सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

04 - मन बहलाने से क्या होता है – (कविता) - परिजात के फूुल

04 - मन बहलाने से क्या होता है – (कविता) - मनसा - मोहनी 

मन बहलाने से क्या होता है, मन के पार तो जाना है।

नई सुबह जो पास खड़ी है, उसे बढ़ कर गले लगाना है।

युगों-युगों के बाद है जग में, इस महा यान का आना है।

टूटे बिखरे इस जीवन पथ से, एक नई राह को पाना है।

चलना है एक राह पकड़ कर, बस नहीं भटक तू पायेगा।।

कुछ कांटों के लगने भर से, क्या राह भटक अब जाना है।

कौन यहां रहा है अजर-अमर, सब मिटता है सब बहता है।

इस जीवन लीला आगे जग में, वो खेल खिलाता रहता है।

नहीं दिखता, कहां छुपा है, फिर भी नित कोतुक करता है।

पल-छल नित-नित सब बदल रहा है, वो काम क्रीड़ा करता है।

कौन छलेगा, तुझको प्रीतम तू तो सब छलता है।

नहीं दिखता, कहीं कभी तू, कैसे तुझे इनकार करूँ।

रोज ही जीवन पनप रहा है कुछ कहते है रोज मरू।

तन-मन सब कुछ हे तेरा, मेरा तो कुछ भी पास नहीं।

पल भर जिसके साथ चले थे, कैसे मैं उसे अपना मानूँ।

(परिजात के फूल)

मनसा-मोहनी दसघरा 

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