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रविवार, 4 जनवरी 2026

47 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय -47

फिर काम शुरू

दीपावली के कुछ दिनों के बाद राम रतन जी फिर काम करने के लिए आ गये। पापा जी तो उनका इंतजार कर ही रहे थे। इस बीच पापा जी न जाने दीदी के साथ बाजार से जाकर कितनी टाईल कि पेटियां ले आये थे। जिससे एक आँगन का कोना भर गया था। शायद मेरे हिसाब से काम ऊपर से ही चालू होना चाहिए। और ठीक ऐसा ही हुआ भी। सबसे पहले ऊपर छत पर जो सुंदर आर्च बनी थी उन पर महरून टाइले लगाई गई। नीचे की क्यारियों में और मोमटी पर तो पहले ही टाईल लगा दी गई थी। सुंदर मोमटी काली सफेद टाईलों से कितनी सुंदर लग रही थी। ठीक उसके बगल में पिरामिड अपने काले वैभव रूप में गर्व से अलग खड़ा दिखाई दे रहा था। बीच कि गैलरी में सफेद झक पाए एक कतार में खड़े कैसे सैनिक भाव दे रहे थे। रंग और डिज़ाइन कितने करीने से तैयार हो रहा थे,  उन पायो या जाली से जब मैं उनमें नीचे भी झांक लेता था और गिरने का कोई डर भी नहीं था। क्योंकि उन पायो में आपस की दूरी बस मेरा मुख ही बहार जाता था गर्दन भी नहीं। सब कितना सुंदर लग रहा था ऊपर से जब मैं नीचे की और देखता तो पेड़ पौधे क्यारियां कितनी सुंदर दिखती थी।

फिर फर्श का काम चालू हुआ गैलरी से जहां पर पानी की टंकियां बनी हुई थी दो दिन में टंकी पर टाई लगा दी गई और तीसरे और चौथे दिन पूरी गैलरी कर दी। मैं सोच रहा था अगर इतनी तेजी से काम चलता रहा तो फिर एक दो महीने में सारे घर में टाईल लग चूकी होंगी। अधिक तो टाईल लग ही गई थी। केवल फर्श ही का काम तो बाकी था। छत के नीचे भी कितनी सुंदर काली सफेद टाईल लगाई थी। अब वहां पेंट करने का कोई काम नहीं बेचारा मूर्जी साहब तो कह रहा है राम रतन तु मेरे पेट पर लात मार रहा है। अब भला मैं रंग-पैंट कहां पर करूंगा। तब पापा जी हंस कर कहते बहुत काम है, पाए है जाली है, और दरवाजों पर पॉलिश करनी है। तब मूर्जी साहब झेप जाते।

उधर की टंकी पर टाईल लगने के बाद, फर्श भी दो दिन में पूरा हो गया। अब मैं सोच रहा था की अब क्या होगा। परंतु देख रहा था की सीढ़ीयों पर भी टाईल लगाई जा रही थी। अरे क्या टाईल लगने से इन पर पैर नहीं फिसलेगा? परंतु नहीं ये टाईल कुछ अलग थी जो अपने अंदर एक खुरदरा पन लिए थी। जो टाइले छत के और सीढ़ीयों के लिए दीदी और पापा जी चून कर लाये थे। वो सब अलग-अलग रंग रूप होने के साथ सौंदर्य तो बढ़ा रही थी परंतु इसके अलावा मजबूत भी थी। क्योंकि इससे पहले जब भैया हर के कमरों में टाइलें लगी थी। पापा जी तब दोनों भैया को लेकर गए थे। उन्होंने इतनी खराब टाईल चुनी की क्या बताऊं उन्हें बाद तक भी पछताना होगा। वह टाईल देखने मात्र में सुंदर है परंतु टिकाऊ नहीं थी। इसलिए अब की बार पापा जी और दीदी ने टाइले खरीदने की जिम्मेदारी ली थी। कितनी छत है, कितने फीट है, किस जगह के लिए कितनी टाइले लानी है। हर जगह अलग तरह की टाइले लग रही है। अगर बच जायेगी तो फिर वह किसी काम की नहीं रहती। आदमी के अंदर कितना दिमाग होता है। जिस की हम कल्पना भी नहीं कर सकते वह वो कार्य किस सहजता से कर लेता। भले आदमी आप कैसे पता लगते हो की यहां पर इतनी टाइले लगेगी। भई अपने पास तो इतना दिमाग नहीं है। जो मगज खपाई की जाये। चलो ये काम हमार नहीं है। हम तो बस इस समय टाइले लगाते हुए देखने का आनंद ले रहे है।

इसके बाद सीढ़ीयां को काम चालू हुआ रोज एक फ्लौर की सीढियां बन जाती थी। दोनों साई की सीढ़ीयों के बाद वहां की खुली छतों पर टाईल लगाई गई, एक तरफ नीले रंग, आप छत से देखों तो आपको लगेगा की छत पर नीला पानी भरा है, मन और आंखों को कितना आराम मिलता है, एक और पेड़े की हरियाली और दूसरी और पानी का भाव। दूसरी छत पर सफेद में स्लेटी रंग का डिज़ाइन बनाया गया ये वहीं टाईल थी जो सीढ़ियों पर लगाई जा रही थी। सीढ़ियों पर भी दोनों किनारे की टाइले सफेद थी और बीच की पट्टी को स्लेटी रखा गया था। वहां आप कम रोशनी में भी बड़े आराम से उतर ओर चढ़ सकते हो।

फिर हिमांशु भैया का कमरा और वरूण भैया का कमरा दोनों एक ही डिज़ाइन की कुछ बड़ी टाइले लाई गई थी। शायद सबसे बड़ी फिर दोनों तरफ की गैलरी के बाद सीढ़ियों काम इस तेजी से हो रहा था। लगता था बस अभी खतम हुआ के तभी। साथ-साथ मूर्जी साहब भी अपने चेले के साथ छत के पाये पर पैंट कर रहे थे। उसके बाद में मकान की पीछे के हिस्से पर एक झूले से लटक कर पेंट किया जा रहा था। झूले में बैठ कर दीवारों पर पेंट कितना खतरनाक काम था। सीढ़ी को लगा कर एक मोटे रस्से से एक झूला लटककर दिया जाता है जिस पर मूर्जी साहब बैठ कर पेंट करते जाते है और धीरे-धीरे उसे नीचे छोड़ना होता है। इस काम में उसके चेले के साथ प्रभु भी करता था। एक आदमी से रस्सा पकड़ना अति कठिन था। क्योंकि अगर यहां से जरा चूक हुई और फिर तो राम...नाम ही समझो। चलों हम ये बुरा ख्याल क्यों अपने मन में लाये सब की जिंदगी कीमती है।

सर्दी के कारण अभी बहार ही सार रंग रोगन हो रहा था। उधर ईशाद मियां भी अपना काम खत्म करते जा रहे थे। भैया हर की अलमारी के बाद वहां के दरवाजे तो पहले ही लगा दिए थे तभी तो वहां आप फर्श कर सकते हो। इसके बाद नीचे का दरवाजा बनाया गया। जिससे की बच्चों के आने जाने का रास्ता उनकी सीढ़ीयों से सीधा बहार जाता था। पुराने मकान का दरवाजा अलग था उनकी सीढियां भी अलग थी। समय का क्या पता। बच्चे अपनी जिंदगी में एकांत में जीना चाहे तो फिर वो पूर्ण स्वतंत्र है कब आना कब जाना। आपके आने जाने का पूरा रास्ता ही अलग से तैयार कर दिया गया है। पापा जी की सोच दो कदम आगे ही रहती थी, वो हर चीज को पूर्णता से सोचते थे। मुझे लगता है सब से पहले ईशाद मियां का काम खत्म होगा। क्योंकि वह तो छुट्टियों में भी काम करते रहे थे। एक और की टाईल लगते हुए जैसे नीचे ध्यान कक्ष के सामने पहुंची वहां पर ईशाद मियाँ का काम खत्म हो गया।

भैया हर की तरफ का काम खत्म हो रहा था। वहां का पैंट का काम तो पहले ही खत्म हो गया था। बचा था पॉलिश का काम। शायद सर्दी के कारण पॉलिश करना ठीक नहीं होगा। यहीं मूर्जी साहब कह रहे थे। अब हमारी तरफ की सीढ़ीयां हो फर्श का काम हो रहा था। वहां भी ज्यादा काम नहीं था। कुछ जगह तो पहले ही टाईल और पत्थर लग चूका था। लाईब्रेरी किचन मम्मी जी का कमरा और बाथरूम। बस सीढियां ओर आंगन का ही काम था। एक जहां पर खाने की टेबल बनी थी वहां पर हरे रंग के कोटा पत्थर की बनी हुई थी। इसलिए वहां पर हरे रंग की टाई लगाई गई ताकी उसका सौंदर्य और उभर कर सामने आये। सामने ही ओशो जी के चेहरे का सिमेंट का बनी मूर्ति थी। जो हिमांशु भैया और पापा न तब बनाया था जब राम रतन घर पर थे। बस वहां पर फर्श का कार्य था, सामने सोना बाथ पहले ही तैयार था उसके सामने बाथ रूम में तो सालों पहले ही पत्थर लग गया था वह तो इस्तेमाल हो रहा था। कुछ काम तो करीब पाँच साल पहले ही हो गया था। क्योंकि उस मकान के खरीदने से पहले यहां का काम लगभग खतम था। इस तरह से देखे तो यह फर्श केवल दस-बीस दिन में ही लग सकते थे। उस सब के लिए पाँच साल इंतजार करना पड़ा। क्योंकि अगर पहले फर्श बन जाता तो अगर उस पर सिमेंट का मसला अगर गिरता तो फर्श खराब हो जाता है। ये खाने की टेबल तो करीब मैं छोटा होता था। तभी आ गयी थी। जब यहां की छत आदि की लिपाई हो रही थी तो इसे मोटी बोरियों से ढकना होता था। वरना तो इसकी पॉलिश खराब हो जाती।

फिर भी टाईल लगने के बाद दोबारा पॉलिश कराई गई। जैसे-जैसे काम खत्म हो रहा था मुझे बड़ा मजा आ रहा था। देखो अपना मकान कितना सुंदर होता जा रहा है। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि इस तरह से बनेगा। फिर मेरा दिमाग ही कितना था। सो मेरी सोच से हजार गुणा ज्यादा सुंदर बन रहा था ओशोबा हाऊस। कितने सालों से ओशोबा हाऊस बन रहा था। कहां से कहां पहुंच गया। और इस सब को देखा है मैंने अपनी आंखों से बनते हुए। कितना भाग्य शाली हूं की इस को पूर्ण होते देख रहा हूं। आज मुझे दादा जी की बहुत याद आती है वह भी कुछ दिन और जीवित रह जाते तो पूर्ण होता इसे देख लेते। लेकिन ये पूर्ण तो उनके सामने हो गया था। कितना काम हुआ मात्र फर्श का। जो सौंदर्य में चार चाँद तो लगता है जो पूर्णता लाता है वह फर्श ही अंतिम कार्य होता है। परंतु देखने वालों के लिए तो दीवारें अधिक महत्व पूर्ण होती है। वो सब तो दादा जी के सामने हो ही गया था।

दादा जी की कमी बच्चों को भी खलती थी। क्योंकि वह हर श्याम जब घर पर आते तो बच्चों के साथ बैठ कर बाते करते या टीवी देखते थे। मेरी समझ में तो कुछ नहीं आता था परंतु मैं पास बैठ कर सुनता रहता था। दादा जी बहुत खुश होते थे। वरूण भैया को कह कर दादा ने अंतिम समय पर अपनी पसंद का धारावाहिक ‘रामायण’ देखने को कहां और पापा जी उनके लिए डी.वी.डी. का सेट मंगवा दिया। और ये सब मिल कर कई महीनों तक उसे देखते रहे। उससे पहले इन्होंने ‘’महाभारत’’ धारावाहिक को पूरा देखा था। चलों उनके मन की कोई मुराद अधूरी नहीं रही। ओर देखों मरने से तीन दिन पहले उन्होंने रामायण के अंतिम एपिसोड देखा था। कैसा चमत्कार है ये सब। हर घटना अपने में एक रहस्य को समेटे चलती है फिर चाहे वह घटना आपको बड़ी लगे या छोटी। यानि उसे पूरा होने के दो दिन बाद दादा जी को चोट लग गई। अंतिम समय वह बहुत खुश थे। हों भी क्यों न इस परिवार के प्रत्येक प्राणी से उन्हें बेहद प्यार मिलता था। केवल मैं एक ऐसा प्राणी था जो केवल प्यार लेता था सब से। परंतु मैं प्यार अगर देता भी हूं तो मेरा तरीका थोड़ा भिन्न है मनुष्य के प्रेम से।

शारदीय ऋतु धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। सुबह जरूर थोड़ी ठंड होती थी परंतु दिन गर्म होने लगे थे। छत पर धूप अधिक तेज हो रही थी। मार्च माह में दिल्ली की धूप थोड़ी सी चूबने लग जाती है। ये भी अच्छा था की इस घूप से पहले ही छत का सभी काम खत्म हो गया। मूर्जी साहब ने भी अपने पेंट का काम समाप्त कर दिया था वह अब भैया लोगों की ओर पॉलिश कर रहे थे। उस पॉलिश की कितनी तेज गंध होती है। मैं जब उधर जाता तो मेरे नाकों में घुस जाती थी वहां खड़ा होना भी मुश्किल था। परंतु वही अगले दिन न जाने कहां गायब हो जाती थी। यहीं हाल पेंट का था जब वह कर रहे होते थे तो कैसे दम घोट गंध चारों और फैल जाती थी। परंतु मूर्जी साहब किस तन्मयता से काम करते थे। एक दम नशेड़ी शायद बेचारे का काम ही ऐसा है की उसे शराब पीनी ही पड़े। नहीं तो सारा दिन रेकमार घिसते-घिसते फेफड़ों में न जाने कितनी गर्द जमा हो जाती होगी। परंतु काम में अपने मास्टर है हमारे मूर्जी साहब। इन लोगों ने एक ही काम करने में अपना पूर्ण जीवन दे दिया था। एक खास तरह की महारत हासिल कर ली थी। परंतु अब उस महारत का उपयोग नहीं हो रहा। चाहे वो कोई कार्य ले लो। पहले कार्य पूस्तेनी होते थे। अब मूर्जी साहब के बेटे ये काम नहीं करते। शायद पापा जी जब यह काम छोड़ दे तो भैया लोग भी ये सब नहीं करना चाहोगे। ये तो पूत के पेर पालने में ही नजर आ रहे है। तब आप एक नया कार्य जीरो से शुरू करोगे...परंतु सच हो तो सब ऐसा ही रहा है।

जैसे-जैसे काम उतर पर आ रहा था। पूरे परिवार को काफी अच्छा लग रहा था। अब सब अपने कमरों में चीजें सहज रहे थे। परंतु मैं ये देख रहा था दीदी के लिए तो कोई कमरा बना ही नहीं वह और में तो दोनों नीचे पुराने साल और कोठे में ही रहते थे। तो क्या यहां भी इतना ही सुंदर होगा। और सच ही वहां तो अति सुंदर कार्य होने लगा जिस की मैंने कल्पना तक नहीं की थी। क्या गजब का वह पुराना मकान बन रहा था उसे कैसे लिखूँ अचानक शब्द नहीं है मेरे पास। दीवारों पर टाई, और उसमें गाटर के दोनों किनारों पर जो मोटे पाए थे उन पर छोटी काली सफेद मोज़ेक की तरह से टाईल लगी थी। कोठे की दीवारों का भी चुना झाड़ कर। टाईल लगाई जा रही थी। और जब फर्श बना तो मन अति प्रसन्न हो उठा उसमें तो शीशे की तरह काला पत्थर, जिसके अंदर में अपनी परछाई भी देख सकता था। पैर कितनी सम्हाल कर रखने होते थे।

एक-एक कोने में ओशो जी की छाप थी। अभी वरूण भैया के कमरे में जो अर्धचंद्राकार आर्च थी उस में ओशो जी का चित्र बनाया जा रहा था। मैं भी सोचता था पापा जी कई दिनों से हिमांशु भैया के कमरे में लाईट जला कर छोटी-छोटी टाईलों को जोड़ते रहते है। पास से देखने से तो केवल रंग बिरंगी टाईल ही आपको दिखाई देंगी। परंतु जरा दूर से देखोगे तो आप साफ ओशो जी का वो चित्र जिसमें वह दोनों हाथों को पकड़े देख रहे है। आंखें भी ऐसी लगती थी मानो अभी जीवंत हो उठेगी। पापाजी और हिमांशु भाई की मेहनत का ये फल है।  वह एक अभूतपूर्व कृति बन गई। चित्र लोग कागज पर बनाते है, कैनवस पर बनाते है परंतु पापा जी ने तो टाईल से उसे अमर कर दिया।

बड़े आँगन जहां पर सामने बड़ा गेट खुलता है। और दो पायो पर छत खडी कितनी सुंदर लग रही थी। बीच में अब काली सफेद टाइले लगाई जा रही थी। इस के बाद तो फिर लगभग काम खत्म होगा। चार दिन में सब टाइले लग गई। अंग गेट ही बचा था। जिसकी आर्च पर तो पहले ही टाई लग गई थी। बस सड़क से उसके ढलान पर टाईल लगानी थी। वहां छोटे लम्बे कट से टाईल लगाई गई थी जिससे की मोटर साइकिल आसानी से चढ़ सके। क्योंकि वह सड़क से करीब दो-तीन फीट उंचा था। उसके बाद हफ्ते भर तक राम रतन ने पूरे घर में अगर कहीं टूट फूट थी तो वह पूरी कर ली।

बस फिर क्या तो एक दिन मम्मी जी ने बहुत सारी खीर, पूरी, आलू फूल गोभी की सब्जी, पनीर की सब्जी, रायता बना कर सब को भोज दिया, उस दिन राम रतन, उसके दोनों बेटे पापा, दोनों भैया, दीदी मम्मी, और मैं भी वहीं पर था। परंतु मैं तो टेबल पर बैठ कर खाना नहीं खा सकता था। मुझे तो सबके हाथ से एक-एक टूकड़ा मिले उसी से प्रसन्नता होती है। फिर भी मेरे हिस्से की खीर मम्मी ने अलग से डाल कर मेरे पसंद की पनीर की सब्जी भी पूरियों पर रख कर मेरी प्लेट में रख दी थी। खीर मुझे ज्यादा अच्छी नहीं लगती है। इस बात को मम्मी जी जानती है। इसलिए उन्होंने थोड़ी ही खीर डाली। न जाने क्यों मुझे चावल अच्छे लगते है, दूध भी अच्छा क्या बहुत अच्छा लगता है परंतु दोनों के मिलन से बनी खीर जंचती नहीं। आज में कई सालों बाद पूरी खा रहा था। जब से मेरे पेट में ऐंठन हुई थी। और उसमें पानी भर गया था तब से में तो केवल ब्रेड ही खाता हूं, दीदी तो मना कर रही थी की मत दो ये बीमार हो जायेगा। परंतु मम्मी नहीं मानी। नहीं एक दो के खाने से कुछ नहीं होता। इसके भी मन में कुछ इच्छा होगी वह अधुरी नहीं रहनी चाहिए। पहले तो ये केवल पूरी परांठे ही खाता था। अब बेचारा बीमार होने के बाद केवल ब्रेड़ पर ही तो जीवित है। खा ले बेटा पोनी कुछ नहीं होगा। और मैंन आंखों से धन्यवाद दिया और पूछ हिला कर अपने खुशी को दर्शा दिया।

कहने लगी सारा परिवार खा रहा है और ये बेचारा सब का मुख देखे। कुछ नहीं होता एक दिन में। और सच ही मेरे को पूरी और परांठे बहुत ही अच्छे लगते थे। रोटी तो मैं कभी खुश होकर खाना पसंद ही नहीं करता था। इसलिए मुझे सब बनिया ही कहते थे की वह बहुत चटोरे होते पूरी पापड़ी के बिना वह जीवित नहीं रह सकते। ये आया भी बीड़न पूरा करोल बाग से है। जब तब उस पर थोड़ा घी नहीं लगा होता था। और अब बीमारी के बाद से वो सब मुझे से छीन लिया केवल ब्राऊन ब्रेड और दूध। एक दम से साधु वाला भोजन हो गया सालों से यहीं खा रहा हूं इसलिए शायद आपके लिए ये कथा लिख पा रहा हूं नहीं तो मेरा अध्याय पाँच-छह साल पहले ही खत्म हो गया था।

सब लोग खुश थे। मुझे याद है एक बार जब दादा जी के साथ सारे बच्चे यूं ही बैठ कर भोजन कर रहे थे। उस दिन तो दादा जी ने चोगा पहना था। और ध्यान भी किया था शायद वह पहला दिन था जब दादा जी ने पापा-मम्मी हर के साथ ध्यान किया था। मैं भी वहीं पिरामिड में था, दादा जी को नाचते देख कर मेरा मन कितना प्रसन्न हो रहा था। मैं बार-बार दादा के पास जाकर खड़ा हो जाता। मैंने इससे पहले इस तरह से दादा जी को नाचते कभी नहीं देखा था। फिर साथ बैठ कर सब ने खाना खाया उन दिनों सब लो कोका-कोला भी पीते थे। ये आदत छोटे भैया हिमांशु की लगाई हुई थी। और सच वह मुझे भी अच्छी तो लगती थी। परंतु वह जीभ पर बहुत तेजी से लगती थी। अगर कोका-कोला के अलावा कोई दूसरी पेप्सी-कोला आदि आ जाती तो मैं उसे नहीं पिता था। सब कहते थे। कि ये तो पोनी के साथ अन्याय है, कोका-कोला वालों को तो पोनी को अपना बे ब्रांड एम्बेसडर बना लेना चाहिए। और इसे अपने विज्ञापन में लेना चाहिए। और मैं इस बात पर अपनी पूछा हिला कर धन्यवाद देता था। कि भैया आप सत्य ही बोल रहे हो।

दादा जी जीवन का वो दिन एक खास था एक परिवर्तन का दिन था। परंतु है ये चमत्कार इतनी उम्र में आदमी का बदलना अति कठिन है जो अंग्रेजों के जमाने से पुलिस में रहा हो उसकी अकड़ तो अलग ही होती है। वह ध्यान और सन्यास के मार्ग पर चल पड़ वह भी अपने बेटे के साथ। जिसे वह गलत समझता था कुछ दिनों पहले तक की मेरा बेटा भटक गया है। परंतु उस दिन से दादा जी का व्यवहार एक दम से बदल गया था। ध्यान में शायद कुछ ताकत थी। परंतु राम रतन आदि ने कभी ध्यान नहीं किया। सालों इस घर में रहे, पापा जी के संग साथ रहे। परंतु शायद उनकी समझ के बाहर की बात होगी। ये मार्ग या कोई भी मार्ग हो आपके जन्मों की कमाई से ही प्राप्त होते है। या आप उस कारवां से हो लो जो चला जा रहा है कुछ दिन में आप को रस गंध का अनुभव हो जायेगा। तब आप चाहो तो अकेले भी चल सकते हो। क्या मैं इस घर में अगर नहीं आता तो ध्यान क्या है, इसकी तो बात दूर की रही। इस तरह के मानव भी होता है मैं समझ पाता। क्या दूसरे मेरे भाई कुत्ते इस मानव को पहचानते है। वह तो उन लोगों को जानते है जा आते जाते उन्हें दुत्कारते है, लात मारते है।

राम रतन हर ने खाना खाने के बाद बिदाई चाही। तब मम्मी जी ने सब को न जाने एक-एक पैकेट दिया। बाद में पता चला की सब को पाँच-पाँच वस्त्र दिए थे। उन्होंने सालों इस ओशोबा हाऊस की सेवा की थी। हां वो अलग बात है की उसके बदले में मजदूरी मिलती थी। परंतु ऐसे महल मजदूरी से नहीं बनते प्रेम से बनते है। ये एक सम्मान था। जिसे उन्होंने नम आंखों से स्वीकार किया। राम रतन और उसके दोनों बच्चों ने पापा जी के पैर छूकर आशीष मांगे, और मम्मी जी के पेर छू कर प्रेम प्रसाद मांगा। और कह रहे थे मम्मी कोई भूल अगर हम से हो गई हो तो माफ कर देना। तब सब खुशी-खुशी विदा हुए।

बाद में पता चला की राम रतन ने अपने गांव राजस्थान में अपने पैतृक गांव में जाकर रहने की इच्छा जाहिर की। की अब मुझे काम नहीं होगा। में इतना सब बना कर अब अपने इन पवित्र हाथों से और कुछ नहीं बना सकता। और ये सब ठीक ही था। वरूण भैया ने जो उन्हें ओशोबा हाऊस के फोटो की सी. ड़ी बना कर दी थी। उससे उनके गांव वालों को बड़ा गर्व था की हमारा एक भाई एक ऐसी कलात्मक इमारत बना कर आया है। फिर सूना है वह पर उसे केवल मंदिर के गुम्मद बनाने का ही कार्य किया। मकान कभी नहीं बनाए। इसे मन और भाव की बात समझ कर हाथ काटना कहते है। एक पूर्णता को उसने पा लिए अब उससे सुंदर वह कभी नहीं बना सकता। वहां पर भी केवल गुम्मद ही बनाये उन पर टाईल कभी नहीं लगाई। क्योंकि उनका दूसरा संगी साथ पापा जी जो उनके साथ नहीं था।

आपकी मेहनत फल लाती है, बाद में पता चला उनके दोनों बच्चे एक ऑस्ट्रेलिया  और एक यू ई में जाकर यहीं काम करते है। वहां भी मम्मी पापा को याद कर कहते है कि हमारी तो जिंदगी बन गई वहां जो काम पापा जी ने हमसे करवाया। आज उसकी के बदलें हमें हजारों की मजदूरी मिल रही है। चलों खुश रहो। तुम ने लगन और मेहनत से इसे बनाया। काम चोरी नहीं की इसी लिए तुम कामयाब हो गए। वारना तो किस का संबंध होता है, 15-20 साल साथ काम करने का। राम रतन तो भरे गले से पापा जी के गले लग कर रो रहे थे। की हम तो दोनों भाई है, भले ही एक पेट से पैदा नहीं हुए। परंतु किसी जन्म में जरूर भाई रहे होगे। एक मालिक और मजदूर का यही प्रेम है जो कम ही देखने को मिलता है। प्रेम ही संबंध बनाता है और जो आपके अहंकार को खत्म करता है। पापा जी को मैं देखता था। उन सब लोगों के साथ बैठ कर चाय पीते थे। जो चाय उनके लिए बनती थी वही पापा भी पीते थे।

ये गुण मम्मी जी में भी था और मैं इसका साक्षी हूं, उन्होंने विभेद नहीं किया जो घर में बनता था, वह सब को देती थी। इसी सब बातों से आपके अंदर गहराई झलकती है। कि आपमें कोई छल कपट नहीं, मन में कुछ है और आप दिखा कुछ रहे हो। तब आप केवल और केवल अपने मार्ग पर कांटे बो रहे हो। आप किसी का नहीं अपना बुरा कर रहे हो। अगर आप साफ पारदर्शी हो। तो ही आपके लिए यह सत्य का ध्यान का मार्ग चालबाज और चतुर लोगों के लिए तो संसार ही अभी पाठशाला है।

 

भू.... भू..... भू.....

आज इतना ही।

 

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