(सदमा - उपन्यास)
आज
नेहा लता को ऊटी में आये करीब छ: महीने हो गए। इस बीच कितना सब बदल गया परंतु समय
है की मानो पंख लगा कर उड़ रहा है। नेहा लता को लगता है की कैसे छ: महीने हो सकते
है। उसे तो लगता है की वह कल ही तो वह यहां पर आई है। अभी तो उसकी आने की थकान भी
नहीं उतरी और समय इतना गुजर गया। वहां दूसरी और यही छ: महीने उसके माता पिता के
लिए अलग आयाम रखते है। उन्हें लगता है छ: जन्म गुजर गये। समय घड़ी की टीक-टीक में
नहीं है समय हमारे अंतस में है। फिर प्रत्येक प्राणी का समय भी भिन्न ही होगा। यही
तो अल्बर्ट आइंस्टीन का सापेक्षवाद है। जिसका निष्कर्ष था कि,
समय-अंतरिक्ष ढाँचे में गतिशील पदार्थ, धीमा
और संकुचित (गति की दिशा में) नजर आता हैं, जब इसे
पर्यवेक्षक के ढाँचे में मापा जाता है। क्या एक मक्खी का और कुत्ते का समय माप एक
होगा। बाहर से देखने में तो दोनो समान होगे परंतु अंदर की समय की गति तो भिन्न
होगी। मक्खी को तो केवल तीन से छ: महीने ही जीवित रहना है और कुत्ते को 14 वर्ष या
मनुष्य को 70 साल या 100 साल। फिर प्रत्येक मनुष्य का समय भी एक समान नहीं होता।
या स्थिति के बदलाव से भी उसमें भिन्नता आ जाती है। ‘एक पल
जैसे एक युग बीता।’ पल तो एक ही बीता है परंतु उसके मन की
स्थिति ऐसी है उसके लिए वह एक युग बन गया।
नेहा लता के मन में एक उमंग थी, एक खुशी थी एक इच्छा, एक कामना कुलांचे मार रही थी। उसने एक लक्ष्य को अपने मन में थिर कर लिया था। उसका मन की गहराई एक थिरता को जान गई थी। उसे कहां पहुंचना है और कैसे उस मार्ग से वह परिचित ही नहीं हुई थी उस पर लगातार चल रही थी, अग्रसर हो रही थी। जब मन शांत और थिर है तो समय भी उतना ही शांत हो जायेगा। बैचेनी भी समय के साथ गति करती है।








