(सदमा - उपन्यास)
सुबह नेहालता काफी देर तक सोती रही। क्योंकि वह एक लम्बा सफर तय कर के आई थी। नानी ने भी उसे नहीं उठाया था। परंतु सोम प्रकाश जल्दी ही उठ गया था। इसलिए वह सामने खुले आँगन में नानी के साथ घूम रहा था। वह बार-बार कमरे के अंदर की और देखना चाह रहा था। ये सब नानी देख रही थी की शायद उसे नेहालता के आने का कुछ भान तो जरूर है। इसलिए उसे लगता होगा की अगर वह आई थी तो अब कहां है। देर से नेहालता उठी तब सोम प्रकाश और नानी को सामने आँगन में घूमते हुए देख कर कुछ झेप गई। अपने अंतस में ही सोचती रही की मैं कितनी देर तक सोती रही। तब नानी मेरे बारे में क्या सोचेगी। वह उठ कर सीधी नानी के पास पहुंची और कहने लगी की आपने मुझे उठाया क्यों नहीं नानी जी। तब नानी ने कहा की यहां कौन काम पड़ा था। कल सफर में तुम बहुत थक गई थी, इसलिए मैंने सोचा की सोने से तुम्हें कुछ तो आराम ही मिलेगा। अब तुम सोम प्रकाश के साथ घूमो मैं चाय बना कर लती हूं। तब नेहा लता ने कहा की नहीं नानी मैं बनाती हूं चाय। तब नानी हंसी और कहने लगी आज आप मेरे हाथ की चाय पिंजिए फिर बाद मैं तुम्हारे हाथ की चाय पिया करूंगी।
और नेहालता सोम प्रकाश के साथ घूमने लगी। नेहालता सोच रही थी की बात कहां से शुरू की जाये। वो दोनो एक प्रकार से तो एक दूसरे को जानते थे, परंतु फिर भी कहां जानते थे। मानो ये रिसता कितना अजीब था जानते हुए भी न जानना।





















