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शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-07

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

बोध क्रांति हैसातवां प्रवचन
१७ जुलाई १९८०; श्री रजनीश आश्रम; पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
खामोश नजर टूटे दिल से हम अपनी कहानी कहते हैं:
बहते हैं आंसू बहते हैं!
कल तक इन सूनी आंखों में शबनम थी चांद-सितारे थे
ख्वाबों की गमकती कलियां थीं दिलकश रंगीन नजारे थे
पर अब हमको मालूम नहीं हम किस दुनिया में रहते हैं।
कृपा कर पता बताएं।

दीपक शर्मा! जीवन दो ढंग से जीया जा सकता है। एक ढंग तो है नींद का। वहां मीठे सपने हैं। पर सपने ही सपने हैं, जो टूटेंगे ही टूटेंगे। आज नहीं कल, कल नहीं परसों, देर-अबेर की बात है। और जब टूटेंगे तो गहन उदासी छोड़ जाएंगे। जब टूटेंगे तो पतझड़ छा जाएगा। जीवन हाथ से गया सपनों में और मौत द्वार पर खड़ी हो जाएगी। एक और भी जीवन को जीने का ढंग है। वही वास्तविक ढंग है। वह है: जाग कर जीना। सपनों से मुक्त होकर जीना। फिर आनंद की वर्षा है। फिर अमृत की बूंदाबांदी है। फिर फूल खिलते हैं और खिलते ही चले जाते हैं। हाथ ही नहीं भरते, प्राणों का आकाश भी फूलों से भर जाता है।

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-06

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

प्रार्थना अंतिम पुरस्कार है—छठवां प्रवचन
१६ जुलाई १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
चमक-चमक कर हजार आफताब डूब गये
हम अपनी शामे-अलम को सहर बना न सके
कृपया, अब बताइये क्या करें?

अब्दुल कदीर!
चांदत्तारे तो ऊगेंगे, डूबेंगे; सूरज ऊगेगा, डूबेगा; इससे तुम्हारे अंतरात्मा की अंधकार नहीं मिट सकता है। बाहर का कोई प्रकाश भीतर के अंधकार को मिटाने में असमर्थ है। वह भरोसा ही छोड़ दो। वह भरोसा रखोगे तो भटकोगे। और वही हम सबका भरोसा है। वहीं हम चूक रहे हैं। बाहर ही धन खोजते हैं कि भीतर की निर्धनता मिट जाए। बाहर ही पद खोजते हज कि भीतर की दीनता मिट जाए। और बाहर की रोशनी पर ही आंखें टिकाते हैं कि भीतर का अंधेरा कट जाए। यह नहीं हो सकता। जो बाहर है बाहर है, जो भीतर है भीतर है। दोनों का कोई तालमेल नहीं। दोनों एक-दूसरे का रास्ता नहीं काटते।

बुधवार, 19 जुलाई 2017

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-05

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

धर्म क्रांति है, अभ्यास नहीं—पांचवां प्रवचन
१५ जुलाई १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
ढूंढता हुआ तुम्हें पहुंचा कहां-कहां
न स्वर्ग ही कुछ बोलता न नर्क द्वार खोलता
हर आंख में मैं आंख डाल तसवीर तेरी टटोलता
पहुंच गया कहां-कहां
सांसों के फासले हैं या कि दूरियां ही दूरियां
न तुम ही कुछ हो बोलते मुख से जुबां न खोलते
चलता है कब तलक मुझे यूं सबके दिल टटोलते
तुम कहां और मैं कहां
ढूंढता हुआ तुम्हें पहुंच गया कहां-कहां
जमीं से मिल सका न पता आसमां लगा सका
ढूंढा नहीं किधर-किधर तुम्हें मगर न पा सका
अब ढूंढता हुआ कि पता तुम्हारा मिल गया
तस्वीर तुम्हारी मेरे दृग में
जैसे कस्तूरी रहती है मृग में

पार्थ प्रीतम कुंडू! यह कबीर का प्रसिद्ध वचन है: कस्तूरी कुंडल बसै, लेकिन इसमें भी बात पूरी समाती नहीं; इसमें भी कुछ छूट जाता है। कबीर भी कहे तो, पर कह नहीं पाए। क्योंकि कस्तूरी और मृग में फासला है। कस्तूरी को मृग से अलग किया जा सकता है--किया जाता है। ऐसे ही तो कस्तूरी मिलती है। लेकिन तुमको तुमसे अलग किया जा सकता नहीं। तुममें उतना भी फासला नहीं है अपने से, जितना कस्तूरी में और मृग में होता है। कस्तूरी मृग में होती है, लेकिन मृग ही नहीं। और तुम जिसे खोज रहे हो, वह तुम ही हो। उतनी दूरी भी नहीं है। खोजनेवाला ही खोज का लक्ष्य है।
इससे मुश्किल है।

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-04

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

प्रार्थना या ध्यान?—चौथा प्रवचन
१४ जुलाई १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान,
तमसो मा ज्योतिर्गमय
असतो मा सदगमय
मृत्योर्माऽमृतं गमय
उपनिषद की इस प्रार्थना में मनुष्य की विकसित चेतना के अनुरूप क्या कुछ जोड़ा जा सकता है?

नरेंद्र बोधिसत्व, यह प्रार्थना अपूर्व है! पृथ्वी के किसी शास्त्र में, किसी समय में, किसी काल में इतनी अपूर्व प्रार्थना को जन्म नहीं मिला। इसमें पूरब की पूरी मनीषा सन्निहित है। जैसे हजारों गुलाब से बूंद भर इत्र निकले, ऐसी यह प्रार्थना है। प्रार्थना ही नहीं है,समस्त उपनिषदों का सार है। इसमें कुछ भी जोड़ना कठिन है। लेकिन फिर भी मनुष्य निरंतर गतिमान है, यह अजस्र धारा है मनुष्य की चेतना की, जिसका कोई पारावार नहीं है। यह रोज नित नये आयाम छूती है, नित नये आकाश। बहुत बार ऐसा लगता है, आ गया पड़ाव और फिर आगे और भी उज्ज्वलत्तर शिखर दिखायी पड़ने लगते हैं। लगता है ऐसे कि आ गयी मंजिल, लेकिन हर मंजिल बस सराय ही सिद्ध होती है। और यह शुभ भी है। नहीं तो मनुष्य जीए ही कैसे? विकास है तो जीवन है। निरंतर विकास है तो निरंतर गति है। गत्यात्मकता जीवन है। इस लिए इस प्रार्थना में यूं तो कुछ जोड़ा नहीं जा सकता, ऐसे बिलकुल भरी-पूरी है, और फिर भी कुछ जोड़ा जा सकता है।

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-03

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

प्रेम बड़ा दांव हैतीसरा प्रवचन
१३ जुलाई १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान, मैं कौन हूं, क्या हूं, कुछ पता नहीं। आपसे अपना पता पूछने आया हूं।

नारायण शंकर! यह पता तुम्हें कोई और नहीं दे सकता। न मैं, न कोई और। यह तो तुम्हें खुद ही अपने भीतर खोदना होगा। बाहर पूछते फिरोगे, भटकाव ही हाथ लगेगा। बहुत मिल जाएंगे पता देनेवाले। जगह-जगह बैठे हैं पता देनेवाले। बिना खोजे मिल जाते हैं। तलाश में ही बैठे हैं कि कोई मिल जाए पूछनेवाला। सलाह देने को लोग इतने उत्सुक हैं, ज्ञान थोपने को एक-दूसरे के ऊपर इतने आतुर हैं कि जिसका हिसाब नहीं। क्योंकि अहंकार को इससे ज्यादा मजा और किसी बात में नहीं आता।
जब भी तुम दूसरे को ज्ञान की बातें देने लगते हो, तो दो बातें सिद्ध हो जाती हैं--दूसरा अज्ञानी है और तुम ज्ञानी हो; दूसरा नहीं जानता और तुम जानते हो। और यह मजा कौन नहीं लेना चाहता। इसलिए मुश्किल है तुम्हें वह आदमी मिलना जो तुम्हें सलाह न दे, ज्ञान न दे। हालांकि कोई किसी से ज्ञान लेता नहीं। और ज्ञान कुछ ऐसी बात है भी नहीं कि काई और दे दे। अच्छा ही है कि लोग लेते नहीं। जो दूसरे से ले लिया, कचरा है।

सोमवार, 17 जुलाई 2017

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-02


साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
ये फूल लपटें ला सकते हैं—दूसरा प्रवचन
१२ जुलाई १९८०; श्री रजनीश आश्रम, पूना

पहला प्रश्न: भगवान, आपकी मधुशाला में ढाली जानेवाली शराब पी-पीकर मखमूर हो गया हूं। भगवान, प्यार करने वालों पर दुनिया तो जलती है मगर अपनी मधुशाला के दूसरे पियक्कड़ भी प्रेम के इतने विरोध में हैं--खासकर पचास प्रतिशत भारतीय, जो कि आज दस-बारह वर्षों से आपके साथ हैं। प्रभु, हमारे विदेशी मित्र तो प्यार करनेवालों को देखकर खुश होते हैं, मगर भारतीय सिर्फ जलते ही नहीं बल्कि अपराधजनक दृष्टि से देखते हैं और घंटों व्यंग्यपूर्ण बातचीत करते रहते हैं। यह जमात प्रेम का बस एक ही मतलब जानती है--"काम'। ऐसा क्यों, प्रभु? क्या प्रेम कर कोई और आयाम नहीं है, खासकर नर-नारी के संबंध में?

स्वभाव! भारतीय चित्त सदियों से कलुषित हैं। प्रेम के प्रति निंदा की एक गहन अवधारणा हजारों वर्षों से कूट-कूटकर भारतीय मन में भरी गयी है। वह भारतीय खून का हिस्सा हो गयी है। उसे ही हम संस्कृति कहते हैं, धर्म कहते हैं और बड़े-बड़े सुंदर शब्दों में छिपाते हैं। लेकिन सारे आवरणों के भीतर प्रेम का निषेध है। और प्रेम का निषेध मूलतः जीवन के ही निषेध का एक अंग है।

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)--प्रवचन-01

साहिब मिले साहिब भये-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो

भगवान श्री रजनीश का पूर्ण मनुष्य—

""...हसन ने कहा," राबिया, तूने तो बात ही बदल दी, तूने तो मुझे बहुत झेंपाया। क्षमा कर, आता हूं, भीतर आता हूं, तू ही ठीक कहती है।'
और राबिया ने कहा,"बाहर तो सब माया है, भ्रम है, सत्य तो भीतर है।'

वहां मैं राजी नहीं हूं। बहार भी सत्य है, भीतर भी सत्य है। तुम्हारी नजर जहां पड़ जाए। तुम बाहर को देखोगे तो भीतर के सत्य से वंचित रह जाओगे। और तुम भीतर देखोगे तो तुम बाहर के सत्य से वंचित रह जाओगे। और अब तक यही हुआ। पूरब ने भीतर देखा, बाहर के सत्य से वंचित रह गया। इसलिए दीन है, दरिद्र है, भूखा है,प्यासा है, उदास है, क्षीण है। जैसे मरणशय्या पर पड़ा है। क्योंकि बाहर तो सब माया है। तो फिर कौन विज्ञान को जन्म दे? कौन उलझे माया में? और कौन खोजे माया के सत्यों को? और माया में सत्य हो कैसे सकते हैं?
इस देश की दरिद्रता में तुम्हारे अध्यात्मवादियों का हाथ है। जाने न सही तो अनजाने सही, मगर हाथ तो है; उसे इनकारा नहीं जा सकता।

रविवार, 16 जुलाई 2017

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-10

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो

अंतर-आकाश के फूल—प्रवचन-दसवां
दिनांक 09 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्
      यस्मिन देवा अधि विश्वे निषेदुः।
यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति
      य इत् दद् विदुस्त इमे समासते।।
जिसमें सब देवता भलीभांति स्थित हैं उसी अविनाशी परम व्योम में सब वेदों का निवास है। जो उसे नहीं जानता वह वेदों से क्या निष्कर्ष निकालेगा? परंतु जो जानता है
उसे वह उसी में से भलीभांति मिल जाता है।
भगवान, श्वेताश्वर उपनिषद के इस सूत्र को हमारे लिए खोलने की अनुकंपा करें।

 सत्यानंद,
यह सूत्र उन थोड़े-से अदभुत सूत्रों में से एक है जिन्हें गलत समझना तो आसान, सही समझना बहुत मुश्किल। एक-एक शब्द की गहराई में उतरना जरूरी है। एक-एक शब्द जैसे जीवन-अनुभव का निचोड़ है। हजारों गुलाबों से जैसे इत्र की कुछ बूंदें बनें, ऐसे हजारों समाधि के अनुभव इस एक सूत्र में पिरोए हुए हैं।

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-09

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो

जिसको पीना हो आ जाए—प्रवचन—नौवां
दिनांक 07 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
आपको लोग गलत क्यों समझते हैं? क्या सत्य को सदा ही गलत समझा गया है? मैं डरता हूं कि शायद जनमानस आपकी आमूल क्रांति को पचा नहीं सकेगा। आप क्या करने की सोच रहे हैं?

 अभयानंद,
यह देख कर कि तुम्हारे भीतर बहुत भय है, मैंने तुम्हें नाम दिया--अभयानंद। अचेतन तुम्हारा भय की पर्तों से भरा हुआ है। तुम अपने ही भय को प्रक्षेपित कर रहे हो। और तब बजाए आनंदित होने के तुम मेरे पास बैठ कर भी चिंतित हो जाओगे। ये सारी चिंताएं तुम्हें पकड़ लेंगी कि आपको लोग गलत क्यों समझते हैं! क्या फिक्र? तुमने समझा, उतना बहुत। तुम्हारे भीतर का दीया जला, उतना तुम्हारे मार्ग की रोशनी के लिए काफी है।

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-08

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो

स्वाध्याय ही ध्यान है—प्रवचन-आठवां
दिनांक 08 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि।
यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः।।
देहाभिमान के गलने और परमात्मा के जानने के बाद जहां-जहां मन जाता है वहां-वहां उसे समाधि अनुभव होती है।
भगवान, इस सूत्र को समझाने की कृपा करें।

 चिदानंद,
यह वक्तव्य तो सूत्र कहे जाने योग्य नहीं है। यह तो मूलतः गलत है। संस्कृत में ही होने से कोई बात सही नहीं हो जाती। शास्त्र में ही हो जाने से कोई वचन सत्य नहीं हो जाता। सत्य के लिए कुछ अनिवार्य शर्तें पूरी करनी होती हैं। और यह सूत्र तो शर्तें पूरी करना तो दूर, अत्यंत मूढ़तापूर्ण भी है।
सोचो। सूत्र कहता है: "देहाभिमान के गलने से...।'
देहाभिमान कब गलता है? देहाभिमान क्या है?

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-07

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो

मैं तुम्हारा कल्याण-मित्र हूं-प्रवचन-सातवां
दिनांक 07 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
यह कैसी आजादी है जहां हर आदमी दुखी है और सुख के कोई आसार भी नजर नहीं आते?

 नारायण प्रसाद,
आजादी से सुख होगा ही, ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है; उलटा भी हो सकता है, दुख भी बढ़ सकता है। और वही हुआ है। आदमी गलत है तो आजादी भी गलत आदमी को मिलेगी। जैसे पागलखाने में पागल बंद हों और हम उन्हें आजाद कर दें, तो क्या तुम सोचते हो स्वर्ग निर्मित हो जाएगा? आजादी तो आ जाएगी, जंजीरें तो टूट जाएंगी, दरवाजे तो खुल जाएंगे, लेकिन पागल तो फिर भी पागल ही होंगे। बंद थे तो पागलपन की सीमा थी; स्वतंत्र हो गए तो पागलपन को पूरी स्वच्छंदता मिल गई।

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-06


सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो
है इसका कोई उत्तर—प्रवचन-छट्ठवां
दिनांक 06 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
न जातु कामात् न भयात् न लोभात्
      धर्म  त्यजेत  जीवितस्यापि  हेतोः।
धर्मो नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये
      जीवो नित्यो हेतुर अस्य त्वनित्यः।।
अपनी किसी इच्छा की तृप्ति के लिए, भय से, लोभ से या प्राणों की रक्षा के विचार से भी धर्म को न छोड़ना चाहिए। धर्म नित्य है और सुख-दुख थोड़े समय के हैं। आत्मा नित्य है, शरीर नश्वर है।
भगवान, कृपा कर इस सूत्र पर कुछ कहें।

 सहजानंद,

बुधवार, 12 जुलाई 2017

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-05

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो

अब प्रेम के मंदिर हों—प्रवचन-पांचवां
दिनांक 05 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
प्रेम यदि मनुष्य का स्वभाव है, तो उसे सहज ही होना चाहिए। तब संत पलटू
क्यों कहते हैं कि सहज आसिकी नाहिं?

 प्रेमानंद,
प्रेम तो निश्चित ही स्वभाव है, स्वरूप है। हम उसे लेकर ही जन्मे हैं, हम उससे ही बने हैं। हमारा रोआं-रोआं, कण-कण, श्वास-श्वास, प्रेम के अतिरिक्त और किसी चीज से अनुप्राणित नहीं है। यह सारा अस्तित्व ही प्रेम का विस्तार है--या कहो परमात्मा का, क्योंकि प्रेम और परमात्मा एक ही सत्य के दो नाम हैं।
जीसस ने कहा है: परमात्मा प्रेम है। जब उन्होंने यह कहा, आज से दो हजार साल पहले, तब बात बड़ी क्रांति की थी, महाक्रांति की थी। जीसस के पहले किसी ने कभी यह बात कही न थी। वस्तुतः परमात्मा के संबंध में ठीक इससे विपरीत बातें बहुत बार कही गई थीं।

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-04

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो

संन्यास यानी नया जन्म—प्रवचन-चौथा

दिनांक 04 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
गुरुरेव हरिः साक्षान्नान्य इत्यव्रबीच्छ्रुतिः।।
श्रुत्या यदुक्तं परमार्थमेतत्
      तत्संशयो नात्र ततः समस्तम्।
श्रुत्या विरोधे ने भवेत्प्रमाणं
      अवेदनर्थाय विना प्रमाणम्।।
श्रुति में कहा गया है कि गुरु ही साक्षात हरि हैं, कोई अन्य नहीं। श्रुति का कथन निस्संदेह परमार्थ रूप ही है। श्रुति का विरोधी होने पर कुछ भी प्रमाण नहीं है। जो अप्रमाण होगा वह अनर्थकारी होगा।
भगवान, ब्रह्मविद्या उपनिषद के इस सुभाषित की व्याख्या करने की कृपा करें।

 सत्यानंद,

सोमवार, 10 जुलाई 2017

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-03

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो

आत्म-श्रद्धा की कीमिया—प्रवचन-तीसरा
दिनांक 03 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
वर्षों से आप जो समझा रहे हैं और जो कुछ भी मैं समझ सका, उसे ही दूसरों को समझाने में मैंने अब तक समय बिताया। लेकिन पीछे मुड़ कर देखता हूं तो पाता हूं कि असल में वह सब तो खुद को ही समझाना था। भगवान, अब यह समझ ही बोझिल हुई जा रही है। अब इस समझ को ढोना नहीं, खोना चाहता हूं। अब पीना चाहता हूं परमात्मा को। अब जीना चाहता हूं भगवत्ता को। अब शिष्य की तरह नहीं, भगवान अब तो भक्त को ही स्वीकार करें।

अजित सरस्वती,

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-02

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो
सहज निर्मलता—प्रवचन-दूसरा
दिनांक 02 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
मुझे ज्ञान दें। आज भिक्षु बन कर आपकी शरण में हूं। क्या आप शरण आए को क्षमा नहीं करेंगे? आपकी शरण आकर ही मैं आज ज्ञान-दान मांग रही हूं। मेरी स्थिति उस कनक ऋषि की पुत्री की तरह है, जो निर्मल थी, जिसे कुछ भी पता न था; जैसा जिसने बताया, सिखाया, उसके हृदय पर लिख गया। क्या इसे मिटा नहीं सकते? आप कहते हैं, जिन्होंने बताया उन्हीं से पूछो। नहीं, मैं आज आपकी शरण हूं। आप ही तटस्थता की स्थिति का मार्ग-दर्शन कराएंगे। क्या निराश वापस जाऊं? नहीं, सिर्फ एक बार मुझे मार्ग-दर्शन कराएं। चाहे किसी भी धर्म की होऊं, आपके लिए तो सब समान हैं न?

 कृष्णा पंजाबी,

रविवार, 9 जुलाई 2017

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—प्रवचन-01

सहज आसिकी नाहिं—(प्रश्नचर्चा)—ओशो
यह प्रेम का मयखाना है—प्रवचन-पहला
दिनांक 01 दिसम्बर सन् 1980 ओशो आश्रम पूना।

पहला प्रश्न: भगवान,
संत पलटू ने सावधान किया है: सहज आसिकी नाहिं। समझाने की अनुकंपा करें कि यह आसिकी क्या है?

 योग मुक्ता,
आसिकी तो समझाई नहीं जा सकती; समझी जरूर जा सकती है।
प्रेम की कोई परिभाषा नहीं है। प्रेम स्वाद है। स्वाद की कोई परिभाषा करे तो कैसे करे? प्रेम अनुभव है। जीकर ही जाना जाता है। और यही खतरा है। इसलिए पलटू ने सावधान किया है। पहला कदम ही खतरनाक है; बिना जाने उतरना होता है।
मन तो उन चीजों में जाना चाहता है, जो परिचित हों, जानी-मानी हों, ज्ञात हों, जिनका गणित हमारे वश में हो। मन अज्ञात में जाने से डरता है; इसी किनारे को पकड़ रखना चाहता है, जोर से! पता नहीं दूसरा किनारा हो कि न हो! दिखाई भी तो नहीं पड़ता। दिखाई तो पड़ते हैं तूफान और आंधियां। दिखाई तो पड़ता है अनंत सागर का विस्तार। जहां तक आंखें जाती हैं दूर क्षितिज तक, सागर ही सागर। इस विराट सागर में इस छोटी-सी नौका को लेकर उतरना आसान तो काम नहीं है।

पोनी एक कुत्‍ते कीी आत्‍म कथा--(अध्‍याय--30)

अध्‍याय—30  (मेरी मुक्‍ति)

      दिसम्बर की शरदऋतु के दिन थे ठंडी हवा अंदर तक शरीर कंपा दे रही थी। तभी अचानक घर में कुछ अजीब सी हरकत शुरू हो गई। जब भी कुछ इस तरह की हरकत घर में होती तो मैं भयभीत हो जाता था। जरूर कही कुछ गलत होने वाला है। उस ऐकांत से बहुत डर जाता था जो मुझे जीना होता था। मन भी कैसा है उस जैसे जीने के लिए छोड दिया जायेऔर मेरा शक शुभा सही निकला। लगातार रोज छत पर ब्रैड सुखाई जा रही थी। और उन्‍हें एक बड़े से ड्रम में भर कर रखा जा रहा था। इत्मीनान से ऐसा काम पहले भी होता था परंतु बहुत छोटे पैमाने पर। या फिर गीदड़ों के लिए ब्रेड ले जाई जाती थी। इस तरह प्रचुर मात्रा में सूखाई जा रही है ओर उन्‍हें एक जगह जगह सम्‍हाल कर रखा जा रहा है। मन में कहीं चौर था, एक भय की आहट होने लेगी....कि जरूर कोई आपतकालिन स्‍थिति आने वाली है। वैसे मुझे सुखी हुई कुरमुरी ब्रैड़ खाने में मजा बहुत आता है।

पोनी एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा--(अध्‍याय--29)

अध्‍याय–29 ( जीवन कुछ है।)

      जीवन इतना सरल नहीं है जितना हम जीते या जानते है। वह अपने में एक अटुट गहराई समटे हुए रहता है। उसकी परत—दर—परत एक—एक नया आयाम लेकर आती है। उपरी सतह पर जिस तरह से धूल खरपतवार जमा होता है, वहीं गहराई में कहीं अधिक चिकनी मिट्टी और अधिक गहराई में गिलापन लिये होती है।
      आने वाला समय तो न जाने कहां पतन की और गिर रहा हो। मनुष्‍य लाख मांसाहारी हो गया है तो क्‍या वह अपने पालतू कुत्‍ते का मांस खा सकता है, नहीं। तो फिर कुत्‍ता इतना गिर सकता है। हां, लेकिन अब सूना है किसी देश में शायद कोरिया में लोग पालतु कुत्‍तो को भी मार कर खा जाते है। शायद वो मनुष्‍य को खा जाते होंगे.....या आने वाले कल जरूर उनका वही कदम होगा। किसी पशु को खुद पाल कर खाना अति कठिन कार्य है।

पोनी--एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा—(अध्‍याय—28)

मैंने भी प्रेम किया—
    अचानक एक दिन घर में गहमागहमी शुरू हो गई। मैं बहुत समझने की कोशिश कर रहा था परंतु मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। भैया-दीदी की स्‍कूल की छुटियां थी। दिसम्बर माह था। दिन की घूप बहुत अच्‍छी लगती थी। और रात को कड़ाके की ठंड शरीर की हड्डियों को भी सिहरा देती थी। और इन दिनों एक बात और थी मैं रोज ही पापा जी के साथ जंगल में सुबह -सुबह जाता था। पापा जी शहर कर के आते और में उस धूल भरे रस्‍ते पर बहुत ताकत के साथ दौड़ लगाता। मुझे अपने पूरे जोर से दौड़ने में बहुत मजा आता था। रात का अँधेरा होता था। आस पास कोई नहीं होता था। दूर रह-रह कर कभी-कभार गीदड़ों की हाऊ....हाऊ की पूकार सुनाई देती थी। आज कर जंगल में कुत्‍ते रहते थे उन में से दो कुतियाँ जो जंगल में रहती थी उन्‍होंने बहुत प्‍यारे-प्‍यारे बच्‍चे दे रखे थे। मैं और सब करता था परंतु बच्‍चे मुझे बहुत अच्‍छे लगते थे।

पोनी--एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा—(अध्‍याय—27)

ध्‍यान और पागलपन

पिरामिड के बनने का काम चलता रहा। पिछले दिनों जैसे ही ध्‍यान का कमरा टूटा था और जो लोग ध्‍यान करने के लिए आना बंद हो गये थे। इन कुछ ही महीनों के इंतजार के बाद उन की तादाद बढ़ गई थी। पिरामिड बन तो गया था परंतु अभी उस के अंदर पलास्टर नहीं हुआ था। लेकिन लोगों को कहां सब्र था। वह तो मौके की तलाश में ही थे। कि जैसे ही ध्‍यान का मौका मिले और वो आये। क्‍योंकि पापा जी ने ध्‍यान का समय ऐसा र्निधारित कर रखा था जो उन्‍हें सुविधा जनक हो। जैसे दिन के 10 बजे दूकान बंद कर के आते थे और 11 बजे ध्‍यान शुरू हो जाता था। ध्‍यान के बाद भी पापा जी को बहुत काम होता था। वरूण भैया को स्‍कूल से लेकर आते थे। हिमांशु भैया के स्‍कूल की बस आती थी। और दीदी तो बड़ी हो गई थी वह तो खूद स्‍कूल चली जाती थी और आ भी जाती थी।