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बुधवार, 29 अप्रैल 2026

47-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-47

(सदमा - उपन्यास)

नेहा लता के माता पिता को ऊटी तक पहुंचे-पहुंचे दिन के चार बज गए। तब उन्होंने शहर के होटल में कमरा ले लिया। पेंटल ने श्री जे. के. मल्होत्रा जी को कहा अगर आप कहे तो मैं तो अब सोम प्रकाश के पास चला जाता हूं, उन्हें हमारे आने खबर भी हो जायेगी। तब श्री जे. के. मल्होत्रा ने कहां की नहीं रहने दो इतना तो थक कर आये हो हजारों मील चलकर अब नाहक परेशान होगे। आप हमारे साथ वाले कमरे में ही रहो। तब उन्होंने दो कमरे बूक कर लिए। पेंटल ने कहां की एक काम तो कर लेते है। सोम प्रकाश को तो सूचना नहीं दे सकते परंतु सोनी को तो दी ही जा सकता है। तब श्री जे. के. मल्होत्रा ने रिसेप्शन को एक नम्बर दिया की आप उन्हें एक फोन करना है। रिसेप्शन पर बैठ बाय ने फोन मिला वहाँ से किसी पुरूष की आवाज आई और बाय ने कहां की बम्बई से कोई आप से बात करना चाहता है। ये सोनी के पति थे श्री देवधर करकरे जी। नमस्कार आदि होने पर श्री जे. के. मल्होत्रा ने कहां की मैं नेहा लता का पिता बोल रहा हूं। हम यहां ऊटी पहुंच गए है। और एक होटल ब्लू रोज में कमरा भी ले लिया है। आप कृपा कर सुबह सोम प्रकाश और नेहा लता को संदेश पहुंचा देंगे। तब श्री देवधर करकरे ने नाराजगी के अंदाज में कहां की आप भी कमाल करते है। इतना बड़ा घर पड़ा है और आप होटल में कमरा ले कर रह रहे है।

मैं आप से नाराज हूं, आप ने ये ठीक नहीं किया। तब माफी के अंदाज में श्री जे. के. मल्होत्रा जी ने कहां की मेरे साथ मेरी पत्नी और एक और व्यक्ति भी है जिनको शायद आप जानते होगे वह पेंटल जी भी। तब श्री देवधर करकरे ने कहां की वह तो सोम प्रकाश का मित्र है। वह तो घर का ही आदमी है उस से क्या पर्दा करना। कल आप होटल का कमरा खाली कर के यहां आ जाना। तब हां हूं कर के किसी तरह से जे. के. मल्होत्रा जी ने अपनी जान छुड़ाई।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

12- GOD IS NOT FOR SALE - (ईश्वर बिकाऊ नहीं है) - का हिंदी अनुवाद

GOD IS NOT FOR SALE–(ईश्वर बिकाऊ नहीं है)-का हिंदी अनुवाद

अध्याय -12

23 अक्टूबर 1976 अपराह्न, चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

[एक संन्यासिनी जिसका एक छोटा बच्चा है, कहती है कि उसके पति ने उसे घर से निकाल दिया है। वह उससे प्यार करता है, लेकिन अब उसके साथ नहीं रह सकता: वह चुप रहना चाहता है, और मुझे लगता है कि बच्चा और मैं बहुत ज़्यादा परेशान करते हैं।]

नहीं, नहीं, ये तो बस बहाने हैं। अगर आप प्यार करते हैं, तो आप उससे निकलने वाली हर चीज़ को स्वीकार करते हैं। आप बच्चे से प्यार करते हैं और आप बच्चे के रोने से भी प्यार करते हैं; यह अब विचलित करने वाला नहीं है। प्यार हर चीज़ को स्वीकार्य बनाता है। लेकिन अगर प्यार नहीं है, तो सब कुछ एक समस्या है। अगर आप किसी महिला से प्यार कर सकते हैं, तो वह कभी भी आध्यात्मिकता के मार्ग पर आपकी बाधा नहीं बन सकती क्योंकि प्यार हमेशा एक अच्छी मदद है और आध्यात्मिकता प्यार के बिल्कुल भी विपरीत नहीं है। उसके मन में कुछ गलत धारणाएँ होंगी।

[वह कहती है: मुझे वाकई लगता है कि मैं उतनी गहराई से प्यार नहीं कर पाती जितनी होनी चाहिए। शायद मैं प्यार से डरती हूँ -- मुझे नहीं पता।]

मार्ग की अनुभुतियां- (बुल-बुल चिड़ियां और उसका अपनापन-)

 बुल-बुल चिड़ियां और उसका अपनापन-

पशु पक्षियों का भी अपना एक स्वतंत्र आस्तित्व होता है। लेकिन वह जहां पर रहते है। उस स्थान के साथ-साथ उनका वहां रहने वाले उन लोगों से भी अपना पन जुड़ जाता है। वह उस सब में समाहित हो कर अपने को भी उसी परिवार या स्थान का सदस्य ही मानते चले आते है। पीढ़ी दर पीढ़ी। मुझे याद है शायद बात 1980 से भी पहले कि है। जब मेरी मां जीवित थी। तब हम पुरूष लोग सब उस बैठक में ही सोते थे। उसे सब ‘’घेर’’ के नाम से पुकारते थे। वहां गाय-भैंसे बैल आदि सब बंधे होते थे। यानि पेड़ पौधे मनुष्य के साथ-साथ उनके रहने के भी मकान।  यानि की वह बहुत ही बड़ी जगह होती थी। करीब वह जगह 1500 से ले कर 2000 गज तो आराम से रही ही होगी। क्योंकि मेरी छोटे चाचा और हम एक साथ तो नहीं रहते थे परंतु स्थान का बटवारा होने पर भी दरवाजे और चार दीवारी एक ही थी। क्योंकि चाची  मेरी मां की सगी बहन थी। जिसे हम मौसी कहते थे। उस समय से लेकर आज करीब 60 साल गुजर गये। एक बुल-बुल जोड़े को मैं तब से देखता हुआ आया हूं। मां जब घेर में जाती तो कैसे वह मां के साथ संवाद करती थी। क्योंकि मां दूध निकलना या गोबर पानी करना मां या बहनों की जिम्मेदारी थी। जब मां जाती तो मुझे कहते की छत पर जाकर उसके बर्तन में पानी भर दे। क्योंकि वहां सीढियां नहीं थी। इस लिए दीवार के बाहर निकले पत्थरों का सहारा ले कर मां तो नहीं चढ़ सकती थी। मैं उसके लिए पानी भरता था और मां जरूरी उनके लिए बाजरा, या रात की बची रोटी को मोर उन  रोटी को टूकड़े छत पर फेंक देती थी।

समय बदला, भीड़ बढ़ती गई। स्थान के बटवारे होते चले गये। और कंकरीट की उंची इमारतें बनती चली गई। आज तो ये हाल है। गांव का क्या पूरे शहर का की गलियां जो पहले छांव को तरसती थी। आज धूप को तरसती है। बुर्जुग औरतें कभी हमारे घर के आंगन में जो नीम का वृक्ष था उस नीचे बैठ कर दिन भी थकान मिटाने के साथ-साथ कुछ हाथ का काम या बातचीत करती रहती थी। आज भी उसी वंशावली की बुल-बुल हमारे ओशोबा हाऊस में रहती है। क्योंकि यहां पर वृक्ष है। सुरक्षा है। जो प्राणी चाहे वह पशु हो या पक्षी एक बार मानव के संग साथ रहने के आदि हो जाते है। तब वह जंगल में आपने को अच्छा महसूस नहीं करते।

रविवार, 26 अप्रैल 2026

46-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-46

(सदमा - उपन्यास)

र पहुंचते-पहुंचते उन्हें संध्या हो गई थी। सब लोग सारा दिन के घर से निकले हुए थे इसलिए थक भी बहुत गये थे। नानी और नेहालता ने पहले कपड़े बदले फिर दोनों ने मिल कर खाना बनाया। उसके बाद सब ने बड़े चाव से खाना खाया और दिन भर की कुछ बाते की। फिर यही निर्णय लिया गया की अब सोम प्रसाद को दवाई दे कर सब को सो जाना चाहिए। सुबह उठ कर जब नेहा लता और सोम प्रकाश घूमने के लिए निकले तो आज दोनों का बदन दर्द कर रहा था। इसलिए वह अधिक दूर तक नहीं जा सके तब सोम प्रकाश ने नेहालता को कहा की आज इतना ही घूमना काफी है। मैं आज से बीच के छोटे रास्ते से पेदल ही स्कूल चला जाया करूंगा। पहले भी तो इसी रास्ते से होकर ही तो जाता था। एक पंथ दो काम हो जायेंगे। ये बात सून कर नेहा लता को बहुत अच्छा लगा। क्योंकि अब वह एकांत से भय नहीं खा रहा था। लोगों से मिलने की झिझक भी उसकी कम होती जा रही थी। ये बात नानी को भी बहुत अच्छी लगी परंतु ये सब हरि प्रसाद को नहीं भा रही थी। जब सुबह तैयार हो कर सोम प्रकाश स्कूल की और गया तो नेहा लता उसे कुछ दूर तक छोड़ने के लिए साथ गई। तब साथ में हरि प्रसाद भी सोम प्रकाश के साथ चल दिया। परंतु अब आगे जा कर उसे समझ नहीं आ रहा था की अब किस के साथ चले। क्योंकि सोम प्रकाश आगे पगडंडी पर स्कूल की और चला गया और नेहा लता वहीं खडी रह गई। ये बेचारे हरिप्रसाद की समझ के बहार की बात थी। फिर वह पहले भाग कर सोम प्रकाश के पास पहुंचा। तब सोम प्रकाश ने उसे प्रेम करते हुए कहां की तुझे को तो नेहा लता के साथ जाना चाहिए क्योंकि वह अकेली है। और मानो वह सारी बात समझ कर नेहा लता के पास वापस आ कर पूछ हिला कर कह रहा हो की चलो अब घर मैं आ गया।

उधर बम्बई में नेहा लता के माता पिता परेशान थी। वह बार-बार यहां आने की जिद्द करते और नेहा लता किसी न किसी बहाने से उन्हें टाल देती थी। परंतु इस बार उन्होंने निर्णय कर लिया अब उसकी एक बात नहीं सुननी। और वह पेंटल के दफ्तर चले गए। पेंटल ने जब उन्हें दफ्तर में देखा तो उन्हें बड़ा अचरज हुआ। अरे आप मुझे बतला देते। तब श्री जे. के. मल्होत्रा ने कहां की चलो आप से मिल ही लेते है। नेहा लता की कोई खोज खबर आप के पास तो होगी ही। पेंटल थोड़ा झेप गए। की वह काम में इतना व्यस्त रहे है की समय ही नहीं निकाल पा रहे है।

11- GOD IS NOT FOR SALE - (ईश्वर बिकाऊ नहीं है) - का हिंदी अनुवाद

GOD IS NOT FOR SALE–(ईश्वर बिकाऊ नहीं है)-का हिंदी अनुवाद

अध्याय -11

22 अक्टूबर 1976 अपराह्न, चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

[एक संन्यासी का कहना है कि उसे हमेशा रिश्तों को लेकर परेशानी रही है, जिसमें उसकी प्रेमिका के साथ वर्तमान रिश्ता भी शामिल है।]

मि एम, हम्म। एक रिश्ता हमेशा एक समस्या होता है क्योंकि दूसरा दर्पण बन जाता है और दूसरे की उपस्थिति आपको कई तरीकों से अपना चेहरा देखने में मदद करती है। और ऐसा ही दूसरे के साथ होता है - आप दर्पण बन जाते हैं। कोई भी उसका असली चेहरा नहीं जानना चाहता। इसीलिए सदियों से लोग मठों की ओर भागते रहे हैं। ये कायर हैं! वे रिश्ते से बच रहे हैं, क्योंकि रिश्ते में वे वैसे ही प्रतिबिंबित होते हैं जैसे वे हैं। अकेले में, वे अपने बारे में जो सोचना चाहते हैं सोच सकते हैं; वे अपने बारे में कोई भी छवि बना सकते हैं। इसलिए रिश्ते के साथ पहली समस्या यह है कि रिश्ता आपको प्रतिबिंबित करता है और आप दूसरे व्यक्ति को प्रतिबिंबित करते हैं। और आपकी समग्रता सामने आती है - आप केवल सतह नहीं हैं।

आप अपने रिश्ते में जितने गहरे उतरेंगे, यह उतनी ही गहरी भावनाओं को सामने लाएगा। अगर आप वाकई किसी रिश्ते में हैं तो यह आपको तोड़कर रख देगा। आपकी सारी छवियाँ बिखर जाएँगी। आपके सारे चेहरे धूमिल हो जाएँगे। आपके सारे मुखौटे उतरने लगेंगे। और जब भी ऐसा होता है तो व्यक्ति दूसरे से बदला लेना शुरू कर देता है। इसीलिए [आपकी गर्लफ्रेंड] ना कहती रहती है। उसकी ना के पीछे हाँ है। दरअसल, वह हाँ कहना चाहती है -- इसीलिए वह ना कहती है -- लेकिन वह अपनी संपूर्णता से डरती है।

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

45-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-45

(सदमा - उपन्यास)

धर बम्बई में नेहा लता के माता पिता ऊटी आने के लिए बैचेन थे। लेकिन न तो पेंटल को छुट्टियाँ मिल रही थी। और दूसरा नेहा लता भी यही चाहती की कम से कम इस बात को दो-चार महीने और टाल दिया जाये। क्योंकि उसके मन में जो चल रहा था। उसे अभी वह अपने माता पिता के सामने नहीं रखना चाहती थी। ये बात वह फोन कर के अपने माता-पिता को बतला कर वह किसी नये बवाल में नहीं उलझना चाहती थी। उसका पूरी ध्यान केवल इस बात पर था, कि किस तरह से सोम प्रकाश जल्दी से जल्दी स्वस्थ लाभ प्राप्त कर सके। दूसरी बात को उठाने से अभी कोई हल होने वाला नहीं है। इसलिए इन बातों को सून कर सोम प्रकाश की बीमारी पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। सो इस बात को कम से कम दो-तीन महीने टाल दिया जाये तो बेहतर होगा।

इधर सोनी के बच्चे को आज तीन महीने हो गए। बच्चा सुंदर और स्वास्थ्य था। और अब उसके आने से सोनी के घर में ही नहीं जो भी उसके आसपास था, वहां भी खुशियों के फूल खिल रहे थे। दूसरा अब सोम प्रकाश लगातार स्कूल जा रहा था। अब तो नेहा लता को भी साथ जाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। उसे वहां जाने में भय कम महसूस हो रहा था। धीरे-धीरे उसे इस काम में रस पैदा हो रहा था। एक खुशी उसके मन में फेल रही थी। इस बीच जब नेहा लता और नानी सोम प्रकाश को महात्मा जी के पास ले कर गए तो वह बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने सोम प्रकाश से कई प्रश्न सब के समाने ही बिठा कर पूछे की तुम्हें भय क्यों लगता है। तब वह नेहा लता की और देख कर चुप हो गया। आज उसकी वाणी भी खुल कर आ रही थी। आप अगर नशे में या आप का मन बीमार है, तब आपकी वाणी आपके मन के आधार पर बदल जाती है। वैद्य जी ने सोम प्रकाश को लिटा कर उसका पेट, हाथ की हथेलियां उसके पैर के तलवे उन पर उँगली से चोट मार कर पूछा की कहां दर्द हो रहा है।

गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

44-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-44

(सदमा - उपन्यास)

ज नेहा लता को ऊटी में आये करीब छ: महीने हो गए। इस बीच कितना सब बदल गया परंतु समय है की मानो पंख लगा कर उड़ रहा है। नेहा लता को लगता है की कैसे छ: महीने हो सकते है। उसे तो लगता है की वह कल ही तो वह यहां पर आई है। अभी तो उसकी आने की थकान भी नहीं उतरी और समय इतना गुजर गया। वहां दूसरी और यही छ: महीने उसके माता पिता के लिए अलग आयाम रखते है। उन्हें लगता है छ: जन्म गुजर गये। समय घड़ी की टीक-टीक में नहीं है समय हमारे अंतस में है। फिर प्रत्येक प्राणी का समय भी भिन्न ही होगा। यही तो अल्बर्ट आइंस्टीन का सापेक्षवाद है। जिसका निष्कर्ष था कि, समय-अंतरिक्ष ढाँचे में गतिशील पदार्थ, धीमा और संकुचित (गति की दिशा में) नजर आता हैं, जब इसे पर्यवेक्षक के ढाँचे में मापा जाता है। क्या एक मक्खी का और कुत्ते का समय माप एक होगा। बाहर से देखने में तो दोनो समान होगे परंतु अंदर की समय की गति तो भिन्न होगी। मक्खी को तो केवल तीन से छ: महीने ही जीवित रहना है और कुत्ते को 14 वर्ष या मनुष्य को 70 साल या 100 साल। फिर प्रत्येक मनुष्य का समय भी एक समान नहीं होता। या स्थिति के बदलाव से भी उसमें भिन्नता आ जाती है। एक पल जैसे एक युग बीता। पल तो एक ही बीता है परंतु उसके मन की स्थिति ऐसी है उसके लिए वह एक युग बन गया।

नेहा लता के मन में एक उमंग थी, एक खुशी थी एक इच्छा, एक कामना कुलांचे मार रही थी। उसने एक लक्ष्य को अपने मन में थिर कर लिया था। उसका मन की गहराई एक थिरता को जान गई थी। उसे कहां पहुंचना है और कैसे उस मार्ग से वह परिचित ही नहीं हुई थी उस पर लगातार चल रही थी, अग्रसर हो रही थी। जब मन शांत और थिर है तो समय भी उतना ही शांत हो जायेगा। बैचेनी भी समय के साथ गति करती है।

बुधवार, 22 अप्रैल 2026

10- GOD IS NOT FOR SALE - (ईश्वर बिकाऊ नहीं है) - का हिंदी अनुवाद

GOD IS NOT FOR SALE–(ईश्वर बिकाऊ नहीं है)-का हिंदी अनुवाद

अध्याय -10

21 अक्टूबर 1976 अपराह्न, चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

आनंद का अर्थ है परमानंद और शून्य का अर्थ है खालीपन, कुछ होना, कोई होना। और यही आनंद है। जब तुम खाली होते हो, केवल तभी तुम पूर्ण होते हो -- कभी भी उसके पहले नहीं। जब तुम नहीं होते, केवल तभी तुम होते हो -- कभी भी उसके पहले नहीं। तुम्हारी अनुपस्थिति ही ईश्वर की उपस्थिति का द्वार है व्यक्ति को स्वयं को पूरी तरह से मिटा देना है; इससे कम कुछ भी मदद नहीं कर सकता। व्यक्ति को गायब हो जाना है। और एक बार जब आप भीतर की ओर बढ़ना शुरू करते हैं, तो आप गायब होने लगते हैं, क्योंकि आप जो कुछ भी हैं वह केवल सतह है, परिधि है। एक बार जब आप केंद्र की ओर बढ़ना शुरू करते हैं, तो परिधि गायब हो जाती है। तब पूरा ब्रह्मांड आपकी परिधि है। या तो पूरा ब्रह्मांड आपकी परिधि है या कोई परिधि नहीं है।

शून्य शब्द का यही अर्थ है। इसका शाब्दिक अर्थ है शून्य। शून्य की अवधारणा भारत में खोजी गई थी। गणितीय शून्य भी एक भारतीय अवधारणा है, और पूरा गणित शून्य की अवधारणा से विकसित हुआ है। शून्य की अवधारणा के बिना, गणित अस्तित्व में नहीं रह सकता और सभी मूल अंक - एक, दो, तीन, चार, पांच, छह, सात, आठ, नौ - भी भारतीय हैं। यहां तक कि ये शब्द भी संस्कृत के शब्द हैं।

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

43-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-43

(सदमा - उपन्यास)

गाड़ी अस्पताल के गेट पर रूकी ही थी की नानी सोनी को ले कर अंदर चल दी। और ड्राइवर को कहां की जाओ सोम प्रकाश हर को घर तक छोड़ आओ। और फिर सीधा वापस आ जाना न जाने कब किस चीज की जरूरत पड़ जाये। सोनी को स्ट्रेचर पर लिटा दिया और श्री देवधर करकरे ने सारी कागजी कार्यवाही पूरी कर ली। और सोनी को अंदर आपरेशन रूम में ले गए। नानी उसके साथ ही थी। डाक्टर ने आकर देखा और एक दो इंजेक्शन लगाये और उसका ब्लड प्रेशर चेक किया सब ठीक था। तब उसने नानी को कहां की अभी तो कुछ देर है। लेकिन नानी तो देख रही थी बच्चे के आगमन की तैयारी प्रकृति ने पूरी कर दी है। और नानी ने नर्स को बतलाया की आप जरा डाक्टर को संदेश भेजे। सोनी के चेहरे पर जरा भी भय नहीं था। न ही वह दर्द से उत्पात मचा रही थी। ये सब देख कर नर्स या नानी बहुत बैचेन थे। इस तरह का व्यवहार आज कल बच्चे होने में दिखाई नहीं देता महिलाएं बहुत शोर और उत्पात मचाती है।

सोनी को ज्यादा छटपटाना नहीं पड़ा केवल एक घंटे में ही एक पुत्र रतन का जन्म हो गया। इस बात से सार स्टाफ खुश था। सालों बाद इस तरह की साधारण डिलीवरी हुई है। इतनी देर में ड्राइवर राम दास भी आ गया। और श्री देवधर करकरे जी ने उन्हें पैसे देते हुए कहां की पाँच किलों मिठाई ले आओ। राम दास ने कहां मालिक कौन सी तब देवधर जी ने कहां की कोई बर्फी या पेड़े जो भी ताजा हो। और नानी को धन्यवाद देते हुए देवधर जी कहां की आप के साथ होने से मुझे बहुत हिम्मत मिली। वरना तो मैं घबराता ही रहता था की न जाने कैसे सब पूरा होगा।