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रविवार, 26 मार्च 2017

सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)-प्रवचन-10



सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)
दिनांक 20 सितम्बर सन् 1975,
श्री ओशो आश्रम पूना।
दसवां प्रवचन-(नीति: कागज का फूल)

प्रश्न-सार:

1—आचरणवादी (बिहेवियरिस्ट) मनस्विदों का यह खयाल कि आचरण के प्रशिक्षण से आदमी को बेहतर बनाया जा सकता है, कहां तक सही है?
2—आरोपित दिखाऊ नीति से क्या समाज का काम चल जाता है?
क्या उसे धर्म से उदभूत नीति की और संतों की आवश्यकता नहीं रहती है?
3—भगवान महावीर और महात्मा गांधी की अहिंसा में फर्क क्या है?
4—कल ध्यान के प्रयोग में कुछ क्षणों के लिए परम शांति की अनुभूति हुई।
तो क्या वह विशेष विधि मेरे अनुकूल आई? और क्या मैं उसे जारी रखूं?
5—जीवन में अनुभव कर-कर के देखना उचित है या देख-देख कर करना उचित है?

सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)-प्रवचन-09



सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)
दिनांक 19 सितम्‍बर सन् 1975,                         
श्री ओशो आश्रम पूना।
नौवां –प्रवचन-(भीतर के मल धोई)

सूत्र:
ऊपरि आलम सब करै, साधु जन घट मांहि।
दादू ऐतां अंतरा, ताथैं बनती नाहिं।।
झूठा सांचा कर लिया, विष अमृत जाना।
दुख को सुख सबके कहै, ऐसा जगत दिवाना।।
सांचे का साहब धनी, समरथ सिरजनहार।
पाखंड की यह पिर्थवी, परपंच का संसार।।
पाखंड पीव न पाइए, जे अंतर सांच न होई।
ऊपर थैं क्यों ही रहौ, भीतर के मल धोई।।
जे पहुंचे ते कहि गए, तिनकी एकै बात।
सबै सयाने एकमत, उनकी एकै जात।।

सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)-प्रवचन-08



सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)
दिनांक 18 सितम्‍बर सन् 1975,

श्री ओशो आश्रम पूना।
आठवां –प्रवचन-(प्रेम जीवन है)
प्रश्न-सार

1—ध्यान, समाधि और प्रेम के अंतर्संबंध को समझाने की कृपा करें।
2—क्या प्रेम ही जीवन है? जीवंतता है?
3—जिसके प्रति भी समर्पण का भाव हो, चाहे परमात्मा के प्रति या गुरु के प्रति, उसके संबंध में कोई न कोई धारणा तो होगी ही। तो यह समर्पण भी एक धारणा के प्रति ही होगा न!
4—भक्त कितना ही भाव में गहरा जाए, लेकिन अंत तक भी शायद उसका संबंध द्वैत का ही बना रहता है। और द्वैत बना रहे तो मुक्ति क्या संभव है?
5—क्या शरीर में रहते हुए चरम अद्वैत की उपलब्धि संभव नहीं है?

शनिवार, 25 मार्च 2017

सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)-प्रवचन-07



सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)
दिनांक 17 सित्‍मबर सन् 1975,
श्री ओशो आश्रम पूना।


सातवां -प्रवचन
इसक अलह का अंग
सूत्र

जब लगि सीस न सौंपिए, तब लगि इसक न होई।
आसिक मरणै न डरै, पिया पियाला सोई।।

दादू पाती प्रेम की, बिरला बांचै कोई।
बेद पुरान पुस्तक पढ़ै, प्रेम बिना क्या होई।।

प्रीति जो मेरे पीव की, पैठी पिंजर माहिं।
रोम-रोम पिव-पिव करै, दादू दूसर नाहिं।।

आसिक मासूक हुई गया, इसक कहावै सोई।
दादू उस मासूक का, अल्लहि आसिक होई।।

इसक अलह की जाति है, इसक अलह का अंग।
इसक अलह औजूद है, इसक अलह का रंग।।

सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)-प्रवचन-06



सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)
दिनांक 16 सित्‍मबर सन् 1975,
श्री ओशो आश्रम पूना।

छठवां -प्रवचन
तथागत जीता है तथाता में

प्रश्न-सार
1—क्या झेन संत बोकोजू का अपनी मृत्यु का पूर्व-नियोजन तथाता के विपरीत नहीं था?
2—दादू कहते हैं: ज्यूं राखै त्यूं रहेंगे, अपने बल नाहीं।
इसी तरह का एक पद संत मलूक का है--
अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।
दास मलूका कहि गए, सब के दाता राम।।
क्या संत मलूक भी सही हैं?
3—साधक या भक्त के लिए मन का कोई विधायक उपयोग है अथवा नहीं?
4—आपने कहा, अस्तित्व एक दर्पण है जिसमें हम अपने को ही देखते हैं।
यदि यह सच है, तो सर्वथा शुद्ध और शून्य हो गए संतों को हम सांसारिकों की पीड़ा, पाप और नरक कैसे दिखाई पड़ते हैं?
5—आपने कहा कि चित्त की अनेक आकांक्षाओं के साथ भगवत-प्राप्ति को एक अतिरिक्त आकांक्षा की तरह नहीं जोड़ा जा सकता।
धर्म-पथ की यात्रा फिर आरंभ कैसे होगी?
6—कभी-कभी नगरवासी आपके और आश्रम के संबंध में प्रश्न पूछते हैं। उनके कुछ प्रश्न इस प्रकार हैं:
7—आपके भगवान का पूरे दिन का कार्यक्रम क्या है?
8—वे लोगों को खानगी मुलाकात क्यों नहीं देते?
9—आश्रम में इतनी गोपनीयता क्यों है?
10-आश्रम में इतने अधिक विदेशी क्यों हैं, भारतीय क्यों नहीं हैं?
11-यहां आश्रम में सुंदर और युवा युवतियों का इतना आधिक्य क्यों है?
12-कुछ विदेशी संन्यासिनियों के गर्भवती होने की खबर क्या सच है?
13-आश्रम के लिए धन कहां से आता है?

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

सबै सयाने एक मत-(संंत दादू दयाल)-प्रवचन-05



सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)
दिनांक : 15 सित्‍म्‍बर, सन् 1975,
श्री रजनीश आश्रम,  पूना।
पांचवां प्रवचन
समरथ सब बिधि साइयां
सारसूत्र:

समरथ सब बिधि साइयां, ताकी मैं बलि जाऊं।
अंतर एक जु सो बसे, औरां चित्त न लाऊं।।

ज्यूं राखै त्यूं रहेंगे, अपने बल नाहीं।
सबै तुम्हारे हाथि है, भाजि कत जाहीं।।

दादू दूजा क्यूं कहै, सिर परि साहब एक।
सो हमको क्यूं बीसरै, जे जुग जाहिं अनेक।।

कर्म फिरावै जीव को, कर्मों को करतार।
करतार को कोई नहीं, दादू फेरनहार।।

आप अकेला सब करै, औरुं के सिर देई।
दादू सोभा दास कूं, अपना नाम न लेई।।

सबै सयाने एक मत-(संंत दादू दयाल)-प्रवचन-04



सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)

दिनांक : 14 सित्‍म्‍बर, सन् 1975,
श्री रजनीश आश्रम,  पूना।
चौथा प्रवचन
मृत्यु श्रेष्ठतम है
प्रश्न-सार:
1—कृष्ण पूर्णावतार कहे जाते हैं, पर सभी सयाने उनके प्रति एकमत क्यों नहीं हैं?
2—आपने कहा है, गुरु मृत्यु है, ध्यान मृत्यु है, समाधि मृत्यु है। जीवन में जो भी श्रेष्ठतम है उसे मृत्यु ही क्यों कहा गया है?
3—शून्य चित्त में यह प्रत्यभिज्ञा, पहचान कैसे होगी कि यह सत्य है?
आप कहते हैं कि हर आकांक्षा के भीतर उसका विपरीत छिपा है। सम्मान की आकांक्षा में अपमान छिपा बैठा है; जीने की आकांक्षा में ही मृत्यु का भय भरा है। ऐसा क्रूर विधि-विधान क्यों है?

गुरुवार, 23 मार्च 2017

सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)-प्रवचन-03


सबै सयाने एक मत-(संत दादू)
दिनांक : 13 सित्‍म्‍बर, सन् 1975,
श्री रजनीश आश्रम,  पूना।
तीसरा -प्रवचन
मेरे आगे मैं खड़ा
 सूत्र:

जीवत माटी हुई रहै, साईं सनमुख होई।
दादू पहिली मरि रहै, पीछे तो सब कोई।।

(दादू) मेरा बैरी मैं मुवा, मुझे न मारै कोई।
मैं ही मुझको मारता, मैं मरजीवा होई।।

मेरे आगे मैं खड़ा, ताथैं रह्या लुकाई।
दादू परगट पीव है, जे यहु आपा जाई।।

दादू आप छिपाइए, जहां न देखै कोई।
पिव को देखि दिखाइए, त्यों-त्यों आनंद होई।।

(दादू) साईं कारण मांस का, लोहू पानी होई।
सूकै आटा अस्थि का, दादू पावै सोई।।

सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)-प्रवचन-02



बै सयाने एक मत-(संत दादू)
दिनांक : 12 सित्‍म्‍बर, सन् 1975,
श्री रजनीश आश्रम,  पूना।

प्रार्थना क्या है?
दूसरा -प्रवचन

प्रश्न-सार:

1—क्या प्रार्थना ही पर्याप्त है?
2—हम अंधे हैं, अंधकार में जी रहे हैं। प्रकाश का कुछ अनुभव नहीं।
ऐसी अवस्था में हम प्रार्थना क्या करें?
3—आपने कहा कि पाप की स्वीकृति से पात्रता का जन्म होता है।
लेकिन उसी से आत्मदीनता का जन्म भी तो हो सकता है!
4—दादू की खोज जिज्ञासु की थी या साधक की या भक्त की?

सबै सयाने एक मत-(संत दादू दयाल)-प्रवचन-01


बै सयाने एक मत-(दयाल)
ओशो
दिनांक : 11 सित्‍म्‍बर, सन् 1975,
श्री रजनीश आश्रम,  पूना।

पहला -प्रवचन
तुम बिन कहिं न समाहिं                     

सूत्र

तिल-तिल का अपराधी तेरा, रती-रती का चोर।
पल-पल का मैं गुनही तेरा, बक्सौ औगुन मोर।।

गुनहगार अपराधी तेरा, भाजि कहां हम जाहिं।
दादू देखा सोधि सब, तुम बिन कहिं न समाहिं।।

आदि अंत लौ आई करि, सुकिरत कछू न कीन्ह।
माया मोह मद मंछरा, स्वाद सबै चित दीन्ह।।

दादू बंदीवान है, तू बंदी छोड़ दिवान।
अब जनि राखौं बंदि मैं, मीरा मेहरबान।।

बुधवार, 22 मार्च 2017

प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया-(दूल्‍हन)-प्रवचन-10



प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया-(दूल्‍हन) 
प्रवचन-दसवां  
दिनांक : 10-फरवरी, सन् 1979;

श्री ओशो  आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार:  

1—प्रार्थना में बैठता हूं तो शब्द खो जाते हैं।
यह कैसी प्रार्थना!

2—मैं संन्यास तो लेना चाहता हूं लेकिन समाज से बहुत डरता हूं।
कृपया मार्ग दिखाएं।

3—संतों की सृजनात्मकता का स्रोत कहां है?
सब सुख-सुविधा है, फिर भी मैं उदास क्यों हूं?      

प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया-(दूल्‍हन)-प्रवचन-09



प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया-(दूल्‍हन) 
प्रवचन-नौवां  
दिनांक : 06-फरवरी, सन् 1979;
श्री ओशो  आश्रम, पूना।
सारसूत्र:

चारा पील पिपील को, जो पहुंचावत रोज।
दूलन ऐसे नाम की, कीन्ह चाहिए खोज।।

कोउ सुनै राग अरु रागिनी, कोउ सुनै जु कथा पुरान।
जन दूलन अब का सुनै, जिन सुनी मुरलिया तान।।

दूलन यह परिवार सब, नदी-नाव-संजोग।
उतरि परे जहंत्तहं चले, सबै बटाऊ लोग।।

दूलन यह जग आइके, काको रहा दिमाक।
चंदरोज को जीवना, आखिर होना खाक।।

प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया-(दूल्‍हन)-प्रवचन-08



प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया-(दूल्‍हन) 
प्रवचन-आठवां   
दिनांक : 08-फरवरी, सन् 1979;
श्री ओशो  आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार: 

1—भगवान! मनुष्य इस संसार में रह कर परमात्मा को कभी नहीं पा
सकता है, यह मेरा कथन है। क्या यह सच है?

2—भगवान! क्या आप सामाजिक क्रांति के विरोधी हैं?

3—मेरे, मेरे, हां मेरे भगवान!
अधरों से या नजरों से हो वह बात, भला क्या बात हुई!
तू कर जो भी तेरा जी चाहे।

4—भगवान! आप मेरे अंतर्यामी हैं। क्या मेरे हृदय में मीरां और चैतन्य
के से प्रेम के गीत फूटेंगे? क्या उनकी तरह मैं पागल हो कर नाच सकूंगा?

5—भगवान! संतन की सेवा का इतना महत्त्व क्यों है?

प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया-(दूल्‍हन)-प्रवचन-07



प्रेम-रंग-रस ओढ़ चुंदरिया-(दूल्‍हन) 
प्रवचन-सातवां
दिनांक : 07-फरवरी, सन् 1979;
श्री ओशो  आश्रम, पूना।
सारसूत्र-

गुरु ब्रह्मा गुरु बिस्नु है, गुरु संकर गुरु साध।
दूलन गुरु गोविंद भजु, गुरूमत अगम अगाध।।

श्री सतगुरु-मुखचंद्र तें, सबद-सुधा-झरि लागि।
हृदय-सरोवर राखु भरि, दूलन जागे भागि।।

दूलन गुरु तें विषै-बस, कपट करहिं जे लोग।
निर्पल तिनकी सेव है, निर्पल तिनका जोग।।

दूलन यहि जग जनमिकै, हरदम रटना नाम।
केवल राम-सनेह बिनु, जन्म-समूह हराम।।

सुनत चिकार पिपील की, ताहि रटहु मन माहिं।
दूनलदास बिस्वास भजु, साहिब बहिरा नाहिं।।

चितवन नीची, ऊंच मन, नामहि जिकिर लगाय।
दूलन सूझै परम-पद, अंधकार मिटि जाय।।