नेता कि ललकार
भयंकर गरजना करके
सीने को तान अहं से कहता है....
हरा सके जो चुनाव में, विजय तभी तू जान।
भूखे रहकर चार दिन, मचा दिया घमासान।।
नेता की फुफकार से जल रही थी घास।
झूठे तोहमत लगा कर तुम करते हो बदनाम।
शब्द—शब्द के बोल में बस फैल
रहा था दंभ।
तेवर नेता के देख क्या लोक, है
लोक पाल।
ताल ठोक कर कह रहे, दो सच्चों
का साथ।
पर जनता ने पूछ ली इस सीधी सच्ची बात।
सुशील कुमार के अखाड़े में क्या करोगे दो-दो हाथ?
मुहम्मद अली के मुक्कों की झेलोगे पड़ेगी बरसात।
क्या जानते हो ब्रूस ली की काफी है इक लात।
कपिल देव की बाल पर क्या बैट रहे न हाथ ।
दौड़ सकोगे उड़न सिख कि परछाई के साथ।
क्यों न बैठे अन्ना के तुम भूख हड़ताल में संग।
तोंद तुम्हारी चार दिन में, ही
हो जायेगी कम।
खड़े होकर के चौक में अब तुम कर रहे हो बकवास।
थूक बिलोना भर रह गया, इस बिकी
मीडिया के साथ।
अब इन झूठे झाँसो में नहीं उलझा सकोगे तुम
लाख जतन तुम कर लो खुली जनता की आँख।
झूठी सच्ची वादों का अब हो गया है अंत।
नेता जी तो खिसिया लिए, सुन कर
इतनी बात।
पूछ दबा ली बगल में, किया कुर्ते
को भी मात ।।
(ओशो की मधुशाला)
मनसा-मोहनी दसघरा
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