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सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

22-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-22

(सदमा - उपन्यास)

नेहालता ने घर पहुंच कर अपने माता-पिता से पेंटल का परिचय कराया की ये हमारे ही कालेज में हमारे साथ पढ़ते थे। परंतु ये हमारे सीनियर थे दो कक्षा आगे, पढ़ाई में हमारे कॉलेज में सबसे अच्छे विद्यार्थी थे। आज अचानक गली के मोड़ पर जाते हुए मिल गये। तो इन्हें घर ले आई। और सूनो गिरधारी लाल जी आज मेहमान आये है हमारे घर। इनके लिए कुछ खास बनाओ या इन से पूछ लो की इन्हें क्या पसंद है। तब पेंटल ने कहा जो भी मिलेगा वह प्रसाद स्वरूप ही होगा। नेहालता ने कहां की ये हमारे काका गिरधारी लाल खान बहुत ही अच्छा बनाते है। कहो तो तब तक एक चाय हो जाये। और गिरधारी को चाय के लिए बोल दिया और दोनों ड्राइंग रूम में बैठ गये। मां-पिता भी पास थे इसलिए वे कुछ बात नहीं कर पा रहे थे। वो जो उन्होंने बात करनी थी उसके लिए तो एकांत और निजता चाहिए। चलों फिर समय निकाल कर मिला जायेगा।

सोमवार, 26 जनवरी 2026

21-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा


 अध्याय-21

(सदमा - उपन्यास)
 

अगले हफ्ते किसी काम के कारण वह नेहालता को ढूंढने के लिए जा नहीं सका। रोज-रोज समय गुजर रहा था, यह वह जानता था। ये सब उसके दोस्त के लिए एक-एक दिन कितना भारी होता जा रहा होगा। परंतु उसकी और से पूरी तो कोशिश कि ही जा रहा है, तब से वह मुम्बई आया है। वहां पर उसका दोस्त किस हालत में होगा इस बात का पता उसे चलता रहता था। क्योंकि वह बीच-बीच में सोनी से फोन पर बात कर सब हाल चाल पता कर लेता था। वहां से सोनी उसको सोम प्रकाश की प्रगति के विषय में बताती रहती थी। उस दिन जो उसके साथ मंदिर में घटा था उसका हालचाल भी उसने सोनी को बतलाया कि वह लड़की शायद मैंने मंदिर में देखी थी। परंतु इस विषय में पक्का तो नहीं कहां जा सकता। लेकिन मुझे लग रहा है था कि ये वहीं है। क्योंकि कोठे पर जब मैंने पहली बार उसे देखा था। तब वह और तरह का परिधान पहने हुए थी और चेहरे पर मेकअप भी अधिक था। एक खास किस्म की विकृति एक भय, एक तनाव वह अपने चेहरे पर लिए हुई थी। फिर मैंने उसे उस समय खास होश से या ध्यान से भी नहीं देखा था। अब जैसे ही में उसका पीछा करने के लिए मंदिर के बाहर आया अचानक न जाने वह कहां गायब हो गई। लाख खोजने पर भी मुझे कहीं दिखाई नहीं दी। परंतु सोनी न जाने क्यों ऐसा लगता है जब मैं उससे अपने दोस्त के बारे में बात करूंगा तो उसकी संवेदना, उसकी भावुकता उसके स्नेह को जगा सकता हूं। ये सब मैंने तेरे संग साथ के प्रेम से सीखा है। न जाने क्यों मुझे ऐसा विश्वास हो गया है। अगर तुम भी आज यहां मेरे साथ होती तो कितना अच्छा होता।

शनिवार, 24 जनवरी 2026

20-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-20

(सदमा - उपन्यास) 

आज पेंटल ने निर्णय लिया की कितनी दिन से टाल रहा हूं परंतु आज तो वहां जाना ही होगा। जो भी हो उसे एक बार आज नेहालता से मिलना ही होगा। सो उसने वहां का पता एक कागज पर लिख लिया और उस दिन कुछ जल्दी ही उठ कर घर से निकल गया। क्योंकि कम से कम दो तीन घंटे का सफर तो था ही। फिर उसके बाद उस पते को ढूंढना भी था। उस इलाके में पहुंचते-पहुंचते सूर्य सर पर आ गया था। काफी पूछने और ढूंढने से उस घर का पता चला। परंतु शहर में रहने वालों की ये बीमारी है की वे अपने पड़ोसी को भी नहीं जानते। वे केवल अपनी दुनियां में इतना मस्त रहते है। सामने क्या हो रहा है किसी को पता नहीं चलता। गांव देहात में आप नाम से ही पता लगा सकते हो। देखने में नेहालता का मकान काफी बड़ा लग रहा था। पैसे वाले आदमी दिखाई दे रहे थे। अब एक दम से अंदर भी नहीं जाया जा सकता है। अब क्या बात की जाये ओर किस से यही पेंटल सोच रहा था। कि जब नेहालता से मिलेगा तो सीधी बीमारी की बात करना भी गलत होगा। अब तक वह उस गली के दो तीन चक्कर लगा चूका परंतु उसे कोई मार्ग नहीं सूझा। गली के एक कोने में एक फल सब्जी वाला खड़ा उसे दिखाई दिया। पेंटल ने उससे बात करने की गर्ज से चार केले खरीद लिए। जब की केले उसे कभी खाने अच्छे नहीं लगते थे। केले ले कर पास ही नाली पर बनी एक छोटी सी पुलिया थी। वहां पर कुछ छांव भी थी। इसलिए वह उस पर बैठ कर उन्हें खाने लगा। सामने ही एक तालाब साफ सुथरा बड़ा सा दिखाई दे रहा था। और उसके दाएं कौन पर एक बड़ा सा मंदिर था। जिसमें इक्का दुकान ही आदमी आता जाता दिखाई दे रहा है।

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

यादें और जीवन का बहा-मनसा-मोहनी

 यादें और जीवन का बहा-


जीवन को अगर हम देखे तो वह यादों का एक बहाव ही पाओगे। परंतु कुछ मील के पत्थर हमारे पूरे जीवन की दशा को प्रतिवर्तन कर देते है। ऐसी ही एक याद आज की यानि की 23 जनवरी 1979 जो आज से 47 साल पहले घटी थी। कैसा मधुर उन्माद आज भी मन के आंगन में गुदगुदाहट सी होने लग जाती है। जब जीवन के उन क्षणों को याद कर रहा हूं। वैसे तो हमारे जीवन की जिसने हमारे जीवन को ये मार्ग दिया या आज जहां हम खड़े है। उसकी भिन्न-भिन्न यादें है। या तिथि है। क्योंकि एक महा बाद यानि 26 फरवरी को 1976 को हम और मोहनी मिले थे। यानि अब करीब 50 साल का हमारा साथ हो रहा है। और यही साथ हमें ओशो के मार्ग पर लेकर गया है। शायद मैं भी इस मार्ग पर अकेला नहीं चल सकता था। और न ही मोहनी ही। परंतु जब दोनों ही अधूरे थे तो ओशो के मार्ग पर चल कर हम एक पूर्ण हुए। और दोनों ने जैसे जीवन के दक्षिणायन की यात्रा एक साथ शुरू की उसी तरह से जीवन का उत्तरायण पर भी एक साथ चले। यानि 23 जनवरी 1994 को पूना से एक ही दिन सन्यास लिया।

मंगलवार, 20 जनवरी 2026

19-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-19

(सदमा - उपन्यास) 

गाड़ी समय से एक दम दादर स्टेशन पर रूकी। उसके पास कोई अधिक सामान तो था नहीं के अच्छी बुरी यादें ही थी। जिनका वज़न न के बराबर था। बस एक ह्रदय में दर्द था। की अगर वह कुछ दिन और रूक सकता तो कितना ही अच्छा होता। परंतु  वह क्या कर सकता था, पहले ही वह इतनी अधिक छुट्टी कर चूका है अब और की गुंजाइश नहीं थी। देखो अब कितने दिनों में समय निकाल कर वह उस लड़की का पता ठिकाना ढूंढ पता है। आसमान पर अभी सूर्य का उदय नहीं हुआ था। परंतु उसकी लालिमा ने सारे अंबर को लाल रंग दिया था। स्टेशन पर अधिक भीड़ नहीं थी बस कुछ पक्षियों के मधुर नाद गुंज रहे थे। दूर स्टेशन से घोषणा हो रही है की कौन सी गाड़ी किस स्टेशन पर आई है और कितनी देर रुकेगी। कितने दिनों बाद उसने अपनी मात्र भूमि पर पैर रखा है। कितनी अंजानी ही बन जाती है ये पृथ्वी ये जगह आप इससे कुछ देर के लिए अलग हो कर जब वापस आते हो। कैसे अजनबी जैसा व्यवहार करती है। तो जब हम एक मनुष्य से भी काफी दिनों बात मिलते है तब वहां भी तो कैसा अनबोला सा व्यवहार बीच में आ कर खड़ा हो जाता है। अपने घर की वह सड़क ले लो या वह दरवाजा जिस को आपने हजारों बार छू-पकड़ कर खोला है। वह भी जब आप इतने दिनों में आते हो तो कैसा पराया-पराया सा लगता है। मानो अब वह भी आप से रूठ गया है।

52 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय 52

यात्रा का अंतिम छंद

ये घटना कर्म जो चल रहा था। इसे मैं रोक देना चाहता था। कम से कम बहार का रूक जाये तो अंदर और अधिक ठहराव से बैठा जा सकता है। पानी पीने के बाद मैं अंदर जाकर लेट गया। पापा जी ने ऐ. सी. चला दिया। ठंडी हवा के कारण मेरी आँख लग गई। शायद शरीर को कुछ विश्राम मिल गया। पता नहीं कितनी देर बाद मैं उठा और इसके बाद मैं आँगन में ही जाकर बैठ गया जैसे किसी का इंतजार कर रहा हूं। कुछ मेरी समझ में नहीं आ रहा था। एक प्रकार का उसे नशा कहूं या बेहोशी वह मुझ पर चढ़ता जा रहा था। कुछ देर बाद उठ कर मैं नीचे जो कच्ची क्यारी थी उस के अंदर घूस कर मैंने बाथरूम किया। अब ऊपर चढ़ना मेरे लिए थोड़ा कठिन था। श्याम को भी सब मिन्नत कर रहे थे की कुछ खा ले परंतु अंदर कुछ जा ही नहीं रहा था। आज पाँच-छ: दिन हो गए थे। केवल पानी या थोड़े दूध को ही पीकर जी रहा था। पापा जी एक दवाई लेकर आए इंजेक्शन भर कर मेरे आधे खुले मुख से वह धीरे-धीरे डालते रहे। शायद कोई ताकत की दवाई होगी। कुछ अंदर गई बाकी पूरा मुख न खुलने की वजह से बाहर ही गिर गई। उसके बाद मैं पास रखे अपने मग्गे से थोड़ा पानी पिया।

शनिवार, 17 जनवरी 2026

18-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-18

 (सदमा - उपन्यास)

आखिरकार पेंटल के लिए वह समय आ ही गया, जब ऊटी को छोड़ने कर जा रहा है। आते हुए किसी नये प्रदेश में मन कैसा होता है। कितना अ-चिन्हित अपरिचित सा एक खोया-खोया सहमा सा। कितना अकेला पर घेरे रहता है आपको। और जब आप वहां से जा रहे होते तो मन कैसा अपना पन चारों और फैला लेता है। उसे लग रहा था कि इस स्टेशन पर पहली बार इस तरह से जा रहा है। पेंटल यहां से जा तो है परंतु अंदर एक पूर्णता को भरा कर, परंतु बहार उसे सब खाली-खाली सा लग रहा है। ये मनुष्य की कैसी बैचेनी है। वह कभी पूर्ण नहीं हो पाता। आज अगर उसका दोस्त सही होता तो वह उसके साथ कैसे-कैसे मजाक बनाता। की उसका जीना कठिन हो उठता। कई बार अपनों का लड़ना झगड़ना भी न मिले तो मन को कितना खलता है। यहां आकर उसे जो मिला वह अमूल्य था। उसके दोस्त की बीमारी ने उसके मन को झकझोर दिया था। उसे एक पल तो समझ नहीं आ रहा था की ये सब क्या और कैसे हो गया। संवेदनशील मनुष्य के जीवन एक तलवार की धार की तरह से होता है। उसका जीवन एक नाजुक पुष्प के समान है। उसे जरा सा भी धक्का लगा नहीं की वह कुम्हला जायेगा।

परंतु अब एक उम्मीद थी। उसके ठीक होने की। वह रेल गाड़ी के डिब्बे में अपनी सीट पर वह बैठ गया था। उसे अंदर से किसी का इंतजार नहीं था। वह अकेला ही अपने विचारों में खोया हुआ था। वह नहीं जानता था। की इसी जगह उसके दोस्त के साथ वह सब हादसा हुआ जो उसके जीवन को पूर्णता बदल गया। क्या वह लड़की उसकी बात का विश्वास करेगी। क्या उसे अपने जीवन की वो घटनाएं जो यहां

51 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

 पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय 51

प्रेम यात्रा का सोपान

प्रेम भी एक पूर्णता एक परिपक्वता चाहता है, जिस प्रेम को हम जानते और देखते है वह प्रेम नहीं वह तो मात्र हमारी एक जरूर है। सही मायने में यह एक दूसरे का शोषण है। प्रेम को जानने के लिए मानव नहीं आपको अति मानव बनना होता है। मैं अति मानव तो नहीं बन पाया परंतु कुछ ऐसे लोगों का संग साथ अवश्य किया जो प्रेम को जानते थे उस पीते थे उसमें जीते थे। वह स्थान प्रेम का एक सरोवर था, जहां उसे पिया ही नहीं जीया जा सकता था, और उसमें डूबा भी जा सकता था। उस सरोवर का नाम था ‘ओशोबा हाऊस’। सच अगर आपने जीवन में ध्यान को नहीं जाना तो आपके जीवन कुछ भी सार्थक नहीं है। कुछ लोग इसे ध्यान कहते है मैं इसे प्रेम कहता हूं। क्योंकि ध्यान मेरे लिए सहज और सरल है। जो आज के मनुष्य के अति कठिन है। मेरे शरीर और योनि के हिसाब से प्रेम अति कठिन है। कितना विरोधाभास लगता है। परंतु सत्य यही है। प्रेम की यात्रा ध्यान के मानसरोवर से शुरू होती है लेकिन कोई मेरे जैसा भाग्यशाली भी है जो बिना मनुष्य रूपी मानसरोवर को प्राप्त किए उस में डूब सकता है। मैं ही नहीं शायद अब मेरे और भाई अनेक होंगे।

मुझे इस बात की अति खुशी है, की ये सब हो रहा है मानव के विकास के कारण, आज भी मानव में ऐसी जाति है, जो पशुओं को केवल अपना अहार समझती है। लेकिन ऐसा तो हमेशा से होता चला आ रहा है। परंतु आटा चाहे कितना ही हो परंतु चुटकी भर नमक भी उसके सुस्वाद को दोगुना कर जाता है। वही मानव इस पृथ्वी के नमक है। अब मेरे पास समय कम है, ये मैं जानता हूं, मुझे अपने दीपक से रिश्ते तेल का पता है, वह कितने दिन या हो सकता घंटे तक और उजियारा देगा।

गुरुवार, 15 जनवरी 2026

17-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-17

 (सदमा - उपन्यास)

सोनी ने घर पहुंच कर ड्राइवर को कहां की गाड़ी को गैराज में पार्क कर दो और अपने कमरे में जाकर लेट गई। इतनी देर में नौकर आया की मालिक साहब तबीयत तो खराब नहीं है आपकी,  कहो तो सर दर्द की गोली लेकर आऊं। तब सोनी हंसी, की नहीं रे, राम लाला। मैं एक दम से ठीक हूं बस थोड़ा थक गई थी। इसलिए थोड़ा सा आराम करने का मन है   बस। मेरे लिए श्याम की चाय भी मत बनाना। मैं खाना खाकर आई हूं नानी के घर से। और वह करवट बदल कर लेट गई। ऐसे मधुर शब्द मालिक साहब के सालों बाद सुनने को मिले है। इसलिए राम लाल मन ही मन अति प्रसन्न था। जो मेहमान चार पाँच दिन पहले घर आया था। क्या ये सब उसकी संग सोहबत का प्रभाव दिख रहा था? कुछ भी हो मालिक जैसी पहले दिखती थी। सब चाहते है, वह अपने उसी जीवन की पटरी पर आ जाये। क्योंकि जिस मार्ग पर मालिक साहब चल रही है। इसका अंत तो मौत है, इस तरह के टकराव और तनाव में क्या कोई भी व्यक्ति साधारण तरह से मंजिल की और जा सकता है।

सोनी देर श्याम को उठी और तब राम लाला को कहां की एक कप चाय तो पिला दो। तब राम लाला ने कहां की आपका मेहमान आया हुआ है। कितनी देर से वह आपका इंतजार कर रहा है। मैंने लाख कहां की आपको जगा दूं परंतु मुझे मना कर दिया की नहीं वह थकी है कितने दिनों में इतनी गहरी नींद सोई है। आप नींद की और विश्राम की कद्र करो।

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

50 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

 पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय -50

जीवन का प्याला

हम केवल जीवन के भरे उस प्याले का ही अनुभव रहा है सम्पूर्ण जीवन भरा होता है। यानि जीवेषणा हम मृत्युवेषणा थानाटोस के अनुभव से वंचित है। ये किसी-किसी भाग्य शाली को ही नसीब होता है। हम तो जीते हुए भी नहीं जीते मृत्यु के भय से कांपते रहते है। लेकिन अगर हमें हमारी मृत्यु का ज्ञान हो जाये तब हमारा जीवन कैसा होगा। इसलिए प्रकृति ने उसे एक रहस्य के पर्दे में छुपा कर रखा है। मैं अब जान रहा था जीवन का वो प्याला अब रिस चूका है। अब तो इसमें केवल एक अंधकार है। फिर भी मुझे उस से डर नहीं लग रहा था। क्योंकि मैंने जीवन को जिस पूर्णता से जिया था वही उसकी तृप्ति है। हम जीवन को जीते नहीं केवल भय से डर कर भागते रहते है। इसलिए हम उसे जान नहीं सकते। वह तो कितनी सुंदर कोमल मुलायम नींद की तरह है। आप अपने जीवन में देखते नहीं दिन भर थकने के बाद जब श्याम शरीर निष्क्रिय सा हो जाता है उस की उर्जा चूक जाती है। तब हम गहरी नींद में चले जाते है। और सुबह उठते है तो फिर तरो ताजा एक उर्जा से सराबोर होकर। कहां से आई वह उर्जा उस अमृत कुंड से। वही तो मृत्यु है।

रोज मेरी शरीर प्राण शक्ति शून्य होता जा रही थी। परंतु मम्मी-पापा जी एक दो दिन बाद जरूर सुबह मुझे घुमाने ले जाते थे। रास्ते में न जाने कितने ही कुत्ते हो गए थे, उसे पार करना भी कठिन होता जा रहा था। पहले तो अकेला जंगल से आ जाता था।

16-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-16

 (सदमा - उपन्यास) 

बाजार में दोनों कुछ इधर उधर कुछ देर घुमाते रहे, संतरे, कुछ अंगूर और सेब के साथ कुछ सब्जी भी खरीदी। सोनी ने तो सालों बाद बाजार में जाकर ये सब खरीदारी की थी। वह तो बाजार जाना ही बंद कर चूकी थी। उसकी तो सारी इच्छाएं मृत हो चूकी थी। जब की बाजार की खरीदारी भी आदमी के अंदर एक जीवंतता भरती है। एक प्रेम भरती है। चाहे वह आदमी फल ही खरीद रहा हो परंतु उसके मन में अपने परिवार अपने सहयोग का ध्यान होता है। उसके ह्रदय में एक प्रेम होता है, एक अपना पन होता है, जिस के लिए वह खरीदारी कर रहा है। ये भी प्रेम का एक आयाम है, जो सोनी लगभग भूल ही चूकी थी। आज उसे बहुत अच्छा लग रहा था। आज वह खूद एक-एक फल और एक-एक सब्जी आपने हाथों से चून रही थी। और पेंटल को मना कर रही थी। तुम नहीं चून सकते। ये काम औरतों का होता है। देखो आप एक संतरा चून कर दिखाओ। पेंटल ने एक संतरा उठाया तब सोनी ने कहां की ये अंदर से फोका एक दम से खाली ही होगा। क्योंकि इसमें वज़न नहीं है। पेंटल तो उसका मुख देखता रहा गया था। आज सोनी एक सम्पूर्ण औरत लग रही थी। अपने अंदर एक अल्हड़ बाल पन के साथ एक परिपक्वता जो केवल स्त्री में ही पाई जाती है। उसके चेहरे पर एक चटक नूर झर रहा था। जिस के लिए किसी मेकअप की जरूरत नहीं होती।

रविवार, 11 जनवरी 2026

49 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

 पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय -49

जीवन के पंख

इस समय जो मैं जीवन जी रहा था। वह जमीन पर चलता सा तो लगता था, परंतु उसके पंख लगे थे। इतना खूबसूरत जीवन होगा मैंने कभी सोचा भी नहीं था। कितनी खुशियाँ कितनी रमणीयता पूर्णता से इस जीवन में समाई हुई  थी। हर पल, हर दिन मानों कुछ नया लेकर आ रहा था। बदला कुछ भी नहीं था सब पहले की ही तरह से चल रहा था। परंतु संग बदलने से मानो आप किसी उत्तुंग या ऊँचा में प्रवेश कर गये हो। मम्मी-पापा जी के संग साथ रहने के कारण जो मेरे दिन कट रहे थे वो शब्दों में नहीं पिरोए जा सकते। वह

वह दिन सुबह से रात तक कैसे अपने में एक सम्पूर्णता समेटे चल रहे थे। मानो आप आज जो जी लिए है बस अब पूर्ण है कल की जरूरत नहीं है। चाहे अगले पल ही मैं जीवन से मुक्त हो जाऊं। जितना मैं पकड़ छोड़ता जा रहा था, उतना जीवन में रस्सा स्वाद बढ़ रहा था। सुबह उठ कर या तो मम्मी पापा ध्यान करते या घूमने चल देते मैं तो उनकी पूंछ था। पल भर भी उनका साथ नहीं छोड़ता था। उसके बाद पापा जी कम्पयूटर पर बैठ कर कुछ खटर-पटर (टाईप) कर रहे होते या बांसुरी का रियाज कर रहे होते मेरा आसन उनके चरणों में ही होता था। तब हर हाल में अपनी जीवन उर्जा का बहाव हो गया। हर हाल में।

15-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-15

(सदमा - उपन्यास) 

सुबह जल्दी उठ कर वैद्य जी की दवाई का काढ़ा बना कर और उसे ठंडा कर सोम प्रकाश को पिला दिया। और फिर वह बाहर आकर धीरे-धीरे खूद ही घूमने लग गया। और फिर पेंटल ने कपड़े पहने और थैला हाथ में ले कर कहने लगे नानी मैं जा रहा हूं। दोपहर के खाने तक आने की भर पूरी कोशिश करूंगा। अगर देर हो जाये तो तुम दोनों खाना खा लेना। क्योंकि वहां का पता नहीं की कितना समय लग जाये। अगर देखता हूं सोनी के पास टाइम होगा तो काम आसान और जल्दी हो जायेगा। पेंटल के चेहरे पर एक उन्माद था। वह नानी से मिल कर अपनी खुशी को छुपाने की लाख कोशिश कर रहा था परंतु नानी ने उसके चेहरे को देख कर जरा मुसकुराई। मन में तो लड्डू फूट रहे होंगे। मन चाही मुराद मिल गई। हां आप भी मजाक करती हो। हां नानी अगर कोई सब्जी तरकारी लानी हो तो बता दो। कल तो आप बैंगन का भर्ता और रोटी खाने का मन है। तब मैं बैंगन लेता हुआ आऊंगा। देखती हूं पिछली बार तो ये बेचारा थैला खाली ही घूम फिर कर आ गया था। देखते है आज अपने अंदर कुछ ले कर आता है या नहीं। इस बात से पेंटल जरा झेप कर मुसकुराता हुआ चल दिया।

पेंटल अपनी मस्ती में गीत गुनगुनाता हुआ चल दिया। पेड़ पौधों के बीच से होते हुए वह अपनी मंजिल की और जा रहा था। जैसे-जैसे सोनी का मकान नजदीक आ रहा था उसके दिल की धड़कन बढ़ रही थी। कैसे उसका सामना करेगा। अंदर से उसे एक झिझक भी हो रही थी। परंतु मन में एक उमंग एक तड़प भी थी की एक बार फिर सोनी को जी भर कर देख लेगा।

बुधवार, 7 जनवरी 2026

48 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय 48

मम्मी-पापा का पूना जाना

ओशोबा हाऊस का काम पूर्ण होने पर कितना गहन एकांत शुरू हो गया। मैं जिस कोने में भी जाता तो एक अलग ही तरंग मुझे महसूस होती थी। क्या लोगों की भाव तरंग उसके साथ चलती है। फिर मुझे अचानक घर पर कुछ ऐसा लगा जिसे मैं पहले भी महसूस कर चूका था। घर पर फिर समान सूटकेस में सजाया जा रहा था। मेरा दिल तो एक दम बैठा गया कुछ देर के लिए। लेकिन थोड़ी  देर में अपने को मैंने सम्हाल लिया। बाद में पता चला की केवल मम्मी-पापा जी पूना जा रहे है। इस बार मैंने मन से प्रसन्नता होकर उन्हें विदा करने की ठान ली थी। जो गलती मुझ से पिछली बार हुई थी मैं उसे दोहरना नहीं चाहता। चाहे मुझसे वह गलती किसी शक्ति ने करवाई हो चाहे उसे सब ने सही ठहरा दिया हो। परंतु हुआ तो गलत था।  कितने दिन हो गए दोनों को खटते हुए काम की इस मारा-मारी में विश्राम की भी तो जरूरत होती है। जब पिछले साल भी मैंने उन्हें जाने से रोक दिया था। लेकिन अब नहीं रोकूंगा। हां एक बात और सालों से चल रहे ओशोबा हाऊस का काम भी तो अब खत्म हो गया। इसलिए लम्बी छूटी तो मम्मी पापा को चाहिए ये उनका हक है।

मम्मी पापा सुबह जब जा रहे थे। तो मेरे पास आए। मैं थोड़ा उदास था क्योंकि कितना ही कह लूं मम्मी पापा के बिना ये घर एक दम से सब खाली-खाली लगता है। उनके बिना मेरा मन तो नहीं लगेगा, ये सब दर्द मुझे सहना होगा। और पहली जैसी बेवकूफी नहीं करूंगा। पापा जी ने मेरे सर पर हाथ फेरा, मैंने पूंछ हिलाई, कि आप जाओ मैं यहां ठीक रहूंगा आप यहां की फिक्र मत करना मैं यहां सब का ख्याल रखूंगा।

14-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-14

(सदमा - उपन्यास) 

रात का खाना खाने के बाद सब ने प्रोग्राम बनाया की कल सोम प्रकाश को भी उसी वैद्य जी के पास ले कर जाया जाये। दूरी तो कोई खास नहीं थी केवल पाँच-छ: मील की ही थी। परंतु सोम प्रकाश के पैर इतना चल सकेंगे या नहीं कहां नहीं जा सकता। आखिर ये बात तय की गई की कुछ दूर तक चल कर देखा जायेगा अगर सोम प्रकाश को चलने में दिक्कत हुई तो वापस आ जायेंगे। उसका धीरे-धीरे चलना बहुत जरूरी है। फिर एक हफ्ते बाद जब वह ठीक से चल सकेगा तब चलेंगे। सुबह चाय पीने के बाद तीनों वैद्य जी से मिलने के लिए चल दिए। आज सोम प्रकाश की चाल में कुछ फर्क था, वह आराम से चल रहा था। एक हाथ पेंटल ने पकड़ रखा था। नानी इतनी उम्र में भी काफी तंदुरुस्त थी। आधा एक किलोमीटर चलने के बाद जब पेंटल ने सोम प्रकाश को कहां की थके तो नहीं हो। तब सोम प्रकाश न गर्दन हिला कर जवाब दिया नहीं। तब नानी और पेंटल को खुशी हुई। कुछ दूर चलने पर वह तीनों एक पत्थर पर बैठ कर विश्राम करने लगे। हवा में ठंडक थी इसलिये गर्मी लगने का तो सवाल ही नहीं था। उपर से चटक धूप निकल आई थी। और चौथा हरिप्रसाद तो उन मार्ग दर्शक था, जो उनके साथ तो कम ही चलता था। आधा मील या तो आगे या फिर पीछे कानूनी कार्यवाही किन्हीं झाडियों में करता रहता था।

करीब तीन घंटे चलने के बाद वैद्य जी कुटिया नजर आई। बीच में एक लकड़ी का पूल बना रखा था। जिससे उस पार जाना आसान हो जाये। नहीं तो बरसात के दिनों में उस और जाना अति कठिन हो जाता था।

रविवार, 4 जनवरी 2026

47 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय -47

फिर काम शुरू

दीपावली के कुछ दिनों के बाद राम रतन जी फिर काम करने के लिए आ गये। पापा जी तो उनका इंतजार कर ही रहे थे। इस बीच पापा जी न जाने दीदी के साथ बाजार से जाकर कितनी टाईल कि पेटियां ले आये थे। जिससे एक आँगन का कोना भर गया था। शायद मेरे हिसाब से काम ऊपर से ही चालू होना चाहिए। और ठीक ऐसा ही हुआ भी। सबसे पहले ऊपर छत पर जो सुंदर आर्च बनी थी उन पर महरून टाइले लगाई गई। नीचे की क्यारियों में और मोमटी पर तो पहले ही टाईल लगा दी गई थी। सुंदर मोमटी काली सफेद टाईलों से कितनी सुंदर लग रही थी। ठीक उसके बगल में पिरामिड अपने काले वैभव रूप में गर्व से अलग खड़ा दिखाई दे रहा था। बीच कि गैलरी में सफेद झक पाए एक कतार में खड़े कैसे सैनिक भाव दे रहे थे। रंग और डिज़ाइन कितने करीने से तैयार हो रहा थे,  उन पायो या जाली से जब मैं उनमें नीचे भी झांक लेता था और गिरने का कोई डर भी नहीं था। क्योंकि उन पायो में आपस की दूरी बस मेरा मुख ही बहार जाता था गर्दन भी नहीं। सब कितना सुंदर लग रहा था ऊपर से जब मैं नीचे की और देखता तो पेड़ पौधे क्यारियां कितनी सुंदर दिखती थी।

13-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-13

(सदमा - उपन्यास) 

उधर एक तरफ तो शारीरिक तृप्ति का आनंद और दूसरी और उसके मन में चोरी की नानी को क्या जवाब दूंगा। पेंटल उलझा विचारों में डूबा हुआ अपनी मंजिल की और चला जा रहा था। सुबह का सूर्या दूर आसमान में काफी उपर तक चढ़ गया था। जिस खाली थैले को लेकर वह गया था। वहीं अब भी उसके हाथ में वैसे का वैसा ही था। वह मन ही मन सोच रहा था, की नानी को क्या झूठ बोलेगा। दूसरी और सोम प्रकाश की बीमारी की आज उसे खुशी भी थी की कम से कम उसे तो उसको कोई जवाब नहीं देना होगा। आदमी भी कितनी नीचे की सोच रख सकता है। ये विचार उसके मन में आते ही उसे अपने से बहुत घिन्न हो उठी। वह डरा सहमा सा घर की और चला आ रहा था। दूर से देखा तो सोम प्रकाश धूप में एक कुर्सी पर बैठा हुआ दिखाई दिया। पास ही नानी उससे कुछ पूछ रही है। पल भर के लिए पेंटल के पैर ठिठक गए। मानो जमीन ने उन्हें पकड़ लिया हो। परंतु यहां खड़ा भी नहीं रहा जा सकता था। एक अपराध भाव भी मन में था। और जो प्रेम सूख की अनुभूति हुई थी। वह चाह चित को किसी और ही लोक में ले जा रही थी। वहां कोई भय कोई शर्म नहीं थी। वह बस उस में डूब जाना चाहता था। उस समय उसे एकांत चाहिए जहां पर वह अपने उस आनंद सागर में डूब जाये। उस सब से उसे अब नहीं बचना।

पेंटल नानी के पास जा कर खड़ा हो गया। नानी ने एक बार उपर से उसे नीचे तक उसे देखा। नानी की आंखों में क्रोध था, परंतु चेहरा एक दम शांति था। लेकिन ध्यान से देखने पर आंखों में प्रेम बह रहा था। इस तरह का रूप नानी का इससे पहले पेंटल ने पहले कभी नहीं देखा था।

शनिवार, 3 जनवरी 2026

46 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

 पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय -46

जीवन की थकाना

दादा जी की मृत्यु के बाद मेरे मन में एक अजीब सा बदलाव आया। दादा जी की मृत्यु इतने नजदीक से मैंने देखी है, की मुझे लगा ये मेरी ही मृत्यु थी। क्या दादा जी को अपनी मृत्यु का एहसास हो गया था। किस तरह से, क्या मुझे भी अपनी मृत्यु का पूर्व अहसास हो सकेगा। अगर होगा तो क्या मैं उसे अपने जीवन विस्तार पर फैलने दूंगा। क्या मैं उसे इस सरलता से स्वीकार कर सकूंगा। अगर कर सकूं तो मुझे बहुत ही अच्छा लगेगा। मैं अब मृत्यु से नहीं डर रहा था। एक प्रकार से दादा जी की मृत्यु ने मुझे एक साहास दिया है। मैंने कभी सोचा भी नहीं था की दादा जी मृत्यु मुझमें एक नया पन एक नई उमंग एक नया विस्तार दे कर चली जायेगी। जीवन सच ही एक विद्यालय है अगर हम सिखना चाहे तो हर घटना ही एक नये आयाम के पार तुम्हें ले जाती है। चाहे वह दूख हो या सूख। सच दादा जी महान थे। और उनकी मृत्यु ने उनके जीवन संघर्ष को परिपूर्णता से हमारे सामने खोल दिया।

अब मैं अंदर से धीरे-धीरे थक रहा था, बस अब मुझे एकांत बहुत भाने लगा था। या ध्यान का कमरा। इसके अलावा अब जंगल में भी जाने का उतना मन नहीं करता था। क्योंकि अब जंगल में ज्यादा दूर नहीं जा सकता था। वैसे दौड़ नहीं सकता था। जल्दी ही थकान होने लग जाती थी। बच्चे भी अपने काम में इतने संलग्न हो गए थे। की उनके पास अब मेरे लिए समय ही नहीं था। वरूण भैया तो कुछ ही दिनों बाद लखनऊ चले गए। मम्मी पापा दुकान पर ही लगे रहते थे।

12-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-12

(सदमा - उपन्यास) 

धीरे-धीरे तेल और दवा अपना असर दिखा रही थी। नियम से फल खिलाना, उसे नहलाना-धुलाना घुमाना आदि, पेंटल अपने दोस्त के लिए जो कर रहा है। वह कोई अपना सगा भी नहीं करता। बेचारा आया था यहां घूमने के लिए और फंस गया। परंतु उसके चेहरे पर जरा भी थकान नहीं दिखाई देती थी। सच ही अगर पेंटल नहीं आता तो नानी कैसे सोम प्रकाश को सम्हालती उसके लिए सब कितना अधिक कठिन हो जाता। परंतु परमात्मा सब की सुनता है। अब धीरे-धीरे सोम प्रकाश खूद भी सहारा ले कर चलने लग गया था। इससे एक दूसरे आदमी का बंधन खुल जाता है। इतना हुआ है तो परमात्मा और भी सुनेगा। तब एक दिन पेंटल ने कहां की नानी में बाजार जाकर आता हूं। बेटा जल्दी आना। वैसे तो सब है घर पर नाहक परेशान हो रहा है। परंतु आज न जाने क्यों पेंटल के मन में सोनी से मिलने एक इच्छा प्रबल हो रही थी। जबकि वह उसके बारे में कितना कम जानता था। उसका देखना बोलना उसे जरा भी नहीं जंचता था। परंतु ये उर्जा अपना काम करती है। और जिसके अंतस में वासना का धाव हो वहां वह अपना असर जरूर दिखलाती है। परंतु ये मन भी कितना अजीब है, खेल तो यही खेलता है। आपके न चाहते हुए भी वह अपनी चाहता अंदर-अंदर उपजता रहता है।

ज्यादा दूर घर नहीं था पास की चढ़ाई चढ़कर कर तो आप 15-20 मिनट में बड़े आराम से जा सकते है। परंतु अगर आपको सड़क से होते हुए जाना पड़े तो एक घंटा तो लग ही जाता। पेंटल ने हाथ में सामान खरीदने का एक थैला भी ले लिया ताकी उसे एक बहाना मिल जाये। श्याम होने में अभी काफी समय था चार ही बजे थे परंतु शीत के दिनों में दिन बहुत छोटे होते है पाँच बजे तक तो सूर्य दूर पहाड़ियों में जाकर विश्राम करने लग जाता है। पेड़ो पर पक्षियों का अपना नाद चल रहा था। हजारों पेड़-पौधे होने पर भी न जाने सो जाने के लिए ये सब पक्षी आपने कल वाले स्थान के लिए क्यों लड़ते है।

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

11-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-11

(सदमा - उपन्यास) 

कल जब नानी और पेंटल बाते कर रहे थे तो उन बातों से कितने ही मार्ग उन्हें खुलते दिखाई दिये। कल तक तो न जाने क्यों सब द्वारा बंद लग रहे थे। कहीं किसी कोने कातर से एक रोशनी का किरण तक नजर नहीं आ रहा थी। आदमी जब थक जाता है। तो उसका तन ही नहीं थकता उसका मन भी थकता है। नानी तन से तो कमजोर थी। परंतु मन भी उम्र पा कर कमजोर हो जाता है। ज्यादा उम्र ज्यादा तनाव को बर्दाश्त नहीं कर सकती। परंतु पेंटल का तन भी जवान था और मन भी। और वह शहर का रहने वाला पढ़ा लिख था। सो आज रात नानी को बहुत अच्छा लगा मानो दूर कहीं उसकी आस का सूर्य उगने वाला है अभी भले ही वहां तमस का पहरा हो, परंतु एक आस की लालिमा के धब्बे भी फैलने शुरू हो गए थे। धीरे-धीरे ये लालिमा एक दिन चटक रोशन जरूर बन जायेंगे।

एक आस, एक उम्मीद उन दोनों को दिखाई थी। समय भी किस तेजी से गुजरता है पता ही चल रहा था। दूख में समय लम्बा तो हो जाता है परंतु एक समस्वरता में वह कितना छोटा हो जाता है। जब तक उसमें जाकर कोई न जिए या बिना उस पर से गुजरे उसे कभी पहचान नहीं सकता है। वही-वहीं काम रोज करते-करते कब बीस दिन गुजर गए पता ही नहीं चला।

45 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय -45

दादा जी की मृत्यु

मेरे मन में रह-रह कर कुछ अजीब से विचार आ रहे थे। जिन्हें मैं एक लयवदिता में जोड़ना चाहूं तो भी जोड़ नहीं पा रहा था। कुछ टूटे टुकड़ों की तरह जो मानो इधर उधर सब फैले हो। मुझे अंदर से ऐसा लग रहा था की घर में कुछ अशुभ होने वाला है। और ये मेरी बीमारी का नाटक भी मेरी मर्जी के बिना मेरे अचेतन में मुझसे कराया था। ये सब मेरे मन का वहम था या सच ही कुछ अशुभ होने वाला था। ये तो समय की गोद में छुपा था। परंतु अगर हम संवेदन शील है तो हम उनकी एक झलक, उन पद चापो की हल्की सी आहट तो सुनाई दे जाती है। लेकिन इसके लिए आपका सजग होना या संवेदनशील होना आवश्यक होता है। खैर मैं लाचार था मेरे पास शब्द नहीं थे, मैं उसे समझ भी नहीं सका था, और न ही उसकी व्याख्या ही कर सकता था। परंतु कुछ जरूर है जो समय मुझे दिखा रहा है। परंतु न मैं खुद ही उसे समझ पा रहा हूं और न ही उस सब से परिवार को आगाह ही कर पा रहा था।

एक दिन गुजर गया और मुझे थोड़ी राहत मिल, चलो हो सकता है मेरे अंदर की बैचेनी किसी और कारण से हो। या मेरा चित तनाव के बाद शांत हो रहा हो तो ये मार्ग की गति भी हो सकती थी। अब पापा-मम्मी को पूना से रोकने का जो नाटक किया था वह सब भूल गया था।

मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

44 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय -44

मेरा नाटक करना

कुदरत का भी अपना एक काल चक्र होता है। वह खेल रही होती है जरूर, परंतु खेलती सी दिखती बिलकुल नहीं। खेल और खिलाड़ी उसका एक ही है। यहीं तो प्रकृति का रहस्य। दादा जी की तमन्ना थी की अब बच्चे बड़े हो गए है उनकी शादी कर दी जाए। परंतु पापा जी ने कहा की अभी वह पढ़ रहे है उम्र ही कितनी हुई है अभी। वो अपना बोझ तो खुद उठा नहीं रहे उनकी बीबी बच्चों का बोझ भी मेरे ही ऊपर आयेगा। फिर अभी तो मकान भी बन रहा है। इसे पूरा तो हो लेने दो फिर देखते है। परंतु दादा जी अपने जमाने के अनुसार ही तो सोच सकते थे। जैसे उनकी शादी हुई उनके परिवार की शादी हुई परंतु हर युग में समय और स्थिति बदल जाती है। जो आज आप को सही लगता है वह आने वाले समय में हो सकता है ठीक न हो। परंतु हमारा मन इस बात को कहा स्वीकार कर सकता है। क्योंकि वह संस्कार कितने पुराने आपके अंदर दबे हुए है। फिर भी कुछ बात तो जरूर उनकी समझ में आई होगी की सच ही अभी कुछ भी तो नहीं कमा रहे तब बोझ किस पर आयेगा।

परंतु दादा जी अंदर से इस बात को स्वीकार किया या नहीं कह नहीं सकते। लेकिन वह आजकल खुश बहुत ही रहते थे। इतनी उम्र में भी घंटों पूरे घर देखते थे। प्रत्येक कोने को देखते और राम रतन से पूछते कि कल क्या करना है। घंटों ईशाद से या फिर मूर्जी साहब से बाते करते थे। काम की जो गति थी इससे लगता था की ओशोबा हाऊस इस साल तो बन कर तैयार हो ही जायेगा। ये कितनी अच्छी बात थी की दादा जी अपनी आंखों से अपने महल से घर को बनता हुआ देख रहे थे।

10-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-10

(सदमा - उपन्यास) 

उधर ऊटी में पहुंच कर पेंटल ने जब सोम प्रकाश का ये हाल देखा तो उसे यकीन ही नहीं हो रहा था। कि उसे ये सब क्या हो गया। नानी इसे क्या हो गया। वह तो अपने दोस्त को पहचान ही नहीं रहा था। बेटा केवल जिंदा है एक लाश की तरह से बस श्वास ही चल रही है। इसके कोई पुण्य कर्म है जो ये बच गया नहीं तो इस तरह के हादसे के बाद कोई भला बचता है। पर बेटा दिल की बात तुझे कह रही हूं। मैं कल से ही तुझे बहुत याद कर रही थी। की कौन देखेगा अब इस अभागे को। भला किया जो तू आ गया। मेरा शरीर अब इतना बलशाली नहीं रहा की इसे उठा बैठा सकूं। तभी पेंटल ने कहां की नानी पहले तुम थोड़ा गर्म पानी कर के मुझे दे दो, मैं इसकी स्पंजिंग कर के कपड़े पहना देता हूं। मैं इसे बहार धूप में लेकर जाता हूं। नानी के मानो प्राण ही खिल उठे। उसे झट से एक पतीले में गर्म पानी किया और एक तोलिये लाकर पेंटल को दे दिया। और नये धुले कपड़े लाकर वहाँ पास ही रख दिये। पेंटल ने अच्छे से अपने दोस्त का शरीर हाथ पैर साफ किया और शरीर पर पाउडर डाल कर नये कपड़े पहना दिये।

कई दिन से कपड़े भी नहीं बदले थे। अभी भी कहीं-कहीं तो कान आदि के पीछे खून भी जमा था। फिर नानी ने इतनी देर में खाने के लिए खिचड़ी बना दी और पेंटल से पूछा तुम्हारे लिए क्या बनाऊँ बेटा। तब पेंटल ने कहां कोई जरूरत नहीं है। मैं भी इसी में खा लूंगा श्याम को कुछ आपने हाथ का मस्त बनाना अरे वो आलू गोभी जो तुम बनाती हो और उसके साथ पूरी और अचार अभी से मेरे मुख में पानी आ रहा है।

रविवार, 28 दिसंबर 2025

09-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-09

(सदमा - उपन्यास) 

तीन दिन महाबलेश्वर में और सब रुके। और उसके बाद सब घर की और चल दिये। परंतु एक परिवर्तन वह सब देख रहे थे नेहालता में की अब वह चुप रहने लगी थी। जो पहले हमेशा चहकती रहती थी। मचलती रहती थी। वह एक दम से इतनी शांत कैसे हो गई। परंतु चुप रहने पर नेहालता के चेहरे पर एक अजीब सी खुशी एक अजीब सी शांति फैली हुई थी। जिससे लगता है वह स्वस्थ है। परंतु आदमी एक दम से ऐसा बदल जाये तो आप मानो किसी दूसरे आदमी के साथ चल रहे हो। तो कठिन हो जाता है वो सब पूरा जो मन के तल पर जमा था जाना पहचाना था। वह कहां तक साफ किया जा सकता है। हम मन से ही तो जीते है। एक संस्कार को अपने अंग संग लपेटे। और उस मन को ही अधिक महत्व देते है। मन की इच्छाएं उसकी जरूरत या पूर्ति को भरने में ही सारा जीवन खत्म कर देते है। परंतु वह कहां भर पाता है। परंतु जीवन में लगभग ऐसा ही होता है। इस जीवन की लकीर को पहले बार नेहालता ने जान लिया है। इसलिए हिंदु जो कहते है, इस जन्म के कर्म आपके अगले जन्म में संस्कार बन जाते है। वो हमें अगर होश से देखे तो आप पास घटता दिखाई जरूर देगा। क्योंकि एक ही घर में एक ही मां-पिता से पैदा संतान कितनी भिन्न होती है। क्या भेद हुआ उन में कहीं तो, होने से पहले कुछ होना चाहिए। जिसे हिंदु जन्म के संस्कार कहते है।

इसे ही कर्म का सिद्धांत कहा गया है। प्रत्येक मनुष्य एक समान सुविधा पा कर भी एक समान कैसे जी सकता है। आप एक समान प्रत्येक को सो रूपये दे दीजिए। वह सब उस पैसे से भिन्न जीवन जीयेंगे। आपने तो समानता चाही थी। परंतु प्रकृति ये विभेद नहीं करती। वह प्रत्येक जड़ चेतन में भिन्नता चाहती है। एक वृक्ष के करोड़ों पत्ते होने पर भी उनमें भिन्नता होती है। देखने में तो वह समान दिखेंगे परंतु आप जरा बारीक नजर से देखेंगे तो भिन्नता है। प्रकृति केवल निर्माण करती, कोपी नहीं करती।

43 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय -43

काम की गति

आज कल अचानक घर के काम में जो आज गति आई थी, इससे पहले उसे मैंने कभी इतनी तेज नहीं देखी थी। राम रतन दीपावली के कुछ दिन बाद ही आ गए थे। अब मौसम थोड़ा ठंडा और सुहाना भी हो गया था। दिन की धूप में बैठना काफी अच्छा लगता था। और काम भी छत पर ही होता था। इसलिए मैं वहीं पर सोता रहता था। पापा जी की मशीन सारा दिन चलती रहती थी। मैं सोचता था की ये आदमी किस मिट्टी का बना है थकता नहीं, ऐसा था की राम रतन के साथ तो वह काम करते ही थे, उसके अलावा भी देर रात तक टाईल काटते रहते थे। फिर सुबह जल्दी ही शुरू हो जाते थे। पहले मम्मी जी के साथ दुकान पर रात तीन बजे जाते वहां का काम खत्म कर फिर घर आकर टाइलें काटने लग जाते थे। रात तक यहीं काम। तब रात 8 या 9 बजे नहा धोकर कुछ देर विश्राम करते। श्याम के समय दोनों भाइयों में एक दुकान पर चला जाता था। जब वह दुकान से घर आ जाता तब सब बच्चों के साथ बैठ कर खाना खाते। उस समय तक खाना पूरा परिवार एक साथ खाता था। फिर कुछ देर आज कल टीवी. भी देखा जाता था। परंतु पापा जी कम ही देखते थे। क्योंकि उन्हें तो रात तीन बजे फिर उठ जाना होता था। उसके बाद सब अपने-अपने कमरों में सोने चले जाते।

छत पर कितनी सुंदर टाइलें लगाई जा रही थी। पाए एक से एक सुंदर डिज़ाइन के बन रहे थे। दादा भी आज कल छत पर ही आ जाता था। और कभी-कभी वह छत पर ही नहाते थे तब मुझे बहुत डर लगता था की अब मेरा नम्बर आया। क्योंकि दादा जी जब नहाते तो पापा जी उनके शरीर पर साबुन लगते थे। मैं ये सोचता था की न जाने क्यों पापा जी सब को साबुन लगने में इतना मजा आता था।