है। और इस भ्रम में हमें नहीं रहना चाहिए कि हमारे राज्यपाल या हमारे न्यायाधीश या हमारे मंत्री और मुख्यमंत्री, मदारियों के प्रभाव से मुक्त हैं। बल्कि सच तो यह है कि वे ज्यादा प्रभाव में हैं। जिन लोगों की भी बहुत महत्वाकांक्षा है, वे मदारियों के प्रभाव में बहुत जल्दी पड़ जाएंगे।

चेत सके तो चेत-(विविध)-प्रवचन-02

प्रवचन-दसरा-(प्राचीन से नवीन)


दिनांक 08 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबार, गुजरात।

आचार्य श्री, आपकी स्पीच से, क्या करना चाहिए, ऐसा कुछ ज्यादा समझ में आता है। मगर कैसे करना चाहिए? और खासतौर से इंडिविजुअल बेस पर नहीं, मगर एज ए कम्युनिटी और एज ए सोसाइटी क्या करना चाहिए, वह जरा ज्यादा डिटेल में आप बताएं।

वह तो मैं दुबारा आऊं और दिन या दो दिन रुकूं, तो आसान पड़ेगा।
लेकिन अभी तो मुल्क के सामने करने की एक ही बात है कि कुछ भी करने की जल्दी नहीं करनी चाहिए और विचार की एक हवा फैलानी चाहिए। करने की बहुत जल्दी नहीं करनी चाहिए अभी। क्योंकि जब तक मुल्क के पास ठीक विचार न हो, हम जो भी करने की कोशिश करेंगे, उससे गलत और उपद्रव ही होने का डर ज्यादा है। तो मुल्क के पास ठीक-ठीक माइंड नहीं है, इसलिए एक्शन की बहुत जल्दी गङ्ढे में ले जाने वाली है और कहीं नहीं ले जाने वाली है।

सोमवार, 24 अप्रैल 2017

चेत सके तो चेत-(विविध)-प्रवचन-01

प्रवचन-पहला-(चिंतन की स्वतंत्रता)

दिनांक 07 जून सन् 1969
बडौदा-अहमदाबार, गुजरात।

मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी कहानी से मैं अपनी बात कहूंगा।
एक बहुत पुराना गांव था। और उस गांव से भी ज्यादा पुराना एक चर्च था उस गांव में। उस चर्च की सारी दीवालें गिरने के करीब हो गई थीं। न तो कोई उपासक उस चर्च के भीतर प्रार्थना करने जाता था, न कोई कभी उस चर्च के भीतर...चर्च के भीतर जाना तो दूर, उसके पास से निकलने में भी लोग डरते थे। वह चर्च कभी भी गिर सकता था। हवाएं चलती थीं, तो गांव के लोग सोचते थे, आज चर्च गिर जाएगा। आकाश में बादल गरजते थे, तो गांव के लोग बाहर निकल कर देखते थे, चर्च गिर तो नहीं गया! बिजली चमकती थी, तो डर होता था, चर्च गिर जाएगा। ऐसे चर्च में कौन प्रार्थना करने जाता? चर्च बिलकुल मरा हुआ था, लेकिन फिर भी खड़ा हुआ था।

चल हंंसा उस देश-(ध्यान-साधना)-प्रवचन-07


संन्यास और अंतस—क्रांति—सातवां प्रवचन

सातवां प्रवचन
घाटकोपर, बंबई,
दिनांक 9 अप्रैल 1966


अगर आप पुरुष हैं और आपको किसी स्त्री का आकर्षण है, तो यह आकर्षण बहुत गहरे में आपके भीतर ही जो आधी स्त्री बैठी है, उसके प्रति है। और जब तक यह स्त्री भीतर नष्ट न हो जाये, तब तक आप बाहर कितनी पत्नियां छोडते रहें, भागते रहें, कोई परिणाम नहीं होगा। आपके मन में स्त्री का आकर्षण बना ही रहेगा। वह घूम—फिर कर आता ही रहेगा। फिर आप नयी—नयी कल्पनाओं में उसका ही रस लेते रहेंगे।
संन्यास बच्चों जैसी बात नहीं है कि एक लड़के को साधु—संन्यासियों की बात सुनकर या किसी लड़की को भावावेश आ गया और उसने कपड़े बदल लिए और कुछ उलटा—सीधा कर लिया, तो वह कोई संन्यासी हो गया! भीतर उसकी साइक कैसी बनेगी! उसका पूरा का पूरा अंतःकरण और मन कैसे बनेगा? उस मन में तो, उसके अनकांशस में विपरीत लिंग बैठा हुआ है।

चल हंसा उस देश-(ध्यान-साधना)-प्रवचन-06


ध्यान है : भगवत्ता—छठवां प्रवचन

छठवां प्रवचन
बंबई; दिनांक 15 अप्रैल, 1970

प्रश्न :

आजकल अनेक संत लोग चमत्कार बताते हैं, उसके संबंध में आपका क्या मंतव्य है?

आदमी बहुत कमजोर है और बहुत तरह की तकलीफों में है। उसकी तकलीफें बिलकुल सांसारिक हैं। अभी एक, और सामान्य आदमी ही नहीं—सुशिक्षित, जिनको हम विशेष कहें वे भी...। अभी एक चार—छह दिन पहले कलकत्ते से एक डाक्टर का पत्र मुझे आया। वह डाक्टर है। तबादला करवाना है, कलकत्ते से बनारस। पत्नी—बच्चे बनारस में हैं। तो मुझे लिखता है कि मैं सब तरह की पूजा—पाठ करवा चुका हूं। साधु—संतों के सब तरह के दर्शन कर चुका हूं सैकडों रुपए भी खर्च कर चुका इस पर, लेकिन अभी तक मेरा तबादला नहीं हो पाया। तब आखिरी आपकी शरण आता हूं। तबादला करवा दें, नहीं तो मेरा भगवान से भरोसा ही उठ जाएगा।

रविवार, 23 अप्रैल 2017

चल हंसा उस देश-(ध्यान-साधना)-प्रवचन-05


ध्यान है अक्रिया—(पाँचवाँ-प्रवचन)

पांचवां प्रवचन
बंबई, दिनांक 10 मार्च, 1970


 मेरे प्रिय आत्मन,
कल मैंने कहा कि ध्यान अक्रिया है, तो एक मित्र ने पूछा है कि वे समझ नहीं सके कि ध्यान अक्रिया कैसे है? क्योंकि जो हम करेंगे, वह तो क्रिया ही होगी, अक्रिया कैसे होगी?
मनुष्य की भाषा के कारण बहुत भूल पैदा होती है। हम बहुत—सी अक्रियाओं को भी भाषा में क्रिया समझे हुए हैं। जैसे हम कहते हैं, 'फलां व्यक्ति ने जन्म लिया। ' सुनकर ऐसे लगता है, जैसे जन्म लेने में उसको भी कुछ करना पडा होगा। जन्मना एक क्रिया है। हम कहते हैं, 'फलां व्यक्ति मर गया', तो ऐसा लगता है कि मरने में उसे कुछ करना पडा होगा। हम कहते हैं कि 'कोई सो गया', तो ऐसा लगता है कि सोने में उसे कुछ करना पडा होगा। नींद क्रिया नहीं है, मृत्यु क्रिया नहीं है, जन्म क्रिया नहीं है, लेकिन भाषा में वे क्रियाएं बन  जाती हैं।

चल हंसा उस देश-(ध्यान-साधना)-प्रवचन-04


ध्यान है : साक्षी—भाव—(चौथा-प्रवचन)

चौथा प्रवचन
बंबई; दिनांक 25 फरवरी,1970
प्रश्न :

ध्यान के समय मन एकाग्र नहीं होता, तो क्या करूं?

नहीं; पहली तो यह बात आपके खयाल में नहीं आयी कि एकाग्रता ध्यान नहीं है। मैंने कभी एकाग्रता करने को नहीं कहा। ध्यान बहुत अलग बात है। साधारणत: तो यही समझा जाता है कि एकाग्रता ध्यान है। एकाग्रता ध्यान नहीं है। क्योंकि एकाग्रता में तनाव है। एकाग्रता का मतलब यह है कि सब जगह से छोड्कर एक जगह मन को जबरदस्ती रोकना। एकाग्रता सदा जबरदस्ती है; इसमें कोएर्सन है। क्योंकि मन तो भागता है, और आप कहते हैं : 'नहीं भागने देंगे ' तो आप और मन के बीच एक लडाई शुरू हो जाती है। और जहां लडाई है, वहां ध्यान कभी नहीं होगा। क्योंकि लडाई ही तो उपद्रव है, हमारे पूरे व्यक्तित्व की। कि वह पूरे वक्त कॉनफ्लिक्ट है, द्वंद्व है, संघर्ष है। और मन को ऐसी अवस्था में छोडना है, जहां कोई कॉनफ्लिक्ट ही नहीं है, तब ध्यान में आप जा सकते हैं।

चल हंसा उस देश-(ध्यान-साधना)-प्रवचन-03


ध्यान मंदिर है: मनुष्‍य का मंगल—तीसरा प्रवचन

तीसरा प्रवचन
साधना शिविर, तुलसीश्याम,
सौराष्ट्र; दिनांक 6 फरवरी, 1966


प्रश्न :

मैं यह पूछना चाहता हूं कि हम लोग जो फंड्स इकट्ठा करने का सोच रहे हैं कि पंद्रह लाख रुपये के करीब इकट्ठा करें, तो इसके लिए आपका मकसद क्या है? ऐसा करने से जीवन जागृति केंद्र का सब जगह से क्या फायदा है, इस बारे में आप समझायें।

बहुत—सी बातें हैं। एक तो जैसी स्थिति में हम आज हैं, ऐसी स्थिति में शायद दुबारा इस मुल्क का समाज कभी भी नहीं होगा। इतने संक्रमण की, ट्रांजीशन की हालत में हजारों, सैकडों वर्षों में एकाध बार समाज आता है—जब सारी चीजें बदल जाती हैं, जब सब पुराना नया हो जाता है। ये क्षण सौभाग्य भी हो सकते हैं और दुर्भाग्य भी। जरूरी नहीं है कि नया हर हालत में ठीक ही होता है। पुराना तो हर हालत में गलत होता है, लेकिन नया हर हालत में ठीक नहीं होता। और जब पुराना टूटता है, तो हजार विकल्प, आल्टरनेटिब्स होते हैं। दुर्भाग्य बन सकता है, अगर गलत विकल्प चुन लिया। इस बात को ठीक से समझ लेना चाहिए।