एक फूल के खिल जाने से,
आती उपवन की आहट है।
दूर कहीं पर नाद गुंजता,
अब पिया मिलन की आस है।
फागुन का ये अलसावन
है प्रेम रंजन मधुभावन
गा रे गा मन फागुन के गुन
पद चाप सूने प्रीतम के आवन
भीतर-भीतर कुछ पगता है
तभी तो जीवन रंग भरता है।।
एक फूल के खिल जाने से,
आती उपवन की आहट है।
दूर कहीं पर नाद गुंजता,
अब पिया मिलन की आस है।
फागुन का ये अलसावन
है प्रेम रंजन मधुभावन
गा रे गा मन फागुन के गुन
पद चाप सूने प्रीतम के आवन
भीतर-भीतर कुछ पगता है
तभी तो जीवन रंग भरता है।।
है सृष्टि के लबों पर, फैलती मुस्कान
हो तुम।
गीत गाते भ्रमरों के, गुंज का
गुंजान हो तुम।।
गा रहा है गीत कोई, थी कभी नीरवता सोई।
बैठ कर अकुलाहटों में, दूर तनहाई
भी रोई।
किन सुरों में है गुनगुनाता,
विहंगम के कंठ बैठ गाता,
पुष्प बन कभी मुसकुराता,
दिखता वो नहीं है फिर भी
है जहां देखो वो पाता।
है वो कृति के पर भी,
सृष्टि की पहचान हो तुम।।
है सृष्टि के लबों पर,
फैलती मुस्कान हो तुम।
21- ज्योति विनिंदक रूप-(कविता)
अंतर के दर्पण में मैंने..
ज्योति-विनिंदक रूप उतारा,
पर असीम को सीमित करना..
सहज नहीं इससे मैं हारा;
निर्वासन, असफल रेखाएं,
हाथ उठा कर गगन निहारें;
चित्र किसी का प्राण अजाने..
मेरा ही आकार बन गया!
आड़ी तिरछी रेखाओं से
एक नया रूप आकार बन गया।
तू बांसुरी बने तो तुझे होंठों से लगा लूं।
तू फूल बने तो अपनी सांसो में समा लूं।
तू पीर बने तो तुझे मैं सीने से लगा लूं।
तू आस बने तो तुम्हें जीवन में बसा लूं।
तन भी फूल मन फूल, हर और फूल
समाया।
तेरी हंसी में प्रीतम हमने फूलो को हंसता पाया।
अरण्य का मौन सधन, कहता है कुछ
गुन-गन।
मन का मर्म इति, कहता है मत इसे
सून।
चीढ़ के पात-पात को, छूती है जब
पवन
कानों में गुंज उठता जल सा क्रीड़ा क्रंदन
अंबर पर वो तैर रहे है, धवल मेघ
छूते पर्वत
पल-पल करते वे अठखेली, छवि बनते
नित नूतन
लहर-लहर दौड़े फिरते, कौन पकड़ पाता अब उनको
कौन? कहता है
पत्थरों तुझे पीड़ा नहीं होती,
वो रो सकता है
और कर सकता है चीत्कार,
वो करता है
कुछ दिल की बातें कभी-कभी
मगर किसी मौन फुसफुसाहट कि तरह
जो हमारे कानों को
लगती है कुछ अनसुनी।
वो इतनी मंद्र ओर सुकोमल सी होती है।
फिसलन मन की अकड़न तन की
बस बन गया सारा पतझड़ जीवन
नहीं सुलझती सुलझी उलझन
है प्रेम प्रीत का ये कैसा बंधन
आओ साजन गदराया फागुन
भर गया मन में चंचल चितवन
दबे पाँव आकर सिरहाने
हवा लगी बाँसुरी बजाने
दुखता सिर सहलाने लगते
फागुन के दिन चार है हंसते
हम दीप जलाए बैठे थे, इक आस लगाए
बैठे थे।
हम दिल के टूटे तारों से, कोई
गीत बनाए बैठे थे।
इक आस बंधी थी जीवन की,आती-जाती श्वास भी थी।
जो महक उठी थी प्राणों में, वो
खो हुई एहसास सी थी।
वो दूर भले ही रहती थी, पर रहते
दिल के पास ही थी।
जो आकर नहीं जाती है कभी, अनबूझी
सी प्यास सी थी।
वो आकर भी कभी आ न सके, हम आस लगाए बैठे थे.....
ओ प्यारे न्यारे प्रीतम..
तुम्हारे प्रेम को मैं जानती हूं
तुम अपने प्रेम की बाते मुझे मत बतलाओ
मैंने उन्हें छूआ है, उसमें में
डूबी हूं।
उसने मुझे घेरा है अपने आगोश में
जानते हो तुम अब मैं उसे
भली भांति जानने लगी हूं
तुम्हारी उस प्रेम दृष्टि को मैंने
अब पल-पल अनुभव किया है,
और सबसे अधिक बुरा यह है कि
तुम्हारा चाबुक मारने जैसा डांट-फटकार
में भी मैंने उस प्रेम का अनुभव महसूस करने लगी हूं।
हमने तो चाहा था पल भर के लिए
केवल तुम्हारा कंधा,
की जीवन के इस लम्बे सफर की
उघती उस लम्बी थकान में,
कुछ रिश्ते दर्द को सहारा मिले,
लेकिन हाय संसार!
तुमने तो झटक दिया दामन
किसी बेरुखी से।
परंतु देखो मेरा भाग्य,
क्या तुझ पर इतराऊं
या जलन करूं तुझ पर
प्रियतम तेरे
सपनों की, मधुशाला मैंने देखी है।
होश बढ़ाता इक-इक प्याला, ऐसी
हाला देखी है।।
मदिरालय जाने बालों ने,
भ्रम न जाने क्यों पाला।
हम तो पहुंच गए मंजिल पे,
पीछे रह गई मधुशाला।।
शब्दों कि मधु, शब्दों
की हाला,
शब्दों की ही बनी मधुशाला।
आँख खोल
कर देख सामने,
थिरक रही जीवित हाला।।
ओ प्यारे, मेरे न्यारे,
यूं काहे
पुकारे, मेरे प्रीतम।
तुम्हारे प्रेम को मैं जानती हूं
तुम अपने प्रेम की बाते
यू मुझे मत बतलाओ
उसने मुझे छूआ है,
केवल मुझे ही नहीं मेरे सजल गात का भी
मैंने उसे महसूस किया है,
मैं उस अथाह सागर में डूबी हूं।
मैं उस भेद भरे भाव को
भली भांति जानने लगी हूं
तुम्हारी उस प्रेम दृष्टि को मैंने
उसे पल-पल अनुभव किया है,
और सबसे अधिक बुरा यह है कि
अरण्य का मौन सधन, कहता है कुछ
गुन-गन।
मन का मर्म इति, डरता है तुम
इसकी मत सून।
चीढ़ के पात-पात, झूमता उच्छवास
सा तन
नाच उठता उसका अंग, छूती जब उसे पवन
दूर का कोलाहल नाद कानों में विभेद गुंजन
नाचती लहरो से उठता जल का क्रीड़ा क्रंदन
अंबर पर तैरते, वो धवल मेघ छूते
पर्वत पर
पल-पल करते अठखेलियां,छवियां बनती भ्रम-विधन
पुष्प खिलता बीज से ही,
क्या बीज ही उसकी गति है?
कष्ट, कंटक, कोपलों में, उत्ताप पाकर वह मुस्कराया।
बन कली मधुमास की जब, चहक कर उत्सव
मनाया।
भ्रमरों की गुंज के संग, मधुरता का कोई गीत गाया।
तपती धारा की उष्णता में, साहस
कब उसने गंवाया।
मेघ की गर्जन को सुन कर, न वो सहमा न घबराया।
मैंने कुछ शब्दों को कहां,
चलोगे हमारे साथ।
हम मिल कर रचेंगे,
एक नया इतिहास।
वो ठिठक कर खड़े ही रह गए,
पल में मुझसे दूर झटक कर
मेरे बुने वो सपने यूं पल ही में दिग-भ्रमित बह गए
मेरी सपनों की गीतांजलि की उखड़ गयी सब सांसे।
और कहने लगी चुप से मेरे कानों में मत बांधो मुझे
इतना संगठित करने अब नहीं है साहस किसी में।
मैंने उन्हें समझाया, बुझाया,
ओर फुसलाया।
चलो न सही परंतु कोई कुरान, बाइबिल, गीता,
ताओ-ते-चिंग, हम मिल कर क्या
नहीं रच दे,
उन शब्दों ने बड़ी बेरहमी से मुझे घूर कर देखा
अध्याय -26
7 अक्टूबर 1976 सायं चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में
[पश्चिम से हाल ही में आये एक संन्यासी से:]
ये समूह आपको थोड़ा सा बोझमुक्त करने की प्रक्रिया मात्र हैं, क्योंकि ईश्वर बहुत दूर नहीं है; आपको बस भारहीनता की आवश्यकता है। बस पंखों की आवश्यकता है। वह बहुत करीब है, लेकिन हर कोई बहुत बोझिल है -- चट्टानों पर चट्टानें, और हम उन चट्टानों को ऐसे संजोते हैं जैसे वे खजाने हों। और उन चट्टानों के नीचे हमारे पंख नष्ट हो रहे हैं और हम उड़ नहीं सकते।
मनुष्य की नियति है उड़ना, जितना
संभव हो उतना ऊपर उठना। जहाँ तक शरीर का सवाल है, मनुष्य
को पंख नहीं दिए गए हैं, लेकिन जहाँ तक आत्मा
का सवाल है, उसके पास सबसे बड़े पंख हैं। मनुष्य
एक आध्यात्मिक दुनिया है जिसके पास बड़े पंख हैं जो उसे अस्तित्व
के सबसे दूर के छोर तक ले जा सकते हैं।
लेकिन फिर बोझ से मुक्ति की आवश्यकता है। और यह बोझ से मुक्ति हमेशा से सभी धर्मों का सबसे आवश्यक हिस्सा रही है। यही यीशु का मतलब है जब वह कहते हैं, 'धन्य हैं वे जो आत्मा में दीन हैं, क्योंकि परमेश्वर का राज्य उनका है।' आत्मा में दीन का अर्थ है वे जो बोझ से मुक्त हैं, पूरी तरह से बोझ से मुक्त हैं।