(सदमा - उपन्यास)
उधर
बम्बई में नेहा लता के माता पिता ऊटी आने के लिए बैचेन थे। लेकिन न तो पेंटल को छुट्टियाँ
मिल रही थी। और दूसरा नेहा लता भी यही चाहती की कम से कम इस बात को दो-चार महीने
और टाल दिया जाये। क्योंकि उसके मन में जो चल रहा था। उसे अभी वह अपने माता पिता
के सामने नहीं रखना चाहती थी। ये बात वह फोन कर के अपने माता-पिता को बतला कर वह
किसी नये बवाल में नहीं उलझना चाहती थी। उसका पूरी ध्यान केवल इस बात पर था, कि किस तरह से सोम प्रकाश जल्दी से जल्दी स्वस्थ लाभ प्राप्त कर सके।
दूसरी बात को उठाने से अभी कोई हल होने वाला नहीं है। इसलिए इन बातों को सून कर सोम
प्रकाश की बीमारी पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। सो इस बात को कम से कम
दो-तीन महीने टाल दिया जाये तो बेहतर होगा।
इधर सोनी के बच्चे को आज तीन महीने हो गए। बच्चा सुंदर और स्वास्थ्य था। और अब उसके आने से सोनी के घर में ही नहीं जो भी उसके आसपास था, वहां भी खुशियों के फूल खिल रहे थे। दूसरा अब सोम प्रकाश लगातार स्कूल जा रहा था। अब तो नेहा लता को भी साथ जाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। उसे वहां जाने में भय कम महसूस हो रहा था। धीरे-धीरे उसे इस काम में रस पैदा हो रहा था। एक खुशी उसके मन में फेल रही थी। इस बीच जब नेहा लता और नानी सोम प्रकाश को महात्मा जी के पास ले कर गए तो वह बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने सोम प्रकाश से कई प्रश्न सब के समाने ही बिठा कर पूछे की तुम्हें भय क्यों लगता है। तब वह नेहा लता की और देख कर चुप हो गया। आज उसकी वाणी भी खुल कर आ रही थी। आप अगर नशे में या आप का मन बीमार है, तब आपकी वाणी आपके मन के आधार पर बदल जाती है। वैद्य जी ने सोम प्रकाश को लिटा कर उसका पेट, हाथ की हथेलियां उसके पैर के तलवे उन पर उँगली से चोट मार कर पूछा की कहां दर्द हो रहा है।








