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शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

29 - ये कैसा स्वप्न है – (कविता) - ओशो की मधुशाला

 29 - ये कैसा स्वप्न है – (कविता)

ये कैसा स्वप्न है, जो टूटता नहीं।

जग गए मगर, कुछ सूझता नहीं।

 

वीराना सूना पथ, और थके कदम।

छूट गया कारवां, रहे अकेले हम।

सुझाता न पथ, धुंधली हुई डगर।

बुझ गए चिराग एक ही रात में....

 

जाना है कहां, कुछ पता नहीं।

चल पड़े जिधर वो रास्ता नहीं।

हम भी चुप रहे, वो भी चुप रहे।

बीच राह में था मौन का ही संग.....

 

तन थका से है, मन उदास है।

दूर तुम सही पर कितने पास है।

ये पता तो है तुम आओगे नहीं।

फिर भी न जाने क्यों,एक झूठी सी आस है.....

 

आ रही सुगंध, इन हवाओं में।

गीत बन गए, नीरवता की धुन।

एकांत खिल उठा, पथ बना उपवन।

पैर उठ रहे, यूं मृदंग का हो संग।

मिल गया जब से, ये अनमोल तेरा संग।

 

 

 

दूर झर रहा, पीतांबर स्वर्ण कलस।

थकान मिट गई, उत्सव बरस गया।

आ गई मंजिल, भर गया कलस।

श्वास भी पराई सी दूर रह गई।

अब हम मिट गये, है पूर्णता का संग।  

ओशो की मधुशाला 

मनसा-मोहनी दसघरा 


 

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