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शुक्रवार, 1 मई 2026

14- GOD IS NOT FOR SALE - (ईश्वर बिकाऊ नहीं है) - का हिंदी अनुवाद

 GOD IS NOT FOR SALE–(ईश्वर बिकाऊ नहीं है)-का हिंदी अनुवाद

अध्याय -14

25 अक्टूबर 1976 सायं चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

देव निसर्ग...निसर्ग का अर्थ है स्वाभाविक होना, सहज होना, सरल और दरिद्र होना। और धन्य हैं वे गरीब - केवल वे ही ईश्वर के राज्य के उत्तराधिकारी होंगे। केवल गरीब ही अमीर हैं। यह आंतरिक गरीबी वास्तव में एक आंतरिक समृद्धि है। जब आप बस प्रकृति के साथ चलते हैं, तो धीरे-धीरे आप गायब हो जाते हैं। आप इतने गरीब हैं कि आप भी नहीं होते - गरीबी समग्र है। जब गरीबी समग्र होती है, तो रखने के लिए कुछ नहीं होता और कोई भी इसे रखने वाला नहीं होता। यही जीसस का मतलब है जब वे कहते हैं 'आत्मा में गरीब' एक आदमी गरीब हो सकता है लेकिन आत्मा में गरीब नहीं हो सकता। उसके पास अपना दावा करने के लिए कुछ भी नहीं हो सकता है लेकिन कम से कम उसके पास उसका अहंकार है। उसके पास संपत्ति नहीं हो सकती है लेकिन उसके पास मालिक है।

आंतरिक दरिद्रता, आत्मा में दरिद्रता का अर्थ है कि स्वामी भी चला गया - कोई संपत्ति नहीं, कोई स्वामी नहीं। तब तुम प्रकृति के विरुद्ध नहीं हो सकते क्योंकि विरुद्ध होने के लिए कोई नहीं है। तब प्रकृति बस तुम्हारे माध्यम से प्रवाहित होती है। तुम एक बादल की तरह हो जाते हो: हवाएं उसे जहां ले जाती हैं, वह चला जाता है। उसे अपना कोई विचार नहीं है। उसका कोई भाग्य नहीं है, कोई निजी लक्ष्य नहीं है। उसने कोई यात्रा की योजना नहीं बनाई है, इसलिए वह जहां भी उतरता है, वह सुंदर होता है, क्योंकि वहां कभी कोई निराशा नहीं होती। निराशा एक निजी लक्ष्य से निकलती है।

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

48-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-45

(सदमा - उपन्यास)

 ज का दिन सब के लिए बहुत भारी गुजरा था। अचानक वो मोड़ आपके जीवन में आ जाये जिसके बारे में आप कल्पना भी नहीं कर सकते है। तब मनुष्य मन क्या प्रकिृया करेगा। यहीं थी वह मन की प्रतिक्रिया जो श्रीमति मल्होत्रा जी की थी। वह अचानक अपना आपा खो बैठी। झल्ला  गई, क्रोध करने लगी, उछलने लगी, तांडव शुरू हो गया। वह व्यक्ति उस बात को स्वीकार न करने के लिये, उस बात को न मानने के लिए भरसक प्रयत्न करेगा। वहीं कल नेहालता ओर श्रीमति मल्होत्रा जी के बीच हुआ था। जिसे पेंटल आराम से बैठ कर देख रहे थे। वैसे भी उस का इस सब बीच में बोलने का न ही कोई औचित्य था और न ही अधिकार।

होटल जाते-जाते तक श्रीमति मल्होत्रा जी का गुस्सा कम ही नहीं एक दम से उतर गया था। उसे अपने बोले शब्दों पर बड़ा पश्चाताप हो रहा था। परंतु बेटी ने जो किया वह बहुत सौम्य था। उस का अपना जीवन है, फिर भी उसने मां को कोई अनुचित शब्द नहीं बोले। वह अपनी मां के स्वभाव को जानती थी। की वह जबान की कड़वी है, परंतु दिल से एक दम मुलायम। ये बात मल्होत्रा जी भी जानते थे, इसलिए वह चिंगारी को बूझने का इंतजार कर रहे थे। अगर वह बेटी का साथ देंगे तो उसकी पत्नी फिर क्रोधित हो जायेगी। सो जब वह होटल पहुंचे तो सब अपने-अपने कमरे में चले गए किसी ने किसी से कोई बात नहीं की। पेंटल जी अपने कमरे में एक दम से मौन मुद्रा में चले गए एक चिंगारी को लिए हुए, जिसके नीचे एक तूफान भभक रहा है।

13- GOD IS NOT FOR SALE - (ईश्वर बिकाऊ नहीं है) - का हिंदी अनुवाद

 GOD IS NOT FOR SALE–(ईश्वर बिकाऊ नहीं है)-का हिंदी अनुवाद

अध्याय -13

24 अक्टूबर 1976 अपराह्न, चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

[एक नव-आगमन संन्यासी कहते हैं: मैं स्वयं को साक्षी मानने में सक्षम हो गया हूँ। मुझे नहीं पता कि यह वास्तव में साक्षी होना है या नहीं, लेकिन ऐसा लगता है कि यह कुछ ऐसा ही है।]

बहुत बढ़िया! यही एकमात्र बाधा है - सूक्ष्म अहंकार। यह हर जगह आता है और यह इतना सूक्ष्म है कि जब तक आप इसके प्रति बहुत सचेत नहीं होंगे, यह आपको धोखा देता रहेगा। यह कई तरह के वेश धारण कर सकता है। यह कई तरह के खेल -खेल सकता है; यह बहुत आविष्कारशील है। यह विनम्रता भी बन सकता है, यह सरलता भी बन सकता है, यह संन्यास भी बन सकता है। इसलिए केवल सजगता ही कुंजी है।

कुछ बातें याद रखने योग्य हैं: इसकी निंदा मत करो, अन्यथा तुम्हारी सतर्कता भ्रष्ट हो जाएगी। एक बार जब तुम किसी चीज की निंदा करते हो तो तुम उससे डर जाते हो। एक बार जब तुम किसी चीज की निंदा करते हो तो तुम उस चीज की शक्ति को स्वीकार कर लेते हो जो तुम पर हावी है। तुम पहले से ही रक्षात्मक मनोदशा में हो, और जब तुम रक्षात्मक होते हो, तो तुम्हारी हार निश्चित है। जब तुम किसी चीज की निंदा करते हो, तो तुम पहले से ही स्वीकार कर लेते हो कि वह मौजूद है। वही स्वीकृति उसे जीवन ऊर्जा देती है। क्योंकि अहंकार कोई चीज नहीं है; यह सार नहीं है। यह सिर्फ एक छाया है। वास्तव में इसका अस्तित्व नहीं है। यह केवल एक छाया की तरह मौजूद है - इसमें कोई पदार्थ नहीं है।

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

47-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-47

(सदमा - उपन्यास)

नेहा लता के माता पिता को ऊटी तक पहुंचे-पहुंचे दिन के चार बज गए। तब उन्होंने शहर के होटल में कमरा ले लिया। पेंटल ने श्री जे. के. मल्होत्रा जी को कहा अगर आप कहे तो मैं तो अब सोम प्रकाश के पास चला जाता हूं, उन्हें हमारे आने खबर भी हो जायेगी। तब श्री जे. के. मल्होत्रा ने कहां की नहीं रहने दो इतना तो थक कर आये हो हजारों मील चलकर अब नाहक परेशान होगे। आप हमारे साथ वाले कमरे में ही रहो। तब उन्होंने दो कमरे बूक कर लिए। पेंटल ने कहां की एक काम तो कर लेते है। सोम प्रकाश को तो सूचना नहीं दे सकते परंतु सोनी को तो दी ही जा सकता है। तब श्री जे. के. मल्होत्रा ने रिसेप्शन को एक नम्बर दिया की आप उन्हें एक फोन करना है। रिसेप्शन पर बैठ बाय ने फोन मिला वहाँ से किसी पुरूष की आवाज आई और बाय ने कहां की बम्बई से कोई आप से बात करना चाहता है। ये सोनी के पति थे श्री देवधर करकरे जी। नमस्कार आदि होने पर श्री जे. के. मल्होत्रा ने कहां की मैं नेहा लता का पिता बोल रहा हूं। हम यहां ऊटी पहुंच गए है। और एक होटल ब्लू रोज में कमरा भी ले लिया है। आप कृपा कर सुबह सोम प्रकाश और नेहा लता को संदेश पहुंचा देंगे। तब श्री देवधर करकरे ने नाराजगी के अंदाज में कहां की आप भी कमाल करते है। इतना बड़ा घर पड़ा है और आप होटल में कमरा ले कर रह रहे है।

मैं आप से नाराज हूं, आप ने ये ठीक नहीं किया। तब माफी के अंदाज में श्री जे. के. मल्होत्रा जी ने कहां की मेरे साथ मेरी पत्नी और एक और व्यक्ति भी है जिनको शायद आप जानते होगे वह पेंटल जी भी। तब श्री देवधर करकरे ने कहां की वह तो सोम प्रकाश का मित्र है। वह तो घर का ही आदमी है उस से क्या पर्दा करना। कल आप होटल का कमरा खाली कर के यहां आ जाना। तब हां हूं कर के किसी तरह से जे. के. मल्होत्रा जी ने अपनी जान छुड़ाई।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

12- GOD IS NOT FOR SALE - (ईश्वर बिकाऊ नहीं है) - का हिंदी अनुवाद

GOD IS NOT FOR SALE–(ईश्वर बिकाऊ नहीं है)-का हिंदी अनुवाद

अध्याय -12

23 अक्टूबर 1976 अपराह्न, चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

[एक संन्यासिनी जिसका एक छोटा बच्चा है, कहती है कि उसके पति ने उसे घर से निकाल दिया है। वह उससे प्यार करता है, लेकिन अब उसके साथ नहीं रह सकता: वह चुप रहना चाहता है, और मुझे लगता है कि बच्चा और मैं बहुत ज़्यादा परेशान करते हैं।]

नहीं, नहीं, ये तो बस बहाने हैं। अगर आप प्यार करते हैं, तो आप उससे निकलने वाली हर चीज़ को स्वीकार करते हैं। आप बच्चे से प्यार करते हैं और आप बच्चे के रोने से भी प्यार करते हैं; यह अब विचलित करने वाला नहीं है। प्यार हर चीज़ को स्वीकार्य बनाता है। लेकिन अगर प्यार नहीं है, तो सब कुछ एक समस्या है। अगर आप किसी महिला से प्यार कर सकते हैं, तो वह कभी भी आध्यात्मिकता के मार्ग पर आपकी बाधा नहीं बन सकती क्योंकि प्यार हमेशा एक अच्छी मदद है और आध्यात्मिकता प्यार के बिल्कुल भी विपरीत नहीं है। उसके मन में कुछ गलत धारणाएँ होंगी।

[वह कहती है: मुझे वाकई लगता है कि मैं उतनी गहराई से प्यार नहीं कर पाती जितनी होनी चाहिए। शायद मैं प्यार से डरती हूँ -- मुझे नहीं पता।]

मार्ग की अनुभुतियां- (बुल-बुल चिड़ियां और उसका अपनापन-)

 बुल-बुल चिड़ियां और उसका अपनापन-

पशु पक्षियों का भी अपना एक स्वतंत्र आस्तित्व होता है। लेकिन वह जहां पर रहते है। उस स्थान के साथ-साथ उनका वहां रहने वाले उन लोगों से भी अपना पन जुड़ जाता है। वह उस सब में समाहित हो कर अपने को भी उसी परिवार या स्थान का सदस्य ही मानते चले आते है। पीढ़ी दर पीढ़ी। मुझे याद है शायद बात 1980 से भी पहले कि है। जब मेरी मां जीवित थी। तब हम पुरूष लोग सब उस बैठक में ही सोते थे। उसे सब ‘’घेर’’ के नाम से पुकारते थे। वहां गाय-भैंसे बैल आदि सब बंधे होते थे। यानि पेड़ पौधे मनुष्य के साथ-साथ उनके रहने के भी मकान।  यानि की वह बहुत ही बड़ी जगह होती थी। करीब वह जगह 1500 से ले कर 2000 गज तो आराम से रही ही होगी। क्योंकि मेरी छोटे चाचा और हम एक साथ तो नहीं रहते थे परंतु स्थान का बटवारा होने पर भी दरवाजे और चार दीवारी एक ही थी। क्योंकि चाची  मेरी मां की सगी बहन थी। जिसे हम मौसी कहते थे। उस समय से लेकर आज करीब 60 साल गुजर गये। एक बुल-बुल जोड़े को मैं तब से देखता हुआ आया हूं। मां जब घेर में जाती तो कैसे वह मां के साथ संवाद करती थी। क्योंकि मां दूध निकलना या गोबर पानी करना मां या बहनों की जिम्मेदारी थी। जब मां जाती तो मुझे कहते की छत पर जाकर उसके बर्तन में पानी भर दे। क्योंकि वहां सीढियां नहीं थी। इस लिए दीवार के बाहर निकले पत्थरों का सहारा ले कर मां तो नहीं चढ़ सकती थी। मैं उसके लिए पानी भरता था और मां जरूरी उनके लिए बाजरा, या रात की बची रोटी को मोर उन  रोटी को टूकड़े छत पर फेंक देती थी।

समय बदला, भीड़ बढ़ती गई। स्थान के बटवारे होते चले गये। और कंकरीट की उंची इमारतें बनती चली गई। आज तो ये हाल है। गांव का क्या पूरे शहर का की गलियां जो पहले छांव को तरसती थी। आज धूप को तरसती है। बुर्जुग औरतें कभी हमारे घर के आंगन में जो नीम का वृक्ष था उस नीचे बैठ कर दिन भी थकान मिटाने के साथ-साथ कुछ हाथ का काम या बातचीत करती रहती थी। आज भी उसी वंशावली की बुल-बुल हमारे ओशोबा हाऊस में रहती है। क्योंकि यहां पर वृक्ष है। सुरक्षा है। जो प्राणी चाहे वह पशु हो या पक्षी एक बार मानव के संग साथ रहने के आदि हो जाते है। तब वह जंगल में आपने को अच्छा महसूस नहीं करते।

रविवार, 26 अप्रैल 2026

46-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-46

(सदमा - उपन्यास)

र पहुंचते-पहुंचते उन्हें संध्या हो गई थी। सब लोग सारा दिन के घर से निकले हुए थे इसलिए थक भी बहुत गये थे। नानी और नेहालता ने पहले कपड़े बदले फिर दोनों ने मिल कर खाना बनाया। उसके बाद सब ने बड़े चाव से खाना खाया और दिन भर की कुछ बाते की। फिर यही निर्णय लिया गया की अब सोम प्रसाद को दवाई दे कर सब को सो जाना चाहिए। सुबह उठ कर जब नेहा लता और सोम प्रकाश घूमने के लिए निकले तो आज दोनों का बदन दर्द कर रहा था। इसलिए वह अधिक दूर तक नहीं जा सके तब सोम प्रकाश ने नेहालता को कहा की आज इतना ही घूमना काफी है। मैं आज से बीच के छोटे रास्ते से पेदल ही स्कूल चला जाया करूंगा। पहले भी तो इसी रास्ते से होकर ही तो जाता था। एक पंथ दो काम हो जायेंगे। ये बात सून कर नेहा लता को बहुत अच्छा लगा। क्योंकि अब वह एकांत से भय नहीं खा रहा था। लोगों से मिलने की झिझक भी उसकी कम होती जा रही थी। ये बात नानी को भी बहुत अच्छी लगी परंतु ये सब हरि प्रसाद को नहीं भा रही थी। जब सुबह तैयार हो कर सोम प्रकाश स्कूल की और गया तो नेहा लता उसे कुछ दूर तक छोड़ने के लिए साथ गई। तब साथ में हरि प्रसाद भी सोम प्रकाश के साथ चल दिया। परंतु अब आगे जा कर उसे समझ नहीं आ रहा था की अब किस के साथ चले। क्योंकि सोम प्रकाश आगे पगडंडी पर स्कूल की और चला गया और नेहा लता वहीं खडी रह गई। ये बेचारे हरिप्रसाद की समझ के बहार की बात थी। फिर वह पहले भाग कर सोम प्रकाश के पास पहुंचा। तब सोम प्रकाश ने उसे प्रेम करते हुए कहां की तुझे को तो नेहा लता के साथ जाना चाहिए क्योंकि वह अकेली है। और मानो वह सारी बात समझ कर नेहा लता के पास वापस आ कर पूछ हिला कर कह रहा हो की चलो अब घर मैं आ गया।

उधर बम्बई में नेहा लता के माता पिता परेशान थी। वह बार-बार यहां आने की जिद्द करते और नेहा लता किसी न किसी बहाने से उन्हें टाल देती थी। परंतु इस बार उन्होंने निर्णय कर लिया अब उसकी एक बात नहीं सुननी। और वह पेंटल के दफ्तर चले गए। पेंटल ने जब उन्हें दफ्तर में देखा तो उन्हें बड़ा अचरज हुआ। अरे आप मुझे बतला देते। तब श्री जे. के. मल्होत्रा ने कहां की चलो आप से मिल ही लेते है। नेहा लता की कोई खोज खबर आप के पास तो होगी ही। पेंटल थोड़ा झेप गए। की वह काम में इतना व्यस्त रहे है की समय ही नहीं निकाल पा रहे है।

11- GOD IS NOT FOR SALE - (ईश्वर बिकाऊ नहीं है) - का हिंदी अनुवाद

GOD IS NOT FOR SALE–(ईश्वर बिकाऊ नहीं है)-का हिंदी अनुवाद

अध्याय -11

22 अक्टूबर 1976 अपराह्न, चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

[एक संन्यासी का कहना है कि उसे हमेशा रिश्तों को लेकर परेशानी रही है, जिसमें उसकी प्रेमिका के साथ वर्तमान रिश्ता भी शामिल है।]

मि एम, हम्म। एक रिश्ता हमेशा एक समस्या होता है क्योंकि दूसरा दर्पण बन जाता है और दूसरे की उपस्थिति आपको कई तरीकों से अपना चेहरा देखने में मदद करती है। और ऐसा ही दूसरे के साथ होता है - आप दर्पण बन जाते हैं। कोई भी उसका असली चेहरा नहीं जानना चाहता। इसीलिए सदियों से लोग मठों की ओर भागते रहे हैं। ये कायर हैं! वे रिश्ते से बच रहे हैं, क्योंकि रिश्ते में वे वैसे ही प्रतिबिंबित होते हैं जैसे वे हैं। अकेले में, वे अपने बारे में जो सोचना चाहते हैं सोच सकते हैं; वे अपने बारे में कोई भी छवि बना सकते हैं। इसलिए रिश्ते के साथ पहली समस्या यह है कि रिश्ता आपको प्रतिबिंबित करता है और आप दूसरे व्यक्ति को प्रतिबिंबित करते हैं। और आपकी समग्रता सामने आती है - आप केवल सतह नहीं हैं।

आप अपने रिश्ते में जितने गहरे उतरेंगे, यह उतनी ही गहरी भावनाओं को सामने लाएगा। अगर आप वाकई किसी रिश्ते में हैं तो यह आपको तोड़कर रख देगा। आपकी सारी छवियाँ बिखर जाएँगी। आपके सारे चेहरे धूमिल हो जाएँगे। आपके सारे मुखौटे उतरने लगेंगे। और जब भी ऐसा होता है तो व्यक्ति दूसरे से बदला लेना शुरू कर देता है। इसीलिए [आपकी गर्लफ्रेंड] ना कहती रहती है। उसकी ना के पीछे हाँ है। दरअसल, वह हाँ कहना चाहती है -- इसीलिए वह ना कहती है -- लेकिन वह अपनी संपूर्णता से डरती है।