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बुधवार, 8 अप्रैल 2026

38-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-38

(सदमा - उपन्यास)

ज घर आने पर जब नानी खाना बना रही थी तो नेहा लता ने कहां की नानी आप आज्ञा दे तो में माता-पिता को एक पत्र लिख दूं। वैसे यहां राज़ी खुशी का हाल सोनी ने जरूर फोन से बतला दिया होगा। फिर भी आज की जो दवा ने काम किया है। उससे हमारे मन में एक नई उमंग जगी है। तब नानी ने कहां है बेटी अगर आप कहो तो दिन भर की भाग दौड़ के बाद सब थक गए है। मैं खिचड़ी बना लूं तो ठीक रहेगा। तब नेहा ने कहां की हां नानी मैं भी आपको कहने ही वाली थी।

और नेहा लता अपने माता-पिता को पत्र लिखने के लिए कमरे में चली गई।

परम पूज्य

माता-पिता जी,

समाचार ये है की हम यहां पर एक दम से राज़ी खुशी से है।

यहां आप दोनों की कमी तो हर पल खलती है। परंतु जिस काम के लिए में यहां पर लक्ष्य कर के आई हूं। उसके सामने ये विरह की दूरी कुछ भी नहीं है। मैंने सोनी जी को कहा दिया था की आप को फोन से बतला दे कि मैं यहां पर ठीक ठाक से पहुंच गई हू। शायद आपको उनका फोन सून का कुछ राहत तो मिली गई होगा। बाकी आप को बतलाती हूं की यहां सब बहुत अच्छे लोग है। सब मेरा बहुत ख्याल और सम्मान करते है। आज हम वैद्य जी के यहां पर सोम प्रकाश को लेकर गए थे। तब वैद्य जी आपके विषय में पूछ रहे थे की आप कैसे है। और मुझे देख कर अचरज भी कर रहे थे। कि मैं यहां पर कैसे आ गई। परंतु वो बहुत ही महान इंसान है। और मेरे साथ आप दोनो की भी बहुत तारीफ कर रहे थे। की आप ही महान नहीं है, वो आपके माता पिता जिन्होंने तुम्हें जन्म दिया। वह तो और भी महान है।

03- GOD IS NOT FOR SALE - (ईश्वर बिकाऊ नहीं है) - का हिंदी अनुवाद

GOD IS NOT FOR SALE–(ईश्वर बिकाऊ नहीं है)-का हिंदी अनुवाद

अध्याय - 03

14 अक्टूबर 1976 अपराह्न, चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

देव का अर्थ है दिव्य और धीरज का अर्थ है धैर्य - दिव्य धैर्य। और यह याद रखना बहुत महत्वपूर्ण है। मार्ग पर धैर्य से अधिक किसी और चीज की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य वह सब कुछ कर सकता है जो वह करने में सक्षम है, लेकिन फिर भी यह आवश्यक नहीं है कि परम घटित हो; यह हो भी सकता है, नहीं भी। हम अंधेरे में टटोल सकते हैं; द्वार खुल भी सकता है, नहीं भी। इसलिए यदि किसी के पास असीम धैर्य नहीं है, तो वह खोज से थकने लगता है। इसका कोई छोटा रास्ता नहीं है - और चीजों की प्रकृति के कारण ऐसा हो भी नहीं सकता। यात्रा लंबी है और कई बार व्यक्ति आशा खोने लगता है। वे ऐसे क्षण हैं जब धैर्य की आवश्यकता होगी।

धैर्य और कुछ नहीं, बस भरोसे की खुशबू है। रात अंधेरी है, लेकिन भरोसा है कि भोर होने वाली है। हर पल वह करीब और करीब आती जा रही है। हो सकता है कि रात वाकई और भी गहरी हो रही हो। दरअसल भोर होने से पहले ही रात और भी गहरी हो जाती है, इसलिए हो सकता है कि वास्तविक संभव के लिए मददगार हो। हो सकता है कि वास्तविक कह रहा हो, 'तुम क्या कर रहे हो? तुम किसका इंतजार कर रहे हो?

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

02- GOD IS NOT FOR SALE - (ईश्वर बिकाऊ नहीं है) - का हिंदी अनुवाद

GOD IS NOT FOR SALE–(ईश्वर बिकाऊ नहीं है)-का हिंदी अनुवाद

अध्याय - 02

13 अक्टूबर 1976 अपराह्न, चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

प्रेम का अर्थ है प्यार और प्रदीप का अर्थ है ज्योति - प्रेम की ज्योति, प्रेम का प्रकाश या प्रेम का दीया। और संन्यास कुछ और नहीं बल्कि मेरे करीब आना है ताकि तुम्हारी बुझी हुई ज्योति जल सके। ज्योति के करीब आना ही काफी है। एक निश्चित क्षण में ज्योति एक ज्योति से दूसरी ज्योति पर पहुंच जाती है। अचानक दो ज्वालाएं हो जाती हैं। मूल ज्योति में कुछ भी नष्ट नहीं होता। एक ज्योति से, एक छोटी मोमबत्ती से, तुम हजार मोमबत्तियां जला सकते हो। मूल ज्योति में कुछ भी नष्ट नहीं होता। यही प्रेम की खूबसूरती है - तुम बांटते रहते हो और कुछ भी नष्ट नहीं होता। वास्तव में जितना अधिक तुम बांटते हो, उतना ही अधिक तुम्हारे पास होता है। इसलिए पहले इतना साहसी बनो कि मेरे करीब आओ ताकि तुम्हारी ज्योति स्वयं जीवित हो जाए, ताकि तुम फिर से प्रकाशित हो जाओ। और फिर दूसरों की सहायता करो... अपना प्रकाश दूसरों के साथ बांटो।

37-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-37

(सदमा - उपन्यास)

 रीब एक घंटे से अधिक सोने के बाद जब नेहा लता की आँख खुली तो उसे बड़ा अचरज हुआ की वह इतनी दे से नानी की गोद में सो रही है। नानी आपके पेरो में दर्द हो गया होगा। नानी केवल हंस दी। बेटा इतनी गहरी तुम सो रही थी की मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। परंतु क्या करूं बेटा अब ये शरीर जवाब दे जाता है। और अपने पैरों को सीधा करके दबाने लगी। शायद खून का दबाव कम होने के करण पेर सून हो गया था। हम जिसे कहते थे पैर सो गया है। उस अवस्था में आपका आपना ही पैर कैसे पराया सा लगने लग जाता है। एक बोझ अपने में लिए आप अगर उस पर चुटकी भी लो तो उसके भीतर कोई दर्द नहीं होता। नेहा लता ने नानी के पैरों को प्रेम से सहलाना शुरू किया और धीरे-धीरे खून का बहाव सामान्य हो गया। इस बात से नेहा लता को बहुत अजीब सा लग रहा था। कि वह इतनी गहरी नींद कैसे सो गई की उसे पता ही नहीं चला। परंतु इस तरह से गहरे सोने के कारण उसे बहुत अच्छा लग रहा था। वह प्रेम पूर्ण नानी का हाथ पकड़ कर कह रही की मैंने आपको कष्ट दिया। आप मुझे जगा देती। तब नानी हंसी। बेटा घिया और बच्चे सोते में विकास करते है। इतनी देर में स्वामी जी उन की और आते हुए नजर आये। वह नेहा लता को पहचानने की कोशिश कर रहे थे। परंतु उन्हें विश्वास नहीं था की वह लड़की यहां कैसे हो सकती है।

पास आने पर नेहा लता ने स्वामी को प्रणाम किया। तब स्वामी जी ने पूछा आप....। तब नेहा लता ने कहां की हां स्वामी मैं वही लड़की हूं जिसे कुछ महीनों पहले आपने ठीक किया था। और ये वही सोम प्रकाश है जो मुझे यहां आपके पास ले कर आया था। फिर भी स्वामी जी को विश्वास नहीं हो रहा था। परंतु आप यहां कैसे पहुंची।

रविवार, 5 अप्रैल 2026

36-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-36

(सदमा - उपन्यास)

श्रम के गेट पर पहुंच कर सब लोगों ने थोड़ा विश्राम करने का सोचा। इस काम में हरि प्रसाद तो मास्टर था वह तो सबसे पहले सबसे अच्छा स्थान ढूंढ कर विश्राम करने लग गया। इतनी देर में अंदर एक पूरूष साधक बाहर आया और उसने जब सब को विश्राम करते हुए देखा तो कहां की नानी थक गई क्या। तब नानी हंसी नहीं बेटा अभी कहां थकी हूं अभी तो और बहुत कुछ झेलना है इस शरीर से। और मेरा मन तो कर रहा है उस पहाडी की चोटी पर चली जाऊ परंतु शरीर जवाब दे देता है। और सब नानी के इस मजाक पर हंस दिये। पल भर में ही वहां का वातावरण एक दम सरल और सौम्य हो गया। तब उस साधक ने कहां की चलो अंदर ही विश्राम कर ले और मरीज को देख भी लेते है।

तब सब भारी कदमों से उठ कर अंदर जाने के लिए खड़े हुए। सोम प्रकाश ये सब देख कर कुछ भय भीत भी हो रहा था। तब नेहालता ने उसके कांपते हाथ को थामते हुए कहां की आप डर रहे है। तब सोम प्रकाश की आंखों में एक करूणा, दया का भाव था। तब नेहा लता ने उसके हाथ को पकड़ते हुए कहां की हम सब आपके साथ है। अंदर ऐसा कुछ नहीं होगा। तब सोम प्रकाश ने कहा की मुझे अंदर डर लगता है। तब नानी ने उसके दोनों कंधों को पकड़ कर कहां की बेटा क्यों डरते हो। वहां ऐसा कुछ थोड़ा ही होता है। परंतु नानी मेरा दम घुटता है वहां पर मैं वहां जाना नहीं चाहता। इतनी देर में स्वामी जी भी आ गए। तब उनकी बातें सून कर कहने लगे सोम प्रकाश आप तो बहुत ही बहादुर है। आप तो जरा भी नहीं डरते। आप तो नानी के साथ जंगल भी चले जाते थे। आपने देखा आपके साथ जब नानी जंगल में जाती थी तो वह क्यों नहीं डरती थी। क्योंकि आप साथ होते थे।

01- GOD IS NOT FOR SALE - (ईश्वर बिकाऊ नहीं है) - का हिंदी अनुवाद

GOD IS NOT FOR SALE - (ईश्वर बिकाऊ नहीं है) - का हिंदी अनुवाद

12/10/76 से 7/11/76 तक दिए गए व्याख्यान

दर्शन डायरी

26 - अध्याय

प्रकाशन वर्ष: 1978

01-GOD IS NOT FOR SALE (ईश्वर बिकाऊ नहीं है)- का हिंदी अनुवाद

अध्याय - 01

12 -अक्टूबर 1976 अपराह्न, चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

प्रेम का अर्थ है प्यार, और त्याग का अर्थ है त्याग। त्यागी का अर्थ है जिसने त्याग किया है -- प्रेम और त्याग। मैं त्याग के लिए एक विशेष शर्त रखता हूँ -- और वह है प्रेम। कोई व्यक्ति क्रोध से त्याग कर सकता है, कोई व्यक्ति घृणा से त्याग कर सकता है, कोई व्यक्ति हताशा से त्याग कर सकता है... लेकिन तब यह अर्थहीन है। जब तक आप प्रेम से त्याग नहीं करते, त्याग का कोई मतलब नहीं है। यदि आप त्याग करते हैं, और आपके त्याग में प्रेम नहीं है, तो यह एक संघर्ष है। यदि प्रेम है, तो यह समर्पण है।

पुराना त्याग संसार के प्रति घृणा के कारण होता था। पुराना त्याग जीवन-विरोधी, नकारात्मक था। मैं सकारात्मक त्याग, जीवन-पुष्टि करने वाला त्याग, जीवन को बढ़ाने वाला त्याग सिखाता हूँ। तो आपका त्याग जीवन के प्रति एक गहन हाँ होने जा रहा है। निश्चित रूप से जब आप जीवन के लिए हाँ या ईश्वर के लिए हाँ कहते हैं, तो कई चीजें अपने आप ही छूटने लगती हैं। ऐसा नहीं है कि आप वास्तव में उनका त्याग करते हैं; वे बस अप्रासंगिक हो जाती हैं इसलिए कभी भी किसी चीज का त्याग करें जब तक कि वह अप्रासंगिक हो जाए।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

35-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-35

(सदमा - उपन्यास)

नेहा लता के आने से जैसे समय के तो पंख ही लग गए थे। नानी के ही नहीं मानो पूरी प्रकृति भी ये से सब होता देख कर अल्हादित हो रही थी। सोम प्रकाश अंदर भी मानो बसंत का उत्सव कोई फैलाव लिये चल रहा है। नेहा लता के संग-साथ के कारण सोम प्रकाश भी जो हमेशा उदास व शांत रहता था। अब कुछ-कुछ सजीव सा दिखाई देने लगा था। उसकी बूझी आंखों में मानो प्राण की ज्योति आ गई थी। सूखी हुई मन की झिल में एक आस की प्रतिछवि नजर आ रही थी। मानो की आसमान पर फिर ये कुछ बादल घिर आये है। ये जरूर थम कर बरसेंगे और इस धरा को सराबोर, अभिभूत और शीतलता से ओतप्रोत कर देंगे। देखते ही देखते वह दिन भी आ गया जब सोम प्रकाश को वैद्य जी के यहां ले जाना था। सुबह की हवा में ठंड के साथ-साथ चारों और कोहरा भी छाया हुआ था। सब एक दम से गर्म कपड़े पहने और इंतजार करने लगे। न जाने कब अचानक ड्राइवर आये चलना पड़े। नेहा लता ने मूली के परांठे और अचार एक टिफिन में रख लिया था। और साथ में थोड़े से अंगूर भी रख लिये थे। क्योंकि नानी ने बतला दिया था की वहाँ से आते-आते श्याम भी हो सकती है।

जिस समय नेहालता बीमार थी और उसे वैद्य जी के पास ले जाया जाता था। मगर उस समय तो उसे कुछ पता या होश ही नहीं था। कि उसके इलाज में कितना समय लगता था। परंतु अब वह सब बातें नानी से कुरेद-कुरेद कर पूछती रहती है। तब नानी कह रही थी। की बेटी तुम्हें तो वहां पर तीन-तीन दिन के लिए रखा लिया था। देखों बेटी तुम तो ठीक हो गई। परंतु अब इस सोम प्रकाश के साथ क्या होता है। आज हम इसे चौथी बार ले जा रहे है। फिर भी मुझे तो रत्ती भर भी आराम होता दिखाई नहीं दे रहा। तेरे भाग्य से आज कुछ विचित्र घट जाये तो कुछ कह नहीं सकते।

23-महान शून्य- (THE GREAT NOTHING—का हिंदी अनुवाद)

महान शून्य-(THE GREAT NOTHING—का हिंदी अनुवाद) ओशो

अध्याय -23

11 अक्टूबर 1976 अपराह्न, चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

देव का अर्थ है दिव्य और चितसुख का अर्थ है आनंद में चेतना। चित का अर्थ है चेतना, सुख का अर्थ है आनंद; आनंद की दिव्य चेतना। और इसे तुम्हें धीरे-धीरे अपने अस्तित्व में आत्मसात करना होगा - इसकी आत्मा - कि सिर्फ सचेत होना ही आनंदमय है। जब भी तुम होश खो देते हो, तुम दुख में उतर जाते हो। जब भी तुम अचेत होते हो, तुम दुखी होते हो - या इसके विपरीत। जब भी तुम दुखी होते हो, तुम अचेत होते हो; ये दोनों एक साथ चलते हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि अचेतनता दुख है। और जब भी तुम पूरी तरह से सचेत, सजग, जागरूक होते हो, अचानक आनंद होता है। तो आनंद और जागरूकता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यही चितसुख का अर्थ है।

इसलिए अधिक से अधिक सचेत बनो, कम से कम यांत्रिक बनो। मशीन की तरह मत चलो: चीजें इसलिए मत करो क्योंकि तुम हमेशा से उन्हें करते आए हो। चीजें इसलिए मत करो क्योंकि तुम उन्हें करने में कुशल हो गए हो। याद रखो कि तुम जो भी कर रहे हो, तुम्हें उसमें जागरूकता का गुण लाना होगा।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

34-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-34

(सदमा - उपन्यास)

सोनी ने घर जाकर पहला काम यह किया की। उसने पहले बम्बई (मुम्बई) के नम्बर पर जो नेहालता के माता-पिता का वह लिख कर लाई थी। उस पर ट्रंकाल बूक कराया। शायद श्याम तक मिल जाये। परंतु उन्हें ये संदेश तो देना जरूरी था की उनकी लड़की यहां ठीक ठाक पहुंच गई है। नेहा लता ने वैसे यह भी कह दिया था की वह चिट्ठी भी लिख देगी। परंतु पत्र को पहुंचने में तो कम से कम एक हफ्ता तो लग ही जायेगा। वह अपने दिल और यहां का हाल अपने माता-पिता को जब पत्र में लिखेगी तो उसे पढ़ कर उन्हें सब हाल मालूम हो जायेगा। परंतु अब कम से कम इतना तो संदेश पहुंच जाये की नेहा लता हजारों मील यहां पर ठीक ठाक पहुंच गई है। वैसे वह चाह रही थी की अगर एक फोन वह पेंटल को भी कर दे तो अच्छा होगा। परंतु इतनी देर में पेंटल का फोन आ गया। नेहालता ने उसे उठा कर हाल चाल पूछा और बतला दिया की नेहालता यहां आराम से पहुंच गई है। आप फिक्र ने करें। मैं अभी वही से आ रहा हूं हमने साथ ही खाना खाया है। वह बहुत ही प्रेम पूर्ण लड़की है इतने लाड़ प्यार से पलने के बाद भी उस में जरा भी अहंकार नहीं है। अपने माता पिता के धन का वैभव का।

22-महान शून्य- (THE GREAT NOTHING—का हिंदी अनुवाद)

महान शून्य-(THE GREAT NOTHING—का हिंदी अनुवाद) ओशो

अध्याय -22

10 अक्टूबर 1976 सायं चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

[एक आगंतुक संन्यास लेने के बारे में कहता है: यही सबसे बड़ा डर है -- संन्यासी बनने का डर नहीं, बल्कि मेरी पिछली दीक्षा के विश्वासघात का डर। यह अभी भी बना हुआ है और मैं यहूदा या कुछ ऐसा महसूस करता हूँ।]

बिलकुल नहीं... बिलकुल नहीं। चीज़ों के बारे में यह रवैया बहुत ग़लत है। यह विश्वासघात नहीं होगा। वास्तव में अगर आप संन्यास नहीं लेते हैं, तो यह विश्वासघात होगा।

... अगर आपको कोई गुरु मिलता है और आप किसी खास रास्ते पर चल पड़ते हैं, तो वह आपकी मदद करता है। किसी दिन कोई आपको उसी रास्ते पर आगे ले जाता है। यह विश्वासघात नहीं है - यह वही यात्रा है। लाखों जन्मों में लाखों गुरुओं से मुलाकात होती है। पूरा जीवन ही आपका स्वामी है। इसलिए अगर आप संन्यास नहीं लेते हैं तो यह विश्वासघात होगा, क्योंकि तब आप किसी खास चीज से चिपके रहते हैं और अपने विकास के साथ नहीं बहते। लेकिन जल्द ही आप ऐसा करने में सक्षम हो जाएंगे।

अभी यदि आप सक्षम हैं, तो इसमें आगे बढ़ें।

बुधवार, 1 अप्रैल 2026

33-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-33

(सदमा - उपन्यास)

कार से उतर कर सोनी ने नानी का हाथ पकड़ कर उसे प्यार से नीचे उतारा और ड्राइवर से कहने लगी की पीछे जो डिग्गी में सामान रखा है उसे अंदर लेकर आ जाये। और जैसे ही ड्राइवर ने गाड़ी का दरवाजा खोला वह शैतान हरिप्रसाद तो गाड़ी से उतरा और वापस दौड़ लिया। तब सोनी कहने लगी ये कहां जा रहा है। तब नानी ने कहां की ये सोम प्रकाश और नेहालता के पास जा रहा है। तब सोनी हंसी की फिर हमारे साथ क्यों नाहक बैठ कर आया। इन लोगों का दिमाग भी कैसे कार्य करता है नानी जी। ये सब समझ जाते है। बिना भाषा के भी इन्हें आप जो करने को कहोगे तो ये करने लग जाते है। क्या इसने नेहालता को आते ही पहचान लिए था। नानी ने कहा की हां उसने तो इसे पहचान लिया परंतु नेहालता इसे नहीं पहचान पा रही थी। बेटी एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही की सोम प्रकाश अब सब को पहचान रहा है। परंतु नेहालता को नहीं पहचान रहा। और नेहालता तो हम किसी को नहीं पहचान पा रही थी। ये कैसा विरोधा भास है। परमात्मा हमारी ये क्या परीक्षा ले रहा है।

नानी और सोनी धीरे-धीरे घर के अंदर में प्रवेश कर रहे थे। नानी के हाथ से सोनी ने चाबी ली और दरवाजे का ताला खोल दिया। पीछे-पीछे ड्राइवर भी फलों के थैले लिये चला आ रहा था। नानी ने कहां की बेटा पिछली बार भी जो फल तुम लेकर आई थी वह अभी तक रखे हुए है। इतना खर्च क्यों करती हो। तब सोनी ने कहां की नानी अब तो नेहालता भी आ गई है। आप को इन बातों की ज्यादा फिक्र करने की अब जरूरत नहीं होगी। वह अब अधिक अच्छे से सोम प्रकाश का ख्याल रखेगी। अब आप को कम मेहनत करनी होगी। हां बेटी बहुत ही सुशील लड़की है।

21-महान शून्य- (THE GREAT NOTHING—का हिंदी अनुवाद)

महान शून्य-(THE GREAT NOTHING—का हिंदी अनुवाद) ओशो

अध्याय -21

09 अक्टूबर 1976 सायं चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

देव का अर्थ है दिव्य और मनसुख का अर्थ है कि आपका मन ही आपकी खुशी है। मनु का अर्थ है मन और सुख का अर्थ है खुशी। तो स्वर्ग कहीं और नहीं है, यह आपके भीतर ही है -- और नरक भी ऐसा ही है। वे दो भौगोलिक परिस्थितियाँ नहीं हैं -- वे आंतरिक दृष्टिकोण हैं...आप उन्हें बनाते हैं। वे वस्तुएँ नहीं हैं -- वे केवल आपके मन की यात्राएँ हैं। यदि आप दुखी होना चाहते हैं, तो आप बन जाते हैं। आप बहाने ढूँढ़ सकते हैं -- वे सभी बहाने हैं; कुछ भी दुख का कारण नहीं है। और यदि आप खुश होना चाहते हैं, तो आप खुश हो सकते हैं। फिर से आप एक हज़ार बहाने ढूँढ़ सकते हैं लेकिन वे कारण नहीं हैं।

सुख और दुख किसी बाहरी चीज के कारण नहीं होते। वे सिर्फ आपकी अपनी आंतरिक रचनाएँ हैं। और एक बार जब आप इसे समझना शुरू कर देते हैं, तो दुखी होने की कोई जरूरत नहीं है। आम तौर पर हम अपने से बाहर कोई स्रोत खोजने की कोशिश करते हैं और उसे जिम्मेदार ठहराते हैं। अगर आप दुखी हैं तो आप यह देखने के लिए अपने आस-पास देखते हैं कि कौन आपको दुखी कर रहा है, क्या आपको दुखी कर रहा है। और बेशक आप प्रक्षेपण कर सकते हैं - पत्नी, दोस्त, समाज, माता-पिता, माँ, पिता, वित्तीय स्थिति। आप हमेशा कुछ न कुछ पा सकते हैं; आपके आस-पास लाखों और एक चीजें हैं। आप हमेशा किसी चीज पर प्रक्षेपण कर सकते हैं - लेकिन वे सभी बलि का बकरा हैं।

मंगलवार, 31 मार्च 2026

32-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-32

(सदमा - उपन्यास)

न दोनों को इसी तरह से छोड़ कर नेहालता को अचानक कुछ याद आया। कितनी देर से नानी गायब है। वह उन्हें पुकारती हुई अंदर गई, की नानी-नानी तुम कहां हो। नेहालता की आवाज सुन कर नानी ने आवाज दी की मैं यहां हूं, बेटा क्या काम था? हरिप्रसाद जो अभी सोम प्रकाश के चरणों में कुर्सी के पास लेटा था, नेहालता को जाते देख कर उसके साथ हो लिया। नानी किचन में खाना बनाने की तैयारी कर रही थी। तब नेहालता ने कहां की आप रहने दो मैं ये सब कर लुंगी। तब नानी ने कहां की बेटा आपका जितना अधिक समय सोम प्रकाश के साथ गुजरेगा वह उसके लिए उतना ही अच्छा होगा। तब अचानक नानी ने हरिप्रसाद को खड़े हुए देखा और नाराज होने के भाव से कहां की शैतान कहां था। दो दिन से क्या तुझे पता नहीं था की नेहालता आने वाली है। से सब सुन का हरि प्रसाद ने अपनी पूछ हिला कर नानी की बात को जवाब दिया। नानी ने नेहालता को कहां की इसके लिए दूध और रोटी रखी है। आप थोड़ा सा दूध गर्म कर के उसमें रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े तोड़ कर के इसे दे दो। मेरे हाथ में सब्जी है वह जल जायेगी। किचन में बहुत मधुर खुशबु आ रही थी। तब नेहा ने कहा की नानी क्या बना रही हो। तब नानी ने कहां की बेटा लाला चौलाई की सब्जी बना रही हूं। साथ में रोटी और छाछ हो जायेगी।

नेहा लता ने दूध को थोड़ा गर्म किया और उस में रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े कर के डाल रही थी। ये सब पास में बैठा हरिप्रसाद बड़े गोर से देख रहा था की ये सब मेरे लिए हो रहा है। और जब नेहालता ने उसके सामने रखा तो खुश होकर वह उसे खाने लगा।