शनिवार, 21 मार्च 2026

27-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-27

(सदमा - उपन्यास)

सुबह जल्दी उठ कर चाय पीने के बाद ही नेहालता ने कुछ कपड़े जो अपने साथ ले जाने थे। उन्हें अलमारी से निकल कर पलंग पर रखना शुरू कर दिया। साथ में गिरधारी काका भी मदद कर रहे थे। बेटी तुम जो ये कार्य करने जा रही हो ये बहुत ही पुण्य का कार्य है। देखों बेटी मैं अनपढ़ जरूर हूं, परंतु मेरी एक बात को अपने ह्रदय में बाँध लो, तुम्हारे ठीक होने में उस व्यक्ति का उतना ही हाथ है जितना की परमात्मा का। असल में परमात्मा उस व्यक्ति के माध्यम बनाया, तुझे ठीक करने के उस आदमी को चुना होगा। मैंने उस देव पुरूष को देखा तो नहीं। तुमने तो उसे देखा है क्या कुछ बाते तुम्हें वहां की उसकी याद है, या सब भूल गई। नेहालता ने कहा की काका, धीरे-धीरे कुछ झलकियां याद आ रही है। जैसे वह स्टेशन पर बंदर की तरह से खेल दिखा रहा था। शायद मेरा ध्यान अपनी और खिंचने के लिए। परंतु मैं नहीं समझ पाई। वही खेल मैं उसके साथ जैसे खेल रही हूं। परंतु पूरी तरह से साफ नहीं हो पा रहा है।

एक बात बेटा ये तुम्हारे लिए भी उतना ही उपयोगी होगा जितना की उस व्यक्ति के लिए हो सकता है। क्योंकि बीच में तुम्हारी भी तो कुछ याद दाश्त गायब हो गई है। ये मनुष्य के विकास में बाधा भी बन सकती है। जैसे मकान अगर बीच में से कमजोर हो तो उसके कभी भी गिरने की संभावना होती है।

ये बुनियाद के साथ ही नहीं होता। प्रत्येक पत्थर एक दूसरे को अपने उपर लिए एक मकान को मजबूत करता है। इसी तरह से ये मन का महल एक दिन जब उम्र पा कमजोर होगा तब तुम उस के घेरे में आ सकता हो। इससे अच्छा है उसे पहले ही चेतन कर लो। आने वाले कल का क्या इंतजार क्यों करना। फिर शायद ये परमात्मा की मर्जी भी हो सकती है। उस के संग साथ रह कर आपकी अपनी की ग्रोथ होगी।

नेहालता ने एक बार काका गिरधारी की और देख की बाबा तुम तो बहुत ज्ञानी हो। आप एक दम से एक-एक बात बिलकुल ठीक कह रहे हो। आपकी ये बातें मैं सदा ह्रदय में महसूस करती रहूंगी। और आपकी ये सीख मेरे जीवन में आने वाले समय में बहुत काम आयेगी। बस काका ज्यादा कपड़ों का क्या करना कौन सा मैं घूमने जा रही हूं। रहने के लिए पाँच-सात जोड़ी वो भी थोड़े गर्म या पूरी बाजू के चून-चून कर रख दो। पता है आपको हिमालय की तरह से ऊटी में भी ठंड पड़ती है। इतनी देर में श्रीमति मल्होत्रा ने आवाज दि की कहां हो तुम गिरधारी कब से तुम्हें ढूंढ रही हूं। और जाते-जाते गिरधारी ने नेहालता को कहा की आप यहां पर मम्मी-पापा का जरा भी फिक्र मत करना यहां पर मैं हूं। और वहां जाकर अपना ख्याल रखना। तब गर्दन हिलाते हुए गिरधारी जी ने कहां की आप वहां की चिंता न करो बिटवा। यहां मैं सब ठीक-से देख लूंगा यहां की जिम्मेवारी मेरी है। बस तुम वहां अपना ख्याल रखना ये ही फिक्र हमें यहां सताती रहेगी।

इतनी देर में श्रीमति मल्होत्रा कमरे के अंदर आ गई। की तुम लोग यहां क्या कर रहे हो। मालिक साहब बिटिया के साथ में ले जाने है उन्हीं कपड़ों सहेजने में सहयोग कर रहा था। क्योंकि वहां यहां से कुछ अधिक ठंड होती है। और उसने श्रीमति मल्होत्रा की और देखते हुए कहा की आज खाने में क्या बनाना है। तुम बतलाओं बिटवा क्या बनाऊं दाल और बैंगन का भर्ता ठीक रहेगा। तुम्हारे जाने के बाद तो इस भोजन को कोई खायेगा ही नहीं। सब नाक मुंह चढ़ाने लग जाते है। खेर अब मैं जाता हूं कोई और जरूरत हो तो आवाज दे देना।

और गिरधारी लाल आपने किचन की और चल दिया की वहां भी सब ऐसे ही बिखरा फैला पड़ा होगा। बर्तन धोने वाली ने पता नहीं बर्तन धोए या अभी आई ही नहीं है। सारा दिन काम में चक्री बनी रहती है। गिरधारी लाल जी एक दम मस्त मोला आदमी थे। हमेशा कुछ अपनी भाषा में गुनगुनाते ही रहते थे। परंतु अगर व्यक्ति काम करने का आनंद लेता है तो उसे पता ही नहीं चलता की दिन कब शुरू हुआ और कब खत्म हो गया। गिरधारी ने जाकर देखा किचन एक दम से साफ था। सब बर्तन धूल मंज गए थे। काम वाली दूसरी जगह की सफाई कर रही थी। तब उसने थैला उठाया और सब्जी लेने के लिए चल दिया। वरना तो सब्जी देने वाला घर पर ही आता है, परंतु वह न जाने कब कितनी देर में आये क्या तब तक मैं उसका यहां इंतजार करता ही रहूंगा। चार पैर मारे और खरीदार कर ये गया और वह आया।

उधर सब कपड़े रखते हुए नेहालता की श्रीमति मल्होत्रा उसे देखने लगी और वहीं पास बैठी कहने लगी। की बेटी देख ले मुझे बहुत डर लग रहा है। वहां तेरी देख भाल कौन करेगा। फिर वह आदमी न जाने तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार करें राम जाने वह पागल न हो। फिर तुम एक पागल के साथ कैसे रह पायेगी। मम्मी आप तो नाहक डर रही है। वह एक मनुष्य है। वह को राक्षस नहीं है। और राक्षस भी तो प्रेम पूर्ण होते थे। उनके भी तो परिवार होते थे। उनके भी तो बच्चे होते थे। आप मत परेशान होना। मैं वहां जा रही हूं, आप मेरी हिम्मत बढ़ाना तो दूर आप मुझे और कमजोर कर रही है। आप मुझे मत डराओ। देखो आप एक बार इन कपड़ों को देख लो। अगर आपको कुछ और याद आये तो मुझे कहना मैं इस समय पेंटल के दफ्तर में फोन कर के पूछ लेती हूं। वह अपने दफ्तर पहुंच गया होगा। और फिर मुझे जहाज का टिकट लेने के लिए भी जाना है।

पेंटल दफ्तर पहुंच गया था उसने नेहालता का फोन उठाया और दोनों ने बात शुरू की नेहालता ने कहां की माता-पिता ने आज्ञा दे दी है। एक तो आप मुझे वहां का पता लिखवा दो। और दूसरा मैं जहाज का टिकट लेने के लिए जा रही हूं, क्या मुझे चेन्नई का टिकट लेना चाहिए।

उधर से पेंटल ने कहां की आप ये पता नोट कर लो। और ये फोन नम्बर भी वहीं का है। जिस स्कूल में सोम प्रकाश पढ़ाते थे, उनके मालिक का। अगर कोई परेशानी हो तो आप इन का सहयोग ले सकती है। हां आप चेन्नई से उतर कर रेल से तो क्या सफर करोगी परेशान हो जाओगी। आपके पास सामान भी होगा सो आप टैक्सी ले लेना वह सीधा घर तक ले जायेगी। चलने का तो मेरा मन कर रहा है। आप को यूं अकेले जाने देना मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। परंतु आप मुझे माफ कर देना दफ्तर से छूटी मिलना अति असंभव है। जैसे ही कुछ दिन की भी छुट्टियां मिलेगी तुरंत वहां आ जाऊंगा।

कब तक जा रही हो। तब नेहालता ने कहां की आज ही जाने की सोच रही हूं। नहीं तो कल पक्का है। पेंटल ने कहा की कल सुबह पाँच बजे वाला जहाज बुक कर लो वह आपको नौ बजे तक पहुंचा देगा। फिर श्याम ढलने से पहले आप ऊटी पहुंच चूकी होगी। क्योंकि वहां के रास्ते काफी विकट है दिन में सफर करना ठीक होगा। भगवान तुम्हारी यात्रा को जरूर सफल करेगा। आप सच्चे दिल और प्रेम से जा रही हो देखना आप जरूर अपने लक्ष्य में कामयाब होंगी। ये सब बाते सुन कर नेहालता को बहुत अच्छा लग रहा था।

इसके बाद नेहालता ने आकर ड्राइवर को आवाज दी की राम दास जरा गाड़ी निकाल कर तैयार हो जाओ। हमें टिकट लेने जाना है और कुछ जरूरी सामान भी बाजार से खरीदना है। मम्मी, पापा जी कहां है। उधर श्री के. के. मल्होत्रा जी तैयार हो रहे थे। उन्हें तैयार देख कर नेहालता ने कहां की आप कहां जा रहे है। गाडी तो मैं ले जाने की सोच रही हूं। तब कुछ कागज पत्र सम्हालते हुए वह नेहालता की और मुड़े और कहां की, मैं तो यहां बैंक तक ही जा रहा हूं। कहो तो तुम्हारे साथ चलूं। नेहालता ने कहा की नहीं पापा बैंक में काफी देर लग जायेगी। मैं टिकट जाकर ले लेती हूं, और बाजार से कुछ जरूरी सामान भी ले लेना है। पता नहीं वहां पर कितना बड़ा बाजार हो की जरूरत का सामान मिले या ने मिले। तब श्री मल्होत्रा जी ने कहां की आप अंग्रेजों की ग्रीष्म कालीन राजधानी में जा रही है। शिमला, दार्जिलिंग, मसूरी, पंचमढ़ी...और ऊटी ये सब गर्मी के दिनों में अंग्रेजों की राजधानियां हुआ करती थी। आप वहां वो सब पा सकेंगी जो आपको यहां मुम्बई में खोजने में मील भर चलना होगा।

और दोनों एक साथ बाहर निकले निर्णय ये हुआ कि पिता जी को बैंक में छोड़ कर अकेली नेहालता आगे का कार्य पूरा करेगी। इससे समय भी बच जायेगा और काम भी जल्दी होगा। अधिक देर का कार्य नहीं था श्री मल्होत्रा जी का कुछ पैसे बेटी के बैंक अकाउंट में डालने थे और कुछ नगद निकाल कर साथ लाना था जिससे वह आपने साथ ले जाये।

उधर नेहालता ने टिकट आदि भी तो खरीदनी थी। अब उसने पिता जी की बाजार की बात सून कर मन बदल लिया। खरीदारी नहीं करने की उसने ठान ली। कि ऐसा कोई खास समान भी उसे नहीं लेना और जब जरूरत की सभी चीजें वहाँ पर उपलब्ध है तो नाहक इतनी दूर से क्यों वजन ढोया जाये। इस से पचड़े में न पड़ने से उसका समय भी बच जायेगा। और बाजार में उसे ज्यादा समय नहीं लगेगा। और वह खाना खाने के समय तक बड़े आराम से घर आ गए थे। पिता जी ने पैसे निकाल कर नेहालता को दिये और कहां की आप चलों में तुम्हारे अकाउंट में कुछ पैसे डलवा कर घर चला जाऊंगा। जब तक तुम टिकट ले कर आ जाओ। कब का टिकट ला रही हो। नेहा लता ने कहा की पापा कल ही जा रही हूं। पेंटल जी से बात हुई है। उन्होंने वहां पता बतला दिया है। और कहां है की यहां से पाँच बजे का जहाज वहां पर नौ बजे तक पहुंच जायेगा फिर आगे से टैक्सी भी लेनी होगी।

ठीक है बेटी जब तुम जाओ दफतर भी खुल गये होंगे। अब तो दस बज चूक है तुम टिकट ले कर आ जाओ। मैं बैंक का काम खत्म कर सीधा घर पर आपका इंतजार करूंगा। यहां दोनों ने अपना-अपना काम समय पर और जल्दी निपटा लिया था। और वह जल्दी ही घर पहुंच कर खुश थे। कपड़े बदल कर सब ने साथ खाना खाया। भरे हुए मन से की अब पता नहीं कितने दिनों बाद इस तरह से बैठ कर साथ खाना खायेंगे। परंतु अंदर एक खुशी भी थी की उनकी बेटी एक समझदार और सुशील हो गई। वह अपने कर्तव्य को समझती है। अपने भविष्य की और नजर उठा रही है। क्या अच्छा है और क्या बुरा है। वह समझ और जान रही है। यही तो प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चों से चाहते है। और खाना खा कर कुछ देर विश्राम करने के लिए अपने-अपने कमरे में चले गए।

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