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गुरुवार, 25 मई 2017

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-03

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
मेरा संन्यास वसंत है(तीसरा प्रवचन)
दिनांक १३ मार्च, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

1—मैं आपके नव-संन्यास से भयभीत क्यों हूं? वैसे पुराने ढंग के संन्यास से मुझे जरा भी भय नहीं लगता है।

पहला प्रश्न: भगवान,
मैं आपके नव-संन्यास से भयभीत क्यों हूं? वैसे पुराने ढंग के संन्यास से मुझे जरा भी भय नहीं लगता है।
मंगलदास,
नए से सदा भय लगता है--नए के कारण ही। मन पुराने से सदा राजी होता है; क्योंकि मन पुराने में ही जीता है। नये में मन की मृत्यु है, पुराने में मन का पोषण है। जितना पुराना हो, मन उससे उतना ही ज्यादा राजी होता है। जितना नया हो, मन उतना ही घबड़ाता है उतना ही भागता है।
मन की पूरी प्रक्रिया तुम्हें समझनी होगी। मन का अर्थ ही होता है--अतीत। जो बीत गया, उस के संग्रह का नाम मन है। वर्तमान क्षण का कोई मन नहीं होता। बीते सारे कल, उनकी छापें, उनके संस्कार--वही तुम्हारा मन है। थोड़ी देर को अतीत को हटा कर रख दो, फिर क्या बचता है मन में? एक-एक ईंट अतीत की अलग कर लो और मन का भवन गिर जाता है। अतीत का कुछ न बचे तो मन को बचा पाओगे? मन का बचना असंभव हो जाएगा। मन तो अतीत का जोड़ है।

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-02

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

खोलो शून्य के द्वार—(दूसरा प्रवचन)
दिनांक १२ मार्च, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

1—अभी न ले जाएं उस पार
इन अंधियारी रातों में अब
चंदा देखा पहली बार
क्षण भर तो जी लेने दें अब
रुक कर निरख तो लेने दें अब
कुछ कह लेने कुछ सुन लेने दें
भ्रम है सपना है यह कह कर
अभी न खोलें शून्य के द्वार
अभी न ले जाएं उस पार
2—आप क्या कहते हैं, मैं समझ नहीं पाता हूं। क्या करूं?
3—क्या संसार में कोई भी अपना नहीं है?

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-01

प्रितम छवि नैनन बसी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

तेरी जो मर्जी-(पहला प्रवचन)
दिनांक ११ मार्च, १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

1—नई प्रवचनमाला को आपने नाम दिया है: प्रीतम छबि नैनन बसी! क्या इसके अभिप्राय पर कुछ प्रकाश डालने की कृपा करेंगे?

2—मैं अत्यंत आलसी हूं। इससे भयभीत होता हूं कि मोक्ष-उपलब्धि कैसे होगी। मार्ग-दर्शन दें!

3—बस यही एक अभीप्सा है:
मौन के गहरे अतल में डूब जाऊं
छूट जाए यह परिधि परिवेश
शब्दों का महत व्यापार
सीखा ज्ञान सारा
और अपने ही निबिड़ एकांत में
बैठा हुआ चुपचाप
अंतरलीन हो
सुनता रहूं मैं शून्य का संगीत
प्रतिपल।

बुधवार, 24 मई 2017

प्रभु मंदिर के द्वार-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-06

प्रभु मंदिर के द्वार-(प्रश्रनोंत्तर)-ओशो

दिनांक 13 जून सन् 1967 अहमदाबाद-चांदा
प्रवचन-छट्ठवां-(जीवन है द्वार)

मित्रों ने बहुत से प्रश्न पूछे हैं--एक मित्र ने पूछा है कि हमारे देश की क्या यह सबसे बड़ी बीमारी नहीं रही कि हमने बहुत ऊंचे विचार किए, लेकिन व्यवहार बहुत नीचा किया। सिद्धांत ऊंचे और कर्म बहुत नीचा। इसीलिए बहुत बड़े-बड़े व्यक्ति तो पैदा हो सके, लेकिन, भारत में एक बड़ा समाज नहीं बन सका?
इस संबंध में दो तीन बातें समझनी उपयोग की होंगी। पहली बात तो यह--यदि विचार श्रेष्ठ हो तो कर्म अनिवार्यरूपेण श्रेष्ठ हो जाता है। इस भ्रम में रहने की कोई जरूरत नहीं है कि विचार हमारे श्रेष्ठ थे और फिर कर्म हमारा निकृष्ट रहा। श्रेष्ठ विचार अनिवार्यरूपेण श्रेष्ठ कर्म के जन्मदाता बनते हैं। अगर श्रेष्ठ कर्म न जन्मा हो तो जानना कि विचार ही भ्रांत रहे होंगे, श्रेष्ठ न रहे होंगे। यह असंभव है कि विचार सत्य के हो और आचरण असत्य की और चला जाए। यह असंभव है कि ज्ञान तो स्पष्ट हो और जीवन भटक जाए। यह तो ऐसे ही हुआ कि हम कहें कि आंख तो बिलकुल ठीक थी लेकिन फिर भी हम दीवार से टकरा गए। दरवाजे से न निकल सके। अगर दीवार से टकरा गए हैं, तो आंख ठीक न रही होगी। आंख वीक रही होती तो दरवाजे से निकल गए होते। दीवार से टकराने की कोई जरूरत न थी।

प्रभु मंदिर के द्वार-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-05

प्रभु मंदिर के द्वार-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
दिनांक 10 जून 1969, शाम अहमदाबाद-चांदा।
प्रवचन-पांचवा-(साक्षी भाव है द्वार)

मेरे प्रिय आत्मन,
पिछली चर्चाओं के आधार पर मित्रों ने बहुत से प्रश्न पूछे हैं एक मित्र ने पूछा है कि आप गांधीजी की भांति हरिजनों के घर में क्यों नहीं ठहरते हैं?

एक छोटी सी कहानी से समझाऊं। जर्मनी का सबसे बड़ा पादरी आर्च प्रीस्ट एक छोटे-से गांव के चर्च का निरीक्षण करने गया था। नियम था कि जब वह किसी चर्च की निरीक्षण करने जाए तो चर्च कि घंटियां उसके स्वागत में बजाई जाती थीं। लेकिन उस गांव के चर्च की घंटियां न बजीं। जब वह चर्च के भीतर पहुंचा तब उसने उस चर्च के पादरी को पूछा कि मेरे स्वागत में घंटियां बजती हैं हर चर्च की। तुम्हारे चर्च की घंटी क्यों नहीं बजी? उस पादरी की आदत थी, कि वह कोई भी कारण बताए, तो उसका तकिया कलाम था, वह इसी में शुरू करता था, कि इसके हजार कारण है। उसने कहा--इसके हजार कारण हैं। पहला कारण तो यह कि चर्च में घंटी भी नहीं है। उस आर्च प्रीस्ट ने कहा, बाकी कारण रहने दो, उनके बिना भी चल जाएगा। यह एक ही कारण काफी है।

प्रभु मंदिर के द्वार-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-04

प्रभु मंदिर के द्वार-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 10 जून 1969; सुबह अहमदाबाद-चांदा ।
प्रवचन—चौथा-(ध्यान है द्वार)

संदेह पूर्ण हो तो संदेह से मुक्ति हो जाती है। विचार पूर्ण हो तो विचार से भी मुक्ति हो जाती है। असल में जो भी पूर्ण हो जाए उससे ही मुक्ति हो जाती है। सिर्फ अधूरा बांधता है। अर्द्व बांधता है। पूर्ण कभी भी नहीं बांधता है। लेकिन संदेह पूर्ण नहीं हो पाता और विचार भी पूर्ण नहीं हो पाता। जो संदेह भी करते हैं वे भी पूरा संदेह नहीं करते हैं। जो संदेह करते हुए मालूम होते हैं,उनकी भी आस्थाएं हैं। उनकी भी श्रद्धाएं है। उनका भी अंधापन है। और जो विचार करते हैं वे भी पूरा विचार नहीं करते। वे भी कुछ चीजों का बिना विचारे ही स्वीकार कर लेते हैं। संदेह वाला भी विचार को बिना विचारे स्वीकार कर लेता है। यदि कोई पूर्ण संदेह करेगा तो अंततः संदेह के ऊपर भी संदेह आ जाएगा। और यह सवाल उठेगा कि मैं संदेह भी क्यों करूं? और यह भी सवाल उठेगा--क्या संदेह से कुछ मिल सकता है? जो विचार पूर्ण करेगा, अंततः उसे यह भी ज्ञात होगा कि क्या विचार से उसे जाना जा सकता है, जिसे मैं नहीं जानता हूं? और क्या विचार से जो जाना जाएगा वह सत्य होगा ही? इस संबंध में कल थोड़ी सी बातें सुबह मैंने कहीं--

मंगलवार, 23 मई 2017

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म कथा)-अध्याय-10

अध्‍याय—दसवां–(हनि का मरना)


      नि कभी कभार ही घर पर आता था। शायद दुकान पर ही आ कर वहीं से ही कुछ खा पी कर चला जाता हो। ये मैं नहीं जानता था। पर घर पर कम ही आता था। ऐसा शायद हम लोगों के आने के कारण ही हुआ होगा। क्‍योंकि वह शायद समझ गया की अब मैरा इस घर से अधिकार खत्‍म हो गया। मैं बूढा हो गया हूं। पर जिस दवाई ने मेरे शरीर पर कुछ असर दिखाया था। उसी दवाई का उसके शरीर पर कोई असर नहीं हुआ। शायद मेरी भी यही हालत होती पर अभी मैं बच्‍चा था। मेरा शरीर अभी बलिष्‍ठ था। उस की प्रतिरोधक शक्‍ति थोड़ी अधिक है। उस समय तक हानि का शरीर बूढा हो गया था। जो उस ज़हरीले खरगोश के जहर को झेल नहीं पाया जिससे उसकी हालत इतनी खराब हो गई।
उसने भी ज्‍यादा नहीं भागा। पर वह खरगोश इतना जहरीला था कि करीब एक महीने बाद उसकी मोत हो गई। पाप जी और वरूण भैया उसे एक कपड़े में बाँध कर जंगल में किन्हीं झाड़ियों में छुपा आये।  ताकी उसे कोई जंगली जानवर न खा कर बीमार न हो जाये। पर ये भी कुदरत का एक चमत्कार है या रहस्‍य है। कि कोई भी मांसाहारी पशु दूसरे मांसाहारी प्रणी को नहीं खाता। क्‍या मांसाहार से निर्मित शरीर कुछ विषाक्‍त हो जाता है?

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म कथा)-अध्याय-09

अध्‍याय—नौवां   (खरगोश का खाना घातक)

 सुबह मम्‍मी—पापा ने हमारी कारस्‍तानी देखी तो दंग रह गये। जहां देखो वहीं मिट्टी—मिट्टी का ढेर लगा था। पैरो से खोद—खोद कर फैंकने के कारण दूर आँगन तक भी मिटटी बिखरी हुई थी। हमनें इतना गहरा गढ़ा खोद दिया, और ये तो हमारा शोभाग्‍य ही था कि उसके उपर जो पत्‍थर रखे थे वो इसी तरह से रुके हुए थे। और उसके नीचे से खोद कर खरगोश निकाल लिया गया था। उसके बाल और खून वहां चारो और बिखरा हुए थे। मेरी और जब पापा जी ने जब देखा वह तुरंत समझ गये कि ये कारस्‍तानी किस की हो सकती है। पापा जी ने मुझे देखते हुए थोड़ा मुस्‍कुराये, मैं तुरंत समझ गया कि पापा जी को सब पता चल। अब बात छुपाने से कोई लाभ नहीं है। और मैं अपनी पूछ हिलाते हुए पापा जी की और चल दिया।
मैंने आपने को सुकेड़ कर गोल मोल कर लिया और अपने कान भी बोच लिए। पापा जी ने मेरी और देखा और समझ गये कि मैं बहुत बुरी तरह से डर गया हूं। सच पूछो तो मैं इतना डर गया था कि मुझे अपने दिल की धडकन खुद ही सुनाई दे रही थी। वो ऐसे धड़क रहा था जैसे किसी लुहार की धौकनी हो या में मीलों  दौड़ कर आया हूं। पापा जी मेरे उपर झुके, तो मैं एक दम डर  के मारे जमीन पर लेट गया। मैंने सोचा अब लगा थप्‍पड़……. पर उन्‍होंने मेरे सर पर प्‍यार से हाथ फेरा, और धीरे—धीरे उसे पूंछ तक ले गये।

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म कथा)-अध्याय-08

अध्‍याय——आठवां  (खरगोश का खाना)

पापा और मम्‍मी जी को मैं मेहनत करते देखता तो मुझे लगता की इंसान कितनी मेहनत कर सकता है। आप को ये सब कुछ जान कर अजीब लगा होगा, कि मैं मनुष्‍य की तरह पापा मम्‍मी बोलता हूं। अब मैं भी क्‍या करू जब सब बच्‍चे उन्‍हें इसी तरह से बुलाते है तब मैं कैसे उन्‍हें किस नाम से पुकार सकता हूं। मम्‍मी पापा जी ने कभी मुझे अपने बच्‍चों से अलग नहीं समझा। और सच कहुं तो मुझे मेरी मां की याद तो कही अंधेरे कोने में दबी से दिखाई देती है।  हाँ तो मैं कह रहा था कि मानव कितना मेहनती है ताकत वर है।
आदमी सुबह से उठ कर सार दिन काम करता ही रहता है। ये सब बातें में पूरी मनुष्‍य जाति के लिए नहीं कहा रहा हूं। केवल जिन लोगों के संग—साथ मैं रहा हूं और जिन्‍हें मैंने जाना है। रम  हमारा तो सो लेना ही पूरा नहीं होता। जब देखो हमारी जाती को कोई सोने की बीमारी है। दिन—रात केवल सोना। दुकान पर दुध लाने से लेकर बेचना, फिर घर पर आकर कोन सा आराम कर लेते थे। पहले नहाते, मम्‍मी इतनी देर में खाना बना लेती थी। शायद आधे घंटे में फिर मम्‍मी जी नहाती। और दोनों ध्‍यान के कमरे में चले जाते। ये उनका रोज का नियम था। जो मेरे अचेतन में बस गया था। मैं आँख बंद कर भी आपको बता सकता था कि मम्‍मी पापा अब क्‍या कर रहे होगें।

पोनी-(एक कुत्ते की आत्म कथा)-अध्याय-07

अध्‍याय—7 (चिडियाओं का उड़ाना)

 टोनी के साथ खेलना बहुत अच्छा लगता था। एक बात और, टोनी को देख कर पहले मुझे जितना बुरा लगा, वा इतना बुरा नहीं था, वो मेरी भूल या जलन कह लो वह तो बहुत ही अच्छा था। सच कहुँ तो मुझे वह बहुत अच्छा लगने लगा था, उसके संग साथ चिपट के सोना, कैसे नरम मुलायम बाल थे उसके जब शेम्पो से धोएं होते तो केसी मधुर—मन मोहक महक आती थी। जब दोनों को खेल मैं बहुत मस्ती चढ़ जाती आपस मैं खेलते हुये जो भी पास मैं सुविधा जनक चीज़ पकड़ मैं आ जाती उसी से हम दोनों छीना झपट कर खेलना शुरू कर देते थे। अब हमारे लिए विशेष खिलौनों की आवश्यकता नहीं थी, फिर लाता भी कौन हिमांशु भैया के पास तो खिलौनों की पुरी दुकान थी। वो तो स्कूल गया होता था, मैं और टोनी उन्हे निकाल कर खूब मुहँ से पकड़ के नोचते, खिंचते, फ्फेड़ते और खूब भागते थे।
परन्तु कभी—कभी हम खेल की मस्ती मैं ऐसी चीजों से भी खेलने लग जाते थे जिसके पीछे हमे डाँट क्या एक आध चपत भी खाना पड़ता जाता था। जैसे दाँत साफ करने की बुरुश, पेस्ट, कंघी या चप्पल ऐसे ही कोई भी सामान पड़ा मिल जाता फिर उसकी खेर नहीं समझो। नये—नये निकलते सुई की तरह नुकीले दाँतों मै ने जाने क्यो इतनी खुजली होती थी।

प्रभु मंदिर के द्वार-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-03

प्रभु मंदिर के द्वार-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
दिनांक 09 जून, 1969 रात्रि अहमदाबाद-चांदा
प्रवचन-तीसरा-(तुलना रहितता है द्वार)

बहुत से प्रश्न मित्रों ने पूछे हैं। एक मित्र ने पूछा है कि मेरे विचार एम. एन. राय के विचारों से नहीं मिलते हैं? एक दूसरे मित्र ने पूछा है कि मैं माओ के विचार से सहमत हूं। एक तीसरे मित्र ने पूछा है कि क्या कृष्णमूर्ति और मेरे विचारों के बीच कोई समानता है? और इसी तरह के कुछ और प्रश्न भी मित्रों ने पूछे हैं।
इस संबंध में कुछ बात समझ लेनी उपयोगी होगी। पहली बात तो यह कि मैं किसी से प्रभावित होने में या किसी भी प्रभावित करने में विश्वास नहीं करता हूं। प्रभावित होने और प्रभावित करने दोनों को, आध्यात्मिक रूप से बहुत खतरनाक, विषाक्त बीमारी मानता हूं। जो व्यक्ति प्रभावित करने की कोशिश करता है वह दूसरे की आत्मा को नुकसान पहुंचाता है। और जो व्यक्ति प्रभावित होता है। वह अपनी ही आत्मा का हनन करता है। लेकिन इस जगत में बहुत लोगों ने सोचा है, बहुत लोगों ने खोजा है। अगर आप भी खोज करने निकलेंगे तो उस खोज के अंतहीन रास्ते पर, उस विराट जंगल में जहां बहुत से पथ-पगडंडिया हैं बहुत बार बहुत से लोगों से थोड़ी देर के लिए मिलना हो जाएगा और फिर बिछुड़ना हो जाएगा।

प्रभु मंदिर के द्वार-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-02

प्रभु मंदिर के द्वार-(अहमदाबाद-चांदा)-ओशो

दिनांक 09 जून सन् 1969
प्रवचन-दूसरा-(प्रवाह शीलता है द्वार)

विश्वास अंधा द्वार है। अर्थात विश्वास द्वार नहीं है, केवल द्वार का मिथ्या आभास है। मनुष्य जो नहीं जानता है उसे इस भांति मान लेता है, जैसे जानता हो। मनुष्य के पास जो नहीं है, उसे वह इस भांति समझ लेता है वह उसके साथ हो। और तब खोज बंद हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं है।
मैंने सुना है, एक अंधेरी रात में एक जंगल से दो संन्यासी गुजरते थे। एक वृद्ध संन्यासी है, एक युवा संन्यासी है। अंधेरी रात है। बियावान जंगल है। अपरिचित रास्त है, गांव कितनी दूर है, कुछ पता नहीं। वह वृद्ध संन्यासी तेजी से भागा चला जाता है। कंधे पर झोला लटकाया है, उस जोर से हाथ से पकड़े हुए हैं। और बार-बार अपने युवा संन्यासी से पूछता है, कोई खतरा तो नहीं, कोई भय तो नहीं, कोई चिंता तो नहीं? युवा संन्यासी बहुत हैरान है, क्योंकि संन्यासी को भय कैसा, खतरा कैसा? और अगर संन्यासी को भय हो, खतरा हो, तो फिर ऐसा कौन होगा जिसे भय न हो, खतरा न हो?

प्रभु मंदिर के द्वार-(प्रशनोंत्तर)-प्रवचन-01

प्रभु मंदिर के द्वार-(प्रशनोंत्तर)-ओशो

दिनांक 08 जून सन् 1969 अहमदाबाद-चांदा 
प्रवचन-पहला-(समग्रता है द्वार)

मेरे प्रिय आत्मन,
सुबह की चर्चा के संबंध में बहुत से प्रश्न मित्रों ने पूछे हैं। एक मित्र ने पूछा है कि क्या ईश्वर है, जिसकी हम खोज करें? और भी दो तीन मित्र ने ईश्वर के संबंध में ऐसे ही प्रश्न पूछे हैं कि क्या आप ईश्वर को मानते हैं, क्या अपने ईश्वर का दर्शन किया है? कुछ मित्रों ने संदेह किया है कि ईश्वर तो नहीं है, उसको खोजें ही क्यों?

इसे थोड़ा समझ लेना उपयोगी होगा। मैं जब परमात्मा का, प्रभु का, या ईश्वर शब्द का प्रयोग करता हूं तो मेरा प्रयोजन है, उससे जो है। दैट, व्हिच इज। जो है। जीवन है। अस्तित्व है। हम नहीं थे तब भी अस्तित्व था। हम नहीं होंगे, तब भी अस्तित्व होगा। हमारे भीतर भी अस्तित्व है। जीवन है। जीवन की यह समग्रता, यह टोटलिटी ही परमात्मा है। इस जीवन का हमें कुछ भी पता नहीं, किया क्या है? स्वयं के भीतर भी जो जीवन है उसका भी हमें कोई पता नहीं कि वह क्या है?
एक फकीर था बायजीद--कोई उसके द्वार पर दस्तक दे रहा है। और कह रहा है, द्वार खोलो।

रविवार, 21 मई 2017

भोला-(कहानी)- मनसा

भोला


      भोला ये केवल एक नाम ही नहीं है। ये उस चलते-फिरते हाड़ मांस के शरीर मैं झलकती एक व्‍यक्‍ति के व्यक्तित्व कि कोमलता, गरिमा, उसका  माधुर्य उसके पोर-पोर से टपकती ही नहीं झरता हुआ आप देख सकते थे। भोला की मनुष्यता, मनस्विता, महिमा या गरिमा उसके दैनिक छोटे बड़े कार्यो मे देखी जा सकती थी। उसकी विशालता को मैने उसके अंतिम चरण मे एक बूढे होते वृक्ष के रूप में जाना था। उसका क्षीण होता शरीर भी बढ़ते उस अपूर सौन्दर्य को कम नहीं कर पर रहा था। परन्‍तु उसकी सुकोमल व पारदर्शी स्फटिक गहरी झील में प्रतिबिम्बित देख सकते थे। उसका शरीर जरूर झुरियां से भर गया था। पर अब भी उसमें एक सुकोमल ताजगी, एक जीवन्तता साफ दिखाई दे रही थी। मानों एक विशाल वृक्ष का खुरदरापन और उबड़-खाबड, रूखा पन भी अपने में एक आकर्षणता लिए हुये था।  जिस तरह से एक वृक्ष  का सौन्दर्य  केवल उसकी कोमलता ही नहीं बखानती, उसकी पूर्णता उसके पल्लव-पल्लव से टपक कर, झूमती लता पर इठलाते हुये पत्ते उसके रूप और आकरशण की कहानी कह रहे थे।

शनिवार, 20 मई 2017

पोकर-(कहानी)-स्वामी आनंद प्रसाद 'मनसा'

पोकर 


      बढ़ी अम्माँ बैल गाडियों की लीक के किनारे बैठी दूर से देखने पर ऐसी लग रही थी, जैसे कोई मूर्ति बैठी हो।  उसका शरीर एक दम थिर था, बिना हलचल के शांत मौन मुद्रा लिए हुए पाषाण वत लग रही थी। कितनी-कितनी देर तक बिना हीले-डूले अपनी मुद्रा बदले वह इसी तरह वह सालों से बैठती आ रही थी। उसके चेहरे की झुर्रियां में दुख, पीड़ा और संताप की लकीरें साफ देखाई दे रही थी। सालों से अम्माँ इसी तरह नितान्त अकेली यहाँ आकर रोज बैठती थी। और दूर उन धुँधली आँखों से क्षतिज का पोर-पोर निहारती रहती थी। अंबर में बनती मिटती धूधूंली उन अकृर्तियां सा ही उसके मन मष्तिष्क कुछ कुछ छपता मिटता रहता। परंतु उसको न वह किसी पर विभेद होने देती थी ओर नहीं उसे कोई जान पाया। दूर कहीं जब कोई आहट या बेलों के पैरो से उड़ती घुल तब वह अपना दायां हाथ आँखों पर हाथ रख अपनी मुद्रा बदल कर उस और देखने की बेकार कोशिश करती थी। क्‍योंकि अब अम्‍मा की आँखो कमजोर ओर धुँधली हो गई थी। शायद यह मूर्ति किसी अर्पूणता को पूर्णता में बदलने के लिए किसी आने वाले किसी कलाकार की राह तक रही हो। दूर तक फैला सफ़ेद काँस जैसे उसके बालों का विस्तार हो। पास पत्थर मिट्टी के टिब्बा उसके रूखे चेहरे जैसे लग रहे थे। और तालाब का पानी सूख कर चितका भर रह ऐसा लग रहा था, जैसे अम्माँ की आँखों में उतरा मोतियाबिंद। मानों उसके इस दूख को आस पास की पूरी पकृति ने अपने पर उकेर लिया हो। देखते हैं उसकी धुँधली आस कब तक हिलते हाथ की धुँधली परछाई को, आस भरी बूढ़ी आँखें निहार सकेगी।

शुक्रवार, 19 मई 2017

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-10

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 10 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-दसवां-(प्रश्न-सार)

01—पिय को खोजन मैं चली, पिया मिलन कैसे हो?
02—कुछ दिनों से आप आंखों से पिलाते हैं, लेकिन मदहोश आंखें ढल जाती हैं। तत्क्षण अहोभाव में डूब जाता हूं और हृदय से पुकार उठती है:
गुरु बिन ज्ञान कहां से पाऊं,
दीजो ध्यान हरिगुन गाऊं।
मन तड़पत हरि-दर्शन को आज।
03—क्या मारवाड़ियों में कुछ प्रशंसाऱ्योग्य नहीं होता है?

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-09

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 09 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-नौवां-(प्रश्न-सार)

01—बेइरादा नजर तुमसे टकरा गई,
जिंदगी में अचानक बहार आ गई।
मौत क्या है जमाने को समझाऊं क्या,
एक मुसाफिर को रस्ते में नींद आ गई।
रुख से परदा उठा, चांद शरमा गया,
जुल्फ बिखरी तो काली घटा छा गई।
दिल में पहले सी अब वो हलचल नहीं,
अब मुहब्बत में मिटने की घड़ी आ गई।

02—अगर एक पुरुष अपनी पत्नी से कामत्तुष्टि नहीं पाता है तो वह दूसरी स्त्रियों के पास जाता है। ऐसा करने से वह एक अपराध-भाव अनुभव करता है, क्योंकि उसे पत्नी से और सब सुविधाएं मिलती हैं, और वह उन सब बातों के लिए उसे चाहता है। जब वह अपराध-भाव अनुभव करता है तो उसका मन तनाव से घिर आता है। उसे क्या करना चाहिए कि उसका मन तनावग्रस्त न हो अथवा उसे अपनी कामत्तृप्ति के लिए कहीं जाना बंद कर देना चाहिए?

03—आपके विवाह-संबंधी विचार सुन-समझकर, विवाह करने की इच्छा ही उड़ गई; परंतु ऐसे महत्वपूर्ण अनुभव से गुजरे बगैर रहा भी नहीं जा सकता। मुझ त्रिशंकु का मार्ग-दर्शन करें!

04—आप दलबदल करने वाले राजनीतिज्ञों के संबंध में क्या कहते हैं?

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-08

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 08 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-आट्ठवां-(प्रश्न-सार)

01—मीरा मेरी प्रेरणा-स्रोत रही है और कृष्ण मेरे इष्टदेव। शांत क्षणों में मैंने भी मीरा जैसे भक्ति-भाव की कल्पना तथा चाह की है और उसी के अनुरूप कुछ प्रयास भी किया। मगर प्राणों में उतनी पुलक नहीं उठी कि मैं नाच सकूं। फिर मैं आपके संपर्क में आया; आपका शिष्य हुआ। मैं तरंगित हुआ; मैं रोया; मैं हंसा। मगर कृष्ण से अब कुछ लगाव नहीं रहा। अब तो उस छवि के पास आते और आंखें मिलाते भी संकोच लगता है, जिसे मैंने वर्षों पूजा, जिसकी अर्चना की। यह क्या है भगवान?
02—उज्जैन के सिंहस्थ मेले में उस स्थान पर काफी भीड़ होती थी जहां नागा साधु लैंगिक प्रदर्शन करते थे। जैसे लिंग से बांध कर जीप गाड़ी को खींचना, आदि। क्यों नग्न प्रदर्शन करने व देखने में लोग उत्सुक होते हैं और उनकी तारीफ करते हैं? और जब आपके आश्रम में ऐसा कोई कृत्य नहीं होता, फिर भी लोग क्यों आप पर और आपके आश्रम पर नाराज हैं?
03—मैं जल्दी से जल्दी दुख से मुक्ति चाहता हूं और मोक्ष का आनंद भी। कोई मार्ग बतावें।

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-07

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 07 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-सातवां-(प्रश्न-सार)

1--आप सत्य को जैसा है वैसा ही कह देते हैं--दो टूक। इसीलिए आपके शत्रु पैदा हो जाते हैं। जैसे आपने कल दयानंद के संबंध में कहा। बात सच है पर चुभती है। क्या आप ऐसे संबंधों में चुप ही रहें तो ठीक न हो?
2—आपने कहा कि आप भारत-रत्न होना पसंद नहीं करेंगे। कृपया बताएं कि क्या आप विश्व-रत्न होना पसंद करेंगे?
3—आप किसी प्रश्न का उत्तर लंबा और किसी का अति संक्षिप्त क्यों देते हैं?
4—पंद्रह साल बीत चुके पर आपका कोई शिष्य बुद्धत्व को उपलब्ध नहीं हुआ। कृपा करके समझाइए।
5—मेरा मन कहता है कि संन्यास मत लो पर भीतर और कुछ कह रहा है--यह मौका बार-बार नहीं आएगा।
6—आपके प्रवचनों से यह लगता है कि आप ब्रह्मचारियों के विरोध में हैं, नीति-नियमों और आदर्शों के विरोध में हैं। ऋषि-मुनियों और साधु-संतों की आलोचना भी आप निरंतर करते रहते हैं। शास्त्रों से भी मुक्त होने को आप कहते हैं। आखिर आपका अभिप्राय क्या है? आपका धर्म क्या है? समाज के लिए कुछ नीति-नियमों का आप विधान करेंगे?

गुरुवार, 18 मई 2017

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-06

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 06 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-छट्ठवां-(प्रश्न-सार)

1--प्रवचन में फल के बारे में आपने कहा कि मैं चुप रह गया और कुछ नहीं बोला। भगवान, इतने सालों से आपने इतने फल खिलाए हैं कि अब न तो कुछ बोलने को रहा है, न कुछ पूछने को। सब कुछ मिल गया है। अब तो बस आपकी अनुकंपा मात्र रह गई है। आपका लाखों, करोड़ों, अरबों बार अनुग्रह, उपकार!

2--मैं नहीं जानता कि यहां क्या पाने आया हूं, लेकिन कुछ पाने की इच्छा है। क्या मिलेगा? कृपया बताएं।

3--मैं ध्यान करने की अथक चेष्टा कर रहा हूं, पर सफलता हाथ नहीं लगती है। क्या करूं?

4--आप कहते हैं कि इस सदी का मनुष्य सबसे ज्यादा प्रौढ़ है। तो यह मनुष्य आपको क्यों नहीं समझ पा रहा है? कृपया समझाने की अनुकंपा करें।

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-05

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 05 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-पांचवा-(प्रश्नसार)

पहला प्रश्न: भगवान!
आपको सुनते-सुनते रोना आ जाता है। अब सक्रिय ध्यान के उत्सव के समय पर रोना फूट पड़ता है। यह क्या है? ध्यान के बीच-बीच ऐसा भाव जगता है कि यह शरीर अब रुकावट है; यह कैसे छूटे--ऐसा भाव सघन होता जाता है। यह क्यों? समझाने की अनुकंपा करें।

अक्षय विवेक!
मनुष्य को ऐसे गलत संस्कार दिए गए हैं कि न तो वह जी भर कर कभी रोया है, न जी भर कर कभी हंसा है। जी भर कर जीया ही नहीं है। किसी पहलू से, किसी आयाम में, जी भर कर कोई काम किया ही नहीं, सब अधूरा-अधूरा है! और इसलिए भीतर बहुत सी चीजें त्रिशंकु की भांति लटकी रह जाती हैं।

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-04

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 04 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-चौथा

प्रश्न-सार:

1—आप मेरी सुहागरातों के मालिक हैं। मुझे कभी वैधव्य का दुख देना ही नहीं। बस इतनी ही चाह है--जीओ हजारों साल!

2—मैं नौ वर्षों से आर्यसमाज में पुरोहित था। पांच वर्षों से आपके संपर्क में हूं। मैं पांच जून को संन्यास लेकर जा रहा हूं। मैं आर्यसमाज से घूमने के बहाने पच्चीस दिन की छुट्टी लेकर यहां आया था। अब मैं माला लेकर जाऊंगा। वे लोग मेरे दुश्मन हो जाएंगे, मुझे धक्के देकर वहां से निकाल देंगे। ऐसी अवस्था में मैं क्या करूं?

3—हम कैसे आपसे जुड़ जाएं? कृपया बतलाएं।

4—आप स्त्रियों के प्रति सामान्यतः अत्यंत करुणा भाव से सराहना करके उनको सम्मान देते हैं। मगर जब स्त्री की बात पत्नी के रूप में करते हैं, तब उसे डांटते हैं और बहुत अलग रूप में चित्रित करते हैं। ऐसा क्यों?

5मेरे पति आपके संन्यासी हैं, मुझे कोई एतराज नहीं। वे मुझे आपके प्रवचनों में, कीर्तन, ध्यान, शिविर और पूना तक के कार्यक्रमों में साथ भी लाते हैं। मैंने आपका संन्यास अभी तक नहीं लिया है, फिर भी वे लेने को मजबूर नहीं करते हैं। मगर मेरी शिकायत सिर्फ इतनी है कि वे न सिनेमा देखने जाते हैं, न साथ घूमने निकलते हैं; घर में ही चुपचाप बैठे रहते हैं; और खुले आकाश को ताकते रहते हैं। बातचीत में कोई उत्सुकता नहीं रखते। ज्यादा समय आपकी बातों में ही पड़े रहने का क्या मतलब? मैं भी उनकी पत्नी हूं, जरा मेरी भी सुनें!

बुधवार, 17 मई 2017

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-03

पिया को खोजन मैं चली-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

दिनांक 03 जून सन् 1980,
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-तीसरा

प्रश्न-सार

01-आपकी हत्या करने के प्रयास की आलोचना किसी भी अखबार वाले ने नहीं की, न ही किसी उच्च दर्जे के व्यक्ति ने कुछ वक्तव्य दिया!
बुद्धिजीवी और साधारणजन, सब के सब उपेक्षा से क्यों भरे हैं?
02-मैं एक ज्योतिषी हूं, किंतु आपके विचार सुन कर ऐसा लगता है कि यह गलत और धोखे का धंधा छोड़ दूं। आपका आशीष चाहिए।