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शुक्रवार, 20 मार्च 2026

26-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-26

(सदमा - उपन्यास)

 रात खाने के बाद जब सब आँगन में बैठ कर बात करने के लिए आये तो सब के हाथ में काफी के मग थे। श्रीमति मल्होत्रा जी अधिक काफी नहीं पीती थी। इसलिए वह एक कप दूध ही ले लेती थी। तब तीनों में चर्चा शुरू हुई तब सबसे पहले श्रीमति मल्होत्रा न पूछा की ये बात जो तुम हमें बतला रही हो तुम्हें किस आदमी ने कही है। परंतु तुम क्या जानती हो की यह बात सच है या नहीं। जिस आदमी ने ये बात तुम्हें कही है क्या तुम पहले से उसे जानती हो। क्या पहले हमें एक बार वहां जाकर देख लेना नहीं चाहिए। हां मां आपकी बात ठीक है। परंतु इस व्यक्ति ने मुझे जो फोटो ग्राफ दिखाये है जिसमें मैं उस व्यक्ति के साथ बैठी हूं खेल रही हूं खा रही हूं। उससे तो कुछ भी गलत नहीं लग रहा। फिर समय के साथ मैं उन धूधंली यादों को अब धीरे-धीरे चिंहित करने लगी हूं। मेरे अचेतन से चेतन पर वह सब याद धीरे-धीर एक परछाई की तरह से बाहर आ रहा है। मैं साफ तोर पर तो उन्हें नहीं देख रही हूं परंतु मेरे अचेतन उन्हें जानता सा लगता है। कि मैं कैसे वहां पर रहती थी। कैसे मेरी कोई देख भाल करता था। और मेरे बारे जो बात इस व्यक्ति ने बतलाई वह तो आप भी नहीं जानते है। कि कैसे में उस नर्सिग होम से गायब हुई और कहां गई। और ये आदमी उस सब का साक्षी है। और ये मेरे कॉलिज का दोस्त भी तो है। इसे तो में दस साल से जानती हू। बहुत भला आदमी है।

14-महान शून्य- (THE GREAT NOTHING—का हिंदी अनुवाद)

महान शून्य-(THE GREAT NOTHING—का हिंदी अनुवाद) ओशो

अध्याय -14

02 अक्टूबर 1976 अपराह्न, चुआंग त्ज़ु ऑडिटोरियम में

देव का अर्थ है दिव्य और प्रसादम का अर्थ है उपहार, दिव्य उपहार। और व्यक्ति को अपने जीवन को दिव्य उपहार के रूप में समझना सीखना चाहिए। यह बहुत मूल्यवान है और इसे बर्बाद नहीं करना चाहिए। चूँकि यह मुफ़्त में दिया गया है इसलिए हमें इसे बर्बाद नहीं करना चाहिए। यह मुफ़्त में दिया गया है क्योंकि यह मूल्य से परे है - लेकिन आम तौर पर लोग इसे मूल्यहीन समझते हैं, जैसे कि इसका कोई मूल्य ही नहीं है। यह मूल्य से परे है। यह मूल्य से परे है।

इसलिए प्रत्येक क्षण को ईश्वर को समर्पित एक महान भेंट में बदलना होगा। चूंकि उसने आपको जीवन दिया है, इसलिए आपको उसका उत्तर देना होगा। वह उत्तर प्रार्थना है। जब आप यह समझने लगते हैं कि यह जीवन कितना मूल्यवान है, और ईश्वर ने आपको जीवन देकर, आपमें प्राण फूंककर इतना प्रेम दिखाया है, तो आप उसके प्रेम के प्रति उत्तर देना शुरू कर देते हैं। वह उत्तर प्रार्थना है। यह हमेशा तब आता है जब व्यक्ति को लगता है कि वह एक उपहार है... कि ईश्वर ने उसे बहुत बड़ा वरदान दिया है।

गुरुवार, 19 मार्च 2026

25-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-25

(सदमा - उपन्यास)

र पहुंचते-पहुंचते नेहालता को रात हो गई। माता पिता दोनों ही उस की फिक्र कर रहे थे। और दोनो बड़ी बेसब्री से नेहालता का इंतजार कर रहे थे। नेहालता को आया देख कर दोनों ने चेन की सांस ली। बेटी बहुत देर कर दी और ड्राइवर को भी वापस भेज दिया था। क्यों उसे साथ रखती तो अच्छा होता। नहीं मां ये बात नहीं है। असल में हमें एलिफेंटा की गुफाएं देखने के लिए जाना था। सो ये बेचारा नाहक पाँच छह घंटे के लिए वह खड़ा-खड़ा सूखता इसलिए मैंने इसे भेज दिया था। आप नाहक फिक्र कर रही थी। अब कोई में गाड़ी थोड़ा ही चला रही थी। फिर मां आप इतनी चिंता नाहक करती हो। गिरधारी लाला को आवाज दे कर कहा की मैं नहाने के लिए जा रही हूं बाद में एक कप चाय बना कर रखना आज सारा दिन घूम-घूम कर थक गई। मां आपने भी देखी होगी एलिफेंटा की गुफाएं तो जरूर। मां ने कहां अब हमारे बस की कहां है। मैं तो तेरे पैदा होने के बाद एक बार गई थी तब तू करीब तीन साल की थी। लो बाबा मैं तो इतना थक गई थी की घर पकड़ना कठिन हो गया था।

बुधवार, 18 मार्च 2026

24-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-24

(सदमा - उपन्यास)

पेंटल—ने कहना शुरू किया की जो मैं कह रहा हूं उस के लिए अगर मुझ से कुछ गलत हो जाये तो केवल मेरे दोस्त के प्रति मेरा मोह समझ कर माफ करना होगा। तब मैं आप से आगे निवेदन कर सकता हूं—नेहा लता ने हां में गर्दन हिलाई। तब फिर पेंटल ने कहना शुरू किया पहले तो आपका संग साथ चाहिए मेरे दोस्त को। जो थोड़ा आपके लिए और आपके परिवार के लिए कठिन होगा। आप जवान हो और मेरा दोस्त चाहे बीमार है परंतु है तो जवान फिर दूसरा आपका उससे रिश्ता-नाता ही क्या है। अगर आप किसी तरह से अपने माता-पिता को मना भी लो तो इस बात के लिए फिर समाज में भी एक अड़चन है। अब मैं और क्या कह सकता हूं।

परंतु वैद्य ने आपके दोस्त की बीमारी के विषय में भी विस्तार से चर्चा हुई थी। तब वह क्या कह रहे थे। वे कह रहे थे कि क्या आपको लगता है कि वह लड़की (नेहालता) मेरी दवाई के कारण ठीक हुई है। देखने में ये सच लगता है। परंतु ये संपूर्ण सत्य नहीं है। ये तो ऊँट को बैठने के लिए तिनके का सहारा मात्र था। उसे तो बैठना ही था आज नहीं बैठता तो एक महीने बाद बैठ जाता। परंतु इसका असली कारण है प्रेम, विश्वास और अपनापन। वह जो आप और मेरे दोस्त के बीच घटा। वहीं से बीमारी का अंत शुरू हो गया। आप को एक विश्वास एक प्रेम एक व्यक्ति पर भरोसा हो गया। आपने अपने को उस व्यक्ति पर संपूर्णता से छोड़ दिया। आपने अंजाने में अपने ह्रदय के द्वारा खोल दिया और उर्जा ने अपना काम शुरू कर दिया। जैसे इसका इलाज या तो ध्यान था या प्रेम है दोनो के एक ही रूप। खेर जो हुआ वह अति सुंदर था।

शनिवार, 14 मार्च 2026

23-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-23

(सदमा - उपन्यास)

गले दिन नेहालता ने पेंटल को दफ्तर में फोन किया। पेंटल खुद भी नेहालता के फोन का बड़ी बेसबरी से इंतजार कर रहा था। क्योंकि उसके दोस्त का एक-एक दिन बहुत कठिनाई से गुजर रहा होगा। नेहालता ने कहां की पेंटल जी हमें जल्दी मिलना चाहिए। आप के पास तो इतवार का ही दिन होगा। और आज तो मंगलवार हुआ है। फिर भी बीच में समय नहीं मिल पायेगा क्या। उधर पेंटल ने अपनी मजबूरी बतलाई की पहले ही मैं बहुत छुट्टी कर चूका हूं, हम क्यों ने रविवार को मिलते है। एक तो हमें अधिक समय चाहिए फिर कोई ऐसा एकांत स्थान भी होना चाहिए,  जिस में हम पूरी तरह से बातों को विस्तार से एक दूसरे को समझा और समझ सके। तब दोनों ने मिल कर एक निर्णय लिया की हम रविवार के दिन नौ बजे मिलते है। ‘’गेट वे ऑफ इण्डिया’’ नेहालता ने पूछा की वहां तो बहुत अधिक भीड़ रहेगी और धूप भी बहुत तेज होगी तब वहां एकांत कहां होगा जब पेंटल ने कहां की वहां से हम स्टिमर में बैठ कर दूर एकांत अलीफैन्टा की गुफाओं में चलेगे सार दिन अपना होगा। और वहां पर एकांत भी खूब होगा।

ये बात नेहालता को भी जमी और प्रोग्राम बन गया की वह 9-30 और 10 बजे के बीच में ‘’गेट वे ऑफ इण्डिया’’ पर मिलते है। पेंटल तो सुबह ही अपनी चाय आदि पीकर लोकल में बैठ कर छत्रपति शिवाजी महाराज स्टेशन के लिए कुछ जल्दी ही पहुंच गया। उसके पास तो रेलवे का पास भी था।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

22-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-22

(सदमा - उपन्यास)

नेहालता ने घर पहुंच कर अपने माता-पिता से पेंटल का परिचय कराया की ये हमारे ही कालेज में हमारे साथ पढ़ते थे। परंतु ये हमारे सीनियर थे दो कक्षा आगे, पढ़ाई में हमारे कॉलेज में सबसे अच्छे विद्यार्थी थे। आज अचानक गली के मोड़ पर जाते हुए मिल गये। तो इन्हें घर ले आई। और सूनो गिरधारी लाल जी आज मेहमान आये है हमारे घर। इनके लिए कुछ खास बनाओ या इन से पूछ लो की इन्हें क्या पसंद है। तब पेंटल ने कहा जो भी मिलेगा वह प्रसाद स्वरूप ही होगा। नेहालता ने कहां की ये हमारे काका गिरधारी लाल खान बहुत ही अच्छा बनाते है। कहो तो तब तक एक चाय हो जाये। और गिरधारी को चाय के लिए बोल दिया और दोनों ड्राइंग रूम में बैठ गये। मां-पिता भी पास थे इसलिए वे कुछ बात नहीं कर पा रहे थे। वो जो उन्होंने बात करनी थी उसके लिए तो एकांत और निजता चाहिए। चलों फिर समय निकाल कर मिला जायेगा।

सोमवार, 26 जनवरी 2026

21-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा


 अध्याय-21

(सदमा - उपन्यास)
 

अगले हफ्ते किसी काम के कारण वह नेहालता को ढूंढने के लिए जा नहीं सका। रोज-रोज समय गुजर रहा था, यह वह जानता था। ये सब उसके दोस्त के लिए एक-एक दिन कितना भारी होता जा रहा होगा। परंतु उसकी और से पूरी तो कोशिश कि ही जा रहा है, तब से वह मुम्बई आया है। वहां पर उसका दोस्त किस हालत में होगा इस बात का पता उसे चलता रहता था। क्योंकि वह बीच-बीच में सोनी से फोन पर बात कर सब हाल चाल पता कर लेता था। वहां से सोनी उसको सोम प्रकाश की प्रगति के विषय में बताती रहती थी। उस दिन जो उसके साथ मंदिर में घटा था उसका हालचाल भी उसने सोनी को बतलाया कि वह लड़की शायद मैंने मंदिर में देखी थी। परंतु इस विषय में पक्का तो नहीं कहां जा सकता। लेकिन मुझे लग रहा है था कि ये वहीं है। क्योंकि कोठे पर जब मैंने पहली बार उसे देखा था। तब वह और तरह का परिधान पहने हुए थी और चेहरे पर मेकअप भी अधिक था। एक खास किस्म की विकृति एक भय, एक तनाव वह अपने चेहरे पर लिए हुई थी। फिर मैंने उसे उस समय खास होश से या ध्यान से भी नहीं देखा था। अब जैसे ही में उसका पीछा करने के लिए मंदिर के बाहर आया अचानक न जाने वह कहां गायब हो गई। लाख खोजने पर भी मुझे कहीं दिखाई नहीं दी। परंतु सोनी न जाने क्यों ऐसा लगता है जब मैं उससे अपने दोस्त के बारे में बात करूंगा तो उसकी संवेदना, उसकी भावुकता उसके स्नेह को जगा सकता हूं। ये सब मैंने तेरे संग साथ के प्रेम से सीखा है। न जाने क्यों मुझे ऐसा विश्वास हो गया है। अगर तुम भी आज यहां मेरे साथ होती तो कितना अच्छा होता।

शनिवार, 24 जनवरी 2026

20-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-20

(सदमा - उपन्यास) 

आज पेंटल ने निर्णय लिया की कितनी दिन से टाल रहा हूं परंतु आज तो वहां जाना ही होगा। जो भी हो उसे एक बार आज नेहालता से मिलना ही होगा। सो उसने वहां का पता एक कागज पर लिख लिया और उस दिन कुछ जल्दी ही उठ कर घर से निकल गया। क्योंकि कम से कम दो तीन घंटे का सफर तो था ही। फिर उसके बाद उस पते को ढूंढना भी था। उस इलाके में पहुंचते-पहुंचते सूर्य सर पर आ गया था। काफी पूछने और ढूंढने से उस घर का पता चला। परंतु शहर में रहने वालों की ये बीमारी है की वे अपने पड़ोसी को भी नहीं जानते। वे केवल अपनी दुनियां में इतना मस्त रहते है। सामने क्या हो रहा है किसी को पता नहीं चलता। गांव देहात में आप नाम से ही पता लगा सकते हो। देखने में नेहालता का मकान काफी बड़ा लग रहा था। पैसे वाले आदमी दिखाई दे रहे थे। अब एक दम से अंदर भी नहीं जाया जा सकता है। अब क्या बात की जाये ओर किस से यही पेंटल सोच रहा था। कि जब नेहालता से मिलेगा तो सीधी बीमारी की बात करना भी गलत होगा। अब तक वह उस गली के दो तीन चक्कर लगा चूका परंतु उसे कोई मार्ग नहीं सूझा। गली के एक कोने में एक फल सब्जी वाला खड़ा उसे दिखाई दिया। पेंटल ने उससे बात करने की गर्ज से चार केले खरीद लिए। जब की केले उसे कभी खाने अच्छे नहीं लगते थे। केले ले कर पास ही नाली पर बनी एक छोटी सी पुलिया थी। वहां पर कुछ छांव भी थी। इसलिए वह उस पर बैठ कर उन्हें खाने लगा। सामने ही एक तालाब साफ सुथरा बड़ा सा दिखाई दे रहा था। और उसके दाएं कौन पर एक बड़ा सा मंदिर था। जिसमें इक्का दुकान ही आदमी आता जाता दिखाई दे रहा है।

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

यादें और जीवन का बहा-मनसा-मोहनी

 यादें और जीवन का बहा-


जीवन को अगर हम देखे तो वह यादों का एक बहाव ही पाओगे। परंतु कुछ मील के पत्थर हमारे पूरे जीवन की दशा को प्रतिवर्तन कर देते है। ऐसी ही एक याद आज की यानि की 23 जनवरी 1979 जो आज से 47 साल पहले घटी थी। कैसा मधुर उन्माद आज भी मन के आंगन में गुदगुदाहट सी होने लग जाती है। जब जीवन के उन क्षणों को याद कर रहा हूं। वैसे तो हमारे जीवन की जिसने हमारे जीवन को ये मार्ग दिया या आज जहां हम खड़े है। उसकी भिन्न-भिन्न यादें है। या तिथि है। क्योंकि एक महा बाद यानि 26 फरवरी को 1976 को हम और मोहनी मिले थे। यानि अब करीब 50 साल का हमारा साथ हो रहा है। और यही साथ हमें ओशो के मार्ग पर लेकर गया है। शायद मैं भी इस मार्ग पर अकेला नहीं चल सकता था। और न ही मोहनी ही। परंतु जब दोनों ही अधूरे थे तो ओशो के मार्ग पर चल कर हम एक पूर्ण हुए। और दोनों ने जैसे जीवन के दक्षिणायन की यात्रा एक साथ शुरू की उसी तरह से जीवन का उत्तरायण पर भी एक साथ चले। यानि 23 जनवरी 1994 को पूना से एक ही दिन सन्यास लिया।

मंगलवार, 20 जनवरी 2026

19-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-19

(सदमा - उपन्यास) 

गाड़ी समय से एक दम दादर स्टेशन पर रूकी। उसके पास कोई अधिक सामान तो था नहीं के अच्छी बुरी यादें ही थी। जिनका वज़न न के बराबर था। बस एक ह्रदय में दर्द था। की अगर वह कुछ दिन और रूक सकता तो कितना ही अच्छा होता। परंतु  वह क्या कर सकता था, पहले ही वह इतनी अधिक छुट्टी कर चूका है अब और की गुंजाइश नहीं थी। देखो अब कितने दिनों में समय निकाल कर वह उस लड़की का पता ठिकाना ढूंढ पता है। आसमान पर अभी सूर्य का उदय नहीं हुआ था। परंतु उसकी लालिमा ने सारे अंबर को लाल रंग दिया था। स्टेशन पर अधिक भीड़ नहीं थी बस कुछ पक्षियों के मधुर नाद गुंज रहे थे। दूर स्टेशन से घोषणा हो रही है की कौन सी गाड़ी किस स्टेशन पर आई है और कितनी देर रुकेगी। कितने दिनों बाद उसने अपनी मात्र भूमि पर पैर रखा है। कितनी अंजानी ही बन जाती है ये पृथ्वी ये जगह आप इससे कुछ देर के लिए अलग हो कर जब वापस आते हो। कैसे अजनबी जैसा व्यवहार करती है। तो जब हम एक मनुष्य से भी काफी दिनों बात मिलते है तब वहां भी तो कैसा अनबोला सा व्यवहार बीच में आ कर खड़ा हो जाता है। अपने घर की वह सड़क ले लो या वह दरवाजा जिस को आपने हजारों बार छू-पकड़ कर खोला है। वह भी जब आप इतने दिनों में आते हो तो कैसा पराया-पराया सा लगता है। मानो अब वह भी आप से रूठ गया है।

52 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय 52

यात्रा का अंतिम छंद

ये घटना कर्म जो चल रहा था। इसे मैं रोक देना चाहता था। कम से कम बहार का रूक जाये तो अंदर और अधिक ठहराव से बैठा जा सकता है। पानी पीने के बाद मैं अंदर जाकर लेट गया। पापा जी ने ऐ. सी. चला दिया। ठंडी हवा के कारण मेरी आँख लग गई। शायद शरीर को कुछ विश्राम मिल गया। पता नहीं कितनी देर बाद मैं उठा और इसके बाद मैं आँगन में ही जाकर बैठ गया जैसे किसी का इंतजार कर रहा हूं। कुछ मेरी समझ में नहीं आ रहा था। एक प्रकार का उसे नशा कहूं या बेहोशी वह मुझ पर चढ़ता जा रहा था। कुछ देर बाद उठ कर मैं नीचे जो कच्ची क्यारी थी उस के अंदर घूस कर मैंने बाथरूम किया। अब ऊपर चढ़ना मेरे लिए थोड़ा कठिन था। श्याम को भी सब मिन्नत कर रहे थे की कुछ खा ले परंतु अंदर कुछ जा ही नहीं रहा था। आज पाँच-छ: दिन हो गए थे। केवल पानी या थोड़े दूध को ही पीकर जी रहा था। पापा जी एक दवाई लेकर आए इंजेक्शन भर कर मेरे आधे खुले मुख से वह धीरे-धीरे डालते रहे। शायद कोई ताकत की दवाई होगी। कुछ अंदर गई बाकी पूरा मुख न खुलने की वजह से बाहर ही गिर गई। उसके बाद मैं पास रखे अपने मग्गे से थोड़ा पानी पिया।

शनिवार, 17 जनवरी 2026

18-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-18

 (सदमा - उपन्यास)

आखिरकार पेंटल के लिए वह समय आ ही गया, जब ऊटी को छोड़ने कर जा रहा है। आते हुए किसी नये प्रदेश में मन कैसा होता है। कितना अ-चिन्हित अपरिचित सा एक खोया-खोया सहमा सा। कितना अकेला पर घेरे रहता है आपको। और जब आप वहां से जा रहे होते तो मन कैसा अपना पन चारों और फैला लेता है। उसे लग रहा था कि इस स्टेशन पर पहली बार इस तरह से जा रहा है। पेंटल यहां से जा तो है परंतु अंदर एक पूर्णता को भरा कर, परंतु बहार उसे सब खाली-खाली सा लग रहा है। ये मनुष्य की कैसी बैचेनी है। वह कभी पूर्ण नहीं हो पाता। आज अगर उसका दोस्त सही होता तो वह उसके साथ कैसे-कैसे मजाक बनाता। की उसका जीना कठिन हो उठता। कई बार अपनों का लड़ना झगड़ना भी न मिले तो मन को कितना खलता है। यहां आकर उसे जो मिला वह अमूल्य था। उसके दोस्त की बीमारी ने उसके मन को झकझोर दिया था। उसे एक पल तो समझ नहीं आ रहा था की ये सब क्या और कैसे हो गया। संवेदनशील मनुष्य के जीवन एक तलवार की धार की तरह से होता है। उसका जीवन एक नाजुक पुष्प के समान है। उसे जरा सा भी धक्का लगा नहीं की वह कुम्हला जायेगा।

परंतु अब एक उम्मीद थी। उसके ठीक होने की। वह रेल गाड़ी के डिब्बे में अपनी सीट पर वह बैठ गया था। उसे अंदर से किसी का इंतजार नहीं था। वह अकेला ही अपने विचारों में खोया हुआ था। वह नहीं जानता था। की इसी जगह उसके दोस्त के साथ वह सब हादसा हुआ जो उसके जीवन को पूर्णता बदल गया। क्या वह लड़की उसकी बात का विश्वास करेगी। क्या उसे अपने जीवन की वो घटनाएं जो यहां

51 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

 पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय 51

प्रेम यात्रा का सोपान

प्रेम भी एक पूर्णता एक परिपक्वता चाहता है, जिस प्रेम को हम जानते और देखते है वह प्रेम नहीं वह तो मात्र हमारी एक जरूर है। सही मायने में यह एक दूसरे का शोषण है। प्रेम को जानने के लिए मानव नहीं आपको अति मानव बनना होता है। मैं अति मानव तो नहीं बन पाया परंतु कुछ ऐसे लोगों का संग साथ अवश्य किया जो प्रेम को जानते थे उस पीते थे उसमें जीते थे। वह स्थान प्रेम का एक सरोवर था, जहां उसे पिया ही नहीं जीया जा सकता था, और उसमें डूबा भी जा सकता था। उस सरोवर का नाम था ‘ओशोबा हाऊस’। सच अगर आपने जीवन में ध्यान को नहीं जाना तो आपके जीवन कुछ भी सार्थक नहीं है। कुछ लोग इसे ध्यान कहते है मैं इसे प्रेम कहता हूं। क्योंकि ध्यान मेरे लिए सहज और सरल है। जो आज के मनुष्य के अति कठिन है। मेरे शरीर और योनि के हिसाब से प्रेम अति कठिन है। कितना विरोधाभास लगता है। परंतु सत्य यही है। प्रेम की यात्रा ध्यान के मानसरोवर से शुरू होती है लेकिन कोई मेरे जैसा भाग्यशाली भी है जो बिना मनुष्य रूपी मानसरोवर को प्राप्त किए उस में डूब सकता है। मैं ही नहीं शायद अब मेरे और भाई अनेक होंगे।

मुझे इस बात की अति खुशी है, की ये सब हो रहा है मानव के विकास के कारण, आज भी मानव में ऐसी जाति है, जो पशुओं को केवल अपना अहार समझती है। लेकिन ऐसा तो हमेशा से होता चला आ रहा है। परंतु आटा चाहे कितना ही हो परंतु चुटकी भर नमक भी उसके सुस्वाद को दोगुना कर जाता है। वही मानव इस पृथ्वी के नमक है। अब मेरे पास समय कम है, ये मैं जानता हूं, मुझे अपने दीपक से रिश्ते तेल का पता है, वह कितने दिन या हो सकता घंटे तक और उजियारा देगा।

गुरुवार, 15 जनवरी 2026

17-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-17

 (सदमा - उपन्यास)

सोनी ने घर पहुंच कर ड्राइवर को कहां की गाड़ी को गैराज में पार्क कर दो और अपने कमरे में जाकर लेट गई। इतनी देर में नौकर आया की मालिक साहब तबीयत तो खराब नहीं है आपकी,  कहो तो सर दर्द की गोली लेकर आऊं। तब सोनी हंसी, की नहीं रे, राम लाला। मैं एक दम से ठीक हूं बस थोड़ा थक गई थी। इसलिए थोड़ा सा आराम करने का मन है   बस। मेरे लिए श्याम की चाय भी मत बनाना। मैं खाना खाकर आई हूं नानी के घर से। और वह करवट बदल कर लेट गई। ऐसे मधुर शब्द मालिक साहब के सालों बाद सुनने को मिले है। इसलिए राम लाल मन ही मन अति प्रसन्न था। जो मेहमान चार पाँच दिन पहले घर आया था। क्या ये सब उसकी संग सोहबत का प्रभाव दिख रहा था? कुछ भी हो मालिक जैसी पहले दिखती थी। सब चाहते है, वह अपने उसी जीवन की पटरी पर आ जाये। क्योंकि जिस मार्ग पर मालिक साहब चल रही है। इसका अंत तो मौत है, इस तरह के टकराव और तनाव में क्या कोई भी व्यक्ति साधारण तरह से मंजिल की और जा सकता है।

सोनी देर श्याम को उठी और तब राम लाला को कहां की एक कप चाय तो पिला दो। तब राम लाला ने कहां की आपका मेहमान आया हुआ है। कितनी देर से वह आपका इंतजार कर रहा है। मैंने लाख कहां की आपको जगा दूं परंतु मुझे मना कर दिया की नहीं वह थकी है कितने दिनों में इतनी गहरी नींद सोई है। आप नींद की और विश्राम की कद्र करो।

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

50 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

 पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय -50

जीवन का प्याला

हम केवल जीवन के भरे उस प्याले का ही अनुभव रहा है सम्पूर्ण जीवन भरा होता है। यानि जीवेषणा हम मृत्युवेषणा थानाटोस के अनुभव से वंचित है। ये किसी-किसी भाग्य शाली को ही नसीब होता है। हम तो जीते हुए भी नहीं जीते मृत्यु के भय से कांपते रहते है। लेकिन अगर हमें हमारी मृत्यु का ज्ञान हो जाये तब हमारा जीवन कैसा होगा। इसलिए प्रकृति ने उसे एक रहस्य के पर्दे में छुपा कर रखा है। मैं अब जान रहा था जीवन का वो प्याला अब रिस चूका है। अब तो इसमें केवल एक अंधकार है। फिर भी मुझे उस से डर नहीं लग रहा था। क्योंकि मैंने जीवन को जिस पूर्णता से जिया था वही उसकी तृप्ति है। हम जीवन को जीते नहीं केवल भय से डर कर भागते रहते है। इसलिए हम उसे जान नहीं सकते। वह तो कितनी सुंदर कोमल मुलायम नींद की तरह है। आप अपने जीवन में देखते नहीं दिन भर थकने के बाद जब श्याम शरीर निष्क्रिय सा हो जाता है उस की उर्जा चूक जाती है। तब हम गहरी नींद में चले जाते है। और सुबह उठते है तो फिर तरो ताजा एक उर्जा से सराबोर होकर। कहां से आई वह उर्जा उस अमृत कुंड से। वही तो मृत्यु है।

रोज मेरी शरीर प्राण शक्ति शून्य होता जा रही थी। परंतु मम्मी-पापा जी एक दो दिन बाद जरूर सुबह मुझे घुमाने ले जाते थे। रास्ते में न जाने कितने ही कुत्ते हो गए थे, उसे पार करना भी कठिन होता जा रहा था। पहले तो अकेला जंगल से आ जाता था।

16-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-16

 (सदमा - उपन्यास) 

बाजार में दोनों कुछ इधर उधर कुछ देर घुमाते रहे, संतरे, कुछ अंगूर और सेब के साथ कुछ सब्जी भी खरीदी। सोनी ने तो सालों बाद बाजार में जाकर ये सब खरीदारी की थी। वह तो बाजार जाना ही बंद कर चूकी थी। उसकी तो सारी इच्छाएं मृत हो चूकी थी। जब की बाजार की खरीदारी भी आदमी के अंदर एक जीवंतता भरती है। एक प्रेम भरती है। चाहे वह आदमी फल ही खरीद रहा हो परंतु उसके मन में अपने परिवार अपने सहयोग का ध्यान होता है। उसके ह्रदय में एक प्रेम होता है, एक अपना पन होता है, जिस के लिए वह खरीदारी कर रहा है। ये भी प्रेम का एक आयाम है, जो सोनी लगभग भूल ही चूकी थी। आज उसे बहुत अच्छा लग रहा था। आज वह खूद एक-एक फल और एक-एक सब्जी आपने हाथों से चून रही थी। और पेंटल को मना कर रही थी। तुम नहीं चून सकते। ये काम औरतों का होता है। देखो आप एक संतरा चून कर दिखाओ। पेंटल ने एक संतरा उठाया तब सोनी ने कहां की ये अंदर से फोका एक दम से खाली ही होगा। क्योंकि इसमें वज़न नहीं है। पेंटल तो उसका मुख देखता रहा गया था। आज सोनी एक सम्पूर्ण औरत लग रही थी। अपने अंदर एक अल्हड़ बाल पन के साथ एक परिपक्वता जो केवल स्त्री में ही पाई जाती है। उसके चेहरे पर एक चटक नूर झर रहा था। जिस के लिए किसी मेकअप की जरूरत नहीं होती।

रविवार, 11 जनवरी 2026

49 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

 पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय -49

जीवन के पंख

इस समय जो मैं जीवन जी रहा था। वह जमीन पर चलता सा तो लगता था, परंतु उसके पंख लगे थे। इतना खूबसूरत जीवन होगा मैंने कभी सोचा भी नहीं था। कितनी खुशियाँ कितनी रमणीयता पूर्णता से इस जीवन में समाई हुई  थी। हर पल, हर दिन मानों कुछ नया लेकर आ रहा था। बदला कुछ भी नहीं था सब पहले की ही तरह से चल रहा था। परंतु संग बदलने से मानो आप किसी उत्तुंग या ऊँचा में प्रवेश कर गये हो। मम्मी-पापा जी के संग साथ रहने के कारण जो मेरे दिन कट रहे थे वो शब्दों में नहीं पिरोए जा सकते। वह

वह दिन सुबह से रात तक कैसे अपने में एक सम्पूर्णता समेटे चल रहे थे। मानो आप आज जो जी लिए है बस अब पूर्ण है कल की जरूरत नहीं है। चाहे अगले पल ही मैं जीवन से मुक्त हो जाऊं। जितना मैं पकड़ छोड़ता जा रहा था, उतना जीवन में रस्सा स्वाद बढ़ रहा था। सुबह उठ कर या तो मम्मी पापा ध्यान करते या घूमने चल देते मैं तो उनकी पूंछ था। पल भर भी उनका साथ नहीं छोड़ता था। उसके बाद पापा जी कम्पयूटर पर बैठ कर कुछ खटर-पटर (टाईप) कर रहे होते या बांसुरी का रियाज कर रहे होते मेरा आसन उनके चरणों में ही होता था। तब हर हाल में अपनी जीवन उर्जा का बहाव हो गया। हर हाल में।

15-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-15

(सदमा - उपन्यास) 

सुबह जल्दी उठ कर वैद्य जी की दवाई का काढ़ा बना कर और उसे ठंडा कर सोम प्रकाश को पिला दिया। और फिर वह बाहर आकर धीरे-धीरे खूद ही घूमने लग गया। और फिर पेंटल ने कपड़े पहने और थैला हाथ में ले कर कहने लगे नानी मैं जा रहा हूं। दोपहर के खाने तक आने की भर पूरी कोशिश करूंगा। अगर देर हो जाये तो तुम दोनों खाना खा लेना। क्योंकि वहां का पता नहीं की कितना समय लग जाये। अगर देखता हूं सोनी के पास टाइम होगा तो काम आसान और जल्दी हो जायेगा। पेंटल के चेहरे पर एक उन्माद था। वह नानी से मिल कर अपनी खुशी को छुपाने की लाख कोशिश कर रहा था परंतु नानी ने उसके चेहरे को देख कर जरा मुसकुराई। मन में तो लड्डू फूट रहे होंगे। मन चाही मुराद मिल गई। हां आप भी मजाक करती हो। हां नानी अगर कोई सब्जी तरकारी लानी हो तो बता दो। कल तो आप बैंगन का भर्ता और रोटी खाने का मन है। तब मैं बैंगन लेता हुआ आऊंगा। देखती हूं पिछली बार तो ये बेचारा थैला खाली ही घूम फिर कर आ गया था। देखते है आज अपने अंदर कुछ ले कर आता है या नहीं। इस बात से पेंटल जरा झेप कर मुसकुराता हुआ चल दिया।

पेंटल अपनी मस्ती में गीत गुनगुनाता हुआ चल दिया। पेड़ पौधों के बीच से होते हुए वह अपनी मंजिल की और जा रहा था। जैसे-जैसे सोनी का मकान नजदीक आ रहा था उसके दिल की धड़कन बढ़ रही थी। कैसे उसका सामना करेगा। अंदर से उसे एक झिझक भी हो रही थी। परंतु मन में एक उमंग एक तड़प भी थी की एक बार फिर सोनी को जी भर कर देख लेगा।

बुधवार, 7 जनवरी 2026

48 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय 48

मम्मी-पापा का पूना जाना

ओशोबा हाऊस का काम पूर्ण होने पर कितना गहन एकांत शुरू हो गया। मैं जिस कोने में भी जाता तो एक अलग ही तरंग मुझे महसूस होती थी। क्या लोगों की भाव तरंग उसके साथ चलती है। फिर मुझे अचानक घर पर कुछ ऐसा लगा जिसे मैं पहले भी महसूस कर चूका था। घर पर फिर समान सूटकेस में सजाया जा रहा था। मेरा दिल तो एक दम बैठा गया कुछ देर के लिए। लेकिन थोड़ी  देर में अपने को मैंने सम्हाल लिया। बाद में पता चला की केवल मम्मी-पापा जी पूना जा रहे है। इस बार मैंने मन से प्रसन्नता होकर उन्हें विदा करने की ठान ली थी। जो गलती मुझ से पिछली बार हुई थी मैं उसे दोहरना नहीं चाहता। चाहे मुझसे वह गलती किसी शक्ति ने करवाई हो चाहे उसे सब ने सही ठहरा दिया हो। परंतु हुआ तो गलत था।  कितने दिन हो गए दोनों को खटते हुए काम की इस मारा-मारी में विश्राम की भी तो जरूरत होती है। जब पिछले साल भी मैंने उन्हें जाने से रोक दिया था। लेकिन अब नहीं रोकूंगा। हां एक बात और सालों से चल रहे ओशोबा हाऊस का काम भी तो अब खत्म हो गया। इसलिए लम्बी छूटी तो मम्मी पापा को चाहिए ये उनका हक है।

मम्मी पापा सुबह जब जा रहे थे। तो मेरे पास आए। मैं थोड़ा उदास था क्योंकि कितना ही कह लूं मम्मी पापा के बिना ये घर एक दम से सब खाली-खाली लगता है। उनके बिना मेरा मन तो नहीं लगेगा, ये सब दर्द मुझे सहना होगा। और पहली जैसी बेवकूफी नहीं करूंगा। पापा जी ने मेरे सर पर हाथ फेरा, मैंने पूंछ हिलाई, कि आप जाओ मैं यहां ठीक रहूंगा आप यहां की फिक्र मत करना मैं यहां सब का ख्याल रखूंगा।

14-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

अध्याय-14

(सदमा - उपन्यास) 

रात का खाना खाने के बाद सब ने प्रोग्राम बनाया की कल सोम प्रकाश को भी उसी वैद्य जी के पास ले कर जाया जाये। दूरी तो कोई खास नहीं थी केवल पाँच-छ: मील की ही थी। परंतु सोम प्रकाश के पैर इतना चल सकेंगे या नहीं कहां नहीं जा सकता। आखिर ये बात तय की गई की कुछ दूर तक चल कर देखा जायेगा अगर सोम प्रकाश को चलने में दिक्कत हुई तो वापस आ जायेंगे। उसका धीरे-धीरे चलना बहुत जरूरी है। फिर एक हफ्ते बाद जब वह ठीक से चल सकेगा तब चलेंगे। सुबह चाय पीने के बाद तीनों वैद्य जी से मिलने के लिए चल दिए। आज सोम प्रकाश की चाल में कुछ फर्क था, वह आराम से चल रहा था। एक हाथ पेंटल ने पकड़ रखा था। नानी इतनी उम्र में भी काफी तंदुरुस्त थी। आधा एक किलोमीटर चलने के बाद जब पेंटल ने सोम प्रकाश को कहां की थके तो नहीं हो। तब सोम प्रकाश न गर्दन हिला कर जवाब दिया नहीं। तब नानी और पेंटल को खुशी हुई। कुछ दूर चलने पर वह तीनों एक पत्थर पर बैठ कर विश्राम करने लगे। हवा में ठंडक थी इसलिये गर्मी लगने का तो सवाल ही नहीं था। उपर से चटक धूप निकल आई थी। और चौथा हरिप्रसाद तो उन मार्ग दर्शक था, जो उनके साथ तो कम ही चलता था। आधा मील या तो आगे या फिर पीछे कानूनी कार्यवाही किन्हीं झाडियों में करता रहता था।

करीब तीन घंटे चलने के बाद वैद्य जी कुटिया नजर आई। बीच में एक लकड़ी का पूल बना रखा था। जिससे उस पार जाना आसान हो जाये। नहीं तो बरसात के दिनों में उस और जाना अति कठिन हो जाता था।

रविवार, 4 जनवरी 2026

47 - पोनी - एक कुत्‍ते की आत्‍म कथा -(मनसा-मोहनी)

पोनी – एक  कुत्‍ते  की  आत्‍म  कथा

अध्‍याय -47

फिर काम शुरू

दीपावली के कुछ दिनों के बाद राम रतन जी फिर काम करने के लिए आ गये। पापा जी तो उनका इंतजार कर ही रहे थे। इस बीच पापा जी न जाने दीदी के साथ बाजार से जाकर कितनी टाईल कि पेटियां ले आये थे। जिससे एक आँगन का कोना भर गया था। शायद मेरे हिसाब से काम ऊपर से ही चालू होना चाहिए। और ठीक ऐसा ही हुआ भी। सबसे पहले ऊपर छत पर जो सुंदर आर्च बनी थी उन पर महरून टाइले लगाई गई। नीचे की क्यारियों में और मोमटी पर तो पहले ही टाईल लगा दी गई थी। सुंदर मोमटी काली सफेद टाईलों से कितनी सुंदर लग रही थी। ठीक उसके बगल में पिरामिड अपने काले वैभव रूप में गर्व से अलग खड़ा दिखाई दे रहा था। बीच कि गैलरी में सफेद झक पाए एक कतार में खड़े कैसे सैनिक भाव दे रहे थे। रंग और डिज़ाइन कितने करीने से तैयार हो रहा थे,  उन पायो या जाली से जब मैं उनमें नीचे भी झांक लेता था और गिरने का कोई डर भी नहीं था। क्योंकि उन पायो में आपस की दूरी बस मेरा मुख ही बहार जाता था गर्दन भी नहीं। सब कितना सुंदर लग रहा था ऊपर से जब मैं नीचे की और देखता तो पेड़ पौधे क्यारियां कितनी सुंदर दिखती थी।

13-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-13

(सदमा - उपन्यास) 

उधर एक तरफ तो शारीरिक तृप्ति का आनंद और दूसरी और उसके मन में चोरी की नानी को क्या जवाब दूंगा। पेंटल उलझा विचारों में डूबा हुआ अपनी मंजिल की और चला जा रहा था। सुबह का सूर्या दूर आसमान में काफी उपर तक चढ़ गया था। जिस खाली थैले को लेकर वह गया था। वहीं अब भी उसके हाथ में वैसे का वैसा ही था। वह मन ही मन सोच रहा था, की नानी को क्या झूठ बोलेगा। दूसरी और सोम प्रकाश की बीमारी की आज उसे खुशी भी थी की कम से कम उसे तो उसको कोई जवाब नहीं देना होगा। आदमी भी कितनी नीचे की सोच रख सकता है। ये विचार उसके मन में आते ही उसे अपने से बहुत घिन्न हो उठी। वह डरा सहमा सा घर की और चला आ रहा था। दूर से देखा तो सोम प्रकाश धूप में एक कुर्सी पर बैठा हुआ दिखाई दिया। पास ही नानी उससे कुछ पूछ रही है। पल भर के लिए पेंटल के पैर ठिठक गए। मानो जमीन ने उन्हें पकड़ लिया हो। परंतु यहां खड़ा भी नहीं रहा जा सकता था। एक अपराध भाव भी मन में था। और जो प्रेम सूख की अनुभूति हुई थी। वह चाह चित को किसी और ही लोक में ले जा रही थी। वहां कोई भय कोई शर्म नहीं थी। वह बस उस में डूब जाना चाहता था। उस समय उसे एकांत चाहिए जहां पर वह अपने उस आनंद सागर में डूब जाये। उस सब से उसे अब नहीं बचना।

पेंटल नानी के पास जा कर खड़ा हो गया। नानी ने एक बार उपर से उसे नीचे तक उसे देखा। नानी की आंखों में क्रोध था, परंतु चेहरा एक दम शांति था। लेकिन ध्यान से देखने पर आंखों में प्रेम बह रहा था। इस तरह का रूप नानी का इससे पहले पेंटल ने पहले कभी नहीं देखा था।