ये तमस भरी मदहोशी, ये जाग भरी
उन्मादी।
पास खड़े जब दोनों, क्यों पी लूं
न आधी-आधी।
जब नयनों में तू बसता, जग लागे
हंसता-हंसता।
जब ह्रदय में तू आता, जीवन
उत्सव बन जाता।
कोई दूर पपीहा गाता, वो मेरी कथा सुनाता।
शबनम की ये चंद बुंदे, मेरे ही
आंसू लाता।
मधुर याद में खोई, कोई क्यों सपनों
से जगता।
कितना ही भर लूं ये मन,नित
रिता होता जाता।
ये तमस भरी मदहोशी, ये जाग भरी
उन्मादी।।
रातों के काले शाये, दीपक का विरह बताता।
जलती शम्मा पर आकर, परवाना ही
जल जाता।
नयनों की भाषा कोई, शब्दों में
कैसे समझाता।
किन छवियों को में पकडू तू धूमिल करता जाता।
हूं साज सजाये बैठी, फिर वो-ही
राग सूना जा।
ये तमस भरी मदहोशी, ये जाग भरी
उन्मादी।
(परिजात के फूल)
मनसा-मोहनी दसघरा

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