(सदमा - उपन्यास)
गाड़ी
अस्पताल के गेट पर रूकी ही थी की नानी सोनी को ले कर अंदर चल दी। और ड्राइवर को
कहां की जाओ सोम प्रकाश हर को घर तक छोड़ आओ। और फिर सीधा वापस आ जाना न जाने कब किस
चीज की जरूरत पड़ जाये। सोनी को स्ट्रेचर पर लिटा दिया और श्री देवधर करकरे ने
सारी कागजी कार्यवाही पूरी कर ली। और सोनी को अंदर आपरेशन रूम में ले गए। नानी
उसके साथ ही थी। डाक्टर ने आकर देखा और एक दो इंजेक्शन लगाये और उसका ब्लड प्रेशर
चेक किया सब ठीक था। तब उसने नानी को कहां की अभी तो कुछ देर है। लेकिन नानी तो
देख रही थी बच्चे के आगमन की तैयारी प्रकृति ने पूरी कर दी है। और नानी ने नर्स को
बतलाया की आप जरा डाक्टर को संदेश भेजे। सोनी के चेहरे पर जरा भी भय नहीं था। न ही
वह दर्द से उत्पात मचा रही थी। ये सब देख कर नर्स या नानी बहुत बैचेन थे। इस तरह
का व्यवहार आज कल बच्चे होने में दिखाई नहीं देता महिलाएं बहुत शोर और उत्पात
मचाती है।
सोनी को ज्यादा छटपटाना नहीं पड़ा केवल एक घंटे में ही एक पुत्र रतन का जन्म हो गया। इस बात से सार स्टाफ खुश था। सालों बाद इस तरह की साधारण डिलीवरी हुई है। इतनी देर में ड्राइवर राम दास भी आ गया। और श्री देवधर करकरे जी ने उन्हें पैसे देते हुए कहां की पाँच किलों मिठाई ले आओ। राम दास ने कहां मालिक कौन सी तब देवधर जी ने कहां की कोई बर्फी या पेड़े जो भी ताजा हो। और नानी को धन्यवाद देते हुए देवधर जी कहां की आप के साथ होने से मुझे बहुत हिम्मत मिली। वरना तो मैं घबराता ही रहता था की न जाने कैसे सब पूरा होगा।








