(सदमा - उपन्यास)
रात खाने के बाद जब सब आँगन में बैठ कर बात करने के लिए आये तो सब के हाथ में काफी के मग थे। श्रीमति मल्होत्रा जी अधिक काफी नहीं पीती थी। इसलिए वह एक कप दूध ही ले लेती थी। तब तीनों में चर्चा शुरू हुई तब सबसे पहले श्रीमति मल्होत्रा न पूछा की ये बात जो तुम हमें बतला रही हो तुम्हें किस आदमी ने कही है। परंतु तुम क्या जानती हो की यह बात सच है या नहीं। जिस आदमी ने ये बात तुम्हें कही है क्या तुम पहले से उसे जानती हो। क्या पहले हमें एक बार वहां जाकर देख लेना नहीं चाहिए। हां मां आपकी बात ठीक है। परंतु इस व्यक्ति ने मुझे जो फोटो ग्राफ दिखाये है जिसमें मैं उस व्यक्ति के साथ बैठी हूं खेल रही हूं खा रही हूं। उससे तो कुछ भी गलत नहीं लग रहा। फिर समय के साथ मैं उन धूधंली यादों को अब धीरे-धीरे चिंहित करने लगी हूं। मेरे अचेतन से चेतन पर वह सब याद धीरे-धीर एक परछाई की तरह से बाहर आ रहा है। मैं साफ तोर पर तो उन्हें नहीं देख रही हूं परंतु मेरे अचेतन उन्हें जानता सा लगता है। कि मैं कैसे वहां पर रहती थी। कैसे मेरी कोई देख भाल करता था। और मेरे बारे जो बात इस व्यक्ति ने बतलाई वह तो आप भी नहीं जानते है। कि कैसे में उस नर्सिग होम से गायब हुई और कहां गई। और ये आदमी उस सब का साक्षी है। और ये मेरे कॉलिज का दोस्त भी तो है। इसे तो में दस साल से जानती हू। बहुत भला आदमी है।





















