अध्याय-27
(सदमा - उपन्यास)सुबह
जल्दी उठ कर चाय पीने के बाद ही नेहालता ने कुछ कपड़े जो अपने साथ ले जाने थे।
उन्हें अलमारी से निकल कर पलंग पर रखना शुरू कर दिया। साथ में गिरधारी काका भी मदद
कर रहे थे। बेटी तुम जो ये कार्य करने जा रही हो ये बहुत ही पुण्य का कार्य है। देखों
बेटी मैं अनपढ़ जरूर हूं, परंतु मेरी एक बात को अपने
ह्रदय में बाँध लो, तुम्हारे ठीक होने में उस व्यक्ति का
उतना ही हाथ है जितना की परमात्मा का। असल में परमात्मा उस व्यक्ति के माध्यम बनाया, तुझे ठीक करने के उस आदमी को चुना होगा। मैंने उस देव पुरूष को देखा तो
नहीं। तुमने तो उसे देखा है क्या कुछ बाते तुम्हें वहां की उसकी याद है, या सब भूल गई। नेहालता ने कहा की काका, धीरे-धीरे
कुछ झलकियां याद आ रही है। जैसे वह स्टेशन पर बंदर की तरह से खेल दिखा रहा था।
शायद मेरा ध्यान अपनी और खिंचने के लिए। परंतु मैं नहीं समझ पाई। वही खेल मैं उसके
साथ जैसे खेल रही हूं। परंतु पूरी तरह से साफ नहीं हो पा रहा है।
एक बात बेटा ये तुम्हारे लिए भी उतना ही उपयोगी होगा जितना की उस व्यक्ति के लिए हो सकता है। क्योंकि बीच में तुम्हारी भी तो कुछ याद दाश्त गायब हो गई है। ये मनुष्य के विकास में बाधा भी बन सकती है। जैसे मकान अगर बीच में से कमजोर हो तो उसके कभी भी गिरने की संभावना होती है।




















