गुरुवार, 17 सितंबर 2026

64 - ये प्रेम प्रीत अनमोल रे—(कविता) - ओशो की मधुशाला

64 - ये प्रेम प्रीत अनमोल रे—(कविता) - मनसा मोहनी 

इस उम्र के ढलते मोड़ पर,ये प्रेम प्रीत अनमोल रे।

यह पूजा है, यहीं भक्ति है, ये आनंद है बे-तोल रे।

 

परम सुखद बना जीवन उसका, जो इन तूफानों में डूबा।

न दर्पण है, न अर्पण है, ये रास्ता है जग से अबूझा।

थके कदम, थी राह कठिन, जीवन उर्जा को जिसने ढूंढा।

इस प्रीत में वो शीतलता बसती,

इस किसी तराजू से न तोल रे।।

 

द्वार खुले जब मधुर नाद से, प्रेम की गागर पूरी भर गई।

सुप्त पड़ी थी प्रेम की गंगा, गो-मुख बन वो जीवित हो गई।

तुझे निहारूँ, तुझे पुकारूँ, तेरी आहट मेरी धड़कन बन गई।

जीवन में रंगोली बन तुम,  जीवन को तुम पूरा रंग गई।

शब्द नहीं अब लब पर आते, जिनसे तुझको अब में तोलूँ।

नहीं राग नहीं गीत ही बनते, गा-गा कर जिससे रहस्य खोलूँ।

झूठे पड़ गये शब्द दीवाने अब सब गीतों के बोल रे।।

 

सांसों का स्पंदन तुम तो बन गई, वीरानों को उपवन कर गई।

प्रेम-प्रीत की एक बूंद से, हृदय का सागर तुम तो भर गई।

मधुर बोल कोकिला बनकर, जीवन को गीतों सा रच गई।

पल-पल ऐसा जीवन हो गया, पैरो को तू मृदंग दे गई।

साज-साज पर, ताल-ताल पर, राग बने अनमोल रे।

इस उम्र के ढलते मोड़ पर,ये प्रेम प्रीत अनमोल रे।

यह पूजा है, यहीं भक्ति है, ये आनंद है बे-तोल रे।

(ओशो की मधुशाला)

मनसा-मोहनी दसघरा 


 

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