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सोमवार, 22 जून 2026

26 - चल पड़ा पथ पर पथिक जब—(कविता) -ओशो की मधुशाला

 26 - चल पड़ा पथ पर पथिक जब—(कविता)

चल पड़ा पथ पर पथिक जब, कौन बाधा रोकेगी उसको।

कौन डगर भटका सकेगी, दृढ़ हो विश्वास  जिसको।।


देख राहों की  रूकावट, तू न थकना, तू  न रुकना।

आंधी और तूफान से भी, तू न  डरना, न सहमना।

डिगने लगे विश्वास जब भी,

प्रेम पथ  के   बीज  बोना।

देख सागर की तू गर्जन,

लहर बन कर विलीन होना।

बुधवार, 17 जून 2026

25 - हे निर्दय अशोक—(कविता) - ओशो की मधुशाला

 25 - हे निर्दय अशोक—(कविता)


है निर्दय अशोक,

तुझे होता नहीं कभी कोई शोक।

जब सारी बगिया

पतझड़ मना रही होती है।

तू निर्झर सा अडिग खड़ा,

कैसे झूमता,मुस्कराता रहता है।

तेरी मंजरी जब फूलती है।

कैसे गमक जाता है उपवन सारा।

 

कोयल के गीत,

भ्रमरों की गुंजान,

तितली की चपलता,

सब मुग्‍ध और मदहोश रहते है।

रविवार, 14 जून 2026

24 - कारे बदरा अब तो आजा-(कविता) - (ओशो की मधुशाला)

24 - कारे बदरा अब तो आजा-(कविता)

कारे बदरा अब तो आजा, मेरी आंख के मोती ले जा।

दूर कहीं जब मिले पिहरवा, उन चरणों में जाकर गहजा।।

 

प्रीतम को यूं जाकर कहना, घुटन भरा ये हो गया जीना।

तपती धरा को अब है सहना, मानो फूलों का है गहना।

दुख पीड़ा को पीते जाना, यूं दिल के टुकड़े सीते रहना।

नासूर बना जख्म जिगर का, किन यादों से अब है सीना।

शनिवार, 13 जून 2026

23 - फागुन का ये अल सावन -(कविता) - ओशो की मधुशाला

 23 - फागुन का ये अल सावन 


एक फूल के खिल जाने से,

आती उपवन की आहट है।

दूर कहीं पर नाद गुंजता,

अब पिया मिलन की आस है।

फागुन का ये अलसावन 

है प्रेम रंजन मधुभावन

गा रे गा मन फागुन के गुन

पद चाप सूने प्रीतम के आवन

भीतर-भीतर कुछ पगता है

तभी तो जीवन रंग भरता है।।

गुरुवार, 11 जून 2026

22-कौन हो तुम—(कविता) - (ओशो की मधुशाला)

22-कौन हो तुम—(कविता)


है सृष्टि के लबों पर, फैलती मुस्कान हो तुम।

गीत गाते भ्रमरों के, गुंज का गुंजान हो तुम।।

 

गा रहा है गीत कोई, थी कभी नीरवता सोई।

बैठ कर अकुलाहटों में, दूर तनहाई भी रोई।

किन सुरों में है गुनगुनाता,

विहंगम के कंठ बैठ गाता,

पुष्प बन कभी मुसकुराता,

दिखता वो नहीं है फिर भी

है जहां देखो वो पाता।

है वो कृति के पर भी,

सृष्टि की पहचान हो तुम।।

है सृष्टि के लबों पर,

फैलती मुस्कान हो तुम।

बुधवार, 10 जून 2026

21- ज्योति विनिंदक रूप-(कविता) - (ओशो की मधुशाला)

21- ज्योति विनिंदक रूप-(कविता)


अंतर के दर्पण में मैंने..

ज्योति-विनिंदक रूप उतारा,

पर असीम को सीमित करना..

सहज नहीं इससे मैं हारा;

निर्वासन, असफल रेखाएं,

हाथ उठा कर गगन निहारें;

चित्र किसी का प्राण अजाने..

मेरा ही आकार बन गया!

आड़ी तिरछी रेखाओं से

एक नया रूप आकार बन गया।

मंगलवार, 9 जून 2026

20 - तू बांसुरी बने तो - (कविता) - ओशो की मधुशाला

20 - तू बांसुरी बने तो - (कविता)

तू बांसुरी बने तो तुझे होंठों से लगा लूं।

तू फूल बने तो अपनी सांसो में समा लूं।

तू पीर बने तो तुझे मैं सीने से लगा लूं।

तू आस बने तो तुम्हें जीवन में बसा लूं। 

 

तन भी फूल मन फूल, हर और फूल समाया।

तेरी हंसी में प्रीतम हमने फूलो को हंसता पाया।

शनिवार, 6 जून 2026

19 - अरण्य उपवन - (कविता) - ओशो की मधुशाला

 19 - अरण्य उपवन - (कविता)

अरण्य का मौन सधन, कहता है कुछ गुन-गन।

मन का मर्म इति, कहता है मत इसे सून।

 

चीढ़ के पात-पात को, छूती है जब पवन

कानों में गुंज उठता जल सा क्रीड़ा क्रंदन

अंबर पर वो तैर रहे है, धवल मेघ छूते पर्वत

पल-पल करते वे अठखेली, छवि बनते नित नूतन

लहर-लहर दौड़े फिरते, कौन पकड़ पाता अब उनको

गुरुवार, 4 जून 2026

18 - पत्थर की पुकार - (कविता) - ओशो की मधुशाला

 18 - पत्थर की पुकार  -  (कविता)

कौन? कहता है

पत्थरों तुझे पीड़ा नहीं होती,

वो रो सकता है

और कर सकता है चीत्कार,

वो करता है

कुछ दिल की बातें कभी-कभी

मगर किसी मौन फुसफुसाहट कि तरह

जो हमारे कानों को

लगती है कुछ अनसुनी।

वो इतनी मंद्र ओर सुकोमल सी होती है।

बुधवार, 3 जून 2026

17-फागुन — (कविता) - (ओशो की मधुशाला)

17-फागुन — (कविता)

फिसलन मन की अकड़न तन की

बस बन गया सारा पतझड़ जीवन

नहीं सुलझती सुलझी उलझन

है प्रेम प्रीत का ये कैसा बंधन

आओ साजन गदराया फागुन

भर गया मन में चंचल चितवन

 

दबे पाँव आकर सिरहाने

हवा लगी बाँसुरी बजाने

दुखता सिर सहलाने लगते

फागुन के दिन चार है हंसते

मंगलवार, 2 जून 2026

16-हम दीप जलाये बैठे है — (कविता) - (ओशो की मधुशाला)

16-हम दीप जलाये बैठे है — (कविता)

हम दीप जलाए बैठे थे, इक आस लगाए बैठे थे।

हम दिल के टूटे तारों से, कोई गीत बनाए बैठे थे।


इक आस बंधी थी जीवन की,आती-जाती श्वास भी थी।

जो महक उठी थी प्राणों में, वो खो हुई एहसास सी थी।

वो दूर भले ही रहती थी, पर रहते दिल के पास ही थी।

जो आकर नहीं जाती है कभी, अनबूझी सी प्यास सी थी।

वो आकर भी कभी आ न सके, हम आस लगाए बैठे थे.....

रविवार, 31 मई 2026

15-ओ प्‍यारे न्‍यारे प्रीतम--(कविता) - (ओशो की मधुशाला)

 15-ओ प्‍यारे न्‍यारे प्रीतम

ओ प्‍यारे न्‍यारे प्रीतम..

तुम्हारे प्रेम को मैं जानती हूं

तुम अपने प्रेम की बाते मुझे मत बतलाओ

मैंने उन्हें छूआ है, उसमें में डूबी हूं।

उसने मुझे घेरा है अपने आगोश में

जानते  हो  तुम अब मैं उसे 

भली भांति जानने लगी हूं

तुम्हारी उस प्रेम दृष्टि को मैंने

अब पल-पल अनुभव किया है,

और सबसे अधिक बुरा यह है कि

तुम्हारा चाबुक मारने जैसा डांट-फटकार

में भी मैंने उस प्रेम का अनुभव महसूस करने लगी हूं।

शनिवार, 30 मई 2026

14 - कंघा--(कविता) - (ओशो की मधुशाला)

 14 - कंघा--(कविता)

हमने तो चाहा था पल भर के लिए

केवल तुम्हारा कंधा,

की जीवन के इस लम्बे सफर की

उघती उस लम्बी थकान में,

कुछ रिश्ते दर्द को सहारा मिले,

लेकिन हाय संसार!

तुमने तो झटक दिया दामन

किसी बेरुखी से।

परंतु देखो मेरा भाग्य,

क्या तुझ पर इतराऊं

या जलन करूं तुझ पर

गुरुवार, 28 मई 2026

13 - ओशो की मधुशाला-कविता - (ओशो की मधुशाला)

 13 - ओशो की मधुशाला-कविता

प्रियतम  तेरे सपनों की, मधुशाला मैंने देखी है।

होश बढ़ाता इक-इक प्याला, ऐसी हाला देखी है।।

 

मदिरालय जाने बालों ने,

भ्रम न जाने क्‍यों पाला।

हम तो पहुंच गए मंजिल पे,

पीछे रह गई मधुशाला।।

 

शब्‍दों कि मधु, शब्‍दों की हाला,

शब्‍दों की ही बनी   मधुशाला।

आँख खोल  कर  देख सामने,

थिरक रही   जीवित   हाला।।

मंगलवार, 26 मई 2026

12 - नहीं जानती क्‍या मैं अभी हूं -कविता - (ओशो की मधुशाला)

 12 - नहीं जानती क्‍या मैं अभी हूं -(कविता) 

ओ प्‍यारे, मेरे न्‍यारे,

यूं काहे पुकारे, मेरे प्रीतम।

तुम्हारे प्रेम को मैं जानती हूं

तुम अपने प्रेम की बाते

यू मुझे मत बतलाओ

उसने मुझे छूआ है,

केवल मुझे ही नहीं मेरे सजल गात का भी

मैंने उसे महसूस किया है,

मैं उस अथाह सागर में डूबी हूं।

मैं उस भेद भरे भाव को

भली भांति जानने लगी हूं

तुम्हारी उस प्रेम दृष्टि को मैंने

उसे पल-पल अनुभव किया है,

और सबसे अधिक बुरा यह है कि