दिन रात ये आंखें उसी को ढूंढती है,
उसे ही निहारती है, प्रत्येक छवि
में।
जिस और भी देखूँ
हर और बस तू-ही-तू
न जाने क्यों अब में?
दिखता है सब में तुमको ही
क्या ये मेरा पागल पन है
या मेरी मदहोशी या शायद मोह
हर छवि तेरी ही छवि बन जाती है
लगता है बस तुम आ गये
ये तुम ने मुझे कैसे घेर लिया है
अपना होना ही भूल रहा हूं
कभी तो कैसी पर मैं मिट जाती हूं
चमत्कार सा लगाता है उस पल
केवल तुम ही तुम रह जाते है
कैसा सूखद होता है वह क्षण
मन रटता है
केवल तेरा ही नाम पल-पल,
तेरी की याद में खोया रहता है.
ये मन पागल दीवाना सा होकर...
दिन रात अब देखो रटता है नाम तेरा
ये कान केवल तुम्हारा ही,
मधुर नाद सुनना चाहते है
तेरे कोकिला कंठ से निकले गीत.....
हाय ये ह्रदय की पुकार सी लगती है,
और ये तन सिहर-तड़प उठता है
ये दिल तड़प जाता है
तब लगता है
की तुम पुकार रही हो
उस पर से फिर एक बार
किसी इशारे से
उद्गमन हो छलक जाते है आंसू
इन आंखों से हर और नजर आती है
केवल तुम्हारी पुकार,
केवल हर नाद लगता है
तुम्हारी ही पुकार है
हर शब्द निःशब्द की रटन करता है
श्वास की माला पर...
तुम हमें याद करो या न करो,
चाहे तुम पुकार या मौन रहो
हम तुम्हें याद किये जायेंगे।
चाहे जीवन में मिलन हो या न हो,
हम तो राहों में पलकों को बिछायेंगे।
तेरे होंठों की हंसी लाने को,
अपने तो होंठों को सीये जायेंगे
तुम हमें याद करों या न करो
हम तुम्हें याद किये जायेंगे
चाहे जीवन में मिल या न मिलों
आस हर पल तो किए जायेंगे।
(ओशो की मधुशाला)
मनसा-मोहनी दसघरा
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