फिसलन मन की अकड़न तन की
बस बन गया सारा पतझड़ जीवन
नहीं सुलझती सुलझी उलझन
है प्रेम प्रीत का ये कैसा बंधन
आओ साजन गदराया फागुन
भर गया मन में चंचल चितवन
दबे पाँव आकर सिरहाने
हवा लगी बाँसुरी बजाने
दुखता सिर सहलाने लगते
फागुन के दिन चार है हंसते
हाय रंग-विरंगा तेरा रूप सलोना
फिर कर जाता दर्पण पर टोना
प्रीतम तुम तो मन में बसते
फागुन के दिन चार है हंसते।
रति-सी लाज घोल तालों में
है अँगड़ाई लिपटी डालों में
जल पाखी अलसाने लग गये
फागुन के दिन चार है हंसते ।
(ओशो की मधुशाला)
मनसा-मोहनी दसघरा
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