जीवन बगिया ऐसी उलझी, फूल उगे कम
कांटे ज्यादा।
सिमटा जीवन डूबी सांसे, आना है
तो अब भी आजा।
01-गीत हवाओं ने जब-जब गाए, मेरे प्रीतम तुम नहीं आये।
दूर कहीं जब घिरी घटाये, तेरी जुल्फों
का है धोखा खाये।
सांसों की तानों को सून-सून, मैंने
कितने ही गीत बनाये।
आस लगाये पलकें बिछाये, खड़ी हूं
कब से तुम न आये।
बीज खुशी के जब-जब बोए, फूल विरह
के खिलते पाये।
आने वाले अब तो आजा, सुने साजों
में फिर राग जगा जा।
जीवन बगिया ऐसी उलझी फूल उगे कम कांटे ज्यादा।
02-तार विरह का दिल में बजाता, वो तो बन बैठा इकतारा।
हार-हार कर नहीं हारता, मन तो
बेबस कितना लाचारा।
दूर कहीं जब पपीहा गाता, न मैं
सोती ना वो बेचारा।
दूख पीड़ा को दूर करूं क्यों, वो
तो अब है तुझसे प्यारा।
नाम पता सब भुल गये अब, लेते
केवल नाम तुम्हारा।
भोर का तारा डूब रहा है, छूट रही
अब ये जीवन धारा।
आंख मेरी तो खुली मिलेगी, मरने
पर भी चाहे आजा।
जीवन बगिया ऐसी उलझी, फूल उगे कम
कांटे ज्यादा।
(ओशो की मधुशाला)
मनसा-मोहनी दसघरा
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