(सदमा - उपन्यास
होटल में जैसे ही कार पहुंची दोनों पति पत्नी तैयार थे। ड्राइवर को जरा भी इंतजार नहीं करना पड़ा। कार में बैठ कर दोनों पति-पत्नी ने कहां की पहले नानी के पास चलते है। उसके बाद आते हुए श्री देवधर करकरे जी के यहां चलेगें और तो कोई संदेश नहीं दिया करकरे जी ने। ड्राइवर राम दास ने कहां नहीं सर। और फिर एक दम से शांति छा गई। श्री मति राजेश्वरी मल्होत्रा के मन में उथल-पुथल चल रही थी। ये बात श्री मल्होत्रा जी समझ गये और उनका हाथ अपने हाथ में ले कर कहां की नाहक चिंता कर रही हो। अपनी नेहालता को तुम नहीं जानती क्या। वह आपकी बात को दिल से नहीं लगायेगी। और इतना प्रेम पा कर श्री मति राजेश्वरी मल्होत्रा फफक कर बिखर गई। बस कुछ ही देर में नानी का घर आ गया। गाडी खडी कर के ड्राइवर ने दरवाजा खोला और कहां की तब तक में कार मोड़ कर खड़ी कर लेता हूं।
दबे पाँव श्रीमति राजेश्वरी मल्होत्रा और के. के. मल्होत्रा जी नानी के घर में प्रवेश कर रहे थे और सोच रहे थे की हरि प्रसाद तो उन्हें देख कर जरूर भौंकेगा परंतु यहां पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसलिए मन में एक अजीब तरह का भय और सन्नाटा छा गया। परंतु अंदर जाकर जैसे ही श्रीमति राजेश्वरी मल्होत्रा आवाज लगाई तो देखा की नानी और नेहालता तो एक दम से तैयार है। मां ने बेटी को इस तरह से बैठे देख कर एक उसांस उठी मानो कोई गाय दिन भर की बिछड़ी जब अपने बेटे से मिली है तो प्यार से रंभा कर उसे संदेश देती है की मैं आ गई।
बेटी भी भाग कर अपनी मां के गले से लिपट गई दोनों और से कहने को कुछ भी नहीं था। थे तो केवल बहते आंसू और श्रीमति राजेश्वरी मल्होत्रा बेटी के आंसू पोंछे कर और जोर से अपने अंग से लगा लिया मानो आज दोनों इस तन की दूरी को भी दूर कर देना चाहती है। तब नानी ने पानी का गिलास लाकर श्री मल्होत्रा और श्री मति मल्होत्रा को दिया। पानी पीने के बाद चाय नाश्ता के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा की वह तो होटल में कर चूके है। और वह इधर उधर देखने लगे की न तो हरि प्रसाद ही दिखाई दे रहा है। और न सोम प्रकाश तब नानी ने कहा की वे दोनों दोस्त तो सुबह ही चाय पीकर निकल पड़े थे। आप नेहालता की जन्म कुंडली ले कर आई है ना। तब श्री मल्होत्रा ने कहां की हां। वो मेरे पास है तब क्यों देर कर रहे हो। चलो चलते है। और चारों कार की और चल दिये।कार कुछ ही देर में
स्वामी के आश्रम के पास पहुंच गई क्योंकि आश्रम सड़क से कुछ हट कर था। इसलिए उन्हें
पैदल ही चलना पड़ा ये दोनो पति पत्नी भी जानते थे। तब वह पहली बार जब यहाँ आये तो
मन में कैसा भय समाया था। परंतु आज मन में एक उमंग है,
एक आस है, जीवन में एक नया मार्ग दिखाई दे रहा
है। ड्राइवर राम दास से श्री के. के. मल्होत्रा जी ने पूछा
की आपको अगर कोई काम है तो आप दो घंटे बाद आ सकते है। परंतु राम दास ने कहां नहीं
मालिक में भी स्वामी जी के दर्शन कर लूंगा वहां मेरी कोई जरूरत नहीं है। आज सारा
दिन आपके साथ ही हूं। कार को देखते ही हरि प्रसाद समझ गया और वह तो हमारी ही कार
है। बह बेपरवाह कार की और भागा, पशु भी प्रेम से कैसे लवरेज
रहता है। उसके पास भी तो मन है, और भाव व संवेदना भी तो जरूर
होंगे मना की मनुष्य जितनी न सहीं। परंतु मनुष्यों में भी ये संवेदना एक समान कहां
होती है। सब में ये मात्रा भिन्न गहराई लिये होती है। वह पल भर में नेहा लता के
पास पहुंच कर लगा भोंकने की तुम ने इतनी देर कर दी हम तो कब का यहां आप का इंतजार
कर रहे थे। तब नेहा लता ने उसे प्रेम किया और कहा की इस में हमारी जरा भी गलती
नहीं है। सारी की सारी गलती तो इस नालायक राम दास की है। और ये बात सून कर मानो
हरि प्रसाद समझ गया और लगा राम दास को भौंकने। तब राम दास ने भी उसे प्यार कर कहां
की मालिक साहब गलती हो गई आज के बाद ऐसा नहीं होगा। और इस हंसी मजाक में सब
वातावरण एक दम से हलका हो गया।
सोम प्रकाश ने श्री
के. के. मल्होत्रा जी और श्री मति राजेश्वरी मल्होत्रा के पैर छुए। मल्होत्रा जी
ने उन्हें गले से लगा कर आशीष दिये और सब स्वामी की के आश्रम की और चल दिए। स्वामी
जी उनका इंतजार ही कर रहे थे। क्योंकि उन्होंने दूर से ही सोम प्रकाश और पेंटल को
बैठे देख लिया था। सोम प्रकाश को देख कर स्वामी जी बहुत प्रसन्न हुए। की सच मुझे
इतनी जल्दी उम्मीद नहीं थी आपके स्वास्थ्य होने की परंतु प्रेम में एक अजीब सी
शक्ति है। प्रेम के धागे से ही ये संपूर्ण संसार पिरोया हुआ है। फिर भी एक बार आप
अंदर चलों, आप आ ही गये हो तो थोड़ा चेक कर लेता
हूं तब तक आप यहां जल पान आदि करो। और सोम प्रकाश को अपने औषधालय में ले जाकर
स्वामी जी ने कहा की आप सब कपड़े उतार कर एक लँगोटी पहन कर यहां पर लेट जाओ। और
उनके सर पर एक खास प्रकार का लेप लगा दिया और उन्हें एक चादर से ढक दिया। साथ ही
कोई ओषधि एक जलती अँगीठी पर रख दी जिससे एक खास तरह की गंध आ रही थी। जो मन और
मस्तिष्क को एक प्रकार से सुन्न कर रही थी। इसी तरह लेटे हुए सोम प्रकाश को पता ही
नहीं चला की वह कब निंद्रा में चला गया। जब वह उठा तो करीब दो घंटे हो गए थे। उसके
बाद वह पास की गर्म पानी के कुंड में स्नान करने चला गया। उसके बाद एक साफ तौलिया
से अपने शरीर को पोंछ कर सोम प्रकाश ने कपड़े पहन लिये। इस सब के बाद भी उनकी
आंखों में एक प्रकार का सरूर था। नशा भी उसे कहे तो गलत नहीं होगा। वह कितनी ही
देर तक ऐसे ही बैठा रहा।
सोम प्रकाश जितनी
देर तक औषधालय में थे। बाहर श्री के. के. मल्होत्रा और श्री मति मल्होत्रा ने
स्वामी जी से कहां की आपने ही पहले नेहा लता को नया जीवन दिया था। आज भी हम आपके
निर्णय को शिरोधार्य से स्वीकार करेंगे। क्योंकि हमने तो एक प्रकार से अपनी बेटी
को खो ही दिया था। अब इसे समय की गति कहे या क्या ये तो आप ही हम से ज्यादा जानते
हे। स्वामी जी ने एक गहरी श्वास ली और फिर बोलने लगे की इस तरह की घटना कभी हजारों
लाखों-या करोड़ों में एक व्यक्ति के साथ घटती है। परंतु इसका अंत हमेशा ही बुरा
होता है। इन दोनों के साथ भी यहीं होना था। या यूं कहूं की कई जन्म से ऐसा होता
चला आ रहा है। परंतु प्रकृति भी कोई क्रूर नहीं है। माना की उसकी गति बहुत मध्य
है। परंतु वह प्रत्येक जीव को अनंत मोके देती है। इस बार लगता है इनकी विजय रही
है। वरना तो आपकी लड़की तो बचती ही नहीं और फिर इस जन्म में उसका चित और अधिक विकृत-और
भयभीत हो उठता अगले जन्म में उसे और भय और डर समाया होता। यही जीवन का वो मोड़ है
जो अपने अंदर किसी क्यों के साथ अनेक रहस्य समेटे चलता है।
परंतु आप सब को भी
इसे प्रकृति का लिखा मान कर स्वीकार करना लेना चाहिए। इसी में हम सब का भला है। एक
प्रकार से यही वह मोड़ है जिसे धर्म में पुण्य कहा गया है। अब आप पढ़े लिखे है समझ
दार है। फिर भी आप इन दोनो को अलग करने की मत सोचो धन,
समाज, जाति या धर्म के नाम पर। क्योंकि धर्म
तो हर युग में बदलते रहते है। हम तो अनंत से चले आ रहे है। इसलिए उन्होंने खास कर
मल्होत्रा जी की और मुख कर के कहा की इन बच्चों को आप आशीष दो ताकी ये अपने इस
जीवन में पिछले कई जन्म के न मिलने की प्यास को पूर्ण कर सके। एक प्रकार से इस तरह
से मन में एक प्यास एक अतृप्ति भरी रह जाती है। जो हर युग में समय और स्थान की
भिन्नता के कारण और जटिल हो उठती है। मानो की आपका पिछला जन्म किसी आदिवासी स्थान
पर हुआ हो। और इस जन्म में आप अति आधुनिकता स्थान पर जन्म ले ले तो अपने बिछुड़े
हुए साथी को आप नहीं ढूंढ सकते फिर मृत्यु भी एक बाधा होती है। किसी जन्म में आपकी
उम्र बाधा बन जायेगी।
इस जन्म में भी इन दोनों का जन्म हजारों मील के
फासले पर होता है। परंतु एक उम्र के मोड़ पर प्रकृति को वर्तुल घूमा और इन दोनों
को मिला दिया। मैंने इनकी कुंडली भी देख ली आप इन दोनों को मिल लेने दीजिए। देखना
इनके जीवन में कोई बाधा नहीं आयेगी। आप ये सोच रहे होंगे की एक शहर में पली लड़की
यहां कैसे जी सकेगी। तो आप कई महीनों से तो ये सब घटता देख ही रहे है। नेहालता को
कोई परेशानी नहीं हो रही वह यहां नानी के साथ भी उतनी ही खुश है जितनी आप लोगों के
साथ थी। और सही मायने में उसकी आधी जरूरत यहां एक पूर्णता में बदल गई है। प्रेम
में अनूठी ताकत है। प्रेम और संगीत में ही तो परमात्मा का वास है। आप कही से शुरू
कर सकते है। बस मार्ग का नाम ही बदल जाता है।
प्रेम हृदय की एक
ऐसी अनुभूति है जो हमें जन्म से ही ईश्वर की और से उपहार स्वरूप प्राप्त होती है।
आगे चलकर यही प्रेम अपने वृहत् स्वरूप में प्रकट होता है। प्रेम किसी के लिए भी
प्रकट हो सकता है। वह ईश्वर, माता-पिता, गुरु, मित्र, किसी के लिए भी
उत्पन्न हो सकता है।
ज्योतिष में प्रेम-
संबंधों और प्रेम-विवाह को लेकर हमेशा से ही दिलचस्पी रही है। ज्योतिषी शास्त्र
में कई ऐसी ग्रह दशाओं और योग का वर्णन है, जिनकी वजह
से व्यक्ति प्रेम करता है और स्थिति प्रेम-विवाह तक पहुंच जाती है।
जब राहु प्रथम भाव
यानी लग्न में हो परंतु सातवें भाव पर बृहस्पति की दृष्टि पड़ रही हो तो व्यक्ति
परिवार के विरुद्ध जाकर प्रेम-विवाह की तरफ आकर्षित होता है।
दूसरे अथवा आठवें
स्थान का गुरु दर्शाता है कि व्यक्ति पूर्व जन्म में सन्त या सन्त प्रकृति का या
और कुछ अतृप्त इच्छाएं पूर्ण न होने से उसे फिर से जन्म लेना पड़ा। ऐसे व्यक्ति पर
अदृश्य प्रेत आत्माओं के आशीर्वाद रहते है। अच्छे कर्म करने तथा धार्मिक प्रवृति से
समस्त इच्छाएं पूर्व होती हैं। ऐसे व्यक्ति सम्पन्न घर में जन्म लेते है।
उत्तरार्ध में धार्मिक प्रवृत्ति से पूर्ण जीवन बिताते हैं। उनका जीवन साधारण
परंतु सुखमय रहता है और अन्त में मौत को प्राप्त करते है।
ज्योतिष शास्त्र के
अनुसार,
किसी भी व्यक्ति की कुंडली देखकर उसके पूर्व जन्म और मृत्यु के बाद
आत्मा की गति के बारे में जाना जा सकता है। दरअसल, शिशु जिस
समय जन्म लेता है, वह समय, स्थान व
तिथि को देखकर उसकी जन्म कुंडली बनाई जाती है। उस समय के ग्रहों की स्थिति के
अध्ययन कर यह जाना जा सकता है कि वह किस योनि से आया है और मृत्यु के बाद उसकी
क्या गति होगी। आइये जानते हैं कि जन्म कुंडली के अनुसार आप पूर्व जन्म में क्या
थे और कौन थे?
स्वामी जी की इन
मुग्ध कर देने वाली बात से सब को बहुत ही राहत और खुशी हो रही थी। इतनी देर में
सोम प्रकाश भी अंदर से तैयार हो कर वहां पर आ गया। उसके चेहरे पर एक खास किस्म की
शांति थी। उसने आकर स्वामी जी के पेरो में झूक कर अशीष दिए। और पास बैठी नेहा लता
ने भी उठ कर स्वामी जी को झुक कर प्रणाम किया। स्वामी जी ने सर पर हाथ रख कर सदा
सुहागन रहने का आर्शीवाद दिया। इस बीच श्री मल्होत्रा जी उठ कर स्वामी के पास आये
और उन्हें एकांत में ले जाकर 51,000/-रूपये का एक चेक उन्हें थमाते हुए कहा की आप इनकार मत करना। हम बहुत गरीब
है हमारे पास केवल यही एक दौलत है जो कागज के रूप में है। आप इसे स्वीकार करेंगे
तो मन को अच्छा लगेगा। तब स्वामी जी ने कहा की इतनी अधिक की जरूरत नहीं थी। हमारा
यहां खर्च ही क्या है। तब मल्होत्रा जी ने कहां की कोई बात नहीं ये एक खुशी का
मोका है। हम ने शहर में तो इससे कई गुण यूं ही बर्बाद कर देने थी शादी के नाम पर
यहां ये धन कुछ सार्थक तो होगा।
और सब खुशी से घर
की और चल दिये। तब यहीं समस्या थी की कार में सब तो आ नहीं सकेंगे। सो यहीं निर्णय
लिया गया की सोम प्रकाश, पेंटल और हरिप्रसाद पैदल ही
आयेंगे। और सब आज के इस अल्हादित वातावरण को ह्रदय में समेटे घर की और चल दिये।
बात ये भी हुई की राम दास हमें छोड़ कर आप को दोबारा लेने के लिये आ जायेगा। तब
पेंटल ने कहां की दूर ही कितनी है। हम बस आप के पीछे-पीछे आ रहे है। ड्राइवर राम
दास ने कहा की मेम साहब कह रही थी आज रात का भोजन आप को मालिक साहब की कोठी पर ही
करना है। वह भी आप लोगों का इंतजार कर रहे है। बस क्या था, मानो
हरि प्रसाद समझ गया और भौंक कर कहा रहा था की मजा आ गया। जब सब उसके इस व्यवहार पर
हंसने लगे तो वह दूर भोंकता हुआ भाग गया। उसे मानो वह सब समझ रहा है। पशु भी
मनुष्य के साथ रह कर उसकी भाषा को अंतस से समझ लेता है। कितना विचित्र है। हम
मनुष्य भी एक दूसरे की भाषा को बिना जाने पढ़े समझ नहीं सकते।
तब यही निर्णय लिया
गया की आप नानी को नेहालता को घर पर छोड़ कर मल्होत्रा जी को होटल में छोड़ कर
सीधा कोठी पर चले जाना और उन्हें हम सब के आने की सूचना दे देना। आज जिस तरह से
सूर्य उदय हुआ था। धीरे-धीरे वह उतंग की और गति कर रहा था। तभी नेहालता और सोम
प्रकाश के जीवन में भी एक उतंग लहर उठ रही थी। माता-पिता के आशीष के बिना जीवन एक
अधूरा होता है। जो पति पत्नी बिना माता पिता के आशीष के जीवन शुरू करते है। उसके
जीवन में पग-पग पर अनेक छोटे बड़े कष्ट आते ही रहते है। परंतु अंत बहुत सुंदर और
खुशी से भरा रहा। इस लिए सब के मन में एक खुशी थी। मन पर जो कोहरा कल उठा था वह अब
महात्मा जी की संगत और सोहबत में छंट गया था। मानो पछवा हवा ने उस काले डरावने मेध
को पल में इधर उधर छटक दिया हो। अब वो धरा पर भंयकर उत्पात नहीं मचा सकते। अब वहां
पर बह रही थी एक मधुरम समीर। जो अपने अंतस में सुहावनी सुगंध वातावरण को और भी
सुंदर बना रही थी।

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