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गुरुवार, 15 जनवरी 2026

17-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-17

 (सदमा - उपन्यास)

सोनी ने घर पहुंच कर ड्राइवर को कहां की गाड़ी को गैराज में पार्क कर दो और अपने कमरे में जाकर लेट गई। इतनी देर में नौकर आया की मालिक साहब तबीयत तो खराब नहीं है आपकी,  कहो तो सर दर्द की गोली लेकर आऊं। तब सोनी हंसी, की नहीं रे, राम लाला। मैं एक दम से ठीक हूं बस थोड़ा थक गई थी। इसलिए थोड़ा सा आराम करने का मन है   बस। मेरे लिए श्याम की चाय भी मत बनाना। मैं खाना खाकर आई हूं नानी के घर से। और वह करवट बदल कर लेट गई। ऐसे मधुर शब्द मालिक साहब के सालों बाद सुनने को मिले है। इसलिए राम लाल मन ही मन अति प्रसन्न था। जो मेहमान चार पाँच दिन पहले घर आया था। क्या ये सब उसकी संग सोहबत का प्रभाव दिख रहा था? कुछ भी हो मालिक जैसी पहले दिखती थी। सब चाहते है, वह अपने उसी जीवन की पटरी पर आ जाये। क्योंकि जिस मार्ग पर मालिक साहब चल रही है। इसका अंत तो मौत है, इस तरह के टकराव और तनाव में क्या कोई भी व्यक्ति साधारण तरह से मंजिल की और जा सकता है।

सोनी देर श्याम को उठी और तब राम लाला को कहां की एक कप चाय तो पिला दो। तब राम लाला ने कहां की आपका मेहमान आया हुआ है। कितनी देर से वह आपका इंतजार कर रहा है। मैंने लाख कहां की आपको जगा दूं परंतु मुझे मना कर दिया की नहीं वह थकी है कितने दिनों में इतनी गहरी नींद सोई है। आप नींद की और विश्राम की कद्र करो।

सोनी जल्दी से उठी और बाहर आकर देखा तो पेंटल कोई पुस्तक पढ़ रहे थे। शायद पुस्तक ‘ओशो’ की थी ‘’तंत्र विजन’’ Tantra Vision(सरहा के गीत)-भाग-पहला। अरे तुम कब से आये हुए हो। मुझे जगाया क्यों नहीं। और वह पेंटल के पास आकर बैठ गई।

पेंटल—तब फिर इतनी सुंदर पुस्तक मुझे कहां पढ़ने को मिलती। तुम ओशो को पढ़ती हो। मैंने तो आज तक केवल उनके विषय में सुना जरूर था। परंतु पढ़ा तो आज पहली बार है। क्या पुस्तक लिखी है। मानो इस धरा की ये है ही नहीं। कोई आदमी कैसे शब्दों में इतना सौंदर्य इतनी सच्चाई पीरो सकता है।

सोनी—कॉलेज के जमाने से ही मुझे अध्यात्म की रुची थी। तब मैंने ओशो को पढ़ा था। लेकिन आप को एक बात बता दूं की ये जो भी ओशो की पुस्तकें है ये उनकी लिखी हुई नहीं है। ये उन्होंने केवल बोला है। प्रवचन के रूप में। क्या आपको लगता है कोई इतना शुद्ध और सरल कैसे बोल सकता है जिसमें किसी कोमा या पूर्णविराम की गलती न हो।

पेंटल—सच ये तो एक चमत्कार है। और ऐसे भी युग पुरूष होते है। मैं सोच भी नहीं सकता हूं। परंतु अब ये कहां पर है। एक बार इनसे जरूर मिल कर दर्शन करना चाहिए। हमारे युग में इतनी बड़ी विभूति आई और जीवित है और हम सो रहे है। सच तुमने मुझे पर जो ये उपकार किया है इसे में उतार नहीं सकता।

सोनी इस समय तो ये अमरीका में है कहते है की इनकी तबीयत बहुत खराब है इसलिए अमरीका चले गए। भारत अपने देश के हीरो की कदर नहीं करता। चाहे वह मनुष्य हो या कोहिनूर हीरा। पूना में इनका आश्रम था। मैंने एक बार कोशिश भी की परंतु पैसे के आभाव के कारण जा नहीं सकी। फिर यहां फंस गई। इसलिए इनकी बदनामी इतनी है की पति देव जी सोचते है। वहां जाकर में बिगड़ जाऊंगी और देखो...हंस कर यहां क्या मैं सुधर गई हूं। जैसी अब हूं...।

पेंटल—नहीं सोनी तुम बहुत भाग्य शाली हो। अगर जीवन में संघर्ष न हो तो जीवन में निखार नहीं आता। तुम्हारे संग साथ मुझे वो मिला है जो किसी देव आत्मा के संग भी नहीं मिलता। पहला गुरु तो वही होता है जो तुम्हें मार्ग बतलाये। और मार्ग ही गुरु की विधि है। मंजिल तो फिर पूर्णता है। जब कोई चला है तो कहीं तो अंत होगा अगर वह नहीं रूकता और नहीं थकता।

अरे अब इतना ज्ञान तो पी लिया अब चाय आदि तो पीने दोगे की नहीं। सच इतनी देर में चाय नाश्ता आ गया। गरमा गर्म गोभी के पकोड़े बने हुए थे। किस जतन से अपना राम लाल पकोड़े बनाता है। ये तो एक रहस्य है। एक पकोड़ा उठा कर जब पेंटल ने चटनी के साथ लगा कर मुख में डाला तो वह तो उसके मुख से निकला अरे वाह ये बात हुई ना। अरे राम लाल भाई ये राज हमें भी बतला दो हम गरीब आदमी इतनी दूर से तुम्हारे हाथ के पकोड़े खाने तो नहीं आ सकते। परंतु अपने किचन में तो बनाने की कोशिश कर सकते। सच पकोड़े अति कुरमुरी खस्ता और उपर से मुलायम एक खास तरह का खट्टा पन अपने में समेटे थे।

पकोड़े खाने और चाय पीने के बाद दोनों उठे और बहार लॉन में घूमने के लिए उठ गए। बाहर थोड़ी ठंड थी और पेंटल ओढ़ने के लिए साथ कुछ नहीं लाये थे। इसलिए राम लाल को आवाज दे कर सोनी ने कहा की मेरी शाल साहब को लाकर दे दो, अगर ठंड़-वंड़ लग तो आफत हो जायेगी। पहले ही ये डेढ़ हड्डी के पहलवान है। और सोनी का हाथ पेंटल ने जोर से दबा दिया। क्या करते हो दर्द होता है। तब पेंटल ने कहा की डेढ़ हड्डी के आदमी के दबाने से दर्द तो नहीं होना चाहिए। और दोनों हंसते खिलखिला लोन में घूमने के लिए चले गए।

अँधेरा घिरने से पहले पेंटल को घर जाने के लिए सोनी ने कहां। तब की पेंटल तो वहां रात गुजारने के लिए आये थे। परंतु शरमा कर सोनी ने कहां की अब और नहीं पूर्ण तृप्त कर दिया आपके प्रेम ने। उस पवित्रता को पुजिये ही बही बना रहने दो। स्वाती की बूंद की तरह से तृप्ति मिल गई है। अब उसे मोती बन जाने दो मैं आप के सामने हाथ जोड़ कर निवेदन करती हूं इस बात का कोई दूसरा अर्थ मत लगाना। उस पवित्रता को मन की वासना को मत घुसने दो। पेंटल ने ऐसा नहीं सोचा था वह जितना भी सोनी को जानता जा रहा था वह और अधिक रहस्यमय होती जा रही थी। उसके मन में उसका मान सम्मान दिन व बढ़ रहा था। सच ही है ये की आप जिस आदमी से या औरत से मिलो जितना वह उंचाई व गहराई लिये है अपने अंतस में भी उतनी ही गहराई चाहिए। आप जितनी बार भी मिलो और वह गहराई और ऊंचाई और-और बढ़ती चली जाये जो आपके पकड़ने से पहले ही छाया चार कदम उछल कर और दूर उतुंग होती चली जाये। वही व्यक्ति संगत करने का हकदार है।

और पेंटल के साथ यही सब हो रहा था। वह पहली बार जब सोनी को देखा तो उसके मन में क्या विचार थे। दूसरी बार कुछ और धीरे-धीरे वह विचार भी उसकी पकड़ से दूर होते जा रहे थे। सोनी ने दोनों पुस्तक एक थैले में डाल कर पेंटल को देते हुए कहां इसे जब भी तुम खोलोगे और पढ़ोगे मेरा प्रेम मेरी खुशबू तुम्हें आस पास नजर आयेगी। आप जो पढ़ रहे थे पहला भाग था दूसरा भाग भी आपको दे रही हूं। और पेंटल भारी और हल्के मन से घर की और चल दिया की अगले हफ्ते तो मुम्बई जाना है। देखो फिर कब मिलते है। परंतु यहां आना मेरे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण था।

और उसने बढ़ कर सोनी को गले लगाया और उसका माथा चूम लिया सोनी की आंखों में भी बिदाई की चार बूंदें आंखों से ढलक कर गालों पर गिर गई। और उसने पेंटल का हाथ चूम लिया। न चाहते हुए भी दोनों बिदा हो रहे थे। कैसा है ये आदमी का मन। अगर आज भी वासना होती तो उसके पास समय था। परंतु प्रेम की सुवास ही इतनी मधुर है वहां केवल सुगंध ही समाविष्ट हो जाती है। और देखते-देखते ही मनुष्य एक नवीनता में प्रवेश कर जाता है। कितना सुगंधित लगता है ये पल। परंतु ये जीवन के वो अनमोल पल है जो प्रत्येक के जीवन में कभी नहीं आते उसे जन्मों-जन्म इस घड़ी का इंतजार करना होता है। जब जाकर कहीं सौभाग्य का पुष्प खिलता है। उस खिलने में एक मध्यम भी होता है। परंतु वह केवल होना मात्र ही है, बीच में तो कोई दूसरी अदृश्य शक्ति होती है। जिसे हम कर्म का सिद्धांत कहते है। आपके पकने का समय आ गया। दूर सूर्य चमक रहा है। बस कोई आकर आपके घर की खिड़की खोल देता है। और किरणें तो बहार खड़ी कब का इंतजार कर रही थी। वह पल में आपके अंदर प्रवेश कर जाती है। परंतु प्रकृति कभी जोर जबरदस्ती नहीं करती। सहीं माने तो वह होने का इंतजार करती है।

पेंटल के जीवन का शायद उतुंग का समय आ गया था। दूर कहीं गुरु उसे पुकार रहा था। वह किस माध्यम से किस तान और सूर में ये महत्व पूर्ण नहीं था। मानो तो ये गुरु की पुकार थी। वह सोनी के माध्यम से पेंटल तक पहुंच गई। बहुत सुंदर और मधुर यादों को समेटे पेंटल के आगे एक नया आयाम प्रतीक्षा कर रहा था। वह घर से क्या सोच कर आया था। यहां क्या घटना घटी मिली और उसके बाद जो हुआ उसके विषय में तो वह जानता ही नहीं था। असल में कुछ हमारे जीवन में इतना महत्वपूर्ण होता है कि हम उसे चाह कर सोच भी नहीं सकते करना तो दूर की बात समझो।

जब तक कि पेंटल आंखों से ओझल नहीं हो गया, सोनी उसे निहारती रही। दूर पेड़ों के बीच से गुजरता हुआ पेंटल कैसा लग रहा था। मानो सोनी का ही एक अंग निकल कर उससे दूर जा रहा है। और वह मुख में पल्लू दबा कर फफक पड़ी। और एक पेड़ से टेक लगा कर जी भर रोई। सच ये आंसू खुशी के थे, इसमें बिछड़ने का मलाल तो दस प्रतिशत था परंतु आनंद और सौंदर्य नब्बे प्रतिशत। दोनों का मिश्रण ही कितना मधुर बन गया थ। वह समझ नहीं पा रही थी कि यह आंसू खुशी है या कि दूख के। क्योंकि दोनों अवस्थाएं उसके चित में एक साथ बह रही थी।

‘’गृह दीप यद्यपि प्रज्वलित,

जीते अंधेरे में नेत्रहीन,

सहजता से परिव्याप्त सभी,

निकट वह सभी के,

पर रहती सब परे मोहग्रस्त के लिए।‘’

पुस्तक के ये शब्द जो अभी-अभी कुछ क्षण पहले पेंटल ने सोनी को पढ़ कर सुनाये थे। जिससे उन हवाओं में उन पत्तों की खड़-खड़ाहट में उनकी अनुगूंज तैरती सी महसूस हो रही थी। पत्ता-पत्ता मानो उससे कुछ कहना चाह रहा था। दूर जो बादल पहाड़ों के संग अठखेलियां कर रहे थे वह भी उसे अपनी और लुभा रहे थे। जब आप प्रेम में होते तो आपका चित कितना विस्तार पा जाता है। क्या उसकी कोई थाह नहीं होती। इसलिए उसे अनंत कहा गया है। सच प्रेम ही पूर्णता है....न उसका कोई आदि है न अंत।

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