(सदमा - उपन्यास)
कार
से उतर कर सोनी ने नानी का हाथ पकड़ कर उसे प्यार से नीचे उतारा और ड्राइवर से
कहने लगी की पीछे जो डिग्गी में सामान रखा है उसे अंदर लेकर आ जाये। और जैसे ही
ड्राइवर ने गाड़ी का दरवाजा खोला वह शैतान हरिप्रसाद तो गाड़ी से उतरा और वापस
दौड़ लिया। तब सोनी कहने लगी ये कहां जा रहा है। तब नानी ने कहां की ये सोम प्रकाश
और नेहालता के पास जा रहा है। तब सोनी हंसी की फिर हमारे साथ क्यों नाहक बैठ कर
आया। इन लोगों का दिमाग भी कैसे कार्य करता है नानी जी। ये सब समझ जाते है। बिना
भाषा के भी इन्हें आप जो करने को कहोगे तो ये करने लग जाते है। क्या इसने नेहालता
को आते ही पहचान लिए था। नानी ने कहा की हां उसने तो इसे पहचान लिया परंतु नेहालता
इसे नहीं पहचान पा रही थी। बेटी एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही की सोम प्रकाश अब
सब को पहचान रहा है। परंतु नेहालता को नहीं पहचान रहा। और नेहालता तो हम किसी को
नहीं पहचान पा रही थी। ये कैसा विरोधा भास है। परमात्मा हमारी ये क्या परीक्षा ले
रहा है।
नानी और सोनी धीरे-धीरे घर के अंदर में प्रवेश कर रहे थे। नानी के हाथ से सोनी ने चाबी ली और दरवाजे का ताला खोल दिया। पीछे-पीछे ड्राइवर भी फलों के थैले लिये चला आ रहा था। नानी ने कहां की बेटा पिछली बार भी जो फल तुम लेकर आई थी वह अभी तक रखे हुए है। इतना खर्च क्यों करती हो। तब सोनी ने कहां की नानी अब तो नेहालता भी आ गई है। आप को इन बातों की ज्यादा फिक्र करने की अब जरूरत नहीं होगी। वह अब अधिक अच्छे से सोम प्रकाश का ख्याल रखेगी। अब आप को कम मेहनत करनी होगी। हां बेटी बहुत ही सुशील लड़की है।





















