कुल पेज दृश्य

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

33-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-33

(सदमा - उपन्यास)

कार से उतर कर सोनी ने नानी का हाथ पकड़ कर उसे प्यार से नीचे उतारा और ड्राइवर से कहने लगी की पीछे जो डिग्गी में सामान रखा है उसे अंदर लेकर आ जाये। और जैसे ही ड्राइवर ने गाड़ी का दरवाजा खोला वह शैतान हरिप्रसाद तो गाड़ी से उतरा और वापस दौड़ लिया। तब सोनी कहने लगी ये कहां जा रहा है। तब नानी ने कहां की ये सोम प्रकाश और नेहालता के पास जा रहा है। तब सोनी हंसी की फिर हमारे साथ क्यों नाहक बैठ कर आया। इन लोगों का दिमाग भी कैसे कार्य करता है नानी जी। ये सब समझ जाते है। बिना भाषा के भी इन्हें आप जो करने को कहोगे तो ये करने लग जाते है। क्या इसने नेहालता को आते ही पहचान लिए था। नानी ने कहा की हां उसने तो इसे पहचान लिया परंतु नेहालता इसे नहीं पहचान पा रही थी। बेटी एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही की सोम प्रकाश अब सब को पहचान रहा है। परंतु नेहालता को नहीं पहचान रहा। और नेहालता तो हम किसी को नहीं पहचान पा रही थी। ये कैसा विरोधा भास है। परमात्मा हमारी ये क्या परीक्षा ले रहा है।

नानी और सोनी धीरे-धीरे घर के अंदर में प्रवेश कर रहे थे। नानी के हाथ से सोनी ने चाबी ली और दरवाजे का ताला खोल दिया। पीछे-पीछे ड्राइवर भी फलों के थैले लिये चला आ रहा था। नानी ने कहां की बेटा पिछली बार भी जो फल तुम लेकर आई थी वह अभी तक रखे हुए है। इतना खर्च क्यों करती हो। तब सोनी ने कहां की नानी अब तो नेहालता भी आ गई है। आप को इन बातों की ज्यादा फिक्र करने की अब जरूरत नहीं होगी। वह अब अधिक अच्छे से सोम प्रकाश का ख्याल रखेगी। अब आप को कम मेहनत करनी होगी। हां बेटी बहुत ही सुशील लड़की है।

मैं तो इसे कितने महीनों से जानती हूं। परंतु वह पहले वाली जो रेशमी थी वह तो अब है ही नहीं ये तो सच ही नेहालता बन गई है। एक ही मनुष्य मन के बदलाव के बाद क्या से क्या हो जाता है। जब तुम पहली बार हमारे घर आई थी तो मैंने तेरे बारे में जो सोचा था वह कितना गलत था। एक ही आदमी के अंदर कितनी आदमी समाये होते है। हम इस विषय में क्या जान सकते है। और बाद में आज मैं तेरे बारे में जो जानती हूं वह कितना भिन्न है। हमें किसी के भी बारे में इतनी जल्दी राय नहीं बनानी चाहिए। हां नानी आप एक दम से बात को अनुभव से कह रही है।

पहले वाली वो बाल बुद्धि रेशमी (नेहालता) जो किसी बच्चे सी लगती थी। आज की इस समझदार नेहालता में दिन रात का फर्क है बेटी। देखों बेटी कितनी हिम्मतवर लड़की है हजारों मिल दूर से आकर कैसे अपने घर की तरह से रह रही है। भगवान अब तो उस बेचारी की तपस्या को सून लो और नानी ने आसमान की और हाथ जोड़ दिए। बेटी अगर सोम प्रकाश ठीक हो जाये तो कितना अच्छा होगा। क्या तुम समझती हो सोम प्रकाश एक दम से ठीक हो जायेगा पहले की तरह से। तब सोनी ने कहां की जरूर नानी आप विश्वास करें एक दिन नहीं बहुत जल्दी ही सोम प्रकाश ठीक हो जायेगा। ये तो प्रकृति का एक खेल जैसा लगता है। देखों नानी जी अगर पेंटल नहीं आते तो क्या आज आपके सामने जो सोनी खड़ी है, वैसी आपके सामने ये सोनी ऐसी होती। नहीं ना। ठीक इसी तरह से सोम प्रकाश और नेहालता का प्रकृति के प्रति आदान प्रदान है। यह एक प्रेम और पूजा का पावन का खेल है। देखो नानी पेंटल के उनके रंग में कुछ पल में ही मानो मेरा जीवन बदल गया। और आप सोचो अगर नेहालता को सोम प्रकाश यहां पर नहीं लाता तो क्या यह इस तरह से ठीक हो जाती कभी नहीं। परंतु संगत और प्रेम के कारण नेहालता ठीक हो गई। और तब हमारा सोम प्रकाश बीमार हो गया। आप सोचो प्रकृति के गर्भ में क्या लिखा है इसे हम कभी नहीं जान पाते। परंतु जो इस से उसके साथ बह जाता है। वह उस पार के किनारे का आनंद लेता है। वह उसे कभी डूबने नहीं देती। आप देख लेना मैं जो बोल रही हूं ये बात एक दम सत्य साबित होगी। तब नानी ने दोनों हाथ जोड़ कर परमात्मा को धन्यवाद दिया और कहां की तुम्हारी जबान पर आज सरस्वती का वास हो।

देखों नानी हम जरा पीछे से देखते तो ......सोम प्रकाश का शहर जाना और एक अंजान सी दिखने वाली बाल बुद्धि लड़की को इतनी दूर लाना क्या आप जानती है इतना साहस सोम प्रकाश के अंदर था। वह तो लड़की की परछाई से ही डरता था। मैंने खूद उस पर न जाने कितनी बार डोरे डाले परंतु वह तो बहुत ही डरपोक है। और अब देखो जिस लड़की को हम जानते तक नहीं वह सोम प्रकाश का दुख महसूस कर के हजारों मील से उसे देखने के लिए ही नहीं उसके ठीक होने की कामना लेकर आई है। और इस सब की साक्षी बन कर कदम से कदम मिला कर चल रही है। अब आगे प्रकृति के गर्भ में क्या लेखा है, इसे कोई नहीं बता सकता है। परंतु अगर हमारा प्रेम सच्चा और प्रेम पूर्ण है तो सब एकदम से ठीक ही होगा। तब नानी ने कहा की बेटा मैं तो कहती हूं आज तेरी जबान से जो शब्द निकले है इन में सरस्वती का वास हो।

किचन का दरवाजा खोल कर ड्राइवर ने फल सामने एक मेज पर रख दिए। तब सोनी ने नानी का हाथ छोड़ कर अपने हाथ पैर धोए और सब फलों को फ्रीज में रखने लगी और कहने लगी की नानी तुमने तो पिछले फल अभी तक खाये ही नहीं। बेटी मुझ से कहां खाए जाते है। दाँत तो नाम मात्र को बचे है। हां कभी-कभार एक आध सेब काट कर जरूर सोम प्रकाश को दे देती थी। अब देखो नेहा लता आ गई है। तो ये सब काम उसे ही करना होगा। वरना तो मैं क्या-क्या देखूं। आज उसके नहाने से लेकर सब काम उसी ने किए थे। इतनी देर में हरिप्रसाद दौड़ता हुआ संदेश वाहक के रूप में आ पहुंचा। और सोनी के कंधों पर पैर रख कर उसे चाट लिया। तब सोनी ने कहां की हां बाबा हमें पता चल गया की महाराज की सवारी पधार गई है। और सब हंसने लगी।

तब सामने देखा तो दोनो नेहा लता और सोम प्रकाश धीरे-धीरे चलते हुए आ रहे थे। नानी ने कहां की कितनी सुंदर जोड़ी लग रही है। क्या इस सोम प्रकाश का ऐसा भाग्य है जो ऐसी सुशील और सुंदर बहु हमें मिल जाये। तब सोनी हंसी और कहने लगी तब तो आप हमें जरूर मिठाई खिलाओगी। तब नानी एक दम से झेप गई की मैं भी क्या कह गई दिन में ही सपने सजोने लग गई हूं। या सठिया गई हूं। देखो बेटा वो कहां और हम कहां वह अपने मात पिता की इकलौती लड़की जो शहरी में इतने नाज नखरों से पली है। क्या वह इस झोपड़े में रह सकती है। तब सोनी ने कहां की इस झोपड़े में रह कर ही उसे एक नया जन्म मिला था। वह ये भी शायद कभी नहीं भूल सकती है। और इसी सब प्रेम के वशीभूत होकर वह यहां आई है। नानी आप भी न जाने कैसी बातें करने लग जाती हो। देखना वक्त सब ठीक कर देगा। क्या खाना तैयार है या कुछ बनाना होगा। तब नानी ने कहां की नहीं बेटी चौलाई की सब्जी तो मैं बना कर गई थी। तुम थोड़ा सलाद काट लो। मैं तो खा नहीं पाऊंगी परंतु तुम सब तो खा सकते हो।

बाथ रूम में ले जाकर नेहालता ने सोम प्रकाश के हाथ पैर धुलवाए और तौलिया से उसे साफ करने को कहा और उसके बाद बहार उसे कुर्सी पर बिठा कर अंदर नानी के पास चली आई की नानी हमें देर तो नहीं हुई। तब नानी ने कहां की नहीं बेटा हम भी तो तुम्हारे सामने-सामने ही तो आये है। देव दूत पहुंच तो गया था हरिप्रसाद तुम्हारा संदेश ले कर। हम समझ गए थे कि आप लोग भी बस आने ही वाले हो। और ये सब बाते मानो हरि प्रसाद बहार बैठा सब सून और समझ भी नहीं था। उसने अपना नाम सून का पूंछ को गोल-गोल हिलाया। यानि वह कह रहा है मैं सब जानता हूं तुम मेरे बारे में क्या बात कर रही हो।

सब ने खुशी-खुशी खाना खाया। ड्राइवर ने खाने से मना कर दिया तब नानी ने उसे पास बुला कर खूब कस कर डाटा की चुप से खाना प्लेट में ले जाकर आराम से बैठ कर खा ले वरना तुम्हारी वो खबर लूंगी की तुम्हें अपनी नानी याद आ जायेगी। तब ड्राइवर हंसा की नानी तो पास है उसे याद करने की जरूरत नहीं है। और उसे सोनी ने खाना परोस कर दे दिया। साथ में गिलास लस्सी भी दे दी। जिसे वह ले कर धूप में एकांत में जाकर बैठ कर खाने लगा। अब बारी थी हरिप्रसाद की। तब सोनी ने कहां आज सूना है महाराज का व्रत है। क्या आज तुम खाना नहीं खाओगे। तब हरि प्रसाद उठा और सोनी का मुख चाट कर पंजे से कहने लगा की जरा तो खाने का सुस्वाद मुझे भी चाहिए। और उसके बर्तन में चावल और सब्जी के साथ थोड़ी छाछ भी मिला दि। ये सब देखते हुए हरि प्रसाद में मुख से पानी गिर रहा था। वह खाने का बहुत ही चटोरा था।

उस के बाद सब के लिए फल काटा गया। फल खाने के बाद सोनी ने कहां की नेहालता जी आप आ गई आपने ये बहुत ही अच्छा कार्य किया। और तीन दिन बाद सोम प्रकाश को उस वैद्य जी को दिखाना है जिसने तुम्हें भी ठीक किया था। सुबह जल्दी में गाड़ी भेज दूंगी। या कहो तो में भी आऊं। तब नेहा लता ने कहां की दीदी आप को आने की जरूरत नहीं है। आप इस हालत में ज्यादा मेहनत मत किया करो। कितने दिन और है हमें मौसी बनने में। तब सोनी थोड़ी सी शरमाई और कहने लगी की अभी दो-तीन महीने तो और समझों। तब नानी ने कहां की मैं साथ चली जाऊंगी। क्योंकि गाड़ी उस आश्रम तक तो जाति नहीं कई मील तो पैदल ही चलना होगा। फिर पहली बार नेहालता जा रही है। इसलिए इसके साथ तो कोई चाहिए भी। बस आप ड्राइवर को भेज देना और वह हमें वहाँ छोड़ कर चला आयेगा। पिछली बार की तरह से उसे पूरा दिन वह मत रखना बेचारा परेशान हो जायेगा। फिर अब तो नेहालता मेरे साथ है।

तब नेहालता ने सोनी से कहां की आप मेरे मम्मी पापा को फोन कर के कह देना की मैं ठीक से पहुंच गई हूं। और यहां पर प्रसन्न हूं। आप हमारी जरा भी फिक्र न करें। मैं एक दो दिन में चिट्ठी में सब विवरण लिख दूंगी। तब सोनी ने कहां की आप चलों ना मेरे साथ आप खूद ही बात कर लेती एक बार मम्मी पापा को। तब नेहालता ने कहां की ट्रंकाल में न जाने कितना समय लगेगा। वैद्य जी से दवाई लेने के बाद अगले हफ्ते जब हम आपके घर आयेगी तब कर लूं। आप की बात सून कर मम्मी पापा को थोड़ी राहत मिल जायेगी। तो यही तय रहा की सोनी आज ही बम्बई (मुम्बई) फोन कर यहां की राज़ी खुशी का हल बतला देगी।

वैद्य जी कह रहे थे जितना सोम प्रकाश चलेगा उतनी ही जल्दी ठीक हो जायेगा। तब यहीं निर्णय लिया गया की परसों सुबह ही ड्राइवर को आना होगा। क्योंकि खाली पेट जाना होता है सोम प्रकाश को इसलिए वह सुबह मूंह अंधेरे ही आ जायेगा। हमें वहां छोड़ कर चला जायेगा। हम खाने का कुछ सामना साथ ले कर चले जायेगे। जिसे मैं और नेहालता बीच में विश्राम के समय जब सोम प्रकाश का इलाज हो रहा होगा हम नाश्ता आदि कर लेंगे। और इसके बाद सोनी ने नेहा लता को गले लगाया और सोम प्रकाश के सर पर हाथ फेर कर कहा की सोमू में जा रही हूं। और नानी के पैर छूकर चली गई। चारों यानी हरि प्रसाद भी सोनी की कार को दूर तक जाते हुए देखते रहे। सब की तंद्रा जब भंग हुई तो हरिप्रसाद ने भौंक कर सब को सचेत किया। और सब जोर से हंस दिये की अब हरिप्रसाद तो गुरु हो गया है हमारा।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें