पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
दिनांक 08 जून सन् 1980, ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-आट्ठवां-
(प्रश्न-सार)
(प्रश्न-सार)
01—मीरा मेरी प्रेरणा-स्रोत रही है और कृष्ण मेरे
इष्टदेव। शांत क्षणों में मैंने भी मीरा जैसे भक्ति-भाव की कल्पना तथा चाह की है
और उसी के अनुरूप कुछ प्रयास भी किया। मगर प्राणों में उतनी पुलक नहीं उठी कि मैं
नाच सकूं। फिर मैं आपके संपर्क में आया; आपका शिष्य हुआ। मैं
तरंगित हुआ; मैं रोया; मैं हंसा। मगर
कृष्ण से अब कुछ लगाव नहीं रहा। अब तो उस छवि के पास आते और आंखें मिलाते भी संकोच
लगता है, जिसे मैंने वर्षों पूजा, जिसकी
अर्चना की। यह क्या है भगवान?
02—उज्जैन के सिंहस्थ मेले में उस स्थान पर काफी भीड़
होती थी जहां नागा साधु लैंगिक प्रदर्शन करते थे। जैसे लिंग से बांध कर जीप गाड़ी
को खींचना, आदि। क्यों नग्न प्रदर्शन करने व देखने में लोग
उत्सुक होते हैं और उनकी तारीफ करते हैं? और जब आपके आश्रम
में ऐसा कोई कृत्य नहीं होता, फिर भी लोग क्यों आप पर और
आपके आश्रम पर नाराज हैं?
03—मैं जल्दी से जल्दी दुख से मुक्ति चाहता हूं और
मोक्ष का आनंद भी। कोई मार्ग बतावें।





