उस पार नहीं मैं होना चाहता, मझधार बना कुछ रहने दो।
प्रियतम टूटे इन तारों से, कोई
राग बजा कुछ रहने दो।
घुलमिल होती छाया का आकार बना कुछ रहने दो।
टूटे-बिखरे इन सपनों का संसार बना कुछ रहे दो।
पथ शूलों से भरा हुआ है, फैला चारों
और ही कोहरा है।
नहीं सूझती
डगर किधर की, मन सपनों ने घेरा है।
जुगनू की किरणों को हमने, समझा हुआ सवेरा है।

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