है निर्दय अशोक,
तुझे होता नहीं कभी कोई शोक।
जब सारी बगिया,
पतझड़ मना रही होती है।
तू निर्झर सा अडिग खड़ा,
कैसे झूमता,मुस्कराता रहता है।
तेरी मंजरी जब फूलती है।
कैसे गमक जाता है उपवन सारा।
कोयल के गीत,
भ्रमरों की गुंजान,
तितली की चपलता,
सब मुग्ध और मदहोश रहते है।
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