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बुधवार, 13 मई 2026

02-एक गीत उठा है प्राणों में (कविता)— (कविता) मनसा-मोहनी दसघरा

 02-एक गीत उठा है प्राणों में (कविता)

एक गीत उठा जब प्राणों में, फिर क्यों उसको मैं गा न सका।

कोई टीस उठी जब ह्रदय में, प्रीतम  तुझको दिखला न सका।       

 

कोई समीर मधुर जीवन में चली,

फिर नाच  उठा   आँगन सारा?

देखो   जीवन  का  बोझ लिए,

नित चल-चल कर अब मैं हारा।

 जो  झूम  रहा  जीवंत स्पंदन

क्‍यों मुझको वो बहला न सका।

इक गीत उठा  जब प्राणों में

फिर क्‍यों उसको मैं अब गा न सका।

21-GOD IS NOT FOR SALE - (ईश्वर बिकाऊ नहीं है) - का हिंदी अनुवाद

GOD IS NOT FOR SALE–(ईश्वर बिकाऊ नहीं है)-का हिंदी अनुवाद

अध्याय -21

01 अक्टूबर 1976 अपराह्न, चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

[एक संन्यासी कहते हैं: मुझे लगता है कि अगर मैं आपसे जो भी सामने आता है, उसके बारे में नहीं पूछूंगा - हर सप्ताह लगभग कुछ नया सामने आता है - तो मैं रास्ते से भटक जाऊंगा; मैं अविश्वसनीय अहंकार यात्रा पर निकल जाऊंगा।]

मि एम, हम्म। गलत दिशा में जाने का डर भी अहंकार की यात्रा है। तुम गलत स्थिति में होने से इतना क्यों डरते हो? -- क्योंकि गलत स्थिति अहंकार को बहुत तोड़ती है और सही स्थिति अहंकार को बहुत बढ़ाती है। वास्तव में भविष्य के बारे में सोचना अहंकार के संदर्भ में सोचना है। इसलिए वर्तमान क्षण के साथ रहो यदि यह तुम्हारे विकास के लिए आवश्यक है -- कि तुम्हें गलत दिशा में जाना चाहिए -- यह होगा। और तुम इसे टाल नहीं सकते, क्योंकि इसे टालना तुम्हारे अपने विकास से बचना होगा। तुम किसी भी चीज से बच नहीं सकते। इसलिए जो भी उपलब्ध है, उसका अपनी पूरी क्षमता से आनंद लो; इसका पूरी तरह से जवाब दो। इस क्षण को वह सब कुछ देने दो जो यह तुम्हें दे सकता है। और अगला क्षण इसी क्षण से जन्म लेने वाला है

अगर इस पल को सही तरीके से जिया गया है, तो अगला पल कहां से आएगा? यह इसी पल से विकसित होगा। यह उसी गुण को ग्रहण करने वाला है। यह इस पल के साथ एक निरंतरता होगी। अगला पल अचानक से नहीं रहा है।

मंगलवार, 12 मई 2026

01-उन्माद बना कुछ रहने दो — (कविता) मनसा-मोहनी दसघरा

 01-उन्माद बना कुछ रहने दो — (कविता)

मत पूछो बहते जीवन का, उन्माद रहेगा कब तक।

आती जाती इन सांसों का, साथ चलेगा कब तक।।

 

बजने दो दिल के तारों से, झंकार छुपे उन रागों को।

जीवन को फिर से बुनने है, उन उलझे टूटे धागों को।

मत पूछो सुने ह्रदय में,  आलाप उठेगा कब तक।।

आती जाती इन सांसों का, साथ चलेगा कब तक।।

 

शून्य की मधुरस बेला में कुछ मौन मधुर क्षण जीने दो।

आपने आनंद के झरने को, बस खोल जरा तुम बहने दो।

मत पूछो आनंद-गुंजन का,माह गान बहेगा कब तक।।

आती जाती इन सांसों का,  साथ चलेगा कब तक।।

सोमवार, 11 मई 2026

56-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा (अंतिम पोस्ट)

 अध्याय-56

(सदमा - उपन्यास)

जीवन के उतर चढ़ाव के बीच में एक विश्राम स्थल भी आता है। वह प्रत्येक मनुष्य के जीवन में वो क्षण आता है। जिसे हम देख सके या न देख सके। बस अगर आपकी चढ़ाई कठिन है। तो आपको वो विश्राम स्थल बड़े आराम से जीवन में जब उतरेगा, या आयेगा तब आप उस विश्राम का को आसानी से महसूस कर सकेंगे। यही सब नेहालता और सोम प्रकाश के आस पास घट रहा था। उनके जीवन में तनाव पीड़ा और वेदना जो जन्म-जन्म तन-मन पर उन दोनों के माध्यम से झेली थी। उस का विश्रांत का अब आ गया था। अब दोनों को जीवन में कुछ सीधा और साफ मार्ग दिखाई दे रहा था।

मकान का बनना शुरू हो गया था। दूसरा नेहालता ने एक ‘’वेस्पा 150’’ स्कुटर ले लिया था। अभी तो उनके यहां पर कार खड़ी करने की जगह नहीं थी। इसलिए स्कूल जाने आने के लिए दोनों के लिए यह उपयोगी था। नेहालता बचपन से साइकिल तो बड़े आराम से चला लेती थी। इसलिए दो-तीन दिन में ही दोनों उस स्कुटर को बड़े आराम से चलाने लगे। पहले तो सोम प्रकाश को उसे चलने में डर लगा। क्यों वह काफी दिनों बाद उसे चला रहा था। कालेज के जमाने में उसने यार दोस्तों का स्कुटर चला कर सीखा था। परंतु जब नेहालता ने खूद चलाना शुरू किया तो सोम प्रकाश की भी हिम्मत बढ़ गई। इस से समय भी बच गया और आराम भी हो गया। बाजार से समान ले कर आने में काफी समय लग जाता था। और दूसरी बात अधिक सामान ला भी नहीं सकते थे। क्योंकि उसका वज़न दूरी के कारण कुछ बढ़ जाता सा महसूस होता था। ये आप भी जीवन में जी कर देख सकते है। आप काम से कम सामान भी अधिक दूरी तक ले जाते हुए थकान महसूस करेंगे

मकान का काम अपनी गति से चल रहा था। परंतु एक आदमी ऐसा चाहिए जो उसकी देख भाल कर सकते। वरना ये मजदूर तो केवल मटर गस्ती करते है। और साथ में सामान की बरबादी भी। इस बीच एक काम और अच्छा हो गया, छूटियों में पेंटल भी आ गये थे। अब धीरे-धीरे मकान बनने ने तेजी पकड़ ली थी। वह लगभग अपनी पूर्णता की और अग्रसर हो रहा था। बस थोड़ा चारदिवारी का कार्य उस का पलस्टर और रंग पेंट चल रहा था। इसके बाद जो सामने लोहे का गेट लगना है वह बाकि था। बस अब बरसात से पहले ही ये काम भी हो जाये तो अच्छा रहेगा।

जीहाद -(कहानी) मुंशी प्रेमचंद

 जीहाद -(कहानी) प्रेम चंद

 

बहुत पुरानी बात है। हिंदुओं का एक काफ़िला अपने धर्म की रक्षा के लिए पश्चिमोत्तर के पर्वत-प्रदेश से भागा चला आ रहा था। मुद्दतों से उस प्रांत में हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रहते चले आये थे। धार्मिक द्वेष का नाम न था। पठानों के जिरगे हमेशा लड़ते रहते थे। उनकी तलवारों पर कभी जंग न लगने पाता था। बात-बात पर उनके दल संगठित हो जाते थे। शासन की कोई व्यवस्था न थी। हर एक जिरगे और कबीले की व्यवस्था अलग थी। आपस के झगड़ों को निपटाने का भी तलवार के सिवा और कोई साधन न था। जान का बदला जान था, खून का बदला खून; इस नियम में कोई अपवाद न था। यही उनका धर्म था, यही ईमान; मगर उस भीषण रक्तपात में भी हिंदू परिवार शांति से जीवन व्यतीत करते थे। पर एक महीने से देश की हालत बदल गयी है। एक मुल्ला ने न जाने कहाँ से आ कर अनपढ़ धर्मशून्य पठानों में धर्म का भाव जागृत कर दिया है। उसकी वाणी में कोई ऐसी मोहिनी है कि बूढ़े, जवान, स्त्री-पुरुष खिंचे चले आते हैं। वह शेरों की तरह गरज कर कहता है-खुदा ने तुम्हें इसलिए पैदा किया है कि दुनिया को इस्लाम की रोशनी से रोशन कर दो, दुनिया से कुफ्र का निशान मिटा दो। एक काफिष्र के दिल को इस्लाम के उजाले से रोशनी कर देने का सवाब सारी उम्र के रोजे, नमाज और जकात से कहीं ज्यादा है। जन्नत की हूरें तुम्हारी बलाएँ लेंगी और फरिश्ते तुम्हारे कदमों की खाक माथे पर मलेंगे, खुदा तुम्हारी पेशानी पर बोसे देगा। और सारी जनता यह आवाज सुन कर मजहब के नारों से मतवाली हो जाती है। उसी धार्मिक उत्तेजना ने कुफ्र और इस्लाम का भेद उत्पन्न कर दिया है। प्रत्येक पठान जन्नत का सुख भोगने के लिए अधीर हो उठा है। उन्हीं हिंदुओं पर जो सदियों से शांति के साथ रहते थे, हमले होने लगे हैं। कहीं उनके मंदिर ढाये जाते हैं, कहीं उनके देवताओं को गालियाँ दी जाती हैं। कहीं उन्हें जबरदस्ती इस्लाम की दीक्षा दी जाती है। हिंदू संख्या में कम हैं, असंगठित हैं; बिखरे हुए हैं, इस नयी परिस्थिति के लिए बिलकुल तैयार नहीं। उनके हाथ-पाँव फूले हुए हैं, कितने ही तो अपनी जमा-जथा छोड़ कर भाग खड़े हुए हैं, कुछ इस आँधी के शांत हो जाने का अवसर देख रहे हैं। यह काफिष्ला भी उन्हीं भागनेवालों में था। दोपहर का समय था। आसमान से आग बरस रही थी। पहाड़ों से ज्वाला-सी निकल रही थी। वृक्ष का कहीं नाम न था। ये लोग राज-पथ से हटे हुए, पेचीदा औघट रास्तों से चले आ रहे थे। पग-पग पर पकड़ लिये जाने का खटका लगा हुआ था।

20-GOD IS NOT FOR SALE - (ईश्वर बिकाऊ नहीं है) - का हिंदी अनुवाद

GOD IS NOT FOR SALE–(ईश्वर बिकाऊ नहीं है)-का हिंदी अनुवाद

अध्याय-20

31 अक्टूबर 1976 सायं चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

‘’स्वामी देव महासत्व’’ यह तुम्हारा नाम होगा... और इसे समझाने के लिए कुछ बातें समझनी होंगी। सदियों से मनुष्य के अस्तित्व के बारे में एक चिरस्थायी बहस चल रही है -- क्या मनुष्य संसार में सार लेकर आता है या बिना किसी सार के आता है और कर्मों के माध्यम से, जीवन-शैली के माध्यम से, अनुभव के माध्यम से सार को संचित करता है... क्या मनुष्य बीज की तरह आता है या खाली आता है। बीज में पहले से ही पूरा वृक्ष विद्यमान है -- यह दिखाई नहीं दे सकता है लेकिन सार रूप में पूरा वृक्ष बीज में विद्यमान है। वृक्ष का विकास कोई नई बात नहीं है। यह पहले से ही वहाँ था -- यह बस प्रकट हो रहा है। बीज अपने सार को प्रकट करता है और अस्तित्वगत हो जाता है। इसलिए सार अस्तित्व से पहले आता है -- यह विचारकों का एक स्कूल रहा है।

एक और स्कूल है -- और आधुनिक दुनिया में बहुत प्रमुख है: अस्तित्व का स्कूल, अस्तित्ववादी। वे कहते हैं कि मनुष्य अस्तित्व के रूप में आता है, बिना किसी सार के; अस्तित्व सार से पहले आता है। मनुष्य बीज की तरह पैदा नहीं होता। वह खोखला, खाली होता है। आपको अपना सार खुद बनाना होगा। मनुष्य बिना आत्मा के आता है, और आत्मा को कर्म करके बनाना होता है। आपका कर्म आपको आपकी आत्मा देगा -- ऐसा नहीं है कि आपके पास पहले से ही है! 

रविवार, 10 मई 2026

55-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-55

(सदमा - उपन्यास

श्याम पाँच बजे अचानक श्री करकरे जी की कार जब आकर खड़ी हुई तो सब को थोड़ा तो विस्मय तो जरूर हुआ परंतु अच्छा भी लगा। करकरे जी तो न जाने कितने सालों बाद यहां आना हुआ है। एक तो उम्र का तकाजा दूसरा इधर कोई विशेष काम ही नहीं पड़ा। सब ने खड़े होकर उन का स्वागत किया। और आँगन में दो चार कुर्सियां और बिछा दी गई। सब आराम से बैठ कर बात करने लगे। इतनी देर में अंदर जाकर पेंटल वह कागज ले आया। जिस पर उसने मकान का नक्शा अभी-अभी बनाया था। उसने वह नक्शा लाकर श्री मल्होत्रा जी को दे दिया। की अंकल आप देखों ये मैंने मकान का ड्राइंग कि है। ये सब मकान आदि की जानकारी थोड़ी-थोड़ी करकरे जी को भी थी। सो वो भी इस में रूचि लेने लगे। तब पेंटल ने समझाया की ये एक बेड रूप हो गया इस के पास बाथरूम और साथ में एक बड़ा ड्राइंग रूम। साथ से उपर जाने के लिए सीढ़ीयां है। जो छ: फिट चौड़ी है। जगह की तो यहां पर कोई कमी नहीं है। ठीक ऐसा ही एक सेट उपर भी बन सकता है। जिस में आकर मेहमान आदि रह सके। और सामने आठ फिट का बरामदा है जिस में बरसात आदि में बैठ कर चाय आदि पी जा सकती है। इस में मैंने किचन नहीं बनाया। नानी और नेहालता कह रही थी की हमारा किचन वही पुराना खुब बड़ा है बस उस की कुछ टूट फूट ठीक करा दी जायेगी। इस तरह नानी का वो मकान ऐसे ही रहेगा। उस में भी कुछ रंग पेंट या मरम्मत की जा सकती है। और चारों और एक चार दीवारी जो करीब आठ फिट होगी। और गेट सामने ही रहेगा परंतु थोड़ा दायें हाथ की और बड़ा कर दिया जायेगा। जिससे की कार आदि अंदर आ सके।

शनिवार, 9 मई 2026

54-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-54

(सदमा - उपन्यास

क तरफ तो ये सब चल रहा था। लेकिन दूसरी और सोम प्रकाश को अंदर एक भय समाया हुआ था। की कहीं उसे छोड़ कर नेहालता फिर चली तो नहीं जायेगी। तब वह अकेला क्या करेगा। उसे तो अभी कुछ भी समझ नहीं आयेगा। ये बात उसने नेहा लता को भी कही। परंतु नेहालता हंस दी और कहां की अब तो मेरा आप का साथ इस जन्म में पक्का हो गया। हमारे बीच में ना मिलने की जन्मों की खाई थी वह पाट दी गई। अब उस पर एक विश्वास का पूल बन गया है। आप घबराओ मत मैं अब कहीं नहीं जाने वाली। आप मेरी बात को अपने ह्रदय में सहज कर रख लो। और पास बैठी नानी से कहने लगी नानी आप बतलाओं अब आगे क्या किया जाये। माता-पिता ने तो नया घर बनाने की कह दी। अब हम क्या करें। हमें तो इस मकान में भी कोई कमी या दिक्कत नजर नहीं आ रही है। तब नानी ने कहां की बात तो ठीक है, बेटा परंतु हर पीढ़ी का रहन सहन, खाना पहनना अलग होता है। हमारे जमाने का ये घर हमारी जरूरत के हिसाब से बना था। परंतु इसे बने करीब पचास साल हो गये। अब समय के साथ सब कुछ बदल गया है। इसलिए नेहालता के माता-पिता की बात में भी दम है। मकान तो बनाना ही चाहिए। क्योंकि कल को तुम्हारे माता पिता जब तुम से मिलने के लिए आयेंगे तो उन्हें क्या हम बाहर ठहरायेंगे। इतनी देर में पेंटल भी आ गया। पेंटल होटल से अपना सामान ले कर सीधा सोम प्रकाश के पास आ गया। तब नेहा लता ने पूछा की मम्मी-पापा क्या होटल में ही है। तब पेंटल ने कहां नहीं भाभी वह श्री करकरे जी के यहां चले गए है। क्योंकि वह तो शायद यहां पर सप्ताह भर और रूकने वाले है परंतु मेरा तो जाना जरूरी है। इसलिए मैं तो सुबह ही चार बजे की पहली बस से चेन्नई के लिए चल दूंगा। जहाज श्याम पाँच बजे का है। इसलिए सुबह ही चल पड़ना ही ठीक होगा।

19- GOD IS NOT FOR SALE - (ईश्वर बिकाऊ नहीं है) - का हिंदी अनुवाद

GOD IS NOT FOR SALE–(ईश्वर बिकाऊ नहीं है)-का हिंदी अनुवाद

अध्याय -19

30 अक्टूबर 1976 सायं चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

आनंद का अर्थ है परमानंद और शांतम का अर्थ है मौन। इसलिए आपको आनंदित और बहुत शांत रहना होगा। खुशी में एक बुखार होता है; यह कभी शांत नहीं होती। खुशी और आनंद के बीच यही अंतर है। खुशी तनावपूर्ण होती है। व्यक्ति वास्तव में हर चीज से थक जाता है - यहां तक कि खुशी से भी। कोई लंबे समय तक खुश नहीं रह सकता; आप इससे तंग जाएंगे। आप आराम करना चाहेंगे - आप विपरीत दिशा में जाना चाहेंगे। इसलिए दुख खुशी का अनुसरण करता है। यह जरूरी है; यह एक अनिवार्यता है - जैसे रात दिन के बाद आती है। दिन में आप कड़ी मेहनत करते हैं; रात में आप विस्मृति में आराम करते हैं।

इसलिए हम जो भी खुशी, आनंद कहते हैं - वे सभी बहुत तनावपूर्ण अवस्थाएँ हैं। व्यक्ति लगातार उत्तेजित रहता है। उत्तेजना थका देती है, और उत्तेजना ऊर्जा को नष्ट कर देती है। और उत्तेजित होने का मतलब है कि आप केंद्रित नहीं हैं। उत्तेजित होने का मतलब है कि आप बाहर चले गए हैं; आप डगमगा रहे हैं। उत्तेजित होने का मतलब है कि आपके अस्तित्व की झील बहुत अधिक अशांत है।

शुक्रवार, 8 मई 2026

53-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

  अध्याय-53

(सदमा - उपन्यास

ज जीवन के लिए एक नई सुबह लेकर आई थी। ये सुबह देखने में तो एक समान दिख रही थी। सूर्य उसी प्रकार उदय हुआ। अंबर में लालिमा छाई पक्षियों ने गीत गाये। पेड़ पौधे नाचे झूमें। बहार जो सब के लिए तो एक समान थी। परंतु इस का प्रभाव इसका अवतरण सब पर भिन्न-भिन्न प्रकार से हुआ था। श्री करकरे और सोनी के लिए एक राहत थी, की अब स्कूल का काम घर परिवार का ही आदमी देख सकेगा। श्री और श्रीमति मल्होत्रा जी को चिंता थी की इतनी दूर लड़की अकेली कैसे रहेगी। उन्हें राहत मिली जब अपनी लड़की को वहां एक परिवार की तरह से घुला मिला पाया। परंतु वह यह देख कर अति प्रसन्न व आश्चर्य चकित थी की नेहा लता तो एक दम से पूरी तरह से बदल गई थी। वो जिस नेहा लता को 23 साल से जानते थे वह तो यहां कही उसे दिखलाई ही नहीं दे रही थी। ये वैज्ञानिक शोध का विषय है जिसे हम मस्तिष्क से कभी समझ नहीं सकते। इसके लिए अचेतन के भावों की गहराई में जाना होगा। पहले उसके लिए सारे पुरवा ग्रह विज्ञान को छोड़ने होंगे। तब उस गहरी की परछाई को महसूस कर सकेंगे।

क्यों एक समान दिखने वाले जीव या प्राणी कहां एक समान होते है। न तो वे बाहर से न ही अंदर से समान । हम एक प्रतिछवि अपने चित पर रख कर निर्णय लेते है। हम उसी प्रतिछवि पर उसे उकेरना चाहते है। और चित की बेहोशी के कारण हमें वह एक जैसे लगने भी लग जाते है। उन्होंने जिस नेहालता को यहां पर देखा है, वह समय और स्थान पा कर अपनी पूर्णता की और अग्रसर हो रही है। जैसे वही बीज या वृक्ष जब किसी दूसरे स्थान पर बोया जाये तो वह स्थान भी उस पर अपना प्रभाव डालता है। वही सब यहां आने पर नेहा लता के साथ घटा था। जिसे जब उसके माता-पिता ने देखा तो उनके लिए वह उनकी नेहालता थी ही नहीं वह तो एक दम नई नेहालता थी।

गुरुवार, 7 मई 2026

18- GOD IS NOT FOR SALE - (ईश्वर बिकाऊ नहीं है) - का हिंदी अनुवाद

GOD IS NOT FOR SALE–(ईश्वर बिकाऊ नहीं है)-का हिंदी अनुवाद

अध्याय -18

29 अक्टूबर 1976 अपराह्न, चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

प्रभु का अर्थ है दिव्य, और वैराग का अर्थ है त्याग - दिव्य त्याग। और त्याग या तो मानवीय हो सकता है या दिव्य। जब यह मानवीय होता है तो यह व्यर्थ होता है। जब यह आपका किया हुआ होता है तो इसका कोई खास महत्व नहीं होता। लेकिन जब यह ईश्वर का किया हुआ होता है तो इसका बहुत महत्व होता है। इसलिए मैं यह नहीं सिखाता कि आपको त्याग का अभ्यास करना है। मैं बस समर्पण करना सिखाता हूँ और बस उसकी इच्छा के अनुसार चलना शुरू करना सिखाता हूँ। वह जहाँ ले जाए, वही नियति है। भले ही उसके तरीके कभी-कभी विरोधाभासी, असंगत हों, लेकिन अविश्वास करें।

मार्ग टेढ़ा-मेढ़ा है; यह सीधा नहीं है। यह हो भी नहीं सकता, क्योंकि यह तर्कपूर्ण नहीं है। यह तर्कपूर्ण नहीं है, यह सीधी रेखा में नहीं है; यह एक अकेली रेखा नहीं है - यह बहुत जटिल है। यह ऐसा ही है, जैसे कि तुम पहाड़ी प्रदेश में, पहाड़ियों में चलते हो। कभी तुम दक्षिण की ओर जा रहे हो, कभी तुम पूर्व की ओर जा रहे हो, कभी तुम ऊपर जा रहे हो और कभी तुम नीचे की ओर जा रहे हो, लेकिन फिर भी तुम शिखर की ओर एक समान बढ़ रहे हो, क्योंकि मार्ग गोल-गोल घूमता है। कई बार तुम एक ही दृश्य पर आते हो, बेशक भिन्न ऊंचाई पर। तुम बार-बार एक ही बिंदु पर आते हो, लेकिन कभी समान ऊंचाई पर नहीं। मार्ग टेढ़ा-मेढ़ा, गोल-गोल, बहुआयामी, वृत्ताकार है, क्योंकि मार्ग मानव चेतना के शिखर की ओर है।

अगर आप त्याग का अभ्यास करते हैं तो यह कभी भी आपसे परे नहीं जाता। आप जो भी अभ्यास करते हैं वह आपसे नीचे ही रहता है। अगर आप क्रोधित हैं, तो आप जो भी अभ्यास करेंगे वह आपके क्रोध से विषाक्त हो जाएगा। अगर आप हिंसक हैं, तो आप प्रेम का अभ्यास कर सकते हैं, लेकिन आपके प्रेम में हिंसा होगी।