( 26/11 के वीरों शहीदों के नाम)
कुदरत के इस अनमोल खजाने से,
आने वाली नसलों को हम क्या देंगे।
एक टूटते धर्म की ज़र-ज़र होती जंजीरें,
या देश के नाम पर, टूटी-फूटी
लकीरे।
वो तो समेटना चाहता है, सीने
में,
समुन्दर की विशालता को।
उसके अरमान हिमालय से भी, ऊंचे
हो शायद।
फिर क्यों हम हवाओं में, नफ़रत
का जहर भर रहे है,
जिन अंजान-अपरिचित लोगों का खून बहाया जा है।

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