शनिवार, 26 सितंबर 2026

71 - और कहें क्या इससे आगे – (कविता) - ओशो की मधुशाला

71 - और कहें क्या इससे आगे  – (कविता) - मनसा  मोहनी
 

अब हमने जीना सीख लिया,

और कहें क्या अब हम तुमको

क्यों सोचे हम उन राहों की,

और कहें क्या इससे आगे

हमने जिन पर चलना छोड़ दिया।

 

आग लगी थी इस जीवन में

तरस रहा था कंठ हमारा।

तृप्ति दे गई बूंद श्रद्धा की

और कहे क्या इससे आगे

तब से हमने पीना छोड़ दिया।।

 

तुम आओगे आस लगी थी

यहीं तड़प से ही सांस रूकी थी

क्यों लगता है मैं तुम सा हो गया

और कहे क्या इससे आगे

क्योंकि अब रूप बदलना छोड़ दिया।।

 

मिटना था नहीं बस मिटने का डर था

क्या कहां हमारा यहां कोई घर था

नहीं हमारा यहां था कोई अपना

और कहे क्या इससे आगे

मोह प्रीत से भी दामन को मोड़ लिया।।

(ओशो की मधुशाला)

मनसा-मोहनी दसघरा 


 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें