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गुरुवार, 4 जून 2026

18 - पत्थर की पुकार - (कविता) - ओशो की मधुशाला

 18 - पत्थर की पुकार  -  (कविता)

कौन? कहता है

पत्थरों तुझे पीड़ा नहीं होती,

वो रो सकता है

और कर सकता है चीत्कार,

वो करता है

कुछ दिल की बातें कभी-कभी

मगर किसी मौन फुसफुसाहट कि तरह

जो हमारे कानों को

लगती है कुछ अनसुनी।

वो इतनी मंद्र ओर सुकोमल सी होती है।

वो भेद नहीं सकती

पाषाण भर किन्हीं कानों को,

और नहीं जगा सकती

जड़वत दिलों में स्पंदन,

बो मंद-मंद मदहोशी

बनकर कुछ कहती है,

कोई अनसुना गीत

कोई मधुर राग।

पर हम जीते है,

पाषाण की दुनिया में

जहां नहीं सून सकती

कोमलता की कोई पुकार,

न वो भेद सकेगी उन ह्रदय को

जो मनुष्य होने पर भी,

कहां मनुष्य होते है।

करते तो है हम पत्थर सा व्यवहार।

जीवित रह कर भी,

कहां जीवित से दिखते है।

हम जीवन को भी कहां जी पाते है,

बस चलते है

जीवन का कोई भार लिए।

ढोते से हम तुमको दिखते है।

चलते जाते है अपनी ही सलीब लिए

अपने कंधों पर सैलाब का बोझ लिए।

हाय मनुष्य!

तू कब जाग सकेगा,

कितनी मधुर बेला अब जा भी चुकी।

कितनी कोकिला के चूके मधुर गान।

क्या नहीं आएगा कभी भी,

तेरे जीवन में वो सवेरा।

जो भर जाए तैरी गोद में

कुछ अनमोल स्वर्णिम किरणें.......

(ओशो की मधुशाला) 

मनसा-मोहनी दसघरा 


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