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सोमवार, 21 नवंबर 2022

तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-02)-प्रवचन-03

 तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision-(भाग-दूसरा)


प्रवचन-तीसरा-(चार मुद्राओं अर्थात चार तालों को तोड़ना)

दिनांक 03 मई 1977 ओशो आश्रम पूना।

सूत्र-

 

वो अपने अंदर जो भी अनुभव करते हैं,

उसे वे उच्चतम सचेतनता की स्थिति बतलाते हुए,

उसकी ही शिक्षा वे देते हैं,

वे उसकी को मुक्ति कह कर पुकारेंगे,

एक हरे रंग कम मूल्य का कांच का टुकड़ा ही

उसके लिए पन्ने-रत्न जैसा ही होगा।

भ्रम में पड़कर वे यह भी नहीं जानते है

कि अमूल्य रत्न को कैसा होना चहिए?

 

सीमित बुद्धि के विचारों के कारण,

वे तांबे को भी स्वर्ण की भांति लेते हैं,

और मन के शूद्र-विचारों को वे अंतिम सत्य की तरह सोचते हैं।

वे शरीर और मन के सपनों जैसे सुखमय अनुभवों को ही

सर्वोच्च अनुभव मानकर वहीं बने रहते है,

और नाशवान शरीर और मन के अनुभवों को ही शाश्वत आनंद कहते है।

 

इवामजैसे मंत्रों को दोहराते हुए वे सोचते हैं कि वे आत्मोपलब्ध हो रहे हैं।

जब कि विभिन्न स्थितियों से होकर गुजरने के लिए चार

मुद्राओं को तोड़ने की जरूरत होती है,

वे अपनी इच्छानुसार सृजित की गई सुरक्षा की चार दीवारी

तक वे स्वयं तक पहुंच जाना कहते है,

लेकिन यह केवल दर्पण में प्रतिबिम्बों को देखा जैसा है।

मंगलवार, 15 नवंबर 2022

तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-02)-प्रवचन-02

 तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision-(भाग-दूसरा)


प्रवचन-दूसरा-(स्वतंत्रता है उच्चतम मूल्य)

दिनांक 02 मई 1977 ओशो आश्रम पूना।

प्रश्न सार:

पहला प्रश्न: प्यारे ओशो!

      मेरे अंदर प्रेम का होना बाहर के संसार पर आश्रित है। इसी समय इसके साथ मैं देखता और समझता हूं कि आप, स्वयं तो हमें अंदर पूर्ण रूप से बने रहने के बारे में भी कहते हैं। ऐसे प्रेम के साथ क्या होता है, यदि वहां पर न कोई भी चीज़ हो और न कोई भी व्यक्ति हो जो उसे पहचान सके और उसका स्वाद ले सके?

बिना शिष्यों के आपका क्या अस्तित्व हैं?

 

पहली बात: इस जगह दो तरह के प्रेम हैं। सी. एस. लेविस ने प्रेम को दो किस्मों में विभाजित किया हैं—‘जरूरत का प्रेमऔर उपहार का प्रेम। अब्राहम मैसलो भी प्रेम को दो किस्मों में बांटता है। पहले को वह जरूरी प्रेम अथवा कमी अखरने वाला प्रेम कहता है, और दूसरे तरह के प्रेम को आत्मिक प्रेमकहता है। यह भेद अर्थपूर्ण है और इसे समझना है। जरूरत का प्रेम और कमी अखरने वाला प्रेम दूसरे पर आश्रित होता है। यह एक अपरिपक्व प्रेम होता है। वास्तव में यह सच्चा प्रेम न होकर एक जरूरत होती है। तुम दूसरे व्यक्ति का प्रयोग करते हो, तुम दूसरे व्यक्ति का एक साधन की भांति प्रयोग करते हो; तुम उसका शोषण करते हो, तुम उसे अपने अधिकार में रखकर उस पर नियंत्रण रखते हो। लेकिन दूसरा व्यक्ति आधीन होता है और लगभग मिट जाता है; और दूसरे के द्वारा भी ठीक ऐसा ही समान व्यवहार किया जाता है। वह भी तुम्हें नियंत्रण में रखते हुए तुम्हें अपने अधिकार में रखना चाहता है और तुम्हारा उपयोग करना चाहता है।

गुरुवार, 10 नवंबर 2022

तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-02)-प्रवचन-01

तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision-(भाग-दूसरा)


प्रवचन-पहला-(तंत्र का मानचित्र)

दिनांक 01 मई 1977 ओशो आश्रम पूना।

 

सरहा के सूत्र:

          स्त्री और पुरूष एक दूसरे का चुम्बन लेकर

          रस-रूप और स्पर्श का इन्द्रिय सुख

पाने की लालसा के लिए

एक दूसरे को धोखा देकर भ्रमित कर रहे हैं

वे इन्द्रियों के विषय-सुख को ही

प्रमाणिक र्स्वोच्च परमआनंद मान कर

उसे पाने की उच्च घोषणा कर रहे हैं।

वह व्यक्ति उस पुरूष की भांति है,

जो अपने अंदर स्थित स्त्री और पुरूष के मिलन

अपने अंतरस्थ रूपी घर को छोड़कर,

इन्द्रिय रूपी द्वारों पर बाहर खड़ा है।

और बाहर की स्त्री से विषय भोग के आनंद की चर्चा करते हुए

उससे विषय सुख के बारे में आग्रह पूर्वक पूंछ रहा है।

 

जो योगी शून्यता के अंतराल में रहते हुए मन के पर्दे पर

जैविक उर्जाओं से आंदोलित होकर कल्पना में अनेक तरीको से

विकृत सुखों को सृजित करके उनका प्रक्षेपण करते हैं;

ऐसे योगी काल्पनिक वासना से प्रलोभित होकर

अपनी शक्ति खोकरकष्ट भोगते है,

           वे अपने दिव्य स्थान से पतित होते हैं।

जैसे ब्राह्मण जो यज्ञ की अग्नि की लपटों में

अन्न और घी की आहुति देकर

मंत्रो चार आदि का अनुष्ठान करता है

कामना करता है कि वह स्वर्ग में स्थान पा जाएगा

और वह स्वप्न देखते हुए, कल्पना में पुण्य रूपी पात्र को सृजित करता है।

सोमवार, 17 अक्तूबर 2022

तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-02)-प्रवचन-00

तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision-(सरहा के गीत)-भाग-दूसरा


दिनांक 01 मई 1977 ओशो आश्रम पूना।

(सरहा के राज गीतों पर दिये गये ओशो के बीस अमृत प्रवचनों में दस का संकलन जो उन्होंने पूना आश्रम में दिनांक 01 मई 1977 से 10 मई 1977 में ओशो आश्रम पूना के बुद्धा हाल में दिए थे।) 

 

भूमिका:

ओशो कहते है कि तंत्र एक खतरनाक दर्शन और धर्म है। मनुष्य के पर्याप्त साहसी न होने के कारण ही बड़े पैमाने पर अभी तक तंत्र के प्रयोग और प्रयास नहीं किये गए। केवल बीच-बीच में कुछ प्रयोग और प्रयास वैयक्तिगत लोगों द्वारा ही तंत्र के आयाम को छेड़ा गया। लेकिन यह अधुरा प्रयास बहुत ही खतरनाक बन गया। अधुरी बात हमेशा गलत और खतरनाक होती ही है। लेकिन समाज द्वरा स्वीकृति न मिलने से उन लोगों को अनेक यातनाएं झेलनी पड़ी। उन्हें गलत समझा गया।

तंत्र कहता है कि एक ऐसी स्त्री के साथ रहना और उससे प्रेम करना भले ही वह तुम्हारी पत्नी हो, जिसके प्रति तुम्हारे प्रेम का प्रवाह बंद  हो गया हो और जिसके साथ रहने में तुम्हें आनंद नहीं मिलता हो, एक पाप और व्यभिचार जैसा ही है। उसके साथ प्रेम करना एक बलात्कार करना है। और स्त्री भी यदि अपने पति से प्रेम नहीं करती और उसके साथ तब उसके साथ रहना एक प्रकार की यात्ना देने जैसा ही है। और संभोग तो एक प्रकार का बलतकार ही नहीं वेश्यावृति जैसा है।

गुरुवार, 19 अगस्त 2021

तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-01)-प्रवचन-10

तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision(सरहा के गीत)-भाग-पहला


दसवां—प्रवचन—(हिंगल डे जिबिटी डांगली जी)

दिनांक-30 मार्च 1977 ओशो आश्रम पूना)  

 

पहला प्रश्न: यह प्रभा का प्रश्न है: प्रिय ओशो, हिंगल डे जे, विपिटी डांग जांग—डो रन नन, डे जुन बुंग।

हिंगल डे जिबिटी डांगली जी?  

    

यह अत्यंत सुंदर है, प्रभा! यह सौन्दर्य पूर्ण है। यह बहुत बढियां है, बच्ची। मैं तुम्हें स्थिर बुद्धि बनाए जा रहा हूं। बस एक कदम और...और संबोधि

 

दूसरा प्रश्न: क्या प्रार्थना उपयोगी है? यदि हां, तो मुझे सिखादें कि कैसे करूं। मेरा तात्पर्य है, प्रार्थना ईश्वर के प्रेम को प्राप्त करने के लिए, उसके प्रसाद को अनुभव करने के लिए।

 

पहल बात, प्रार्थना उपयोगी नहीं है—जरा भी नहीं। प्रार्थना का कोई उपयोग, कोई उपयोगिता नहीं है। यह कोई वस्तु नहीं है। तुम इसका उपयोग नहीं कर सकते हो। यह कोई चीज नहीं है। यह किसी अन्य चीज का साधन नहीं है—इसका उपयोग तुम कैसे कर सकते हो?

शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2020

तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-01)-प्रवचन-09

तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision(सरहा के गीत)-भाग-पहला


नौवां—प्रवचन—(अपने में थिर निष्कलंक मन)

दिनांक-29 मार्च 1977 ओशो आश्रम पूना)  

 सुत्र:

जब (शिशिर में) छेड़ता है निश्चल जल को समीर

बन हिम ग्रहण कर लेता है वह

आकृति और बनावट किसी चट्टान सी

जब होता मन व्यथित है व्याख्यात्म विचारों से

जो अभी तक था एक अनाकृत सौम्य सा

बन वही जाता है कितना ठोस और कठोर।

 

अपने में थिर निष्कलंक मन कभी नहीं होगा दूषित

संसार या निर्वाण की अपवित्रताओं से भी

कीचड़ में पड़ा एक कीमती रतन ज्यों

चमकेगा नही यद्यपि है उसमें कांति।

 

ज्ञान चमकता नहीं है अंधकार में,

पर अंधकार जब होता है प्रकाशित,

पीड़ा अदृश्य हो जाती है(तुरंत)

शाखाएं-प्रशाखएं उग आती है बीज से

पुष्प पल्वित होते नुतपात शाखाओं से।

 

जो कोई भी सोचता-विचारा है

मन को एक या अनेक, फेंक देता है

वह प्रकाश को और प्रवेश करता है संसार में

जो चलता है (प्रचण्ड) अग्नि मे खुुली आंख

तब किस और होगी करूण की आवश्यकता अधिक।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-01)-प्रवचन-08

तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision—(सरहा के गीत)-भाग-पहला


(आठवां—प्रवचन) प्रेम के प्रति सच्चे रहो

दिनांक-28 मार्च 1977 ओशो आश्रम पूना।) 

सुत्र:

 पहला प्रश्न: ओशो, मैं एक मेढक हूं: मैं जानता हूं कि मैं एक मेढक हूं, क्योंकि मैं धुंधले, गहरे पानी में तैरना और चिपचिपी कीचड़ में उछलना-कूदना पसंद करता हूं। और यह मधु क्या होता है? यदि एक मेढक अस्तित्व की एक अनादृत दशा में हो सके, क्या वह एक मधुमक्खी बन जाएगा?

 निश्चय ही! मधुमक्खी बन जाना हर किसी की संभावना है। हर कोई मधुमक्खी हो जाने में विकसित हो सकता है। एक अनावृत, जीवंत, स्वस्फूर्त जीवन, क्षण-क्षण वाला जीवन, इसका द्वार है, इसकी कुंजी है। यदि कोई ऐसा जी सके कि वह जीना अतीत से न हो, तब वह मधुमक्खी है, और तब चारों तरफ मधु ही मधु है।

मैं जानता हूं कि किसी मेढक को यह बात समझा पाना कठिन है। प्रश्न सही है: और यह मधु क्या होता है?’ मेढक ने इसके विषय में कभी जाना नहीं होता। और वह ठीक उसी पौधे की जड़ के समीप रहता है, जहां कि फूल खिलते हैं, और मक्कियाँ मधु एकत्रित करती है, पर वह कभी उस आयाम में गया ही नहीं है।

गुरुवार, 10 सितंबर 2020

तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-01)-प्रवचन-07

तंत्रा-विजन-(सरहा के गीत)-भाग-पहला

सातवां प्रवचन-(सत्य न पवित्र है न अपवित्र)
(दिनांक 27 अप्रैल 1977 ओशो आश्रम पूना।) 

सूत्र:

यह है प्रारंभ में, मध्य में, और अंत में
फिर भी अंत व प्रारंभ हैं नहीं और कहीं
जिनके मन भ्रमित हैं, व्याख्यात्मक विचारों से
वह सब हैं दुविधा में, इसीलिए
शून्य और करूणा को वे दो समझते है।

मधु-मक्खियां जानती है, मधु मिलेगा फूलों में
कि नहीं हैं दो, संसार और निर्वाण
भ्रमित लोग समझेंगे पर कैसे यह

भ्रमित कोई जब झांकते हैं किसी दर्पण में
प्रतिविम्ब नहीं, देखते हैं, वे एक चेहरा
वैसे ही जिस मन ने सत्य को नकारा हो
भरोसा वह करता है उस पर जो नहीं है सत्य

यद्यपि छू सकता नहीं कोई सुगंध फूलों की
है यह सर्वव्यापी और एकदम अनुभवगम्य
वैसे ही अनाकृत मन स्वतः
पहचान जाते हैं रहस्यपूर्ण वृतों की गोलाई को

शनिवार, 5 सितंबर 2020

तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-01)-प्रवचन-06


तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision-(सरहा के गीत)-भाग-पहला
 
छठवां—प्रवचन (मैं एक विध्वंसक हूं)  
(दिनांक 26 अप्रैल 1977 ओशो आश्रम पूना।) 

पहला प्रश्न: ओशो, मैंने इधर हाल ही में संबोधि के विषय में दिव्य-स्वप्न देखने शुरू किए हैं, जो कि प्रेम व प्रसिद्धि के दिव्य-स्वप्नों से भी अधिक मनोरम हैं। क्या आप दिव्य-स्वप्न देखने के ऊपर कुछ कहेंगे?

यह प्रश्न प्रेम पंकज का है। जहां तक प्रेम और प्रसिद्धि का संबंध है, दिव्य-स्वप्न देखना पूर्णता सही है--वे स्वप्न-संसार के ही अंग है। तुम जितने चाहो स्वप्न देख सकते हो। प्रेम एक स्वप्न है, ऐसे ही प्रसिद्धि भी, वे स्वप्न के विपरीत नहीं हैं। सच तो यह है कि जब स्वप्न देखना बंद हो जाता है, तो वे भी गायब हो जाते है। उनका असित्व उसी आयाम में है, सपनों के आयम में।
सपना तो अंधकार की भांति है। यह तभी तक रहता है जब तक कि प्रकाश नहीं होता है। जब प्रकाश फे लता है, अंधकार बस वहां से विलीन हो जाता है, वह पल भर भी वहां रह नहीं सकता। सपना इसलिए है क्योंकि जीवन अंधकार पूर्ण, फीका और उदासीन है। सपना तो तुम्हारी एक पूरकता जैसा होता है।

सोमवार, 31 अगस्त 2020

तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-01)-प्रवचन-05


तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision-(सरहा के गीत) भाग-पहला

पांचवां-प्रवचन-(मनुष्य एक कल्पना है)
(दिनांक 25 अप्रैल 1977 ओशो आश्रम पूना।) 
सूत्र:

सड़े मांस की गंध पर रीझने वाली मक्खी को
चंदन की सुगंध भी, जान पडती है दुर्गंध
प्राणी जो तज देते है निर्वाण
लोलुप हो जाते हैं क्षुद्र संसारिक विषयों के

जल से भरे ताल में बैल के पदचिंह
जल्दी ही हो जाते हैं शुष्क, वैसे ही वह दृढ़ मन
जो भरपूर है उन गुणों से जो है अपूर्ण
शुष्क हो जाएंगी ये अपूर्णताएं समय पर

समुद्र का नमकीन जल जैसे हो जाता है मधुर,
जब पी लेते है मेघ उसे
वैसे ही वह स्थिर मन, काम जो करता है
औरों के हेतु बना देता है अमृत
उन एंन्द्रिक-विषयों के विष को

यदि वर्णनातित घटे, कभी नहीं रहता कोई असंतुष्ट
यदि अकल्पनिय, होगा यह स्वयं आनंद ही
यद्यपि भय होता है मेघ से तड़ित का
फसलें पकती है जब यह बरसता है जल

मंगलवार, 4 अगस्त 2020

तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-01)-प्रवचन-04


तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision-(सरहा के गीत)-भाग-पहला

चौथा-प्रवचन-(प्रेम एक मृत्यु है)  
(दिनांक 24 अप्रैल 1977 ओशो आश्रम पूना।) 

पहला प्रश्न: ओशो, आप में वह सब-कुछ हैं जो मैंने चाहा था, या जो मैंने कभी चाही या मैं कभी चाह सकती थी। फिर मुझ में आपके प्रति इतना प्रतिरोध क्यों है?

शायद इसी कारण--यदि तुममें मेरे प्रति गहन प्रेम है तो गहन प्रतिरोध भी होगा। वे एक-दूसरे को संतुलित करते हैं। जहां कहीं पर प्रेम है, वहां प्रतिरोध तो होगा ही। जहां कहीं भी तुम बहुत अधिक आकर्षित होते हो, तुम उस स्थान से, उस जगह से भाग जाना भी चाहोगे--क्योंकि अत्यधिक आकर्षित होने का अर्थ है कि तुम अतल गहराई में गिरोगे, जो तुम स्वयं हो वह फिर न रह सकोगे।
प्रेम खतरनाक है। प्रेम एक मृत्यु है। यह स्वयं मृत्यु से भी बड़ा घातक है, क्योंकि मृत्यु के बाद तो तुम बचते हो लेकिन प्रेम के बाद तुम नहीं बचते। हां, कोई होता है परंतु वह दूसरा ही होता है, आपमें कुछ नया पैदा होता है। परंतु तुम तो चले गए इसलिए भय है।

शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-01)-प्रवचन-03

तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision-(सरहा के राजगीत) (भाग-एक)

तीसरा प्रवचन—(मधु तुम्हारा है)  
(दिनांक 23 अप्रैल 1977 ओशो आश्रम पूना।)  

एक मेध की तरह, जो उठता है समुंद्र से
अपने भीतर समाएं वर्षा को,
करती हो आलिंगन घरती जिसका,
वैसे ही, आकाश की भांति
समुंद्र भी उतना ही रहता है,
न बढ़ता, न घटता है।

अतः, उस स्वच्छंदता से जो कि है अद्वितीय
बुद्ध की पूर्णमाओं से भरपूर
जन्मती हैं चेतनाएं सभी
और आती है विश्राम हेतु वहीं
पर यह साकार है न निराकार है

वे करते हैं विचरण अन्य मार्गों पर
और गंवा बैठते हैं सच्चे आनंद को
उद्धीपक जो निर्मित करते है, खोज में उन सुखों की
मधु है उसके मुख में, इतना समीप...
पर हो जाएंगा अदृश्य, यदि तुरंत ही न करले वे उसका पान

पशु नहीं समझ पाते कि संसार है दुख,
पर समझते हैं वे विद्वान तो
जो पीते हैं इस स्वर्मिक अमृत को
जबकि पशु भटकते फिरते हैं
एंद्रिंक सुखों के लिए 

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision -भाग-01)-प्रवचन-02


तंत्रा-विज्ञान-Tantra Vision: (सरहा के गीत) भाग-पहला


दूसरा प्रवचन-The goose is out!-(हंस बाहर है)
(दिनांक 22 अप्रैल 1977 ओशो आश्रम पूना।) 
प्रश्नचर्चा-
पहला प्रश्न: ओशो, शिव का मार्ग भाव का है, हृदय का है। भाव को रूपांतरित करना है। प्रेम को रूपांतरित करना है ताकि यह प्रार्थना हो जाए। शिव के मार्ग में तो भक्त और मूर्ति रहते हैं, भक्त और भगवान रहते हैं। आत्यंतिक शिखर पर वे दोनों एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। इसे ध्यान से सून लो: जब शिव का तंत्र अपने आत्यंतिक आवेग में पहुंचता है, ‘मैं’ ‘तूमें विलीन हो जाता है, और तू- मैंमें विलीन हो जाता है--वे साथ-साथ होते हैं, वे एक इकाई हो जाते हैं।

जब सरहा का तंत्र अपने आत्यंतिक शिखर पर पहुंचता है, तब यह पता चलता है: न तुम हो, न तुम सत्य हो, न तुम्हारा अस्तित्व है, न तुम सही हो, न तुम्हारा अस्तित्व है, और न ही मेरा, दोनों ही वहां विलीन हो जाते हैं। दो शून्य मिलते हैं--मैं नही, तू नहीं, न तू न मैं। दो शून्य, दो रिक्त आकाश एक दूसरे में विलीन हो जाते हैं, क्योंकि सरहा के मार्ग पर सारा प्रयास यही है, कि विचार को कैसे विलीन किया जाए, और मैं और तू दोनों विचार के ही अंग हैं।
जब विचार पूर्णतः विलीन हो जाए, तुम स्वयं को मैंकैसे कह सकते हो? और किसे तुम अपना ईश्वर कहोगे? ईश्वर विचार का अंग है, यह एक चिर-निर्मित, विचार-सृजित, मन-सृजित बात है। अतः समस्त मन-सृजन विलीन हो जाते हैं, और केवल शून्य रिक्तता उत्पन्न होती है।

शनिवार, 25 जुलाई 2020

तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-01)-प्रवचन-01


तंत्रा-विजन-(सरहा के गीत)-भाग-पहला

पहला-प्रवचन--(One whose arrow is shot) (जिसका एक तीर नीशाने पर)

(सरहा के पदों पर दिए गए ओशो के अंग्रेजी प्रवचनों का दिनांक 21 अप्रैल, 1977 ओशो सभागार, पूना में दिये गए बीस अमृत प्रवचनों में से पहले दस प्रवचनों तथा उसके शिष्यों द्वारा प्रस्तुत प्रश्नों के उत्तरों का हिंदी अनुवाद)
सूत्र:

महान मंजुश्री को मेरा प्रणाम,
प्रणाम हैं उन्हें
जिन्होंने किया सीमित को अधीन

जैसे पवन के आघात से
शांत जल में उभर आती है, उतंग तरंगें,
ऐसे ही देखते हो सरहा
अनेक रूपों में, हे राजन!
यद्यपि है वह एक ही व्यक्ति।

भेंगा है जो मूढ़
दिखते उसे एक नहीं, दो दीप,
जहां दृश्य और द्रष्टा नहीं दो,
अहा! मन करता संचालन
दोनों ही पदार्थगत सत्ता का।

गृहदीप यद्यपि प्रज्वलित,  जीते अंधेरे में नेत्रहिन,
सहजता से परिव्याप्त सभी,
निकट वह सभी के,
पर रहती सब परे मोहग्रस्त के लिए।

सहजता से परिव्याप्त सभी, निकट वह सभी के,
पर रहती सदा परे मोहग्रस्त के लिए।
सरिताएं हो अनेक, यद्यपि,
सागर मे मिल होती है एक,
हों झूठ अनेक परंतु
होगा सत्य एक, विजयी सभी पर।
मिटेगा अंधकार, कितना ही हो गहन,
उदित होने पर एक ही सूर्य के।

इस प्रथ्वी पर जितने भी सदगुरु हुए हैं उनमें गौतम बुद्ध सर्वश्रेष्ठ हैं। ईसा क्राइस्ट, महावीर, मोहम्मद और अन्य कई महान सदगुरु हुए परंतु बुद्ध फिर भी इन सबमें श्रेष्ठ हैं। ऐसा नहीं है कि बुद्ध की ज्ञानोपलब्धि किसी अन्य की ज्ञानोपलब्धि से अधिक है--ज्ञान की उपलब्धि न कम होती है न ज्यादा। वस्तुतः गुणात्मक दृष्टि से तो बुद्ध भी उसी चेतना को प्राप्त हुए जिस चेतना को महावीर, क्राइस्ट, जरथुस्त्रा तथा लाओत्सु प्राप्त हुए। अतः यह सवाल ही नहीं है कि कौन किससे अधिक ज्ञानोपलब्धि को प्राप्त हुआ। परंतु जहां तक सदगुरु होने का प्रश्न है, बुद्ध अतुलनीय हैं, क्योंकि उनके द्वारा हजारों व्यक्तियों को ज्ञान उपलब्ध हुआ।

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision-भाग-01)-ओशो

तंत्रा-विज्ञान-(Tantra Vision)-भाग-पहला (हिन्दी अनुवाद)

(सरहा के पदों पर दिए गए ओशो के अंग्रेजी प्रवचनों Tantra Vision का दिनांक 21 अप्रैल, 1977 ओशो सभागार, पूना में दिये गए बीस अमृत प्रवचनों में से पहले दस प्रवचनों तथा उसके शिष्यों द्वारा प्रस्तुत प्रश्नों के उत्तरों का हिंदी अनुवाद)
..........  तंत्र कहता है: किसी चीज की निंदा न करो, निंदा करने की वृत्ति ही मूढ़तापूर्ण है। निंदा करने से तुम अपने विकास की पूरी संभावना रोक देते हो। कीचड़ की निंदा न करो, क्योंकि उसी में कमल छिपा है। कमल पैदा करने के लिए कीचड़ का उपयोग करो। माना कि कीचड़ अभी तक कीचड़ है कमल नहीं बना है, लेकिन वह बन सकता है। जो भी व्यक्ति सृजनात्मक है, धार्मिक है, वह कमल को जन्म देने में कीचड़ की सहायता करेगा, जिससे कि कमल की कीचड़ से मुक्ति हो सके।
सरहा तंत्र-दर्शन के प्रस्थापक हैं। मानव-जाति के इतिहास की इस वर्तमान घड़ी में जब कि एक नया मनुष्य जन्म लेने के लिए तत्पर है, जब कि एक नई चेतना द्वार पर दस्तक दे रही है, सरहा का तंत्र-दर्शन एक विशेष अर्थवत्ता रखता है। और यह निश्चित है कि भविष्य तंत्र का है, क्योंकि द्वंदात्मक वृत्तियां अब और अधिक मनुष्य के मन पर कब्जा नहीं रखा सकतीं। इन्हीं वृत्तियों ने सदियों से मनुष्य को अपंग और अपराध-भाव से पीड़ित बनाए रखा है। इनकी वजह से मनुष्य स्वतंत्र नहीं, कैदी बना हुआ है। सुख या आनंद तो दूर इन वृत्तियों के कारण मनुष्य सर्वाधिक दुखी है। इनके कारण भोजन से लेकर संभोग तक और आत्मीयता से लेकर मित्रता तक सभी कुछ निंदित हुआ है। प्रेम निंदित हुआ, शरीर निंदित हुआ, एक इंच जगह तुम्हारे खड़े रहने के लिए नहीं छोड़ी है। सब-कुछ छीन लिया है और मनुष्य को मात्र त्रिशंकु की तरह लटकता छोड़ दिया है ।

मनुष्य होने की कला–(A bird on the wing)-प्रवचन-11

सजग,शांत और संतुलित बने रहो--प्रवचन-ग्याहरवां

मनुष्य होने की कला--(The bird on the wing)-ओशो की बोली गई झेन और बोध काथाओं पर अंग्रेजी से हिन्दी में रूपांतरित प्रवचन माला)
कथा: -
भिक्षु जुईगन अपना प्रत्येक दिन स्वयं अपने आप मैं जोर-जोर से-
यह कहते हुए ही शुरू करता था- ''मास्टर! क्या तुम हो वहां?’’
और वह स्वयं ही उसका उत्तर भी देता था- '' जी हां श्रीमान? मैं हूं। ''
तब वाह कहता- '' अच्छा यही है- सजग, शांत और संतुलित बने रहो।''
और वह लौट कर जवाब देता—‘’जी श्रीमान? मैं यही करूंगा ''
तब वह कहता- ''और अब देखो वे कहीं तुझे बेवकूक न बना दें।‘’
और वह ही उसका उत्तर देता- ''अरे नहीं श्रीमान? मैं नहीं बगूंगा
मैं हरगिज नहीं बनूंगा?

ध्यान टुकड़ों में करने वाली चीज नहीं हो सकती, वह एक सतत प्रयास होना चाहिए। प्रत्येक को हर क्षण सचेत, सजग और ध्यानपूर्ण होना चाहिए। लेकिन मन एक चालबाजी करता है, तुम सुबह ध्यान करते हो और तब उसे उठाकर बगल में रख देते हो अथवा तुम मंदिर जाकर प्रार्थना करते हो और तब भूल जाते हो। तब तुम पूरी तरह बिना ध्यान इस संसार में वापस लौटते हरे, लगभग अचेत से जैसे तुम सम्मोहित निद्रा में चल रहे हो।