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गुरुवार, 3 सितंबर 2026

54 - कैसे भरूं तुम मैं अंजुली में – (कविता) - ओशो की मधुशाला

54 - कैसे भरूं तुम मैं अंजुली में – (कविता)  - मनसा-मोहनी 

कैसे भरूं मैं तुझे, इस छोटी सी अंजुरी में।

तुम कहां समा पाते हो ह्रदय के आंगन में।

 

मत पूछो मेरी कविता को आशय अब मुझसे।

मैंने मन की वेदना कभी कही है क्या तुझसे।

 

टीस दर्द के पैबंद चुन कर बना मेरा ये गान।

तुम मेरे हो मैं तेरा हूं अब नहीं मुझे अभिमान।

 

न ये मेरी साधना है न आराधना, न साध्यता।

रच जाती है यूं ही विरह प्रीत में ये संभाव्यता।

 

प्रीतम तेरी जीवित आंखें, कुछ कहती सी लगती।

मेरे जीवन की बगिया में, मधुमास फैलाती जाती।

 

ये आती-जाती श्वास मेरी तेरा नाम पुकारा करती।

दूर चातक के गीतों में कोई दर्द विरह का भर जाती।

 

जो मिल पाते एक पल भर तो, मैं बार-बार न मरती।

इन छवियों-प्रति छवियों के नित रूप-अनेक क्‍यों धरती।

(ओशो की मधुशाला) 

मनसा-मोहनी दसघरा 

 

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