(सदमा - उपन्यास)
संसार की सभी संस्कृतियों में स्त्री पृथ्वी की भांति और पुरूष आकाश की भांति होने का प्रतिनिधित्व करता है। स्त्री का आस्तित्व पूर्ण रूप से भूमि से जुड़ा हुआ है। और वह तुम्हें अपने में समेट लेना चाहती है। उसकी जड़े जिस अतल में समाई है, वहाँ पर एक घन-घोर अंधकार है। वही से जीवन पनपता है, वही से जीवन की उत्पती है, वही से जीवन का परिवर्तन है। वह तुम्हारे सम्पूर्ण अस्तित्व को भूमि की और खींचती है। वह पुरूष की अपेक्षा कहीं अधिक सांसारिक कहीं अधिक व्यवहारिक और कहीं अधिक परिणाम वादी है। यहीं कारण है कि स्त्रियों में महान कवयित्रियां, महान चित्रकार और महान संगीतकार तुम नहीं पाते हो, और नहीं तुम पा भी नहीं सकते। अगर ऐसा कोई स्त्री करती हुई हम आस पास दिखलाई देती भी है तो उसके अंदर की उर्जा पुरूष प्रधान है। वह स्त्रैण नहीं है। स्त्रियां बहुत अधिक आकाश में नहीं उड़ती है। वे सदा पृथ्वी को पकड़े रहती हैं, वे अपनी जड़ों के साथ पृथ्वी में प्रवेश करती हैं। और वह एक मजबूत वृक्षों की भांति खड़ी रहती है। पुरूष कहीं अधिक एक पक्षी की भांति होता है। जब एक पुरूष विवाहित होता है, तो स्त्री उसे भूमि पर और व्यवहारिक संसार में ले आती है। कवि, विवाह नहीं करना चाहते। वे हमेशा प्रेम में ही बना रहना चाहते है और अपनी इस बीमारी का उपचार नहीं करना चाहते।
प्रेम एक
उत्तेजनापूर्ण और तीव्र ऊर्जा है। इसी तरह घृणा में भी उत्तेजना होती है। लेकिन
उपेक्षा या उदासीनता उत्साहहीन, जमी हुई बर्फ की तरह
ठंडी होती है। तुम प्रेम घृणा और उदासीनता के बारे में इसी पैमाने पर विचार कर
सकते हो: ठीक घृणा और प्रेम के मध्य में वहां एक शून्यता का बिंदु होता हैं—ठीक जैसे की एक थर्मामीटर में वहां एक ‘जीरो प्वाइंट’
होता है। जिसके नीचे ठंडक होती है और उसके ऊपर उष्णता होती है।
प्रेम एक उत्तेजना हैं एक आवेग है जीरो बिंदु पर घृणा है; उसे
नीचे तुम और भी ठंडे हो जाते हैं। तुम बर्फ की तरह जम कर-उदासीन हो जाते हो। यदि
प्रेम विकसित नहीं होता है, तो वह नीचे की और गिरना शुरू हो
जाता है। उसे गतिशील होना ही होता है।
प्रेम एक ऊर्जा है;
ऊर्जा गतिशील होती है। यदि वह गतिशील होती है तो तुम शीघ्र ही पाओगे
कि वह अब और प्रेम नहीं रहा है, वह ध्यान बन गया है, वह प्रार्थना पूर्ण बन गया है। तंत्र का पूरा मार्ग यहीं हैं—कि यदि प्रेम ठीक से विकसित होता है, यदि प्रेम की
प्रवृति की सावधानी से देखभाल की जाती है तो वह प्रार्थना पूर्ण बन जाता है। वह
अंतिम रूप से धार्मिकता का सर्वोच्च अनुभव बन जाता है।
जब कोई व्यक्ति उस
प्रेम की ऊर्जा को केवल पहली बार महसूस करता है। तो वह उस व्यक्ति के लिए ये एक विचित्र
रहस्य बन कर खडी हो जाती है। क्योंकि वहां बुद्धि अपना कार्य नहीं करती क्योंकि
बुद्धि उस रहस्य को समझ ही नहीं सकती। उसके लिए तो हमें ह्रदय के वो द्वार खोलने
होगे, जिसके खोलने से प्रत्येक प्राणी डरता है। क्योंकि वह द्वार जितनी तुम्हें
स्वतंत्रता देते है। उतने ही रहस्य पूर्ण तरह से तुम्हें अपने में समेट भी लेते
है। आप उस शिकारी की तरह से होते हो जहां आप खुद अपना ही शिकार खुद कर रहे होते हो
और दूर तब अपने को छला हुआ सा महसूस करते हो। क्योंकि हमारा मन इस तंतु जाल को खोल
या सुलझा नहीं सकता। उसे वह जितना बौद्धिकता से समझने की कोशिश करेगा। उतना ही उस
में उलझता चला जायेगा।
ठीक यहीं हालत सोनी
के साथ घटी वह घटना है। वह प्रेम के लिए प्यासी तो थी परंतु अपनी प्यास को देख और
समझ नहीं पा रही थी। जैसे नदी जो अनंत की प्यास बूझा रही है वह खुद अंतस में एक
प्यासी ही तो है। इसी लिए प्यासों की और उसका प्रेम बहता है। वह उसे खुद प्यासी रह
कर भी समझ नहीं पाती की वह कैसे तृप्ति को महसूस करें। परंतु पेंटल के जीवन में
आते ही। एक बूंद मोती की तरह से जैसे ही सीप में गिरी वह तुरंत सागर की गहराई में
जाकर विश्राम मुद्रा में लीन हो गई। अब वहां न बैचेनी थी और न ही जलन। उस बूंद की
प्यास वहां सब शांत हो गयी। ये बात खूद सोनी भी अपने अंदर महसूस कर रही थी। खूद के
अलावा उसके आस पास के लोग भी इसे जान और देख रहे थे। उनके पति देवधर करकरे भी, उनके लिए अब सोनी एक रहस्य बन गई थी। परंतु सच मन उनका भी एक ऐसी ही सोनी
की चाहत करता था। परंतु उपर से मन में एक अनबूझी वासना जो जवानी की तलाश और शरीर
और मन की मांग अलग थलग किए थी। यही तो मानव की बीमारी है। परंतु फिर भी सोनी ने जब
देवधर करकरे से शादी की थी तो लोग सोच रहे थे की अनमेल विवाह है, देखा एक दिन अवश्य ही टूट जायेगा ज्यादा दिन चलेगा नहीं।
और घर के नौकर चाकर
तो अब सोनी के इस बदलाव को देख कर बहुत ही खुश हो रहे थे। सोनी ने ड्राइवर राम दास
को बुला कर कहां की कई दिन से हम काम में इतने उलझे रहे कि हमें नेहा लता और नानी
का हाल चाल पूछने का ध्यान ही नहीं रहा। अभी तुम्हें कुछ काम न हो तो एक बार उनका
हाल चाल पूछते हुए आ जाओ। क्योंकि नानी का मकान रास्ते से हट कर एक देहात की और
पड़ता था जो न बाजार के मार्ग में और नहीं स्कूल के मार्ग में आता था। उसके लिए
केवल आपको वही जाने का चुनाव करना होता था। तब ड्राइवर ने कहा की हां इस बात का
ख्याल कई दिन से मुझे भी आ रहा था दीदी। की वो लोग क्या सोचेगें की कितने दिन हो
गए हमारी सुध भी नहीं ली। उस दिन दवा दिलवाने के लिए ले कर गया था, वह भी आधा-अधूरा ही। अभी तो मुझे साहब के साथ स्कूल जाना है। तब पता नहीं
वहां पर इंतजार करना हो या नहीं कहा नहीं सकता। परंतु अगर समय मिला तो मैं खूद ही
चला जाऊंगा। तब सोनी ने कहा की तब तो ठीक है। क्योंकि उधर से पेंटल के फोन का भी
कोई जवाब नहीं आया था। कि वह नेहा लता के घर गया या नहीं। उन के माता पिता को उसने
फोन तो कर दिया था। परंतु आमने सामने बात हो जाये तो दिल को थोड़ी अधिक राहत मिल
जाती है।
इधर पता नहीं नेहा
लता ने अपने माता पिता को पत्र लिखा या नहीं। चलों खेर तुम आज जा रहे हो सब बातों
का पता चल जायेगा। उधर नेहा लता और नानी भी सोनी से मिलने के लिए सोच रही थी कि न
जाने उसके गर्भ के दिन पूरे हो गये लगते है, उस की भी
कुछ सुध नहीं ली। दोनों और से एक ही विचार चल रहा था। जैसे एक दूसरे के विचार
संप्रेषण हो रहे हो। यह हम सब के साथ अकसर होता है। जिससे आपके हृदय के तार अति
गहरे से जूड़े हो तो उसके भाव संदेश की एक महीन सी तरंग आप तक पहुंचती है। परंतु
उस सब को महसूस करने के लिए संवेदना चाहिए। हम अति बेहोश जीवन जीते है। है इसलिए प्रकृति
की भाषा या उसके पद चाप नहीं सून और न ही महसूस कर पाते है।
पेंटल को जब सोनी
ने फोन पर नेहा का हाल चाल बतलाया था। तब उसे बहुत अच्छा लगा था। परंतु वह काम में
इतना उलझा हुआ था की वहां नेहा लता के घर जाने का समय ही नहीं निकाल पा रहा था।
उधर नेहा लता के माता पिता भी अपनी बेटी के विरह में कुछ परेशानी महसूस कर रहे थे।
कम से कम तीन चार सप्ताह तो गुजर गये थे। इस लिए पेंटल को वहां जानें में एक झिझक
भी आ रही थी। की उस और सोनी क्या सोचेगी और दूसरी और नेहा लता के माता-पिता
सोचेंगे की जब अपनी गर्ज थी तो यहां दिन रात आते रहते थे। और अब उनकी दूख दर्द का
हाल सुनाने का समय भी नहीं निकाल पा रहा है। परंतु सच ही दफ्तर का कम की अधिक था
और उपर से काम का बोझ वह तो अति कठिन हो गया था। क्योंकि बीच में जो उसे तीन-चार
महीने की छुट्टी ली थी वो काम का बोझ इतना बढ़ गया था की उसे देर रात तक काम करना
होता था। फिर रोज के कम बोझ भी जुड़ता ही जा रहा था। परंतु वह काम से घबराता
बिलकुल ही नहीं था। थकावट तो उसे भी होती थी परंतु काम तो काम है उसे तो करना ही
है। फिर रोना क्यों अकसर हम लोगों को इस तरह से देखते है कि जब आपको काम की तलाश
होती है तो लगता है कि कोई भी काम कितना भी कठिन क्यों न करना हो, वह किसी काम को मना नहीं करेगा। परंतु नौकरी मिलने पर कम लोग ही काम को
पूजा समझ कर करते थे। ये संवेदना पेंटल जी में थी यही उनका गुण था यही उनका गौरव
था। इसलिए उनके मालिक हमेशा उनसे बहुत खुश रहते थे। वह दफतर के काम को अपना ही
समझता था। वह समझता था अगर काम को समय पर खत्म नहीं किया गया तो एक-एक दिन कम्पनी
को अधिक भुगतान करना होता है।
इसलिए तीन-चार
महीने तो काम पर नहीं आने पर उनके मालिक ने उनकी तनख्वाह एक रूपये भी नहीं काटी
थी। पेंटल ने मना भी किया था कि सर दो महीने की तो छूटी है परंतु आप चार महीने की
अधिक तनख्वाह क्यों दे रहे हो। तब उसके मालिक ने कहां की तुम अपने काम से काम रखो तनख्वाह
कितनी देनी है या नहीं देनी है ये हमारा काम है। परंतु आज तो उसने सोच लिया था कि
कुछ भी हो इस बार का जो रविवार आयेगा वह तो नेहालता के माता-पिता से जरूर मिलने के
लिए चला ही जायेगा। इसलिए जब शनिवार आया तो आधे दिन का अवकाश होने पर भी वह घर
नहीं गया वैसे देखा जाये तो करीब इन चार पाँच महीनों से उसे शनिवार को आधा अवकाश
कभी लिया ही नहीं।
काम खत्म कर वह घर
पहुंचा तब रात के नौ बज गए थे। खाना खा कर वह सो गया की सुबह उसे जल्दी उठना होगा।
क्योंकि वह काम से इतना थक जाता था की उसकी आँख दस बजे से पहले खुलती ही नहीं थी।
चाय पीते-पीते नहाते कपड़े धोते हुए ही एक दो बज जाते थे। तब घर से निकलने का मन
ही नहीं होता था। इसलिए वह कई महीने से नेहालता के घर जा नहीं पा रहा था। उसने
घड़ी में सुबह सात बजे का अलार्म लगा लिया था। उठते ही उसने पहले स्नान किया और
फिर एक कप चाय पी और कपड़े पहन कर चल दिया। क्योंकि नेहालता का परिवार बम्बई के
दूसरे किनारे पर रहता था। उस पार दूसरे छोर पर जाने में कम से कम दो-तीन घंटे का
सफर हो ही जाता था। उसके बाद स्टेशन से उतर कर करीब एक घंटा वह पैदल भी चलता था।
वह जानता था की वहां जाते-जाते 10-11 तो बज ही जायेंगे।
फिर भी उसने आज सोच
लिया था की मुझे आज मिस्टर मल्होत्रा से मिलना ही है। और वह स्टेशन से उतर कर पैदल
ही चल दिया। क्योंकि वहां आटो वाला जाने के लिए नखरे अलग दिखला रहा था। तब पेंटल
ने सोचा थोड़ा घूमना भी हो जायेगा। परंतु चलते-चलते एक घंटा लग गया। जब वह कोठी के
गेट पर पहुंचा तो काफी धूप हो गई। माली ने भी अपना काम करना बंध कर दिया था।
क्योंकि इस समय काफी धूप थी उसने गेट खोल कर आवाज दी। माली ने उनकी आवाज सूनी और
पहचान गया। कि ये तो कोई परिचित ही है। तब उसने गेट खोल कर कहां की आओ बाबूजी कई
दिनों बाद आये। नेहा लता बेटी तो वहां पर ठीक है। हम लोग तो यहां काफी फिक्र कर रहे
थे। और उन्हें ले जाकर ड्राइंग रूम में बैठा दिया और अंदर जाकर संदेश दिया। अंदर
से नेहा लता की माता और पिता आये और पेंटल को देख कर खुश हो गए। अरे बेटा हम तो कब
से आपकी राह तक रहे थे। तब सोचा जरूर कोई जरूरी काम में उलझ गये वरना तो यहां आये
बिना नहीं रह सकते थे।
उठ कर पेंटल ने जे.
के. मल्होत्रा और राजेश्वरी मल्होत्रा के आगे बढ़ कर पैर छुए दोनों ने आशीर्वाद दिया।
और सब बैठ कर बात करने लगे। तब पेंटल ने कहां की शायद आपको संदेश तो मिल गया होगा।
वहां सब ठीक है। और नेहा लता के जाने से सोम प्रकाश की बीमारी भी बहुत तेजी से कम
होती जा रही है। वैद्य जी के पास सोम प्रकाश को लेकर जब वो लोग गए तो उन्हें काफी
सकारात्मक परिणाम मिला। महात्मा जी भी कह रहे थे, अब
काफी उम्मीद है। वह जल्दी साधारण जीवन जीना शुरू कर देगा। तब राजेश्वरी मल्होत्रा बेटा ये तो सब ठीक है परंतु मन नहीं
मानता इतनी दूर बेटी है। नेहालता की शक्ल देखे भी कितने महीने हो गए। वह अकेली कभी
इतने दिनों तक हमसे अलग नहीं रही है। सिवाय इस बीमार को छोड़ कर। परंतु बीमारी के
बाद तो वह अति प्रेम पूर्ण हो गई थी। इन चंद दोनों में हम दोनों को लगाता था की ये
तो हमारी नेहालता है ही नहीं।
तब मल्होत्रा जी ने कहां की आप भी कैसी बातें करती हो नेहा
लता की मम्मी वह अब बड़ी हो गई है। वह अपना अच्छा बुरा समझ सकती है। यहीं सब तो
बच्चों में एक विश्वास भरता है। बच्चे के अंदर एक अपना पन आत्मविश्वास पैदा होता।
उसके सोचने समझने की शक्ति बढ़ती है। और आगे आने वाला समय उसके लिए बहुत सही और सुंदर
होता चला जाता है। तब नेहा लता की मम्मी ने कहां वो तो आपके ज्ञान की बाते है। जो
मेरी समझ में नहीं आती। परंतु बेटा सच बतला वहाँ पर नेहा का मन तो लग गया है।
तब पेंटल ने कहां
हां माता जी आप विश्वास करें की नेहा लता वहाँ एक दम से खुश है। और वहाँ जाकर उसने
सब का दिल जीत लिया है। तब पेंटल ने वहां का सब हाल चला बतला कर नेहालता के माता
पिता को विश्वास दिला दिया की वह एक दम से ठीक है। और अभी दफ्तर में काम का बोझ
है। और अगर माता जी आप जाना भी चाहती है तो कम से कम पाँच या छह महीने तो इंतजार
करें। क्योंकि आपके जाने से नेहा लता का ध्यान सोम प्रकाश की और से हट जायेगा। वह
जिस तन मन से कार्य कर रही है। उसकी वो तपस्या है। उस तपस्या में हमें विघटन अवरोध,
या रूकावट नहीं डालना चाहिए।
तब अचानक गिरधारी
लाला ने आकर सबकी बात को बीच में ही भंग कर दिया की बाबूजी आप सब खाना खा लो। उसके
बाद आराम से बैठ कर आगे की चर्चा करना। क्योंकि खाना ठंडा हो जायेगा। मल्होत्रा जी
ने कहां पेंटल जी चलों आप भी हमारे साथ आप तो घर से सुबह के चले दिये होगे। आपका
लम्बा सफर है। फिर इतनी सुबह क्या बनाया होगा। हम सब साथ बैठ कर खाना खाते है। सब
ने साथ बैठ कर खाना खाया सच ही घर का बना खाना अपने में कितना अपना पन समेटे होता
है। ये सब सोचते हुए पेंटल को मां की याद आ गई। उस को इस तरह विचारों में खोया हुआ
देख कर राजेश्वरी मल्होत्रा ने उसके विचारों को भंग किया की क्या सोच रहे हो। खाना
खाओ। तब पेंटल एक दम से मानो नींद से जागा और कहां की आज का खाना खा कर मां की याद
आ गई। अपना गिरधारी लाला खाना बहुत अच्छा बनाता है। सालों पहले मां कभी इतने प्रेम
से खाना खिलती थी। अब तो अपने हाथ का बना कर खाना भी क्या कोई खाना होता है।
तब राजेश्वरी
मल्होत्रा ने कहां की अब आप शादी कर लो घर को सम्हालने वाली मिल जायेगी। ताजा खाना
भी मिलेगा। और जीवन में कुछ नया पन भी आ जायेगा। हां अम्मा आप ठीक कहती है। परंतु
आज के जमाने में लड़की कहां मिलती है। और दूसरा न मेरे पास अपना मकान है,
एक खोली में किसी तरह से गुजर बसर हो रही है। शादी के बाद तो एक
मकान चाहिए। इसलिए शादी की सोच कर ही घबराहट होती है। और बात इस तरह शुरू हुई की
जो तनाव था या नेहालता के विछोह का जो दूख
था, वह हंसी में बदल गया। सब हंसने लगे।
सोनी के साथ जब से
मुलाकात हुई है। पेंटल के जीवन में एक नई पूर्णता आ गई थी। उसका सोचना,
रहना जीवन शैली के अलावा उसकी पूरी तरंग ही बदल गई थी। परंतु पहले
तो वह कभी-कभार शादी के विषय में सोच भी लेता था। या गांव से चाचा-चाची का कभी खत भी
आ जाता था। की तुम आ जाओ तुम्हारे लिए एक लड़की देख रखी है। तब उसका भी मन करता की
अब तो जीवन में थकान महसूस होने लगी है। अब इस मोड़ पर आकर लगता है की काई तो साथ
चलने वाला चाहिए अकेले चलते हुए बहुत अकेला पन और सूना पन महसूस हो रहा था। परंतु
जब से वह सोनी से मिला है। तो उसने इस शादी के विचार को लगभग छोड़ ही दिया था। अपने
जीवन के मार्ग से वह रास्ता बंद कर दिया जो शादी की गलियों की और जाता था। उसने
सोच लिए था अब इस दिल में इस जीवन में दूसरे का प्रवेश नहीं चाहिए। उसके अंदर एक
तृप्ति का भाव प्रवेश कर गया था। प्रेम एक ऐसी तृप्ति देता है जिसकी एक बूंद मात्र
से आपकी जन्मों की प्यास सुधा पूर्ण हो जाती है। ऐसा सब के साथ नहीं होता। क्योंकि
इसके लिए एक तो आपके अंतस में पूर्ण प्यास होनी चाहिए। दूसरा आप उसे ग्रहण कर सकने
में सामर्थ्य है या नहीं ये भी तो उतना ही जरूरी है।
इस तरह से अपने में
खोया देख कर नेहा लता के माता पिता कुछ बैचेन से हो गये थे। कि आप इस तहर से उदास
हो गए है क्या कोई ऐसी बात हो गई है जिसे आप हम से बतलाना नहीं चाहते। तब पेंटल को
ख्याल आया की वह कहां है। उसने अपने को सम्हाल कर कहां नहीं मैं सच वहां के बारे
में सोचने लगा की वो सब कैसे होंगे। अगर सोम प्रकाश ठीक हो गया तब हम क्या करेंगे।
ऐसी कोई भी बात नहीं है। आप घबराना मत। जब हमारी नियत में कोई दोष नहीं तो कुछ भी
गलत नहीं हो सकता। तब नेहा लता की मां ने कहा की ऐसा ही हो। परंतु बेटा मन तो
कांपता ही है। मेरा तो यहां पर एक पल के लिए भी मन नहीं लगता। तब पेंटल ने कहां की
बहुत जल्दी चलेंगे। जरा वहां पर गाड़ी को पटरी पर आ जाने दो। और माहोल में जो उदासी
भर गयी थी उसे पेंटल ने कम करने की कोशिश की। खान कब का खत्म हो चूका था। गिरधारी
लाला कब के वर्तन उठा कर ले गया था।
और अब तो वह चाय भी
बना कर ले आया था। उन्हें बातों में समय का पता ही नहीं चला। श्रीमति मल्होत्रा ने
कहा की अरे गिरधारी इतना समय हो गया। तुम चाय भी बना लाये। खेर तुने ठीक किया आज
तो तुझे आराम का मोका भी नहीं मिला और चाय पीकर पेंटल ने कहां की अब आज्ञा दे। भारी
मन से उसे श्री मल्होत्रा और श्रीमति मल्होत्रा ने विदा लिया। आज अपने मन का कितना
भार वह उतर कर पेंटल जा रहा था। उसे अपने अंदर एक हलका पन महसूस हो रहा था।

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