(सदमा - उपन्यास)
आज
घर आने पर जब नानी खाना बना रही थी तो नेहा लता ने कहां की नानी आप आज्ञा दे तो
में माता-पिता को एक पत्र लिख दूं। वैसे यहां राज़ी खुशी का हाल सोनी ने जरूर फोन
से बतला दिया होगा। फिर भी आज की जो दवा ने काम किया है। उससे हमारे मन में एक नई
उमंग जगी है। तब नानी ने कहां है बेटी अगर आप कहो तो दिन भर की भाग दौड़ के बाद सब
थक गए है। मैं खिचड़ी बना लूं तो ठीक रहेगा। तब नेहा ने कहां की हां नानी मैं भी
आपको कहने ही वाली थी।
और नेहा लता अपने
माता-पिता को पत्र लिखने के लिए कमरे में चली गई।
परम पूज्य
माता-पिता जी,
समाचार ये है की हम
यहां पर एक दम से राज़ी खुशी से है।
यहां आप दोनों की कमी तो हर पल खलती है। परंतु जिस काम के लिए में यहां पर लक्ष्य कर के आई हूं। उसके सामने ये विरह की दूरी कुछ भी नहीं है। मैंने सोनी जी को कहा दिया था की आप को फोन से बतला दे कि मैं यहां पर ठीक ठाक से पहुंच गई हू। शायद आपको उनका फोन सून का कुछ राहत तो मिली गई होगा। बाकी आप को बतलाती हूं की यहां सब बहुत अच्छे लोग है। सब मेरा बहुत ख्याल और सम्मान करते है। आज हम वैद्य जी के यहां पर सोम प्रकाश को लेकर गए थे। तब वैद्य जी आपके विषय में पूछ रहे थे की आप कैसे है। और मुझे देख कर अचरज भी कर रहे थे। कि मैं यहां पर कैसे आ गई। परंतु वो बहुत ही महान इंसान है। और मेरे साथ आप दोनो की भी बहुत तारीफ कर रहे थे। की आप ही महान नहीं है, वो आपके माता पिता जिन्होंने तुम्हें जन्म दिया। वह तो और भी महान है।












