उस पार नहीं मैं होना चाहता, मझधार बना कुछ रहने दो।
प्रियतम टूटे इन तारों से, कोई
राग बजा कुछ रहने दो।
घुलमिल होती छाया का आकार बना कुछ रहने दो।
टूटे-बिखरे इन सपनों का संसार बना कुछ रहे दो।
पथ शूलों से भरा हुआ है, फैला चारों
और ही कोहरा है।
नहीं सूझती
डगर किधर की, मन सपनों ने घेरा है।
जुगनू की किरणों को हमने, समझा हुआ सवेरा है।
मेरा-मेरा
कहते थे जिनको,
कहां हुए वो मेरा है।
मत बतलाओ मंजिल मेरी, भ्रम बना
कुछ रहने दो।.........
प्रियतम टूटे तारों से.......
जितना हंसती जग के आगे, भीतर
उतना ही रोती हूं।
आती जाती साँसों को गिनकर, जीवन
खोती रहती हूं।
तुम आओगे सुने इस पथ पर, बैठ
किनारे रो लेती हूं।
आंखें थकी,थक गया जीवन,
निष्प्राण तड़पती रहती हूं।
मत शाहलाओं इस पीड़ा को, दर्द
बना कुछ रहने दो....
प्रियतम टूटे तारों से.......
बसंत फैलता जब उपवन में, मैं
केवल रो लेती हूं।
तेरी यादों की टीसो को, मर-मर कर जी लेती हूं।
जग की पीड़ा को में यूं ही,हंस-हंस
कर पी लेती हूं।
फटे पुराने मन के पैबंद, रह-रह कर सी लेती हूं।
आस बची ना इस जीवन की, विश्वास
बना कुछ रहने दो..
प्रियतम टूटे तारों से.....
दीप जलाये सुने पथ पर, इक आस जगाये बैठी हूं।
मुझे पता तुम नहीं आओगे, पथ
शूल हटाती रहती हूं।
दूर कहीं जब पपीहा गाता, बस अधरों
को सी लेती हूं।
जीवन के इन लघु क्षणों को, पल-युग
सा जी लेती हूं।
कहीं तो होगा कोई किनारा, बस
घाट बना कुछ रहने दो...
प्रियतम टूटे तारों से......
पक्षी जागे, जागा जीवन,
यूं कब तक मुझको सोना है।
कितना क्यों न पा ले ये मन,
बस इसको तो रोना है।।
दाग लगे जो इस दामन पर, कितना
उसको धोना है।
दुःख-पीड़ा के इन बीजों से, बिछना
नया बिछौना है।।
आँख के आंसू मोती बन गये, बस
हार पिरोते रहने दो......
उस पार नहीं मैं होना चाहता, मझधार
बना कुछ रहने दो।
प्रियतम टूटे इन तारों से, कोई
राग बजा कुछ रहने दो।
(परिजात के फूल)
मनसा-मोहनी दसघरा

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