(सदमा - उपन्यास)
जीवन
के उतर चढ़ाव के बीच में एक विश्राम स्थल भी आता है। वह प्रत्येक मनुष्य के जीवन
में वो क्षण आता है। जिसे हम देख सके या न देख सके। बस अगर आपकी चढ़ाई कठिन है। तो
आपको वो विश्राम स्थल बड़े आराम से जीवन में जब उतरेगा,
या आयेगा तब आप उस विश्राम का को आसानी से महसूस कर सकेंगे। यही सब
नेहालता और सोम प्रकाश के आस पास घट रहा था। उनके जीवन में तनाव पीड़ा और वेदना जो
जन्म-जन्म तन-मन पर उन दोनों के माध्यम से झेली थी। उस का विश्रांत का अब आ गया
था। अब दोनों को जीवन में कुछ सीधा और साफ मार्ग दिखाई दे रहा था।
मकान का बनना शुरू हो
गया था। दूसरा नेहालता ने एक ‘’वेस्पा 150’’ स्कुटर ले लिया था। अभी तो उनके यहां पर कार खड़ी करने की जगह नहीं थी। इसलिए
स्कूल जाने आने के लिए दोनों के लिए यह उपयोगी था। नेहालता बचपन से साइकिल तो बड़े
आराम से चला लेती थी। इसलिए दो-तीन दिन में ही दोनों उस स्कुटर को बड़े आराम से
चलाने लगे। पहले तो सोम प्रकाश को उसे चलने में डर लगा। क्यों वह काफी दिनों बाद
उसे चला रहा था। कालेज के जमाने में उसने यार दोस्तों का स्कुटर चला कर सीखा था। परंतु
जब नेहालता ने खूद चलाना शुरू किया तो सोम प्रकाश की भी हिम्मत बढ़ गई। इस से समय
भी बच गया और आराम भी हो गया। बाजार से समान ले कर आने में काफी समय लग जाता था।
और दूसरी बात अधिक सामान ला भी नहीं सकते थे। क्योंकि उसका वज़न दूरी के कारण कुछ
बढ़ जाता सा महसूस होता था। ये आप भी जीवन में जी कर देख सकते है। आप काम से कम
सामान भी अधिक दूरी तक ले जाते हुए थकान महसूस करेंगे
मकान का काम अपनी गति से चल रहा था। परंतु एक आदमी ऐसा चाहिए जो उसकी देख भाल कर सकते। वरना ये मजदूर तो केवल मटर गस्ती करते है। और साथ में सामान की बरबादी भी। इस बीच एक काम और अच्छा हो गया, छूटियों में पेंटल भी आ गये थे। अब धीरे-धीरे मकान बनने ने तेजी पकड़ ली थी। वह लगभग अपनी पूर्णता की और अग्रसर हो रहा था। बस थोड़ा चारदिवारी का कार्य उस का पलस्टर और रंग पेंट चल रहा था। इसके बाद जो सामने लोहे का गेट लगना है वह बाकि था। बस अब बरसात से पहले ही ये काम भी हो जाये तो अच्छा रहेगा।









