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शुक्रवार, 27 मार्च 2026

30-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-30

(सदमा - उपन्यास)

नानी का तीन चार कमरों का मकान था। कुछ पुराना जरूर था परंतु बना बहुत सुंदर था। नेहालता ने एक बार नानी की और देखा फिर उनकी और से अस्वस्थ हो कर जानना चाहा की जो व्यक्ति सामने है क्या वहीं सोम प्रकाश है। नानी ने धीरे से गर्दन हिला दी। हाँ बेटी वही है सोम प्रकाश। नानी की आंखों में आंसू थे, न जाने वह खुशी के या सोम प्रकाश की इस हालत के कारण या लड़की का साहस देख कर। नेहालता आगे बढ़ी अब सोम प्रकाश को पास से उसे कुछ नजदीक से देखना चाहती थी। की क्या ये वहीं महान व्यक्ति है, जिसने मुझे नया जीवन दिया है। और आज कितना लाचार हो कर एक कुर्सी पर मूर्तिवत बैठा है। सोम प्रकाश सामने ही एक कुर्सी पर बैठा उसे देख रहा था। उसकी आंखों में एक अंजाना सा भय एक रहस्य साफ दिखाई दे रहा था। न जाने वह कुछ सोच रहा था, या नहीं परंतु उसके चेहरे पर सब भाव एक दम से थिर थे। मानो वह कोई शिला बन गया है। हम पत्थर की मूर्ति में भी उसके चेहरे पर भाव अंकित कर देते है। परंतु सोम प्रकाश का चेहरा एक दम सपाट मैदान सा लग रहा था। क्या कोई मनुष्य बिना विचार के जी सकता है। हम इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते। तब तक आपने किसी निर्विचार को जीवित नहीं देखा होगा। परंतु निर्विचार और विक्षिप्त में दिन रात का फर्क है। जैसे शांत नदी जो चल तो रही है परंतु उपर से खड़ी लग रही है। परंतु एक शांत झील जो मात्र दर्पण बन जाती है। जबकि आप एक विचार भाव हिन चेहरे को देख कर भयभीत हो उठोगे। आप उसका संग साथ नहीं रह सकेंगे।

18-महान शून्य- (THE GREAT NOTHING—का हिंदी अनुवाद)

महान शून्य-(THE GREAT NOTHING—का हिंदी अनुवाद) ओशो

अध्याय -18

06 अक्टूबर 1976 सायं चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

आंतरिक विकास ऐसी चीज़ नहीं है जिसके बारे में आप कुछ कर सकें। ज़्यादा से ज़्यादा आप इसमें बाधा डालना बंद कर सकते हैं, बस इतना ही। सकारात्मक रूप से, कुछ भी नहीं किया जा सकता। लेकिन अगर आप इसमें बाधा डालना बंद कर देते हैं, तो यह अपने आप ही आगे बढ़ता है।

यह ऐसा है जैसे कि एक छोटा सा पौधा है और आप उस पर एक खास दबाव डालते हैं। आप उसकी शाखाओं पर कुछ खास पत्थर लटकाते हैं और उसे एक खास आकार देने की कोशिश करते हैं। आप उसे रोकेंगे क्योंकि प्राकृतिक विकास संभव नहीं होगा। आप बस इतना कर सकते हैं कि आप उसकी शाखाओं पर जो पत्थर लटका रहे हैं उन्हें गिरा दें और उसे कोई आकार देने की कोशिश न करें। उसे अपने तरीके से चलने दें। आप पौधे को पानी दे सकते हैं, आप मिट्टी में खाद डाल सकते हैं, आप पौधे को जानवरों, बच्चों और लोगों से बचा सकते हैं, लेकिन बस इतना ही -- यह सब कुछ है जो एक आदमी कर सकता है। इसलिए विकास कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे आप कर सकते हैं। विकास तब होता है जब आप उसे बाधित नहीं करते।

बुधवार, 25 मार्च 2026

17-महान शून्य- (THE GREAT NOTHING—का हिंदी अनुवाद)


महान शून्य-(THE GREAT NOTHING—का हिंदी अनुवाद) ओशो

अध्याय -17

05 अक्टूबर 1976 सायं चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

देव का अर्थ है दिव्य और विनीत का अर्थ है विनम्रता। विनम्रता आपका काम होगी। और जब मैं विनम्रता कहता हूँ, तो मेरा मतलब वह नहीं है जो इस शब्द का सामान्य अर्थ है। आम तौर पर इसका मतलब है एक ऐसा व्यक्ति जो अपने अहंकार को दबाने की कोशिश करता है, जो अपने अहंकारी मन को नियंत्रित करने की कोशिश करता है, जो कभी भी खुद को मुखर करने की कोशिश नहीं करता - एक गैर-मुखर व्यक्ति। विनम्रता शब्द का यही सामान्य अर्थ है। लेकिन मेरे लिए यह एक तरह का दमन है। आप अहंकार को दबा सकते हैं, लेकिन इसे दबाकर आप कभी भी इससे आगे नहीं बढ़ सकते। इसे दबाकर आप एक नए तरह के अहंकार को विकसित करते हैं जो अधिक जहरीला होता है क्योंकि यह पवित्र लगता है।

जब कोई नया अहंकार पैदा होता है जो कहता है, 'मैं विनम्र हूँ,' तो 'मैं' वहीं रहता है। अब इसने विनम्रता का चोला ओढ़ लिया है, अब यह विनम्रता के पीछे छिप रहा है। अब भेड़िया भेड़ के पीछे छिप रहा है - लेकिन भेड़िया भेड़िया है; भेड़ की खाल से कोई फर्क नहीं पड़ सकता। इसलिए मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि विनम्र अहंकारी बनो या अहंकारी रूप से विनम्र बनो।

29-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-29

(सदमा - उपन्यास)

हाज अपने निर्धारित समय से मद्रास (चेन्नई) पहुंच गया था। नेहा लता ने अपना पर्स और एक हेंडबैग हाथ में उठा लिया और जहाज की सीढ़ियों से उतर कर उस और चल दी जहां पर सभी मुसाफिर बेल्ट से अपने सामान लेने के लिए चले जा रहे थे। जिस की अभी घोषणा हुई थी की कहां पर आपका सामान आने वाला था। सीढ़ियों उतर कर कुछ ही दूरी पर बेल्ट थी जिस पर उसका सामान आ गया और ट्रॉली में ले कर वह बाहर की और चल दी। बाहर अनेक गाड़ी वाले खड़े थे सवारियों का इंतजार कर रहे थे। कुछ लोगों ने नेहा लता को घेर लिया। एक तो उनकी भाषा भी नेहालता को समझ नहीं आ रही थी। फिर भी उसने ऐसा दिखलाया की वह यहां का चप्पा-चप्पा जानती है। सब गाड़ीवान जाने के उससे आग्रह कर रह थे। परंतु जैसे ही उसने ऊटी जाने का नाम लिया तो लगभग सभी वहां के तितर-बितर हो गए। मात्र एक नौजवन ही वहां पर बचा। और वह कहने लगा की मेम साहब वह तो काफी दूर है। और रास्ता भी बहुत कठिन है। कुछ और देर बात कर नेहालता ने उसे वह पता बतलाया की तुम मुझे वहां पहुंचा दो। लड़का देखने में काफी समझदार लग रहा था। आखिर कार मोल भाव कर वह ऊटी जाने के लिए तैयार हो गया। परंतु जो पता नेहालता बतला रही थी वह उस पते के विषय में कुछ अधिक नहीं जानता था। हां वह कितनी ही बार सवारियों को लेकर ऊटी गया था। पर इस पते को वह नहीं जानता। लेकिन वहां जाकर खोजा जा सकता है। भाड़े के साथ समय भी अधिक लग रहा था। सो उसे वहां पहुंचते-पहुंचते श्याम हो जायेगी। तब वह रात को वही रुकेगा। कुछ अधिक पैसे देने से उस नौजवन युवक के चलने की बात बन गई वरना तो और कोई तो गाड़ी वाला जाने को तैयार ही नहीं था।

सोमवार, 23 मार्च 2026

16-महान शून्य- (THE GREAT NOTHING—का हिंदी अनुवाद)

 महान शून्य-(THE GREAT NOTHING—का हिंदी अनुवाद) ओशो

अध्याय -16

04 अक्टूबर 1976 सायं चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

[एक संन्यासी कहता है: मैंने आपको शिविर के दौरान उपचार करने के बारे में एक पत्र लिखा था। (देखें 'अपने रास्ते से हट जाओ' 22 अप्रैल, 1976, जहाँ ओशो उपचार के बारे में बात करते हैं, और ध्यान शिविरों के दौरान उपचार का वर्णन करते हैं।) मुझे पता चला कि यह न केवल दूसरों को दे रहा था, बल्कि इससे मेरी ज़रूरत भी पूरी हुई। यह कहना मुश्किल है।]

मैं समझता हूँ। उपचार एक दोधारी तलवार है। यह उपचार करने वाले और उपचारित होने वाले दोनों की मदद करता है, क्योंकि यह वास्तव में एक अलग स्थान पर जा रहा है जो उपचारात्मक है। जब आप किसी व्यक्ति का उपचार करना शुरू करते हैं, तो आप वास्तव में उस व्यक्ति से प्यार करते हैं, उसके लिए महसूस करते हैं, उसकी देखभाल करते हैं, उसे आशीर्वाद देते हैं। और आशीर्वाद में, दूसरे को आशीर्वाद मिलता है। दूसरे व्यक्ति के लिए महसूस करने में आपकी ऊर्जा बहने लगती है। दूसरे के लिए उस संपूर्ण चिंता में, अहंकार गायब हो जाता है। जिस क्षण अहंकार गायब होता है, आप उपचारकर्ता बन जाते हैं, उससे पहले नहीं। भले ही यह एक पल के लिए गायब हो जाए, उपचार हो जाएगा।

28-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-28

(सदमा - उपन्यास)

धर ये खबर सून कर सोनी बहुत खुश हुई की नेहालता आ रही है। उसने जाते हुए भी पेंटल के मुख से जो सूना था। ये सब बाते जान कर उसे एक उम्मीद थी। की जरूर ये लड़की अपने अंदर एक साहास रखती है। इनमें एक संकल्प है, इतना साहास कम ही व्यक्तियों में पाया जाता है। कौन भला दूसरे की आग में अपना हाथ जलाना चाहेगा। देखना मेरा मन कहता है कि एक दिन ये जरूर अपने लक्ष्य को पा लेगी। जब मन प्रसन्न होता है तो मानव का तन भी कैसा उड़ान भरने लग जाता है। मानो वह आनंद उत्सव के पंखों पर बैठ कर उड़ रहा है। उस लड़की (नेहलता) की तारीफ कर के जब पेंटल उसे फोन पर बता रहे थे तो उसे कोई जलन नहीं हो रही थी। उन दोनों का प्रेम कैसा अनूठा और विचित्र था। न जानते हुए भी एक दूसरे को कितना अधिक जान गए थे। एक ही मिलन में कैसे प्यास बूझ गई थी सोनी की जैसे स्वाती की एक बूंद का इंतजार सागर किनारे वह सीप कर रही थी। की जैसे ही स्वाती की वो बूंद आये और वह पूर्ण हो अपने को तृप्त पाये। और मोती बनने तक नीचे सागर की तलहटी में चली जाये। एक खामोश गहरी नींद में। इसी सब का नाम तृप्ति है जहां होता है केवल मिलन का अनुभव व रसा स्वाद जो उसे गहरे-और गहरे खिंचता ही रहता है। सोनी का मन गुनगुना रहा था.....

जब से साजन मोह अंग लगाया, तन मन की प्यास बुझाई।

आनंद उत्सव आँगन  उतरा,  नव जीवन न ली अंगडाई।

जहाज का टिकट ले कर जितनी देर में नेहालता पहुंचे, उससे कुछ ही देर पहले उनके पिता घर पहुंचे थे। सब ने पहले हाथ मूंह धोकर खाना खाया। फिर सब लोग जब कुछ विश्राम के बाद श्याम को उठे तो सबका मन भारी था। परंतु नेहालता को अपने अंदर कुछ नया पन लग रहा था। कि वह किसी अंजाने पथ पर जा रही है। जहां आपका अपना जानने वाला कोई नहीं है, आप उस परिवार का एक सदस्य बनने जा रही हो बिना किसी नाते रिश्ते के। जिसे उसके माता पिता से स्वीकार किया है। ये उनके लिए बहुत बड़ी बात है।

शनिवार, 21 मार्च 2026

27-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-27

(सदमा - उपन्यास)

सुबह जल्दी उठ कर चाय पीने के बाद ही नेहालता ने कुछ कपड़े जो अपने साथ ले जाने थे। उन्हें अलमारी से निकल कर पलंग पर रखना शुरू कर दिया। साथ में गिरधारी काका भी मदद कर रहे थे। बेटी तुम जो ये कार्य करने जा रही हो ये बहुत ही पुण्य का कार्य है। देखों बेटी मैं अनपढ़ जरूर हूं, परंतु मेरी एक बात को अपने ह्रदय में बाँध लो, तुम्हारे ठीक होने में उस व्यक्ति का उतना ही हाथ है जितना की परमात्मा का। असल में परमात्मा उस व्यक्ति के माध्यम बनाया, तुझे ठीक करने के उस आदमी को चुना होगा। मैंने उस देव पुरूष को देखा तो नहीं। तुमने तो उसे देखा है क्या कुछ बाते तुम्हें वहां की उसकी याद है, या सब भूल गई। नेहालता ने कहा की काका, धीरे-धीरे कुछ झलकियां याद आ रही है। जैसे वह स्टेशन पर बंदर की तरह से खेल दिखा रहा था। शायद मेरा ध्यान अपनी और खिंचने के लिए। परंतु मैं नहीं समझ पाई। वही खेल मैं उसके साथ जैसे खेल रही हूं। परंतु पूरी तरह से साफ नहीं हो पा रहा है।

एक बात बेटा ये तुम्हारे लिए भी उतना ही उपयोगी होगा जितना की उस व्यक्ति के लिए हो सकता है। क्योंकि बीच में तुम्हारी भी तो कुछ याद दाश्त गायब हो गई है। ये मनुष्य के विकास में बाधा भी बन सकती है। जैसे मकान अगर बीच में से कमजोर हो तो उसके कभी भी गिरने की संभावना होती है।

15-महान शून्य- (THE GREAT NOTHING—का हिंदी अनुवाद)

महान शून्य-(THE GREAT NOTHING—का हिंदी अनुवाद) ओशो

अध्याय -15

3 अक्टूबर 1976 अपराह्न, चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

[एक संन्यासिन ने कहा कि वह पश्चिम वापस चली गयी क्योंकि उसके पचपन वर्षीय पिता कैंसर से मर रहे थे।]

बहुत बूढ़ा नहीं... लेकिन मौत बूढ़े और जवान में कोई फर्क नहीं करती। जब भी उसे आना होता है, वह आती है। हम मौत के सामने असहाय हैं, और यही असहायता सभी धर्मों का मूल स्रोत रही है। अगर मृत्यु को नष्ट किया जा सके, तो धरती से सभी धर्म गायब हो जाएंगे। मृत्यु ईश्वर की ओर से एक चेतावनी है कि जीवन को बहुत गंभीरता से न लें; यह क्षणिक है और इसे जाना ही है। इसलिए इधर-उधर खेलें लेकिन इसे बहुत गंभीरता से न लें, क्योंकि मृत्यु आएगी और जीवन से आपने जो कुछ भी बनाया है, उसे नष्ट कर देगी। केवल ध्यान ही मृत्यु से नष्ट नहीं हो सकता। दुनिया में केवल यही एक चीज है जो दुनिया की नहीं है और परे है।

इसलिए रोओ मत और अपने पिता के लिए दुख मत महसूस करो, क्योंकि चाहे कोई पचपन साल में मरे या नब्बे साल में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। किसी का सपना थोड़ा छोटा होता है और किसी का सपना थोड़ा लंबा होता है, लेकिन सपना तो सपना ही है! अंतिम विश्लेषण में सपने की लंबाई मायने नहीं रखती। अंतिम हिसाब-किताब में, आप कितने लंबे सपने देखते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। पचपन, नब्बे या पांच सौ साल तक कोई जी सकता है, लेकिन जब भी मौत आती है तो सब नष्ट हो जाता है। यह ऐसा ही है जैसे सुबह जब आप उठते हैं तो पूरी रात और सपनों की दुनिया बस अर्थहीन हो जाती है - उसका सारा अर्थ खो जाता है।

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

26-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-26

(सदमा - उपन्यास)

 रात खाने के बाद जब सब आँगन में बैठ कर बात करने के लिए आये तो सब के हाथ में काफी के मग थे। श्रीमति मल्होत्रा जी अधिक काफी नहीं पीती थी। इसलिए वह एक कप दूध ही ले लेती थी। तब तीनों में चर्चा शुरू हुई तब सबसे पहले श्रीमति मल्होत्रा न पूछा की ये बात जो तुम हमें बतला रही हो तुम्हें किस आदमी ने कही है। परंतु तुम क्या जानती हो की यह बात सच है या नहीं। जिस आदमी ने ये बात तुम्हें कही है क्या तुम पहले से उसे जानती हो। क्या पहले हमें एक बार वहां जाकर देख लेना नहीं चाहिए। हां मां आपकी बात ठीक है। परंतु इस व्यक्ति ने मुझे जो फोटो ग्राफ दिखाये है जिसमें मैं उस व्यक्ति के साथ बैठी हूं खेल रही हूं खा रही हूं। उससे तो कुछ भी गलत नहीं लग रहा। फिर समय के साथ मैं उन धूधंली यादों को अब धीरे-धीरे चिंहित करने लगी हूं। मेरे अचेतन से चेतन पर वह सब याद धीरे-धीर एक परछाई की तरह से बाहर आ रहा है। मैं साफ तोर पर तो उन्हें नहीं देख रही हूं परंतु मेरे अचेतन उन्हें जानता सा लगता है। कि मैं कैसे वहां पर रहती थी। कैसे मेरी कोई देख भाल करता था। और मेरे बारे जो बात इस व्यक्ति ने बतलाई वह तो आप भी नहीं जानते है। कि कैसे में उस नर्सिग होम से गायब हुई और कहां गई। और ये आदमी उस सब का साक्षी है। और ये मेरे कॉलिज का दोस्त भी तो है। इसे तो में दस साल से जानती हू। बहुत भला आदमी है।

14-महान शून्य- (THE GREAT NOTHING—का हिंदी अनुवाद)

महान शून्य-(THE GREAT NOTHING—का हिंदी अनुवाद) ओशो

अध्याय -14

02 अक्टूबर 1976 अपराह्न, चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

देव का अर्थ है दिव्य और प्रसादम का अर्थ है उपहार, दिव्य उपहार। और व्यक्ति को अपने जीवन को दिव्य उपहार के रूप में समझना सीखना चाहिए। यह बहुत मूल्यवान है और इसे बर्बाद नहीं करना चाहिए। चूँकि यह मुफ़्त में दिया गया है इसलिए हमें इसे बर्बाद नहीं करना चाहिए। यह मुफ़्त में दिया गया है क्योंकि यह मूल्य से परे है - लेकिन आम तौर पर लोग इसे मूल्यहीन समझते हैं, जैसे कि इसका कोई मूल्य ही नहीं है। यह मूल्य से परे है। यह मूल्य से परे है।

इसलिए प्रत्येक क्षण को ईश्वर को समर्पित एक महान भेंट में बदलना होगा। चूंकि उसने आपको जीवन दिया है, इसलिए आपको उसका उत्तर देना होगा। वह उत्तर प्रार्थना है। जब आप यह समझने लगते हैं कि यह जीवन कितना मूल्यवान है, और ईश्वर ने आपको जीवन देकर, आपमें प्राण फूंककर इतना प्रेम दिखाया है, तो आप उसके प्रेम के प्रति उत्तर देना शुरू कर देते हैं। वह उत्तर प्रार्थना है। यह हमेशा तब आता है जब व्यक्ति को लगता है कि वह एक उपहार है... कि ईश्वर ने उसे बहुत बड़ा वरदान दिया है।

गुरुवार, 19 मार्च 2026

25-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-25

(सदमा - उपन्यास)

र पहुंचते-पहुंचते नेहालता को रात हो गई। माता पिता दोनों ही उस की फिक्र कर रहे थे। और दोनो बड़ी बेसब्री से नेहालता का इंतजार कर रहे थे। नेहालता को आया देख कर दोनों ने चेन की सांस ली। बेटी बहुत देर कर दी और ड्राइवर को भी वापस भेज दिया था। क्यों उसे साथ रखती तो अच्छा होता। नहीं मां ये बात नहीं है। असल में हमें एलिफेंटा की गुफाएं देखने के लिए जाना था। सो ये बेचारा नाहक पाँच छह घंटे के लिए वह खड़ा-खड़ा सूखता इसलिए मैंने इसे भेज दिया था। आप नाहक फिक्र कर रही थी। अब कोई में गाड़ी थोड़ा ही चला रही थी। फिर मां आप इतनी चिंता नाहक करती हो। गिरधारी लाला को आवाज दे कर कहा की मैं नहाने के लिए जा रही हूं बाद में एक कप चाय बना कर रखना आज सारा दिन घूम-घूम कर थक गई। मां आपने भी देखी होगी एलिफेंटा की गुफाएं तो जरूर। मां ने कहां अब हमारे बस की कहां है। मैं तो तेरे पैदा होने के बाद एक बार गई थी तब तू करीब तीन साल की थी। लो बाबा मैं तो इतना थक गई थी की घर पकड़ना कठिन हो गया था।

बुधवार, 18 मार्च 2026

24-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-24

(सदमा - उपन्यास)

पेंटल—ने कहना शुरू किया की जो मैं कह रहा हूं उस के लिए अगर मुझ से कुछ गलत हो जाये तो केवल मेरे दोस्त के प्रति मेरा मोह समझ कर माफ करना होगा। तब मैं आप से आगे निवेदन कर सकता हूं—नेहा लता ने हां में गर्दन हिलाई। तब फिर पेंटल ने कहना शुरू किया पहले तो आपका संग साथ चाहिए मेरे दोस्त को। जो थोड़ा आपके लिए और आपके परिवार के लिए कठिन होगा। आप जवान हो और मेरा दोस्त चाहे बीमार है परंतु है तो जवान फिर दूसरा आपका उससे रिश्ता-नाता ही क्या है। अगर आप किसी तरह से अपने माता-पिता को मना भी लो तो इस बात के लिए फिर समाज में भी एक अड़चन है। अब मैं और क्या कह सकता हूं।

परंतु वैद्य ने आपके दोस्त की बीमारी के विषय में भी विस्तार से चर्चा हुई थी। तब वह क्या कह रहे थे। वे कह रहे थे कि क्या आपको लगता है कि वह लड़की (नेहालता) मेरी दवाई के कारण ठीक हुई है। देखने में ये सच लगता है। परंतु ये संपूर्ण सत्य नहीं है। ये तो ऊँट को बैठने के लिए तिनके का सहारा मात्र था। उसे तो बैठना ही था आज नहीं बैठता तो एक महीने बाद बैठ जाता। परंतु इसका असली कारण है प्रेम, विश्वास और अपनापन। वह जो आप और मेरे दोस्त के बीच घटा। वहीं से बीमारी का अंत शुरू हो गया। आप को एक विश्वास एक प्रेम एक व्यक्ति पर भरोसा हो गया। आपने अपने को उस व्यक्ति पर संपूर्णता से छोड़ दिया। आपने अंजाने में अपने ह्रदय के द्वारा खोल दिया और उर्जा ने अपना काम शुरू कर दिया। जैसे इसका इलाज या तो ध्यान था या प्रेम है दोनो के एक ही रूप। खेर जो हुआ वह अति सुंदर था।

शनिवार, 14 मार्च 2026

23-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-23

(सदमा - उपन्यास)

गले दिन नेहालता ने पेंटल को दफ्तर में फोन किया। पेंटल खुद भी नेहालता के फोन का बड़ी बेसबरी से इंतजार कर रहा था। क्योंकि उसके दोस्त का एक-एक दिन बहुत कठिनाई से गुजर रहा होगा। नेहालता ने कहां की पेंटल जी हमें जल्दी मिलना चाहिए। आप के पास तो इतवार का ही दिन होगा। और आज तो मंगलवार हुआ है। फिर भी बीच में समय नहीं मिल पायेगा क्या। उधर पेंटल ने अपनी मजबूरी बतलाई की पहले ही मैं बहुत छुट्टी कर चूका हूं, हम क्यों ने रविवार को मिलते है। एक तो हमें अधिक समय चाहिए फिर कोई ऐसा एकांत स्थान भी होना चाहिए,  जिस में हम पूरी तरह से बातों को विस्तार से एक दूसरे को समझा और समझ सके। तब दोनों ने मिल कर एक निर्णय लिया की हम रविवार के दिन नौ बजे मिलते है। ‘’गेट वे ऑफ इण्डिया’’ नेहालता ने पूछा की वहां तो बहुत अधिक भीड़ रहेगी और धूप भी बहुत तेज होगी तब वहां एकांत कहां होगा जब पेंटल ने कहां की वहां से हम स्टिमर में बैठ कर दूर एकांत अलीफैन्टा की गुफाओं में चलेगे सार दिन अपना होगा। और वहां पर एकांत भी खूब होगा।

ये बात नेहालता को भी जमी और प्रोग्राम बन गया की वह 9-30 और 10 बजे के बीच में ‘’गेट वे ऑफ इण्डिया’’ पर मिलते है। पेंटल तो सुबह ही अपनी चाय आदि पीकर लोकल में बैठ कर छत्रपति शिवाजी महाराज स्टेशन के लिए कुछ जल्दी ही पहुंच गया। उसके पास तो रेलवे का पास भी था।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

22-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-22

(सदमा - उपन्यास)

नेहालता ने घर पहुंच कर अपने माता-पिता से पेंटल का परिचय कराया की ये हमारे ही कालेज में हमारे साथ पढ़ते थे। परंतु ये हमारे सीनियर थे दो कक्षा आगे, पढ़ाई में हमारे कॉलेज में सबसे अच्छे विद्यार्थी थे। आज अचानक गली के मोड़ पर जाते हुए मिल गये। तो इन्हें घर ले आई। और सूनो गिरधारी लाल जी आज मेहमान आये है हमारे घर। इनके लिए कुछ खास बनाओ या इन से पूछ लो की इन्हें क्या पसंद है। तब पेंटल ने कहा जो भी मिलेगा वह प्रसाद स्वरूप ही होगा। नेहालता ने कहां की ये हमारे काका गिरधारी लाल खान बहुत ही अच्छा बनाते है। कहो तो तब तक एक चाय हो जाये। और गिरधारी को चाय के लिए बोल दिया और दोनों ड्राइंग रूम में बैठ गये। मां-पिता भी पास थे इसलिए वे कुछ बात नहीं कर पा रहे थे। वो जो उन्होंने बात करनी थी उसके लिए तो एकांत और निजता चाहिए। चलों फिर समय निकाल कर मिला जायेगा।

सोमवार, 26 जनवरी 2026

21-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा


 अध्याय-21

(सदमा - उपन्यास)
 

अगले हफ्ते किसी काम के कारण वह नेहालता को ढूंढने के लिए जा नहीं सका। रोज-रोज समय गुजर रहा था, यह वह जानता था। ये सब उसके दोस्त के लिए एक-एक दिन कितना भारी होता जा रहा होगा। परंतु उसकी और से पूरी तो कोशिश कि ही जा रहा है, तब से वह मुम्बई आया है। वहां पर उसका दोस्त किस हालत में होगा इस बात का पता उसे चलता रहता था। क्योंकि वह बीच-बीच में सोनी से फोन पर बात कर सब हाल चाल पता कर लेता था। वहां से सोनी उसको सोम प्रकाश की प्रगति के विषय में बताती रहती थी। उस दिन जो उसके साथ मंदिर में घटा था उसका हालचाल भी उसने सोनी को बतलाया कि वह लड़की शायद मैंने मंदिर में देखी थी। परंतु इस विषय में पक्का तो नहीं कहां जा सकता। लेकिन मुझे लग रहा है था कि ये वहीं है। क्योंकि कोठे पर जब मैंने पहली बार उसे देखा था। तब वह और तरह का परिधान पहने हुए थी और चेहरे पर मेकअप भी अधिक था। एक खास किस्म की विकृति एक भय, एक तनाव वह अपने चेहरे पर लिए हुई थी। फिर मैंने उसे उस समय खास होश से या ध्यान से भी नहीं देखा था। अब जैसे ही में उसका पीछा करने के लिए मंदिर के बाहर आया अचानक न जाने वह कहां गायब हो गई। लाख खोजने पर भी मुझे कहीं दिखाई नहीं दी। परंतु सोनी न जाने क्यों ऐसा लगता है जब मैं उससे अपने दोस्त के बारे में बात करूंगा तो उसकी संवेदना, उसकी भावुकता उसके स्नेह को जगा सकता हूं। ये सब मैंने तेरे संग साथ के प्रेम से सीखा है। न जाने क्यों मुझे ऐसा विश्वास हो गया है। अगर तुम भी आज यहां मेरे साथ होती तो कितना अच्छा होता।

शनिवार, 24 जनवरी 2026

20-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-20

(सदमा - उपन्यास) 

आज पेंटल ने निर्णय लिया की कितनी दिन से टाल रहा हूं परंतु आज तो वहां जाना ही होगा। जो भी हो उसे एक बार आज नेहालता से मिलना ही होगा। सो उसने वहां का पता एक कागज पर लिख लिया और उस दिन कुछ जल्दी ही उठ कर घर से निकल गया। क्योंकि कम से कम दो तीन घंटे का सफर तो था ही। फिर उसके बाद उस पते को ढूंढना भी था। उस इलाके में पहुंचते-पहुंचते सूर्य सर पर आ गया था। काफी पूछने और ढूंढने से उस घर का पता चला। परंतु शहर में रहने वालों की ये बीमारी है की वे अपने पड़ोसी को भी नहीं जानते। वे केवल अपनी दुनियां में इतना मस्त रहते है। सामने क्या हो रहा है किसी को पता नहीं चलता। गांव देहात में आप नाम से ही पता लगा सकते हो। देखने में नेहालता का मकान काफी बड़ा लग रहा था। पैसे वाले आदमी दिखाई दे रहे थे। अब एक दम से अंदर भी नहीं जाया जा सकता है। अब क्या बात की जाये ओर किस से यही पेंटल सोच रहा था। कि जब नेहालता से मिलेगा तो सीधी बीमारी की बात करना भी गलत होगा। अब तक वह उस गली के दो तीन चक्कर लगा चूका परंतु उसे कोई मार्ग नहीं सूझा। गली के एक कोने में एक फल सब्जी वाला खड़ा उसे दिखाई दिया। पेंटल ने उससे बात करने की गर्ज से चार केले खरीद लिए। जब की केले उसे कभी खाने अच्छे नहीं लगते थे। केले ले कर पास ही नाली पर बनी एक छोटी सी पुलिया थी। वहां पर कुछ छांव भी थी। इसलिए वह उस पर बैठ कर उन्हें खाने लगा। सामने ही एक तालाब साफ सुथरा बड़ा सा दिखाई दे रहा था। और उसके दाएं कौन पर एक बड़ा सा मंदिर था। जिसमें इक्का दुकान ही आदमी आता जाता दिखाई दे रहा है।

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

यादें और जीवन का बहा-मनसा-मोहनी

 यादें और जीवन का बहा-


जीवन को अगर हम देखे तो वह यादों का एक बहाव ही पाओगे। परंतु कुछ मील के पत्थर हमारे पूरे जीवन की दशा को प्रतिवर्तन कर देते है। ऐसी ही एक याद आज की यानि की 23 जनवरी 1979 जो आज से 47 साल पहले घटी थी। कैसा मधुर उन्माद आज भी मन के आंगन में गुदगुदाहट सी होने लग जाती है। जब जीवन के उन क्षणों को याद कर रहा हूं। वैसे तो हमारे जीवन की जिसने हमारे जीवन को ये मार्ग दिया या आज जहां हम खड़े है। उसकी भिन्न-भिन्न यादें है। या तिथि है। क्योंकि एक महा बाद यानि 26 फरवरी को 1976 को हम और मोहनी मिले थे। यानि अब करीब 50 साल का हमारा साथ हो रहा है। और यही साथ हमें ओशो के मार्ग पर लेकर गया है। शायद मैं भी इस मार्ग पर अकेला नहीं चल सकता था। और न ही मोहनी ही। परंतु जब दोनों ही अधूरे थे तो ओशो के मार्ग पर चल कर हम एक पूर्ण हुए। और दोनों ने जैसे जीवन के दक्षिणायन की यात्रा एक साथ शुरू की उसी तरह से जीवन का उत्तरायण पर भी एक साथ चले। यानि 23 जनवरी 1994 को पूना से एक ही दिन सन्यास लिया।

मंगलवार, 20 जनवरी 2026

19-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-19

(सदमा - उपन्यास) 

गाड़ी समय से एक दम दादर स्टेशन पर रूकी। उसके पास कोई अधिक सामान तो था नहीं के अच्छी बुरी यादें ही थी। जिनका वज़न न के बराबर था। बस एक ह्रदय में दर्द था। की अगर वह कुछ दिन और रूक सकता तो कितना ही अच्छा होता। परंतु  वह क्या कर सकता था, पहले ही वह इतनी अधिक छुट्टी कर चूका है अब और की गुंजाइश नहीं थी। देखो अब कितने दिनों में समय निकाल कर वह उस लड़की का पता ठिकाना ढूंढ पता है। आसमान पर अभी सूर्य का उदय नहीं हुआ था। परंतु उसकी लालिमा ने सारे अंबर को लाल रंग दिया था। स्टेशन पर अधिक भीड़ नहीं थी बस कुछ पक्षियों के मधुर नाद गुंज रहे थे। दूर स्टेशन से घोषणा हो रही है की कौन सी गाड़ी किस स्टेशन पर आई है और कितनी देर रुकेगी। कितने दिनों बाद उसने अपनी मात्र भूमि पर पैर रखा है। कितनी अंजानी ही बन जाती है ये पृथ्वी ये जगह आप इससे कुछ देर के लिए अलग हो कर जब वापस आते हो। कैसे अजनबी जैसा व्यवहार करती है। तो जब हम एक मनुष्य से भी काफी दिनों बात मिलते है तब वहां भी तो कैसा अनबोला सा व्यवहार बीच में आ कर खड़ा हो जाता है। अपने घर की वह सड़क ले लो या वह दरवाजा जिस को आपने हजारों बार छू-पकड़ कर खोला है। वह भी जब आप इतने दिनों में आते हो तो कैसा पराया-पराया सा लगता है। मानो अब वह भी आप से रूठ गया है।

52 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय 52

यात्रा का अंतिम छंद

ये घटना कर्म जो चल रहा था। इसे मैं रोक देना चाहता था। कम से कम बहार का रूक जाये तो अंदर और अधिक ठहराव से बैठा जा सकता है। पानी पीने के बाद मैं अंदर जाकर लेट गया। पापा जी ने ऐ. सी. चला दिया। ठंडी हवा के कारण मेरी आँख लग गई। शायद शरीर को कुछ विश्राम मिल गया। पता नहीं कितनी देर बाद मैं उठा और इसके बाद मैं आँगन में ही जाकर बैठ गया जैसे किसी का इंतजार कर रहा हूं। कुछ मेरी समझ में नहीं आ रहा था। एक प्रकार का उसे नशा कहूं या बेहोशी वह मुझ पर चढ़ता जा रहा था। कुछ देर बाद उठ कर मैं नीचे जो कच्ची क्यारी थी उस के अंदर घूस कर मैंने बाथरूम किया। अब ऊपर चढ़ना मेरे लिए थोड़ा कठिन था। श्याम को भी सब मिन्नत कर रहे थे की कुछ खा ले परंतु अंदर कुछ जा ही नहीं रहा था। आज पाँच-छ: दिन हो गए थे। केवल पानी या थोड़े दूध को ही पीकर जी रहा था। पापा जी एक दवाई लेकर आए इंजेक्शन भर कर मेरे आधे खुले मुख से वह धीरे-धीरे डालते रहे। शायद कोई ताकत की दवाई होगी। कुछ अंदर गई बाकी पूरा मुख न खुलने की वजह से बाहर ही गिर गई। उसके बाद मैं पास रखे अपने मग्गे से थोड़ा पानी पिया।

शनिवार, 17 जनवरी 2026

18-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-18

 (सदमा - उपन्यास)

आखिरकार पेंटल के लिए वह समय आ ही गया, जब ऊटी को छोड़ने कर जा रहा है। आते हुए किसी नये प्रदेश में मन कैसा होता है। कितना अ-चिन्हित अपरिचित सा एक खोया-खोया सहमा सा। कितना अकेला पर घेरे रहता है आपको। और जब आप वहां से जा रहे होते तो मन कैसा अपना पन चारों और फैला लेता है। उसे लग रहा था कि इस स्टेशन पर पहली बार इस तरह से जा रहा है। पेंटल यहां से जा तो है परंतु अंदर एक पूर्णता को भरा कर, परंतु बहार उसे सब खाली-खाली सा लग रहा है। ये मनुष्य की कैसी बैचेनी है। वह कभी पूर्ण नहीं हो पाता। आज अगर उसका दोस्त सही होता तो वह उसके साथ कैसे-कैसे मजाक बनाता। की उसका जीना कठिन हो उठता। कई बार अपनों का लड़ना झगड़ना भी न मिले तो मन को कितना खलता है। यहां आकर उसे जो मिला वह अमूल्य था। उसके दोस्त की बीमारी ने उसके मन को झकझोर दिया था। उसे एक पल तो समझ नहीं आ रहा था की ये सब क्या और कैसे हो गया। संवेदनशील मनुष्य के जीवन एक तलवार की धार की तरह से होता है। उसका जीवन एक नाजुक पुष्प के समान है। उसे जरा सा भी धक्का लगा नहीं की वह कुम्हला जायेगा।

परंतु अब एक उम्मीद थी। उसके ठीक होने की। वह रेल गाड़ी के डिब्बे में अपनी सीट पर वह बैठ गया था। उसे अंदर से किसी का इंतजार नहीं था। वह अकेला ही अपने विचारों में खोया हुआ था। वह नहीं जानता था। की इसी जगह उसके दोस्त के साथ वह सब हादसा हुआ जो उसके जीवन को पूर्णता बदल गया। क्या वह लड़की उसकी बात का विश्वास करेगी। क्या उसे अपने जीवन की वो घटनाएं जो यहां

51 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

 पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय 51

प्रेम यात्रा का सोपान

प्रेम भी एक पूर्णता एक परिपक्वता चाहता है, जिस प्रेम को हम जानते और देखते है वह प्रेम नहीं वह तो मात्र हमारी एक जरूर है। सही मायने में यह एक दूसरे का शोषण है। प्रेम को जानने के लिए मानव नहीं आपको अति मानव बनना होता है। मैं अति मानव तो नहीं बन पाया परंतु कुछ ऐसे लोगों का संग साथ अवश्य किया जो प्रेम को जानते थे उस पीते थे उसमें जीते थे। वह स्थान प्रेम का एक सरोवर था, जहां उसे पिया ही नहीं जीया जा सकता था, और उसमें डूबा भी जा सकता था। उस सरोवर का नाम था ‘ओशोबा हाऊस’। सच अगर आपने जीवन में ध्यान को नहीं जाना तो आपके जीवन कुछ भी सार्थक नहीं है। कुछ लोग इसे ध्यान कहते है मैं इसे प्रेम कहता हूं। क्योंकि ध्यान मेरे लिए सहज और सरल है। जो आज के मनुष्य के अति कठिन है। मेरे शरीर और योनि के हिसाब से प्रेम अति कठिन है। कितना विरोधाभास लगता है। परंतु सत्य यही है। प्रेम की यात्रा ध्यान के मानसरोवर से शुरू होती है लेकिन कोई मेरे जैसा भाग्यशाली भी है जो बिना मनुष्य रूपी मानसरोवर को प्राप्त किए उस में डूब सकता है। मैं ही नहीं शायद अब मेरे और भाई अनेक होंगे।

मुझे इस बात की अति खुशी है, की ये सब हो रहा है मानव के विकास के कारण, आज भी मानव में ऐसी जाति है, जो पशुओं को केवल अपना अहार समझती है। लेकिन ऐसा तो हमेशा से होता चला आ रहा है। परंतु आटा चाहे कितना ही हो परंतु चुटकी भर नमक भी उसके सुस्वाद को दोगुना कर जाता है। वही मानव इस पृथ्वी के नमक है। अब मेरे पास समय कम है, ये मैं जानता हूं, मुझे अपने दीपक से रिश्ते तेल का पता है, वह कितने दिन या हो सकता घंटे तक और उजियारा देगा।

गुरुवार, 15 जनवरी 2026

17-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-17

 (सदमा - उपन्यास)

सोनी ने घर पहुंच कर ड्राइवर को कहां की गाड़ी को गैराज में पार्क कर दो और अपने कमरे में जाकर लेट गई। इतनी देर में नौकर आया की मालिक साहब तबीयत तो खराब नहीं है आपकी,  कहो तो सर दर्द की गोली लेकर आऊं। तब सोनी हंसी, की नहीं रे, राम लाला। मैं एक दम से ठीक हूं बस थोड़ा थक गई थी। इसलिए थोड़ा सा आराम करने का मन है   बस। मेरे लिए श्याम की चाय भी मत बनाना। मैं खाना खाकर आई हूं नानी के घर से। और वह करवट बदल कर लेट गई। ऐसे मधुर शब्द मालिक साहब के सालों बाद सुनने को मिले है। इसलिए राम लाल मन ही मन अति प्रसन्न था। जो मेहमान चार पाँच दिन पहले घर आया था। क्या ये सब उसकी संग सोहबत का प्रभाव दिख रहा था? कुछ भी हो मालिक जैसी पहले दिखती थी। सब चाहते है, वह अपने उसी जीवन की पटरी पर आ जाये। क्योंकि जिस मार्ग पर मालिक साहब चल रही है। इसका अंत तो मौत है, इस तरह के टकराव और तनाव में क्या कोई भी व्यक्ति साधारण तरह से मंजिल की और जा सकता है।

सोनी देर श्याम को उठी और तब राम लाला को कहां की एक कप चाय तो पिला दो। तब राम लाला ने कहां की आपका मेहमान आया हुआ है। कितनी देर से वह आपका इंतजार कर रहा है। मैंने लाख कहां की आपको जगा दूं परंतु मुझे मना कर दिया की नहीं वह थकी है कितने दिनों में इतनी गहरी नींद सोई है। आप नींद की और विश्राम की कद्र करो।