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रविवार, 31 मई 2026

15-ओ प्‍यारे न्‍यारे प्रीतम--(कविता) - (ओशो की मधुशाला)

 15-ओ प्‍यारे न्‍यारे प्रीतम

ओ प्‍यारे न्‍यारे प्रीतम..

तुम्हारे प्रेम को मैं जानती हूं

तुम अपने प्रेम की बाते मुझे मत बतलाओ

मैंने उन्हें छूआ है, उसमें में डूबी हूं।

उसने मुझे घेरा है अपने आगोश में

जानते  हो  तुम अब मैं उसे 

भली भांति जानने लगी हूं

तुम्हारी उस प्रेम दृष्टि को मैंने

अब पल-पल अनुभव किया है,

और सबसे अधिक बुरा यह है कि

तुम्हारा चाबुक मारने जैसा डांट-फटकार

में भी मैंने उस प्रेम का अनुभव महसूस करने लगी हूं।

शनिवार, 30 मई 2026

14 - कंघा--(कविता) - (ओशो की मधुशाला)

 14 - कंघा--(कविता)

हमने तो चाहा था पल भर के लिए

केवल तुम्हारा कंधा,

की जीवन के इस लम्बे सफर की

उघती उस लम्बी थकान में,

कुछ रिश्ते दर्द को सहारा मिले,

लेकिन हाय संसार!

तुमने तो झटक दिया दामन

किसी बेरुखी से।

परंतु देखो मेरा भाग्य,

क्या तुझ पर इतराऊं

या जलन करूं तुझ पर

गुरुवार, 28 मई 2026

13 - ओशो की मधुशाला-कविता - (ओशो की मधुशाला)

 13 - ओशो की मधुशाला-कविता

प्रियतम  तेरे सपनों की, मधुशाला मैंने देखी है।

होश बढ़ाता इक-इक प्याला, ऐसी हाला देखी है।।

 

मदिरालय जाने बालों ने,

भ्रम न जाने क्‍यों पाला।

हम तो पहुंच गए मंजिल पे,

पीछे रह गई मधुशाला।।

 

शब्‍दों कि मधु, शब्‍दों की हाला,

शब्‍दों की ही बनी   मधुशाला।

आँख खोल  कर  देख सामने,

थिरक रही   जीवित   हाला।।

मंगलवार, 26 मई 2026

12 - नहीं जानती क्‍या मैं अभी हूं -कविता - (ओशो की मधुशाला)

 12 - नहीं जानती क्‍या मैं अभी हूं -(कविता) 

ओ प्‍यारे, मेरे न्‍यारे,

यूं काहे पुकारे, मेरे प्रीतम।

तुम्हारे प्रेम को मैं जानती हूं

तुम अपने प्रेम की बाते

यू मुझे मत बतलाओ

उसने मुझे छूआ है,

केवल मुझे ही नहीं मेरे सजल गात का भी

मैंने उसे महसूस किया है,

मैं उस अथाह सागर में डूबी हूं।

मैं उस भेद भरे भाव को

भली भांति जानने लगी हूं

तुम्हारी उस प्रेम दृष्टि को मैंने

उसे पल-पल अनुभव किया है,

और सबसे अधिक बुरा यह है कि

रविवार, 24 मई 2026

11-अरण्य-उपवन - कविता - (ओशो की मधुशाला)

 11- अरण्य-उपवन (कविता)

अरण्य का मौन सधन, कहता है कुछ गुन-गन।

मन का मर्म इति, डरता है तुम इसकी मत सून।

 

चीढ़ के पात-पात, झूमता उच्छवास सा तन

नाच उठता उसका अंग, छूती जब उसे पवन

दूर का कोलाहल नाद कानों में विभेद गुंजन

नाचती लहरो से उठता जल का क्रीड़ा क्रंदन

अंबर पर तैरते, वो धवल मेघ छूते पर्वत पर

पल-पल करते अठखेलियां,छवियां बनती भ्रम-विधन

शनिवार, 23 मई 2026

10-पुष्प की परिणति—कविता -(ओशो की मधुशाला)

10-पुष्प की परिणति—(कविता)

पुष्प खिलता बीज से ही,

क्‍या बीज ही उसकी गति है?

 

कष्‍ट, कंटक,  कोपलों में,  उत्ताप पाकर वह मुस्कराया।

बन कली मधुमास की जब, चहक कर उत्‍सव मनाया।

भ्रमरों की गुंज के संगमधुरता का कोई गीत गाया।

तपती धारा की उष्णता में, साहस कब उसने गंवाया।

मेघ की गर्जन को सुन कर, न वो सहमा न घबराया।

शुक्रवार, 22 मई 2026

09-मैंने शब्‍द से कहां – कविता- (ओशो की मधुशाला)

 09-मैंने शब्‍द से कहां  कविता

मैंने कुछ शब्‍दों को कहां,

चलोगे हमारे साथ।

हम मिल कर रचेंगे,

एक नया इतिहास।


वो ठिठक कर खड़े ही रह गए,

पल में मुझसे दूर झटक कर

मेरे बुने वो सपने यूं पल ही में दिग-भ्रमित बह गए

मेरी सपनों की गीतांजलि की उखड़ गयी सब सांसे।

और कहने लगी चुप से मेरे कानों में मत बांधो मुझे

इतना संगठित करने अब नहीं है साहस किसी में।

 

मैंने उन्हें समझाया, बुझाया, ओर फुसलाया।

चलो न सही परंतु कोई कुरान, बाइबिल, गीता,

ताओ-ते-चिंग, हम मिल कर क्‍या नहीं रच दे,

उन शब्‍दों ने बड़ी बेरहमी से मुझे घूर कर देखा

26-GOD IS NOT FOR SALE - (ईश्वर बिकाऊ नहीं है) - का हिंदी अनुवाद

GOD IS NOT FOR SALE–(ईश्वर बिकाऊ नहीं है)-का हिंदी अनुवाद

अध्याय -26

7 अक्टूबर 1976 सायं चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

[पश्चिम से हाल ही में आये एक संन्यासी से:]

ये समूह आपको थोड़ा सा बोझमुक्त करने की प्रक्रिया मात्र हैं, क्योंकि ईश्वर बहुत दूर नहीं है; आपको बस भारहीनता की आवश्यकता है। बस पंखों की आवश्यकता है। वह बहुत करीब है, लेकिन हर कोई बहुत बोझिल है -- चट्टानों पर चट्टानें, और हम उन चट्टानों को ऐसे संजोते हैं जैसे वे खजाने हों। और उन चट्टानों के नीचे हमारे पंख नष्ट हो रहे हैं और हम उड़ नहीं सकते।

मनुष्य की नियति है उड़ना, जितना संभव हो उतना ऊपर उठना। जहाँ तक शरीर का सवाल है, मनुष्य को पंख नहीं दिए गए हैं, लेकिन जहाँ तक आत्मा का सवाल है, उसके पास सबसे बड़े पंख हैं। मनुष्य एक आध्यात्मिक दुनिया है जिसके पास बड़े पंख हैं जो उसे अस्तित्व के सबसे दूर के छोर तक ले जा सकते हैं।

लेकिन फिर बोझ से मुक्ति की आवश्यकता है। और यह बोझ से मुक्ति हमेशा से सभी धर्मों का सबसे आवश्यक हिस्सा रही है। यही यीशु का मतलब है जब वह कहते हैं, 'धन्य हैं वे जो आत्मा में दीन हैं, क्योंकि परमेश्वर का राज्य उनका है।' आत्मा में दीन का अर्थ है वे जो बोझ से मुक्त हैं, पूरी तरह से बोझ से मुक्त हैं।

गुरुवार, 21 मई 2026

08 - उजाला — (कविता) - (ओशो की मधुशाला)

08-उजाला कविता 

कब तक खड़ा रहेगा ये उजाला

मेरे द्वारा पर और करता रहेगा

यूं युगों-युगों तक यूं तन्हा मेरा इंतजार...

 

पर मैं हूं कि आंखें बंद किये

उलझा हूं किन्‍हीं अंधेरी गलियों में

ढूंढ रहा हूं, उन आस्था और विश्वास में

उन वादों में उन कसमों में उन सिंकवा में

जो कभी के दफ़न हो गये है

नैतिकता और संस्कारों के बोझ तले

किसी अनबूझी कब्र की लकीर बन कर

25-GOD IS NOT FOR SALE - (ईश्वर बिकाऊ नहीं है) - का हिंदी अनुवाद

GOD IS NOT FOR SALE–(ईश्वर बिकाऊ नहीं है)-का हिंदी अनुवाद

अध्याय -25

06 अक्टूबर 1976 सायं चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

 [पश्चिम की ओर प्रस्थान कर रहे एक संन्यासी से]

ध्यान करते रहो। ध्यान छोड़ने के कई प्रलोभन हैं, और वे सभी बाहर से नहीं हैं; कई अंदर से हैं। मन सुस्त होता है और वह हमेशा अच्छे कारण ढूँढ़ लेता है, इसलिए मन की बात मत सुनो। भले ही कारण बिल्कुल सही लगे, लेकिन तर्कहीन बने रहो लेकिन ध्यान करते रहो, क्योंकि केवल वे क्षण ही बचाए गए क्षण हैं जो ध्यान के लिए उपयोग किए गए हैं - बाकी सब खो गया है। यह अंत में ही समझ में आता है, लेकिन तब बहुत देर हो चुकी होती है; आप इसके बारे में कुछ नहीं कर सकते।

यह मनुष्य की दुविधाओं में से एक है: कि हम तब बुद्धिमान बनते हैं जब सारा समय और ऊर्जा नष्ट हो जाती है। जब समय और ऊर्जा थी तो हम मूर्ख थे। मन बहुत मूर्ख है और फिर भी बहुत तर्कसंगत है। वास्तव में इसकी मूर्खता इसकी तर्कसंगतता में निहित है। कभी-कभी मन कहेगा 'क्या मतलब है? कुछ भी नहीं हो रहा है।'

बुधवार, 20 मई 2026

07-चाँद गगन में - (कविता) - (ओशो की मधुशाला)

07-चाँद गगन में (कविता)

चारों तरफ अँधेरा छाया, चाँद गगन में हैं मुस्काता।      

हमने जग को राह दिखार्इ,ऐसा भ्रम है उसको आया।


थोड़ा सा आगे चलने पर, बहुत भयंकर जंगल आया।

पथ, घट-घन गहरे थे उसके, चलते-चलते वो घबराया।

इतने में एक झील देख कर,वो ठि‍ठका, कुछ शरमाया।

शांत झील में देख छवि को, है इठलाया और मुस्‍काया।

मुग्‍ध हुआ अपने ही रूप पर, भूल गया वो तो है छाया।

खेला उन लहरों पर, अपने प्रतिबिम्‍ब को दोस्त बनाया।

मंगलवार, 19 मई 2026

06-एक प्रेम प्रीत कि पाती -- (कविता) - (ओशो की मधुशाला)

 06-एक प्रेम प्रीत कि पाती -- (कविता)

बहता जीवन पल-पल उत्सव, कल-कल बहता जो झरना बन।

कुछ मधुर राग किन्हीं छंदों में,कानों में आकर करता गुन-गुन।

 

देखो मेरे तुम उत्सव को, नित खेल खेलता अठखेली।

वह नहीं पकड़ता दीवारें, वह नहीं बाँधता बंधन बेड़ी।

 

नित रूप बदलता जाता है, जीवन के काल चक्र पर वो।

वह नहीं देखता मुड़कर कल, वह कहां सिमटना चाहता है।

 

जो रोक सके उस तट बंध में, किसी अविरल की दीवारों में,

वह मुक्त हास सा खिलता है, जीवन की पल-पल धारो में।

24-GOD IS NOT FOR SALE - (ईश्वर बिकाऊ नहीं है) - का हिंदी अनुवाद


 GOD IS NOT FOR SALE–(
ईश्वर बिकाऊ नहीं है)-का हिंदी अनुवाद

अध्याय -24

05 अक्टूबर 1976 सायं चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

देव का अर्थ है दिव्य, नाट्य का अर्थ है नाटक--एक दिव्य नाटक। और यही जीवन है। इसे गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। जिस क्षण आप इसे गंभीरता से लेते हैं, आप चूक जाते हैं। यह एक नाटक है। नाटक की तरह लिया जाए तो यह अत्यंत सुंदर है। इसमें खोने को कुछ नहीं है और पाने को कुछ नहीं; यह बस मौज-मस्ती है। और एक बार आप जीवन को मौज-मस्ती, हास्य, आनंद, खेल की तरह देखने लगें, तो सारी चिंताएं अपने आप गायब हो जाती हैं; धीरे-धीरे सारी समस्याएं अप्रासंगिक हो जाती हैं। क्योंकि जब भी उस घाव के आसपास गंभीरता का घाव होता है, तो समस्याएं, चिंताएं, चिंताएं इकट्ठी हो जाती हैं। वे गंभीरता के घाव को पालती हैं। जब भी वह घाव भर जाता है, जब व्यक्ति जीवन की सारी गंभीरता भूल जाता है, तो वह पूरी तरह से अलग ढंग से जीता है। तब जीवन आनंदमय हो जाता है।

सोमवार, 18 मई 2026

05-तुम हो एक अंधकार — कविता - (ओशो की मधुशाला)

 05-तुम हो एक अंधकार — (कविता) 

कुछ दीवारें दे रही थी

एक रूप और आकर का भ्रम मुझे

थक गया उस बंटवारे से एक दिन

गिरा दिया मैंने उसे एक रात के अंधेरे में

जो एक पकड़ थी मेरे होने की मेरे अहं की

जो चिपक गई थी

जन्म-जन्म मेरे संग साथ

शनिवार, 16 मई 2026

04 - न और न छोर - (कविता)-ओशो की मधुशाला

04- न और न छोर — (कविता)

न कोई और है न छोर है उसका,

केवल एक गति भर है,

जो एक सम्मोहन बन कर छाई है।

हर और जहां-तहां,

चर-अचर, उस अनंत बिंदु के छोर तक।

बन कर एक उदासी सी शांति

जो आभा की तरह चमकती है,

और एक गहन तमस का बनती है उन्माद।

ये कोई प्रलाप के बादल नहीं है ‘’प्रिय’’,

23-GOD IS NOT FOR SALE - (ईश्वर बिकाऊ नहीं है) - का हिंदी अनुवाद

GOD IS NOT FOR SALE–(ईश्वर बिकाऊ नहीं है)-का हिंदी अनुवाद

अध्याय -23

03 अक्टूबर 1976 अपराह्न, चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

देवा का अर्थ है दिव्य और अर्पित का अर्थ है अर्पण - दिव्य को अर्पण, भगवान को अर्पण। और जीवन को ऐसा ही होना चाहिए। यदि यह अर्पण नहीं है तो व्यक्ति दुखी रहता है। यदि यह अर्पण नहीं है तो व्यक्ति कभी भी कोई अर्थ महसूस नहीं कर सकता। अर्थ केवल तभी आता है जब तुम स्वयं से बड़ी किसी चीज के साथ जुड़ जाते हो; तब अचानक अर्थ जाता है। जब तुम अकेले होते हो तो तुम अर्थहीन हो जाते हो। इसलिए प्रेम में कुछ अर्थ है, प्रार्थना में कुछ अर्थ है, क्योंकि वे तुम्हें जोड़ते हैं, वे तुम्हें तुम्हारे अकेलेपन से बाहर ले जाते हैं; वे सेतु बन जाते हैं। ईश्वर को अर्पण सबसे बड़ा सेतु है। तब तुम समग्र के साथ जुड़ जाते हो, और उसी जुड़ने के साथ ही रूपांतरण होता है। तब तुम पुराने स्व नहीं रहते। वास्तव में तुम स्व नहीं रहते; वह गोपनीयता गायब हो जाती है। तुम अब बंद नहीं रहते - तुम बस खुले होते हो, और वहां महान विश्वास होता है।